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शनिवार, 9 जुलाई 2011

बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं .............

चलो अच्छा हुआ
अब दहलीज को
लांघकर निकल
जाते हैं लोग
वरना आस के पंख
कब तक इंतजार की
धडकनें गिनते
यूँ भी अब कहाँ
लोग बनाते हैं
दहलीज घरों में
ये तो कुछ
वक्त के निशाँ हैं
जिन्हें दहलीजें
समेटे बैठी हैं
वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं ...........
शायद तभी
रिश्तों की दहलीज
लाँघ गए तुम ............
बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं .............

35 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत बढिया रचना है बधाई स्वीकारें।

वर्ज्य नारी स्वर ने कहा…

Shayad dahleez langhme ke liye hi hote hai .achchha likhaachchha likha

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं .......

बहुत खूबसूरत बिम्ब दिया है ... अच्छी रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय वन्दना जी
नमस्कार !
अद्भुत अभिव्यक्ति बहुत बढिया इतनी खूबसूरत रचना की लिए धन्यवाद|

संजय भास्कर ने कहा…

 अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

Rakesh Kumar ने कहा…

गजब है आपका वंदना जी.
अजब प्रस्तुति कर देतीं हैं आप
क्यूंकि आप पर उसकी कृपा है.
और'आपे' की दहलीज के पार जा कर
ही आपकी यह सुन्दर अभिव्यक्ति है.

रविकर ने कहा…

बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ||
बधाई ||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना!
सोचने के लिए बाध्य करती हुई!

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर कविता... दहलीज़ का विम्ब अच्छा बना है...

smshindi By Sonu ने कहा…

महोदय/ महोदया जी,
अब आपके लिये एक मोका है आप भेजिए अपनी कोई भी रचना जो जन्मदिन या दोस्ती पर लिखी गई हो! रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है! आपकी रचना मुझे 20 जुलाई तक मिल जानी चाहिए! इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी! आप अपनी रचना हमें "यूनिकोड" फांट में ही भेंजें! आप एक से अधिक रचना भी भेजें सकते हो! रचना के साथ आप चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक(ब्लॉग लिंक), ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिख सकते है! प्रथम स्थान पर आने वाले रचनाकर को एक प्रमाण पत्र दिया जायेगा! रचना का चयन "स्मस हिन्दी ब्लॉग" द्वारा किया जायेगा! जो सभी को मान्य होगा! मेरे इस पते पर अपनी रचना भेजें sonuagra0009@gmail.com या आप मेरे ब्लॉग “स्मस हिन्दी” मे टिप्पणि के रूप में भी अपनी रचना भेज सकते हो.
हमारी यह पेशकश आपको पसंद आई?
नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
http://smshindi-smshindi.blogspot.com/2011/07/12.html
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है !

मनोज कुमार ने कहा…

चलो अच्छा हुआ
अब दहलीज को
लांघकर निकल
जाते हैं लोग
वरना आस के पंख
कब तक इंतजार की
धडकनें गिनते
आपने प्रतीकों में बहुत गहरी बात कही है। रिश्ते निभाते लोग कम मिलते हैं, लांघते ज़्यादा।

संध्या शर्मा ने कहा…

वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं .........

सुन्दर अभिव्यक्ति........

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ...बहुत खूबसूरत रचना...

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' ने कहा…

बड़ी ही भावप्रवण रचना...बधाई

mahendra verma ने कहा…

दहलीज को प्रतीक बनाकर ज़िंदगी से जुड़े एक अहम् सवाल को मुखरित किया है आपने।
बहुत अच्छी रचना।

Neeraj Dwivedi ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्त, दहलीज के नए नए सार्थक अर्थों के साथ.

Life is Just a Life

Kunwar Kusumesh ने कहा…

विचारणीय प्रस्तुति.

Rajesh Kumari ने कहा…

vicharniye prastuti sahi me rishton ki dahleej aajkal kam hoti ja rahi hain.

अरूण साथी ने कहा…

वंदना जी यही होना ही चाहिए। दहलीजों को लंधना ही होगा वह भी वैसे दहलीज को जो है ही नहीं......बहुत सशक्त रचना। आभार।

निवेदिता ने कहा…

वन्दना जी ,बहुत ख़ूबसूरत लगी कविता ......

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

न जाने कितनी सीमायें छिपी छिपी ही रह गयीं।

इमरान अंसारी ने कहा…

दहलीजें तो अब सिर्फ उम्र की हुआ करती हैं........वाह वंदना जी बहुत गहरी बात कही है आपने......शानदार|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 14-07- 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- दर्द जब कागज़ पर उतर आएगा -

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत खूब ।

वीना शर्मा ने कहा…

वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं ...........

..बेनाम दहलीजों को कब नाम मिले हैं ..........
बहुत सारगर्भित और मर्मस्पर्शी रचना..आप की रचना की Punch line का तो कोई ज़वाब नहीं होता..बहुत सुन्दर. आभार

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गहरी बात कह दी ... उम्र की डलहीज होती है ... रिश्तों की दहलीज की बात कौन करे ... बहुत लाजवाब प्रस्तुति ...

PRIYANKA RATHORE ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति ...बहुत खूबसूरत रचना...

दीपक जैन ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आप सभी का थोड़ा सा सहयोग चाहता हूँ कृपया मेरे लेखो पर थोरी द्रष्टि डाले और मुझे महत्वपूर्ण सुझाव दे

Deepak Saini ने कहा…

सुन्दर बिम्ब रचना
सुन्दर अभिव्यक्ति

mridula pradhan ने कहा…

अब दहलीज को
लांघकर निकल
जाते हैं लोग
sachchayee ko bade nazuk andaz men chitrit kar diya......bahut sunder.

कुश्वंश ने कहा…

वरना दहलीजें तो
अब सिर्फ उम्र की
हुआ करती हैं
रिश्तों की नहीं ...........
शायद तभी
रिश्तों की दहलीज
लाँघ गए तुम ............

बहुत खूबसूरत ,अच्छी रचना

Dr Varsha Singh ने कहा…

मर्मस्पर्शी रचना...आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार....

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति.......