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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

मगर अब कैसे भस्मीभूत बीजों में फिर से अंकुरण हो


भटक रहा है ऋतुराज 
मेरे घर के बाहर
अन्दर आने को उत्सुक
मगर आने के हर दरवाज़े पर
मैंने सांकल चढ़ा दी है अब
ऋतुराज भी वक्त के साथ आये
तभी अच्छा लगता है
बेवक्त का आना कब किसे सुहाता है
और देखो तो
अब उमंगों से सब नाते टूट चुके हैं
लाल रोशनाई से अब नहीं लिखती कोई ख़त 
नहीं उगती क्यारियों में कोई मौसमी सब्जी
अब नहीं दिखता आईने में अक्स
जिसे देख आईना भी लजा जाता था
अब नहीं पड़ती सुबह की पहली किरण
किसी दरो- दीवार को रोशन करती हुई
नहीं होती कोई कविता अब अलंकृत 
श्रृंगार रस के मधुर सरस बोलों से
और बसंत रोज दस्तक दे रहा है
कुण्डी खडखडा रहा है 
मगर क्या करूँ 
थाप सिर्फ सुनाई देती है 
मगर निशाँ नहीं छोडती
जिस पर चलकर दरवाज़ा खोल सकूँ 
कैसे खुले दरवाज़ा 
जिसकी चाबियाँ तो 
रूहों के तिलस्मों में ज़मींदोज़ हो चुकी हैं 
चाबियों की खेती नहीं होती ना 
कोई फसल नहीं होती 
अब कौन से बीजों को रोपूं
जो नव पल्लव खिल जायें 
नए बीज होते तो शायद 
अंकुरित हो भी जाते
मगर अब कैसे भस्मीभूत बीजों में फिर से अंकुरण हो

26 टिप्‍पणियां:

vidya ने कहा…

बहुत बहुत सुन्दर वंदना जी...

सच है चाभियों की खेती नहीं होती..और सुख बड़े तालों में बंद होता है..

बहुत अच्छी रचना..
शुभकामनाये.

dheerendra ने कहा…

बहुत बढ़िया भाव लिए रचना,सुंदर प्रस्तुति..

NEW POST..फुहार..कितने हसीन है आप...

kshama ने कहा…

Kya likhtee ho.....mujhe to nishabd kar detee ho!

Maheshwari kaneri ने कहा…

बसंत ने तो आना ही है...सुन्दर अभिव्यक्ति...

Personal Loan ने कहा…

Very Niceeeeee Post our team Like this
Thanks
Team Loan NCR

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कहीं न कहीं मन की पीड़ा को दर्शा रही है यह रचना .. अच्छी प्रस्तुति

संध्या शर्मा ने कहा…

बसंत दस्तक दे रहा है तो जरुर आएगा.बीजों में फिर से अंकुरण होगा...
सुन्दर भाव...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति...

सुमित प्रताप सिंह Sumit Pratap Singh ने कहा…

ऋतुराज को आने दें
छाई निराशा जाने दें...

अरूण साथी ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति,भावपूर्ण.

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

ख़बरनामा ने कहा…

बहुत प्रशंसनीय.......

***Punam*** ने कहा…

fir basant aayi....
talon ko tod de....
aur andar aane den bahar ko...!
jeevan mein bhi bina mausan ki
sabzi aur fal-fool ugaaye....
man ki bagiya ko hara-bhara rakhen....!

Akhil ने कहा…

waah...bahut baut sundar rachna...kamaal ka shabd sanyojan kiya hai aapne..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बीज अवश्य अंकुरित होंगे...

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बसंत भी कभी कभी पीड़ा दे जाता है ।
भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

भटक रहा है ऋतुराज
मेरे घर के बाहर... dekh rahi hun , kabhi vallari ban jhank raha hai , kabhi khushboo ban rijha raha hai... bina izaazat aane kee aadat jo rahi , achha kiya saankal chadha di

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

सुन्दर कविता... बहुत बढ़िया...

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुंदर कविता. भस्मीभूत बीजों में अंकुरण का प्रयास एक नयी सोच को स्थापित करने का प्रयत्न है.

बधाई वंदना जी इस खूबसूरत प्रस्तुति के लिये.

Murari Pareek ने कहा…

सचमुच ऋतुराज भटक रहे हैं और बेमौसमी सब्जियां खाकर गायों को लगाने वाले इंजेक्शन की सब्जियां खा कर हम खुश हैं...

Manisha Abhyankar ने कहा…

'spring is at the door and door is closed.' what a wonderful creation!

रविकर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

mahendra verma ने कहा…

जिंदगी के समानांतर चलती एक और अच्छी कविता।

Manisha Abhyankar ने कहा…

spring is at the door and door is closed what a wonder creation a like it