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सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

उम्र कैद की सजा काटने को विवश होती हैं................






सुना है 
उम्र के उस दौर में
जब सब जिम्मेदारियों से 
निवृत हो जाते हैं
तब एक बार फिर
ऋतुराज का पदार्पण होता है
जीवन फिर नयी करवट लेता है
एक बार फिर
चिड़ियाँ आँगन में चहकती हैं
मीठी- मीठी बतियाँ करती हैं
जो उम्र भर सुकून नहीं मिला
वो इस उम्र की थाती होती है
फिक्र से कोसों दूर
साथी के साथ
ज़िन्दगी फिर नयी उड़ान भरती है
क्या सच में ऐसा होता है ?
क्या संभव है फिर
मृतप्राय कुसुमों का खिलना?
क्या संभव है फिर 
जो बह गया उस पानी का
वापस मुड़ना?
क्या संभव है फिर
जिस रिश्ते की भस्म भी ना बची हो
उसका फिर से जीवित होना?
क्या संभव है फिर
मुरझाई तस्बीहों का खिलना?
क्या संभव है फिर
एक नवयौवन का आना?
जब गया वक्त वापस नहीं मुड़ता
फिर कैसे कहता है कोई
उम्र का वो दौर वापस आता है
जहाँ सच्चा प्यार जाना जाता है
जब शक्तिहीन ,बेबस , लाचार जिस्म
इक दूजे पर बोझ बने होते हैं
उम्र की घड़ियाँ गिन रहे होते हैं
सांस- सांस पर आह निकलती हो
कोई कैसे कह सकता है फिर
उम्र के उसी दौर में सच्चा प्यार होता है
ख्वाहिशें जवाँ होती हैं
हर ख्वाहिश को मुकाम मिलता है
जब ख्वाहिशों के जनाजे  में
वक्त की कील चुभी होती है
जब दिन रात में ना फर्क दिखता है
जब ना कहीं कोई मौसम बदलता है
जब स्पर्श में भी ना गर्माहट होती है
सिर्फ तबियत में बोझिलता होती है
आँखों में न स्वप्न पलते हैं
सिर्फ वक्त के काले साए  
ही अपने दंश देते हैं 
कोई कैसे कह सकता है फिर 
साथी के साथ जीने की 
सिर्फ यही उम्र होती है ?
ये तो विवशता होती है
जब किसी को ना उनकी 
जरूरत होती है
तब सिर्फ साथ निभाना
दोनों की मजबूरी होती है
मगर उसमे भी 
मोहब्बत की ना शिरकत होती है
वहाँ ना कोई उल्फत होती है
वहाँ ना कोई चाहत होती है
ये सब किताबी बातें होती हैं 
हकीकत से न रु-ब-रु  होती हैं 
सिर्फ वक्त की सलीबों पे टँगी
दो आत्माएं जिस्म  की बंदिश में कैद 
उम्र कैद की सजा काटने को विवश होती हैं................



24 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

रिश्ते को नए तरह से देखने की कोशिश है इस कविता में....

वन्दना ने कहा…

सिर्फ़ कोशिश नही अरुण जी ऐसा होते देखा भी है तभी लिखा है ………ज़िन्दगी के एक मोड पर आकर रिश्ते बेमानी से होने लगते हैं क्योंकि अपना आप तो चल नही पाता दोनो एक ही पडाव पर होते हैं ऐसे मे दूसरे की सेवा भी बोझ लगने लगती है………बहुत मुश्किल हालात होते हैं वो जब दोनो ही निस्सहाय होते हैं और सांसें पूरी करने को मजबूर तब वो उम्र कैद की सज़ा से कम नही होता जीना।

Maheshwari kaneri ने कहा…

सच है एक मोड़ पर आकर अपनी स्वयं की जिन्दगी एक बोझ लगने लगती है.जब शरीर जवाब देने लगता है और खुद को निसहाय महसूस करने लगते है ऐसे में जिन्दगी कैद सी लगती है..कुछ अलग सा विषय अलग सी सोच..बहुत सुन्दर वंदना जी..

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

ज़िन्दगी के उन लम्हों की अकुलाहट के दर्द का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है !
वंदना जी, साधुवाद स्वीकार करें !
आभार !

इमरान अंसारी (عمران انصاری) ने कहा…

अंत बहुत अच्छा है कविता का.....शानदार |

RITU ने कहा…

क्या लिखूं इसे पढ़ कर समझ नहीं आ रहा ..क्या सचमुच रिश्ते इतने बोझिल हो जाते हैं..?! पता नहीं .. ..क्या मालूम परिस्थति कैसी हो?
कई सवाल खड़े करती है आपकी ये रचना..
kalamdaan.blogspot.in

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सांसे तो सभी की अपनी ही होती हैं .
लेकिन सहवास में भी सुख होता है .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन का यह पड़ाव बहुत कुछ सोचने को विवश करता है..

vidya ने कहा…

बहुत सार्थक लिखा है आपने...
जीवन के इस पहलु पर ध्यान अक्सर जाता नहीं...या शायद मुँह फेर लेते हैं हम सच्चाई से..

शुभकामनाएँ.

ASHA BISHT ने कहा…

yah kavy sanjidigi ko liye huye hai...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

केवल राम : ने कहा…

उम्र के इस पड़ाव में जब जिन्दगी के अनुभव और वास्तविकताएं भी महसूस की होती हैं तब एक नया अनुभव होता है जीवन का सब कुछ सामने घटित हो रहा होता है और हम बेबस होते हैं ....जिसे आपने बैगाना कहा है ...एक नया दृष्टिकोण उभर कर आया है आपकी इस रचना में ....!

केवल राम : ने कहा…

उम्र के इस पड़ाव में जब जिन्दगी के अनुभव और वास्तविकताएं भी महसूस की होती हैं तब एक नया अनुभव होता है जीवन का सब कुछ सामने घटित हो रहा होता है और हम बेबस होते हैं ....जिसे आपने बैगाना कहा है ...एक नया दृष्टिकोण उभर कर आया है आपकी इस रचना में ....!

dr.mahendrag ने कहा…

Wakt ki salibo pe tangi do atmaye jism ki bandish mai kaid umra kaid ki saja katne ko vivsh hoti hai
APNE ERD GIRD DONO HI ANUBHAV SE GUJRA HOO,KUCH AISE BHI DEKHE HAI JINHONE ES BAT KO JHUTHLAYA HAI,pHIR BHI EK BADI SACCHAIE KO DARSHATI KAVITA

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

रचना दीक्षित ने कहा…

प्रेम के विभिन्न चरणों का विवरण का इस कविता में समावेश सोचने के लिये छोड जाता है पढ़ने के बाद भी.

Reena Maurya ने कहा…

सच कहती है आप जीवन के अंतिम दिन में वो
बात नही होती है जो शुरुवाती दिन में ,
बुढापे में जब शरीर कमजोर हो जाता है तो जीवन बोझ सा हि लगता है
एकदम सहमत हु आपकी बात से ..
और इस रचना के तो क्या कहने जीवन कि यथार्थ झलकती है
रचना में ...बहूत हि सुंदर , बेहतरीन रचना है ...

dheerendra ने कहा…

वंदना जी,..जहां तक मेरा मान्ना है,उस पदाव पर अगर आपस में अटूट प्रेम के भाव हो,अंतिम साँस तक एक दुसरे के लिए बोझ नही लगती,

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

jiwan ka yah padaav suna hai bahut dukhdayi hota hai...lekin sacchayi to vahi bata sakta hai jo is padaav se guzer raha ho.

sunder yatharthpoorn kavita.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

सुन्दर, तभी तो कहते हैं कि जिन्दगी कैसी है पहेली हाये.....................!

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सोचने को विवश करती है रचना ... पर क्या उम्र के उस दौर में चाहतें नहीं होती ... कई बार साथी नहीं होते पर हाँ यादें तो होती ही हैं ...

मनीष सिंह निराला ने कहा…

सोचने पर मजबूर करती रचना !
अनुपम प्रस्तुति के लिये बधाई !

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।