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गुरुवार, 22 नवंबर 2012

अम्बर तो श्वेताम्बर ही है

रंगों को नाज़ था अपने होने पर
मगर पता ना था
हर रंग तभी खिलता है
जब महबूब की आँखों में
मोहब्बत का दीया जलता है
वरना तो हर रंग 
सिर्फ एक ही रंग में समाहित होता है
शांति दूत बनकर .........
अम्बर तो श्वेताम्बर ही है 
बस महबूब के रंगों से ही
इन्द्रधनुष खिलता है
और आकाश नीलवर्ण दिखता है ...........मेरी मोहब्बत सा ...है ना !!

सोमवार, 19 नवंबर 2012

"कन्यादान" ............एक सामाजिक कुरीति

"कन्यादान" ............एक सामाजिक कुरीति

 "कन्यादान" सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है मगर यदि गौर से देखा जाये तो ये भी एक सामाजिक कुरीति है जिसने स्त्री की दशा को दयनीय  बनाने में अहम् भूमिका निभाई .  आज कन्यादान जैसी  कुरीतियों ने स्त्री को वस्तु बना दिया या कहिये गाय ,बकरी बना दिया जिसे जैसे चाहे प्रयोग किया जा सकता है , जिसे जब तक जरूरत हो प्रयोग करो और उसके बाद चाहो तो दूसरे  को दे दो या फेंक दो उसी तरह का व्यवहार चलन में आ गया जिसके लिए कुछ हद तक हमारे ऐतिहासिक पात्र  भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपनी बेटी की विदाई के वक्त ये कह दिया कि  ये तुम्हारे घर की दासी है इसे अपने चरणों में जगह देना .........आखिर क्यों ? क्या विवाह दो इंसानों में नहीं होता ? क्या एक खरीदार होता है और दूसरा विक्रेता ? क्या सन्देश दे रहे हैं हमारे ऐतिहासिक पात्र  ? और जो परम्पराएं बड़े घरों से  चलती हैं वो ही समाज में गहरे जडें जमा लेती हैं जिनका  दूरगामी परिणाम बेहद दुष्कर होता है जिसका उदाहरण आज की स्त्री की दुर्दशा  है .

पहले के पात्रों में देखो सीता की विदाई में  यही दृश्य उपस्थित  हुआ तभी तो सीता का प्रयोग एक वस्तु की तरह हुआ . जिसने कदम कदम पर अपने पति का साथ देकर पत्नीधर्म निभाया उसे ही गर्भावस्था में एक धोबी के कहने पर त्यागना क्या उदाहरण पेश करता है समाज के सामने कि  वो एक वस्तु ही है जिसे जैसे चाहे प्रयोग करो और जरूरत न हो तो फेंक दो ,त्याग दो और उसे राजधर्म का नाम दे दो ............क्या वो उनकी प्रजा में नहीं आती थी ? राम को  भगवान की दृष्टि से न देखकर यदि साधारण इन्सान की दृष्टि से देखा जाये तो ये प्रश्न उठना लाजिमी है और देखिये इस कुप्रथा का दुष्परिणाम पांडवों ने भी तो यही किया अपनी पत्नी को वस्तु की तरह प्रयोग किया ,पहले तो माँ के कहने पर आपस में बाँट लिया और उसके बाद  द्युत क्रीडा में दांव पर लगा दिया , ये कहाँ का न्याय हुआ ? उसकी मर्ज़ी का कोई महत्त्व नहीं , उसे जो चाहे जीत ले और जैसे चाहे उपयोग करे , इन्ही कुप्रथाओं ने तो आज के मनुष्य को ये कहने का हक़ दे दिया कि  क्या हुआ अगर मैंने ऐसा किया पहले भी तो ऐसा होता था  .........और वो ही सब आज भी चला आ रहा है . आज भी हम कन्यादान करते हैं और गंगा नहाते हैं ...........आखिर क्यों?

क्या बिगाड़ा है कन्या ने जो उसे दान किया जाए और कौन सा खुदा होता है दामाद जो उसे पूजा जाये ?क्यों उसके पैर छुए जायें ? क्या वो हमसे बड़ा है या खुदा है ? अरे वो भी तो बच्चा ही है जैसे हमारी बेटी वैसे ही उसे भी बेटा माना  जाये तो क्या कुछ फर्क आ जायेगा ?

हम क्यों ये नहीं सोचते कि जैसे हमारे बेटा  है वैसे ही बेटी भी है . दोनों को हमने ही तो जन्म दिया है तो कैसे उनमे भेदभाव कर सकते हैं और कैसे अपनी बेटी को वस्तु के समान दान कर सकते हैं . अगर हम ऐसा करेंगे तो सामने वाले को तो मौका मिल जाता है कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें दान किया है न कि विवाह . विवाह में तो बराबरी होती है दोनों पक्षों की .

अब सोचने वाली बात है जैसे हमारे लिए बेटी वैसे ही तो दामाद होना चाहिए और जिस घर वो जाये उनके लिए बहू  का भी वो ही स्थान होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता . दामाद को तो भगवान बना देते हैं और बहू को दासी ..........आखिर क्यों नहीं उसे भी उसी तरह का सम्मान दिया जाता अगर बराबरी का रिश्ता है तो ? अगर दामाद पूज्य है तो बहू को भी पूज्य माना जाये और अगर ऐसा नहीं है तो उन दोनों से  ही अपने बच्चों की तरह ही व्यवहार  किया जाये न कि  उन्हें पूजा जाये और अपने घर परिवार में बराबर का सम्मान दिया जाये तो क्या इससे समाज में कोई अंतर आ जायेगा या रिश्ते में अंतर आ जायेगा ? ऐसा कुछ नहीं होगा . होगा तो सिर्फ इतना कि  दोनों परिवारों में , उनमे रहने वालों की सोच में एक दूसरे  के लिए मान सम्मान पैदा होगा जिससे एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा और यदि हम पुरानी  परिपाटियों पर ही चलते रहे तो हमारी बेटियां यूँ ही कुचली मसली जाएँगी या जला दी जाएँगी मगर वो सम्मान नहीं पाएंगी जिसकी वो हक़दार हैं .

कभी उन्हें सामान्य इन्सान नहीं माना गया . या तो देवी बनाकर पूजा गया वो भी सिर्फ नौ दिन और या फिर दुत्कारा गया मगर कभी आम इन्सान की तरह नहीं देखा गया . एक जानकार कहते हैं मैं बेटियों से झूठे बर्तन नहीं उठवाता दूसरी तरफ बेटे बेटी को बराबर मानता हूँ तो ये कैसी बराबरी हुई पूछने पर कहने लगे अरे मर्यादा भी तो कोई चीज होती है और बेटी तो बेटी होती है . जब हमारे पढ़े लिखे समाज की ऐसी सोच होगी तो कैसे उसमे सुधार  संभव है जहाँ एक तरफ बराबरी की बात हो और दूसरी तरफ उसे देवी बना दो। बराबरी भी देनी है तो हर स्तर पर देनी चाहिए न की सिर्फ कथनी में बल्कि  करनी में भी .

हमें इसी जड़ता को बदलना है और इसे बदलने के लिए पहल तो हमें अपने घर से , अपनी बेटियों के जीवन से ही करनी होगी तभी समाज और देश में उनकी दशा में सुधार आएगा बेशक ये प्रथाएँ बदलने में वक्त लगे मगर फिर भी आज का समझदार युवा तो कम से कम इस बात को समझेगा और उसे अपने जीवन में स्थान देगा और शादी से पहले यदि ये कहेगा कि मैं कन्यादान जैसी रस्म का बहिष्कार करता हूँ/करती हूँ तो भी इस दिशा में ये एक क्रांतिकारी व आशान्वित कदम होगा .


आज क्या होता है कि कुछ सामाजिक संगठन गरीब कन्याओं के विवाह के नाम पर "कन्यादान" का लालच देते हैं और कन्यादान को मोहरे की तरह प्रयोग करते हैं जो कि  किसी भी तरह उचित नहीं है . यदि गरीब कन्याओं का विवाह ही कराना है तो उसे कन्यादान का नाम क्यों दिया जाए और उनकी भावनाओं से क्यों खेला जाये . करना क्या है सिर्फ इतना ही कन्यादान शब्द और इस रीती का प्रयोग बंद किया जाये बाकि सारे कार्य किये जायें तो इससे गरीब कन्याओं के विवाह में या उनके लिए सहयोग  देने वालों में तो फर्क नहीं आएगा और साथ ही समाज में भी स्वस्थ सन्देश जायेगा ऊंचे तबसे से लेकर निचले तबके तक कि  कन्या दान की वस्तु नहीं है . वो भी एक जीती जागती इंसान है और उसे भी समाज में बराबरी से रहने का हक़ है और उसे भी समाज में एक इन्सान की तरह स्थान मिले .

अब ये हम पर है कि हम अपनी बेटियों को क्या देना चाहते हैं . बेशक किसी समाजसुधारक का ध्यान आज तक इस तरफ नहीं गया मगर कन्यादान भी किसी कुरीति से कम नहीं जिसने समाज में स्त्री के दर्जे को दोयम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी . यदि नयी पीढ़ी और हम सब मिलकर ऐसी कुरीतियों का प्रतिकार करें और फिर चाहे बेटे की शादी हो या बेटी की इस कुप्रथा का बहिष्कार करें तो जरूर समाज की सोच में बदलाव आएगा और ऐसी कुप्रथाएं जड़ से समाप्त हो जाएँगी और बेटियों को उनका सम्मान व उचित स्थान मिल जायेगा।



अंत में एक बार फिर से यही कहूँगी………



कन्यादान या अभिशाप


दान करने के नाम पर
रहन रखने की
ये अजब रस्म देखी
बेटी ना हुई
कोई जमीन हुई
जिस पर जो चाहे 
जैसे चाहे हल चलाये
या मकान बनाए
या कूड़े का ढेर लगाये
मगर वो सिर्फ 
बेटी होने की कीमत चुकाए
उफ़ भी ना कर सके
दहलीज भी पार कर ना सके 
ना इस दर को
ना उस दर को
अपना कह सके 
जब दुत्कारी जाये
जब जीवन उसका
नरक बन जाये
जब साथ रहना दूभर हो जाये
कहो तो .........ओ ठेकेदारों
किस दर पर जाए
कहाँ जाकर गुहार लगाये?

अब बदलना होगा 
ऐसी रस्मों को
समझना होगा
बेटी कोई वस्तु नहीं
जो दान दे दी जाये
बेटियां तो जान होती हैं
दो घरों की आन होती हैं
फिर कैसे कर देते हो 
कन्यादान के नाम पर दान
क्या कभी नहीं 
तुम्हारे अंतस ने 
ये सवाल उठाया ?
क्या कभी नहीं 
तुम्हारा जमीर जागा?
जिसे इतने नाजों से पाला पोसा
और एक ही पल में
उसे सारे हकों से 
महरूम कर दिया
ब्याह के बाद 
ना वो घर अपना बना
और ना मायका अपना रहा
दोनों ही घरों से
उसका हक़ तोड़ दिया
कन्यादान प्रथा ने 
समाज को अभिशापित किया
कन्या का जीवन दूभर किया
सब जानते हैं
अब उस घर से इसके 
सभी हक़ ख़त्म हुए
और मायके वाले भी
बाद में बोझ समझते हैं
फिर अत्याचारों का सिलसिला 
कहर ढाता है
कभी दहेज़ के नाम पर 
तो कभी लड़की जन्मने के नाम पर
उसी का शोषण किया जाता है
कभी  ज़िन्दा जलाया जाता है
तो कभी बच्चा जनते जनते ही
उसका दम निकल जाता है
बेटी को हर अधिकार से वंचित कर दिया
दान दी जाने वाली चीज  से
कोई हक़ ना रखना
इस प्रथा ने ही ऐसी 
कुरीतियाँ फैलाई हैं 
ज़रा सोचो
अगर ऐसा तुम्हारे साथ होने लगे
पुरुष का दान होने लगे
और किसी भी घर में
उसका कोई स्थान ना हो
कहीं कोई मान ना हो
अपनी कोई पहचान ना हो
कैसे तुम जी पाओगे?


ओ समाज के ठेकेदारों
जागो .........समझो
मत लकीर के फकीर बनो
जो रस्मे जज्बातों  से खेलती हों
जिनसे कोई सही शिक्षा ना मिलती हो
जो विकास में बाधक बनती हों
उन रस्मों को , उन परिपाटियों को 
बदलना बेहतर होगा
एक नए समाज का 
निर्माण करना होगा
कन्यादान की रस्म को 
बदलना होगा
लिंग भेद ना करना होगा
बल्कि कन्या को भी 
सम स्तर का समझना होगा
कन्यादान को अभिशाप ना बनने देना होगा

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

आखिर कब तक कोई उधेडे और बुने स्वेटरों को ???

जब सारा पानी चुक जाये………कहीं ठहरने को जी चाहता है मगर्………कोई है जो भरमाता है ………असमंजस की सीमा पर खडा राह रोकता है ………ना जाने कौन आवाज़ लगाता है …………और चल पडता है फिर दिशाहीन सा आवाज़ की दिशा में ……………जो छलावे सी छल जाती है और फिर सफ़र एक मोड पर आकर फिर चुक जाता है …………ये अनवरत चलता सिलसिला………कहीं रेगिस्तान की जलकुंभी तो नहीं …………आखिर कब तक कोई उधेडे और बुने स्वेटरों को ???


हलक मे फ़ँस रहा है ………आँख से नही बहता ………वो खामोश पल ………गुमनाम अंधेरों की दहलीज पर ठिठकता तो है मगर ………सहूलियतों की रौशनियाँ रास नहीं आतीं ………मिटने की हसरत में जी उठता है और सलीब पर लटक जाता है …………इम्तिहान की बेजारियाँ और क्या होंगी???



सीमाहीन  दिशाहीन कतरे समेटने को जो हाथ बढे ………सारी रौशनियाँ गुल हो गयीं …………साज़िशों के दौर में वक्त बेज़ार मिला ………कंठहीन कोकिला के स्वरों पर पहरे मिले ………ना सुबह को रौशनी मिली ना सांझ को बाती मिली………बस दीमक ही सब चाटती रही …………खोखली दीवारों के पार मौसम नहीं बदला करते!!!

सोमवार, 12 नवंबर 2012

काश! प्रेम की आकृति होती

काश! प्रेम की आकृति होती
एक वायुमंड्ल होता उसका
और उसमें तैरते कुछ
नीले अन्तर्देशीय पत्र
कुछ पोस्टकार्ड होते
जिन पर कुछ ना लिखा होता
और तुमने हर हर्फ़
पढ लिया होता

सिसकने की जहाँ मनाही होती
अश्कों की खेती खूब लहलहाती
क्योंकि
जो कह दिया
शब्दों मे जिसे बाँध दिया
वो भला कब इश्क हुआ
और हमारी परिभाषा तो
वैसे भी चिन्तन से परे की
कोई अबूझ पहेली होती
जिसमें होने और ना होने के बीच की परिधि पर
ना तुम होते ना मैं होती
मगर फिर भी वहाँ………
इश्क होता……मोहब्बत होती
जीने को और क्या चाहिये
होना ना होना कब मायने रखता है
वैसे भी इश्क का मजमून तो यूँ भी कोई फ़कीर ही पढता है…जानते हो ना

बेजुबानों की अबोली भाषा मे छुपे गूढार्थ बूझने के लिये 
कोई शर्त नही होती इश्क की पाठशाला में
फिर प्रेम को आकार देना इतना आसाँ कहाँ ?
ऐसे मे कैसे कहूँ
काश! प्रेम की आकृति होती………

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

निष्ठुर आशा का निर्णायक मोड़ होगा वो

निष्ठुर आशा का निर्णायक मोड़ होगा वो
जब भभकती चिताओं में ना शोर होगा वो
एक चील ने छीना होगा बाज के मुँह से निवाला
तब जरूर कोई नया उदबोध  होगा वो

यूँ ही नहीं बनती हैं शिलाएं वक्त की

यूँ ही नहीं गढ़ती हैं कहानियां शक्ल की
एक ज़र्रे ने जब किया होगा रोशन जहान
तीखी फिजा बदला मोजूं कुछ और होगा वो 

सिमटती कायनात की खुमारी होगी

एक जुनूनी आतिशी वो पारी होगी
जब किसी चाह की ना कोई जवाबदारी होगी
तब इंकलाबी लहर की तैयारी कुछ और होगी वो

टूटा पत्ता जब शाख से जुड़ जायेगा

रुत का नया रुख तब नज़र आएगा
यूँ ही नहीं आशियानों के ख्वाहिशमंद रहे
बदलते आसमाँ के तेवर कुछ और होंगे वो

फतवों की मीनारों पर ना बुर्ज होंगे

तालिबानी अमलों के ना हुजूम होंगे
हर आँख में जब एक कोहिनूर होगा
तब मंज़र बदलता एक सुनहरा दौर होगा वो

रविवार, 4 नवंबर 2012

मैं नीली हँसी नहीं हँसती

मैं नीली हँसी नहीं हँसती 
कहा था तुमने एक दिन 
बस उसी दिन से 
खोज रही हूँ ..............नीला समंदर 
नीला बादल , नीला सूरज 
नीला चाँद , नीला दिल 
हाँ ............नीला दिल 
जिसके चारों  तरफ बना हो 
तुम्हारा वायुमंडल सफ़ेद आभा लिए नहीं 
सफेदी निकाल  दी है मैंने 
अब अपने जीवन से 
चुन लिया है हर स्याह रंग 
जब से तुम्हारी चाहत की नीली 
चादर को ओढा है मैंने 
देखो तो सही 
लहू का रंग भी नीला हो गया है मेरा 
शिराएं भी सहम जाती हैं लाल रंग देखकर 
कितना जज़्ब किया है न मैंने रंग को 
बस नहीं मिली तो सिर्फ एक चीज 
जिसके तुम ख्वाहिशमंद थे 
कहा करते थे ............एक बार तो नीली हँसी हँस दो 
देखो नीले गुलाब मुझे बहुत पसंद हैं 
और मैं तब से खड़ी हूँ 
झील के मुहाने पर 
गुलाबों को उगाने के लिए 
नीली हँसी के गुलाब ..........
एक अरसा हुआ 
नीले गुलाब उगे ही नहीं 
लगता है 
तेरी चाहत के ताजमहल को बनाने के बाद 
खुद के हाथ खुद ही काटने होंगे 
क्यूंकि 
सुना है नील की खेती के बाद जमीन बंजर हो जाती है ..........

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

अब रिवाजों की मोहताज नहीं रही हमारी मोहब्बत

मेहंदी लगे मेरे हाथ


पिया जी का है साथ 
 
 

रंग तो खिल कर रहेगा 

 उनके सामने उनकी शाप पर बैठकर 
मेहंदी लगवाने का मज़ा ही कुछ और है ……है ना :)


सुनो
कभी कभी सोचती हूँ
कितना वक्त हुआ
हमें साथ रहते
एक दूसरे  के साथ चलते
और अभी कितना सफ़र बाक़ी है
हम नहीं जानते
इस सफ़र में
कुछ यादें सुहानी रहीं
तो कुछ बेगानी
तो कुछ खट्टी
तो कुछ कडवी
और कुछ मीठी
तुम भी जानते हो
और मैं भी
आज आकलन करने बैठी
खोज रही थी
अपने अंतस्थल में
कितना पानी बचा है
क्या सच में
हमारी चाहत में कुछ इजाफा हुआ है
क्या आज भी उसमे
वैसा ही सौंदर्य समाया है
जैसा पहले होता था
तो पाया
कितना बदल चुके हैं
हमारे पैमाने
कितना बदल चुकी हैं
हमारी चाहतें
देखो न
पहले जैसी न तो उमंगें रहीं
न ही पहले जैसी चाहतें
फिर भी कहीं न कहीं
बचा हुआ है कुछ पानी
जिसमे हरा रंग घुल गया है
न मेरा रंग न तुम्हारा
बस वो बन गया है हमारा
तभी तो
देखो न
नहीं करती कोई तैयारी
पहले जैसी करवाचौथ पर
कैसे अल्हड लड़की सी
मेरी सारी  आकांक्षाएं
तुम्हारे इर्द -गिर्द घूमा करती थीं
और मैं
मेहंदी के रंग में
तो कभी सौंदर्य के पैमानों में
तुम्हारी मोहब्बत ढूँढा करती थी
बस तुम ही तुम हो
मेरे आस पास
मेरे ख्यालों में
मेरी हर चाहत को
परवान चढ़ा दो
बस इन्ही में डूबता -उतरता रहता था
मेरी मोहब्बत का चाँद
क्योंकि
तुम्हें भी तो
मेरा सजे -संवरे रहना पसंद था
और मैं भी
अपनी पूजा की थाली में
सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत ही पूजा करती थी
मगर देखना
वक्त की पहरेदारी भी गज़ब है
कैसे बिना आवाज़ दिए
चौकीदारी के उसूल बदल दिए
अब ना सजने - सँवरने में
न मेहंदी के रंग में
न चाहतों की बुलंदियों पर
खोजती हूँ तुम्हारी मोहब्बत के चाँद को
फिर भी
मना लेती हूँ करवाचौथ
जानते हो क्यों
क्योंकि
अब मेरे चाँद ने करवट ले ली है
तभी तो देखो
तुम्हें फर्क ही नहीं पड़ता
मैं करवाचौथ पर
कोई तैयारी  करूँ या नहीं
तुम्हें फर्क ही नहीं पड़ता
मैं ढंग से तैयार होऊँ या नहीं
तुम्हारे नाम की मेहंदी लगाऊँ या नहीं
तुम्हारी पसंद की
लाल काँच की चूड़ियाँ पहनूं या नहीं
कितना फर्क आ गया है ना ..............
फिर भी लगता है
कुछ पानी बचा है अभी
दोनों के गुलदानों में
क्योंकि कहीं न कहीं
पहले से ज्यादा
आज हम में
हमारी मोहब्बत में
संजीदगी आयी  है
अब लेन देन से परे
झूठे दिखावटी रिवाजों से परे
बिना कहे सुने भी
एक दूसरे के लिए जीते हैं हम
फिक्रमंद होते हैं
एक दूजे के दर्द में
उसका ज़िन्दगी में
मौजूदगी का अहसास ही
काफी होता है अब
जीने के लिए
तभी तो देखो
मना ही लेते हैं हम भी करवाचौथ
बिना कोई रस्मो - रिवाज़ निभाए 
एक अन्दाज़ ये भी होता है ……क्योंकि
अब रिवाजों की मोहताज नहीं रही हमारी मोहब्बत .......है ना साजन !!!

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

तेरी हसरत, तेरी कसम मेरी जाँ लेकर जायेगी

मेरी नज़रों के स्पर्श से 
नापाक होती तेरी रूह को
करार कैसे दूँ 
बता यार मेरे 
तेरी इस चाहत को
"कोई होता जो तुझे तुझसे ज्यादा चाहता"
इस हसरत को 
परवाज़ कैसे दूँ

तुझे तुझसे ज्यादा 
चाहने की तेरी हसरत को
मुकाम तो दे दूँ मैं
मगर
तेरी रूह की बंदिशों से
खुद को 
आज़ाद कैसे करूँ यार मेरे
प्रेम के दस्तरखान पर
तेरी हसरतों के सज़दे में
खुद को भी मिटा डालूँ
मगर कहीं तेरी रूह
ना नापाक हो जाये
इस खौफ़ से 
दहशतज़दा हूँ मैं
अस्पृश्यता के खोल से 
तुझे कैसे निकालूँ
इक बार तो बता जा यार मेरे
फिर तुझे 
"तुझसे ज्यादा चाहने की हसरत" पर
मेरी मोहब्बत का पहरा होगा
तेरे हर पल 
हर सांस 
हर धडकन पर
मेरी चाहत का सवेरा होगा
और कोई 
तुझे तुझसे ज्यादा चाहता है 
इस बात पर गुमाँ होगा
बस एक बार कसम वापस ले ले
"अस्पृश्यता"  की
वादा करता हूँ
नज़र का स्पर्श भी
तेरे अह्सासों को
तेरी चाहत को
तेरी तमन्नाओं को
मुकाम दे देगा
तेरी रूह की बेचैनियों को
करार दे देगा
तेरे अन्तस मे 
तुझे तू नही
सिर्फ़ मेरा ही 
जमाल नज़र आयेगा
कुछ ऐसे नज़रों को
तेरी रूह में उतार दूँगा
और मोहब्बत को भी
ना नापाक करूँगा
मान जा प्यार मेरे
वरना
तेरी हसरत, तेरी कसम
मेरी जाँ लेकर जायेगी ……………

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

मेरे पैर नही भीगे ……………देखो तो !!!

मेरे पैर नही भीगे
देखो तो
उतरे थे हम दोनों ही
पानी के अथाह सागर में
सुनो………जानते हो ऐसा क्यों हुआ?

नहीं ना …………नहीं जान सकते तुम
क्योंकि
तुम्हें मिला मोहब्बत का अथाह सागर
तुम जो डूबे तो
आज तक नहीं उभरे
देखो कैसे अठखेलियाँ कर रही हैं
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें
कैसे आँखों मे तुम्हारी
वक्त ठहर गया है
कैसे बिना नशा किये भी
तुम लडखडा रहे हो
मोहब्बत की सुरा पीकर
और देखो………इधर मुझे
उतरे तो दोनों साथ ही थे
उस अथाह पानी के सागर मे ………
मगर मुझे मिली ………रेत की दलदल
जिसमें धंसती तो गयी
मगर बाहर ना आ सकी
जो अपने पैरों पर मोहब्बत का आलता लगा पाती
और कह पाती ………
देखो मेरे पैर भी गीले हैं ……भीगना जानते हैं
हर पायल मे झंकार का होना जरूरी तो नहीं …………
सिमटने के लिये अन्तस का खोल ही काफ़ी है
सुना है
नक्काशीदार पाँव का चलन फिर से शुरु हो गया है
शायद तभी
मेरे पैर नही भीगे ……………देखो तो !!!

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

इसलिये आखिरी नहान कर लिया है मैने



1)
देखो ना

आज जरूरत थी मुझे
चादर बदलने की
रंगों से परहेज़ जो हो गया है और तुम
इबादत के लिये माला ले आये
तुलसी की तुलसी के लिये
क्या अपना पाऊँगी मैं
तुम्हारे रंगों की ताब को
जो बिखरी पडी है
शीशम सी काली देह पर
जिसको जितना छीलोगे
उतनी स्याह होती जायेगी
यूँ भी ओस मे भीगे बिछोनों पर कशीदाकारी नही की जाती
फिर कैसे अल्हडता की डोरियों को साँस दोगे
जो हाँफ़ने से पहले एक ज़िरह कर सके
अब यही है तुम्हारी नियति शायद
उम्र भर का जागरण तो कोई भी कर ले
तुम्हें तो जागना है मेरी रुख्सती के बाद भी
पायलो को झंकार देने के लिये
घुंघरूओं का बजना सुना है शुभ होता है
.........

2)
आह! …………
कितनी बरसात होती रही
और चातक की ना प्यास बुझी
बस यही अधूरापन चाहिये मुझे
नही होना चाहती पूरा
जानते हो ना
पूर्णता की तिथि मेरी जन्मपत्री मे नही है
वैसे भी देह के आखिरी बीज पर
एक रिक्तता अंकित रहती है अगली उपज के लिये
फिर क्यों ट्टोलते हो खाली कनस्तरों मे इश्क के चश्मे
क्योंकि कुछ चश्मे ख्बाहिशों की रोशनाई के मोहताज़ नही होते
कभी डूबकर देखना भीगे ना मिलो तो कहना
पीठ पर मेरी उंगलियों की छाप मेरे होने का प्रमाण देगी
यहाँ प्यासों के शहर बारिशों के मोहताज़ नही होते............


3)
नमक वाला इश्क यूँ ही नही हुआ करता
एक कंघी, कुछ बाल और एक गुडिया तो चाहिये 

कम से कम  जिसकी तश्तरी मे
कुछ फ़ांक हों तरबूज़ की और कुछ फ़ांक हों मासूमियत की
डाल कर देखना कभी तेल सिर मे
आंसुओं के बालों मे तरी नही होगी, कोइ वट नही होगा
होगा तो बस सिर्फ़ और सिर्फ़ एक नमकीन अहसास
जो खूबसूरती का मोहताज़ नही होता ,
जो उसकी रंगत पर कसीदे नही पढता
बस इबादत करता है और ये जुनून यूँ ही नही चढता
इश्क की मेहराबदार सीढियाँ
देखा ना कितनी नमकीन होती हैं
दीवानगी की चिलम फ़ूँकना कभी मौसम बदलने से पहले


4)
इश्क की सांसों पर थिरकती हर महज़बीं
मीरा नही होती , राधा नही होती
और मैं आज भी खोज मे हूँ
उस नीले समन्दर मे खडे जहाज की
जिसका कोई नक्शा ही नहीं
सिर्फ़ लहरों की उथल पुथल ही पुल बन जाती है
धराशायी मोहब्बत के फ़ूलों की
जिसकी चादर पर पैर रख
कोई आतिश जमीन पर उतरे और खोल मेरा सिमट ले …………



5)

मोहब्बत के कोण
त्रिआयामी नही हुआ करते 

जिसे कोई गणित सुलझा ले
और नयी  प्रमेय बना दे

इसलिये आखिरी नहान कर लिया है मैने
अब मत कराना स्नान चिता पर रखने से पहले
............

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

यूँ ही तो नहीं स्त्री को खुदा ने जननी का अधिकार दिया होगा

मिथक है 
स्त्री पुरुष होना
या एक सरंचना का उद्भव 
किसी कारण से होना
युगों से बांचते रहे हम
स्त्री पुरुष में अधिकार और कर्त्तव्य
मगर ना जान पाए उनके
समूचे अस्तित्व के आंकड़े
यूँ ही स्त्री नही हुआ जाता
उसके लिए सिर्फ 
समर्पण ही काफी नहीं था
किया था उसने उस वक्त 
कितना बड़ा त्याग
जब इन्द्र को हुआ था 
ब्रह्म हत्या का श्राप
कौन सा पुरुष आगे आया
उसकी ब्रह्म हत्या को 
चार भागों में था बांटा गया
उसमे से एक भाग
स्त्री को दिया गया
और उसने स्वीकार भी किया
क्यूँकि जानती थी वो
जनने की शक्ति से हो जाएगी आप्लावित
मस्तक उसका हो जायेगा गौरान्वित 
जो कार्य पुरुष नहीं कर पायेगा
स्त्री का मुख तेज की लालिमा से
उदीप्त हो जायेगा 
फिर कैसे पुरुष कर सकता है समानता 
किसी भी युग में ?
किसी भी काल में 
वरना तो स्त्री भी थी उतनी ही सशक्त
उतनी ही लोह हृदय 
जितना आज का पुरुष दिखता है
फिर चाहे वो होता नहीं लोह्पुरुष
सिर्फ अपने दंभ में चूर 
अपने मान के लिए
श्रेष्ठ साबित करने पर आमादा हो जाता है
नहीं जानता स्त्री का सच
यूँ ही स्त्री नहीं करती
त्याग और समर्पण
आज भी स्त्री है हर हाल में श्रेष्ठ
मगर उसने ना कभी जताया
जानती है .........जताने वाले कमजोर होते हैं 
हो हिम्मत तो एक बार
उसके आकार तक आकर देखो
उसकी ऊँचाइयों को छूकर देखो
गर कर पाओ ऐसा तब कहना
पुरुष है श्रेष्ठ ..............
शक्ति यूँ ही हर किसी में आप्लावित नहीं होती
सामर्थ्यवान  को ही ज्योतिपुंज सौंपा जाता है 
शक्तिमान भी शक्ति के बिना अधूरा माना जाता है 
फिर कहो पुरुष ! तुम हो कैसे स्त्री से श्रेष्ठ ?
कोई तो कारण रहा होगा ना 
यूँ ही तो नहीं स्त्री को खुदा ने जननी का अधिकार दिया होगा 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

अधूरी हसरतों का ताजमहल

जो तफ़सील से सुन सके
जो तफ़सील से कह सकूँ
वो बात , वो फ़लसफ़ा
एक इल्तिज़ा, एक चाहत
एक ख्वाहिश, एक जुनून
चढाना चाहती थी परवान
ढूँढती थी वो चारमीनार
जिस पर लिख सकती वो इबारत
मगर बिना छत की दीवारों के घर नही हुआ करते
जान गयी थी ……तभी तो
खामोशी की कब्रगाह मे सुला दिया हर हसरत को
क्योंकि
दीवानगी की हद तक चाहने वाले ताजमहल के तलबगार नही होते
और मुझे तुम कभी मिले ही नही
तो किसे सुनाती दास्तान-ए-दिल
पास होकर भी दूरियों ने कैसी लक्ष्मण रेखा खींची है
सोचती हूँ ..........
एक मकबरा बनवा दूं
और उस पर लिखवा दूं
अधूरी हसरतों का ताजमहल ............है ना सनम !!!!!!!!!!

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

ओ प्रदीप्तनयन!

वक्त के उस छोर पर खड़े तुम
और इस छोर पर खडी मैं
फिर भी एक रिश्ता तो जरूर है
कोई ना कोई कड़ी तो जरूर है
हमारे बीच यूँ ही तो नहीं 
संवादों का आदान प्रदान होता 
चाहे बीच में गहन अंधकार है
नहीं है कोई साधन देखने का
जानने का एक दूजे को
मगर फिर भी 
कोई तो सिरा है 
जो स्पंदन के सिरों को जोड़ता है
वरना यूँ ही थोड़े ही 
सूर्योदय के साथ 
मिलन की दुल्हन साज श्रृंगार किये
प्रतीक्षारत होती 
कभी अपनी चूड़ियों की खन खन से 
तो कभी पायल की रून झुन से
अपनी भावनाओं का आदान प्रदान करती
वैसे भी सुना है 
स्पंदन शब्दों के मोहताज नहीं होते
देखो तो ज़रा 
ना तुमने मुझे देखा 
ना जाना ना चाहा
मगर फिर भी एक डोर तो है 
हमारे बीच
यूँ ही थोड़े ही रोज 
कोई किसी का 
वक्त के दूसरे छोर पर खड़ा
इंतज़ार करता है
मैं तो ज़िन्दगी गुज़ार देती यूँ ही 
मगर वक्त की कुचालें कोई कब समझा है 
यूँ ही थोड़े ही वक्त का पहरा रहा है 
ये स्पंदनों के शाहकार भी अजीब  होते हैं
लफ़्ज़ों को बेमानी कर 
अपनी मर्ज़ी करते हैं
देखो तो 
वक्त अब डूबने को अग्रसर है
और तुम ना जाने
कौन से दूसरे ब्रह्माण्ड में चले गए हो
जो समय की सीमा से भी मुक्त हो गए हो
मगर मैं आज भी
इंतज़ार की बैसाखियों पर खडी
तुम्हारे नाम की 
हाँ हाँ नाम की ..........जानती हूँ
ना तुम्हारा कोई नाम है 
ना मेरा 
ना तुमने मुझे जाना है 
ना मैंने
फिर भी एक नाम दिया है तुम्हें मैंने…ओ प्रदीप्तनयन!
बस उसी नाम का दीप जलाए बैठी हूँ
ओह ! आह ! उम्र के सिरे कितने कमज़ोर निकले
स्पंदनों की सांसें भी थमने लगीं
शायद शब्दों का अलगाव रास नहीं आया 
तभी धुंध के उस पार सिमटा तुम्हारा वजूद
किसी स्पंदन का मोहताज ना रहा 
और मैं अपनी साँसों को छील रही हूँ
शायद कोई कतरा तो निकले 
जिसमे कोई स्पंदन तो बचा हो 
और इंतज़ार मुकम्मल हो जाए 
ये वक्त की कसौटी पर इंतज़ार की रूहों का सिसकना देखा है कभी ?
ए .........एक बार हाथ तो बढाओ
एक बार गले तो लगाओ
और दम निकल जाए 
फिर मुकम्मल ज़िन्दगी की चाह कौन करे ?

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर

वार्तालाप तुमसे या खुद से नही पता…………मगर

आह ! और वक्त भी अपने होने पर रश्क करने लगेगा उस पल ………जानती हो ना मै असहजता मे सहज होता हूँ और तुम्हारे लि्ये लफ़्ज़ों की गिरह खोल देता हूँ बि्ल्कुल तु्म्हारी लहराती बलखाती चोटी की तरह …………बंधन ऐसा होना चाहिये जिसमे दोनो के लिये कुछ जगह बाकी हो क्योंकि मुझे पता है तुम उन्मुक्त पंछी हो मेरे ह्रदयाकाश की


स्पर्श की आर्द्रता के लिये जरूरी तो नही ना समीप होना ………देखो सिहरन की पगडंडी कैसे मेरे रोयों से खेल रही है और तुम्हारा नाम लिख रही है ………अमिट छाप मेरी असहजता मे तुम्हारे होकर ना होने की ………यूं कभी करवट नही बदली मैने ………आज भी खामोशी की दस्तक सुन रहा हूँ तुम्हारी धडकनों के सिरहाने पर बैठी मेरी अधूरी हसरत की………क्या तुमने उसे सहलाया है आज?

उम्र के रेगिस्तान मे मीलो फ़ैली रेत मे अक्स को ढूँढता कोई वजूद …………जहां ज़ब भी उम्र की झांझर झनकती है मेरी पोर पोर दुखती है तुम्हारी यादों की तलहटी मे दबी अपनी ही गहन परछाइयों से ………मुक्त नही होना मुझे , नही चाहिये मोक्ष …………इसीलिये स्वर का कम्पन कंपा देता है मेरी रूह की चिलम को……क्यों जरूरी नही हर कश मुकम्मल हो और उम्र गुज़र जाये


प्रेम को जोडना नही , वो जुडता नही है वो तो सिर्फ़ होता है और तुम हो इसलिये आवाज़ देती हूँ और कहती हूँ  .………आ जाओ बह जाओगे प्रेम के अथाह सागर मे जिसके किनारे नही होते , पतवार नही होती और ना ही कोई नाव होती …………बस बहते जाना ही नियति होती है ……क्या आ सकोगे उस छोर तक सीमित से असीमित होने तक्………अनन्त तक प्रवाहित होने के लिये ………बस मीठा होने के लिये इतना ही कर लो ………बह चलो मेरे संग मेरे आकाश तक

अब रेगिस्तान की रेत मे घरोंदे नही बनाना …………बस एक शाश्वत प्रश्रय स्थल तक पहुँचना है …जो अनन्त हो , असीम हो ………और उम्मीद है मिलेगा वो एक दिन

आन्दोलनों के लिये जरूरी तो नही वज़ूद का होना……………तो बन जाओ महादेव का हलाहल और बना लो मुझे विषकन्या ………काफ़ी है अदृश्य रेखा के विस्तार के लिये।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

बेमेल विवाह ……एक त्रासदी


बेमेल विवाह ………एक त्रासदी
जो समाज को अभिशापित करती रही
स्त्री भोग्या है……इसी को इंगित करती रही


यूँ तो सदियों से समाज में

बेमेल विवाह होते आये
जो हमारे अस्वस्थ समाज की
अस्थिर नींव बने
जिसका दुष्परिणाम आज
अधिकाधिक देखने को मिलता है
पहले औरत ना जागृत हुई
ना कभी अपने अधिकार के लिए लड़ी
बस सहज स्नेह त्याग की प्रतिमूर्ति रही
तो कैसे सोच पाती अपने बारे में
जहाँ संस्कारों में ही बीज ऐसे रोपित हुए
आज क्रांति का बिगुल बजाया है
तब नारी को ये समझ आया है
और उसका स्वाभिमान जाग आया है
तभी तो आज इसके दुष्परिणाम दिख गए हैं
हर गली हर मोड़ पर सिसकते मिल रहे हैं 

ये सड़े - गले गलीज़ रिश्ते
समाज को दूषित कर रहे हैं



पहला दुष्परिणाम


अभी उम्र थी बाली मेरी

बापू क्या देखा तुमने
मुझमे और उसमे ………
जो ब्याह दी अपने हमउम्र संग
जिसे देख चाचा ताया मामा
कहने की इच्छा होती है
कैसे उस संग सो सकती हूँ
वैवाहिक जीवन के सुख भोग सकती हूँ
जहाँ मन तो कभी मिला ही नहीं
और तन तो जैसे बिछौना बना
रोज चादर की तरह बिछ गया
पर कभी ना पूर्ण समर्पण रहा
चाहे कितना कष्ट सहा
उस वासना के कीड़े पर ना फर्क पड़ा
वो तो अपने सुख को खोजता रहा
और मुँह ढांप कर सोता रहा
ना जाना कभी प्रीतम का सुख क्या होता है
कैसे प्रेम पुष्पित पल्लवित होता है
सिर्फ भोग्या सा ही जीवन रहा
उस पर मानसिकता का भी दबाव रहा
ना कभी विचार मिले
ना कभी मुझे सराहा गया
ना मेरे घर में मेरा कोई
निर्णय कभी माना गया
सब पर बस उसी का एकाधिकार रहा
बोलो बापू जवाब दो
तुमने ऐसा क्यों किया
मेरा और उसका ना फर्क देखा
सिर्फ अपनी जिम्मेदारी समझ
क़र्ज़ सा जीवन से उतार दिया
मगर कभी ना जाना
कैसे नारकीय जीवन मैंने जीया
बेमेल विवाह का सबसे बड़ा
यही दुष्परिणाम रहा
वो मेरे जीवन का सुनहरा पन्ना ना कभी बना
सिर्फ शरीर से शरीर का संयोग रहा
वो भी उसकी मर्ज़ी पर
जब चाहे जैसे चाहे उपभोग हुआ
ऐसे में कैसे ना कुंठा जागृत होगी
कैसे उसके लिए मन में कोई पीर उठेगी
जिसने ना कभी मेरी कोई पीर जानी
जिसने मुझे सिर्फ अपनी जरूरत का सामान समझा
रोज ओढ़ा
और बिछाया
फिर मुँह ढांप कर सो गया
इंसान हूँ मैं भी
उत्कट अभिलाषाएं हैं मेरी भी
मगर जब तक उन अभिलाषाओं का जागरण हुआ
उससे पहले तो उसका पौरुष ध्वस्त हुआ
अब कैसे उम्र यूँ गुजरेगी
क्या रोज काँटों पर ना सिसकेगी
मर्यादा की बेड़ियाँ मेरे पाँव ना जकडेगी
क्या अपोषित कुंठाएं जन्म नहीं लेंगी
हर कोई अंकुश ना रख पाता है
संयम का जीवन से गहरा नाता है
मगर उम्र और इच्छाओं के आगे
सब बेमानी हो जाता है
तब उपदेश ना कोई भाता है
अब ऐसे में यदि मैं कोई गलत कदम उठा लूं
उसका साथ छोड़ दूँ
या
कोई दूजा उपाय खोज लूं
कहो बापू .......क्या मैं दोषी कहलाऊंगी
जब उसे उस उम्र में मुझसे
ब्याहने में ना शर्म आई
अपनी जरूरत की पूर्ति को
उसने ये राह अपनाई
तो क्या आज वो ही राह
मैं नहीं अपना सकती
क्या मैं कुल कलंकी कहलाऊंगी
क्या तमाम दुनिया के अंकुश
मुझ पर ही लागू होते हैं
क्या मेरी जरूरतों का कोई मोल नहीं
जवाब दो बापू ...........आज तुम्हें जवाब देना होगा
बेमेल विवाह के इस दुष्परिणाम का  तुम्हें साक्षी रहना होगा


दूसरा दुष्परिणाम


यूँ तो होते हैं दुनिया में

ब्याह रोज ही
जोड़े बनते हैं सभी तरह के
कभी मन से तो कभी बेमन से
और मन से बने जोड़े तो
फिर भी साथ निबाह लेते हैं
मगर बेमन से बने जोड़े
या दबाव में बने जोड़े
एक दिन टूट ही जाते हैं
उस पर यदि प्रश्न
खूबसूरती बनी हो
सौंदर्य ही जहाँ पैमाना हो
और दूसरा साथी कुरूपता की पराकाष्ठा हो
कैसे वैवाहिक जीवन संपूर्ण हो
कैसे ना वहाँ अनिश्चितता हो
जहाँ विश्वास सबसे पहले धराशायी होता है
साथी को कोई प्रशंसनीय दृष्टि से देखे तो भी शक होता है
साथी की सुन्दरता ही अभिशाप बन जाती है
चाहे ज़माने में कितना ही सराही जाए
मगर अपने साथी से ही दुत्कारी जाती है
तब सुन्दरता भी श्रापित हो जाती है
बेमेल विवाह में ये एक कड़ी और जुड़ जाती है
जहाँ मानसिक और शारीरिक उपयोगिता गौण हो जाती है
बस अंतस पर तो जैसे धुंध सी पड़ जाती है
जीवन तहस नहस हो जाता है
विश्वास का दामन छूट जाता है
बस मन के आँगन में अविश्वास का पौधा ही लहराता है
तब बेमेल विवाह का भयानक दुष्परिणाम
नज़र आता है
साथी कुंठाग्रस्त हो जाता है
और अपनी कुंठा में
या तो खुद को नुक्सान पहुँचाता है
या फिर साथी को ही बर्बाद कर डालता है
या फिर
उसे मार खुद भी मर जाता है
या उसका जीवन तानों बाणों से
दुश्वार कर देता है
घर से निकलना , किसी से बोलना
हँसना सब पर पहरे लग जाते हैं
तब बेमेल विवाह का दुष्परिणाम सामने आता है
शक के बीज में दो जीवन तबाह हो जाते हैं
क्योंकि मन में ये विश्वास काबिज़ हो जाता है
मेरा साथी ना मुझसे वफादार रहता है
बस इसी कुंठा में एक और परिवार तबाह होता है
कोई दबाव सह लेता है तो कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता है

अन्य  दुष्परिणाम


यूँ तो हम  २१ वीं सदी में जीते हैं

फिर भी खून का घूँट पीते हैं
दबाव में आकर जीवन बर्बाद कर लेते हैं
कभी पारिवारिक स्थिति में अंतर
तो कभी दहेज़ की कमी
तो कभी शैक्षिक अंतर
तो कभी हीन भावना
तो कभी उच्च ओहदा होना
जीवन बर्बाद कर देते हैं
कहीं पारिवारिक हैसियत इतनी हावी होती है
साथी को दोयम दर्ज़ा देती है
जो ना सम्बन्ध मधुर रख पाती है
बात बात पर हैसियत का दर्शन होता है
जिस पर साथी कुंठाग्रस्त होता है
बस ऐसे अनुबंधों की परिणति
अंत में विलगाव पर ही ठहर जाती है
और उसमे सबसे ज्यादा सहना
औरत को ही पड़ता है
बेमेल विवाह की सबसे बड़ी पीड़ित वो ही होती है
जहाँ कभी अहसान उतारने के लिए
तो कभी बचपन का वादा निभाने के लिए
तो कभी अपना क़र्ज़ उतारने के लिए
वस्तु सम उपभोग की वस्तु बनती है
एक हाथ से दूसरे हाथ में गुजरती है
जहाँ शैक्षिक अंतर होता है
वहाँ तो और भी जीना दुश्वार होता है
बात बात पर गंवार के ताने सहती है
चाहे कितनी कोशिश कर ले
मगर कभी ना आदर्श सुयोग्य स्त्री होने का दर्जा पाती है
वहाँ भी वो सिर्फ एक भोग्या ही बन जाती है
और कहीं कहीं तो अलगाव की नौबत भी आ जाती है
जहाँ पारिवारिक, वैचारिक , शारीरिक , आर्थिक या शैक्षिक
अंतर होता है वहाँ तो बेमेल विवाह का दुष्परिणाम
अलगाव में ही परिणत होता है
बेमेल विवाह की परिणति
या तो आँसुओं में
या चिता पर ही होती है
कोई तलाकशुदा तो कोई विक्षिप्तता
का जीवन जीता है
और जो सह नहीं पाता
वो ख़ुदकुशी को प्रेरित होता है
ऐसे बेमेल विवाह जीवन भर का बोझ बन जाते हैं
जो ना ढोए जाते ना सहेजे जाते हैं
आखिर कब हम समझेंगे
आखिर कब हम ये जानेगे
कब हम बेटियों के भविष्य की सोचेंगे
कब हम अपनी मानसिकता को बदलेंगे
और समझेंगे हमारे निर्णय कैसे
समाज को दूषित कर रहे हैं
खोखले रीती रिवाजों की भेंट चढ़ रहे हैं
और अपनों के सुखो की ही बलि ले रहे हैं
कैसे एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो
जब ऐसी अनदेखी हम करते रहेंगे
अब हमें ही नजरिया बदलना होगा
आपसी विश्वास और सहिक्ष्णुता ही
किसी रिश्ते की नींव होते हैं
ये बात अब सबको समझना होगा
और बेमेल विवाह के दुष्परिणामों का
आईना समाज को दिखाना होगा
तभी स्वस्थ भारत निर्माण होगा
तभी नया सूर्योदय होगा ..............

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

तुम कहाँ हो ?



तुम कहाँ हो ?
युगों युगों की पुकार
ना जाने कब तक चलेगी
यूँ ही अनवरत
बहती धारा
प्रश्न चिन्ह बनी
अपने वजूद को ढूंढती
क्योंकि
तुमसे ही है मेरा वजूद
तुम नहीं तो मैं नहीं
मैं ...........कौन
कुछ भी तो नहीं
अस्तित्वहीन सा कुछ
जो तुम्हारे बिना कुछ नहीं
तुम ही तो वीणा में राग भरते हो
साज़ में आवाज़ भरते हो
धडकनों में स्पंदन करते हो
तुमसे पृथक "मैं" कहाँ ?
और कौन हूँ?
कुछ भी तो नहीं
तो बताओ
कैसे तुम्हें ढूंढूं
कहाँ तुम्हें खोजूं?
कौन सा रूप दूँ?
कौन सा आकार दूँ
जिसे नैनन में भर लूँ
जिसकी छाप अमिट हो जाये
वो छवि बस अंतरपट पर छा जाये
बोलो .........दोगे मुझे
वो अनिर्वचनीय सुख
समाओगे मेरे नैनों के कोटर में
मेरे ह्रदय स्थली में
देखो
ढूँढ ढूँढ हार चुकी हूँ
नहीं मिल रहा वो तुम्हारा रूप
ना वो रंग
जिसे देखने के बाद
कुछ देखना बाकी नहीं रहता
जिसे पाने के बाद
कुछ पाना बाकी नहीं रहता
तो बोलो
हे अनंत ...............चितचोर
माधव नन्द किशोर
कहाँ हो तुम ?
आओगे ना एक बार
जीवन रहते जवाब देने
और मुझे संपूर्ण करने
हे केशव
हे मदन मुरारी
तुझ पर मैं सब कुछ हारी
तुम कहाँ हो मुरारी ?
मेरी अधूरी प्यास के अमृतघट ...............
आ जाओ ना अब तो ..................
ओ बिहारी ! ओ गिरधारी !
लो मैं खुद को हारी !
अब तो सुन लो पुकार
दे दो दीदार !
तुम कहाँ हो ? तुम कहाँ हो ? तुम कहाँ हो?
सुन लो मन पपीहे की ये करुण पुकार
पीर का आर्तनाद तुम तक पहुँचता तो होगा ना ..........केशव !


बुधवार, 19 सितंबर 2012

खरोंच


कल तक जो
आन बान और शान थी
कल तक जो
पाक और पवित्र थी
जो दुनिया के लिए
मिसाल हुआ करती थी
अचानक क्या हुआ
क्यों उससे उसका ये
ओहदा छीन गया
कैसे वो मर्यादा
अचानक सबके लिए
अछूत चरित्रहीन हो गयी
कोई नहीं जानना चाहता
संवेदनहीन ह्रदयों की
संवेदनहीनता की यही तो
पराकाष्ठा होती है
पल में अर्श से फर्श पर
धकेल देते हैं
नहीं जानना चाहते
नकाब के पीछे छुपे
वीभत्स सत्य को
क्योंकि खुद बेनकाब होते हैं
बेनकाब होती है इंसानियत
और ऐसे में यदि
कोई मर्यादा ये कदम उठाती है
तो आसान नहीं होता
खुद को बेपर्दा करना


ना जाने कितने
घुटन के गलियारों में
दम तोडती सांसों से
समझौता करना पड़ता है
खुद को बताना पड़ता है
खुद को ही समझाना पड़ता है
तब जाकर कहीं
ये कदम उठता है
अन्दर से आती
दुर्गन्ध में एक बूँद और
डालनी पड़ती है गरल की
तेज़ाब जब खौलने लगता है
और लावा रिसता नहीं
ज्वालामुखी भी फटता नहीं
तब जाकर परदगी का
लिबास उतारना  पड़ता है
करना होता है खुद को निर्वस्त्र
एक बार नहीं बार बार
हर गली में
हर चौराहे पर
हर मोड़ पर
तार तार हो जाती है आत्मा
लहूलुहान हो जाता है आत्मबल
जब आखिरी दरवाज़े पर भी
लगा होता है एक साईन बोर्ड
सिर्फ इज्जतदारों को ही यहाँ पनाह मिलती है
जो निर्वस्त्र हो गए हों
जिनका शारीरिक या मानसिक
बलात्कार हुआ हो
वो स्वयं दोषी हैं यहाँ आने के
यहाँ बलात्कृत आत्माओं की रूहों को भी
सूली पर लटकाया जाता है
ताकि फिर यहाँ आने का गुनाह ना कर सकें

इतनी ताकीद के बाद भी
गर कोई ये गुनाह कर ही दे
तो फिर कैसे बच सकता है
बलात्कार के जुर्म से
अवमानना करने के जुर्म से
जहाँ पैसे वाला ही पोषित होता है
और मजलूम पर ही जुल्म होता है
ये जानते हुए भी कि साबित करना संभव नहीं
फिर भी आस की आखिरी उम्मीद पर
एक बार फिर खुद को बलात्कृत करवाना
शब्दों की मर्यादाओं को पार करती बहसों से गुजरना
अंग प्रत्यंग पर पड़ते कोड़ों का उल्लेख करना
एक एक पल में हजार हजार मौत मरना
खुद से इन्साफ करने के लिए
खुद पर ही जुल्म करना
कोई आसान नहीं होता

खुद को हर नज़र में
"प्राप्तव्य वस्तु" समझते देखना
और फिर उसे अनदेखा करना
हर नज़र जो चीर देती है ना केवल ऊपरी वस्त्र
बल्कि रूह की सिलाईयाँ भी उधेड़ जाती हैं
उसे भी सहना कुछ यूँ
जैसे खुद ने ही गुनाह किया हो
खरोंचों पर दोबारा लगती खरोंचें
टीसती भी नहीं अब
क्योंकि
जब स्वयं को निर्वस्त्र स्वयं करना होता है
सामने वालों की नज़र में
शर्मिंदगी या दया का कोई अंश भी नहीं दिखता
दिखता है तो सिर्फ
वासनात्मक लाल डोरे आँखों में तैरते
उघाड़े जाते हैं अंतरआत्मा के वस्त्र
दी जाती हैं दलीलें पाक़ साफ होने की
मगर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती
होता है तो सिर्फ एक अन्याय जिसे
न्याय की संज्ञा दी जाती है

इतना सब होने के बावजूद भी
मगर नहीं समझा पाती किसी को
नहीं साक्ष्य उपलब्ध करवा पाती
और हार जाती है
निर्वस्त्र हो जाती है खोखली मर्यादा
और हो जाता है हुक्म
चढ़ा दो सूली पर
दे दो उम्र कैद पीड़ित मर्यादा को
ताकि फिर कोई खरोंच ना इतनी बढे
ना करे इतनी हिम्मत
जो नज़र मिलाने की जुर्रत कर सके

आसान था उस पीड़ा से गुजरना शायद
तब कम से कम खुद की नज़र में ही
एक मर्यादा का हनन हुआ था
मगर अब तो मर्यादा की दहलीज पर ही
मर्यादा निर्वस्त्र हुई थी प्रमाण के अभाव में
और अट्टहास कर रही थी सुना है कोई 
आँख पर पट्टी बाँधे हैवानियत की चरम सीमा........

ये खोखले आदर्शों की जमीनों के ताबूत की आखिरी कीलों पर
मौत से पहले का अट्टहास सोच की आखिरी दलदल तो नहीं
किसी अनहोनी के तांडव नृत्य का शोर यूँ ही नहीं हुआ करता ...गर संभल सकते हो तो संभल जाओ

रविवार, 16 सितंबर 2012

अधूरी कविता हूँ मैं

जानती हूँ
तेरी ज़िन्दगी की
अधूरी कविता हूँ मैं
हाँ .........अधूरी ही कहा है
क्योंकि यही तो सच है
अच्छा बताओ तो ज़रा
कहाँ पूरी हुई है
रोज तो लिखते हो एक नया फलसफा
रोज गढ़ते हो एक नया किरदार मुझमे
रोज करते हो सजदा
कभी मोहब्बत की देवी बनाकर
तो कभी मोहब्बत का खुदा बनाकर
बताओ तो ज़रा
क्या नहीं देखते तुम मुझमे
कभी किसी नदिया की अल्हड रवानी
क्या नहीं करते तुम तुलना
चाँद की चाँदनी से मेरे अक्स की
क्या नहीं देखते तुम मेरी आँखों में
सारे जहान की जन्नत
क्या नहीं लिखते रोज एक
नयी नज़्म
कभी मेरी खिलखिलाहट पर
तो कभी मेरी मुस्कराहट पर
तो कभी नज़रों की शोखियों पर
तो कभी मेरी नाजनीन अदाओं पर
तो कभी मेरी उदासी पर
तो कभी मेरी घबराहट पर
तो कभी मेरी धड़कन पर
तो कभी मेरी उलझन पर
बताओ तो ज़रा
कितने फलसफे गढ़े हैं तुमने
लिख लिख कर तुमने
पन्ने कितने काले किये हैं
मगर क्या पूरी हुई तुम्हारी कविता
नहीं ना .........नहीं होगी
जानते हो क्यों
क्योंकि
तुमने खुद को मिटाया है
और अपनी मिटी हस्ती की राख में
आँसुओं की कलम में
दिल के जज्बातों को डुबाया है
तभी तो ये नक्स उभर आया है
कि देखने वालों को
सिर्फ और सिर्फ मैं ही दिखती हूँ
तुम कहीं नहीं .............
और ऐसा तभी होता है
जब किसी के वजूद को
किसी ने आत्मसात कर लिया हो
तो बताओ ज़रा
क्या कभी पूरी हो सकती है ये कविता
जब तक ज़िन्दगी है
जब तक सांस है
जब तक धड़कन है
जब तक कायनात है
ये कविता हमेशा अधूरी ही रहेगी
मगर अधूरेपन में छुपी पूर्णता को सिर्फ मैं ही जान सकती हूँ
क्यूँकि
प्रकृति हो या पुरुष दोनों का सम्बन्ध शाश्वत जो है

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

"मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी बोल रही हूँ"


आप सब मेरी एक रचना पढिये जो अभी 5-6 दिन पहले अचानक लिखी गयी और उम्मीद नही थी कि इसका प्रयोग इतनी जल्दी हो जायेगा ……और देश मे जो घटने वाला है वो कलम से उद्धरित हो जायेगा 






मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी बोल रही हूँ
कट्टरपंथियों की कट्टरता से लेकर
पुरातत्व विदों की खोजों तक
मेरे वजूद पर सिर्फ पहरे ही मिले
कहीं ना मुझे मेरे चेहरे मिले
कोशिशों के संग्राम में
उम्मीदों की आस्तीनों पर
जब विचारों का बवंडर चला
इन्कलाब के नारे लगे
एक नया जूनून उठा
और अस्तित्व मेरा सुलग उठा
अपना युद्ध खुद लड़ना पड़ता है
मैंने भी लड़ा .........मगर देखो तो
मुझे आखिर क्या मिला
लगता है अब तक सिर्फ मेरा
दोहन ही तो हुआ
अभिव्यक्ति की आज़ादी का सिर्फ तमगा मिला
कहीं ना कहीं मेरी स्वतंत्रता पर
आज भी है अंकुश लगा
तभी तो
सच कहने वाला ही दोषी बना
झूठ का परचम तो आज भी खूब डटा
मैंने ही हथकड़ी पहनी
मेरे ही पाँव में बेडी पड़ी
मगर झूठ तो आज भी सिंहासन पर काबिज़ है
फिर कैसी ये अभिव्यक्ति की आज़ादी है
जहाँ सांस लेना भी दुश्वार है
अभिव्यक्ति की आज़ादी का बलात्कार है
देखो अब ना खुलकर सांस ले रही हूँ
ना तुम्हारे चँगुल से निकली हूँ
फिर मैं कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी हूँ
जो चोर को चोर नहीं कह सकती हूँ
महामहिमों को दंडवत सलाम ठोंकती हूँ
और अन्दर ही अन्दर कसमसाती हूँ
बेड़ियों में जकड़ी मैं कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी हूँ
बस इसी पर विचार करती हूँ
कभी कहा जाता है भाषा संयमित बरतो
तो कभी कहा जाता है भावनाओं पर अंकुश रखो
कभी कहा जाता है ये कहने का तुम्हें हक़ नहीं
तो आखिर कैसे खुद को अभिव्यक्त करूँ
आखिर कैसे मूँहतोड जवाब दूं
कैसे इस रेत के दरिया से बाहर निकलूँ
और खुलकर ताज़ी हवा में सांस ले सकूँ
और कह सकूँ ..........हाँ , मैं आज़ाद हूँ
सही में अभिव्यक्ति की आज़ादी हूँ
जब तक ना अपना वास्तविक स्वरुप पाऊँ
कैसे खुद को अभिव्यक्ति की आज़ादी कहलाऊँ ????????

सोमवार, 10 सितंबर 2012

शतरंज के खेल मे शह मात देना अब मैने भी सीख लिया है …400 वीं पोस्ट

तुम्हारा प्रश्न
आज की आधुनिक
क्रांतिकारी स्त्री से
शिकार होने को  तैयार हो ना
क्योंकि
नये नये तरीके ईज़ाद करने की
कवायद शुरु कर दी है मैने
तुम्हें अपने चंगुल मे दबोचे रखने की
क्या शिकार होने को तैयार हो तुम ……स्त्री?

तो इस बार तुम्हे जवाब जरूर मिलेगा ……



हां , तैयार हूँ मै भी

हर प्रतिकार का जवाब देने को
तुम्हारी आंखों मे उभरे
कलुषित विचारों के जवाब देने को
क्योंकि सोच लिया है मैने भी
दूंगी अब तुम्हे
तुम्हारी ही भाषा मे जवाब
खोलूँगी वो सारे बंध
जिसमे बाँधी थी गांठें
चोली को कसने के लिये
क्योंकि जानती हूँ
तुम्हारा ठहराव कहां होगा
तुम्हारा ज़ायका कैसे बदलेगा
भित्तिचित्रों की गरिमा को सहेजना
सिर्फ़ मुझे ही सुशोभित करता है
मगर तुम्हारे लिये हर वो
अशोभनीय होता है जो गर
तुमने ना कहा हो
इसलिये सोच लिया है
इस बार दूँगी तुम्हे जवाब
तुम्हारी ही भाषा मे
मर्यादा की हर सीमा लांघकर
देखूंगी मै भी उसी बेशर्मी से
और कर दूंगी उजागर
तुम्हारे आँखो के परदों पर उभरी
उभारों की दास्ताँ को
क्योंकि येन केन प्रकारेण
तुम्हारा आखिरी मनोरथ तो यही है ना
चाहे कितना ही खुद को सिद्ध करने की कोशिश करो
मगर तुम पुरुष हो ना
नही बच सकते अपनी प्रवृत्ति से
उस दृष्टिदोष से जो सिर्फ़
अंगो को भेदना ही जानती है
इसलिये इस बार दूँगी मै भी
तुम्हे खुलकर जवाब
मगर सोच लेना
कहीं कहर तुम पर ही ना टूट पडे
क्योंकि बाँधों मे बँधे दरिया जब बाँध तोडते हैं
तो सैलाब मे ना गाँव बचते हैं ना शहर
क्या तैयार हो तुम नेस्तनाबूद होने के लिये
कहीं तुम्हारा पौरुषिक अहम आहत तो नही हो जायेगा
सोच लेना इस बार फिर प्रश्न करना
क्योंकि सीख लिया है मैने भी अब
नश्तरों पर नश्तर लगाना …………तुमसे ही ओ पुरुष !!!!!!!

दांवपेंच की जद्दोजहद मे उलझे तुम

सम्भल जाना इस बार
क्योंकि जरूरी नही होता
हर बार शिकार शिकारी ही करे
इस बार शिकारी के शिकार होने की प्रबल सम्भावना है
क्योंकि जानती हूं
आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य मे आहत होता तुम्हारा अहम
कितना दुरूह कर रहा है तुम्हारा जीवन
रचोगे तुम नये षडयत्रों के प्रतिमान
खोजोगे नये ब्रह्मांड
स्थापित करने को अपना वर्चस्व
खंडित करने को प्रतिमा का सौंदर्य
मगर इस बार मै
नही छुडाऊँगी खुद को तुम्हारे चंगुल से
क्योंकि जरूरी नही
जाल तुम ही डालो और कबूतरी फ़ंस ही जाये
क्योंकि
इस बार निशाने पर तुम हो
तुम्हारे सारे जंग लगे हथियार हैं
इसलिये रख छोडा है मैने अपना ब्रह्मास्त्र
और इंतज़ार है तुम्हारी धधकती ज्वाला का
मगर सम्भलकर
क्योंकि धधकती ज्वालायें आकाश को भस्मीभूत नहीं कर पातीं
और इस बार
तुम्हारा सारा आकाश हूँ मै …………हाँ मैं , एक औरत 


गर हो सके तो करना कोशिश इस बार मेरा दाह संस्कार करने की
क्योंकि मेरी बोयी फ़सलों को काटते
सदियाँ गुज़र जायेंगी
मगर तुम्हें ना धरती नज़र आयेगी
ये एक क्रांतिकारी आधुनिक औरत का तुमसे वादा है
शतरंज के खेल मे शह मात देना अब मैने भी सीख लिया है
और खेल का मज़ा तभी आता है

जब दोनो तरफ़ खिलाडी बराबर के हों 
दांव पेंच की तिकडमे बराबर से हों 
वैसे इस बार वज़ीर और राज़ा सब मै ही हूँ
कहो अब तैयार हो आखिरी बाज़ी को ……ओ पुरुष !!!!

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

इश्क का पंचनामा ऐसे भी हुआ करता है



दौड़ती भागती रही उम्र भर
तेरे इश्क की कच्ची गलियों में
लगाती रही सेंध बंजारों की टोलियों में
होगा कहीं मेरा बंजारा भी
जिसकी सारंगी की धुन पर
इश्क की कशिश पर
नृत्य करने लगेंगी मेरी चूड़ियाँ
रेशम की ओढनी पर
लगी होंगी जंगली बेल बूँटियाँ
और बजती होंगी किसी
मंदिर की चौखट पर
इश्क की घंटियाँ
स्वप्न के पार होगी कहीं
कोई स्वप्निली घाटियाँ
जिसके एक छोर पर
सारंगी बजाता होगा मेरा बंजारा
और दूसरे छोर पर
कोई रक्कासा की परछाईं
करती होगी नृत्य सांझ की चौखट पर
एक धूमिल अक्स झुक रहा होगा आसमाँ का
करने कदमबोसी इश्क की ..........
सुनो ............आवाज़ पहुंची तुम तक ?
मेरे ख्वाबों की चखरी पर
हकीकत का मांजा क्यों नहीं चढ़ता ?
ये आखिरी ख़त की भाषा
कोई रंगरेज क्यों नहीं समझता ?
शायद अब इश्क की बारातें नहीं निकला करतीं
जनाजों की धूम खामोश होने लगी है
तभी तो देखो ना ..................
मैंने जो पकड़ी थी एक लकीर हाथों से
उसके बस निशाँ ही हथेली पर पसरे पड़े हैं
मगर कोई ज्योतिषी बूझ ही नहीं पा रहा
इश्क का ज्ञान .............
देखो ना मेरी हथेली पर
सारी रेखाएं मिट चुकी हैं
सिर्फ इश्क की रेखा ही कैसे टिमटिमा रही है
फिर भी नहीं कर पा रहा कोई भविष्यवाणी
अब ये भविष्य वक्ता का दोष है या इश्क की इन्तेहाँ
जो बस सिर्फ एक रेखा का गणित ही
सवाल हल नहीं कर पा रहा
और देखो तो ............सदियाँ बीत गयीं
सुलझाते सुलझाते धागे की उलझन को
बालों में उतरी चाँदी गवाह है इसकी
जितना सुलझाने की कोशिश करती हूँ
जितना मौलवी से कलमे पढवाती हूँ
ताबीज़ गढ़वाती  हूँ
ये नामुराद इश्क की रेखा उतनी ही सुर्ख हो जाती है
ना ना .........इश्क की रेखा हर हथेली में नहीं होती
और जिसमे होती है तो वहाँ
बस सिर्फ एक वो ही रेखा होती है
और मेरी हथेली की जमीन देखो तो ज़रा
कितनी चमक रही है
बर्फ की चादर बिछी है
जिसकी मांग सिन्दूर से भरी है
अमिट है मेरा सुहाग ......जानते हो ना
तभी तो दिन पर दिन
सुहागरेखा कैसे गहरा रही है
इसीलिए अब बंद रखती हूँ मुट्ठी को
कहीं नज़र ना लग जाए
वैसे तुम्हारी नज़र का
इन्तखाब तो आज भी है
मगर इंतज़ार के पुलों पर
ख्वाबों के बाँध बांधे तो
युगों बीत गए .........
क्या पहुँचा तुम तक
इंतज़ार -ओ-इश्क का जूनून
जानती हूँ नहीं पहुँचा होगा
तभी तो लहू का रिसना जारी है
यूँ ही इश्क का सुहाग अमर नहीं होता
जब तक ना दर्द का लहू रिसता
और फिर बंजारों की टोलियाँ
वैसे भी कब महलों की मोहताज हुई हैं
इश्क की चादरें तो बिना धागों के बुनी जाती हैं
और मेरी हथेली के बीचो बीच खिंची रेखा तो
लक्ष्मण रेखा से भी गहरी है , अटल है , तटस्थ है
जो इश्क की सुकूनी हवाओं की मोहताज नहीं
ओ मेरे इश्क के बंजारे ...........तू जहाँ भी है
याद रखना ...........एक दिन इश्क के जनाजे में ताशे तू ही बजा रहा होगा
और मेरा इश्क गुनगुना रहा होगा
रब्बा इश्क के पाँव में मेहंदी लगा दे कोई
इक शब की दुल्हन बना दे कोई ............
फिर भी कहती हूँ
यूँ इश्क के पेंचोखम में उलझना ठीक नहीं होता ...............जान की कीमत पर
क्योंकि
इंसानियत की रूह जब उतरती है
तब इश्क की दुल्हन अक्स बदलती है ...........और आइनों पर लिबास नहीं होते
देख लेना आकर क़यामत के रोज़ मेरी हथेलियों की सुर्ख रंगत .......... 
जो किसी मेहंदी की मोहताज नहीं
                      फिर चाहे तेरे इंतज़ार की ही क्यों ना हो ............

इश्क का पंचनामा ऐसे भी हुआ करता है …………ओ मेरे बंजारे  !!!!!!!!

सोमवार, 3 सितंबर 2012

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
ये ब्लोगिंग में मचा घमासान सा क्यों है

क्या हुआ जो एक पुरस्कार हाथ से छूट गया

क्या हुआ जो दिल तुम्हारा टूट गया
ऐसा तो हमेशा होता आया
फिर भी  उठा आखिर  ये बवाल सा क्यों है

क्या हुआ जो तुम्हारी पूछ ना हुई

क्या हुआ जो आयोजक की चाँदी हो गयी
यूँ ही तो नहीं बनता कोई खतरों का खिलाडी
आयोजकों पर मढ़ा ये इल्ज़ाम सा क्यों है

क्या हुआ जो आयोजन में  कमी रह गयी

क्या हुआ जो बद इन्तजामी  रह गयी
बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी
बातें होती रहती हैं
ऐसी बातें कहता हर बार वो  है
हर आयोजक का पुराना जुमला यही क्यों है

क्या हुआ जो अपनी भड़ास दूसरों पर निकाल दी

क्या हुआ जो किसी शख्सियत ने वाह वाही बटोर ली
ये तो होता आया हर आयोजन में
फिर इस बार ही ये धमाल सा क्यों है


क्या हुआ जो तुम्हारी ट्रेन छूट गयी

क्या हुआ जो ट्राफ़ी तुमसे रूठ गयी
ये ही तो होता आया ब्लोगिंग की जुगाडु दुनिया में
फिर इस बार ही छाया ये तूफ़ान सा क्यों है

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है
ये ब्लोगिंग में मचा घमासान सा क्यों है
:):):):):):):):):)

शनिवार, 1 सितंबर 2012

देख तो ज़रा एक कश लेकर………………

अपने दिल की चिलम मे
तेरी सांसों को फ़ूंका मैने
फिर चाहे खुद फ़ना हो गयी
देख तो ज़रा एक कश लेकर………
हर कश में जो गंध महकेगी
किसी के जिगर की राख होगी

छलनियाँ भी शरमा जाएँ जहाँ
ये ऐसी दिल की शबे बारात होगी 


अब और क्या नूर-ए-नज़र करूँ
ना सुबह होगी ना शाम होगी
कह दो रौशनियों से कोई जाकर
अब ना कभी मुलाकात होगी



जानते हो ना

चिलमों की धीमी आँच

कैसे धीमे धीमे ज़हर सी

उतरती है रूह के लिहाफ़ मे 
धुओं के छल्लों पर निशान भी नही मिलेंगे

बस तू एक कश लेकर तो देख
दर्द की राखों मे चीखें नही होतीं …………