पृष्ठ

अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

मंगलवार, 28 जून 2011

इतनी जल्दी क्या थी

देखो आज
मुझे जरूरत थी
मगर तुम नहीं हो
ऐसा क्यूँ होता है
हमेशा .............
कभी तो सुन सको मेरे दिल की जुबान
कभी तो बांध सको रेत को मुट्ठी में
कभी तो लगा दो गांठ चुनरी में
कभी तो फाँस बिना चुभे भी निकाल दो
देखो आज तुम्हारी ...........
तुम्हारे बिन
कुम्हला गयी है
देखो कहीं ऐसा ना हो
जब तुम आओ
और देर हो जाये
तुम्हारी ........
ज़िन्दगी की धड़कन सो जाये
और तुम कहो
जानां  ...........इतनी जल्दी क्या थी जाने की
मैं आ तो रहा था ..............

शुक्रवार, 24 जून 2011

कहो ना ..........

उस दिन जब तुमने
उसे पसंद किया
और मैंने भी छुआ
तो एक तरंग सी
अहसासों से गुजर गयी
एक नमकीन सा अहसास
दिल में धड़क गया
स्पर्श का ऐसा अहसास
तो पहले कभी नहीं हुआ था
क्या तरंगें वस्तुओं से भी
पहुँचती हैं या हमारे दिल

इतने जुड़ चुके हैं कि
तरंगे वस्तुओं से गुजरकर
भी हम तक पहुँच जाती हैं
ये कैसे संकेत हैं
क्या प्रेम की तरंगें
इतनी गहरी होती हैं
या प्रेम तरंगें ऐसे ही बहती हैं
बिना माध्यम के
दिल की तारों पर
मचलते स्पंदनों में
ए क्या तुम्हारे साथ भी
ऐसा होता है
क्या तुमने भी कभी
मुझे यूँ ही महसूस किया है
बिना स्पर्श के
मगर अहसास और अनुभूति में
जीवंत किया हो
कहो ना ..........

मंगलवार, 21 जून 2011

हिचकी

सुना था
कोई याद करे
कोई बात करे
कोई बारिश में भीगे
कोई सपनो में देखे
कोई ख्यालो में संजोये
तो हिचकी आती है
मगर देखो ना
मैं तो इक पल को भी
कभी तुमको भूली ही नहीं
यादों से कभी तुमको
रुखसत ही नहीं किया

ख्यालों में …दिन में
सपनो में …रात में
भीगी भीगी बरसात में
फिर चाहे आसमानी हो
या रुहानी
तुम और तुम्हारी यादों को हमेशा भिगोये रखा

बताओ ज़रा ……
कभी एक सांस भी
ले पाये मेरी हिचकियों बिन
या ये मेरा कोरा भरम था
तुम्हें कभी हिचकी आयी ही नहीं

शुक्रवार, 17 जून 2011

जो मानस का मोती बन पाता

ढूंढती हूँ मानस का मोती
शायद कहीं मिल जाए
जो छूट गया है आँगन में
फिर से मुझे मिल जाये

इक नदी सी मुझमे बहती थी
अठखेलियाँ लेती थी
दिन रात की कशमकश में
कोई अधूरी सुबह  मिल जाये

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए

उर की धधकती ज्वाला में
ना स्नेह का कोई गीत जगा
बरसों तलाशा है जिसको ,वो
 कहीं ना मन का मीत मिला

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर  मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता
मुझे जीने का सबब दे पाता


मंगलवार, 14 जून 2011

और कविता लौट गयी कभी ना मुडने के लिये…………

सोच की आखिरी सीढी पर जाकर कविता फिर मुडती है
और कहती है
कहां से शुरु करूँ
तुम अब तुम न रहे
मै अब मै न रही
न तुम्हारे जज़्बात मे
वो आंधियां रहीं
ना तुम्हारी कलम मे
वो स्याही रही
जिसमे लफ़्ज़ रूह
बनकर उतरते थे
और दिल पर
सुबह की ओस से
गिरते थे
फिर कैसे तुम करोगे
मुझे व्यक्त
अव्यक्त हूं और
अब अव्यक्त ही
रह जाऊंगी
क्योंकि अब
दीवारों पर
कांच का प्लास्टर
चढा रखा है
सब दिखने लगा है
आर -पार
तुम्हारे भीतर का
भयावह सच
तुम अब मुझे
जीते नही हो
उपभोग की
सामग्री बना दिया
मेरा क्रय विक्रय किया
और मेरे वजूद का
हर कोण पर
बलात्कार किया
क्योंकि अर्थ यूं ही
नही मिला करता
ज़माने की नब्ज़
के आगे तुमने भी
सिर झुका दिया
फिर कैसे करोगे
तुम मुझे व्यक्त
अब तुममे वो
चाशनी बची ही नही
वो अमृत रहा ही नही
आखिर तुमने भी
बाज़ारवाद की भेंट
चढा दिया मुझे
लौटा रही हूं
तुम्हारा अक्स तुम्हे
अब नही मिलूंगी
किसी दिल के बाज़ार मे
करवट बदलते
अब नही मिलूंगी
किसी गरीब की झोंपडी मे
आग सेंकते
अब नही मिलूंगी
किसी छंद मे बंद होते हुये
अब सब मिलेगा तुम्हे
मगर नही मिलेगा तो बस
स्वान्त: सुखाय का अर्थ
जाओ जी लो अपनी ज़िन्दगी
और कविता लौट गयी
कभी ना मुडने के लिये…………

शनिवार, 11 जून 2011

मैंने कहा था ना

मैंने कहा था ना
जो नकाब डला है
डाले रहने दो
मत करो बेनकाब
एक बार यदि
बेनकाब हो जाये
फिर कितनी सदायें भेजो
कितने ही सितारे
आसमा में टांको
कितना भी अब
दुल्हन को सजाओ
कोई भी चूनर उढाओ
एक बार बेनकाब होने पर
अक्स सच बोल देता है
और फिर ये तो
एक रिश्ता था
तुम्हारा और मेरा
अन्जाना रिश्ता
कहा था ना
मिलने की ख्वाहिश को
ज़मींदोज़ कर दो
मगर तुम नहीं माने
और देखा
जब से मिले हो
सारे भ्रम टूट गए
और तुम जो मुझमे
अपना अक्स देखते थे
वो आईने भी टूट गया
जानती हूँ तभी
तुमने अब मेरी
मिटटी पर अपने
निशाँ छोड़ने बंद कर दिए
जानती हूँ तभी तुमने
अपने आसमाँ अलग बना लिए
काश ! तुमने पर्दा ना हटाया होता
तो चाँद घूंघट में ही रहा होता
यूँ बेबसी की आग में ना जल रहा होता
सच की आँच में झुलसा ना होता
और तेरा पैमाना ना छलका होता
जीने के लिए किवाड़ की ओट ही काफी होती है

बुधवार, 8 जून 2011

प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

आज भी याद है 
वो पहले मिलन की
पहली खुशबू
सांसों के साथ महकती सी 

वो तुम्हारी नागिन सी
बलखाती ,लहराती 
वेणी जब मेरे सीने से
टकराई थी 
इक आह सी निकल आई थी 
तुम बिलकुल मेरे
पीछे ही तो थीं
जब तुमने
लापरवाही से
अपनी करीने से बंधी
वेणी को पीछे झटका था
उस वेणी का पहला स्पर्श
आज भी मदमाता है
और जब मैंने पलटकर
तुम्हें देखा तो 
न जाने गुस्सा 
कहाँ काफूर हो गया 
और तुम्हारी 
चंचल मुस्कान
बेफिक्र अदा
बात- बात पर 
खिलखिलाना 
होशो -हवास 
गुम करने के लिए
काफी था 
और तुम 
अपनी दुनिया में मस्त थीं 
तुम्हें पता भी न था
कि किसे घायल कर दिया
किसी को अपनी ज़ुल्फ़ों का
कैदी बना लिया 


देखो आज भी 
तुम्हारी वेणी
मेरे ह्रदय आँगन में 
पहाड़ों की सर्पीली 
राहों सी बलखाती है 
मैं इन राहों में
खो जाता हूँ 
और तुम्हें ढूंढता हूँ 
प्रिये , ये कौन सा 
मुकाम आ गया 
ज़िन्दगी का 
वो अल्हड़ता , चंचलता 
उन्मुक्त हंसी 
आज ढूंढता हूँ
तुम में उसी कमसिनी को
फिर ढूंढता हूँ एक बार
तुम्हारे साथ 
उसी पल को
जीना चाहता हूँ
प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

पास होकर भी 
क्यूँ दूर हो तुम 
पता नहीं 
वक्त अजीब होता है
या रिश्ते 
मगर मैं तुम्हारे 
प्रेम की वेणी में आबद्ध 
वो प्रेम पुष्प हूँ 
जो आज भी 
तुममे तुम्हें ढूंढता है        

शुक्रवार, 3 जून 2011

एक सच और टूट गया

मुझे पता था
जाओगे एक दिन
तुम भी छोड़कर
टूटे हुए मकबरों पर
कौन चराग जलाता है
शायद तभी शाम अब
दिया बाती नहीं करती
जानती है ना कोई नहीं आएगा
बुझे चराग रौशन करने
क्या हुआ जो आज
एक सच और टूट गया
यूँ भी मरे हुए को ही
दुनिया भी मारती है
क्या हुआ जो तुमने भी
ज़ख्मो पर नमक छिड़क दिया
आखिर कब सिसकती
शामों को सुबह मिली है

सोमवार, 30 मई 2011

प्रेम का कैनवस

तुम्हारी ख्वाबों की दुनिया 
का कैनवस कितना
विस्तृत है 
है ना ...........
उसमे प्रेम के 
कितने अगणित रंग
बिखरे पड़े हैं 
कभी तुम मेरे साथ
किसी अन्जान शहर की
अन्जान गलियों में 
विचर रहे होते हो   
तो कभी तुम 
मेरे जूडे में 
फूल लगा रहे होते हो 
कभी तुम किसी 
मंदिर की सीढ़ी पर 
मेरे प्रेम की 
आराधना कर रहे होते हो
तो कभी किसी 
बियावान  में 
अकेले , तन्हा 
मेरी यादों के साथ
भ्रमण कर रहे होते हो
कभी तुम किसी 
गुलमोहर से मेरा 
पता पूछ रहे होते हो
तो कभी किसी
अन्जान स्टेशन पर
मुझसे बिछड़ रहे होते हो
कभी खुद को 
लहूलुहान कर रहे होते हो
तो कभी यादों को
ख्वाबों के दामन से
खुरच रहे होते हो 
कितना विस्तृत है
तुम्हारे प्रेम का कैनवस
कहीं भी तुम 
तन्हा नहीं होते
हमेशा मेरी यादों के साथ
अपनी ख्वाबगाह में 
सैर कर रहे होते हो
फिर कहाँ से 
यादों की परछाइयाँ 
तुम्हें सताएंगी 
वो तो हर पल
तुम्हारे साये में 
स्वयं को 
महफूज़ महसूस 
करती होंगी 
मगर देखो तो
हमारे प्रेम के
कैनवस का
दूसरा पक्ष
ज़रा पलटकर तो देखो 
इस कैनवस को
इसके पीछे 
सिर्फ और सिर्फ 
एक ही रंग है
जानते हो तुम
वो रंग जिस पर
कभी कोई रंग 
चढ़ा ही नहीं 
जो किसी के 
कपोलों पर लग जाये 
तो सुन्दरता 
निखर जाती है
है ना...........
अब देखो मुझे
उस रंग में 
क्या दिखाई देती हूँ ?
नहीं ना ..........
क्यूंकि मेरे प्रेम का कैनवस
सिर्फ मुझमे ही
सिमट कर रह गया है
उसमे तुम्हारा वजूद
न जाने कहाँ खो गया है
जब भी कोई रंग 
भरना चाहा तुमने
कैसे इस रंग में 
सिमट गया 
क्योंकि 
मैंने तो प्रेम का
सिर्फ एक ही रंग जाना है 
प्रेम कब किसका
संपूर्ण हुआ है 
विरहाग्नि की तप्त ज्वाला में
दग्ध प्रेम ही शायद
पूर्ण हुआ है 
इसलिए उसका सिर्फ 
एक ही रंग हुआ है
ख़ामोशी में भीगता
विरह का रंग
इक दूजे में 
एकाकार होता 
सम्पूर्णता को पाता 
प्रेम का रंग 
तन से परे
मन के पार
तुम्हारे और मेरे
ख्वाबों के दामन में सिमटा
सिर्फ वो ही है
हमारे प्रेम का रंग 
क्यों है ना............ 
 

गुरुवार, 26 मई 2011

यहाँ तो आसमाँ बचा ही नहीं

अब नही होगा कोई पुनर्गठन
जानती हूँ ...........
कुछ बचे तो होता है
पुनर्गठन ............
मगर जहाँ कुछ बचा ही ना हो
हाथ से लकीरें भी
छिन गयी हों
लाश से कफ़न भी
छिन गया हो
दीपक से लौ
छिन गयी हो
आसमाँ से सूरज
और धरती से वायु
छिन गया हो
वहाँ तो सिर्फ
दूर दूर तक
भयावह सन्नाटे
चीखते हैं
और सन्नाटों की चीखें
सन्नाटों में ही
दफ़न हो जाती हैं
बिना कोई आवाज़ किये
बिना अपनी पहचान दिए
तो कहो फिर
किसका हो पुनर्गठन ?
और कैसे ?
यहाँ तो आसमाँ बचा ही नहीं
फिर दिन कैसे ढलेगा
और शाम कैसे उतरेगी
सात फेरों की अग्नि
में होम हुए उस
नाम वाले बेनाम रिश्ते में
सुबह तो कब की
दफ़न हो चुकी है

सोमवार, 23 मई 2011

एक भरम और तोड़ दिया ?

चलो अच्छा है 
आज
एक भरम और
तोड़ दिया 
तुम ही कहते थे ना
दिल के उस 
हिस्से को मेरा 
वहाँ सिर्फ 
मेरा अधिकार है
वो मेरी 
अमानत है
मगर एक ही पल में
कैसे तुमने
सारे भरम तोड़ दिए
जब माँगा उस हिस्से 
को अपने लिए
तो तुमने मुझे 
गैर बना दिया 
आह ! मोहब्बत
क्यूँ ये भरम 
तोड़ दिया
कम से कम
तब तक 
ज़िन्दा तो थी
मगर अब ज़िन्दगी 
बुलाती नहीं और
मौत  गले 
लगाती नहीं
सीली लकड़ियाँ 
सिर्फ चटक रही हैं
ना बुझती हैं ना जलती हैं

मंगलवार, 17 मई 2011

मगर राखों के कोई अर्थ नही होते

जले हुये कागज़ की चिंदियाँ
और उस पर कुछ अधजले लफ़्ज़
अपने अर्थ से परे
एक नया अर्थ देते हुये
एक नयी खोज को
आयाम देते हुये
उस लफ़्ज़ के
अर्थ ढूँढते कुछ पल
एक ही क्षण मे
मटियामेट हो जाते हैं
जैसे ही छूने की
कोशिश करो
सब भुरभुरा जाते हैं
और रह जाती है
सिर्फ़ राख
सारे अर्थ अपना
वजूद खो बैठते हैं
वो जो उसके असली
अर्थ थे और
वो भी जिसके अर्थ
निकाले जा रहे थे
मगर राखों के
कोई अर्थ नही होते

रविवार, 15 मई 2011

क्या कर सकोगे तुम ऐसा

जानती हूँ
हाल तेरा तुझसे ज्यादा
जो बातें तेरा दिल
तुझसे नहीं कह पता
वो मुझे आकर बता जाता है
देख कितना अपना है
मत रातों को ख्वाब
सजाया कर
मत रात के तकिये पर
मोहब्बत सजाया कर
खामोश दीवारें
कब बोली हैं
वहाँ तो सिर्फ
मोहब्बत चिनी है
मोहब्बत की है
दर्द भी सहना होगा
वियोग का गम भी
हँस के पीना होगा
ये तू भी जानता है
और मैं भी
फिर इतनी बेकरारी क्यूँ
चाहत को मंजिल मिल जाये
तो बुलंद कब होती है
जो मिटटी में मिल जाये
हर आग में जल जाये
हर सितम सह जाये
मौत भी जहाँ
रुसवा हो जाये
तब जानना
वो ही मोहब्बत होती है
छोड़ दे रातों को जागना
छोड़ दे दरो दीवार से लिपटना
करनी है तो ऐसे कर मोहबब्बत
कि काँटों को भी रश्क होने लगे

चाँद तारे भी सजदा करने लगें
जमीं आसमाँ भी तेरे क़दमों तले
झुकने लगें
मोहब्बत में फ़ना होना बड़ी बात नहीं
मज़ा तो तब है जिए तो ऐसे
तेरे जीने से दुनिया को
रश्क होने लगे
क्या कर सकोगे तुम ऐसा
मोहब्बत की खातिर
दे सकोगे मोहब्बत का इम्तिहान

और जी सकोगे हँस कर…………

अब मोहब्बत के चिनार नही खिलते

जब तुम
अपने मन के
कैनवस पर
प्रीत के
रंग भरते हो
सच कहती हूं
मैं जीवन्त
हो जाती हूं
मगर जब तुम
उसी कैनवस पर
कुछ आडी तिरछी
रेखायें खींचते हो
मेरा वजूद उनमे
नेस्तनाबूद
हो जाता है
क्यों ऐसा करते हो?
जब जानते हो
मेरा वजूद
सिर्फ़ तुम्हारे
रंगों मे ही
सांस लेता है
तुम्हारा एक भी
गलत कदम
मुझसे मेरी
धडकन और
मेरी सांसे
छीन लेता है
और मै एक
निर्जीव ,
स्पन्दनहीन
तुम्हारे रंगों से
सजी बेहद
भयावह तस्वीर
बन जाती हूँ
जहाँ रंग भी
बिखर जाते हैं
मेरे वजूद की तरह
जबकि सुना था
रंग तो कभी
बेरंग नही होते
या तुम्हारे मन के
कैनवस पर अब
मोहब्बत के
चिनार नही खिलते

बुधवार, 11 मई 2011

इतनी नाजुक हो तुम

इतनी नाजुक
हो तुम कि
छूने से भी डरता हूँ
इतनी दृढ
हो तुम कि
नहीं टूटोगी जानता हूँ

  इतना विरोधाभास क्यूँ?
मै इतनी नाज़ुक भी नही
और इतनी पत्थर भी नही
सिर्फ़ एक रूह हूँ जो
हवा मे बहती हूँ
सांसो के संग
प्रवाहित होती हूँ
तुमने कहाँ से
ढूँढ लिया मुझमे
विरोधाभास

बस बहने दो
मुझे मेरे ख्यालो के संग
बस खिलने दो
मुझे मेरे सवालो के संग
मुझे बस मै ही रहने दो
मत बांधो अपने
दायरो मे
अह्सास हूँ
अह्सास ही रहने दो

जानता हूँ
तुम क्या हो
तभी तो कहा
मगर शायद
तुमने समझा नही
तुम मेरे अह्सासो से भी
नाज़ुक हो
तभी तो कहा
हाथ लगाने से
डरता हूँ
और क्योंकि
रूह मे बसती हो
हवा सी बहती हो
तभी तो कहा
नही टूटोगी कभी
हवा कब टूटी है
सिर्फ़ बही है
और तुम तो
मेरी सांसो मे
बहती हो
जानता हूँ
मरने के बाद भी
नही टूटोगी
मेरे संग संग रहोगी

शनिवार, 7 मई 2011

प्रेम का कोई छोर नहीं होता ………250 वीं पोस्ट

याद करो प्रियतम
वो अलबेली शाम
मौसम नमकीन था
उस पर भी शायद
शबाब का नशा
छाया था
जब एक झोंका
मेरी लट से
लिपट आया था
और मेरे कपोलो
पर अपने प्रेम का
बोसा रख आया था
और फिर तुमने उसे
अपने अधरों से हटाया था
एक ताजमहल जज्बातों का
वहीँ उभर  आया था
जिसके तुम शाहजहाँ थे
और मुझे अपनी नूरजहाँ बनाया था
और फिर तुमने अपने
बाहुपाश में मौसम की
हर शाख को समेट लिया था
जैसे किसी तपस्वी ने
अपनी सारी तपस्या का
आज फल पा लिया हो
याद है ना प्रियतम
कैसे फिर मौसम के तूफानों ने
हमें घेरा था
कितने ही चक्रवात 
भावनाओं को झिंझोड़ रहे थे
कभी मधुमास दस्तक देता था
कभी शीत सरसराती थी
तो कभी ग्रीष्म की ऊष्मा
झुलसाती थी
ओस की नमी भी
वाष्प बन उड जाती थी
मगर प्रेम अगन ना
बुझ पाती थी
कितना ही चाहे
सावन भिगोता था
मगर वो भी तपन
बढाता था
हृदयों को हुलसाता था
कभी मेघ सम छा जाते थे
कभी तडित सी कोई
चमक जाती थी
कभी सिन्दूरी शाम पर
रात का काजल लगाता था
तो कभी सुरमई सुबह पर
कोई चाँद झिलमिलाता था
वो कैसा सुगन्धित पल था
जब मेरा दामन तुझमे
भीगा जाता था मगर
फिर भी पार ना कोई पाता था
इक दूजे में खोते हम
ब्रह्माण्ड की सैर पर निकले
कभी पहाड़ों की चोटियाँ
आवाज़ देती थीं
कभी घाटियों की गहराइयाँ
खुद में समोती थीं
कभी सागर की
अथाह गहराई मे
हम डूबे जाते थे
कभी नक्षत्र इक दूजे से
टकराते थे
कभी जज्बातों के तारे
टिमटिमाते थे
और कभी बर्फीले बोसे
चहूँ ओर बिखर जाते थे
कभी ध्रुव नये बन जाते थे
और हम कभी एक
ग्रह से दूसरे ग्रह पर
अपने आकाश से
दूजे के आकाश पर
बर्फ के फाहों से
उड़ते जाते थे
मगर फिर भी
पार ना कहीं पाते थे
और हमारे अस्तित्व
इक दूजे में ही
सिमट जाते थे
ना जाने कितनी
खगोलीय घटनाये
साक्षी बनी होंगी
कहाँ कहाँ  ना खोजा होगा
उन अनन्त अपार
ऊंचाइयों को
मगर पार ना
पाया होगा
युग परिवर्तन हो
या कल्प बदले हों
तुम और मै
कभी अलग हुये ही नही
स्त्री पुरुष की भूमिका
कभी बदली ही नही
फिर भी अपरिचित 
इक दूजे से  
जन्म जन्मान्तरों से
अतृप्त प्यास 
पूर्णता को पाने को आतुर 
हर काल में 
सूरज और सूरजमुखी सा
अपना मिलन और विछोह 
यही शाश्वत सत्य है
प्रेम कभी नही बदलता
शायद इसीलिए
प्रेम का कोई छोर नहीं होता



गुरुवार, 5 मई 2011

क्यूँकि मैंने देखा है वक्त को वापस मुड़ते हुए

दोस्तों
आज की इस रचना का जन्म फेसबुक पर एक दोस्त से बात करते हुआ ..........वक्त पर बात चलते - चलते मैंने आखिरी लाइन लिखी और लिखते ही लगा कि ये तो एक कविता का सूत्रपात हो गया .........बस तभी लिखनी शुरू कर दी और जब तैयार हुई तो और भी कमाल हो गया क्यूंकि उसी दिन विजय सपत्ति जी से बात हो रही थी और वो कह रहे थे कि कभी उनके स्टाइल में कविता लिखूं तो मैंने कहा कि सबका अपना स्टाइल होता है कोई किसी को कॉपी नहीं कर सकता मगर जब ये कविता तैयार हुई तो पहली नज़र में लगा जैसे सच में विजय जी की मुराद पूरी हो गयी ..........इसलिए आज मैं ये कविता विजय जी को समर्पित करती हूँ . 




याद है आज भी
वो गली के नुक्कड़ पर
तुम्हारा कुछ देर रुकना
पीछे मुड़ना
दरवाज़े को देखना
और सूनी आँखों से
एक इबारत कह देना
और उसे मैंने
किवाड़ की झिर्री में से
पढ़ लिया था
वो चेहरे पर
शाम का उतर आना
मैंने देखा था
वो आँखों में
समंदर का ठहर जाना
मैंने देखा था
वो लबों पर
ख्वाहिशों का
दफ़न होना
मैंने देखा था
तुम तो इस तरह
मुड कर चल दिए
जैसे कभी
उस शहर
उस गली
उस दरवाज़े
पर कभी ठहरे ना हों
मगर मैं जानती हूँ
तुम आओगे
एक दिन जब
मेरी सांस तुम ले रहे होंगे
तुम आओगे उस दिन
जब मेरी धड़कन
अपने दिल में सुन रहे होंगे
तुम आओगे उस दिन
जब मेरी आँखों का पथराव
अपनी आँखों में देखोगे
मुझे इंतज़ार है आज भी
तुम्हारे लौटने का
लोग कहते हैं
गया वक्त नहीं आता

मगर वक्त भी दोबारा
एक बार जरूर
दस्तक देता है
क्यूँकि मैंने देखा है
वक्त को वापस मुड़ते हुए

सोमवार, 2 मई 2011

ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

अब और क्या देखें हम
ज़िन्दगी को करीब से
देख लिया जान लिया
हर चेहरा अजनबी लगा
हर शख्स नाखुदा लगा
कभी तुम ज़ुदा लगे
कभी हम खफ़ा लगे
बरसों के फ़लसफ़े थे
आईनो मे छुपे रहे
ना वो गवाह बने
ना उम्र ज़िबह हुयी
कुछ रेत की गुस्ताखियां थीं
हाथ से फ़िसलती रहीं
उम्र की तरह खामोश सफ़र था
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

देह से आगे गणनाएं नहीं की जातीं


किसने हक़ दिया
तुम्हें हंसने का
अपनी मनपसंद
ज़िन्दगी जीने का
किसने हक़ दिया
तुम्हें मरने का
ज़िन्दगी से ऊब कर
ज़िन्दा लाशें
सिर्फ सड़ने के लिए
होती हैं
उनका वजूद
होता ही कब है
जो कुछ पल
मुस्कुरा सकें
उनका वजूद होता
ही कब है
जो खुद पर इठला सकें
प्रायोगिक वस्तुएं
निजी अस्तित्व नहीं रखतीं
उन्हें सिर्फ
इस्तेमाल किया
जाता है
अधिकार सिर्फ
मालिक का होता है
किरायेदार तो सिर्फ
ज़िन्दगी भर
किराया देते हैं
तीलियाँ तो सिर्फ
जलने के लिए
होती हैं
जिनसे सिर्फ
रौशनी की जाती है
तीलियों को
सहेजा नहीं जाता
सिर्फ उपयोग किया
जाता है
आखिर तीलियों की
इससे आगे
हैसियत ही क्या है
चलती फिरती
ज़िन्दा लाशें
मुस्कुराने को मजबूर
इज्जत बचाने को मजबूर
अदृश्य बेड़ियों में जकड़ी
अपने वजूद से लड़तीं
समाज की बलि वेदी पर
खुद को होम करतीं
पति और बच्चों
की चाहतों पर
कुर्बान होतीं
अपनी इच्छाओं
आकांक्षाओं को
ज़हर के घूँट पिलातीं
बेशक मिट जायें 

मगर
कुछ वजूदों की 

देह से आगे गणनाएं नहीं की जातीं

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पहन लेती उम्र भर के लिये

काश कर सकती ऐसा
कि कर लेती बंद
मन्त्रों से तुम्हें
और समेट लेती
तुम्हारा वजूद
एक छोटे से
यन्त्र में
पढवा लेती
कलमा किसी
मौलवी से
या किसी दरवेश से
या किसी फकीर से
और कर देता
वो तुम्हें बंद
चंद आहुतियों से
किसी अमावस की रात को
या किसी पूनम  की रात को
मेरे लिए , मेरे नाम के साथ
ज़िन्दगी भर के लिए
मेरे बन जाने के लिए
और मैं पहन लेती
गले में उम्र भर के लिए
तुम्हें ताबीज बना कर

रविवार, 24 अप्रैल 2011

धूप भी मजबूर होती है

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में
घुटन , बदबूदार
अँधेरी कोठरियां
डराती हैं
बंद तहखाने
हजारों कीड़ों की
शरणस्थली बन जाते हैं
ये रेंगते हुए
कीड़े मकौड़े
किसी और के
अस्तित्व को
स्वीकार नहीं पाते
डँस लेते हैं
अपने दंश से
धराशायी कर देते हैं
लहूलुहान हो जाता है
बिखरा हुआ अस्तित्व
ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो
बताओ कैसे
उन चौबारों पर
धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है

सीमाओं का अतिक्रमण 
चाह कर भी नही कर पाती
एक मर्यादा होती है
शायद इसलिए
अपना आशियाना
बदल देती है
धूप भी मजबूर होती है

दस्ताने पहनने को………

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

बताओ ना कौन सी रिश्वत देते हो

ए ………सुनो
बहुत कहना चाह
रहा है आज ये दिल
मगर शब्द साथ
नही दे रहे
ना जाने कौन सी
खोह मे छुप गये
ज़रा देखना
तुम्हारे दिल के
पास तो नही
टहलने आ गये
ज़रा देखना
तुमसे तो
नही गुफ़्तगू
कर रहे
मेरे दिल की तो
कहीं नही कह रहे
ज़रा देखना
कोई नया
फ़साना तो नही
गढ रहे
ये शब्द बहुत
बेईमान हो गये है
आजकल
जब भी देखते हैं तुम्हे
मेरा दामन छोड
तुम्हारे पहलू मे
सिमट आते हैं
बताओ ना
कौन सी
रिश्वत देते हो

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

.क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

ना जाने कब से एक प्रश्न कुलबुला रहा है कि आज जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक लडाई लड़ी गयी तब उसका कुछ हल निकालने की दिशा में कदम उठाने शुरू हुए मगर किसी ने ये नहीं सोचा अब तक कि इतना भ्रष्टाचार फैला कैसे और किसके कार्यकाल में और क्यों? देखा जाये तो भ्रष्टाचार का हमेशा बोलबाला रहा फिर भी पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार ने अपनी जडें इतनी फैला लीं कि कोई टहनी , कोई शाखा भ्रष्टाचार से मुक्त दिखाई नहीं देती ............जहाँ भी नज़र दौड़ाओ सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की व्यापकता नज़र आती है .........कोई ना कोई घोटाला तैयार है हर दिन ............अब तो लगता है हम गिनती भी भूलने लगेंगे कि कौन से कौन से कामों में भ्रष्टाचार फैला और कौन कौन उसमे शामिल था .............कौन सा ऐसा कार्य रहा जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला ना रहा हो और वो भी पिछले दस सालों में तो भ्रष्टाचार सीमा से बाहर होता जा रहा है ...........अब तो भारत देश को भ्रष्टाचार का देश कहा जाने लगा है तो ऐसे में ये प्रश्न उठना वाजिब है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है और किसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा फैला ?

क्या नैतिकता की दृष्टि से सरकार को अपना पड़ नहीं छोड़ देना चाहिए ?

सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार एक ही सरकार के कार्यकाल में हुआ है सभी जानते हैं तो ये प्रश्न क्यूँ नहीं उठाया जाता ?

आखिर इसके लिए आन्दोलन क्यों नहीं किया जाता?

शायद इसलिए क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं लेकिन जनता को तो अपनी शक्ति और एकता का परिचय देना चाहिए और एक आह्वान ऐसा भी करना चाहिए .............क्यों नहीं जनता सरकार से जवाब  मांगे कि उनके ही कार्यकाल में भ्रष्टाचार आसमान को कैसे छूने  लगा ?

क्या सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है?

सरकार तो एक मिनट में किसी से भी कुछ भी पूछने को तैयार रहती है यहाँ तक कि अन्ना के अनशन को किसने प्रायोजित किया , कितने पैसे लगे ऐसे सवाल एक पल में सरकार ने उठा दिए मगर क्या जनता फिर उनसे ये सवाल नहीं कर सकती कि आपके कार्यकाल में इतना भ्रष्टाचार कैसे हुआ और अब उन्हें नैतिकता के आधार पर अपने सभी मंत्रिमंडल के साथ त्यागपत्र दे देना चाहिए ?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके जवाब जनता जरूर जानना चाहेगी ..........क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सिर्फ निशाँ होते हैं

तुम पुकार लो
तो रुक भी जाऊं
तुम निहार लो
तो संवर भी जाऊं
तुम आ जाओ
तो साथ चल भी दूँ
तुम बढाओ हाथ
तो थाम भी लूँ
तुम दिखाओ ख्वाब
तो देख भी लूँ
और पलको पर
सजा भी लूँ
मगर तुमने कभी
पुकारा ही नहीं
उस नज़र से
निहारा ही नहीं
वो हक़ जताया ही नहीं
कभी हाथ बढाया ही नहीं
फिर कैसे , कौन से मोड़ पर
रूकती और किसके लिए?
सिर्फ निशाँ होते हैं
इंतज़ार के मोड़ नहीं हुआ करते ..............

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

एक प्रेम पत्र अनदेखे अहसास के नाम


आज तेरे
अह्सास का
छूकर निकल जाना
अन्दर तक
तडपा गया
मुझसे मुझे
चुरा ले गया
तेरी चाहत की बदली
दिल पर छा गयी
हर धडकन की
गूँज भिगो गयी
अहसास से
तपते दिल
के काँच पर
पडती एक
बूँद तेरे प्यार की
कहीं कुछ
तडका गयी
जैसे आईना कोई
चटका गया
हर अंग शिथिल
कर गया मगर
आंखियो मे ठांठें
मारता सागर
ना रोक पाया
उसे ना शिथिल
कर पाया
शायद तेरा ना होना
ही तेरे होने का
अहसास कराता है
और तेरे अह्सास
की डोर मे
मेरे जज़्बातों को
बाँध ले जाता है
ओ अनदेखे अहसास!
तू दूर होकर भी
पास होता है
मेरी रूह
मेरे ख्यालो मे
बहते तेरे
अन्छुये स्पर्श
मुझे सिहरा
जाते हैं
और तेरे होने
का अह्सास
करा जाते हैं
ये कैसे
अहसास हैं
जो हर
स्पन्दन को
स्पन्दित कर जाते हैं
कहाँ हो
कौन हो
नही जानती
मगर फिर भी
जैसे भीड मे भी
तुम्हे पहचानती हूँ
कैसे अहसास हो
जो मुझे मुझसे
छीने जाते हो
और तडप को
मेरी और
तडपा जाते हो
यादों को
दिल के कोने मे
छुपा लेती हूँ
अहसासों को भी
अहसास नही होने देती
क्योंकि कुछ अहसास
सिर्फ़ रूह की थाती होते हैं