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बुधवार, 12 जून 2013

ओ मेरे !.............5

कभी कभी जरूरत होती है किसी अपने द्वारा सहलाये जाने की ............मगर हम, उसी वक्त ,ना जाने क्यूँ ,सबसे ज्यादा तन्हा होते है..........ज़िन्दगी के पडावों में एक पडाव ये भी हुआ करता है शायद 
या तन्हाइयों की चोटों में आवाज़ नहीं हुआ करती शायद ............कुछ मौसम कितना ही भीगें , हरे हुआ ही नहीं करते शायद ………जरूरी तो नहीं ना सावन बारहों माह बरसे और रीती गागर भरे ही …………जानाँ !!! 

इश्क के मट्ठे खट्टे ही हुआ करते हैं और मैने सिर्फ़ उसी को पीया है जन्मों से ………जानते हो ना जबसे बिछडे हम …………मैने स्वाद बदला ही नहीं ………फिर तुमने कैसे स्वाद बदल लिया ..........ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

7 टिप्‍पणियां:

कुशवंश ने कहा…

बेहतरीन अभ्व्यक्ति

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इश्क की खट्टी खटास भी पीने में मज़ा होता है ...ये जीवन ऐसा ही होता है ...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कुछ सवालों के जवाब देना इतना आसान भी नही होता, बहुत लाजवाब रचना.

रामराम.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ऐसे ऐसे सवाल करोगी तो जवाब कैसे मिलेगा ?

भावपूर्ण रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर गद्यगीत!

संध्या शर्मा ने कहा…

सुन्दर रचना... शुभकामनायें

shorya Malik ने कहा…

वाह बेजोड़ रचना , आभार