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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

जब आत्मिक मिलन हो जाए.............

यूँ तो 
करती हूँ 
हर साल
करवाचौथ 
का व्रत 
तुम्हारी 
लम्बी उम्र 
की दुआएँ 
करने का 
रिवाज़ मैं भी
निभाती हूँ 
हर सुहागिन 
की तरह
मगर फिर भी
कहीं एक 
कमी लगती है
एक कसक सी
रह जाती है
कोई अदृश्य 
रेखा बीच में
दिखती है
किसी अनदेखी

अनजानी
कमी की
जो डोर को
पूर्णता से
बाँध नही
पाती है
इसलिए 
चाहती हूँ
अगले 
करवाचौथ 
तक मैं
तुम्हें तुमसे
चुरा लूं
और तुम्हारे
ह्रदय 
सिंहासन पर 
अपना आसन
जमा लूं
जब तुम 
खुद को 
ढूँढो तो
कहीं ना मिलो
सिर्फ मेरा ही
वजूद  तुम्हारे
अस्तित्व का
आईना बन
चुका हो
जहाँ तुम 
मुझे और
मैं तुम्हें
सामाजिकता 
के ढांचे से 
ऊपर उठकर
व्यावहारिकता
की रस्मों से
परे होकर
एक दूजे के
हृदयस्थल 
पर अपने 
अक्स चस्पां
कर दें
तन के 
सम्बन्ध तो
ज़िन्दगी भर
निभाए हमने
चलो एक बार
मन के स्तर पर
एक नया
सम्बन्ध बनाएँ
जिस दिन
"तुम" और "मैं"
दोनों की चाह
सिर्फ इक दूजे
की चाह में
सिमट जाए
प्रेमी और 
प्रेयसी के 
भावों में
हम डूब जाएँ
राधा - कृष्ण 
सा अमर प्रेम
हम पा जाएँ
जहाँ शारीरिक
मानसिक
स्तर से 
अलग रूहानी
सम्बन्ध बन जाए
जहाँ तन के नहीं
मन के फूल
मुस्कुराएं
कुछ ऐसे 
अगली बार
अपनी 
करवाचौथ 
को अपने 
अस्तित्वों
के साथ संपूर्ण
बना जायें
और व्रत 
मेरा पूर्ण हो जाये
जब आत्मिक 

मिलन 
हो जाए
तब
सुहाग अमर 
हो जाये

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

हाँ , चैट कर लेती है

२१ वीं सदी की नारी है
 हाँ , चैट कर लेती है
तो क्या हुआ ?
बहुत खरपतवार 
मिलती है 
उखाड़ना भी
जानती है
मगर फिर
लगता है
बिना खरपतवार
के भी आनंद 
नहीं आता 
इसलिए
साथ- साथ 
अच्छी फसल के 
उसे भी झेल लेती है
२१ वीं सदी की नारी है
हाँ , चैट कर लेती है

हर किसी से
हँसकर मिलती है 
तो सबको
अपनी लगती है
चाहे अन्दर से
गालियाँ देती है
मगर ऊपर से
स्वागत करती है
हर किसी को
इसका 
कोई ना कोई 
रूप भा जाता है 
कोई दोस्त 
तो कोई भाभी
तो कोई माँ 
बना जाता है
किसी को बहन की 
तलाश होती है
और सबसे ज्यादा 
बुरा हाल तो
 दिलफेंक 
प्रेमियों का
होता है
जो हर दूसरी
चैट पर 
मिलने वाली 
नारी में 
अपनी प्रेमिका 
खोजता है
कभी डियर
कभी डार्लिंग 
तो कभी 
लाइफ़लाइन
कहता है
मगर
कहते वक्त 
ज़रा नहीं सोचता 
जिसे तू
कह रहा है
वो तेरे बारे में
क्या सोचती है
तू भरम में जीता है
और वो खुश होती है
आज उसे 
ये लगता है
बरसों गुलामी 
की जिनकी
देखो आज कैसे 
दुम हिलाता है
पालतू जानवर- सा 
कैसे पीछे- पीछे 
आता है
सोच- सोचकर 
खुश होती है
और उसके 
अरमानों से खेलती है
हर बदला 
वो लेती है
जो वो सदियों से 
देता आया है
उसका दिया 
उसी को 
सूद समेत 
लौटा देती है
शायद 
इसीलिए इस 
खरपतवार को 
उखाड़ नहीं पाती है
कुछ इस तरह
आत्म संतुष्टि पाती है
ये २१ वीं सदी की नारी है
हाँ , चैट कर लेती है
मगर अब
बेवक़ूफ़ नहीं बनती है

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

कोई नया विरह ग्रन्थ बन जायेगा ...............

एक अरसा हुआ
हमें बिछड़े 
ना जाने 
कौन से 
वो पल थे
कौन सा 
वो लम्हा था
जब हम 
जुदा हुए 
कुछ 
तुम्हारी
 बेलगाम 
चाहतें थीं 
कुछ मेरी 
मजबूरियां थीं
शायद तभी 
रिश्ते में 
दूरियां थीं
जरूरत से
ज्यादा 
दूजे को 
चाहना
भी 
कभी कभी
दुश्वारियां 
बढ़ा देता है
इच्छाओं को
पंख लगा 
देता है
और वो 
गुनाह हो 
जाता है
जो 
खुद भी
ना सह 
पाता है
अब सोचती हूँ
मुद्दत से
तुमसे बात 
नहीं की
तुम्हारे 
लिए कभी
कोई दर्द
नहीं उठा
तुम्हें देखे
तो ज़माने 
गुजर गए
शायद वक्त
की दीमक
सब चाट गयी 
फिर भी
अगर कभी
किसी मोड़ पर
तुम मुझे
मिल गए तो?
क्या वो 
अहसास फिर
जाग पाएंगे?
क्या तुम 
मुझसे 
नज़र 
मिला पाओगे?
क्या लम्हों
को कुछ 
पल के लिए
रोक पाओगे?
क्या अपनी 
कभी कुछ
कह पाओगे?
या फिर 
एक बार 
अपने गुनाह
के नीचे 
दबे प्यार को
उसका मुकाम
दे पाओगे ?
या मैं
तुम्हें
कभी माफ़
कर पाउंगी ?
नहीं जानती 
मगर इतना 
जानती हूँ
शायद 
वो पल जरूर
वहाँ ठहर 
जायेगा 
खामोशियों 
को भी 
मुखर 
कर जायेगा  
और कोई
नया 
विरह ग्रन्थ
बन जायेगा 



आज की ये रचना राजीव सिंह जी की फरमाइश पर लिखी है उनका कहना था पिछली पोस्ट पर कि यदि कभी मिल गए तो क्या होगा उस पर भी लिखिए.

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

अब कोई मोड़ तेरी राह तक नहीं मुड़ता..................

अब मंजिलों ने 
रास्ते बदल
लिए हैं 
तुम्हारे 
मोड़ पर
कभी मिलेंगे
ही नहीं 
जो राह में 
बिखरे पड़े थे 
निशाँ सफ़र के
वो भी अब 
दिखेंगे नहीं
मोहब्बत के
ज़ख्मो को
सुखाना 
सीख लिया
अब रोज 
आँच पर 
धीमे धीमे
पकाती हूँ 
 ताकि 
किसी भी 
मोड़ पर
कोई बादल
ना भिगो 
दे इन्हें  
एक यही तो 
आखिरी 
निशाँ बचे 
है मोहब्बत 
की रुसवाई के 
और तेरी 
बेवफाई के 
अब कोई 
मोड़ तेरी
राह तक
नहीं मुड़ता

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

भूल गया था................

दोस्तों,
आप सबके द्वारा कहानी और कवितायेँ पसंद करने के लिए बहुत आभारी हूँ ...............आज उसी भाव की एक दूसरी कविता लगा रही हूँ ..........उम्मीद है ये भी आपकी कसौटी पर खरी उतरेगी ...................



लो 

आज मैंने 
स्वयं ही
खंडित 
कर दिया
तुम्हारी 
प्रतिमा को
जिसे अपने 
मन की 
मूरत बनाया 
था कभी
यही सज़ा 
है मेरी
मेरे
गुनाह की 

तुम तो 
बा -वफ़ा थीं 
मैं ही
वफ़ा ना 
कर सका
तुम्हारे 
स्वरुप की
निश्छलता 
पवित्रता 
का 
तिरस्कार
किया 
जो जोत 
जली थी 
तन से
ऊपर उठकर 
भावनाओं  की
बिना किसी 
वादे के
बिना किसी 

चाहत के
बिना किसी
रस्मो रिवाज़ के
उसी
प्रज्वलित
दीप का
आलोक
ना बन पाया

अपने हाथों
जला दिया
जीर्ण शीर्ण 
कर दिया
प्रेमालय को
प्रतिमा पर 
ही इक 
गहरा दाग
कभी ना 
मिटने वाला
लगा दिया


ज़िन्दगी 
एक मौका 
देती है 
सभी को 
मोहब्बत का
और मैं 
उस मौके को
शायद 
हमेशा के लिए
गँवा चुका हूँ 


अब खंडित
प्रतिमा के 
टूटे टुकड़े
जब- जब 
चुभेंगे
शायद 
तभी मेरा
कुछ तो 
गुनाह 
कम होगा
या फिर 
वो ही 
मेरा 
प्रायश्चित 
होगा


भूल 
गया था
प्रतिमाएं 
सिर्फ 
पूजित 
होती हैं 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

युगों का प्रमाण क्या दोगे ?

दोस्तों,

आप सबके द्वारा कहानी को  इतना पसंद करने के लिए आप सबकी तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ .



कई दोस्तों ने कहा कि कहानी आगे बढाइये या कहानी में लम्बी कहानी का कथानक है मगर कभी- कभी कुछ अंत हमारे हाथ में नहीं होते नियति के होते हैं और ऐसे अंत भी होते हैं जहाँ लगता है कि अभी तो शुरू ही हुआ था और ये क्या हो गया मगर हमारे हाथ में कुछ नहीं होता .................कुछ ऐसे ही हालत को दर्शाने की कोशिश की है इस कहानी में ................ फ़िलहाल तो माफ़ी चाहती हूँ कि कहानी तो आगे नहीं बढ़ा रही मगर इस कहानी को लिखने के बाद कुछ ख्याल दिल में उपजे जिन्हें मैंने कविता में ढालने का प्रयास किया है .........अगली २-३ कवितायेँ इसी कहानी से प्रेरित अहसासों की बानगी हैं ..........आज पहली कविता लगा रही हूँ ............उम्मीद है उन भावों को आप समझेंगे और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँगे.



लो 

आज मैंने 
ठुकरा दिया
तुम्हें भी 
तुम्हारे प्यार 
को भी
जिसे तुम
पवित्र 
नूर की बूँद
कहा करते थे 
तुम्हारा प्यार 
प्यार था कब ?
शायद 
एक धोखा था
नज़रों का 
तुम प्यार को
आत्मिक बँधन
कहा करते थे
मगर 
उस पल
क्या हुआ
जब तुम्हारा 
प्यार
आत्मिकता 
से हटकर
वासनात्मक
हो गया
शरीर  के
प्रलोभनों में 
फँस गया
प्यार भी
मर्यादित 
होता है
ये शायद
तुम नहीं जानते 
एक जन्म के
कुछ पल 
तो निभा 
ना पाए
युगों का
प्रमाण क्या दोगे ?

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

कभी तो माफ़ करेगी वो !

वो --------वो ही थी. ना जाने कैसे  टकरा गयी थी ज़िदगी की राहों में चलते चलते. मैं तो जी ही रहा था अपने भीगे, उफनते ख्यालातों के साथ और वो ओस की बूँद सी शीतल, झरने सी झर- झर छनकती हुई जीवन में उतर आई . यूँ उसको अपने ख्यालों में जी रहा था . एक अक्स था जो आकार ले रहा था . मैं उसे जानना चाहता था . उस अक्स को साकार करना चाहता था मगर उम्मीद ना थी कि कभी वो बुत जीवंत हो उठेगा जो ख्वाबों की धरोहर था .......एक दिन वो ही अक्स साक्षात दिवास्वप्न सा विस्मित कर गया. 


वो बादल छंटने लगे थे जो अक्स को धुंधला रहे थे. एक मनोरम छटा ज़िन्दगी को हुलसाने लगी थी .अब  मेरे रोम- रोम में गीत प्रस्फुटित  होने लगे थे. हर गीत का आधार वो ही तो थी . गीत की हर सांस में उसका ही तो स्पंदन था .उसके सान्निध्य में गीत मुखर होने लगे थे. वो जो पीछे कहीं छूट गयी थी उस चंचलता का समावेश होने लगा था . हर राग , हर रस गीत में उतरने लगा था .वो जो चाँदनी सी छा गयी थी , सुरों सी उसकी झंकार जब भी मन के तारों को झंकृत करती , नव सृजन हो जाता था. वो मेरे वजूद का हिस्सा नहीं थी बल्कि मेरा वजूद जैसे उसी में एकाकार हो गया था.

उम्र के उस दौर में जब इच्छाएं शेष नहीं रहतीं , उसका आना जैसे बूढ़े बरगद पर हरियाली का  छा जाना था.जब भी उसे देखता तो कभी लगा ही नहीं कि मेरी उम्र अब उस दौर से आगे निकल चुकी है ............अपने को एक बार फिर भ्रमर सा गुंजारित ,उल्लसित महसूस करता ...............उस दौर में नवयुवक सा मेरा ह्रदय सीमाएं लांघने को आतुर रहने लगा. सारे जहाँ को चीख- चीख कर बताना चाहता था --------हाँ , मुझे मेरा अक्स मिल गया . मगर वो , वो तो सिर्फ अपने अंतस में ही कैद रहती थी. कभी किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती थी. ना ही मुझे बढ़ावा देती थी क्योंकि उम्र के उसी दौर से तो वो भी गुजर रही थी ...........वो तो सिर्फ एक सुखद अहसास के साथ खुश रहती थी और उसके आगे और कोई चाह नहीं रखती थी ...........कभी सीमाएं नहीं लांघती थी मगर मैं अपने प्रवाह में बहा जा रहा था. सागर सा उछाल मारता आकाश को छूने की चाह में और हर बार अपने ही आगोश में डूब  जाता.


फिर भी कहीं तो कुछ था जो मुझे मुझसे छीन ले गया था और एक दिन मैं ही अपनी सीमा अपनी मर्यादा का अतिक्रमण कर गया और उसे सिर्फ मजाक में एक अपशब्द कह गया ..........चाहे मेरा मजाक था ये सिर्फ मैं जानता हूँ मगर उसके लिए तो वो विश्वासघात था , मर्यादा का हनन था और वो मुझे हमेशा -हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी .कुछ मज़ाक ज़िन्दगी को मज़ाक बना जाते हैं उम्र भर के लिए .


आज सदायें भेजता हूँ मगर गुनाह की कोई माफ़ी नहीं होती, जानता हूँ इसलिए ना अब जी पाता हूँ और ना मर पाता हूँ. कहीं देखा है किसी ने अपने ही हाथों अपनी कब्र खोदते किसी को और फिर खुद ही उस कब्र में दफ़न होते.दोज़ख की आग में जल रहा हूँ . अपने वजूद को ढूँढ रहा हूँ . मेरे गीत मुझसे रूठ चुके हैं क्योंकि गीतों के प्राणों को तो मैंने खुद ही अपने हाथों फाँसी पर लटकाया था .

बस ज़िन्दा हूँ तो सिर्फ इसी आस पर------------कभी तो माफ़ करेगी वो !



शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

मेरे अपने कौन ?

मेरे अपने
कौन ?


पति 
बेटा 
या बेटियाँ 
कौन हैं 
मेरे अपने ?


ता-उम्र 
हर रिश्ते में
अपना 
अस्तित्व 
बाँटती रही 
ज़िन्दगी भर
छली जाती रही 
मगर उसमे ही
अपना सुख 
मानती रही 


पत्नी का फ़र्ज़ 
निभाती रही
मगर कभी
पति की
प्रिया ना 
बन सकी 
मगर उसके
जाने के बाद 
भी कभी
होंसला ना 
हारती रही


माँ के फ़र्ज़
से कभी 
मूँह ना मोड़ा
रात -दिन 
एक किया
जिस बेटे 

के लिए 
ज़माने से 
लड़ गयी 
वो भी 
एक दिन 
ठुकरा गया
उस पर 
सठियाने का 
इल्ज़ाम 
लगा गया 
उसकी 
गृहस्थी की
बाधक बनी 
तो भरे जहाँ में
अकेला छोड़ 
दूर चला गया 

पति ना रहे 
बेटा ना रहे
तो कम से कम
एक माँ का 
आखिरी सहारा 
उसकी बेटियां
तो हैं 
इसी आस में
जीने लगती है
ज़हर के घूँट 
पीने लगती है


मगर एक दिन 
बेटियाँ भी
दुत्कारने 
लगती हैं
ज़मीन- जायदाद 
के लालच में 
माँ को ही 
कांटा समझने
लगती हैं

रिश्तों की 
सींवन 
उधड़ने लगी
आत्म सम्मान 
की बलि
चढ़ने लगी
अपमान के 
घूँट पीने लगी
जिन्हें अपना 
समझती थी
वो ही गैर
लगने लगी
जिनके लिए
ज़िन्दगी लुटा दी
आज उन्ही को 
बोझ लगने लगी
उसकी मौत की 
दुआएँ होने लगी 
और वो इक पल में
हजारों मौत 
मरने लगी 


कलेजा फट 
ना गया होगा 
उसका जिसे
भरे बाज़ार 
लूटा हो 
अपना कहलाने 
वाले रिश्तों ने


वक्त और किस्मत 
की मारी 
अब कहाँ जाये
वो बूढी 
दुखियारी 
लाचार 
बेबस माँ
जिसका 
कलेजा बींधा 
गया हो 
दो मीठे 
बोलों को 
जो तरस 
गयी हो
व्यंग्य बाणों 
से छलनी 
की गयी हो 


हर सहारा 
जिसका 
जब टूट जाये
दर -दर की 
भिखारिन 
वो बन जाए
फिर
कहाँ और 
कैसे 
किसमे 
किसी 
अपने को 
ढूंढें ?

बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

"वर्जित फल"

नज़रों का स्पर्श भी
ना गंवारा हो जिसे
छूने या देखने 
की कोशिश
तो दूर की  बात है
हवा के स्पर्श की भी
जिसे चाहत ना हो
रौशनी का स्पर्श भी

जलाता  हो जिसे
रूह के मिलन को भी
जो अगले जन्म का मोहताज़ बना दे
इस जन्म की हर रस्म निभा दे
मगर अपने साये को भी जो
किसी साए का स्पर्श होने ना दे
एक अपना अलग
मुकाम जो बना ले
चाहने वालों को
मिलकर भी ना मिले
हर चाहत पर जो पहरे बिठा दे
किसी ने कहा है
मुझे
तुम ऐसा
"वर्जित फल" हो

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

माना..................

माना चाहत की डोर
बाँधी है तूने मुझसे 
मगर मैंने नहीं
माना तेरी चाहत
पूजती है मुझे
माना मेरे जिक्र से 
बढ़ जाती हैं धडकनें 
माना पवित्र है 
तेरी चाहत 
माना नहीं है वासना
का लेश इसमें 
माना मेरे ख्याल ही
तेरी धरोहर हैं
माना मेरे लिए ही
तू जिंदा है 
माना मैं ही 
तेरी ज़िन्दगी हूँ
माना तेरी हर साँस
मेरे नाम से चलती है
मगर फिर भी 
नहीं लगता अच्छा 
कोई मेरे वजूद को
अपने अहसासों 
में भी छुए
 

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

रूठ गया प्यार मेरा ..........

रूठ गया
प्यार मेरा 
उसे अपना
कहने का 

गुनाह जो 
कर बैठा 

अब कैसे 
मनाऊँ 
कौन सा 
दीप जलाऊँ 
कैसे उसे
समझाऊँ

सितारों कोई तो 
राह दिखलाओ
तुमने तो कितने
चाहने वालों को
मनाते देखा होगा

मैं तो आसमाँ से
तारे तोड़कर
ला नहीं सकता
दूध की नदियाँ
बहा नहीं सकता
याद में उसकी
ताजमहल 
बनवा नहीं सकता
फिर कैसे 
मनाऊँ
कौन सा 
दीप जलाऊँ

माना तुम 
मेरी नहीं हो
मगर प्यार पर
बस भी तो 
नहीं मेरा
ये इस 
दिल को
कैसे समझाऊँ

अब अपने रूठे
प्यार को 
कैसे मनाऊँ
कौन सा सुमन
भेंट करूँ जो
उसके ह्रदय की 
थाह मैं पाऊँ
कौन सी ऋतु 
का आह्वान करूँ 
कौन सा मैं
राग सुनाऊँ

सितारों तुम ही
कोई राह
रोशन कर दो
उसके ह्रदय की
आकाशगंगा में 
मेरे प्यार का
सितारा बुलंद 
कर दो
उसे अपना चाहे
कह ना सकूँ 
मगर मैं उसका
बन जाऊँ
आज कोई ऐसा
जतन कर दो

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

दो रोटियों के बीच

आज रोटी बनाते -बनाते
तुम्हारे  ख्याल ने
आकर पुकारा
और हाथ बेलन
पर ही रुक गया
और ख्याल मुझसे
आकर उलझ गया
मुझे अपने साथ
उडा ले चला
जहाँ तुम्हारा साथ था
हाथ में हाथ था
सपनो का महल था
बगीचे में झूला पड़ा था
मैं झूल रही थी
तुम झुला रहे थे
हवा के संग
मीठी - मीठी
सरगोशियाँ किये
जा रहे थे
आँखें मेरी बंद थी
और दिल में एक
उमंग थी
प्रेम का चटक रंग
होशो- हवास भुला
रहा था
कहीं कोई भंवरा
किसी कली पर
मंडरा रहा था
जिसे देख दिल
धड़क - धड़क
जा रहा था
ये कैसा
मदहोश करता
पल था
प्रेम के आँगन में
मन मयूर
नृत्य किये

जा रहा था
और तेरी
रूह के आगोश में
सिमटे जा रहा था
तभी ना जाने
कैसे एक झोंका
हवा का आया
और तवे पर जलती
रोटी ने हकीकत का
आभास कराया
अब कभी चकले पर
अधबिली रोटी को
देख रही थी मैं
तो कभी
तवे पर जली रोटी
मुझे देख
हँस रही थी
"पागलों की सरदार" की
उपाधि दे रही थी
हाय ! दो रोटियों के बीच
आये उस ख्वाब को
अब मैं कोस रही थी
और हालत पर अपनी
मैं खीज रही थी

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

आज नहीं बनाये जाते मोहब्बत के मकबरे.............

इश्क हुआ होगा कभी 
राँझा को हीर से 
मजनू को लैला से
फरहाद को शीरीं से 
जिन्होंने इश्क को 
इबादत बनाया 
खुदा से भी पहले 
जुबान पर
महबूब का नाम आया
खुदा और इश्क में जहाँ
ना फर्क नज़र आया 
क्या कर सकेगा इबादत
तू भी महबूब की
बना सकेगा खुदा
अपनी मोहब्बत का
हो सकेगा कुर्बान
मोहब्बत की खातिर
दे सकेगा मोहब्बत के 
खुदाई जुनून का इम्तिहान
रे पगले ! ये किस्से 
कहानियों की बात और है
इश्क के इम्तिहान की
बात और है
आज नहीं बनाये जाते 
मोहब्बत के मकबरे.............

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

कुछ तो निशाँ पड़े होंगे .......................

तुम्हारे घर की 
चौखट पर 
आस का दीप 
जलाये पड़ा 
मेरा मन
और रसोई में 
खनकती 
चूड़ियों की खनक 
घर के आँगन में
छम- छम करती 
पायल की छनक
और बैठक में
गूंजती खिलखिलाहट 
कभी चीखती
चिल्लाती , हँसती 
मुस्कुराती
कभी ख़ामोशी 
की आवाज़
और बिस्तर के
एक छोर पर
प्यार , मनुहार
और दूसरे छोर पर
सिसकते , तड़पते 
पलों का हिसाब
ये तो कण -कण में
बिखरे अहसास 
और इन सबसे अलग
तुम्हारे तसव्वुर में
तुम्हारे ख्यालों में
तुम्हारे मन में 
बसी वो 
जीती -जागती 
प्रतिमा
जिसकी रौशनी 
से रोशन
तुम्हारे दिल का
हर कोना
कैसे इतने सारे
भीगे  मौसमों 
में से अपना
मौसम ढूँढ 
पाओगे
कैसे समेटोगे
उन यादों को
जो तुम्हारे
वजूद का 
जीता -जागता 
हिस्सा  हैं 
कैसे मेरी 
यादों के 
बिखरे सामान
को समेट 
पाओगे
देखो तुम्हारा 
घर मैंने कैसे
अपनी यादों से 
भर दिया है 
हर कोने में
मेरा ही अक्स
चस्पां है
तन के बँधन
भले ही टूट जायें
मन के बन्धनों 
से कैसे खुद को
आज़ाद कर पाओगे
आखिर इक 
उम्र गुजारी है
हमने साथ साथ
कुछ तो निशाँ पड़े होंगे .......................

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

"शब्द " और " काव्य "

काव्य शब्द है 
या शब्द काव्य
या फिर भावों का
समन्वय 

शब्द को 
सौंदर्य प्रदान 
कर काव्य 
बनता है
या फिर 
काव्य शब्द में 
सिमटा एक 
निर्विकार 
निर्लेप
अनंत 
आकाश है
जहाँ 
शब्द ही शब्द है
निराकार में 
आकार है
या फिर
आकारबद्ध हो 
शब्द 
काव्य सौष्ठव 
बन अपने अनेक 
अर्थ प्रस्तुत 
करता है

एक में छिपे अनेक
भावों का समन्वय है
शब्द
या काव्य की उच्च
अवस्था को 
प्राप्त करता 
गरिमाबोध 
करता है शब्द
या शब्द सिर्फ 
सामाजिक सरोकारों 
का प्रतीक है
या नितांत 
व्यक्तिगत
अभिव्यक्ति का
माध्यम 
या शब्द काव्य की
गुणवत्ता का 
श्रेष्ठ परिचायक है

काव्य को 
खुद में समेटता
शब्द 
भावो के 
प्रस्तुतीकरण का
माध्यम मात्र है
या फिर 
प्रणव - सा 
निनाद करता
दिशाओं को
गुंजार करता 
शब्द 
स्वयं में 
समाहित करता
काव्यात्मकता का
लयबद्ध संगीत है 



शनिवार, 25 सितंबर 2010

तुम मुझे जानते हो ?

मुझे पढने के
बाद भी
मैं समझ 
आने वाली नही 
इसलिए कभी
मत सोचना
कि तुम मुझे जानते हो ?

कुछ दायरे 
सोच से भी 
उपर होते हैं
बहुत दूर हूँ 
तुम्हारी सोच से
तुम्हारी सोच 
सिर्फ मेरे 
अस्तित्व तक ही 
पहुंचेगी 
मगर मेरी
सोच तक नहीं
मेरे ख्यालों तक नहीं
मेरे सीने में उठते 
ज्वार भाटों तक नहीं
उन कसमसाते 
सवालों तक नहीं
उन ख्वाब में बुनी
चादरों तक नहीं
उन दिल  के खामोश
सूने तहखानो तक 
कभी नहीं पहुँच पायेगी 
तुम्हारी सोच
फिर कैसे कह सकते हो 
तुम मुझे जानते हो ?

कुछ शख्सियत
कुछ किताबें
उसके कुछ अक्षर
गूढार्थ समेटे होते हैं
कहीं गूढार्थ
तो कहीं भावार्थ
हर अहसास
हर भाव
हर ख्वाब
का  अर्थ 
ना ढूँढ पाओगे
बाज़ार में
भावों की 
कोई डिक्शनरी
नही मिलती 
फिर कैसे कह सकते हो
तुम मुझे जानते हो ?

हर अनकहे 
शब्द का अर्थ
हर जज़्बात का
भीगा  टुकड़ा
हर याद की 
अनकही चाहत
हर मौसम की
सर्द हवाओं और 
लू के गर्म 
थपेड़ों में 
चकनाचूर हुए कुछ
बोझिल ख्यालात
कैसे इन सबसे 
पार पाओगे
कहाँ तक इनके
अर्थ ढूँढ पाओगे
शायद सागर से तो
मोती ढूँढ भी लाओ
मगर मुझमे छुपी "मैं"
कहाँ ढूँढ पाओगे
कुछ ना जान पाओगे
सिर्फ उपरी आडम्बर है
यहाँ कोई किसी को
पहचान नहीं पाता
एक ज़िन्दगी साथ 
गुजारने के बाद भी
फिर जानना तो 
मुमकिन ही नहीं
इसलिए 
अब फिर कभी ना कहना
तुम मुझे जानते हो ?

बुधवार, 22 सितंबर 2010

कोपभाजन से कोखभाजन तक .................

तुम्हारे 
कोपभाजन से कोखभाजन तक 
सिसकती मर्यादाआहत हो जाती है 
जब बर्बरता की चरम सीमा को लाँघ जाते हैं
अपने ही लहू के दुश्मन
अपना ही लहू बहाते  हैं 
फिर भी मुख पर न मलाल लाते हैं 
तब सड़ांध भरे घुटते कमरों में
सिसकती ममता आहत हो जाती है 

मुखौटे पर लगे मुखौटे 
भयावहता का दर्शन करा जाते हैं 
वो मर्यादा की हर सीमा को लाँघ कर भी इंसान कहाते हैं

शनिवार, 18 सितंबर 2010

पुरुष तुम अब भी कहाँ बदले हो?

पुरुष
तुम अब भी
कहाँ बदले हो?
अपने व्यंग्य बाणों
से कलेजा
बींध देते हो
उम्र के किसी 
भी दौर में
तुम में ना 
परिवर्तन आया 
तुम्हारी कुंठित सोच
अवचेतन में बैठे
पौरुष के दंभ से
कभी ना बाहर 
आ पायी  है 
हर बार ज़हर 
बुझे नश्तर ही
चुभाते आये हो
अपने प्रगति पथ पर
नारी के त्याग ,
समर्पण ,सहयोग 
को हमेशा
नकारते आये हो 
उसके वजूद को
खिलौना समझ
खेलना ही तुमको
आता है
कहाँ नारी ह्रदय को
जीतना तुमको आता है
कल भी नारी को
दुत्कारा था
उसे त्याग, तपस्या 
की मूरत बना
बलि वेदी पर
चढ़ाया था
आज भी नारी को 
शोषित करते हो
कभी उसका 
सौंदर्य भुनाते हो
कभी मानसिक
शोषण करते हो
प्रगति के नाम पर
हर बार 
भावनाओं का 
बलात्कार करते हो
कल भी तुम 
नहीं बदलोगे
अपनी कुंठित 
सोच से ना 
उबरोगे
चाहे अन्तरिक्ष
भ्रमण कर आओ
चाहे प्रगति के
कितने सोपान 
तुम चढ़ जाओ
पर अपनी पुरुषवादी
प्रवृत्ति से ना
मुक्त हो पाओगे
जब तक 
अपने अंतस में
बैठे झूठे दंभ से
बाहर ना आओगे

बुधवार, 15 सितंबर 2010

दुनिया की अदालत में खड़े भगवान ?

कल कन्हैया 
सपने में आया 
उदास , हताश
बड़ा व्यथित था 
दुनिया के
आरोपों से
प्रश्न उठाया 
क्यूँ दुनिया 
जीने नहीं देती है 
किसी भी युग में 
हर युग में 
आरोप लगाया 
और जनता की 
अदालत में 
मुझे ही दोषी 
ठहराया

जब राम 
बनकर आया 
मर्यादा में रहा 
मगर वो भी ना
किसी को भाया 
नारी का 
सम्मान किया 
उसे यथोचित 
स्थान दिया 
एक पत्नी व्रत लिया
ता- उम्र उस 
व्रत को निभाया
मगर फिर भी
खुद को ही
कटघरे में 
खड़ा पाया
क्यूँ सीता को
बनवास दिया?
क्यूँ उस पर 
अविश्वास किया?
क्यूँ उसकी 
अग्निपरीक्षा ली?
ताने मारा 
करती है 
दुनिया
मगर इतना ना 
समझ पाती है
मर्यादा में रहकर
राजा का कर्त्तव्य 
भी निभाना था
प्रीत को एक बार
फिर सूली पर 
चढ़ाना था 
मेरा तो विशवास
अटल था
मगर दुनिया के
आरोपों से 
सीता को मुक्त 
करना था
और दुनिया में 
रहकर 
दुनिया का धर्म 
भी निभाना था
इसीलिए 
उस दर्द  से
मुझे भी तो 
गुजरना था 
वो बनवास 
महलों में रहकर
मुझे भी तो
भोगना था 


जब कृष्ण बन 
कर आया
तब भी 
खुद को
दुनिया की 
अदालत
में दोषी ही पाया
क्यूँ राधा के प्रेम
को ना स्वीकारा ?
उसे पत्नी का दर्जा
क्यूँ ना दिया?
क्यूँ उससे 
विश्वासघात किया?
क्यूँ उसके प्रेम 
को ना स्वीकार किया?
मगर मेरा दर्द
ना किसी ने जाना
संसार का दिया
वाक्य मुझे भी
निभाना था 
"कर्त्तव्य हर 
भावना से 
बड़ा होता है "
इसी को ज़िन्दगी 
भर निभाता रहा
प्रीत का दीया 
अश्रुओं से 
जलाता रहा
मगर कभी भी 
कोई भी भाव 
ना मुख पर 
लाता रहा 
निर्मोही, निर्लिप्त 
भाव से हर 
कार्य निभाता रहा
गर राधा को 
पत्नी बना
लिया होता तो
ये ज़माना उसे भी
धरती में समा 
जाने को विवश 
कर देता 
या फिर कोई 
एक नया 
इलज़ाम उस पर
भी लगा देता
और फिर एक बार
दो प्रेमी
विरह अगन में
जल रहे होते
मिल कर भी
ना मिले होते


तब भी तो दुनिया 
ने ही विवश किया था
वो निर्णय लेने के लिए
एक आदर्श राजा के 
फ़र्ज़ की खातिर
पति हार गया था
और ये दुनिया 
जीत गयी थी
इसीलिए प्रण 
किया था मैंने
अगले जन्म 
अपने प्रेम को 
दुनिया के हाथ 
की कठपुतली 
ना बनने दूँगा
वचन लिया था
सीता ने मुझसे   
ना यूँ अगले जन्म
रुसवा करना
चाहे पत्नी का
दर्जा ना देना
मगर हमारे 
प्रेम को
अमर कर देना
जो इस जन्म
अधूरा छूट गया
उसे अगले जन्म
पूरा कर देना
नहीं चाहिए 
संग ऐसा जो
दुनिया दीवार बने
वो ही वादा 
मैंने निभाया
मगर वो भी 
दुनिया को 
ना रास आया
ना पत्नी को 
किसी ने जाना
ना ही प्रेम को
पहचाना


राधा संग 
अपने प्रेम को
दिव्यता की
ऊँचाइयों तक
पहुँचाया 
खुद से पहले
राधा को पुजवाया 
संसार को 
प्रेम करना सिखाया
मैंने और राधा ने
तो प्रेम की पूर्णता
पा ली थी
दूर होकर भी
कभी दूर ना हुए थे
ह्रदय तो हमारे
इक दूजे में ही
समाये थे
दिखने में ही
दो स्वरुप थे
असल में तो
एकत्त्व में 
विलीन थे 


फिर कहो कैसे
राधा को 
धोखा दिया मैंने
उसी को दिया
वचन अगले 
जन्म में 
निभाया मैंने
मगर तब भी
दुनिया की कसौटी 
पर खरा ना 
उतर पाया मैं
अब बताओ
कैसे खुद को
निर्दोष साबित करूँ
अपनी ही बनाई
दुनिया के 
इल्जामों से
कहो कैसे
खुद को 
मुक्त करूँ 
दुनिया ना 
खुद जीती है
चैन से  
ना मुझे
जीने देती है
आखिर क्या 
चाहती है 
दुनिया मुझसे ?




राधा अष्टमी पर राधा जी को समर्पित श्रद्धा सुमन .



सोमवार, 13 सितंबर 2010

पीड़ा का मर्म

कभी
मर्यादा का हनन 
किया होता
दोस्त बन कर 
दिल का दर्द 
पी लिया होता
तो कुछ लम्हों
के लिए ही सही 
मुझे मुझसे
छीन लिया होता
रूह पर गिरते 
अश्कों पर 
लब अपने 
रख दिए होते
अश्को का
ज़हर सारा 
पी लिया होता
तो मेरी रूह को
कुछ देर ही सही
तू जी लिया होता
रूह में जलते
सुर्ख अंगारों की 
तपिश पर 
हाथ रखा होता
दिल के हर 
अंगार पर अपना
नाम लिखा होता
कुछ अश्रु बूँद
टपकायीं होती
तो दिल जलने 
की आवाज़ 
तुझ तक भी
आई होती
मेरे दर्द की
कोई सीमा नहीं
अंतहीन दर्द के 
सफ़र में 
हमसफ़र 
बना होता
इस सीमा का
अतिक्रमण
किया होता
इस रेखा को लाँघ
अन्दर आया होता
तो मेरी पीड़ा का
मर्म जान पाया होता


शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

"सूरज है वो "

सूरज है वो 
सबसे ज्यादा 
चमकना चाहा
सबके जीवन 
प्राण बनना चाहा
सबसे ऊपर 
उठना चाहा
जो चाहा 
सब मिला
दूसरों  को 
ज़िन्दगी देना
आसान कब होता है 
किसी को 
जीवन देने के लिए 
खुद की आहुति
दी जाती है
हर अभिलाषा को
होम किया जाता है
ताउम्र इक आग में
जलना होता है
तब किसी जीवन में
रौशनी की जाती है
शायद नहीं 
जानता था
इसीलिए
जीवन भर 
जलते रहने का
अभिशाप लिया 
सोचा तो 
इसे वरदान था
मगर बन 
अभिशाप  गया
शायद अब 
जाना होगा
सूरज 
होने का अर्थ 
किसने जहाँ में 
तपन को 
अपनाया है
कौन किसी की 
तपिश में
कब साथ दे पाया है
ये सफ़र तो 
स्वयं के साथ 
ही तय हो पाया है
कोई साथी 
नहीं बनता 
जलने वालों का
जीवन भर
तनहा सफ़र 
तय करते रहना
और जलते रहना
जलने की पीड़ा को
स्वयं में ही
समाहित करना
और फिर भी
 उफ़ ना करना 
अपनी चिता 
स्वयं जलाकर
सबकी ज़िन्दगी 
रोशन करना
शायद इसीलिए
"सूरज है वो "

बुधवार, 8 सितंबर 2010

प्राची के पार.......................

मोहब्बत की थी 
हम दोनों ने
इश्क की सीढियां
चढ़ी थीं 
हम दोनों ने
ज़माने से लड़ा था
दोनों के लिए 


याद है तुम्हें 
प्राची के पार 
मिलने का 
वादा किया था
डूबता सूरज
गवाह बना था
तेरी ज़ुल्फ़ से
अठखेलियाँ करती 
पवन अपने 
पंखों पर 
हमारे प्रेम का
संदेस ले उड़
चली थी
सारा चमन
महका रही थी
और हम दोनों
मिलेंगे कभी 
इसी चाह में
इसी विश्वास पर
इसी आस पर
जिए जा रहे थे 
मोहब्बत के 
ख्वाब बुने 
जा रहे थे 



ना जाने कहाँ से
वो बवंडर आया 
ख्वाब के महल 
को ढहा गया 
ज़माने को ना
इश्क रास आया
तुम्हें मजबूर
किया गया
रिश्तों की 
बेड़ियों में
जकड़ा गया
इज्ज़त के नाम 
पर ठगा गया
लड़की होने की
मजबूरी  पर
कुर्बान किया गया


और फिर उस दिन
जब तुम दुल्हन 
बनीं किसी और की
मुझसे मेरी खुशबू ,
मेरी सांसें ,
मेरी जिंदा
रहने की
हर वजह छीन 
ली गयी
जब तुम्हें देखा
आखिरी बार
दुल्हन के 
लिबास में
विदाई के वक़्त
अंग सब 
शिथिल हो गए
आँसू आँख में
जज़्ब हो गए 
धडकनों ने जैसे
धडकना छोड़ 
दिया था
दिमाग 
चेतनाशून्य
हो गया था
दिल तो तेरे
हवन कुंद की
आग में पहले ही
भस्म हो गया था
और रूह 
तेरे क़दमों तले
कुचली गयी थी
जिस पर
पाँव रख 
तू डोली  में
चढ़ी थी
हर अंग 
स्पन्दनहीन था
बस रूह का 
ज़िंदा पिंजर
खड़ा था
तेरे एक 
वादे की
सलीब पर
टंगा मेरा
वादा खड़ा था
कि
प्राची के पार
मिलन होगा 
हमारा
मगर तूने
बता दिया
प्राची के पार
जहाँ और भी है
जहाँ और भी है.................

सोमवार, 6 सितंबर 2010

चाहे हस्ती ही मेरी मिट जाये

कोई ऐसी शय खोजो यारों
दिल को मेरे सुकूँ आ जाये


धडकनों को गज़ल बनाओ यारों
शायद गुलाब कोई खिल जाये


उनके  चौबारे को ऐसे सजा दो यारों
शायद्  फिर कोई शहीद हो जाये


उसके लबों पर मुस्कुराहट सजा दो यारों

चाहे लहू मेरा बह जाये

दर्द के बिस्तर पर सुला दो मुझको
बस एक बार वो हँस जाये


कोई अहले -करम फ़रमाओ यारों
वो जी जाये और मैं  मर जाऊँ


कुछ उसके भरम तोड दो यारों
चाहे मै शहर--ए-बदर हो जाऊँ


कुछ तो उसको सुकून मिलेगा यारों
चाहे हस्ती ही मेरी  मिट जाये

 

रविवार, 5 सितंबर 2010

शिक्षा का स्तर ---------कल और आज ?

आज के वक्त में शिक्षा ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया है .अब हर बच्चे के लिए शिक्षा का क्या महत्त्व है ये ज्यादातर सभी को  पता है मगर कभी वो भी वक्त था कि सिर्फ लड़कों को ही शिक्षा के योग्य समझा जाता था और लड़कियों की दुनिया सिर्फ घर में काम काज तक सीमित थी .मगर जैसे- जैसे शिक्षा का प्रसार होता गया शिक्षा का महत्त्व समझ आता गया और लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाने लगा .


    आज लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों के कंधे से कन्धा मिलाकर चलती हैं और घर के कामकाज भी उतनी ही चुस्ती से करती हैं .शिक्षा ने देश और समाज को एक नयी दिशा दी है मगर फिर भी कल और आज के शिक्षा के स्तर में काफी फर्क आ चुका है.


कल शिक्षा बेशक सबके लिए अनिवार्य  नहीं थी मगर तब भी जो लगन होती थी वो अद्भुत होती थी . देश के लिए, समाज के लिए और घर परिवार के लिए कुछ करने का जज्बा होता था मगर आज शिक्षा सिर्फ पैसे कमाने का साधन बन कर  रह गयीं है .शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है. कोई मूल्य , कोई सिद्धांत नहीं रहे ...........बस पैसे के आगे कोई रिश्ता -नाता नहीं , सब छोटे हो गए हैं, बेमानी हो गए हैं ........................ये आज की शिक्षा की देन है .बेशक बड़ी बड़ी डिग्रियां मिल जाती हैं खूब नाम ,दौलत और शोहरत मिल जाती है मगर संस्कार नाम की दौलत से वंचित  रह जाता है आज का समाज. छात्र जव तक हाई स्कूल में होता है! माता पिता का आज्ञाकारी होता है . इंटर  में आने पर माता पिता की अवहेलना करता है! ग्रेज्यूएशन कर लेने के बाद स्वच्छंद हो जाता है और उसके बाद माता पिता को दुत्कारता और गालियां  देता है!
यही तो आजकल की शिक्षा का असर है.
बेशक आज अन्तरिक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है मगर फिर भी कल की तुलना में कहीं ना कहीं कमजोर ही है आज का शिक्षा का स्तर.

क्या कहें अब ...............कल ज्यादा बढ़िया था कि आज ..............सबका अपना -अपना दृष्टिकोण होता है मगर अगर देखा जाए तो कल शिक्षा सिर्फ कमाई का साधन नहीं थी व्यावहारिक ज्ञान के साथ व्याकरणीय  ज्ञान भी उत्तम था मगर आज ना तो व्यावहारिक ज्ञान है और ना ही व्याकरणीय ज्ञान...............ऐसे में आज की पीढ़ी से क्या उम्मीद की जा सकती है ............सिर्फ कुछ शब्द अंग्रेजी के बोल लेने से कोई शिक्षा का स्तर उच्च नहीं हो जाता ............आज किसी साक्षात्कार में जाने से पहले हर बच्चे को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कोचिंग   में जाना पड़ता है जबकि पहले ये सब शिक्षा के साथ - साथ व्यवहार में भी शामिल था..........बेशक आज भी व्यावहारिक ज्ञान जरूरी है मगर उसकी उपयोगिता सिर्फ साक्षात्कार तक ही सीमित हो कर रह गयीं है ..........एक बार जॉब मिल जाये उसके बाद सब भुला दिया जाता है या कहो रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है.

आज सिर्फ एक ही ज्ञान दिया जाता है कि पैसे कमाकर , दूसरे की टांग खींचकर कैसे आगे बढ़ा जा सकता है जबकि कल नम्रता , सहनशीलता और संतोष का ज्ञान भी बांटा जाता था .

आज शिक्षा अपना  मूल स्वरुप खो चुकी है सिर्फ कमाई का साधन बन चुकी है .ऐसे में जो पौध निकलेगी वो भी तो वैसी ही निकलेगी जैसा बीज रोपित किया गया होगा.

कल की तुलना कभी भी आज से नहीं की जा सकती............कल हमारी धरोहर है मगर आज भविष्य ...............और आज यही भविष्य अंधकार की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है.हमें आज को सुरक्षित करना होगा तभी भविष्य की इमारत सुदृढ़ बन सकेगी और इसके लिए पहल हमारे शिक्षकों को ही करनी पड़ेगी क्योंकि नींव तो वो ही रखते हैं .नींव पक्की होगी तो इमारत आने आप सुदृढ़ और खूबसूरत बनेगी.

बुधवार, 1 सितंबर 2010

प्रेम का अंजन

प्रेम का अंजन
लगाओ 
सखी री 
मेरी आँखों में 
प्रेम का अंजन
लगाओ सखी री 
मुझे उनकी 
पुजारिन 
बनाओ सखी री
ये प्रेम की 
तिरछी डगर 
है सखी री
इस पर 
चलना सिखाओ 
सखी री
कभी तो 
मोहन को
बुलाओ सखी री
उनकी चाहत की 
पैंजनिया 
पहनाओ सखी री
विरह  में उनके 
नचाओ सखी री
श्याम को कहीं 
से ढूँढ लाओ
सखी री
मुरलिया की 
धुन सुनवाओ 
सखी री
मुझे श्याम की
मुरली बनाओ
सखी री
उनके अधरों
से मुझको 
लगाओ सखी री
कैसे भी अब तो
मुझे श्याम की
प्रिया बनाओ
सखी री
मोहे 
प्रेम का अंजन
लगाओ सखी री ............