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शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सोच का फर्क

अभी थोडी देर के लिये बैठ पायी तो सबसे पहली पोस्ट तेजेन्द्र शर्मा जी की वाल पर पढी तो वहाँ की सोच पर ये ख्याल उभर आये तो लिखे बिना नहीं रह पायी अब चाहे तबियत इजाज़त दे रही है या नहीं मगर हम जैसे लोग रुक नहीं पाते चाहे बच्चे डाँटें कि मम्मा रैस्ट कर लो अभी इस लायक नहीं हो मगर खुद से ही मज़बूर हैं हम …………तो ये ख्याल उभरा जो आपके सम्मुख है पश्चिमी सोच और हमारी सोच के फ़र्क को इंगित करने की कोशिश की है: 

ये था उनकी वाल पर जो नीचे लिखा है तो उस पर मेरे ख्याल कविता के रूप में उतर आये 


मित्रो

मेरे साथ हैच-एण्ड स्टेशन पर एक सहकर्मी हैं फ़िलिप पामर। उनसे बात हुई कि मुझे यू.पी. हिन्दी संस्थान द्वारा दो लाख रुपये का सम्मान दिया जा रहा है। 

उसने बहुत मासूम अन्दाज़ में पूछा, "Tej, in terms of real money, how much would it be." मैनें कल के रेट 1 पाउण्ड = 94 रुपये के हिसाब से बता दिया कि क़रीब क़रीब 2,240/- पाउण्ड बनेंगे। मन में कहीं एक टीस सी भी महसूस हुई कि भारत की करंसी Real Money नहीं है।

उसका जवाब था, "That is still a good amount."




सोच का फर्क 

कर जाता है फर्क 
तुम्हारे और मेरे नज़रिए में 
तुमने सिर्फ पैसे को सर्वोपरि माना 
तुम बेहद प्रैक्टिकल रहे 
बेशक होंगी कुछ संवेदनाएं 
तुम्हारे भी अन्दर महफूज़ 
किसी खिलते गुलाब की तरह 
मगर नहीं सहेजी होंगी तुमने कभी 
उसके मुरझाने के बाद भी 
यादों के तकियों में तह करके 
नहीं पलटे  होंगे तुमने कभी 
अतीत के पन्ने 
क्योंकि तुम हमेशा आज में जिए 
तुम्हारे लिए तुम महत्त्वपूर्ण रहे 
तुम्हारे लिए तुम्हारी प्राथमिकताएं ही 
तुम्हारा जीवन बनी 
जिन्होंने तुम्हें हमेशा उत्साहित रखा 
बस यही तो फर्क है 
तुम्हारी और मेरी सोच में 
मैं और मेरी संवेदनाएं 
सिर्फ कब्रगाह तक पहुँच कर ही दफ़न नहीं हुयीं 
जीवित रहीं फ़ना होने के बाद भी 
एक अरसा गुजरा 
मगर कभी अतीत से बाहर  न निकल पाया 
बेशक आज में जीता हूँ 
मगर 
अतीत को भी साथ लेकर चलता हूँ 
शायद तभी ज्यादा भावुक 
संवेदनशील कहलाता हूँ 
और जीवन के हर पथ पर मात भी खाता हूँ 
जो तुम्हारे लिए महज पैसे की तराजू में 
तोली जा सकने वाली वस्तु हो सकती है 
जिसका अस्तित्व महज चंद  सिक्के हो सकता है 
तुम्हारे लिए 
मेरे लिए मेरे जीवन भर  की उपासना का प्रतिफल है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का भेज शुभाशीष है वो 
मेरे लिए मेरे अपनों का प्रेम है वो 
किसी भी सम्मान को पाना और सहेजना 
गौरान्वित कर जाता है मन : मस्तिष्क को 
मगर तुम ये नहीं समझ सकते 
क्योंकि 
यही कमी कहो या फर्क है तुम्हारी और मेरी सोच में 
ओ पश्चिमी सभ्यता के वाहक मेरे सफ़र के साथी 
मैं भारतीय हूँ सबसे पहले 
जहाँ नहीं तोले जाते सम्मान सिक्कों के तराजू पर 

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

फिर शोर में दरारें होंगी

फिर शोर में दरारें होंगी 
फिर मौसम में बहारें होंगी 
तू आवाज़ में सच का दम रख तो सही
फिर इंकलाब की पुकारें होंगी


वरना तो देश को खा जायेंगे 
ये गद्दार यूँ ही चबा जायेंगे 
देश के छलिये नेता नया कानून पारित कर 
एक बार फिर से छल जायेंगे

विधेयक जल्द पारित हो जायेंगे 
अपनी सहूलियतों के लिए कानून बन जायेंगे 
मगर दामिनियों के लिए जल्दी विधेयक 
नहीं बना करते 
ना ही उन्हें बिना आन्दोलनों के 
इन्साफ मिला करते 
ये तो खुद की खातिर बिगुल बजायेंगे 
कानून की भी सरे आम धज्जियाँ उड़ायेंगे 

आम जनता की सहूलियतों का क्यूं सोचें 
अपनी कुर्सी  की जडें क्यों न सींचें 
इसी कारण तो सत्ता में आते हैं 
फिर देश की नींव को ही खाते हैं 
यूं सफेदपोश देशभक्त हुक्मरान कहलाते हैं 
जो गलत को गलत और सही को सही न कह पाते हैं 
सिर्फ कुर्सियों के प्रति उनकी निष्ठां होती है 
बस वही तक उनकी अंधभक्ति होती है 

फिर संसद में दागियों मुजरिमों का बोलबाला होगा 
फिर तेरे सत्य का बार बार मूँह काला होगा 
तू एक बार हौसला रख आगे बढ तो सही 
गलत सही को पहचान तो सही 
अपने अधिकार का सदुपयोग कर तो सही 
फिर मौसम का रख जरूर बदला होगा


फिर तेरे मुख से यूं ही ना निकला होगा 
इन्कलाब जिंदाबाद इन्कलाब जिंदाबाद 
मेरा देश रहे हल पल आबाद , हर पल आबाद 

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जी चाहता है--------

जी चाहता है--------
दिल को तोड के लिख दूँ
कलम को मोड के लिख दूँ
फ़लक को  फ़ोड के लिख दूँ
जमीँ को निचोड के लिख दूँ

जी चाहता है-------------
दर्द को  घोल के पी लूँ
ज़हर को भी अमर कर दूँ
मोहब्बत को ज़हर कर दूँ
गंगा को उल्टा बहा दूँ

जी चाहता है------------
नकाबों को आग लगा दूँ
बुझता हर चिराग जला दूँ
रेत से चीन की दीवार चिनवा दूँ
ज़िन्दगी को मौत से जिता दूँ

जी चाहता है-------------
हर रोक को आज हटा दूँ
हर पंछी को उडना सिखा दूँ
रस्मों की हर रवायत मिटा दूँ
बेफ़िक्री का डंका बजा दूँ

जी चाहता है------------
ब्रह्माँड को उलट दूँ
ब्रह्मा की सृष्टि को पलट दूँ
पाप पुण्य का भेद मिटा दूँ
इंसान को देवता बना दूँ

जी चाहता है------------------
हर नियम कानून की नींव मिटा दूं
मौत को भी रास्ता भुला दूँ

अमीरी गरीबी का भेद मिटा दूँ
रिश्वतखोरों  की कौम मिटा दूँ
भ्रष्टाचारियों को फ़ांसी चढा दूँ

एक नया जहान बसा दूँ

मगर मनचाहा कब होता है?





( भ्रष्ट तंत्र से परेशान हर ह्रदय की व्यथा )

शनिवार, 27 जुलाई 2013

एक थिरकती आस की अंतिम अरदास


जो पंछी अठखेलियाँ किया करता था कभी 
मुझमें रिदम भरा करता था जो कभी 
बिना संगीत के नृत्य किया करता था कभी 
वो मोहब्बत का पंछी आज धराशायी पड़ा है 
जानते हो क्यों ?
क्योंकि ………तुम नहीं हो आस पास मेरे 
अरे नहीं नहीं ………ये मत सोचना 
कि शरीरों की मोहताज रही है हमारी मोहब्बत 
ना ना …………मोहब्बत की भी कुछ रस्में हुआ करती हैं 
उनमे से एक रस्म ये भी है ……क़ि तुम हो आस पास मेरे 
मेरे ख्यालों में , मेरी सोच में , मेरी साँसों में 
ताकि खुद को जिंदा देख सकूं मैं ………
मगर तुम अब कहीं नहीं रहे
ना सोच में , ना ख्याल में , ना साँसों के रिदम में 
मृतप्राय देह होती तो मिटटी समेट  भी ली जाती 
मगर यहाँ तो हर स्पंदन की जो आखिरी उम्मीद थी 
वो भी जाती रही…………….तुम्हारे न होने के अहसास भर से 
और अब ये जो मेरी रूह का जर्जर पिंजर है ना 
इसकी मिटटी में अब नहीं उगती मोहब्बत की फसल 
जिसमे कभी देवदार जिंदा रहा करते थे 
जिसमे कभी रजनीगंधा महका करते थे 
यूं ही नहीं दरवेशों ने सजदा किया था 
यूं ही नहीं फकीरों ने कलमा पढ़ा था 
यूं ही नहीं कोई औलिया किसी दरगाह पर झुका था 
कुछ तो था ना ……………क़ुछ तो जरूर था 
जो हमारे बीच से मिट गया 
और मैं अहिल्या सी शापित शिखा बन 
आस के चौबारे पर उम्र दर उम्र टहलती ही रही 
शायद कोई आसमानी फ़रिश्ता 
एक टुकड़ा मेरी किस्मत का लाकर फिर से 
गुलाब सा मेरे हाथों में रखे 
और मैं मांग लूं उसमे खुदा से ……तुम्हें 
और हो जाए कुछ इस तरह सजदा उसके दरबार में 
झुका  दूं सिर कुछ इस तरह कि फिर कहीं झुकाने की तलब न रहे 
उफ़ …………कितना कुछ कह गयी ना 
ये सोच के बेलगाम पंछी भी कितने मदमस्त होते हैं ना 
हाल-ए -दिल बयाँ करने में ज़रा भी गुरेज नहीं करते 
क्या ये भी मोहब्बत की ही कोई अनगढ़ी अनकही तस्वीर है …………जानाँ
जिसमे विरह के वृक्ष पर ही मोहब्बत का फूल खिला करता है 
या ये है मेरी दीवानगी जिसमे 
खुद को मिटाने की कोई हसरत फन उठाये डंसती रहती है 
और मोहब्बत हर बार दंश पर दंश सहकर भी जिंदा रहती है 
तुम्हारे होने ना होने के अहसास के बीच के अंतराल में 
एक नैया मैंने भी उतारी है सागर में 
देखें …उस पार पहुँचने पर तुम मिलोगे या नहीं 
बढाओगे या नहीं अपना हाथ मुझे अपने अंक में समेटने के लिए 
मुझमे मुझे जिंदा रखने के लिए 
क्योंकि …………जानते हो तुम 
तुम  , तुम्हारे होने का अहसास भर ही जिंदा रख सकते हैं मुझमे मुझे 

क्या मुमकिन है धराशायी सिपाही का युद्ध जीतना बिना हथियारों के 
क्योंकि 
उम्र के इस पड़ाव पर नहीं उमगती उमंगों की लहरें 
मगर मोहब्बत के बीज जरूर किसी मिटटी में बुवे होते हैं 

( एक थिरकती आस की अंतिम अरदास है ये ……जानाँ )

बुधवार, 24 जुलाई 2013

ओ मेरे !.......10

आँख में उगे कैक्टस के जंगल में छटपटाती चीख का लहुलुहान अस्तित्व कब हमदर्दियों का मोहताज हुआ है फिर चाहे धुंधलका बढता रहा और तुम फ़ासलों से गुजरते रहे ……ना देख पाने की ज़िद पर अडी इन आँखों का शगल ही कुछ अलग है …………नहीं , नहीं देखना ………मोहब्बत को कब देखने के लिये आँखों की लालटेन की जरूरत हुयी है …………बस फ़ासलों से गुजरने की तुम्हारी अदा पर उम्र तमाम की है तो क्या हुआ जो तुम्हें मैं नज़र ना आयी , तो क्या हुआ जो तुम्हारे कदमों में ना इस तरफ़ मुडने की हरकत हुयी ………इश्क के अंदाज़ जुदा होते हैं फ़ासलों में भी मोहब्बत के खम होते हैं ………जानाँ !!! 

अब मुस्कुराती हूँ मैं अपने जीने के अन्दाज़ पर ………फिर क्या जरूरत है रेगिस्तान में भटकने की …………कैक्टस के फ़ूल यूँ ही नहीं सहेजे जाते …………उम्र फ़ना करनी पडती है धडकनो का श्रृंगार बनने को…………और मैंने तो खोज लिया है अपना हिमालय …………क्या तुम खोज सकोगे कभी मुझमें , मुझसा कुछ ………यह एक प्रश्न है तुमसे ओ मेरे !

शनिवार, 20 जुलाई 2013

" बाइपास "............मेरा दृष्टिकोण


आयकर एवं वैट अधिवक्ता मलिक राजकुमार जी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम हैं । कितने ही कहानी संग्रह, कविता संग्रह उपन्यास , यात्रा वर्णन आदि उनके छप चुके हैं। इसके अलावा कविता , गज़ल संग्रह आदि का संपादन भी कर चुके हैं साथ में उनकी किताबों पर लघु शोध  भी हो चुके हैं कुछ पर पीएच डी भी हुई है।  इसके अलावा दूरदर्शन रेडियो आदि पर कहानी वार्ता कविता आदि प्रसारित होती रही हैं पंजाबी , ब्रज आदि भाषाओं में । ऐसे व्यक्तित्व के धनी ने मुझे अपना उपन्यास स्वंय भिजवाकर अनुगृहित किया ।

मलिक राजकुमार का उपन्यास बाइपास पढ़ा जो राजकुमार जी ने सस्नेह मुझे भिजवाया . ईश्वर का करम रहा कि उपन्यास पढने के लिए बहुत ज्यादा बिजी होते हुए भी वक्त मिलता रहा और किश्तों में पढ़ती रही . कभी इतना वक्त हुआ करता था कि दो घंटे में मोटे से मोटा उपन्यास पढ लिया करती थी मगर अब वक्त की कमी से किश्तों में गुजरती है ज़िन्दगी।

इस उपन्यास की खासियत ये है कि इसमें उस ज़िन्दगी का चित्र खींचा गया है जिसकी तरफ हम देखते तो हैं मगर कभी सोचते नहीं . एक अजीब सा कसैलापन अपने अंतस में समेटे हम  उन चरित्रों से रु-ब -रु तो होते हैं मगर वो कैसे ऐसे बनते हैं , कैसे उनकी सोच , उनके व्यवहार और बातचीत में एक कडवाहट शामिल हो जाती है हम कभी उस तरफ देख नहीं पाते क्योंकि हमारी दृष्टि सिर्फ हम तक ही सीमित रहती है मगर राजकुमार जी की दृष्टि ने उन चरित्रों के जीवन के उन भेदों पर निशाना लगाया है जो तभी किया जा सकता है जब इंसान या तो खुद उन हालात से गुजरा हो या उसने उन हालातों को बहुत करीब से देखा या सुना हो . अब ये तो वो ही जाने कि कैसे उन्होंने प्रत्येक चरित्र को आत्मसात किया और इतना अद्भुत चित्रण किया . 

बाइपास वो जगह होती है जहाँ से न जाने कितनी जिंदगियां रोज गुजरती हैं किसी न किसी रूप में मगर बाइपास वहीँ रहता है कुछ इसी तरह इन्सान के जीवन में भी एक बाइपास होता है जिससे वो अपने अन्दर की उथल पुथल से गुजरता है मगर बाइपास पर उड़ने वाली धुल को खुद पर हावी नहीं होने देता न ही अपने चरित्र पर दाग लगने देता . 

बाइपास एक ऐसी जगह है जहाँ ट्रक वालों की ज़िन्दगी है तो कहीं ढाबे वालों का संघर्ष तो कहीं बचपन को लांघ सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करते साइकिल के पंक्चर लगाने वालों की आँख में उभरी शाम की रोटी के लिए लडती ज़िन्दगी की दास्ताँ है और इसी में कुमार नाम के शख्श की जद्दोजहद जो ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर जीना चाहता है और जीता भी है अपने नियमों और शर्तों पर , किसी प्रकार का समझौता किये बगैर . न ज़िन्दगी से समझौता न समाज से न अपने उसूलों से जो आसान नहीं था क्योंकि जहाँ पूरा तालाब ही कीचड़ से भरा हो वहां कैसे  छींटों से बचा  जा सकता है मगर कुमार ने अपनी दृढ इच्छा शक्ति के बलबूते पर ना केवल ये कर दिखाया बल्कि वहाँ के लोगों के जीवन को भी बदला और समाज के कल्याण के लिये भी लाभकारी योजनाओं को कार्यान्वित किया बेशक अपना फ़ायदा उसका भी था मगर उसका उसने दुरुपयोग नहीं किया जो ये दर्शाता है कि यदि इंसान एक बार हिम्मत कर ले तो अपने चरित्र से समझौता ना करते हुये भी जीवन को सही दिशा में क्रियान्वित करते हुये एक सफ़ल जीवन जी सकता है । बेशक समाज की विभिन्न विडम्बनायें साथ साथ चलती रहीं और लेखक उन पर भी दृष्टिपात करता रहा और कुमार का उन पर प्रहार भी होता रहा मगर पूरे समाज को बदलना आसान नहीं इसलिये कुमार को भी कभी कभी चुप लगाना पडा मगर फिर भी अपने विचारों से बदलाव लाने का उस का प्रयास जारी रहा ।

लेखक का ये प्रयास बेहद सराहनीय है कि उसने समाज के उस अंग की ओर ध्यान दिलाया जिस तरफ़ हम देखना भी नहीं चाहते कि कैसे ज़िन्दगी समझौतों की नाव पर गुजरती है बिना किसी पतवार के । जहाँ दिन रात एक समान होते हैं और पेट की भूख हर समझौते को विवश कर देती है मगर उसमें भी कुछ चरित्र ज़िन्दादिली बरकरार रखते हैं क्योंकि जीवन है तो उसमें संघर्ष भी है और समझौते भी और उनके साथ जीने की जद्दोजहद भी …………बस इसी का नाम तो है बाइपास।
 नटराज प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ये उपन्यास यदि आप पढना चाहते हैं तो मलिक राजकुमार जी से इन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं 

M: 09810116001

     011-25260049

बुधवार, 17 जुलाई 2013

खोये हैं हम ना जाने किस जहान में

खोये हैं हम ना जाने किस जहान में 
आये कोई आवाज़ दे बुला ले उस जहान से



यूँ तो वापसी की डगर कोई नहीं 
बस उम्मीद के तारे पे रुकी है ज़िन्दगी
कतरनों को सीने की जद्दोजहद में 
आवाज़ के घुँघरुओं में बसी है ज़िन्दगी

चिलमनों के उस तरफ जो शोर था 
दिल में मेरे भी तो कुछ और था 
करवट बदलने से पहले कोई दे आवाज़ पुकार ले 
बस इसी आरज़ू की शाख से लिपटी खड़ी है ज़िन्दगी 

यूं तो जीने के बहाने और भी थे 
मेरे गम के सहारे और भी थे 
बस खुद को मुबारक देने की चाहत में 
उस पार की आवाज़ को तड़प रही है ज़िन्दगी 


खोये हैं हम ना जाने किस जहान में 
आये कोई आवाज़ दे बुला ले उस जहान से

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत

याद है तुम्हें
वो पहला मिलन
जब हम
इक राह पर
इक मोड पर
अचानक मिले थे
और तुमने कहा था
तुम कौन हो?
तुम्हे देखकर
यूँ लगा
जैसे जन्मो की
तलाश को मुकाम
मिल गया हो
बताओ ना
कौन हो तुम?
तुम्हे तो मै
रोज अपने
ख्यालों मे
देखा करता था
कैसे आज
सपना साकार
हो गया
कैसे तुमने
आकार पा लिया
क्या मेरी खातिर?
और मै
सिर्फ़ तुम्हे
सुनती ही रही
और सोचती रही
ये कौन है अजनबी
कैसे इतना बेबाक
हो गया
कैसे इसका वजूद
मुझमे खो गया
और फिर हम
बिना हाथो मे हाथ डाले
निकल पडे अन्जाने सफ़र पर
बिना कोई वादा किये
बिना मोहब्बत का
इज़हार किये
बिना किसी आस के
सिर्फ़ एक विश्वास के साथ
हाँ ……कोई है इस जहाँ मे
जिसके सीने मे
मोम पिघलता है
है ना………कुछ ऐसा ही
क्योंकि बिन लफ़्ज़ों की मोहब्बत के घूंट का स्वाद 

उम्र भर के लिये जुबाँ  पर रुक जाता है 
की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत 
मगर नमकीन मोहब्बत के स्वाद ज़ेहन की धरोहर होते हैं
कहो ना…………ये है हमारी पहली मोहब्बत 
पहले मिलन की याद ……जिसमे कभी इतवार नही होते

बुधवार, 10 जुलाई 2013

ओ मेरे !.............9

रिदम वाद्य यंत्रों में कब होती है ............बिना साधे तो स्वर उसमे भी नहीं फूटा करते ............कसना पड़ता ही है तारों को , खींचनी पड़ती है नकेल तभी सप्त सुर एक संगीत की लड़ी में पिर जाते हैं ..........बस यूं ही ............तुम्हारा प्रेम है जिसे साधती हूँ मैं ..........अपनी साँसों की लड़ियों में , ह्रदय  के कम्पन में , धडकनों की झंकार में ............तब कहीं जाकर कभी कभी एक गीत झड़ता है तुम्हारी शुष्क प्रियता की शाख से ............और उसी में जीने की कोशिश करती हूँ मैं " पूरा एक  जीवन "............वरना  तो पीले पत्ते मूंह चिढाते रोज झड़ते हैं संवेदनहीन होकर और मैं समेट  लेती हूँ आँचल में उनका पीलापन ..........ना जाने कौन सी नीम की निम्बोली दाब रखी है तुमने दाढ़ के नीचे ...........कसैलापन जाता ही नहीं और मैं आदी  हो चुकी हूँ अब ...........तुम्हारे कसैलेपन की ......जानाँ !!!!!!!!

नमक ज़ख्म पर छिडकने से भी अब तो राहत मिलती है इसलिए गर्म करके चिमटे का सेंक दे देती हूँ कभी कभी ..........दर्द की बयारें कहीं बंद न हो जाएँ और मेरा जीना कहीं दुश्वार न हो जाए ...........आखिर आदत भी कोई चीज होती है ना ............सुनो ! तुमने भी क्या कभी ऐसी कोई आदत पाली है , जी सकते हो मेरी तरह ...........लबों पर मुस्कान धरे , ज़िन्दगी से भरपूर होकर ...............मगर दिल की जगह उसकी राख भी न बची हो ...............एक अंधकूप में रहकर रौशनी से बचकर ...............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ओ मेरे !……………8

दर्द कभी हुआ ही नहीं ..............हा हा हा ............सोच रहे होंगे फिर ये समंदर कैसे बना ............अरे जानां !!! कुछ फसलों को उगाने के लिए प्रेम का बीज रोंपा जाता है जिसमे से हरी हरी  कोंपलें जब फूटा करती हैं विरह की तब जाकर दर्द का जन्म हुआ करता है और दर्द को पैदा करने के लिए मौत से इश्क किया करती हूँ .............इसलिए दर्द होता नहीं है पैदा किया जाता है ........खुद की आहुति देकर , अपनी रूह को नोंच खसोट कर बीजना पड़ता है उसमे इश्क का कीला ........उम्र भर के लिए , एक जन्म के लिए नहीं ..............इस कायनात के आखिरी छोर तक के लिए ...............तब जाकर दर्द की खिलखिलाती , लहलहाती पैदावार होती है जो उम्र की चाशनी में डूबा डूबा कर , तीखी लहर बन लहू में दौड़ा करती है और इश्क की कहानी मुकम्मल होती है ..........जानां !!!

किसान हूँ ना किसना फिर भी बिना खेती के उपकरणों के पैदावार करना और बिना अधरों पर वंशी धरे खुद को सम्मोहित करने का हुनर जान गयी हूँ ........... रिस रिस कर तपती पटरी पर ज़िन्दगी की रेल धडधडाती गुजर रही है बिना आंच ताप को महसूस किये और मोहब्बत के जश्न भी मना रही है सिगार सी सुलग सुलग कर ...........क्या कभी मेरे साथ एक कश तुम भी लेने आओगे ........क्या कभी तुम कटौथी में गंगाजल भर एक घूँट भरोगे और करोगे इश्क का समंदर पार .............मेरी तरह !!!!!ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

गुरुवार, 27 जून 2013

ओ मेरे !...........7

बारातें तो बहुत देखी होंगी ............सूरतें भी बहुत गुजरी होंगी निगाहों से ..........मगर क्या देख पाए वो पुरनम नमी चेहरे की खिलखिलाहट में , जुल्फों की कसमसाहट में , आँखों की शरारत में , लबों की हरारत में .............नहीं देख पाए होंगे ...........जानती हूँ .............क्योंकि आँखें तो कब से मेरी आँखों में बसी हैं , दिल एक मुद्दत हुयी मेरे दिल में धड़कता है ...........तुम्हारे पास बचा क्या है तुम्हारा बताओ तो ज़रा ............सिवाय मेरे ! फिर भी  क्यों कोशिश करते हो जीने की .........मेरे बगैर , समझ नहीं पायी आज तक तुम्हारी मुफलिसी का दंश .............और वो जो मुस्कराहट का लिबास ओढ़े तुम्हारी ज़र्द निगाहें जब भेदती हैं आकाश हो ............ना जाने कैसे हवाएं डाल देती हैं पर्दा रुखसारों पर और मैं खोजती हूँ फिर तुम्हारे ना होने में होने को ............उठाती हूँ मिटटी तुम्हारे दफनायें वजूद से ...........उसी वजूद से जो है मगर जिस पर तुमने रात की कालिख मल दी है ...........और करती हूँ उसका अन्वेषण .......मेरे खोजी कुत्ते दौड़ते हैं तुम्हारी रूह के कब्रिस्तान मे बेधड़क ...........जानने को तुम्हारी ज़मींदोज़ सभ्यताओं को ..........शायद कहीं मिल जाए कोई शहादत की निशानी और मैं बन जाऊं मुकम्मल ग़ज़ल तुम्हारी आँखों में ठहरी ख़ामोशी की ............जानां !!!

इश्क की बारातों के दूल्हे तो सदा अंगारों पर चला करते हैं ..........घोड़ी चढ़ना उनका नसीब नहीं हुआ करता ............और दुल्हनें सदा सुहागिन ही रहती हैं उम्र भर बिना सात फेरों की रस्मों को निभाए ..............और देख एक मुद्दत हुयी ..............मेरे इश्क की दुल्हन ने घूंघट नहीं खोला है सिर्फ और सिर्फ तेरे इंतज़ार में ............कि  तुम एक दिन खुद उठाओगे घूंघट ..........क्या करोगे मुझे मुकम्मल मेरी मज़ार पर आरती का दीप जलाकर .........मेरी तरह  क्योंकि एक मुद्दत हुयी मेरी आरती का दीप बुझा नहीं है अब तक ...........तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

सोमवार, 24 जून 2013

ओ मेरे !............6

साहेबा ! इश्क की डली मूंह में रखी है मैंने ............ और कुनैन से कुल्ला किया है ...........खालिस मोहब्बत यूं ही नहीं हुआ करती ...........एक डोरी सूरज की तपिश की लेनी पड़ती है और एक डोरी रूह की सुलगती लकड़ी की ...फिर गूंथती हूँ चोटी अपने बालों के साथ लपेटकर ...........लपटें रोम रोम से फूटा करती हैं और देख आज तक जली ही नहीं मेरी ख्वाहिशें , तुझे चाहते रहने की कोशिशें , तुझ पर जाँ निसार करने की चाहतें ..........एक एक मनका प्रीत का पिरोया है ना मैंने जो सूत काता था कच्चे तारों का और कंठी बना गले में बाँध लिया है ........... सुना है इस कंठी को देख फ़रिश्ते भी सजदे किया करते है , सजायाफ्ता  रूहें भी सुकून पाया करती हैं ...........जानते हो क्यों ? क्योंकि इसमें तेरा नाम लिखा है ..............जानां !!!

सिन्दूर , पाजेब , बिंदिया , मंगलसूत्र कुछ नहीं चाहिए मुझे ..........ये ढकोसलों भरे रिवाज़ मेरी रूह की थाती नहीं ..........तुम जानते हो ............बस प्रेम की कंठी जो मैंने बाँधी है ...........क्या किसी जन्म में , किसी पनघट के नीचे , किसी पीपल की छाँव में , किसी चाहत की मुंडेर पर ...........आओगे तुम मुझमे से खुद को ढूँढने .........मेरी आवाज़ को , मेरी इबादत को मुकम्मल करने ...............ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

बुधवार, 19 जून 2013

पल पल सुलग रही है इक चिता सी मुझमें

पल पल सुलग रही है इक चिता सी मुझमें ………मगर किसकी ………खोज में हूँ 
पल पल बदल रहा है इक दृश्य सा मुझमें …………मगर कैसा …………खोज में हूँ 
पल पल बरस रहा है इक सावन सा मुझमें ………मगर कौन सा ………खोज में हूँ 

बुद्धिजीवी नहीं जो गणित के सूत्र लगाऊँ 
अन्वेषक नहीं जो अन्वेषण करूँ 
प्रेमी नहीं जो ह्रदय तरंगों पर भावों को प्रेषित करूँ 

और खोज लूं दिग्भ्रमित दिशाओं के पदचिन्ह 
इसलिए 
सुलग रही है इक चिता मुझमे जिसके 
हर दृश्य में बरसते सावन की झड़ी 
कहती है कुछ मुझसे ...........मगर क्या ..........खोज में हूँ 

और खोज के लिये नहीं मिल रहा द्वार 
जो प्रवेश कर जाऊँ अंत: पुर में और थाह पा जाऊँ 
सुलगती चिता की , बदलते दृश्य की , बरसते सावन की 

सोमवार, 17 जून 2013

" ज़िन्दगी के पन्ने " …………मेरी नज़र से



इस बार के पुस्तक मेले में इतने स्नेह और सम्मान से पवन अरोडा जी ने अपनी पुस्तक ना केवल भेंट की बल्कि उसके विमोचन का भी हमें हिस्सा बनाया और मैं अपनी मसरूफ़ियतों के चलते पढ नहीं पायी और जब पढ ली तो उसके बाद उस पर लिखे बिना कैसे रह सकती थी सो आज सब काम छोड कर सबसे पहला ये ही काम किया ।

ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित पवन अरोड़ा की " ज़िन्दगी के पन्ने " वास्तव में ज़िन्दगी की एक सीधी  सरल दास्ताँ है जिससे हम सब कहीं न कहीं गुजरते हैं .जहाँ कवि मन ज़िन्दगी को सूक्ष्म दृष्टि से विवेचित करता है और यही कवि  की दृष्टि होती है जो भेदों  को अभेद्ती है जो साधारण में से असाधारण को खोजती है और व्याख्यातित करती है फिर ज़िन्दगी तो है ही ऐसी शय जिसे जितना खोजो जितना चाहो जितना विश्लेषण करो अबूझी  ही लगती है .

"आस्था " कैसे जीवन के संग बढ़ी चलती है की हम सही गलत सोचते ही नहीं बस लकीर के फ़क़ीर बने दौड़ते हैं आँख पर अविवेक की पट्टी बांधे  . आस्था की डोर में बढे एक जिंदगी जी कर कब निकल जाते हैं और जान  ही नहीं पाते  आखिर जीवन है क्या और उसका मकसद क्या है . 

"नरक धाम " जीवन की वो सच्चाई है जो इंगित करती है कई  स्वर्ग और नरक की अवधारणा को जो हर इंसान चाहता ही की उसे स्वर्ग मिले जबकि ये एक सत्य है जिसे भी स्वर्ग मिला उसे फिर जन्म लेना पड़ा और दुनिया में आकर वो दुःख दर्द झेलना पड़ा जो किसी नरक से कम नहीं फिर क्या फायदा नरक धरती पर हो या आसमान में रहना तो नरक में ही है .
" धर्मयुद्ध " के माध्यम से इंसान की वृत्ति पर कटाक्ष किया है . 
धर्म के नाम पर आज खोली दूकान
जहाँ उगलता साँपों जैसी 
खुद को कहता 
भगवान या कैसा आज का इंसान 
एक ऐसी सच्चाई जिसमें फंसकर इंसान क्या कुछ नहीं गँवा देता और हाथ कुछ नहीं आता .

" कौन मैं " खुद को खोजता हर अस्तित्व जिसमें कोई साथ नहीं न दोस्त न माँ , , बाप भाई बहन कोई नहीं एक ऐसी सोच जिसने पा लिया उसे कुछ खोजना बाकी न रहा .

"सवाल उठते हैं मन मैं " हर मन की पीड़ा का अवलोकन है और कुछ प्रश्न हमेशा अनुत्तरित ही रहते हैं या वो कर्मों और भाग्य का लेख बन मूक रह जाते हैं . 
इंसानियत का हो रहा कत्लेआम 
ऐसे न लगवाओ इसके दाम 
कभी तूने भी 
सोचा क्या होगा उस माँ का हाल 
जिसने जिगर का टुकड़ा खो दिया अपना लाल 

"रिश्ते" में रिश्तों के सिमटते आकाश को बखूबी उकेरा है . आज के युग में जब एक दो बच्चे ही हो रहे हैं तो कैसे जान पायेगे वो कोई दूसरा रिश्ता भी होता है और फिर अकेले ही गिने चुने रिश्तों को सहेजना है और न सहेज पाने की स्थिति में गलत कदम उठाना कितना दुरूह होता है उसका आकलन किया है .

" आँखों की भाषा " में चंद  शब्दों में पूरा प्रेम का फलसफा गढ़ दिया .

" आओ कहीं आग लगायें " एक कटाक्ष है आज की राजनीती पर कैसे सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए जनता का दोहन किया जाता है .

 " आज फिर गूँज उठी आवाज़ " मौत एक शाश्वत सत्य है कि ओर  इंगित करती रचना बताती है चाहे कुछ कर लो मगर मौत ने तो आना ही आना है .

" एक इंतज़ार " में एक पिता की भावनायें कैसे बेटी के लिए उमगती हैं उसका खूबसूरत चित्रण है .

" माटी का यह " के माध्यम से ज़िन्दगी की हकीकत बताई है कि ये शरीर मिटटी है और एक दिन मिटटी में ही मिल जाना है बस इसे समझना जरूरी है .

" नेता रुपी नाग " के माध्यम से नेताओं की सोच को परिलक्षित किया है कि वो तुम्हें डँस ले उससे पहले जाग जाओ और सही कदम उठाओ .

ये तो सिर्फ कुछ रचनायें ही मैंने समेटी हैं बाकि पूरे काव्य संग्रह में हर कविता में ज़िन्दगी के हर पहलू को समेटने की कोशिश की है . सीधी सरल भाषा में हर पहलू को छूना और उसे व्यक्त करना ताकि मन की बात सब तक पहुँच सके यही पवन अरोड़ा की खासियत है. हर लम्हा लम्हा ज़िन्दगी को खोजने को प्रयासरत पवन अरोड़ा ने काफी रचनायें ज़िन्दगी पर ही लिखी हैं जैसे खोज रहे हों ज़िन्दगी के गर्भ में छुपी हकीकतें और वो मिलकर भी अधूरी हसरत सी तडपा रही हों .


पवन अरोड़ा से आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं 
M: 09999677033

ज्योतिपर्व प्रकाशन  
99,ज्ञान खंड  --- 3 , इन्दिरपुरम
 गाज़ियाबाद -------- 201012

मोबाइल  : 9811721147

शनिवार, 15 जून 2013

हसरतों के लकड़बग्गे ..........

मेरी नीम बेहोशी में 
बडबडाती आवाज़ का 
शब्द बने तुम 
और उतर गए 
ग्लूकोज की बोतल में 
चेतना को जागृत करते हुये
बूँद बूँद शिराओं में 
गूंजता तुम्हारा संगीत 
आत्मा को जिला रहा था 
सांसों को ठहरा रहा था 
एक अदृश्य हाथ 
चमत्कृत सा 
माथे को सहला रहा था 
जीवन तंतु बिखराव से 
जुड़ाव की ओर जा रहा था 
सम्मोहन का 
विष बाण  तारी  था 
और एक ही झटके में 
सांस की माला बिखर गयी 
सम्मोहन टूट गया 
जब धारा  का प्रवाह उल्टा हो गया 
जब ग्लूकोज की खाली बोतल 
लहू के कतरे कतरे से भर गयी 
सिर्फ सूईं गड़ी रह गयी जिस्म में 
और मेरी बेहोशी टूट गयी 

अब जीने को या कहो हंसने को 
मजबूर हैं 
हसरतों के लकड़बग्गे ..........

बुधवार, 12 जून 2013

ओ मेरे !.............5

कभी कभी जरूरत होती है किसी अपने द्वारा सहलाये जाने की ............मगर हम, उसी वक्त ,ना जाने क्यूँ ,सबसे ज्यादा तन्हा होते है..........ज़िन्दगी के पडावों में एक पडाव ये भी हुआ करता है शायद 
या तन्हाइयों की चोटों में आवाज़ नहीं हुआ करती शायद ............कुछ मौसम कितना ही भीगें , हरे हुआ ही नहीं करते शायद ………जरूरी तो नहीं ना सावन बारहों माह बरसे और रीती गागर भरे ही …………जानाँ !!! 

इश्क के मट्ठे खट्टे ही हुआ करते हैं और मैने सिर्फ़ उसी को पीया है जन्मों से ………जानते हो ना जबसे बिछडे हम …………मैने स्वाद बदला ही नहीं ………फिर तुमने कैसे स्वाद बदल लिया ..........ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

शनिवार, 8 जून 2013

मैं नहीं जानती अपने अन्दर की उस लडकी को

आज के दिन अपने लिये शायद यही उपयुक्त है :

मैं नहीं जानती
अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो आहटों के गुलाब उगाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो काफ़ी के कबाब बनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो मोहब्बत के सीने पर जलता चाँद उगाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो तुम्हारे ना होने पर तुम्हारा होना दिखाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो कांच की पारदर्शिता पर सुनहरी धूप दिखाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो चटक खिले रंगों से विरह के गीत बनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो सांझ के पाँव में भोर का तारा पहनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो प्रेम में इंतिहायी डूबकर खुद प्रेमी हो जाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो खुद को मिटाकर रोज अलाव जलाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो जलते सूरज की पीठ पर बासी रोटी बनाया करती है

नहीं जानती

नहीं जानती
नहीं जानती
सुना है तीन बार जो कह दिया जाये
वो अटल सत्य गिना जाता है ………क्या सच में नहीं जानती ?
मानोगे मेरी इस बात को सच?
हो सके तो बताना ………ओ मेरे अल्हड स्वप्न सलोने 

जो आज भी 
ख्वाबों में अंगडाइयाँ लिया करता है बिना किसी ज़ुम्बिश के !!!
तारों में सज के अपने प्रीतम से देखो धरती चली मिलने …………गुनगुनाने को जी चाहता है मेरे अन्दर की लडकी का
अब ये तुम पर है …………किसे सच मानते हो ?
जो पहले कहा या जो बाद में …………सोच और ख्याल तो अपने अपने होते हैं ना
और मैं ना सोच हूँ ना ख्याल
बस जानने को हूँ बेकरार
क्या जानती हूँ और क्या नहीं ?
ये प्रीत के मनके इतने टेढे मेढे क्यों होते हैं ………मेरी जिजीविषा की तरह, मेरी प्रतीक्षा की तरह , मेरी आतुरता की तरह
वक्त मिला तो कभी जप के हम भी देखेंगे
शायद सुमिरनी का मोती बन जायें ………
अल्हड लडकी की ख्वाहिशों में 

चाहतों की शराब की दो बूँद काफ़ी है नीट पीने के लिये
ज़िन्दगी के लिये… ज़िन्दगी रहने तक
ओ साकी ! क्या देगा मेरी मिट चुकी आरज़ुओं को जिलाने के लिये 

अपने अमृत घट से एक जाम
फिर कभी होश में ना आने के लिये
मेरे पाँव थिरकाने के लिये
मेरे मिट जाने के लिये
क्योंकि
मैं नहीं जानती
अपने अन्दर की
उस लडकी को
कि आखिर उसका आखिरी विज़न क्या है…………



और अब अंत में जानिये ये भी 

दोस्तों आज आपको बताना चाहती हूँ कि कल रविवार को दिन में 12 : 05 से 1 : 05 के बीच मीडियम वेब 819 पर आल इंडिया रेडियो पर मेरा काव्य पाठ और बातचीत सुनियेगा अगर आपके यहाँ ट्रांजिस्टर या रेडियो है तो :) 

गुरुवार, 6 जून 2013

ओ मेरे !.............4

मेरी आँखों में ठहरे सूखे सावन की कसम है तुम्हें ............कभी मत कहना अब "मोहब्बत है तुमसे" ...........बरसों कहूं या युगों कहूं नहीं जानती मगर ये जो आँखों की ख़ामोशी में ठहरा दरिया है न कहीं बहा न ले जाए तुम्हें भी और इस बार सैलाब रोके नहीं रुकेगा चाहे जितने बाँध बना लेना ..............जानते हों क्यों ? क्योंकि मैंने दिल की मिटटी में खौलता  तेज़ाब उंडेल दिया था उसी दिन जब तुम मेरी आखिरी ख्वाहिश जानकर भी वो तीन लफ्ज़ ना कह सके , ना ही महसूस सके ...........और अब हाथों में मेहंदी लगाने की रुत नहीं रही जिसे देख सिहर सिहर उठूँ ..........बीती रुत , गिरे पत्ते और सिन्दूरी मोहब्बत वापस नहीं मुड़ा करती हैं ..........जानां !!!

इश्क और जूनून पर्याय हैं एक दूजे के और मैं उनका अर्थ ..........नागफनी सी उग आती हूँ  बंजर , रेतीली जमीनों पर भी या कभी डंस लेती हूँ स्वयं ही अपनी रूह की उड़ानों को ..........जज़्ब करने की रुतें नहीं हुआ करती ना ............क्या कर सकोगे कभी तुम मेरी दहकती , भभकती रूह को खुद में जज़्ब और जी सकोगे उसके बाद मुस्कुराकर .............मेरी तरह ? ..............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 2 जून 2013

ओ मेरे !..............3

जरूरी होता है खेत को सींचा जाना भी ऋतु आने पर ............यूं ही नहीं फसलें लहलहाती हैं ............सभी जानते हैं मगर मानता कौन है , करता कौन है ...............चाहे नेह का समंदर ठाठें मार रहा हो , चाहे सुनामी आने को आतुर हो मगर अहम की पोषित तुम्हारी वंशबेल कभी चप्पू उठाने ही नहीं देती  ...........चाहे किनारे नेस्तनाबूद हो जाएँ या नैया भंवर में ही डूब क्यों  न जाए .............एक अहम की कस्सी से तुम खोद ही नहीं पाते बंजर जमीन की  मिटटी को और नहीं रोंप पाते अपनी मनचाही फसल के बीजों को ............वैसे भी यहाँ तो खलिशों के रेगिस्तान की इकलौती मलिका हूँ मैं ...........हाँ , मैं , तुम्हारी चाहतों की कब्रगाह का फूल नहीं जो तोडा , सूंघा और मसल डाला ............जीने के लिए कुछ  रौशनदान बनाए हैं मैंने भी .............तुम्हारी दी बेरुखी से , तुम्हारी बदमजगी से , तुम्हारी बेअदबी से ................हवाये झुलसाने का शऊर बखूबी निभा रही हैं तब से .........जानां !!!

इश्क की कतरनें भी कभी क्या सीं जाती हैं ? और देख मैंने तो पूरा लिहाफ बना डाला ...........चाहो तो ओढ़ लो चाहो बिछा लो चाहो तो इबादत कर लो ..........कहो , कर सकोगे  इबादत , कर सकोगे बुतपरस्ती .......मुझसी ? .............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

गुरुवार, 30 मई 2013

ओ मेरे !..........2

कुछ आईने बार बार टूटा करते हैं कितना जोड़ने की कोशिश करो .............शायद रह जाता है कोई बाल बीच में दरार बनकर .............और ठेसों का क्या है वो तो फूलों से भी लग जाया करती हैं ............और मेरे पास तो आह का फूल ही है जब भी आईने को देख आह भरी ............टूटने को मचल उठा . आह ! निर्लज्ज , जानता ही नहीं जीने का सुरूर ...........जो कहानियाँ सुखद अंत पर सिमटती हैं कब इतिहास बना करती हैं और मुझे अभी दर्ज करना है एक पन्ना अपने नाम से ...........इतिहास में नहीं तुम्हारी रूह के , तुम्हारी अधखिली , अधपकी चाहत के पैबदों पर ...........जो उघडे तो देह दर्शना का बोध बने और ढका रहे तो तिलिस्म का .............मुक्तियों के द्वार आसान नहीं हुआ करते और जीने के पथ दुर्गम नहीं हुआ करते ............कशमकश में जीने को खुद का मिटना भी जरूरी है फिर चाहे कितना आईना देखना या टूटे आइनों में निहारना .........तसवीरें नहीं बना करतीं , अक्स नहीं उभरा  करते फ़ना रूहों के ........जानां !!!

मैंने तो सुपारी ले ली है अपनी बिना दुनाली चलाये भी मिट जाने की ...........क्या कभी देख सकोगे आईने में खुद के अक्स पर खुद को ऊंगली उठाये ............ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 26 मई 2013

एक यादगार शाम के दो रंग

25 मई 2013  की शाम डायलाग में "मुक्तिबोध" की प्रसिद्ध कविता " अंधेरे में " को पढने का मौका मिला जो एक यादगार क्षण बन गया क्योंकि उपस्थित गणमान्य अतिथियों ने भी उसी कविता के संदर्भ में अपने अपने विचार रखे तो लगा कि सही कविता चुनी मैने पढने के लिये :)

 पहली बार किसी दूसरे की कविता को पढना और उसके भावों को प्रस्तुत करना आसान नहीं था अपनी कविता का तो हम सभी को पता होता है मगर यहाँ तो मुक्तिबोध को पढना था जो साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं इसलिये कोशिश की कि उनके भावों को सही तरह से प्रक्षेपित कर सकूँ और इस तरह उन्हें नमन कर सकूँ 
क्योंकि कविता बहुत बडी है इसलिये सिर्फ़ उसके पहले भाग को ही पढा  










 इस कार्यक्रम के बाद क्योंकि दूसरे कार्यक्रम में जाना था इसलिये अतिथियों के विचार मुक्तिबोध की कविता के बारे में सुनने के बाद और आशुतोष कुमार जी का मुक्तिबोध की कविता का पाठ सुनने के बाद मुझे वहाँ से जाना पडा ।


एक शाम और दो दो कार्यक्रम ………लीजिये लुत्फ़ आप भी हमारे साथ चित्रों के माध्यम से 

 सुमन केशरी जी के काव्य संग्रह "मोनालिसा की आँखें" का लोकार्पण कल शाम "इंडिया इंटरनैशनल सैंटर" में किया गया तो वहाँ भी पहुँचना जरूरी था इसलिये डायलाग में कविता पाठ करके और गणमान्य अतिथियों को सुनने के बाद हमने यहाँ के लिये प्रस्थान किया 
 ये कम उम्र साथी संजय पाल जिसने खुद मुझे पहचाना और आकर मिला तो बेहद खुशी हुयी
 यहाँ राजीव तनेजा जी , संजय और रश्मि भारद्वाज के साथ यादों को संजोया

 ये हर दिल अज़ीज़ मुस्कान बिखेरती पंखुडी इंदु सिंह के साथ निरुपमा सिंह 
 सुमन केशरी जी के साथ शाम को जीवन्त किया 

इस प्रकार एक सुखद माहौल में काफ़ी लोगों से मिलना हुआ साथ ही आज के समय के वरिष्ठ हस्ताक्षर देवी प्रसाद त्रिपाठी जी और अशोक वाजपेयी जी को सुनने का भी मौका मिला जो एक अलग ही अनुभव था। 
राजीव तनेजा जी को आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होने ये तस्वीरें संजो कर  
हम सबके यादगार क्षणों को यहाँ कैद किया और हमें अनुगृहित किया।

गुरुवार, 23 मई 2013

.ओ मेरे !...........1

सपनों के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं जो तुम्हें ठंडी हवा के झोंके सी लगती, फिर भी हूँ .......सोचती हूँ , शायद , कुछ ...........तुम्हारी भी या तुम्हारी बेरुखी की सजायाफ्ता तस्वीर ...........इस उम्मीद के चराग को बुझने नहीं देना चाहती इसलिए खूब डालती हूँ तेल तुम्हारे दिए ज़ख्मों पर आंसुओं का ........आहा ! फिर जो सुरूर चढ़ता है , फिर जो नशा होता है , फिर जो रवानी होती है ............कब सुबह हुयी और कब शाम .........कौन पता करता है ...............एक मखमली सुकून की तलाश ख़त्म हो जाती है जैसे ही तुम्हारे दिए ज़ख्मों को जलते चिमटे से सहलाती हूँ ...........उम्र ठहर जाती है कुछ देर मेरी दहलीज पर ...............और मैं करती हूँ अट्टाहस अपने गुरूर पर , उस सुरूर पर जो सिर्फ मेरा है और मैं ...............हूँ , का अहसास चुरा लेता है तुम्हारी नींद भी फिर चाहे नहीं हूँ मैं तुम्हारी चाहत की दुल्हन , तुम्हारे सपनो का कोहिनूर ..............नशे के लिए जरूरी नहीं होता हर बार जाम को पीना ..............जो सुरूर बिना पीये चढ़ते हैं उम्र फ़ना होने पर भी न उतरते हैं ........जानां !!!


बस इतना जानती हूँ ..............तुम्हारे सपनो के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं एक धधकती ज्वाला हूँ मैं, गर्म लू सी जो झुलसा देती है चमड़ी तक भी  ...........कहो , जी सकोगे अब साथ मेरे या मेरे ना होने पर भी ...........तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 19 मई 2013

और आज चलन नहीं है आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का

नहीं जानती कविता का 
अर्थशास्त्र गणित या भूगोल 
क्योंकि ना कभी समकालीनों को पढ़ा 
ना ही कभी भूत कालीनों को गुना 
फिर कैसे जान सकती हूँ 
उस व्याकरण को 
जहाँ भाषा में शिल्प हो 
सौन्दर्य हो 
प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग हो 
फिर चाहे उनके दोहरे अर्थ ही 
क्यों ना निकलते हों 
और सब अपने अपने अर्थ उसके गढ़ते हों 
मगर कविता तो बस वो ही हुआ करती है 
जिसमें गेयता हो 
छंदबद्धता हो 
सपाटबयानी तो कोई भी कर सकता है 
उसके भावों को कौन गिनता है 
क्योंकि उसने नहीं जाना बाहरी सौन्दर्य 
और आज चलन नहीं है 
आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का 
आज चलन नहीं है सपाटबयानी का 
ऐसे में तुमने ही मेरे लिखे में 
जाने कैसे कविता ढूंढ ली 
जाने कैसे कविता के पायदान पर 
मेरी लेखनी को रख दिया 
मगर मैंने तो ना कभी कहा 
कि मैंने कविता को है गढ़ा 
जाने कौन से भाव तुम्हें 
उन्मत्त कर गए 
जाने कौन सा तार 
तुम्हारे दिल को छू गया 
जो तुम्हें सपाटबयानी में भी 
कविता का सम्पुट दिख गया 
और मैं हो गयी तल्लीन आराधना में 
साधना में , उपासना में 
बिना जाने 
बिना पुष्पों के अर्घ्य के 
आज के देवता प्रसन्न नहीं हुआ करते 
और मुझमे वो कूवत नहीं 
जो मछली की ग्रीवा से 
सागर में चप्पू चला सकूं 
या नए बिम्ब और प्रतीकों के प्रतिमान गढ़ूं 
जिनका कोई स्वेच्छाचारी अपने ही अर्थ निकाले 
और मेरी रचना का मूल स्वर ही शून्य में समाहित हो जाए 
मैं तो बस भावों का मेला लगाती हूँ 
और उसमे ज़िन्दगी के अनुभवों को 
बिना किसी सजावट के परोसा करती हूँ 
क्योंकि ज़िन्दगी कब दुल्हन सी श्रृंगारित हुयी है 
ये तो हर पल चूल्हे की आंच सी ही भभकती रही है 
और फिर जलती चिताओं की ज्वालाओं में 
कब श्रृंगार पोषित , सुशोभित , सुवासित हुआ है .............बस सोच में हूँ 

गर तुम स्वीकारो बिना दहेज़ की दुल्हन को 
जिसमे ना शिल्प है ना सौन्दर्य , ना बिम्ब ना प्रतीक 
तो इतना कर सकती हूँ 
जलती आँच से एक लकड़ी उठा सकती हूँ दुल्हन के श्रृंगार को
जो तुम्हारे सिंहासन को हिलाने को काफी है 
वैसे मेरी भावों की दुल्हन किसी श्रृंगार की मोहताज नहीं ..........जानती हूँ 

अब तुम खोजते रहना किसी भी कथ्य में "कविता या उसके अर्थ "
मगर आज के वक्त में तुम्हारा ये जानना भी जरूरी है 
भावों के तूफानों में कब सजावट सजी संवरी रहा करती है