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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

झूठे मक्कारों के देश मे गांधी ने क्यों जनम लिया

किससे करें शिकायत
किससे करें गिला
झूठे मक्कारों के देश मे
गांधी ने क्यों जनम लिया
ये गांधीवादी बनते हैं
जनता पर अत्याचार करते हैं
सिर्फ़ बातों मे ही सब्ज़बाग दिखाते हैं
मगर आचरण मे ना
गांधी के उपदेश लाते हैं
गांधी की तस्वीर के नीचे ही
सच को कदमों तले कुचलते हैं
कदम कदम पर धोखा देते हैं
अपनी बातों से ही मुकरते हैं
गांधी गर होते ज़िन्दा
अपने देश का हाल देख
खुदकुशी वो भी कर लेते
अपने नारों का
अपनी बातों का
अपनी मर्यादाओ का
यूँ तिरस्कार ना देख पाते
जो राह दिखाई थी
उस पर चलने वालों को
तिल तिल कर ना मरते देखा जाता
आतंकवादियों , भ्रष्टाचारियों की खातिर मे
देश के कर्णधारों को
यूँ दण्डवत करते देखते
तो सच मे गांधी आज
लोकतंत्र की परिभाषा पर
खुद ही शर्मिंदा होते
किसकी खातिर संघर्ष किया
किसकी खातिर अनशन किये
किसकी खातिर जाँ कुर्बान की
गर पता होता तो आज
गांधी भी ज़िन्दा होते
और देश पर विदेशियो का
राज होता तो क्या गलत होता
कल भी विदेशी राज करते थे
आज भी विदेशी राज करती है
देश की जनता तो बस
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढती है
गर गांधी ने ये सब देखा होता
तो सिर शर्म से झुक गया होता
अन्तस मे पीडा उपजी होती
गर कुर्सी के लालची नेताओं की
ये ऐसी मिलीभगत देखी होती
जहाँ कुर्सी की खातिर
जनता से विश्वासघात होता है
वहाँ संविधान भी आज
अपनी किस्मत पर रोता है
कैसे करे इस बात को साबित
जनता को ,जनता के लिये, जनता के द्वारा
ये तो सिर्फ़ एक किताबी तहरीर
बनी है मगर इसमे ना कोई
जनता की भागीदारी है
जनता तो सिर्फ़ प्रयोगों
तक सीमित होती है
गर देखा होता आज देश का ये हाल
गांधी ने भी अफ़सोस किया होता
क्यूँ मैने झूठे मक्कारों धोखेबाजों के
देश मे जनम लिया……………

रविवार, 21 अगस्त 2011

प्रेम दीवानी

सांवरे की प्रीत संग मैने 
बांध ली है डोरी
अब मर्ज़ी तुम्हारी
नैया मेरी पार लगाओ 
या मझधार मे डुबा दो मोरी
प्रीत की रीत मै नही जानूँ
पूजा पाठ की विधि ना जानूँ
और कोई राह ना जानूँ
सांवरे इक तेरे नाम के सिवा
और ना कोई नाम ना जानूँ
अब मर्ज़ी तुम्हारी
हाथ पकडो या छोड दो मुरारी
मै तो जोगन बनी तिहारी
मुझे ना भाये दुनिया सारी




तुम बिन  ठौर ना पाये दीवानी
भई बावरी प्रीत बेचारी
दर दर भटके मीरा बेचारी
कहीं ना मिलते कृष्ण मुरारी
कैसे आये चैन जिया मे
श्याम बिन अंखियाँ बरस रही हैं
श्याम दरस को तरस रही हैं
श्याम रंग मे डूब गयी हैं
श्याम ही श्याम हो गयी हैं
 
और कोई रंग नही है
और कोई ढंग नही है
जीवन तुम बिन व्यर्थ गया है
जीने का ना कोई अर्थ रहा है
श्याम सुधि ना बिसरायो
इक बार दरस दिखा जाओ
ह्रदयकमल मे आ जाओ



मोहिनी रूप दिखा जाओ
मुझे अपनी दासी बना जाओ
श्याम प्रीत की रीत दिखा जाओ
मुझे अपनी दुल्हन बना जाओ
श्याम मिलन को आ जाओ
कांकर पाथर बना जाओ
चरण स्पर्श करा जाओ
मुझ अहिल्या को भी तार जाओ
श्याम दिव्य जोत जगा जाओ
इक बार विरहिनी के ताप को मिटा जाओ
श्याम इक बार तो आ जाओ
प्यारे इक बार दरस दिखा जाओ


गुरुवार, 18 अगस्त 2011

आज तुम फिर धडकी हो

आज तुम फिर धडकी हो
क्या हुआ है जो आज
धडकनों  ने फिर करवट ली है
क्या फिर से कोई सरगोशी हुई है
किसी याद ने फिर आँगन
बुहारा है
ये तो  बियाबान जंगल में
एक उजाड़ मंदिर है
जहाँ अब कोई घंटा नहीं बजता
फिर कैसे आज टंकार हुई है
यहाँ तो देवी की मूरत भी
खंडित हो चुकी है
सिर्फ अवशेष ही बिखरे पड़े हैं
फिर कैसे यहाँ आज आहट हुई है
मैंने तो सुना है उजड़े दयारों में
चराग रौशन नहीं होते
फिर कैसे आज लौ टिमटिमा रही है
वैसे भी सब सावन हरे नहीं होते
फिर कैसे यहाँ कोंपल फूट रही है
क्या वक्त तुम्हारे आँगन में हवा दे रहा है
या कोई उड़ता तिनका मेरी आस का
आज तुम्हें भी चुभा है
जो तुमने मुझे इस कदर याद किया है
कि मेरी धडकनों ने फिर से जीना सीख लिया है
या फिर कोई बादल आज तुम्हारे
पाँव को फिर से छू गया है
और तुम्हें वो गुजरा लम्हा
याद आ गया है
जिसमे बरसात भी सूख गयी थी
और मोहब्बत भीग रही थी
कोई तो कारण है
यूँ ही तुम आज फिर से मुझमे नहीं धडकी हो

रविवार, 14 अगस्त 2011

जब तुम्हारा नया जन्म होगा……एक अपील देश की जनता के नाम





स्वतंत्रता दिवस है या महज औपचारिकता?
क्या वास्तव मे स्वतंत्रता दिवस है?
क्या वास्तव मे हम स्वतंत्र हैं?
कौन से भ्रम मे जी रहे हैं हम? किसे धोखा दे रहे हैं? शायद खुद को धोखा देने की आदत पड गयी है ।
जिस देश मे बोलने की आज़ादी पर प्रतिबंध लगने लगे, अपने अधिकारों के इस्तेमाल पर अंकुश कसने लगे, तानाशाही का बोलबाला होने लगे, आम जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाने लगे,जनता के मौलिक अधिकारों का हनन होने लगे…………तो कहाँ से वो देश लोकतांत्रिक देश गिना जायेगा…………क्या हम तानाशाही की तरफ़ नही बढ रहे…………क्या फ़र्क रह गया तानाशाही मुल्कों मे और हमारे देश मे जहाँ भ्रष्टतम अधिकारी डंके की चोट पर सीना तान कर आम जनता की आवाज़ को दबाने मे जुटे हों और देश की सरकार भी उसमे शामिल हो …………किस आधार पर कहते हैं कि ये देश लोकतंत्र मे विश्वास रखता है कहाँ है लोकतंत्र जब आम जनता को उसके बोलने या विरोध प्रदर्शन की भी इजाज़त ना दी जाये?
सिर्फ़ लोकतंत्र शब्द याद किया है मगर उसके असली अर्थ को तो नेस्तनाबूद कर दिया है । कैसा शासन है ? फिर कैसी स्वतंत्रता का ढोल पीट रहे हैं हम? क्या यही स्वतंत्रता है और इसी का जश्न हमने मनाना है तो मेरी अपील है इस देश के नागरिकों से कि मत भ्रम मे रहें और कल स्वतंत्रता दिवस पर कोई भी जनता लालकिले पर ना पहुँचे और इस तरह अपना विरोध प्रदर्शन करे………ताकि देश के कर्णधारो को पता चल जाये कि तानाशाही हर युग मे चकनाचूर हुई है………और जनता की एकता और अखंडता का सबूत सरकार को मिल जाये अन्यथा उम्रभर गुलामी की जंजीरो मे जकडे रहेंगे और फिर ये मौका दोबारा कभी मिलेगा भी या नही , नही मालूम।
तो क्यों ना आज हम सब मिलकर अपना विरोध प्रदर्शन इस तरह करें कि सरकार और उनके नुमाइंदों को जनता के तेवर समझ आ जायें और इसका सबसे बेहतर अब एक  आखिरी उपाय यही बचा है कि हम सब कल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले ना जाकर और ना ही किसी समारोह मे शिरकत करके अपना विरोध दर्ज करायें और देश के सच्चे नागरिक होने का फ़र्ज़ निभायें ताकि आने वाला कल हम पर शर्मिंदा ना हो।





सभ्यता संस्कार और संस्कृति का मानी
तीन रंगो मे समाया देश है मेरा
अब इसके रक्षक बन जाओ
मत फिर से तुम भरमाओ
एकजुट फिर हो जाओ
बलिदान को तैयार हो जाओ
आज देश की पुकार यही है
एक बार फिर से दोहराओ
तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूँगा
और एकता का परचम लहराओ
खुद मे भगतसिंह , सुखदेव , राजगुरु
को एक बार फिर जिला देना
वतन का कुछ कर्ज़ चुका लेना
गांधी का मान रख लेना
अपनी शक्ति का परिचय देना
कल गुलाम थे गैरो के
इस बार अपनो की जंजीरें तोड देना
भारत को एक बार फिर
आज़ाद कर देना
ये आज़ादी का संकल्प लेना
तब स्वतंत्रता दिवस सफ़ल होगा
जब तुम्हारा नया जन्म होगा
जब तुम्हारा नया जन्म होगा……………

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

आहत मन

आओ लहू का बीज बोयें
लहू का खाद पानी दें
और लहू की ही खेती करें
अब रगो मे लहू का उफ़ान कहाँ
वो जमीन आसमान कहाँ
बन्जर मरुस्थलो मे 
अब खिलते कँवल कहाँ 
चलो यारो थोडा तेरा 
थोडा मेरा 
कुछ लहू बहाया जाये
एक लहू का दरिया बनाया जाए

सीनो मे अब दिल कहाँ 
जज़्बातो मे वो सिहरन कहाँ
अहसासो मे वो अपनापन कहाँ
चलो यारो ज़िन्दा लाशो को
फिर से दफ़नाया जाये
कुछ तेरा और कुछ मेरा
थोडा लहू बहाया जाए

सरहदो मे अब फ़ासले कहाँ
आने जाने मे अब रुकावटें कहाँ
हर तरफ़ दहशतगर्दी का आलम
चलो फिर से इस बेजान शहर को
कब्रिस्तान बनाया जाए
यहाँ ज़िन्दा रूहो को दफ़नाया जाए
कुछ तेरी कुछ मेरी
लहू की भूख मिटायी जाए
ऐसे इक दूजे को काटा जाए
फिर ना कोई प्यास रहे
फिर ना कोई आस रहे
कहीं ना कोई विश्वास रहे
चलो यारो आओ इस देश को अपने
लहू का समन्दर बनाया जाए

जब ज़िन्दा ही चिताये जलती हैं
इंसान हर पल मरता हो
आतंक , भ्रष्टाचार का बोलबाला हो
आम आदमी के नसीब मे तो
सिर्फ़ भुखमरी का पाला हो
पैसे से जहाँ सबकी भूख मिटती हो
गद्दारो से धरती पटी पडी हो
जहाँ लाशें भी बिकती हों
और इंसानियत पर 
बेईमानी , गद्दारी की
दीवारें चिनती हों
जहाँ मौत ज़िन्दगी से सस्ती हो
आदमी आदमी का दुश्मन हो
फिर क्यो न ऐसे देश मे यारो
अपनो का लहू बहाया जाए
खुद को स्वंय मिटाया जाए

जब मौत हर पासे ताण्डव करती हो
तो क्यों ना उसे गले लगाया जाए
इस बेबस लाचार कमजोर सभ्यता 
को मिटाया जाए
प्रलय का दीदार कराया जाए
कुछ इस तरह यारों 
आखिरी कर्ज़ चुकाया जाए
एक नये जहान, 
एक नयी सभ्यता 
एक नयी जमीन 
और इंसानियत की खातिर
 वर्तमान को ज़मींदोज़ किया जाये
भविष्य को नया सूरज दिया जाए






































































बुधवार, 10 अगस्त 2011

उधर तो चीन की दीवार खिंची है

ये मोहब्बत की
शिकस्त नही तो क्या है
तुम्हारी परछाइयाँ भी
साथ छोड रही हैं
और नगर मे
कोलाहल मचा है
कुछ सुनाई नही देता
क्या तुम तक
मेरी आवाज़ पहुंचती है
क्या तुम अब भी
मोहब्बत की राख मे
भीगते हो
अगर हाँ ……।
तो बताओ छूकर मुझे
क्या मेरा स्पर्श
महसूस कर रहे हो
और जो राख बची है मुझमे
क्या मिली उसमे कोई चिंगारी
नही बता सकते ……जानती हूँ
मोहब्बत कब स्पर्श की मोहताज़ रही है
शायद तभी बर्तन खडक रहे हैं
और शोर मच रहा है
मगर इकतरफ़ा…………
उधर तो चीन की दीवार खिंची है
अब दीवारों मे कान नही होते………।


रविवार, 7 अगस्त 2011

कुछ कश्तियाँ अकेले बहने को मजबूर होती हैं

जाने कैसे पहुँच गयी
महासागर मे बहते बहते
लहरों के तांडव पर
अपने वजूद को संभालने
की कशमकश में

वो कहते हैं
तुम दूर हो गयी हो
इंसानी वजूद से

तुम्हारे चारो तरफ़
फ़ैला सागर
तुम्हे समेट रहा है
अपने आगोश मे



और तुम अकेले
किनारे पर खडे
मुझे  और मेरी
ज़िन्दगी की हलचलों
को इस किनारे से उस किनारे तक
देख रहे हो
मगर क्या तुम्हे
मै वहाँ मिली?
दिखा मेरा वजूद
जो ना जाने कब का
सागर के अंतस्थल मे
विलीन हो गया है


तुम होकर भी नही हो
और मै ………
देखो ना मै बची ही नही
तुम्हारे बिना………
इस बहते सागर के
उठते ज्वार भाटों मे
कश्तियाँ डूब जाया करती हैं
अपना वजूद खो देती हैं
मगर कुछ कश्तियाँ
अकेले बहने को मजबूर होती हैं

कहीं देखा है तुमने

शापित कश्तियों का अकेलापन

बुधवार, 3 अगस्त 2011

कभी देखा है चिता को चीत्कार करते हुये?

ये कानखजूरों से रेंगते
सवालो के पत्थर
ये बेतरतीब से बिखरे
अशरारों के मंज़र
हादसों के गवाह
कब होते हैं
ये तो खुद हादसों की
वकालत करते हैं
सीने पर बिच्छू से
डंक मारते अलाव
उम्र भर जलने को
मजबूर होते हैं
चिता का धुआं
सुलगती आग को
हवा देता है
और हर ख्यालाती
मंज़र को होम
कर देता है
कभी देखा है
चिता को चीत्कार
करते हुये?

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

कहाँ हो तुम?

याद तो होगा तुम्हे
वो बरसात का मौसम
जिसमे भीगे थे
दोनो के तन मन
एक सुनसान सडक पर
लम्बा सफ़र था
दोनो का साथ था
और मौसम का भी
अपना अन्दाज़ था
खामोशी पसरी हुई थी
मगर बूँदो की आवाज़
मधुर धुन घोल रही थी
दिल की धडकनो के साथ
हर आवाज़ से अन्जान
जब तुमने अचानक कहा था
याद तो होगा ना………
कैसे मौसम वही ठिठक गया था
आसमाँ से उतरती बूँदोँ की लडियों
ने जैसे कोई शामियाना बनाया था
और वक्त तो जैसे आज भी
वही उस भीगे मौसम मे भीग रहा है
और तुमने कहा था
आज तक किसी ने किसी को
इस तरह ना कहा होगा
ए बूंदों तुम गवाह रहना
मेरी इस बात की
लो आज मै इस बरसात को
साक्षी बना कहता हूँ
मैने दिल तुम्हे दे दिया
क्या रख सकोगी संभाल कर………जानाँ
और देखो तुम्हारी जानाँ
उसी सुनसान राह पर
तुम्हारे दिल को संभाले
आज भी वैसे ही
बारिश मे भीग रही हूँ
ए ………बताओ ना
कहाँ हो तुम?

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

ये तो हद हो गयी………अब टी वी पर भी आ गये

दोस्तों
कल एन डी टी वी पर प्रसारित एक कार्यक्रम जिसमे सोशल मिडिया के प्रभाव के बारे मे बोलना था …………अपने विचार व्यक्त करने थे उसमे मैने , राजीव तनेजा जी और संजू तनेजा जी ने भाग लिया था ………देखिये उसकी विडियो


अगर ओरिजिनल देखना है तो यू ट्यूब का ये लिंक क्लिक करके देख सकते हैं
http://www.youtube.com/watch?v​=_X7bGGIFn3k
 
 ये विडियो तो हमने मोबाइल से लिया है मगर ऊपर सीधा और साफ़ प्रसारण देख सकते हैं




रविवार, 24 जुलाई 2011

बहुत दिन हुये तुमने कुछ कहा नही

बहुत दिन हुये
तुमने कुछ कहा नही
तुम कुछ कहते क्यों नही
देखो ना सारे पन्ने कोरे पडे हैं
बताओ अब इनमे
कौन सी ताबीर लिखूँ
तुम्हारा ना दर्द है अब मेरे पास
और ना ही कोई सुबह
जिसमे तुमने कुछ
ख्वाब बोये हों
बताओ ना क्या लिखूँ
ज़िन्दगी के हर पन्ने पर
सिर्फ़ तुम्हारे ही तो
रंग उकेरती हूँ
तुम जानते हो
और जब तुम कुछ नही कहते
तो सोचो ना
कितनी बेरंग हो जाती हूँ
मै और मेरे पन्ने
क्या तुम कभी
पढना चाहोगे बेरंग पन्नों को
मेरे जाने के बाद
कैसे उनमे मुझे ढूँढोगे
कैसे उनमे से अपने प्रेम की
चिलमन उठाओगे
और दीदार करोगे इन्द्रधनुष का
जिसमे बरसात के बाद
सुनहरी धूप खिली होगी
और उनमे तुम्हारा अक्स
चस्पां होगा
बताओ ना कैसे तुम
खुद का दीदार मेरी
आंखो से करोगे
तुम्हे कुछ तो कहना ही होगा
मेरे लिये ना सही
कम से कम अपने लिये तो कहो
यही तो अनमोल सौगात
तुम्हे देने के लिये
लिख रही हूँ
शायद कभी तुम पढो
और उनमे कभी खुद को
और कभी मुझे देखो
और लफ़्ज़ों मे मुझे
छूने की , महसूसने की
कोशिश करो
देखना उस पल
तुम्हारी आँखों से ट्पकते
आँसू पन्ने मे जज़्ब नही होंगे
उन्हे मै पी रही होंगी
और तुम्हारा गम जी रही होंगी

जानते हो ………
मोहब्बत का इक ताजमहल

ऐसे भी बनाया जाता है…………

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

अखंड समाधियाँ यूँ ही नहीं लगा करतीं

एक मुद्दत हुई
ज़माने से मिले
कब से मन के तिलिस्म में
कैद कर लिया वजूद को
मन पंछी ने उड़ना भी छोड़ दिया
अब तो शायद पंख भी झड़ चुके हैं
वक्त की दीमक सब चाट चुकी है
बाहर का शोर भी बाहर ही रह जाता है
जैसे किसी  साऊंड प्रूफ घर में
कोई अजनबी सारी मिलकियत दबाये
अपनी हसरतों  के साथ रह रहा हो
कोई दरवाज़ा खटखटाए तो भी
अन्दर आवाज़ नहीं आती
आवाज़भेदी दरवाज़ों के साथ
प्रतिबिम्बरोधी दीवारें मन
के तिलिस्म की मजबूत
मीनारें बनी हैं
अब तो चाहकर भी उड़ ना पायेगा
जहाँ हवा का भी प्रवेश वर्जित  हो
वहाँ उड़ान कैसे संभव हो
मगर पता नही क्यों
आज इस तिलिस्म में दफ़न वजूद
बाहर की दुनिया का
तसव्वुर करने को बेचैन हो गया
लेकिन डरता है
कोई उसे जान सकेगा?
पहचान पायेगा ?
एक मुद्दत हुई ज़माने की
आहटों को सुने
और जैसे ही अपनी चाहत को
मन ने असलियत का जामा पहनाया
और मन को ज़माने की
धारा में प्रवाहित किया
कैसा विकल हुआ
यहाँ तो कोई चेहरा
कोई राहगीर
कोई नक्श ना अपना हुआ
हर तरफ , हर दीवार पर सिर्फ
एक नो एंट्री का बोर्ड दिखा
तो क्या सभी ने अपने
मनो में एक तिलिस्म बनाया है
और ज़माने के दस्तूर को भांप
मन ने वापस अपनी खोह में
आसान जमाया
समाधि से कभी ना वापस आने के लिए
आखिर अखंड समाधियाँ यूँ ही नहीं लगा करतीं

शनिवार, 16 जुलाई 2011

ज़रा खबर की खबर भी ले जाये

खबर खबर बन के रह गयी
ये खबर को भी खबर ना हुई
जब निकला खबर का जनाज़ा
खबर की भी खबर बन गयी
तब तक जब तक कोई नयी सनसनीखेज खबर और नही आ जाती बस तभी तक असर रहना है ………जनता को आदत पड चुकी है ये सब देखने की और ऐसे ही जीने की…………जनता ने भी बापू के बन्दरों की तरह बुरा देखना, बुरा बोलना और बुरा सुनना बन्द कर दिया है…………तो बस खबर है अगली खबर तक ही है इसका जीवन
 
हम सब अब खबरो के आदी हो चुके हैं…एक से जल्दी बोर हो जाते हैं इसलिये रोज एक नयी खबर का तो इंतज़ार कर सकते हैं मगर करने के नाम पर सिर्फ़ कोस सकते हैं और जब अपनी बारी आये तो अपने घर परिवार का वास्ता देकर पतली गली से निकल जाते हैं ……जब हम बहाने बनाना जानते हैं तो फिर सरकार के पास तो पूरा अख्तियार है और बहाना बनाना वैसे भी उसकी फ़ितरत है………तो क्या हुआ अगर वो रोज एक नया बहाना गढ लेती है कभी सबूतों के नाम पर तो कभी दबाव के नाम पर तो कभी डर के नाम पर्…..........और ये भी बस खबर बन कर ही रह जाएगी हमेशा की तरह........बैठकें की जाएँगी , समितियां गठित की जाएँगी, दूसरे मुल्क पर इलज़ाम लगाये जायेंगे और अपनी कमी को ना देख दूसरों के सिर घड़ा फोड़ा जायेगा , शहीदों को श्रद्दांजलि दी जाएगी और कुछ लाख का मुआवजा उसके बाद किसी आतंकवादी को यदि गलती से पकड़ भी लिया तो उसे मेहमान बनाकर रखा जायेगा ...........आखिर इस देश की परंपरा रही है ........अतिथि देवो भवः ...........अब बेचारी सरकार ये सब तो करेगी ही ना आखिर कुर्सी का सवाल है ......कहीं गलती से छिन गयी तो अबकी बार दोबारा मिले ना मिले ...........तो अच्छा है ना अतिथि का खास ख्याल रखा जाये कुछ जनता मरती है तो क्या हुआ ..........जनता वैसे भी इतनी बढ़ चुकी है इसी तरह तो कम होगी .........सरकार को सारे उपाय पता हैं ..........मिडिया अपना काम कर रहा है ........ख़बरों के पीछे दौड़ रहा है जब तक कोई दूसरी खबर नहीं आती और जनता हमेशा की तरह हाय हाय चिल्ला कर दो दिन में चुप बैठ जानी है ............तो क्या कहेंगे इसे एक खबर ही ना........इससे ज्यादा अगर हो तो बेचारी खबर को भी शर्म आ जाये .........खबर का जीवन दो दिन का............एक ने आना है तो दूसरी ने जाना ही है............अब तो यही कहेंगे

खबर को खबर ने बेखबर कर दिया
और खबर का जूनून खबर में सिमट गया

शनिवार, 9 जुलाई 2011

बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं .............

चलो अच्छा हुआ
अब दहलीज को
लांघकर निकल
जाते हैं लोग
वरना आस के पंख
कब तक इंतजार की
धडकनें गिनते
यूँ भी अब कहाँ
लोग बनाते हैं
दहलीज घरों में
ये तो कुछ
वक्त के निशाँ हैं
जिन्हें दहलीजें
समेटे बैठी हैं
वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं ...........
शायद तभी
रिश्तों की दहलीज
लाँघ गए तुम ............
बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं .............

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

तभी आज इतने वर्षों बाद यादों ने दस्तक दी है


पूरा चाँद था उस दिन
जिस दिन हम मिले थे
याद है ना तुम्हें
और आसमाँ में आषाढ़ की
काली कजरारी बदली छाई थी
जिसने चाँद को
अपने आगोश में
धीरे धीरे समेट लिया था
और चाँद भी
बेफिक्र सा उसके
आगोश में सो गया था
जाने कब की थकान थी
जो एक ही रात में
उतार देना चाहता था
और उस सारी रात
हमने भी एक सफ़र
तय किया था
दिलों से दिलों तक का
रूह से रूह तक का
जहाँ जिस्म से परे
सिर्फ आँखें  ही बोल रही थीं
और शब्द खामोश थे
पता नहीं क्या था उस रात में
ना बात हुई ना वादा हुआ
मगर फिर भी कुछ था ऐसा
कि जिसने मुझे आज तक
तुमसे जोड़ा हुआ है
शायद .........तुम भूल गए हों
मगर वो प्लेटफ़ॉर्म पर
सुबह के इंतज़ार में
गुजरती रात आज भी
मेरे वजूद में ज़िन्दा है
सुबह तो सिर्फ जिस्म
वापस आया था
रूह तो वहीँ तुम्हारी
खामोश आँखों में ठहर गयी थी
कभी कभी अहसास
शब्दों के मोहताज़ नहीं होते
और कम से कम
पहली और आखिरी मुलाक़ात
तो उम्र भर की जमा पूँजी होती है
शायद कहीं तुम भी आज
उस मुलाकात को याद कर रहे होंगे
तभी आज इतने वर्षों बाद
यादों ने दस्तक दी है


उन आषाढी बूंदों में आज भी भीग रही है हमारी मोहब्बत 
इंतज़ार बनकर 

सोमवार, 4 जुलाई 2011

क्यूँ इतना शोर मचाया है

हमको ना इतना समझ ये आया है
चवन्नी की विदाई का क्यूँ
इतना शोर मचाया है
ये तो दुनिया की रीत है
आने वाला कभी तो जायेगा
फिर ऐसा क्या माजरा हुआ
जैसे किसी आशिक का जनाजा हुआ
शोर ऐसे मचा रहे जैसे
चवन्नी को दिल से लगाकर रखते थे
किसी से पूछो तो सही
चवन्नी का इक सिक्का भी
पास नहीं होगा मगर
चवन्नी चवन्नी गाकर
शोर ऐसे मचाया है जैसे
किसी पूंजीपति ने सारी
पूँजी को इक दिन में गंवाया है
वक्त के साथ हर हवा बदलती है
चवन्नी का वक्त पूरा हुआ तो
इसमें कौन सी नयी रीत बनती है
कोई लेख तो कोई कविता लिख रहा है
जिस चवन्नी को ज़िन्दगी भर ना पूछा
आज उसके लिए दहाड़ें मार रहा है
अरे क्यों मायूस होता है प्यारे
ये तो जग की पुरानी रीत है
आये है सो जायेंगे राजा रंक फकीर
इसमें चवन्नी चली गयी तो
कौन सी बदल गयी तेरी तकदीर
नही मानते तो ऐसा करो
अब चवन्नी की आत्मा की शांति
के लिए हवन पूजन करवाओ
१३ दिन का कम से कम शोक मनाओ
आखिर तुम्हारी जान से प्यारी थी
चाहे आज काम नही आती थी
पर थी तो कभी बडे काम की
अब यही दोहराओगे………
इसलिये प्यारों ……चवन्नी के आशिकों
उसके गम मे कम से कम
एक मज़ार तो बनवाओ
देख चवन्नी को फ़क्र होगा
अपने आशिकों को दुआ देगी
और कभी कभी तुम्हें
स्वप्न मे दर्शन देगी

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

विशालता के पैमाने नही होते

दे्खा है ना
दग्ध सूरज
रोज आस्माँ
के सीने को
जलाता है
अपनी आग
अपना आक्रोश
सब उँडेल देता है
मगर आस्माँ
आज भी वहीं
स्थिर अविचल
समाधिस्थ सा
ध्यानमग्न ख़डा है
जानता है ना
दर्द जब हद से गुजर जाये
तो दवा बन जाता है
और देखो ना
आस्माँ ने उसकी ज्वाला को
अपने मे समाहित कर
उसे सुकून और स्वंय को
कितना विस्तृत किया है
या विशालता और महानता को
किसी कसौटी की जरूरत नही होती
तभी हर दर्द को समाने का हुनर आता है
शायद तभी  विशालता के पैमाने नही होते

मंगलवार, 28 जून 2011

इतनी जल्दी क्या थी

देखो आज
मुझे जरूरत थी
मगर तुम नहीं हो
ऐसा क्यूँ होता है
हमेशा .............
कभी तो सुन सको मेरे दिल की जुबान
कभी तो बांध सको रेत को मुट्ठी में
कभी तो लगा दो गांठ चुनरी में
कभी तो फाँस बिना चुभे भी निकाल दो
देखो आज तुम्हारी ...........
तुम्हारे बिन
कुम्हला गयी है
देखो कहीं ऐसा ना हो
जब तुम आओ
और देर हो जाये
तुम्हारी ........
ज़िन्दगी की धड़कन सो जाये
और तुम कहो
जानां  ...........इतनी जल्दी क्या थी जाने की
मैं आ तो रहा था ..............

शुक्रवार, 24 जून 2011

कहो ना ..........

उस दिन जब तुमने
उसे पसंद किया
और मैंने भी छुआ
तो एक तरंग सी
अहसासों से गुजर गयी
एक नमकीन सा अहसास
दिल में धड़क गया
स्पर्श का ऐसा अहसास
तो पहले कभी नहीं हुआ था
क्या तरंगें वस्तुओं से भी
पहुँचती हैं या हमारे दिल

इतने जुड़ चुके हैं कि
तरंगे वस्तुओं से गुजरकर
भी हम तक पहुँच जाती हैं
ये कैसे संकेत हैं
क्या प्रेम की तरंगें
इतनी गहरी होती हैं
या प्रेम तरंगें ऐसे ही बहती हैं
बिना माध्यम के
दिल की तारों पर
मचलते स्पंदनों में
ए क्या तुम्हारे साथ भी
ऐसा होता है
क्या तुमने भी कभी
मुझे यूँ ही महसूस किया है
बिना स्पर्श के
मगर अहसास और अनुभूति में
जीवंत किया हो
कहो ना ..........

मंगलवार, 21 जून 2011

हिचकी

सुना था
कोई याद करे
कोई बात करे
कोई बारिश में भीगे
कोई सपनो में देखे
कोई ख्यालो में संजोये
तो हिचकी आती है
मगर देखो ना
मैं तो इक पल को भी
कभी तुमको भूली ही नहीं
यादों से कभी तुमको
रुखसत ही नहीं किया

ख्यालों में …दिन में
सपनो में …रात में
भीगी भीगी बरसात में
फिर चाहे आसमानी हो
या रुहानी
तुम और तुम्हारी यादों को हमेशा भिगोये रखा

बताओ ज़रा ……
कभी एक सांस भी
ले पाये मेरी हिचकियों बिन
या ये मेरा कोरा भरम था
तुम्हें कभी हिचकी आयी ही नहीं

शुक्रवार, 17 जून 2011

जो मानस का मोती बन पाता

ढूंढती हूँ मानस का मोती
शायद कहीं मिल जाए
जो छूट गया है आँगन में
फिर से मुझे मिल जाये

इक नदी सी मुझमे बहती थी
अठखेलियाँ लेती थी
दिन रात की कशमकश में
कोई अधूरी सुबह  मिल जाये

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए

उर की धधकती ज्वाला में
ना स्नेह का कोई गीत जगा
बरसों तलाशा है जिसको ,वो
 कहीं ना मन का मीत मिला

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर  मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता
मुझे जीने का सबब दे पाता


मंगलवार, 14 जून 2011

और कविता लौट गयी कभी ना मुडने के लिये…………

सोच की आखिरी सीढी पर जाकर कविता फिर मुडती है
और कहती है
कहां से शुरु करूँ
तुम अब तुम न रहे
मै अब मै न रही
न तुम्हारे जज़्बात मे
वो आंधियां रहीं
ना तुम्हारी कलम मे
वो स्याही रही
जिसमे लफ़्ज़ रूह
बनकर उतरते थे
और दिल पर
सुबह की ओस से
गिरते थे
फिर कैसे तुम करोगे
मुझे व्यक्त
अव्यक्त हूं और
अब अव्यक्त ही
रह जाऊंगी
क्योंकि अब
दीवारों पर
कांच का प्लास्टर
चढा रखा है
सब दिखने लगा है
आर -पार
तुम्हारे भीतर का
भयावह सच
तुम अब मुझे
जीते नही हो
उपभोग की
सामग्री बना दिया
मेरा क्रय विक्रय किया
और मेरे वजूद का
हर कोण पर
बलात्कार किया
क्योंकि अर्थ यूं ही
नही मिला करता
ज़माने की नब्ज़
के आगे तुमने भी
सिर झुका दिया
फिर कैसे करोगे
तुम मुझे व्यक्त
अब तुममे वो
चाशनी बची ही नही
वो अमृत रहा ही नही
आखिर तुमने भी
बाज़ारवाद की भेंट
चढा दिया मुझे
लौटा रही हूं
तुम्हारा अक्स तुम्हे
अब नही मिलूंगी
किसी दिल के बाज़ार मे
करवट बदलते
अब नही मिलूंगी
किसी गरीब की झोंपडी मे
आग सेंकते
अब नही मिलूंगी
किसी छंद मे बंद होते हुये
अब सब मिलेगा तुम्हे
मगर नही मिलेगा तो बस
स्वान्त: सुखाय का अर्थ
जाओ जी लो अपनी ज़िन्दगी
और कविता लौट गयी
कभी ना मुडने के लिये…………

शनिवार, 11 जून 2011

मैंने कहा था ना

मैंने कहा था ना
जो नकाब डला है
डाले रहने दो
मत करो बेनकाब
एक बार यदि
बेनकाब हो जाये
फिर कितनी सदायें भेजो
कितने ही सितारे
आसमा में टांको
कितना भी अब
दुल्हन को सजाओ
कोई भी चूनर उढाओ
एक बार बेनकाब होने पर
अक्स सच बोल देता है
और फिर ये तो
एक रिश्ता था
तुम्हारा और मेरा
अन्जाना रिश्ता
कहा था ना
मिलने की ख्वाहिश को
ज़मींदोज़ कर दो
मगर तुम नहीं माने
और देखा
जब से मिले हो
सारे भ्रम टूट गए
और तुम जो मुझमे
अपना अक्स देखते थे
वो आईने भी टूट गया
जानती हूँ तभी
तुमने अब मेरी
मिटटी पर अपने
निशाँ छोड़ने बंद कर दिए
जानती हूँ तभी तुमने
अपने आसमाँ अलग बना लिए
काश ! तुमने पर्दा ना हटाया होता
तो चाँद घूंघट में ही रहा होता
यूँ बेबसी की आग में ना जल रहा होता
सच की आँच में झुलसा ना होता
और तेरा पैमाना ना छलका होता
जीने के लिए किवाड़ की ओट ही काफी होती है

बुधवार, 8 जून 2011

प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

आज भी याद है 
वो पहले मिलन की
पहली खुशबू
सांसों के साथ महकती सी 

वो तुम्हारी नागिन सी
बलखाती ,लहराती 
वेणी जब मेरे सीने से
टकराई थी 
इक आह सी निकल आई थी 
तुम बिलकुल मेरे
पीछे ही तो थीं
जब तुमने
लापरवाही से
अपनी करीने से बंधी
वेणी को पीछे झटका था
उस वेणी का पहला स्पर्श
आज भी मदमाता है
और जब मैंने पलटकर
तुम्हें देखा तो 
न जाने गुस्सा 
कहाँ काफूर हो गया 
और तुम्हारी 
चंचल मुस्कान
बेफिक्र अदा
बात- बात पर 
खिलखिलाना 
होशो -हवास 
गुम करने के लिए
काफी था 
और तुम 
अपनी दुनिया में मस्त थीं 
तुम्हें पता भी न था
कि किसे घायल कर दिया
किसी को अपनी ज़ुल्फ़ों का
कैदी बना लिया 


देखो आज भी 
तुम्हारी वेणी
मेरे ह्रदय आँगन में 
पहाड़ों की सर्पीली 
राहों सी बलखाती है 
मैं इन राहों में
खो जाता हूँ 
और तुम्हें ढूंढता हूँ 
प्रिये , ये कौन सा 
मुकाम आ गया 
ज़िन्दगी का 
वो अल्हड़ता , चंचलता 
उन्मुक्त हंसी 
आज ढूंढता हूँ
तुम में उसी कमसिनी को
फिर ढूंढता हूँ एक बार
तुम्हारे साथ 
उसी पल को
जीना चाहता हूँ
प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

पास होकर भी 
क्यूँ दूर हो तुम 
पता नहीं 
वक्त अजीब होता है
या रिश्ते 
मगर मैं तुम्हारे 
प्रेम की वेणी में आबद्ध 
वो प्रेम पुष्प हूँ 
जो आज भी 
तुममे तुम्हें ढूंढता है        

शुक्रवार, 3 जून 2011

एक सच और टूट गया

मुझे पता था
जाओगे एक दिन
तुम भी छोड़कर
टूटे हुए मकबरों पर
कौन चराग जलाता है
शायद तभी शाम अब
दिया बाती नहीं करती
जानती है ना कोई नहीं आएगा
बुझे चराग रौशन करने
क्या हुआ जो आज
एक सच और टूट गया
यूँ भी मरे हुए को ही
दुनिया भी मारती है
क्या हुआ जो तुमने भी
ज़ख्मो पर नमक छिड़क दिया
आखिर कब सिसकती
शामों को सुबह मिली है