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गुरुवार, 5 मार्च 2009

आत्मकथा-----------प्रेम की

मैं प्रेम हूँ,प्यार हूँ,इश्क हूँ,मोहब्बत हूँ,इक अहसास हूँ,खुदा हूँ और न जाने क्या क्या हूँ.हर किसी के लिए अलग.किसी के दिल का चैन हूँ तो किसी के दिल का दर्द,किसी के लिए ख्वाब हूँ तो किसी के लिए हकीकत,किसी का जीवन हूँ तो किसी के लिए मौत...........................सबके अहसास , सबके दायरे, सबकी सोच सब अलग मगर फिर भी एक अलग पहचान लिए मैं हर दिल में पलता हूँ किसी न किसी रूप में.कभी प्रेमी के प्रेम में तो कभी माँ के दुलार में,कभी पिता के अहसास में तो कभी बेटी के जज़्बात में,कभी बहन के रूप में तो कभी भाई के रूप में,कभी पत्नी के खवाबों में तो कभी पति के दिल में,न जाने कितने ही असंख्य रूपों में लोग मुझे जानते हैं और मेरे साथ जीते हैं अपने हर गम और खुशी के पलों को.किसी ने मुझे इंसान में देखा तो किसी ने भगवान में , मगर पूरा किसी ने न जाना। जब जाना नही तो पाना कैसा?
मेरा रूप-सौंदर्य शाश्वत है। मैं कभी नही मरता,हमेशा हर हाल में जीवित रहता हूँ.मैं गीतों में , रंगों में,रूपों में जो भी जैसा चाहे ,हर हाल में ढल जाता हूँ.जिस बंधन में भी कोई बांधना चाहे बंध जाता हूँ। मेरा मुझमें कुछ नही है,जो कुछ है वो सामने वाले के मन में ,उसके विचारों में , उसकी सोच में , उसकी आंखों में ,उसके दिल में है, जैसा भी चाहता है मुझे रूप दे लेता है।
मेरे आनंद में सराबोर हर प्राणी मुझमें ही खुदा ढूंढता है और सच मानो तो खुदा बसता भी तो प्रेम में ही है.प्रेम को जानना क्या इतना आसान है.प्रेम को तो सिर्फ़ कुछ लोगों ने जाना और जिन्होंने जाना उन्होंने ही पाया.प्रेम हो तो राधा सा,मीरा सा -------जहाँ शरीर तो थे ही नही। था तो सिर्फ़ ---------प्रेम.प्रेम के अलावा वहां कुछ न था। क्या रस था , क्या आनंद था। इसे कहते हैं ----------प्रेम।
शाश्वत सत्य ,चिरंतन,दिव्यता के पार। मुझे जानना और पाना हर किसी के बस की बात कहाँ!मैं तो रस का महासागर हूँ जहाँ प्रेमी डूबते ही हैं-------बहुत गहरे अनंत में.
बहुत से लोगों ने मेरे बारे में न जाने सदियों से कितना लिखा और आज भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे मगर फिर भी मैं किसी की भी कविता में ,किसी भी लेख में क़ैद न हो पाया क्यूंकि मैं अनंत हूँ मैं भी शायद अपने बारे में पूरा सच नही बता सकता क्यूंकि मैं क्या हूँ -------------ये तो सिर्फ़ मुझमें डूबने वाला ही बता सकता है । जिसने इस रस में डुबकी लगायी है वो ही जानता है कि -----------मैं प्रेम हूँ.

11 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

प्रेम अमर है, प्रेम अजर है, बनी नही परिभाषा है।
ढाई आखर को पाने को, सबके मन में जिज्ञासा है।

जीवन के हर चैराहे पर, बस इसके ही किस्से है,
चाहे जितना पान करो, पर बुझती नही पिपासा है।

तन-मन जिसमें खो जाता है,यह ऐसा भवसागर है,
शब्दो में यह बंधा नही है, इसकी अपनी भाषा है।।

SWAPN ने कहा…

BAHUT SUNDER LEKH, LEKH NAHIN MAIN TO ISKO EK SAMPURNA KAVITA KAHUNGA,PREM MEN BAHUT GAHRAI TAK UTRE HO BHAI, PHIR BHI KAHTE HO PREM KO KOI NAHIN JAANTA YAH AAPKI MAHANTA HAI, KUCHH BHI HAI LIKH BAHUT ANUPAM HAI . BAHUT-2, BADHAI.

शोभा ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा आपने इस ढाई आखर पर

Rahul kundra ने कहा…

sundar

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

प्रेम की आत्मकथा बहुत ही अच्छी लिखी गई है। लाजवाब।

विनय ने कहा…

वाक़ई बहुत सुन्दर लिखा है~

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चाँद, बादल और शाम

Prem Farrukhabadi ने कहा…

Vandana ji,
10 bar prem shabd ka prayog karke poori rachna ko prem meim dubo kar prem may bana diya. ye to rahi rachna ke dikhavati roop ki baat.bahut achchhe dang se rachna ko roop diya hai.

aantrik taur par rachna apne aap mein athaah roop liye hue hai.kahin kahin par pyar ko khushi ka naam diya to kahin par dard ka roop.
pyar ke ye dono roop hi pyar ko paribhaashit karte hain. rachna sarahneey hai. bahut bahut badhaai.

अनूप शुक्ल ने कहा…

जियो भैया प्रेमकुमार!

ishwar ने कहा…

bahan ko saadar pranaam......ni-shabd hu.aap aapake bhaw,komal hraday ki bhasha,nishchhal prem k roop ,ko bhi mera pranaam,bas yahi prarthana karata hu ki maa saraswati aapake lekhani ko wo shakti pradan kare jisase aap apane nishchhal/ganga rupi pavitr bhavanao se bhujhe logo k hraday ko prakashit kar unake jeewan ko ek disha/prakash de sake,aapaki rachana ne mere hraday ko bhaw vibhor kar diya ,atah mai ek tuchh prani jisane aap mai ek bahan /maa ka roop dekha hai,punah pranaam, iti ishwar