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शुक्रवार, 17 जून 2011

जो मानस का मोती बन पाता

ढूंढती हूँ मानस का मोती
शायद कहीं मिल जाए
जो छूट गया है आँगन में
फिर से मुझे मिल जाये

इक नदी सी मुझमे बहती थी
अठखेलियाँ लेती थी
दिन रात की कशमकश में
कोई अधूरी सुबह  मिल जाये

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए

उर की धधकती ज्वाला में
ना स्नेह का कोई गीत जगा
बरसों तलाशा है जिसको ,वो
 कहीं ना मन का मीत मिला

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर  मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता
मुझे जीने का सबब दे पाता


31 टिप्‍पणियां:

Arunesh c dave ने कहा…

सही लिखा है आपने

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले

तो अद्भुत है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता

मन की छटपटाहट को कहती भावपूर्ण अभिव्यक्ति

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut badiya likha aapne

नुक्‍कड़ ने कहा…

jeene ka sabab aaj hindi blogging hain hum sab lekhoin ke liye. aapki kavitaai dhar tej ho rahi hai. shubh kavya kamneyen.

सदा ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
भावमय करते शब्‍द इन पंक्तियों के ..।

निवेदिता ने कहा…

अच्छा लगा पढ़ना .... लगा खुद को ही पढ़ रही हूँ ....

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत ही बढ़िया लिखा है

Kailash C Sharma ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले ...

बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..अंतस की वेदना बहुत गहराई तक उतर आयी है...उत्कृष्ट प्रस्तुति..आभार

shikha varshney ने कहा…

वाह वाह वाह...कितना प्रवाह पूर्ण. बहुत ही अच्छा लगा पढ़ना.
बहुत सुन्दर शब्द संयोजन.

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

Bahut achchha likhati hai...

PK Sharma ने कहा…

bahut bhawuk vandna ji

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी यह मार्मिक और उत्कृष्ट प्रविष्टी कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी है!

Maheshwari kaneri ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले ..बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उसी की खोज में हम भी हैं।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति

Babli ने कहा…

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए...
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब और भावपूर्ण रचना!

कुश्वंश ने कहा…

सुन्दर पंक्तिया , भावमय करती कविता बधाई

एस.एम.मासूम ने कहा…

वंदना जी बेहतरीन अंदाज़
इसी कल कि बगीची कि चर्चा मैं शामिल किया गया है

Dr Varsha Singh ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता.


वन्दना जी,
आपकी बेहतरीन कविता ने ये मशहूर शेर याद दिला दिया........
ये इश्क नहीं आसां,बस इतना समझ लीजै,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

आग के दरिया में डूब के जाना हर किसी के वश में नहीं....संवेदना से भरी इस मार्मिक रचना की बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद!

मनोज कुमार ने कहा…

प्रवाह पूर्ण सुंदर द्रचना।

Roshi ने कहा…

bhavpooran abhivyakti

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

ढूंढती हूँ मानस का मोती ....

बेहतरीन रचना .... संवेदनशील भाव

mridula pradhan ने कहा…

bahut prabhavit hui aapki kavita se.....

Ankur jain ने कहा…

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता
मुझे जीने का सबब दे पाता


sundar prastuti vandana ji

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

ZEAL ने कहा…

कोई अधूरी सुबह मिल जाए...वाह वंदना जी ...नूतन अभिव्यक्ति ।

Vivek Jain ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता...

आभार- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

सुमन'मीत' ने कहा…

hamesha ki tarah ..bemisal...

shekhar suman ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिखा है वंदना जी...

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत सुन्दर.....बरसों तलाशा है जिसको कहीं न मन का वो मीत मिला......शानदार |

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए

यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.
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कल 21/06/2011को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है-
आपके विचारों का स्वागत है .
धन्यवाद
नयी-पुरानी हलचल