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सोमवार, 2 मई 2011

ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

अब और क्या देखें हम
ज़िन्दगी को करीब से
देख लिया जान लिया
हर चेहरा अजनबी लगा
हर शख्स नाखुदा लगा
कभी तुम ज़ुदा लगे
कभी हम खफ़ा लगे
बरसों के फ़लसफ़े थे
आईनो मे छुपे रहे
ना वो गवाह बने
ना उम्र ज़िबह हुयी
कुछ रेत की गुस्ताखियां थीं
हाथ से फ़िसलती रहीं
उम्र की तरह खामोश सफ़र था
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

42 टिप्‍पणियां:

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

आद.वंदना जी,
कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थीं,
साथ से फिसलती रहीं!
उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही !
इन पंक्तियों का जवाब नहीं !
नये विम्बों से सजी बेहद खूबसूरत और संवेदशील कविता !

सदा ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफर था

जिन्‍दगी पन्‍ने पलटती रही ... ।


बहुत खूब कहा है आपने इन पंक्तियों में ... ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अब और क्या देखें हम
ज़िन्दगी को करीब से
देख लिया जान लिया
हर चेहरा अजनबी लगा
हर शख्स नाखुदा लगा
--
रचना तो बहुत बढ़िया है
मगर हर शख्श नाखुदा कैसे हो गया?
जबकि हर चेहरा अजनबी था!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

अमूर्त संकल्पनाओं से विम्ब निकलना और उन्हें व्यापक अर्थ देना कोई आप से सीखे.. सुन्दर कविता...

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

अमूर्त संकल्पनाओं से विम्ब निकलना और उन्हें व्यापक अर्थ देना कोई आप से सीखे.. सुन्दर कविता...

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

झील हो, दरिया हो, तालाब हो या झरना हो
जिस को देखो वही सागर से ख़फ़ा लगता है

उसकी आंखों में कभी झांक के देखो ‘सागर‘
गहरे ख़ामोश समंदर का पता लगता है

http://mushayera.blogspot.com/

Sunil Kumar ने कहा…

अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं जिन्दगी पन्ने पलटती रह गयी ... बहुत अच्छी सुन्दर रचना, बधाई ..........

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा आपने.

सादर

Rajesh Kumari ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती .....bahut khoobsurat panktiyan.

Kailash C Sharma ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियां थीं
हाथ से फ़िसलती रहीं
उम्र की तरह खामोश सफ़र था
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही....

बहुत मर्मस्पर्शी..बहुत ख़ूबसूरत. आभार

संध्या शर्मा ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही !

वंदनाजी वाकई ये लाजवाब पंक्तियाँ हैं........
हमेशा की तरह गहरे अर्थ लिए सुन्दर रचना..

kshama ने कहा…

Wah! Vandana!Wah! Kya anootha khayal hai...ret kee gustakhiyaan!

nilesh mathur ने कहा…

एक सुन्दर अभिव्यक्ति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 03- 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Rakesh Kumar ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफर था
जिंदगी पन्ने पलटती रही

आप बहुत दार्शनिक सी बातें करतीं हैं वंदना जी तो डर लगने लगता है. आपके दर्शन को बिना आपके समझाये कैसे समझूँ .

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्या बात हे बहुत अच्छी रचना...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कभी शब्दों का अर्थ मिल ही जायेगा।

mridula pradhan ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थीं,
साथ से फिसलती रहीं!
उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही !
wah.bahot sundar likhi hain....

Dr Varsha Singh ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता लिखी है आपने .
आपकी लेखनी को नमन...

Sadhana Vaid ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थी
हाथ से फिसलती रहीं !
उम्र की तरह खामोश सफ़र था
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ ! हर शब्द मन में घर कर गया ! बधाई स्वीकार करें !

वाणी गीत ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफ़र था ..
जिंदगी पन्ने पलटती रही ...
लाजवाब !

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर भावना पूर्ण रचना| धन्यवाद|

संजय भास्कर ने कहा…

वंदना जी,
देख लिया जान लिया
हर चेहरा अजनबी लगा
हर शख्स नाखुदा लगा
..... बेहद खूबसूरत और संवेदशील कविता !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब।

निशांत ने कहा…

kuch ret ki gustaakhiyaan thi
haathon se fisalati rahi..

acchi panktiyaan

aur aapki acchi rachna...

कुमार राधारमण ने कहा…

ओशो सिद्धार्थ कहते हैं-
संसारी हो या साधक हो
फल की आकांक्षा बाधक है
उद्देश्य कर्म का पूरा हो
यह तो न सदा आवश्यक है।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना। वन्दना तुम से मिल कर जितनी खुशी हुयी बता नही सकती। शुभकामनायें।

सुज्ञ ने कहा…

सार्थक अभिव्यक्ति, वंदना जी, सत्य रख दिया…

कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थीं,
साथ से फिसलती रहीं!
उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही !

___________________________
सुज्ञ: ईश्वर सबके अपने अपने रहने दो

Kunwar Kusumesh ने कहा…

ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही

वाह वाह,क्या बात है.

वीना ने कहा…

वाह वंदना जी....बहुत खूबसूरत रचना है....

Maheshwari kaneri ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थीं,
साथ से फिसलती रहीं!
वाह: क्या सुन्दर प्रस्तुति है..वंदना जी बधाई ..........

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियां थीं
हाथ से फ़िसलती रहीं.

उत्तम रचना । बेहतरीन प्रस्तुति...

कविता रावत ने कहा…

अब और क्या देखें हम
ज़िन्दगी को करीब से
देख लिया जान लिया
हर चेहरा अजनबी लगा
..बहुत उम्दा रचना.

ZEAL ने कहा…

उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही ...

Very appealing lines !

.

***Punam*** ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...!!

अरूण साथी ने कहा…

सुन्दर अहसास

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

ज़िन्दगी के सफे सब फलसफे हो गए|

इमरान अंसारी ने कहा…

खूबसूरत अहसास से भरी पोस्ट.......

ज्योति सिंह ने कहा…

कुछ रेत की गुस्ताखियाँ थीं,
साथ से फिसलती रहीं!
उम्र की तरह खामोश सफ़र था,
ज़िन्दगी पन्ने पलटती रही !
waah man ko chhoo gayi ye baate .ati sundar .

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

fir bhi jindgi k panno par likhe kuchh naam mitaye nahi mitTe.

Amrita Tanmay ने कहा…

इतनी सुंदर कविता ..जिन्‍दगी पन्‍ने पलटती रही