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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

कन्यादान या अभिशाप




दान करने के नाम पर
रहन रखने की
ये अजब रस्म देखी
बेटी ना हुई
कोई जमीन हुई
जिस पर जो चाहे 
जैसे चाहे हल चलाये
या मकान बनाए
या कूड़े का ढेर लगाये
मगर वो सिर्फ 
बेटी होने की कीमत चुकाए
उफ़ भी ना कर सके
दहलीज भी पार कर ना सके 
ना इस दर को
ना उस दर को
अपना कह सके 
जब दुत्कारी जाये
जब जीवन उसका
नरक बन जाये
जब साथ रहना दूभर हो जाये
कहो तो .........ओ ठेकेदारों
किस दर पर जाए
कहाँ जाकर गुहार लगाये?

अब बदलना होगा 
ऐसी रस्मों को
समझना होगा
बेटी कोई वस्तु नहीं
जो दान दे दी जाये
बेटियां तो जान होती हैं
दो घरों की आन होती हैं
फिर कैसे कर देते हो 
कन्यादान के नाम पर दान
क्या कभी नहीं 
तुम्हारे अंतस ने 
ये सवाल उठाया ?
क्या कभी नहीं 
तुम्हारा जमीर जागा?
जिसे इतने नाजों से पाला पोसा
और एक ही पल में
उसे सारे हकों से 
महरूम कर दिया
ब्याह के बाद 
ना वो घर अपना बना
और ना मायका अपना रहा
दोनों ही घरों से
उसका हक़ तोड़ दिया
कन्यादान प्रथा ने 
समाज को अभिशापित किया
कन्या का जीवन दूभर किया
सब जानते हैं
अब उस घर से इसके 
सभी हक़ ख़त्म हुए
और मायके वाले भी
बाद में बोझ समझते हैं
फिर अत्याचारों का सिलसिला 
कहर ढाता है
कभी दहेज़ के नाम पर 
तो कभी लड़की जन्मने के नाम पर
उसी का शोषण किया जाता है
कभी  ज़िन्दा जलाया जाता है
तो कभी बच्चा जनते जनते ही
उसका दम निकल जाता है
बेटी को हर अधिकार से वंचित कर दिया
दान दी जाने वाली चीज  से
कोई हक़ ना रखना
इस प्रथा ने ही ऐसी 
कुरीतियाँ फैलाई हैं 
ज़रा सोचो
अगर ऐसा तुम्हारे साथ होने लगे
पुरुष का दान होने लगे
और किसी भी घर में
उसका कोई स्थान ना हो
कहीं कोई मान ना हो
अपनी कोई पहचान ना हो
कैसे तुम जी पाओगे?


ओ समाज के ठेकेदारों
जागो .........समझो
मत लकीर के फकीर बनो
जो रस्मे जज्बातों  से खेलती हों
जिनसे कोई सही शिक्षा ना मिलती हो
जो विकास में बाधक बनती हों
उन रस्मों को , उन परिपाटियों को 
बदलना बेहतर होगा
एक नए समाज का 
निर्माण करना होगा
कन्यादान की रस्म को 
बदलना होगा
लिंग भेद ना करना होगा
बल्कि कन्या को भी 
सम स्तर का समझना होगा
कन्यादान को अभिशाप ना बनने देना होगा 


दोस्तों ओ बी ओ पर महा लाइव उत्सव के अंतर्गत ये टोपिक दिया गया मगर पता नहीं ये रचना पहले ही लिख ली गयी थी तो आज वहां लगा दी ........शायद कुछ कामों की बुनियाद पहले ही पड़ चुकी होती है बस हमें पता बाद में चलता है .........तो सोचा आप सबको भी ये पढवानी बनती है 

35 टिप्‍पणियां:

vidya ने कहा…

बेहद सशक्त अभिव्यक्ति वंदना जी..
बधाई आपको, इस कविता को जन्म देने के लिए..

सदा ने कहा…

कन्‍यादान को अभिशाप न बनने देना होगा ...सार्थक अभिव्‍यक्ति ।

अनुपमा पाठक ने कहा…

दान के साथ गहरे अर्थ जुड़े हैं...
दान हमेशा सुपात्र को दिया जाता है... और जहां दान करने वाले और दान लेने वाले दोनों सुपात्र हों वहाँ दान की हुई कन्या की मानहानि कभी नहीं होती...!
यहाँ रीतियों में आई विकृतियों को बदलने के लिए हमें सदाचारी होना होगा... समाज को इन रीतियों का मान रखने की पात्रता हासिल करनी होगी!
"कन्यादान को अभिशाप ना बनने देना होगा"
इस सुन्दर आह्वान के साथ कविता का समापन करने हेतु हार्दिक बधाई!

वन्दना ने कहा…

अनुपमा जी कहने का सिर्फ़ इतना आशय है कि इंसान को दान की वस्तु मत बनाओ यानि कन्या को …………क्या वो एक वस्तु है? क्यों धर्म के नाम पर उसका दोहन हो ? क्यों नही इन कुरीतियों के प्रति आवाज़ उठायी जाये? सिर्फ़ सदाचारी होने से सब कुछ नही हो सकता उसके साथ साथ बदलाव लाने की भी हिम्मत करनी पडेगी और कन्यादान की वस्तु नही ये सबको समझना होगा ।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...क्यों हमारी प्रथाएं हमारे अपने खून को एक परायी 'वस्तु' बना देती हैं ? हमें हमारी सोच में बदलाव लाना होगा.

आशा जोगळेकर ने कहा…

कन्या कोई वस्तू नही है जब उसको वस्तु माना जाता है तो वह िस्तेमाल करके फेकने की चीज़ बन जाती है । समाज़ बदल रहा है, पुरुष भी बदल रहे हैं पर बहुत धीरे धीरे ।

अनुपमा पाठक ने कहा…

सत्य कहा...
हमने भी कविता की प्रसंशा ही की... व्यक्त भावों का मान ही किया...
बस अज्ञानतावश प्रतिक्रिया उपयुक्त न हो पायी, क्षमा करेंगी!

very well written:)
बेहद सुन्दर बात कही आपने...
'कुछ कामों की बुनियाद पहले ही पड़ चुकी होती है बस हमें पता बाद में चलता है...' what a lovely co-incidence:)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

संबंधों की गहराई को शब्दों के अर्थ मात्र से जोड़ने से अच्छा होगा कि कुरीतियों का सामना मिलकर करें, कन्यादान पर यदि दुख बढ़ता है तो गृहलक्ष्मी पर गर्व भी हो।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बेटी होने का दर्द , विरोध की अग्नि बन शब्दों में प्रवाहित हो रहा है

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-784:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

kshama ने कहा…

Khud mujhe 'kanyadaan;kee vidhise achraj hota hai! Bahut sundar rachana!

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut shandar rachna.

RITU ने कहा…

आपने एक प्रश्न उठाया है ..निश्चय ही कन्या कोई वस्तु नहीं है .
kalamdaan.blogspot.in

dheerendra ने कहा…

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी,लाजबाब सशक्त प्रस्तुति ...

MY NEW POST...मेरे छोटे से आँगन में...

अरूण साथी ने कहा…

ओह बहुत कुछ है जो बदल हीं नहीं रहा.......

अरूण साथी ने कहा…

sorry...pl remove 2nd comm

इमरान अंसारी (عمران انصاری) ने कहा…

सुन्दरता से एक सशक्त विषय पर लिखी पोस्ट ।

ऋता शेखर मधु ने कहा…

ये सवाल सभी बेटियों के मन में आते हैं...आपने उन्हें शब्द दे दिया|
बहुत सशक्त प्रस्तुतिकरण|

Kunwar Kusumesh ने कहा…

चिंतन करने योग्य प्रश्न उठाया है

M VERMA ने कहा…

प्रश्न उकेरती रचना ...
बहुत सुन्दर

Reena Maurya ने कहा…

कन्याये कोई वस्तु नहीं है जिसे दान में दिया जाये ,
फिर इसे कन्यादान नाम क्यों दिया गया ?
एक कन्या के मनः स्थिति को बहुत ही अनुपम शब्द रचना
से व्यक्त किया है ...
इतनी गहराई है इस रचना में ,,
बहुत ही सुन्दर ,बेमिसाल रचना है ..

Onkar ने कहा…

prabhavshali rachna

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सशक्त रचना ..सोचने पर मजबूर कराती हुई

Dr. sandhya tiwari ने कहा…

betiyon ki suraksha aur bachane ke abhiyan me mere blog unnati ki or hamari betiyan me aapka swagat hai.

Aparajita ने कहा…

Bahut gehri sacchayi hai isme, jo aksar log samajhtey nahi ya samajhna nahi chaahtey
very nice

Aparajita ने कहा…

Bahut gehri sacchayi hai isme, jo aksar log samajhtey nahi ya samajhna hi nahi chaahtey :(

Maheshwari kaneri ने कहा…

विचारणीय सशक्त अभिव्यक्ति..

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अब बदलना होगा ऐसी रस्मो को..।

Dr.Priya ने कहा…

आह...बेटियों के लिए आपका दर्द कितना भावपूर्ण है...चिंतन योग्य ज्वलंत विषय
प्रिया

mahendra verma ने कहा…

कुछ परम्पराएं आक्रोशित करती हैं।
बेटियों के हक के लिए जूझना जरूरी है।
अच्छी कविता।

प्रेम सरोवर ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आप आमंत्रिक हैं । धन्यवाद ।

Rakesh Kumar ने कहा…

अनुपमा पाठक जी और आपके बीच का उपरोक्त संवाद अच्छा लगा.
सोचने को बाध्य करती है आपकी यह अनुपम प्रस्तुति.

संगीता तोमर Sangeeta Tomar ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति.....

Breakanand ने कहा…

Things are not changing and we are sticking to tradition,customs,rituals,region,caste and so on We are bound from all sides and do not live a fuller life.We have lost love for life, flair for life.If you don't use your foot for a long time you lose walking power.You keep shut your eyes for two years and you lose your sight.The same way we have been following others and are not living as per our instinct and therefore we have lost flair for life.There is no motion and when energy is not in motion it perishes.So break the limits and we call it Break The Rule

Breakanand ने कहा…

yeh great things are same since ages