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सोमवार, 7 मार्च 2011

अयोग्य घोषित कर दिया गया?

हर विधा में पारंगत थी 
आसमानों को छूती थी 
हर क्षेत्र की ज्ञाता थी
सबके मन को भाती थी
नित नए सोपान गढ़ती थी
दिलों पर राज़ करती थी
किसी से कुछ न कहती थी
बस कर्तव्यपालन करती रहती थी
तो हर शख्स की आँख का तारा थी
आखिर धुरी जो थी घर की
मगर इक दिन ऐसा भी आया 
जब खुद को उसने 
कटघरे में खड़ा पाया 
सोच में पड़ गयी थी
जीवन के हर क्षेत्र में 
महारत हासिल करते हुए
हर कर्तव्य खूब निभाया
कभी न अनर्गल प्रलाप किया
आत्मावलोकन करती रही
खुद को हर पल छलती रही
और दुनिया की कसौटी पर
खरी उतरती रही 
हर मोर्चे पर डटी रही
सबसे सम्मानित भी होती रही 
फिर चूक कहाँ पर कैसे हुयी
शायद उसका 
पुरुषवादी व्यक्तित्व
न स्वीकार हुआ 
फिर भी उसने कभी न उफ़ किया
इन दोहरी मानसिकता के 
गुलामों को हमेशा 
कमी उसमे ही दिखती रही
आखिर ज़िन्दगी भर उसने
हर दायित्व खूब निभाया
हर कर्त्तव्य को अंजाम दिया
और अब तो उम्र के 
उस मुकाम पर आ गयी
जहाँ कर्तव्यों की
इतिश्री हो गयी
फिर कैसे उसे
अयोग्य घोषित कर दिया गया?
इस प्रश्न में उलझ गयी 
शायद!
अब वो खुद के लिए 
जीने लगी थी इसलिए?     

38 टिप्‍पणियां:

Sonal Rastogi ने कहा…

अपने अधिकार ना मांगे तो सच्ची नारी
अपने कष्ट ना बताये वो अच्छी नारी
रोबोट की तरह निभाती रहे सारे दायित्व
वो ही आदर्श नारी .....
अपनी पहचान अगर बनाने लगे तो ....?

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सच में वंदनाजी .....कहाँ मिलती है उसे कर्तव्यों को निभाने के लिए कृतज्ञता ...... बहुत अच्छा लिखा आपने...

knkayastha ने कहा…

अब वो खुद के लिए
जीने लगी थी इसलिए...

ऐसा कब होगा आखिर...

वैसे महिला दिवस की शुभकामनाएँ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यही दोहरी मानसिकता है ...नारी को आगे बढने की बात सब करते हैं लेकिन जब मौके आते हैं तो कर्तव्य की बेडियाँ डाल दी जाती हैं ...नारी चाहे जितने भी मुकाम हासिल कर ले फिर भी उसे अयोग्य ही ठहरा दिया जाता है ...सटीक अभिव्यक्ति

ehsas ने कहा…

क्योंकि सभी की जिदंगी में एक वक्त ऐसा आता है जब वह अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। मन की वेदना को बेहतर तरीके से पेश किया है आपने।

सदा ने कहा…

अब वो खुद के लिये

जीने लगी थी इसीलिए ...


बहुत ही सुन्‍दर भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Atul Shrivastava ने कहा…

महिलाओं को त्‍याग की मूर्ति कहा जाता है लेकिन यही त्‍याग की मूर्ति जब अपने अधिकारों की बात करने लगे तो....
बेहतरीन रचना।

mridula pradhan ने कहा…

ek bahut hi mahatwpoorn pahlu ko khoobsurti ke saath chooa hai aapne.....bahot achcha....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर रचना!
मगर यह भी सत्य है कि उगते सूर्य को सब प्रणाम करते हैं!
यही दुनिया की रीत है!

janta ki aawaz ने कहा…

Aaj Wo Apne Liye Ji Rahi Hai Isliye ..Samj Me Kalanki ?????

Aakhir Kyon ????

Umda Post

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

स्त्री विमर्श को नई दिशा देती आपकी कविता बेहतरीन है...

वाणी गीत ने कहा…

कविता दोहरी मानसिकता की शिकार स्त्रियों की स्थिति को अच्छी तरह निरुपित कर रही है...!

shikha varshney ने कहा…

kai sawal khade karti praabhavshaalee rachna.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अब वो खुद के लिए जीने लगी थी ....
बहुत खूब ... सच है औरत जब अपने आपके लिए जेती है तो ये पुरुष समाज सह नहीं पाटा ... तोहमत ही लगाता है ...
बहुत पते की बात कही है आपने ...

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

बहुत सुन्दर......एक स्त्री के मनोभावों का सुन्दर समावेश किया है आपने इस पोस्ट में.....

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बस एक ही शब्द मुह से निकलता है, स्वार्थी दुनिया !

क्षितिजा .... ने कहा…

बहुत खूब वंदना जी ... नारी के सामान अधिकारों की बात तो सब करते हैं ... पर जब सच में उसे ये अधिकार देने की बात आती है तो उसे कई तरह की 'उपाधियाँ' दी जाती हैं ...

arvind ने कहा…

bahut badhiya post.....aadarsh naaree sirf daayityon kaa vahan hi kyon kare use adhikaar bhi paane kaa hak hai...vaajib baat kah di aapne.

Deepak Saini ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने...

गौरव शर्मा "भारतीय" ने कहा…

बेहतरीन भावाभिव्यक्ति के साथ इन्सान के दोहरी मानसिकता का अच्छा चित्रण किया है आपने...
सार्थक एवं प्रभावी लेखन के लिए शुभकामनायें...

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति|
धन्यवाद|

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सशक्त लिखा है आपने.

रामराम.

Kailash C Sharma ने कहा…

फिर कैसे उसेअयोग्य घोषित कर दिया गया?इस प्रश्न में उलझ गयी शायद!अब वो खुद के लिए जीने लगी थी इसलिए?

बहुत कटु सत्य..बहुत सार्थक और सशक्त प्रस्तुति. आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.uchcharan.com/

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर ओर बेहतरीन रचना, धन्यवाद

abhishek ने कहा…

acchi rachna hai...

ummeden rakhte sab hain
par ummedon ko bhi samajhana chahiyye..
sirf soch se nahi
saath to sabka dena chahiye jo iska adhikaari hai...
rab raakha...

Udan Tashtari ने कहा…

क्या कहें...

यही मानसिकता है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भावनाओं को सम्मान मिले।

ZEAL ने कहा…

At times people get biased in judging a woman . Very impressive creation .

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर भावों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति|
महिला दिवस की शुभकामनाएँ|

धीरेन्द्र सिंह ने कहा…

शायद ! अब वो खुद के लिए जीने लगी थी इसलिए...नारी के मनोभाव को अभिव्यक्ति देती एक सुन्दर रचना।

Manpreet Kaur ने कहा…

bouth he aacha post likha hai aapne dear good 1
happy women's day...Visit My Blog PLz..
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Navin C. Chaturvedi ने कहा…

वंदना जी आप की इस सशक्त कविता पर आदरणीया संगीता जी की बेबाक राय से असहमत होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है|

Kunwar Kusumesh ने कहा…

HAPPY WOMEN'S DAY.

रजनीश तिवारी ने कहा…

sach aur satik likha aapne . naari dohri mansikta ki shikar hamesha se rahi hai aur use milne vale challanges bhi bahut kade/ kathin hote rahe hain. naari ne samay samay par apne saamartya aur shakti ka loha manvaya hai ! aapki kavita ek katu-satya ka varnan karti hai. shubhkamnayen !

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

arey bhai isme itna sochne ki kya baat hai...jahan nari ne khud ke liye sochna shuru kiya vahin se ayogy saabit kar di gayi....yahi to purush pradhaan samaaj kahlata hai.

anupama's sukrity ! ने कहा…

दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रहार -
सुंदर रचना .

Sadhana Vaid ने कहा…

नारी जीवन की विडंबनाओं का सस्जक्त चित्रण किया है ! अत्यंत प्रभावशाली रचना ! बधाई स्वीकार करें !