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बुधवार, 27 नवंबर 2013

बालार्क की तीसरी किरण



बालार्क की तीसरी किरण कैलाश शर्मा :

बालार्क काव्य संग्रह के तीसरे कवि की अनुभूतियों और संवेदनाओं से मिलवाती हूँ। 

कैलाश शर्मा की रचना "अनुत्तरित प्रश्न" एक अशक्त से सशक्ति की और बढ़ती माँ के ह्रदय की वेदना है जिसमें बेटी के जन्म पर खड़े होते प्रश्न को शायद  अब उत्तर मिल गया है। 

"अब मैंने जीना सीख लिया " ज़िन्दगी की हकीकत बयां करती रचना है पीछे मुड़कर देखने की आदत कैसे आगत को दुखी कर देती है उससे कवि  ने मुक्ति पायी है जब उसे हकीकत समझ आयी है जो इन पंक्तियों में उद्धृत हुआ है :अब पीछे मुड़कर मैं क्यों देखूं /सूनी राहों पर चलना सीख लिया। 

बहुत बहाये हैं आंसू इन नयनों ने / अब तो बाकि कुछ तर्पण रहने दो /चाहत के बीज क्यों बपोये थे ? / क्यों फल पाने कि इच्छा कि ?/ कुछ समय दिया होता खुद को /मन होता आज न एकाकी /देख लिए हैं बहुत रूप तेरे जीवन /अब चिरनिद्रा में मुझे शांति से सोने दो………एकाकीपन की वेदना का सजीव चित्रण करती रचना "क्यों अधर न जाने रूठ गए ?" . ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव का एकांत कैसे घुन की तरह खाता जाता है और अंदर से कितना खोखला कर देता है कि इंसानी मन विश्राम की और कूच करने को आकृष्ट होने लगता है , जरूरी है वो वक्त आने से पहले कुछ वक्त खुद के लिए जीना या खुद के लिए कुछ ऐसा संजो लेना जो इस एकाकीपन से मुक्ति मिल सके का भाव देती रचना सोचने को मजबूर करती है। 

कल की तलाश में /निकल जाता आज /मुट्ठी से / रेत की तरह .... कविता "ख्वाहिशें " की चंद पंक्तियाँ मगर सब कुछ कहने में सक्षम जिसके बाद कुछ कहने की शायद जरूरत ही नहीं । सारी ज़िन्दगी कुछ ख्वाहिशों की डोर पकडे दौडते हम जान ही नही पाते कब वक्त हाथ से फ़िसला और सरक गया और ख्वाहिशों  की फ़ेहरिस्त में ना कोई कमी हुयी।

कीमोथेरपी का ज़हर /जब बहने लगता नस नस में /अनुभव होता जीते जी जलने का / जीने कि इच्छा मर जाती /सुखकर लगती इस दर्द से मुक्ति/ मृत्यु कि बाँहों में /जीवन और मृत्यु कि इच्छा का संघर्ष /हाँ, देखा है मैंने अपनी आँखों से ………… कैंसर की भयावहता का इससे इतर  सटीक चित्रण और क्या होगा ?"जीवन और मृत्यु का संघर्ष " कविता मानो खुद जी कर लिखी हो कवि ने , किसी अपने को पल पल उस पीड़ा से गुजरते देखा हो और कुछ ना करने में जब खुद को असमर्थ पाया हो तो उस दर्द की अनुभूति को शायद यूं लिख कर कुछ कम कर पाया हो तभी तो कविता के अंत में कवि ने आखिर स्वीकार ही लिया इस सत्य को कुछ इस तरह : आज भी जीवंत हैं / वे पल जीवन के / काँप जाती है रूह /जब भी गुजरता/ उस सड़क से। रौंगटे खड़े करने को काफी है कविता में उपजी दिल दहला देने  वाली पीड़ा। 


जीवन के विभिन्न आयामों से गुजरते  कवि ह्रदय ने अपने अनुभवों की पोटली से एक एक कर ज़िन्दगी की हर हकीकत से रु-ब -रु करवाया है।  जब तक कोई भुक्तभोगी ना हो नही व्यक्त कर सकता इतनी सहजता से ज़िन्दगी की तल्खियों, दुश्वारियों , खामोशियों , एकाकियों से।  यूँ ही नहीं प्रस्फुटित होते शब्दबंध जब तक ह्रदय में पीड़ा का समावेश ना हो , जब तक कोई खुद ना उन अनुभवों से गुजरा हो और कवि वो सब कहने में सक्षम है जो आम जीवन में घटित होता है मगर हम उन्हें पंक्तिबद्ध नहीं कर पाते। 


अगली कड़ी में मिलते है एक नए कवि से.…। 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

मुझे तो महज तमाशबीन सा खड़ा रहना है

आजकल कुछ नहीं दिखता मुझे 
ना संसार में फैली आपाधापी 
ना देश में फैली अराजकता 
ना सीमा पर फैला आतंक 
ना समाज में फैला नफरतों का कोढ़ 
ना आरोप ना प्रत्यारोप 
कौन बनेगा प्रधानमंत्री 
किसकी होगी कुर्सी 
कौन दूध का धुला है 
किसने कोयले की दलाली में 
मूंह काला किया है 
किस पर कितने भ्रष्टाचार 
के मामले चल रहे हैं 
कौन धर्म की आड़ में 
मासूमों का शोषण कर रहा है 
कौन वास्तव में धार्मिक है 
कुछ नहीं दिखता आजकल मुझे 
जानते हैं क्यों 
देखते देखते 
सोचते सोचते 
रोते रोते 
मेरी आँखों की रौशनी जाती रही 
श्रवणरंध्र बंद हो गए हैं 
कुछ सुनाई नहीं देता 
यहाँ तक की अपने 
अंतःकरण की आवाज़ भी 
अब सुनाई नहीं देती 
फिर सिसकियों के शोर कौन सुने 
और मूक हो गयी है मेरी वाणी 
जब से अभिव्यक्ति पर फतवे जारी हुए 
वैसे भी एक मेरे होने या ना होने से 
कौन सा तस्वीर ने बदलना है 
जोड़ तोड़ का गुना भाग तो 
राजनयिकों ने करना है 
मुझे तो महज तमाशबीन सा खड़ा रहना है 
और हर जोरदार डायलोग पर तालियाँ बजाना है 
और उसके लिए 
आँख , कान और वाणी की क्या जरूरत 
महज हाथ ही काफी हैं बजाने के लिए 
तुम कहोगे 
जब हाथ का उपयोग  जानते हो 
तो उसका सदुपयोग क्यों नहीं करते 
क्यों नहीं बजाते कान के नीचे 
जो सुनाई देने लगे 
जुबान के बंध  खुलने लगें 
आँखों के आगे तारे दिखने लगें 
बस एक बार अपने हाथ का सही उपयोग करके देखो 
है ना …… यही है ना कहना 
क्या सिर्फ इतने भर से तस्वीर बदल जाएगी 
मैं तुमसे पूछता हूँ 
क्या फिर इतने भर से 
घोटालों पर ताले लग जायेंगे 
क्या इतने भर से 
हर माँ , बहन , बेटी सुरक्षित हो जाएगी 
रात के गहन अँधेरे में भी वो 
सुरक्षित घर पहुँच जायेंगी 
क्या इतने भर से 
हर भूखे पेट को रोटी मिल जायेगी 
क्या फिर कहीं कोई लालच का कीड़ा किसी ज़ेहन में नहीं कु्लबुलायेगा 
क्या हर अराजक तत्व सुधर जाएगा 
क्या कानून सफेदपोशों के हाथ की कठपुतली भर नहीं रहेगा 
क्या फिर से रामराज्य का सपना झिलमिलायेगा 
क्या सभी कुर्सीधारियों की सोच बदल जायेगी 
और उनमे देश और समाज के लिए इंसानियत जाग जायेगी 
गर मेरे इन प्रश्नों की उत्तर हों तुम्हारे पास तो बताना 
मैं हाथ का सदुपयोग करने को तैयार हूँ ………एक आज्ञाकारी वोटर की तरह 
जबकि जानता हूँ 
राजनीति के हमाम में सभी वस्त्रहीन हैं  और मैं महज एक तमाशबीन 

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

बालार्क की दूसरी किरण


बालार्क की दूसरी किरण ज्योति खरे :

कवि की वास्तविक पहचान उसका लेखन होता है और उसका सबूत ज्योति खरे ने "आसमान , तुम चुप क्यों हो " नामक कविता के माध्यम से दिया है कि इंसान की इंसानियत के प्रति की गयी वादाखिलाफी एक दिन उसके सीने में जब शूल सी चुभती है तो कर देता है दोषारोपण खुद को मुक्त करने के लिए , बेसाख्ता उठा  देता है सवाल तुम चुप क्यों हो इन दुश्वारियों पर जो हर इंसानियत के पैरोकार को सोचने पर मजबूर कर देता है। 

"चिड़िया " कविता मानव के जाने कितने सपनो का चित्रण है जो उम्मीद की चिड़िया के पंखों पर उड़ान भरता है और निर्द्वन्द सा विचरता है शायद तभी उम्मीद पर दुनिया कायम है। 

ज़िन्दगी कितनी है कौन जानता है तो क्यों ना कुछ सत्यों को सहेजा जाए , कुछ ज़िन्दगी की खुश्गवारियों को चुना जाए , कुछ पल जो खिलखिलाते तो हैं आस पास मगर हैम नज़रअंदाज़ कर जाते हैं ऐसे में हमें चाहिए कि उनमे से थोड़ी से ख़ुशी की रोशनाई सहेज ली जाए तो जीवन सिर्फ दर्द की तहरीर ही नहीं बना रहता बल्कि एक खूबसूरत यादों की तस्वीर भी साथ साथ चलती है जो ज़िंदादिली कायम रखती है बस इतना सा तो कहना है कवता " पर अभी कुछ सत्य कह लें " का। 

पिता की यादों को समर्पित कविता " पापा अब " इस रिश्ते की ऊष्मा और गरिमा दोनों को सहेजती है वो सब देखती है जो सामने घटित हो रहा है मगर बेबसी की शाखें भी इर्द गिर्द होने का अहसास करा रही हैं।  संवेदनाओं से भरपूर रचना मन पर दस्तक देती है। 

गाँव के परिदृश्य को समेटती कविता " लौट चलो " की स्पन्दन्ता वो ही महसूस कर सकता है जो बिछड़ा हो अपने मूल से और कभी आ गया हो कुछ पल सहेजने……… अनुभव को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना और कल और आज के स्वरुप को इंगित करना ही इसकी विशेषता है। 

" सूख रहे आँगन के पौधे " नाम के अनुरूप आज के यथार्थ को चित्रित करती है जो हर घर की कहानी है , कैसे स्वार्थपरता और संवेदनहीनता ने रिश्तों को खोखला कर दिया है और जो इंसान के लहू में दीमक सी घुस गयी है जब तक खोखला ना करे छोड़ती ही नहीं।  

ज़िन्दगी के अनुभवों और सच्चाइयों को कोई सच्चा कवि जब महसूसता है तो रोके नहीं रुकता , कलम के माध्यम से छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या पर अपनी चिंताओं के फूल रख देता है कुछ ऐसी ही दीवानगी है ज्योति खरे के लेखन में जो हर पहलू पर दृष्टिपात करती है फिर समस्या देश की हो , समाज की या पारिवारिक सब पर उनकी कलम बराबर असर करती चलती है यही तो एक कवि के लेखन की , उसके मौन की मुखर अभिव्यक्ति होती है।  

मिलती हूँ अगले कवि के साथ :

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

बालार्क …………मेरी नज़र से

दोस्तों 
बालार्क यानि बाल सूर्य …… लेखन के क्षेत्र में हम सभी बालार्क ही तो हैं और उन सबको एकत्रित करके एक माला में पिरोने का श्रेय रश्मि प्रभा दी और किशोर खोरेन्द्र जी को जाता है और उसमें मुझे इतना सम्मान देना कि मेरे द्वारा लिखी प्रस्तावना को स्थान देना अन्दर तक अभिभूत कर गया साथ में आत्मविश्वास का संचार कर गया । इस संग्रह में मेरी तीन रचनाओं को भी स्थान मिला है जो मेरे लिये गौरव की बात है ।

बालार्क काव्य संग्रह यूँ तो अपने आप में अनूठा और बेजोड़ है जिसमे चुन चुन कर सुमनो को संजोया गया है और एक काव्य का गुलदस्ता बनाया गया है जिसे पढ़ने के बाद  सोच के जंगलों में उगी झाड़ियों को नए आयाम मिलते हैं , एक नयी दिशा मिलती है।कोशिश करती हूँ अपने नज़रिये से कवियों के लेखन को समझने की और आपके समक्ष प्रस्तुत करने की : 

आइये इस संग्रह के पहले कवि " देवेन्द्र कुमार पाण्डेय "  से मिलते हैं जिनकी पहली ही कविता "दंश" मन को झकझोरती है. इंसानी जीवन और पशु के जीवन में ना जहाँ कोई फर्क दिखता  है , एक कांटा सा  दिल में चुभता है और लहू भी नहीं निकलता ये है लेखन का व्यास तो दूसरी कविता "पिता " पिता के होने और ना होने के फर्क को यूं संजोती है जैसे कोई बच्चा अपने सबसे प्रिय खिलौने को सम्भालता है और उसके महत्त्व को जानता है मगर इंसान कहाँ जीते जी सारे सचों को जान पाता  है और जब जानता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. 

" धूप ,हवा और पानी " कविता एक ख़ामोशी की चीत्कार है , एक सच के मुँह से मुखौटा उतारता आईना है जिसे इंसानी भूख ने शर्मसार किया है , इंसानी कानूनों ने जहाँ पहरेदारी की मोहर लगाई है। ज़िन्दगी की जद्दोजहद का ऐसा  चित्रण जो रोज सामने होता है मगर किसी को फर्क नहीं पड़ता। 

" पानी " कविता जहाँ ना केवल संस्कारों पर वार करती है वहाँ पानी की किल्लत के साथ ज़िंदगी जीने को विवश इंसानी फितरत को भी बयां करती है।  ज़िन्दगी है तो जीना भी पड़ेगा मगर वक्त की बेरहमी कब किस रूप में उतर आये और खुद के आँखों का पानी भी जब सागर सा लगे , कह नहीं सकते।  वक्त के साथ कैसे बदल जाती हैं संस्कारों की परिभाषाएँ जो अंदर ही अंदर कचोटती तो हैं मगर इंसान विवश है इस सच के साथ जीने को क्योंकि कहीं ना कहीं वो खुद भी दोषी है , कहीं ना कहीं उन्होंने किया है खुद अपना दोहन तो फिर आज किस पर और कैसे करें दोषारोपण। 

देवेन्द्र पाण्डेय की कवितायेँ मन को तो छूती ही हैं साथ में सोचने को भी विवश करती हैं।  अपने आस पास घटित रोजमर्रा के जीवन से किरदारों सरोकारों को उठाना और उस दर्द को महसूसना जिसे आमतौर पर हम अनदेखा कर जाते हैं यही होती है कवि की दृष्टि , कवि की संवेदना , उसके ह्रदय की कोमलता जो उसे औरों से अलग करती है और उसका एक विशिष्ट स्थान बनाती है। 

 मिलती हूँ अगली बार अगले कवि के साथ ............

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

मेरे मन की मधुशाला


१ )
मेरे मन की मधुशाला का 
जो एक घूँट तुम भर लेते 
फिर चाहे उम्र भर होश में ना आते 
इक जीवन तो हम जी लेते ..........प्रिये !

२ )
मेरे तन के घाट पर 
जो तुमने शाहकार गढ़ा 
जीवन की मधुशाला में 
उसे अंतिम पड़ाव मिला ...............प्रिये!

३ )
नैनों के द्वारे से कभी 
जो उतरे होते निर्जन मन में 
वीराने भी गुलज़ार होते 
जो हाथ में हमारे हाथ होते ..........प्रिये ! 

४ )
देह की प्यास पर तुमने गर 
तरजीह जो ह्रदय को दी होती 
रूह की मधुशाला तुम्हारी 
लबालब भर गयी होती ...........प्रिये !

५ )
फिर न लफ़्ज़ों के मोहताज होते 
जो ककहरा प्रेम का पढ़ लेते 
फिर मधुशाला की एक ही घूँट में 
मौन की भाषा भी तुम गुन लेते ........प्रिये !

६ )
अधूरी अबूझी प्यास से 
न कदम तुम्हारे बोझिल होते 
जो मेरे मन की मधुशाला के 
तुम सजग प्रहरी होते ................प्रिये !

७ )
दो तन दो मन दो प्राण का 
जो एक एक घूँट हम भर लेते 
फिर न द्वी  के परदे में 
जीवन हमारे ढके होते ............प्रिये !

८ )
अपने एकांतवास से तुम 
जो बाहर  निकले होते 
हम की निर्झर मधुशाला में 
जीवन हमारे संवर गए होते ...........प्रिये !

९ )
गर अहम् की मीनारों के 
जो बुर्ज न इतने ऊंचे होते 
फिर तो मधुशाला के रस में 
मन रसायन हो गए होते ......प्रिये ! 

१ ० )
भोर की उजली धूप  में 
जो कुछ देर ठहरे होते 
तुम और मैं के बोझ तले दबे 
समीकरण सारे बदल गए होते ..........प्रिये ! 

१ १ )
घट भर भर कर पीया होता 
जो जाम न तेरा छलका होता 
फिर तो मधुशाला के मधु से तर 
तेरा रोम रोम हुआ होता ............प्रिये ! 

१ २ )
गर एक कोशिश की होती 
जो अपना सर्वस्व माना होता 
फिर मेरे मन की मधुशाला तक 
आना न था कठिन ......... प्रिये !

१ ३ )
खुद को न्योछावर करने की 
जो दलीलें थोपी थीं कल तुमने 
गर उन पर खुद भी चले होते 
फिर डगर कठिन न थी मधुशाला की .........प्रिये !

१ ४ )
इक बार सिर्फ मेरे हो गए होते 
जो दो घडी संग जी गए होते 
प्रेम की मधुशाला पर कुर्बान 
फिर मेरे मन की मधुशाला हो गयी होती ..........प्रिये ! 

१ ५ )
तुम न फिर तुम रहे होते 
मैं न फिर मैं रही होती 
इक दूजे में समायी हमारे 
मनों की मधुशाला होती ........प्रिये ! 

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

मेरी आस का मौसम नहीं बदला…………सिर्फ़ तुम्हारे लिये


एक उम्र बीती
मेरे यहाँ
पतझड को ठहरे
यूँ तो मौसम बदलते हैं
साल दर साल
मगर
कुछ शाखों पर
कभी कोई मौसम ठहरता ही नहीं
शायद
उन मे अवशोषित करने के गुण
बचते ही नहीं किसी भी मिनरल को
देखो तो
ना ठूँठ होती हैं
ना ही फ़लती फ़ूलती हैं
सिर्फ़ एक ही रंग मे
रंगी रहती हैं
जोगिया रंग धारण करने के
सबके अपने कारण होते हैं
कोई श्याम के लिये करता है
तो कोई ध्यान के लिये
तो कोई अपनी चाहत को परवान चढाने के लिये
जोग यूँ ही तो नही लिया जाता ना
क्योंकि
पतझड के बाद चाहे कितना ही कोशिश करो
ॠतु को तो बदलना ही होता है
और जानते हो
मेरी ॠतु उसी दिन बदलेगी
जिस दिन हेमंत का आगमन होगा मेरे जीवन में ………सदा के लिये
ए ………आओगे ना हेमंत का नर्म अहसास बनकर
प्यार की मीठी प्यास बनकर
शीत का मखमली उजास बनकर
देखो ………इंतज़ार की दहलीजें किसी मौसम की मोहताज़ नहीं होतीं
तभी तो युग परिवर्तन के बाद भी
मेरी आस का मौसम नहीं बदला…………सिर्फ़ तुम्हारे लिये
क्योंकि
मैं नही बदलना चाहती 

अपनी मोहब्बत के मौसम को किसी भी जन्म तक
क्या दे सकोगे साथ मेरा ……अनन्त से अनन्त तक हेमंत बनकर
जानते हो ना………मोहब्बत तो पूर्णता में ही समाहित होती है

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

आवाज़ का भरम

सब कुछ टूटने पर भी 
जोड़े रखना है मुझे 
आवाज़ का भरम 
भाँय भाँय की आवाज़ का होना 
काफी है एक रिदम के लिए 
नहीं सहेज सकती अब 
सन्नाटों के शगल 
क्योंकि जानती हूँ 
सन्नाटे भी टूटा करते हैं………
मगर 
आवाजें घूमती हैं ब्रह्माण्ड में निर्द्वन्द ………. 
आवाज़ कहूं , ध्वनि या शब्द 
जिसका नहीं होता कभी विध्वंस 
इसलिए 
अब सिर्फ आवाज़ को माध्यम बनाया है 
जिसके जितने भी टुकड़े करो 
अणु का विद्यमान रहना जीवित रखेगा मुझे ……मेरे बाद भी 

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

कुछ ख्याल

1)

ये कैसी विडम्बना है 
ये कैसी संस्कारों की धरोहर है 
जिसे ढो रहे हैं 
कौन से बीज गड गये हैं रक्तबीज से 
जो निकलते ही नहीं 
सब कुछ मिटने पर भी 
क्यों आस के मौसम बदलते नहीं 
करवा चौथ का जादू क्यूँ टूटता नहीं 
जब बेरहमी की शिला पर पीसी गयी 
उम्मीदों को नेस्तनाबूद करने की मेंहदी 
ये लाल रंग शरीर से बहने पर भी 
प्रीत का तिलिस्म क्यों टूटता नहीं 
उसी की उम्रदराज़ की क्यों करती है दुआ 
जिसकी हसरतों की माला में प्रीत का मनका ही नहीं 
दुत्कारी जाने पर भी क्यों करवाचौथ का तिलिस्म टूटता नहीं 
रगों में लहू संग बहते संस्कारों से क्यों पीछा छूटता नहीं……


2)



ये जो लगा लेती हूँ 
माँग मे सिंदूर और माथे पर बिन्दिया 
पहन लेती हूँ  पाँव मे बिछिया और हाथों में चूडियाँ 
और गले में मंगलसूत्र 
जाने क्यों जताने लगते हो तुम मालिकाना हक 
शौक हैं ये मेरे अस्तित्व के 
अंग प्रत्यंग हैं श्रृंगार के
पहचान हैं मुझमे मेरे होने के 
उनमें तुम कहाँ हो ? 
जाने कैसे समझने लगते हो तुम मुझे 
सिंदूर और बिछिया में बंधी जड़ खरीद गुलाम 
जबकि ……. इतना समझ लो 


हर हथकड़ी और बेडी पहचान नहीं होती बंधुआ मजदूरी की 

3

संभ्रांत परिवार हो या रूढ़िवादी या अनपढ़ समाज 
सबके लिए अलग अर्थ होते भी 
एक बिंदु पर अर्थ एक ही हो जाता है 
फिर चाहे वो सोलह श्रृंगार कर 
पति को रिझाने वाली प्रियतमा हो 
या रूढ़िवादी परिवार की घूंघट की ओट में 
दबी ढकी कोई परम्परावादी स्त्री 
या घर घर काम करके दो वक्त की रोटी का 
जुगाड़ करने वाली कोई कामगार स्त्री 
सुबह से भूखा प्यासा रहना 
कमरतोड़ मेहनत करना 
या अपने नाज नखरे उठवा खुद को 
भरम देने वाली हो कोई स्त्री 
अर्घ्य देने के बाद 
चाँद निकलने के बाद 
व्रत खोलने के बाद 
भी रह जाती है एक रस्म अधूरी 
वसूला जाता है उसी से उसके व्रत का कर 
फिर चाहे वो शक्तिहीन हो 
शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ हो 
क्योंकि जरूरी होती है रस्म अदायगी 
फिर चाहे मन के मोर तेजहीन हो गए हों 
क्योंकि 
सुना है 
जरूरी है आखिरी मोहर का लगना 
जैसे मांग भरे बिना कोई दुल्हन नहीं होती 
वैसे ही रस्मों की वेदी पर आखिरी कील जरूरी है 
वैसे ही देहों के अवगुंठन बिना करवाचौथ पूर्ण नहीं होती 
वसूली की दास्ताँ में जाने कौन किसे जीतता है 
मगर 
दोनों ही पक्षों के लिए महज अपने अपने ही नज़रिए होते हैं 
कोई धन के बल पर 
कोई छल के बल पर 
तो कोई बल के बल पर 
भावनाओं का बलात्कार कर रस्म अदायगी किया करता है 
और हो जाता है 
करवाचौथ का व्रत सम्पूर्ण 

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

ज़िन्दगी जीने के सबके अंदाज़ जुदा हुआ करते हैं

मेरे फ़लक से तुम्हारे फ़लक तक 
विचरती आकाश गंगायें 
जरूरी तो नहीं 
माध्यम बने ही 
सम्प्रेक्षणता का 
जबकि जानते हो 
ध्वनियों में भी गतिरोध हुआ करते हैं 
उमस के दरवाज़ों पर भी ताले हुआ करते हैं 
खपरैलों के भी उडने के मौसम हुआ करते हैं 
यूँ भी बेवजह ढोलक पर थाप नही दी जाती 
तो फिर क्यों बेज़ार हो खटखटाऊँ मौन की कुण्डियाँ 
जब नक्काशी के लिए मौजूद ही नहीं सुलगती लकड़ियाँ 

अब कौन  दीवान-ए -आम और दीवान-ए -ख़ास की जद्दोजहद में उलझे 
जब नागवारियों की नागफनियों से गुलज़ार हो मोहब्बत का अंगना 

ज़िन्दगी जीने के सबके अंदाज़ जुदा हुआ करते हैं जानम !!!

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

एक जटिल प्रश्न उत्तर की चाह में


आज  फिर अंतस में एक प्रश्न कुलबुलाया है 
आज फिर एक और प्रश्नचिन्ह ने आकार पाया है 
यूं तो ज़िन्दगी एक महाभारत ही है 
सबकी अपनी अपनी 
लड़ना भी है और जीना भी सभी को 
और उसके लिए तुमने एक आदर्श बनाया 
एक रास्ता दिखाया 
ताकि आने वाली  पीढियां दिग्भ्रमित न हों 
और हम सब तुम्हारी  दिखाई राह का 
अन्धानुकरण करते रहे 
बिना सोचे विचारे 
बिना तुम्हारे कहे पर शोध किये 
बस चल पड़े अंधे फ़क़ीर की तरह 
मगर आज तुम्हारे कहे ने ही भरमाया है 
तभी इस प्रश्न ने सिर उठाया है 

महाभारत में जब 
अश्वत्थामा द्वारा 
द्रौपदी के पांचो पुत्रों का वध किया जाता है 
और अर्जुन द्वारा अश्वत्थामा को 
द्रौपदी के समक्ष लाया जाता है 
तब द्रौपदी द्वारा उसे छोड़ने को कहा जाता है 
और बड़े भाई भीम द्वारा उसे मारने को कहा जाता है 
ऐसे में अर्जुन पशोपेश में पड़ जाते हैं 
तब तुम्हारी और ही निहारते हैं 
सुना है जब कहीं समस्या का समाधान ना मिले 
तो तुम्हारे दरबार में दरख्वास्त लगानी  चाहिए 
समाधान मिल जायेगा 
वैसा ही तो अर्जुन ने किया 
और तुमने ये उत्तर दिया 
कि अर्जुन :
"आततायी को कभी छोड़ना नहीं चाहिए 
और ब्राह्मण को कभी मरना नहीं चाहिए 
ये दोनों वाक्य मैंने वेद में कहे हैं 
अब जो तू उचित समझे कर ले "
और अश्वत्थामा में ये दोनों ही थे 
वो आततायी भी था और ब्राह्मण भी 
उसका सही अर्थ अर्जुन ने लगा लिया था 
तुम्हारे कहे गूढ़ अर्थ को समझ लिया था 

मेरे प्रश्न ने यहीं से सिर उठाया है 
क्या ये बात प्रभु तुम पर लागू नहीं होती 
सुना  है तुम जब मानव रूप रखकर आये 
तो हर मर्यादा का पालन किया 
खास तौर से रामावतार में 
सभी आपके सम्मुख नतमस्तक हो जाते है 
मगर मेरा प्रश्न आपकी इसी मर्यादा से है 
क्या अपनी बारी में आप अपने वेद में कहे शब्द भूल गए थे 
जो आपने रावण का वध किया 
क्योंकि 
वो आततायी भी था और ब्राह्मण भी 
क्या उस वक्त ये नियम तुम पर लागू नहीं होता था 
या वेद  में जो कहा वो निरर्थक था 
या वेद में जो कहा गया है वो सिर्फ आम मानव के लिए ही कहा गया है 
और तुम भगवान् हो 
तुम पर कोई नियम लागू नही होता 
गर ऐसा है तो 
फिर क्यों भगवान् से पहले आम मानव बनने का स्वांग रचा 
और अपनी गर्भवती पत्नी सीता का त्याग किया 
गर तुम पर नियम लागू नहीं होते वेद के 
तो भगवान बनकर ही रहना था 
और ये नहीं कहना था 
राम का चरित्र अनुकरणीय होता है 
क्या वेदों की मर्यादा सिर्फ एक काल(द्वापर) के लिए ही थी 
जबकि मैंने तो सुना है 
वेद साक्षात् तुम्हारा ही स्वरुप हैं 
जो हर काल में शाश्वत हैं 
अब बताओ तुम्हारी किस बात का विश्वास करें 
जो तुमने वेद में कही या जो तुमने करके दिखाया उस पर 
तुम्हारे दिखाए शब्दों के जाल में ही उलझ गयी हूँ 
और इस प्रश्न पर अटक गयी हूँ 
आखिर हमारा मानव होना दोष है या तुम्हारे कहे पर विश्वास करना या तुम्हारी दिखाई राह पर चलना 
क्योंकि 
दोनों ही काल में तुम उपस्थित थे 
फिर चाहे त्रेता हो या द्वापर 
और शब्द भी तुम्हारे ही थे 
फिर उसके पालन में फ़र्क क्यों हुआ ? 
या समरथ को नही दोष गोसाईं कहकर छूट्ना चाहते हो 
तो वहाँ भी बात नहीं बनती 
क्योंकि 
अर्जुन भी समर्थ था और तुम भी 
गर तुम्हें दोष नहीं लगता तो अर्जुन को कैसे लग सकता था 
या उससे पहले ब्राह्मण का महाभारत में कत्ल नहीं हुआ था 
द्रोण भी तो ब्राह्मण ही थे ?
और अश्वत्थामा द्रोणपुत्र ही थे 
आज तुम्हारा रचाया महाभारत ही 
मेरे मन में महाभारत मचाये है 
और तुम पर ऊँगली उठाये है 
ये कैसा तुम्हारा न्याय है ?
ये कैसी तुम्हारी मर्यादा है ?
ये कैसी तुम्हारी दोगली नीतियाँ हैं ?


संशय का बाण प्रत्यंचा पर चढ़ तुम्हारी दिशा की तरफ ही संधान हेतु आतुर है 
अब हो कोई काट , कोई ब्रह्मास्त्र या कोई उत्तर तो देना जरूर 
मुझे इंतज़ार रहेगा 
ओ वक्त के साथ या कहूँ अपने लिए नियम बदलते प्रभु…………… एक जटिल प्रश्न उत्तर की चाह में तुम्हारी बाट जोहता है


रविवार, 6 अक्टूबर 2013

जिसका शायद कहीं कोई उत्तर नहीं


वो जो शक्ति है 
वो जो धारती है 
वो जो जननी है 
जब उसी का शोषण होता है 
तब मेरा स्त्रीत्व रोता है 


दूसरी तरफ 

वो जो आस्था है 
वो जो श्रद्धा है 
वो जो विश्वास है 
जब वो आहत होता है 
तब मेरा अंतस रोता है 


सही गलत से परे 
एक सोच कसमसाती है 
कैसे एक मछली सारे तालाब को 
कलंकित करती है 
किस पर विश्वास करूँ 
किसे नमन करूँ 


आज जब चारों तरफ 
झूठ और सच 
चंद  सिक्कों में बिक जाते हैं 
कहीं झूठे लांछन लगाए जाते हैं 
तो कहीं सच हारता दीखता है 
कहीं कोई सिर्फ पैसे , पद , प्रतिष्ठा के लिए 
कौड़ियों में बिक जाता है 
और किसी का मान सम्मान आहत हो जाता है 
ऐसे विरोधाभासी माहौल में 
कौन सा इन्साफ का तराजू उठाऊँ 
कौन  सा जहाँगीरी घंटा बजा न्याय की गुहार करूँ 
जहाँ चहुँ ओर अराजकता अव्यवस्था का बोलबाला है 
जहाँ न्याय भी अपनी ही बेड़ियों में जकड़ा 
बेबस नज़र आता है 
और दिमागी तौर से परिपक्व को भी 
जो अवयस्कता के आवरण में निर्दोष पाता है 
ऐसे कश्मकाशी माहौल में 
किस आश्वासन पर उम्मीद का दीप जलाऊँ 
जहाँ झूठ और सच के बीच ना कोई फर्क दिखे 
जहाँ मेरे अन्दर की स्त्री 
छटपटाती तमाशबीन सी सिर धुनती है 
आखिर किस खोल में छुप गयी सभ्यता 
जो सच और झूठ के परदे ना खोल पाती है 


क्या सच क्या झूठ है 
जहाँ रोज गवाह भी मुकरते हों 
जहाँ रोज कुछ अवसरवादी 
सच को झूठ और झूठ को सच में बदलते हों 
ऐसे माहौल में 
मेरे अन्दर की स्त्री मुझसे ही उलझती है 
किसे मानूँ किसे ना मानूँ 
ना स्त्री का शोषण झुठला सकती हूँ 
ना आस्था की वेदी पर बलि होते 
विश्वास और श्रद्धा से आँख मिला पाती हूँ 
और सच और झूठ के हवन में होम होती 
अपने अन्दर की स्त्री से प्रश्न उठाती हूँ 

क्या श्रद्धा और विश्वास की कीमत यूं चुकाई जाती है 
क्या स्त्रीत्व के शोषण की जो तस्वीर सामने है 
उसका कोई दूसरा रुख तो नहीं 

विश्वास अन्धविश्वास की खाई में 
मेरी वेदना पड़ी कराहती है 
जिसका शायद कहीं कोई उत्तर नहीं , कहीं कोई उत्तर नहीं 


रविवार, 15 सितंबर 2013

एक सुखद आश्चर्य

''दिल की धड़कन हिंदुस्तान ब्लोगर सम्मान ''
विजेता -सुश्री वंदना गुप्ता

एक सुखद आश्चर्य मिला अभी नैट खोलते ही जाने कब मैने भेज दी याद भी नहीं प्रतियोगिता के लिये निम्न कविता जिसके लिये ये सम्मान मिला । शालिनी कौशिक जी की ह्रदय से आभारी हूँजो मुझे इस काबिल समझा। 51 शब्दों में अपने देश के लिये अपने भाव लिखकर भेजने थे " हम हिंदी चिट्ठाकार हैं " अभिव्यक्ति मंच पर आयोजित प्रतियोगिता में , जो इस प्रकार थे :

हिंदुस्तान
मेरी आन मेरी शान मेरी जान
कैसे करूँ तुम्हें प्रणाम
शस्य श्यामला रूप तुम्हारा
मन को लगता बहुत ही प्यारा
हर दिल में भरता उजास है
विश्व पटल पर छवि तुम्हारी
कितनी सुन्दर कितनी प्यारी
कीर्ति पताका फहराती रहे
हर वाणी शौर्यगाथा गाती रहे
दुनिया सर झुका गीत तेरे गाती रहे

वैसे इस लिंक पर जाकर सबकी रचनायें और सूचना पढी जा सकती है :
http://yeblogachchhalaga.blogspot.in/

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सोच का फर्क

अभी थोडी देर के लिये बैठ पायी तो सबसे पहली पोस्ट तेजेन्द्र शर्मा जी की वाल पर पढी तो वहाँ की सोच पर ये ख्याल उभर आये तो लिखे बिना नहीं रह पायी अब चाहे तबियत इजाज़त दे रही है या नहीं मगर हम जैसे लोग रुक नहीं पाते चाहे बच्चे डाँटें कि मम्मा रैस्ट कर लो अभी इस लायक नहीं हो मगर खुद से ही मज़बूर हैं हम …………तो ये ख्याल उभरा जो आपके सम्मुख है पश्चिमी सोच और हमारी सोच के फ़र्क को इंगित करने की कोशिश की है: 

ये था उनकी वाल पर जो नीचे लिखा है तो उस पर मेरे ख्याल कविता के रूप में उतर आये 


मित्रो

मेरे साथ हैच-एण्ड स्टेशन पर एक सहकर्मी हैं फ़िलिप पामर। उनसे बात हुई कि मुझे यू.पी. हिन्दी संस्थान द्वारा दो लाख रुपये का सम्मान दिया जा रहा है। 

उसने बहुत मासूम अन्दाज़ में पूछा, "Tej, in terms of real money, how much would it be." मैनें कल के रेट 1 पाउण्ड = 94 रुपये के हिसाब से बता दिया कि क़रीब क़रीब 2,240/- पाउण्ड बनेंगे। मन में कहीं एक टीस सी भी महसूस हुई कि भारत की करंसी Real Money नहीं है।

उसका जवाब था, "That is still a good amount."




सोच का फर्क 

कर जाता है फर्क 
तुम्हारे और मेरे नज़रिए में 
तुमने सिर्फ पैसे को सर्वोपरि माना 
तुम बेहद प्रैक्टिकल रहे 
बेशक होंगी कुछ संवेदनाएं 
तुम्हारे भी अन्दर महफूज़ 
किसी खिलते गुलाब की तरह 
मगर नहीं सहेजी होंगी तुमने कभी 
उसके मुरझाने के बाद भी 
यादों के तकियों में तह करके 
नहीं पलटे  होंगे तुमने कभी 
अतीत के पन्ने 
क्योंकि तुम हमेशा आज में जिए 
तुम्हारे लिए तुम महत्त्वपूर्ण रहे 
तुम्हारे लिए तुम्हारी प्राथमिकताएं ही 
तुम्हारा जीवन बनी 
जिन्होंने तुम्हें हमेशा उत्साहित रखा 
बस यही तो फर्क है 
तुम्हारी और मेरी सोच में 
मैं और मेरी संवेदनाएं 
सिर्फ कब्रगाह तक पहुँच कर ही दफ़न नहीं हुयीं 
जीवित रहीं फ़ना होने के बाद भी 
एक अरसा गुजरा 
मगर कभी अतीत से बाहर  न निकल पाया 
बेशक आज में जीता हूँ 
मगर 
अतीत को भी साथ लेकर चलता हूँ 
शायद तभी ज्यादा भावुक 
संवेदनशील कहलाता हूँ 
और जीवन के हर पथ पर मात भी खाता हूँ 
जो तुम्हारे लिए महज पैसे की तराजू में 
तोली जा सकने वाली वस्तु हो सकती है 
जिसका अस्तित्व महज चंद  सिक्के हो सकता है 
तुम्हारे लिए 
मेरे लिए मेरे जीवन भर  की उपासना का प्रतिफल है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का भेज शुभाशीष है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का प्रेम है वो 
किसी भी सम्मान को पाना और सहेजना 
गौरान्वित कर जाता है मन : मस्तिष्क को 
मगर तुम ये नहीं समझ सकते 
क्योंकि 
यही कमी कहो या फर्क है तुम्हारी और मेरी सोच में 
ओ पश्चिमी सभ्यता के वाहक मेरे सफ़र के साथी 
मैं भारतीय हूँ सबसे पहले 
जहाँ नहीं तोले जाते सम्मान सिक्कों के तराजू पर 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

फिर शोर में दरारें होंगी

फिर शोर में दरारें होंगी 
फिर मौसम में बहारें होंगी 
तू आवाज़ में सच का दम रख तो सही
फिर इंकलाब की पुकारें होंगी


वरना तो देश को खा जायेंगे 
ये गद्दार यूँ ही चबा जायेंगे 
देश के छलिये नेता नया कानून पारित कर 
एक बार फिर से छल जायेंगे

विधेयक जल्द पारित हो जायेंगे 
अपनी सहूलियतों के लिए कानून बन जायेंगे 
मगर दामिनियों के लिए जल्दी विधेयक 
नहीं बना करते 
ना ही उन्हें बिना आन्दोलनों के 
इन्साफ मिला करते 
ये तो खुद की खातिर बिगुल बजायेंगे 
कानून की भी सरे आम धज्जियाँ उड़ायेंगे 

आम जनता की सहूलियतों का क्यूं सोचें 
अपनी कुर्सी  की जडें क्यों न सींचें 
इसी कारण तो सत्ता में आते हैं 
फिर देश की नींव को ही खाते हैं 
यूं सफेदपोश देशभक्त हुक्मरान कहलाते हैं 
जो गलत को गलत और सही को सही न कह पाते हैं 
सिर्फ कुर्सियों के प्रति उनकी निष्ठां होती है 
बस वही तक उनकी अंधभक्ति होती है 

फिर संसद में दागियों मुजरिमों का बोलबाला होगा 
फिर तेरे सत्य का बार बार मूँह काला होगा 
तू एक बार हौसला रख आगे बढ तो सही 
गलत सही को पहचान तो सही 
अपने अधिकार का सदुपयोग कर तो सही 
फिर मौसम का रख जरूर बदला होगा


फिर तेरे मुख से यूं ही ना निकला होगा 
इन्कलाब जिंदाबाद इन्कलाब जिंदाबाद 
मेरा देश रहे हल पल आबाद , हर पल आबाद 

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जी चाहता है--------

जी चाहता है--------
दिल को तोड के लिख दूँ
कलम को मोड के लिख दूँ
फ़लक को  फ़ोड के लिख दूँ
जमीँ को निचोड के लिख दूँ

जी चाहता है-------------
दर्द को  घोल के पी लूँ
ज़हर को भी अमर कर दूँ
मोहब्बत को ज़हर कर दूँ
गंगा को उल्टा बहा दूँ

जी चाहता है------------
नकाबों को आग लगा दूँ
बुझता हर चिराग जला दूँ
रेत से चीन की दीवार चिनवा दूँ
ज़िन्दगी को मौत से जिता दूँ

जी चाहता है-------------
हर रोक को आज हटा दूँ
हर पंछी को उडना सिखा दूँ
रस्मों की हर रवायत मिटा दूँ
बेफ़िक्री का डंका बजा दूँ

जी चाहता है------------
ब्रह्माँड को उलट दूँ
ब्रह्मा की सृष्टि को पलट दूँ
पाप पुण्य का भेद मिटा दूँ
इंसान को देवता बना दूँ

जी चाहता है------------------
हर नियम कानून की नींव मिटा दूं
मौत को भी रास्ता भुला दूँ

अमीरी गरीबी का भेद मिटा दूँ
रिश्वतखोरों  की कौम मिटा दूँ
भ्रष्टाचारियों को फ़ांसी चढा दूँ

एक नया जहान बसा दूँ

मगर मनचाहा कब होता है?





( भ्रष्ट तंत्र से परेशान हर ह्रदय की व्यथा )

शनिवार, 27 जुलाई 2013

एक थिरकती आस की अंतिम अरदास


जो पंछी अठखेलियाँ किया करता था कभी 
मुझमें रिदम भरा करता था जो कभी 
बिना संगीत के नृत्य किया करता था कभी 
वो मोहब्बत का पंछी आज धराशायी पड़ा है 
जानते हो क्यों ?
क्योंकि ………तुम नहीं हो आस पास मेरे 
अरे नहीं नहीं ………ये मत सोचना 
कि शरीरों की मोहताज रही है हमारी मोहब्बत 
ना ना …………मोहब्बत की भी कुछ रस्में हुआ करती हैं 
उनमे से एक रस्म ये भी है ……क़ि तुम हो आस पास मेरे 
मेरे ख्यालों में , मेरी सोच में , मेरी साँसों में 
ताकि खुद को जिंदा देख सकूं मैं ………
मगर तुम अब कहीं नहीं रहे
ना सोच में , ना ख्याल में , ना साँसों के रिदम में 
मृतप्राय देह होती तो मिटटी समेट  भी ली जाती 
मगर यहाँ तो हर स्पंदन की जो आखिरी उम्मीद थी 
वो भी जाती रही…………….तुम्हारे न होने के अहसास भर से 
और अब ये जो मेरी रूह का जर्जर पिंजर है ना 
इसकी मिटटी में अब नहीं उगती मोहब्बत की फसल 
जिसमे कभी देवदार जिंदा रहा करते थे 
जिसमे कभी रजनीगंधा महका करते थे 
यूं ही नहीं दरवेशों ने सजदा किया था 
यूं ही नहीं फकीरों ने कलमा पढ़ा था 
यूं ही नहीं कोई औलिया किसी दरगाह पर झुका था 
कुछ तो था ना ……………क़ुछ तो जरूर था 
जो हमारे बीच से मिट गया 
और मैं अहिल्या सी शापित शिखा बन 
आस के चौबारे पर उम्र दर उम्र टहलती ही रही 
शायद कोई आसमानी फ़रिश्ता 
एक टुकड़ा मेरी किस्मत का लाकर फिर से 
गुलाब सा मेरे हाथों में रखे 
और मैं मांग लूं उसमे खुदा से ……तुम्हें 
और हो जाए कुछ इस तरह सजदा उसके दरबार में 
झुका  दूं सिर कुछ इस तरह कि फिर कहीं झुकाने की तलब न रहे 
उफ़ …………कितना कुछ कह गयी ना 
ये सोच के बेलगाम पंछी भी कितने मदमस्त होते हैं ना 
हाल-ए -दिल बयाँ करने में ज़रा भी गुरेज नहीं करते 
क्या ये भी मोहब्बत की ही कोई अनगढ़ी अनकही तस्वीर है …………जानाँ
जिसमे विरह के वृक्ष पर ही मोहब्बत का फूल खिला करता है 
या ये है मेरी दीवानगी जिसमे 
खुद को मिटाने की कोई हसरत फन उठाये डंसती रहती है 
और मोहब्बत हर बार दंश पर दंश सहकर भी जिंदा रहती है 
तुम्हारे होने ना होने के अहसास के बीच के अंतराल में 
एक नैया मैंने भी उतारी है सागर में 
देखें …उस पार पहुँचने पर तुम मिलोगे या नहीं 
बढाओगे या नहीं अपना हाथ मुझे अपने अंक में समेटने के लिए 
मुझमे मुझे जिंदा रखने के लिए 
क्योंकि …………जानते हो तुम 
तुम  , तुम्हारे होने का अहसास भर ही जिंदा रख सकते हैं मुझमे मुझे 

क्या मुमकिन है धराशायी सिपाही का युद्ध जीतना बिना हथियारों के 
क्योंकि 
उम्र के इस पड़ाव पर नहीं उमगती उमंगों की लहरें 
मगर मोहब्बत के बीज जरूर किसी मिटटी में बुवे होते हैं 

( एक थिरकती आस की अंतिम अरदास है ये ……जानाँ )