पृष्ठ

अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

गुरुवार, 31 मार्च 2011

क्यों गुलमोहर का भरम तोड़ दिया?

जब भी चाहा तुमने
सिर्फ़ देह को चाहा
रूप के सौदागर बने
भोग सम्भोग के पार
ना जाना तुमने
एक नया आकाश
एक नई धरती
एक नयी दुनिया
तुम्हारे इंतजार में थी
मगर तुमने तो
दुनिया के तमाम
रास्ते ही बंद कर दिए
पता नहीं मिटटी में
तुम्हें कौन सा सुख मिला
जो तुम कभी
मूरत तक पहुँच ही नहीं सके
क्या जीने के लिए
सिर्फ देह ही जरूरी थी
या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे
मगर कभी
अपना लिबास
ना  बदल पाए
और मैं
तुममे
अपना एक
जहान खोजती रही
देह से परे
एक ऐसा आकाश
जिसका कोई
छोर ना हो
जहाँ कोई
रिश्ते की गंध
ना हो
जहाँ रिश्ता
बेनाम हो जाये
सिर्फ शख्सियत
काबिज़ हो
रूहों पर
और ज़िन्दगी
गुजर जाए
मगर सपने
कब सच हुए हैं
तुम भी
वैसे ही निकले
अनाम रिश्ते को
नाम देने वाले
दर्द को ना
समझने वाले
देह तक ही
सीमित रहने वाले
शायद
सबका अपना
आकाश होता है
और दूसरे के आकाश में
दखल देने वाला ही
गुमनाम होता है
जैसे आज तुमने
मुझे गुमनाम कर दिया
जिस रिश्ते को
कोई नाम नहीं दिया था
उसे तुमने आज
बदनाम कर दिया
आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया?

38 टिप्‍पणियां:

केवल राम ने कहा…

क्या जीने के लिए
सिर्फ देह ही जरूरी थी
या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे

इंसान की यही फितरत उसे कई अनुभवों से अपरिचित रखती है ..उसने नहीं समझा कभी किसी की भावनाओं को और भावनाओं को ना समझना खुद से दूर होना है .. वास्तविकता को ना समझना है ..आपने बहुत सुन्दरता से प्रकाश डाला है ..आपका आभार

Swarajya karun ने कहा…

@ एक नया आकाश,एक नई धरती
एक नयी दुनिया तुम्हारे इंतजार में थी
मगर तुमने तो दुनिया के तमाम
रास्ते ही बंद कर दिए ,पता नहीं मिटटी में
तुम्हें कौन सा सुख मिला ,जो तुम कभी
मूरत तक पहुँच ही नहीं सके '
- भावनाओं को दार्शनिक अंदाज़ में गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रकट करती बहुत अच्छी कविता . आभार .

सदा ने कहा…

तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे

बहुत ही गहन भावों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

बहुत ही सही और सच्ची बात कही आपने!

सादर

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

Bahut sundar.

नीलांश ने कहा…

सुंदर लगी..
eternal relation.

abhi..

Manpreet Kaur ने कहा…

बहुत ही उम्दा शब्द है ! हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर जरुर आना !
Music Bol
Lyrics Mantra
Shayari Dil Se
Latest News About Tech

Kunwar Kusumesh ने कहा…

जीवन की सच्चाई को बाखूबी चित्रित किया है आपने..

मेरे भाव ने कहा…

आज तुमने
मुझे गुमनाम कर दिया
जिस रिश्ते को
कोई नाम नहीं दिया था
उसे तुमने आज
बदनाम कर दिया
आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया? .....

marmsparshi aur satik rachna.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

भौतिक और आध्यात्मिक प्रेम के बीच के फर्क के बीच एक सुन्दर कविता.
@ एक नया आकाश,एक नई धरती
एक नयी दुनिया तुम्हारे इंतजार में थी
मगर तुमने तो दुनिया के तमाम
रास्ते ही बंद कर दिए ,पता नहीं मिटटी में
तुम्हें कौन सा सुख मिला ,जो तुम कभी
मूरत तक पहुँच ही नहीं सके '@
देह से परे प्रेम की व्याख्या बड़े सहज शब्दों में की गई है...

नया आकाश.. नई धरती... जैसे सरल शब्दों में प्रेम के नए संसार को रच दिया है कविता में...

shikha varshney ने कहा…

कमाल लिखा है ...आपके ब्लॉग से पंक्तियाँ कॉपी नहीं हो रहीं. पर बीच की कुछ पंक्तियाँ बेहद अच्छी लगीं.

Kailash Sharma ने कहा…

तुम भी
वैसे ही निकले
अनाम रिश्ते को
नाम देने वाले
दर्द को ना
समझने वाले
देह तक ही
सीमित रहने वाले...

जीवन के यथार्थ का बहुत सुन्दर चित्रण ...गहन चिंतन से परिपूर्ण बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति..उत्कृष्ट रचना..आभार

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे

सुन्दर रचना ... गहन भाव !

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
koi ise janna nhin chahta yhi to durbhagy hai
umda rachna
kavita-kaarn

Anupriya ने कहा…

वंदना जी,

नमस्कार,

बड़े दिनों बाद आज ब्लॉग पर आना हुआ...कुछ निजी कारणों से आज कल वक़्त नहीं मिल पाता...आप की ये रचना बहुत ही अच्छी लगी...एक - एक पंक्ति किसी और ही दुनिया में ले जाती है...

शायद
सबका अपना
आकाश होता है
और दूसरे के आकाश में
दखल देने वाला ही
गुमनाम होता है
जैसे आज तुमने
मुझे गुमनाम कर दिया
जिस रिश्ते को
कोई नाम नहीं दिया था
उसे तुमने आज
बदनाम कर दिया
आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया?

क्या बात है...बहुत ही गहरी सोच वाली एक बेहद सुन्दर रचना...आपको बधाई.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर लिखा है... बेहद सुन्दर चित्रण ..मिट्टी से मूरत तक, रूह तक... रिश्तों के नाम से अनाम और बदनाम सभी बिम्बो को दिखाती भावना से ओट प्रोत एक दर्द को ले कर चलती आपकी कविता दिल छू गयी ...
कल आपकी यह पोस्ट चर्चामंच पर होगी... आप वह आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित करियेगा ... सादर
चर्चामंच
मेरे ब्लॉग में भी आपका स्वागत है - अमृतरस ब्लॉग

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही गहन भावों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति । धन्यवाद|

Sushil Bakliwal ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति. वाकई...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

अच्छा विश्लेषण!
--
रचना जीवन के धरातल पर खरी उतरती है!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

यथार्थपरक भावों का बेहतरीन संयोजन......

ज्योति सिंह ने कहा…

क्या जीने के लिए
सिर्फ देह ही जरूरी थी
या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे
bhavna badal jaati ,aese mod par khadi hoti hai ki sahi faisla nahi le pati ,ati sundar racha hai ..........

ज्योति सिंह ने कहा…

क्या जीने के लिए
सिर्फ देह ही जरूरी थी
या देह से इतर भी
कुछ होता है
ये ना जानना चाहा
तुम सिर्फ क्षणिक
सुख की खातिर
वक्त के लिबास
बदलते रहे
bhavna badal jaati ,aese mod par khadi hoti hai ki sahi faisla nahi le pati ,ati sundar racha hai ..........

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन का सागर बड़ा गहरा है, कोई उतरे तो सही।

Rakesh Kumar ने कहा…

काश! देहासक्ति से बाहर निकल अपने असली स्वरुप को पहचान पायें हम लोग 'भोग सम्भोग के पार'

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत नेक ख्याल और गहन सोच -
भावनाओं को समझ पाना -
उस पवित्र गहराई तक पहुच पाना -
बहुत सुंदर रचना -

आनंद ने कहा…

और मैं
तुममें
अपना एक जहाँ खोजती रही
देह से परे
एक आकाश
जिसका कोई ओर छोर न हो

ये हैं हमारी वन्दनीय वंदना जी .....जिनकी भावनाओं कि गहराई का कोई छोर नही ..
नारी के प्यार का सहज और स्वाभाविक चित्रण ......बधाई हो !

बेनामी ने कहा…

bahut accha vandna g

बेनामी ने कहा…

वंदना जी,

सुभानाल्लाह.....बहुत खूबसूरत .शानदार, बेहतरीन, लाजवाब लगी ये पोस्ट.....बहुत गहरी बात उठाई है आपने.........आजकल आप हमारी दहलीज़ पर नहीं आती .....कोई खता हुई क्या हमसे...

बाबुषा ने कहा…

bahot subdar !

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

बेहद भावपूर्ण !

amit kumar srivastava ने कहा…

"how to love body to love soul or how to love soul to love body" this is an eternal question and still unanswered....

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

bahut sundar...

वाणी गीत ने कहा…

आह !
यही टीस कुछ और दिलों में भी उठी होगी !

Arun sathi ने कहा…

आह! क्यांे गुलमोहर का भरम तोड़ दिया।

‘‘आह’’ दिल से निकल कर ब्लॉग जगत पर छा गई।

तार-तार कर दिया।
शर्मसार कर दिया।
पर सच को आइने के
सामने लाकर धर दिया।

आभार, इतनी सशक्त रचना के लिए। यही तो ब्लॉग जगत की खासियत है जिसमें आदमी के अंदर की आग, दर्द और प्रेम सब कुछ निकल कर बाहर आ जाता है।

ZEAL ने कहा…

जैसे ही किसी अनाम रिश्ते को नाम दिया जाता है , उसमें से प्रेम की खुशबू निकल जाती है।

mridula pradhan ने कहा…

आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया?
kya dard bhara hai in pangtiyon men aapne aaj....jabab nahin.

شہروز ने कहा…

umda!!! mubarakbad lijiye dil se!!

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

आह ! ये क्या किया
क्यों गुलमोहर का
भरम तोड़ दिया?

पीड़ा झलकती है इन पंक्तियों में..
एक स्त्री के दर्द को बखूबी उकेरा है आपने..
बधाई..