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रविवार, 19 फ़रवरी 2012

सीमांत सोहल जी की नज़र से ............


सीमांत सोहल जी की नज़र से भी देखिये .........कैसे कविता को नए आयाम और दृष्टि मिल जाती है और वो अनकहा भी सामने आ जाता है जहाँ तक नज़र नहीं जा पाती..........एक समीक्षक की निष्पक्ष दृष्टि ही किसी कविता का सही आकलन कर सकती है जिसका प्रमाण ये समीक्षा है ............ये फेसबुक पर पुस्तक मित्र पर की गयी समीक्षा है जिसे ज्यों का त्यों आपके सम्मुख रख दिया है अभी तक प्राप्त टिप्पणियों के साथ .................



पुस्तक "स्त्री होकर सवाल करती है "
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कवयित्री -वंदना गुप्ता
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वंदना गुप्ता हैं !उनकी दो असरदार कविताएं मौजूद हैं !वंदना गुप्ता की औरत एक झील है !एक ठहरी हुए झील !शांत ! बेखबर !लोग अपना अक्स देखने उसके पास आते रहते हैं !पहले शांत जल में अपना अक्स देखते हैं फिर उसे छेड्ने के बाद !मतलब उसमें कंकड़ फेंकने के बाद !अपने ही अक्स को बदलता हुआ देखते हैं !अपने ही अक्स का मूल्यांकन करते हैं !झील कुछ नहीं कहती !शांत रहती है !पत्थर फेंकने से पहले और पत्थर फेंकने के बाद भी !कुछ देर के लिए वह अपनी लहरों से उद्वेलित होती है !फिर शांत हो जाती है !
इस तरह पत्थर फेककर अपना अक्स देखने वालों की कमी नहीं है और पत्थर ना फेंकने वालों की भी !झील को कोई फर्क नहीं पड़ता !
झील की तकलीफ इस बात में है कि क्या पत्थर फेंके बिना काम नहीं चलता? पहले पत्थर फेंको !झील को उद्वेलित करो फिर अपना अक्स बिगाड़ो !ये समाज की किस समझदारी का नाम है ?
ऐसा भी हो सकता था कि आदमी झील के पास आकार शांत बैठ जाता !झील में अपना अक्स देखता रहता !आदमी भी शांत ,झील भी शांत !आदमी की रूह और झील की रूह दोनों साक्षात्कार करते !दोनों बेफिक्र बैठे रहते !वक्त का पता ना चलता !दिन क्या ,पूरी उम्र गुजर जाती !आदमी वृद्ध हो जाता बैठा -बैठा !झील सूख जाती धीरे -धीरे !
लेकिन ऐसा नहीं हो पाता !झील शांत रहती है !उसे कोई शिकायत नहीं है !
वंदना सच कहती हैं ,झीलें कब बोली हैं ?वो साक्षी बनती रहती हैं हर कुरूपता की ,हर गहनता की !हर तूफान को सहती हैं !अपने वजूद से ही उसे दिक्कत है !हर खामोशी की कब्र है उसमे !
बावजूद सबके, झीलें खामोश रहती हैं !
फिर वंदना एक ऐसी औरत की भी कल्पना करती हैं जिसे छूना भी गवारा ना हो !हवा का स्पर्श भी नहीं !अपना साया भी नहीं !अपने चाहने वालों से दूर !अपनी रूह से भी कोसों दूर !वंदना के शब्दों में ,वर्जित फल !ये बात अलग है कि ऐसा वर्जित फल दुर्लभ है !
वंदना की कविताओं में एक भोलापन है !निर्दोषपन है !वंदना क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं !ना ही क्लिष्ट भावों का !कविताओं में ज्यादा स्टेंजा नहीं रहते !सुस्पष्ट रहती हैं !पाठक भटकता नहीं है !कविताओं में चतुराई नहीं है !वंदना को पढ़ना सुखद लगता है !
वंदना की याद रह जाने वाली पंक्तियाँ
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खामोशी की कब्र में ही
दफन हुई हैं
मगर झीलें कभी नहीं बोली हैं
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 ·  ·  · 13 hours ago

    • Vasundhara Pandey Nishi धन्यवाद सीमांत जी ...सच कहे आप... इन बेतरतीब लाइनों में भी एक लय होता है ,कोई सवर्ण सजाना नहीं पर एक रिद्म होता है कितनी सहजता से असहज शब्दों को भी पिरो जाती हैं...पढने वाला एक ले में पढता जाये...बस पढता जाये.......खामोशी की कब्र में ही
      दफन हुई हैं
      मगर झीलें कभी नहीं बोली हैं..gajab ki panktiyan hai..

      13 hours ago ·  ·  4

    • Misir Arun वंदना गुप्ता की कवितायेँ सचमुच सुन्दर हैं लेकिन आपकी समीक्षा भी किसी कविता से कम नहीं सीमान्त जी !बधाई वंदना जी और आप दोनों को !
      13 hours ago ·  ·  4

    • सीमांत सोहल शुक्रिया वसुंधरा जी ,मिसिर जी
      12 hours ago ·  ·  1

    • अनु कोहली 'भावना' सीमान्त जी आपका आभार कि आप हमेँ कविताओँ की गहराई मेँ ले जा रहे है! कविताओँ का सौन्दर्य और निखर के आ रहा है! वन्दना जी व आपको हार्दिक बधाई!
      12 hours ago via mobile ·  ·  3

    • सीमांत सोहल शुक्रिया अनु
      12 hours ago ·  ·  1

    • Nidhi Tandon 
       वंदना की कविताओं में एक भोलापन है !निर्दोषपन है !वंदना क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं !ना ही क्लिष्ट भावों का !कविताओं में ज्यादा स्टेंजा नहीं रहते !सुस्पष्ट रहती हैं !पाठक भटकता नहीं है !कविताओं में चतुराई नहीं है !वंदना को पढ़ना सुखद लगता है !
      सीमान्त जी ..आपने बिलकुल सही विश्लेषण किया है...वन्दना जी की कवितायें जब मैंने पढ़ी ...तो वो सीधे डील में उतरी..उन्हें समझने आत्मसात करने में कोई भी प्रयास मुझे...यानी एक पाठक को नहीं करना पड़ा .
      वन्दना जी को बधाई.

      11 hours ago ·  ·  1

    • Kavita Vachaknavee आपकी नजर से कविताओं को देखने का क्रम अच्छा लग रहा है।
      7 hours ago ·  ·  2

    • Kalpana Pant bahut sundar!
      3 hours ago ·  ·  1

    • कोमल सोनी सीमांतजी, जिस द्रष्टि की आवश्यकता एक कविता को सम्पूर्ण आत्मसात करने के लिए जरूरी होती है, वो सभी में नहीं होती है, आपकी नज़र
      से इन कविताओ का रूप निखर कर आ रहा है,और इनका प्रभाव भी दुगुना हो गया है, आभार आपका...

      2 hours ago ·  ·  1

    • Vandana Gupta सीमांत सोहल जी आपने मेरी कविताओं की समीक्षा कर ना सिर्फ़ मुझे अनुगृहित किया है बल्कि कविता के सौंदर्य मे भी चार चांद लगा दिये हैं………इतनी सूक्ष्मता और गहनता से भावों को पकडा है कि एक बार कविता जिसने पढी होगी वो आपके विश्लेषण के बाद दोबारा पढना चाहेगा …………और ये मेरे लिये किसी उपलब्धि से कम नहीं …………आपकी ह्रदय से आभारी हूँ ॥
      a few seconds ago · 

22 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सशक्त और सही विश्लेषण - बहुत बहुत शुभकामनायें

vidya ने कहा…

सुन्दर समीक्षा..
क्योकि रचनाकार और रचनाएँ ही सुन्दर है....

बधाई...

Amrita Tanmay ने कहा…

प्रतिभा को सम्मान ..आपको शुभकामनाये..

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुंदर समीक्षा. पाठकों की राय और ज्ञानीजनों द्वारा उत्तम समीक्षा और सुंदर लेखन को प्रेरित करती है.

बधाई वंदना जी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक समीक्षा ... सोहल जी की नज़र से तुमको जानना अच्छा लगा ॥ :):)

Shanti Garg ने कहा…

अनुपम भाव संयोजन के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

झील की शान्ति अपने आप में मुखर है...

dheerendra ने कहा…

वंदना जी,सोहल जी के द्वारा की समीक्षा अच्छी लगी,
मेरे ख्याल से,किसी भी रचना को लिखने के बाद,
यदि खुद को आत्मसंतुष्टि मिले,वहीं पर सबसे बड़ी समीक्षा
वही हो जाती है कि हमने अच्छा लिखा है,फिर किसी के समीक्षा की
जरूरत नही,वैसे ही आप एक सफल अच्छी रचनाकार है,...बधाई...

MY NEW POST ...सम्बोधन...

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह सोहल जी की पारखी नज़रों के क्या खूब पहचाना है कवियत्री मन को । बहुत बहुत शुभकामनाएं

कुमार राधारमण ने कहा…

जो सोहिल जी थोक में कह रहे हैं,वह हम किस्तों में न जाने कितनी बार कह चुके। पर पता नहीं क्यों,आपको हमारा कुछ याद ही नहीं रहता!

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी लगा रहा हूँ!सूचनार्थ!
--
महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ स्वीकार करें।

कुश्वंश ने कहा…

वंदना जी निस्संदेह एक शाशाक्त कवयत्री है साहिल जी की समीक्षा बेहतरीन के लिए है बधाई

Madhuresh ने कहा…

सटीक समीक्षा
बहुत शुभकामनाएं,
सादर

mahendra verma ने कहा…

वंदना जी की कविताएं मानव मन की पर्त-दर-पर्त विश्लेषण करती हैं।
सोहल जी की समीक्षा वंदना जी के कविता संसार को सुगमता से दृष्टव्य बना रही है।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

bahut sundar samiksha , vandna ji badhai aapko.........

ऋता शेखर मधु ने कहा…

बहुत स्पष्टता से प्रस्तुत की गई समीक्षा कविता के भाव को प्रेषित कर रही है...
मैंने यह कविता नहीं पढ़ा है...पढ़ने की इच्छा हो रही है
कभी फुरसत में पोस्ट कीजिएगा|

मनीष सिंह निराला ने कहा…

बढ़िया समीक्षा !

PRAN SHARMA ने कहा…

Saahil kee bebaaq smeeksha kee daad detaa hun main . Badee
imaandaaree se unhonne Vandana ji kee kavitaaon kaa aaklan
kiya hai . Vandana ji nissandeh ek sashakt kavyitri hain .

sakhi with feelings ने कहा…

bahut achha laga yaha aakar samiksha padhkar

आशा जोगळेकर ने कहा…

जितनी सरल सुंदर कविता उतनी ही सहज समीक्षा । बधाई आपको भी और सीमान्त साहिल जी को भी ।

संगीता तोमर Sangeeta Tomar ने कहा…

बेहतरीन समीक्षा! .....