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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

एक रेखा खींच लेता हूँ……………

इन दिनों
अघटित भी देख लेता हूँ
मानव हूँ ना
एक रेखा खींच लेता हूँ




बेध्यानी की खाद में
अंकुर नए उगाता हूँ
और अपने बेपरवाह
ख्यालो को सींच लेता हूं
जब भी कुछ
अघटित देख लेता हूँ
मानव हूँ ना
एक रेखा खींच लेता हूँ


संवेदनाओ की गिरह
बाँध लेता हूँ
और खुद से ही जूझ जाता हूँ
मुखर नहीं हो पाता हूँ
मानव हूँ ना
आत्मयंत्रणा  की
एक रेखा खींच लेता हूँ


विद्रोह के स्वर भींच लेता हूँ
चीख की चिंगारी को
हवा भी दे देता हूँ
मगर सच से मुँह
चुराता हूँ
मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ

28 टिप्‍पणियां:

Coral ने कहा…

विद्रोह के स्वर भींच लेता हूँ
चीख की चिंगारी को
हवा भी दे देता हूँ
मगर सच से मुँह
चुराता हूँ

सच बात है
---------
१९ तारीख को चाँद आ रहा है मिलने ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

विद्रोह के स्वर भींच लेता हूँ
एक रेखा खींच लेता हूँ
--
बहुत बढ़िया!
कवित्व तो आपके भीतर कूट-कूट कर भरा है!
यदि यह अभिव्यक्ति छन्दबद्ध होती तो मजा आ जाता!
फिर भी बहुत आननद दे गई आपकी रचना
और लिखने की प्रेरणा भी!

: केवल राम : ने कहा…

मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की

जब मानव सत्य और असत्य के बीच खुद के होने का अहसास करता है तो द्वन्द के बीच उसे सत्य का बोध नहीं होता , और वह जीवन के मूल लक्ष्य से हट जाता है ...और उसे हटाने में उसका दंभ भी महतवपूर्ण भूमिका अदा करता है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन, भावों की स्पष्टवादिता की सुन्दर अभिव्यक्ति।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बहुत सुन्दर वंदना जी , लाजबाब शब्द रचना !

"पलाश" ने कहा…

सच कहा वन्दना जी
अच्छे विचार लिये हुये है आपकी रचना

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत शानदार!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ

sach me aisa hi hota hai...!
par manav ke saath!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सच से मुँह
चुराता हूँ
मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ
bahut hi badhiyaa

Pinky Kaur ने कहा…

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संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

विद्रोह के स्वर भींच लेता हूँ
चीख की चिंगारी को
हवा भी दे देता हूँ
मगर सच से मुँह
चुराता हूँ

आज की परिस्थितियां देखते हुए करना पड़ता है ..नहीं तो हवन करते हुए हाथ जल जाते हैं ...अच्छी रचना... विचारोतेजक ..

Manpreet Kaur ने कहा…

bouth he aacha post hai aapka...
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sandhya ने कहा…

बिलकुल सच कहा आपने, मानव हूँ ना परिस्थितियों के हाथ में एक कठपुतली के जैसे फिर भी ..

सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ....

बेहतरीन प्रस्तुति के लिये धन्यवाद..

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

बहुत खूबसूरत......

mridula pradhan ने कहा…

मानव हूँ ना.....
aur iski keemat to chukani hi padegi.bahut achcha likhi hain.

Kailash C Sharma ने कहा…

मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ ...

आज सभी अपने अपने स्वार्थों में फंसे हुए हैं..वर्तमान समाज के मनोविज्ञान का बहुत गहन विश्लेषण और चित्रण...बहुत सशक्त रचना..

Rakesh Kumar ने कहा…

दार्शनिक भावों की सुंदर अभिव्यक्ति.रेखा खींचना
व्यक्ति -व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कहाँ पर किस प्रकार की रेखा खींचे.

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

चीख की चिंगारी को
हवा भी दे देता हूँ
मगर सच से मुँह
चुराता हूँ

sachchai h..
behatreen
badhai..

सदा ने कहा…

मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ ...

बहुत ही सुन्‍दर भावमय प्रस्‍तुति ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

काफी गहरी सोच में डूबी रचना । सुन्दर ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत लाजवाब.

रामराम.

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर लाजबाब शब्द रचना| धन्यवाद|

रंजना ने कहा…

क्या बात कही है....

गहन अनुभूति, गहन अभिव्यक्ति...

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप ने अपनी रचना मे बहुत भाव पुर्ण बात कह दी,
बहुत ही सुंदर प्रस्तुति !! धन्यवाद

amit-nivedita ने कहा…

sach baat....

वाणी गीत ने कहा…

सत्य और असत्य के बीच
स्वयं के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ ...
मानव ठहरा आखिर , आत्मनियंत्रण जरुरी था ...
बेहद खूबसूरत !

Hema Nimbekar ने कहा…

सबसे पहले इस उत्तम अभिव्यक्ति के लिए आपको बधाई...
पहली पंक्ति पता नहीं क्यूँ पर अभी जापान में हुई प्रकृति विपदा की ओर इशारा करती हुई प्रतीत हुई...

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"इन दिनों
अघटित भी देख लेता हूँ
मानव हूँ ना
एक रेखा खींच लेता हूँ"

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सच में मैं इंसान हूँ इसीलिए तो अघटित घटना भी देख लेते हूँ....सचाई से मुह मोड़ लेता हूँ....
की मैं इस धरती माँ का सुपुत्र नहीं कुपुत्र हूँ...फिर भी जब माँ विक्राट रूप दिखाती है...तब भी मैं सच से मुह चुरा लेता हूँ....और खुद को सुधारने की जगह धरती माँ को ही दोष देता हूँ...

सच कहा आपने..

"विद्रोह के स्वर भींच लेता हूँ
चीख की चिंगारी को
हवा भी दे देता हूँ
मगर सच से मुँह
चुराता हूँ
मानव हूँ ना
सत्य असत्य के बीच
स्वंय के होम होने की
एक रेखा खींच लेता हूँ"

Minakshi Pant ने कहा…

bahut khubsurat andaz vidroh to tha par bahut shant lehze me keh dala
bahut khub