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रविवार, 25 मार्च 2018

राम...बधाई और शुभकामनाओं तक

राम
बधाई और शुभकामनाओं तक ही बची है तुम्हारी प्रासंगिकता
जानते हो
प्रयोग होते हो तुम अब एक अस्त्र की तरह
जिससे जीती जाती हैं जंग

तुम, तुम्हारी मर्यादा और तुम्हारा औचित्य
महज प्रायोगिक हथियार हैं
जिनसे काटी जाती हैं सभ्यताओं की नस्लें
इस मर्यादाविहीन समय में
मर्यादा महज वो खिलौना है
जिससे दूसरों को ही सिखाया जाता है
खुद पर अमल करना शर्म का विषय गिना जाता है

क्या सोचा था कभी तुमने
जो राह तुम दिखा रहे हो
वहां ऐसी नागफनियाँ उगेंगी ?
अब काटने को नहीं बचा कोई औजार
क्योंकि
यहाँ सभी औजारों में तब्दील हो चुके हैं

भय का कोलाहल मथ रहा है
पंगु है चेतना
हावी है वासना
तत्वचिंतन महज कोरा ज्ञान भर है
भुनाने का एकमात्र अवसर हो तुम

क्या वाकई खुश होते होंगे तुम देख कर
झूठी संवेदनाएं और प्रतिक्रियाएं
जबकि जानते हो आज तुम महज एक मुद्दा भर रह गए हो

बताओ तो जरा
ऐसे निसहाय समय में कैसे दूँ तुम्हारे जन्म पर तुम्हें शुभकामनाएं
जब शुभकामनाओं का कटोरा भरा है
समय की दुर्दान्तता से
असामाजिक तत्व सी हो गयी है समय रेखा
ह्रदय उमगे भी तो भला किस बिनाह पर ?

क्या नहीं लगता राम तुम्हें
आज तुम्हारे जन्म को बना दिया
इस स्वार्थी जगत ने एक अभिशाप तुम्हारे लिए ...ऐसा तो नहीं सोचा था न तुमने?

उन्होंने तुम्हें
न भगवान् रहने दिया न इंसान
विडंबना की दहलीज पर
कैसे चटखती होंगी तुम्हारी श्वासें तिल तिल
मापने को नहीं मेरे पास कोई यंत्र 
 
बस इतना समझ लो .....काफी है
बदल चुके हैं अब रिवाज़
जन्मदिन मनाना महज दिखावा भर रह गया है
और
यहाँ जन्म लेना अब नियति है तुम्हारी... बार बार हर बार


बुधवार, 21 मार्च 2018

एक लम्बे अरसे बाद

एक लम्बे अरसे बाद
जब खोलती है घूँघट
अपने मुख से कविता
चकित रह जाता है कवि
देख उसका अनुपम सौन्दर्य

उसकी काम कमान भवें
नेत्रों की चपलता
धीर गंभीर मुखाकृति पर
छोड़ जाती हैं एक विरोधाभास

वो कोई और थी
या तुम कोई और हो
पहचान के सभी चिन्ह मिलते हैं जब नदारद
हो जाता है कवि
चारों खाने चित्त

अब किसे सहेजे
उठ खड़ा होता है प्रश्न
और समय के गर्भ से मिलता है उत्तर
बचपन हो या यौवन
अवसान तो होता है
और जो परिपक्वता प्रौढ़ावस्था को प्राप्त होती है
वहीँ अनुभव की पोटली से सजी श्वेत केशराशी
कर देती है द्विगुणित सौन्दर्य कविता का
जिसका कभी अवसान नहीं हुआ करता 
आओ करो उद्घोष कवि
वक्त जो बीता 
उदासीन निरुद्देश्य 
किसी निरर्थक समाधि सा
उसी के गर्भ में छुपे होते हैं बीज कविता के
वही रचता है कालजयी कविता 
और तुम बन जाते हो कालजयी कवि
मान लेना 
वो खाली दीवारों को तकना 
छत पर मकड़ी के जालों को देखते रहना 
खुद से भी बेजार हो उठना
नहीं था निरर्थक , निरुद्देश्य 
बेचैनी बेसब नहीं हुआ करती ... जानते हो न 

खालीपन वास्तव में खालीपन नहीं होता 
भर रहे होते हो तुम उस वक्त 
जरूरी हवा, पानी और धूप
यही है खाद 
तुम्हारी तरलता की 
क्योंकि 
संवेदनाओं के बीज 
मौसम के अनुकूल  होने पर ही प्रस्फुटित हुआ करते हैं


समय के सीने पर छोड़ने को पदचाप 
जरूरी है तुम्हारा गूंगे वक्त से मौन संवाद

#विश्वकवितादिवस


गुरुवार, 15 मार्च 2018

भामती मेरी नज़र में








प्राचीन ग्रंथों वेदों उपनिषदों से आम इंसान अनजान ही रहता है. जितना उसे कहीं सुनने को या थोडा बहुत पढने को मिलता है उसी के आधार पर अपनी सोच बना लेता है. ऐसी सोच खतरनाक होती है क्योंकि आधा ज्ञान कभी समाज को सही दिशा नहीं दे सकता. ऐसे में जरूरी है ज्ञान का प्रचार प्रसार. उसके लिए जरूरी है उन ग्रंथों को खंगालना और फिर उनके मूल तत्व की व्याख्या सरल शब्दों में करना. इसके लिए जरूरी है किसी प्रकांड पंडित का होना और ऐसा ही किरदार है Ushakiran Khan उषा किरण खान जी के उपन्यास ‘भामती’ में वाचस्पति का, जिसके बचपन में माता पिता मर जाते हैं और गाँव के लोग और गुरु के आश्रम में उनका और उनकी बहन सुलक्षणा का जीवन यापन होता है. 


उपन्यास का मुख्य तत्व है उस समय के लोगों का आपसी विश्वास, प्यार और भाईचारा. जहाँ आज के जीवन जैसे मतलब के रिश्ते नहीं थे. जैसे कण कण अपना हो ऐसा प्यार वाचस्पति और सुलक्षणा को मिलता है. विद्वानों का गाँव है तो विद्वता कण कण से फूटती है. जिसने आधार दिया वाचस्पति को, उनके लेखन को. वहीँ समयानुसार बहन का विवाह होना, वाचस्पति का बीमार पड़ना और फिर गुरुपुत्री भामा से विवाह होना. यहाँ तक सब सहज लगेगा लेकिन सहज है नहीं. वाचस्पति जब प्रकांड पंडित बन जाते हैं तो उन पर जिम्मेदारी आ जाती है ग्रंथों की टीका लिखने की और वो लिखते भी हैं. यहाँ वाचस्पति का चरित्र कितना जुझारू था वो जानना जरूरी है. जिसने अपने आप को पूरी तरह टीका में झोंक दिया. कोई मतलब नहीं संसार से. सिर्फ अपने कमरे में दीये की रोशनी में संलग्न रहना. भोजन पानी के लिए उठना उसमे भी बात न करना. कोई आ जाए तो जरूरी बात का संक्षिप्त उत्तर देना बस. ऐसा व्यक्तित्व जो तीन पहर सोता है बाकी पूरा वक्त टीका करने में लगा देता है. ऐसा समर्पण जिसका हो वो कैसे नहीं इतिहास रचेगा. दूसरी बात उनकी ख्याति का फैलना, राजा द्वारा उचित सहायता देना, बेशक राजा कमजोर है, दरबारी भी स्वार्थी हैं फिर भी वो वक्त ऐसा था जब विद्वान का सम्मान हुआ करता था. उनके लेखन पर राजा का अधिकार होता था. वो उन्हें सभी तरह की सुविधाएँ मुहैया करवाया करते थे. ये तो बात हुई वाचस्पति की. लेकिन यहाँ एक मुख्य किरदार है जो अँधेरे में बेशक रहा लेकिन उसी के त्याग ने वाचस्पति को वो स्थान दिलवाया जो शायद तब तक संभव ही नहीं होता जब तक ऐसा न हुआ होता. ये है वाचस्पति की पत्नी ‘भामती’. भामती सिर्फ पत्नी ही नहीं रही बल्कि जैसे एक माँ बच्चे का पालन पोषण करती है उस तरह वाचस्पति की सेवा की. पति पत्नी के सम्बन्ध क्या होते हैं वो तो उसने जाने ही नहीं. उसने सिर्फ ये जाना स्वामी एक बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं तो उनके कार्य में कोई विघ्न न आये. रात और दिन एक कर यदि वाचस्पति टीका करने में व्यस्त रहे तो भामती ने उन्हें समय से भोजन देने, कलम तैयार करने, दीपक में तेल डालने में ही अपना जीवन होम कर दिया. क्या संभव है आज की किसी स्त्री में ऐसा समर्पण. जहाँ पति दीं दुनिया से इतना बेखबर हो जाए कि उसे पता ही न चले कि 18 साल लग गए उसे इस कार्य में और वो भूल चुका है कि उसकी कोई पत्नी भी है. 18 साल साथ रहकर भी वियोगी का जीवन जीती है भामती शायद सीता ने भी इतना वियोग राम का न सहा होगा जितना भामती ने सहा. और सबसे बड़ी विडंबना उसके जीवन की तब थी जब अंत में वो पति का मुख देख समझ जाती है आज कार्य पूर्ण हो गया पंडित जी का, तब दीपक में तेल डालती है तब उनकी दृष्टि जब भामती पर पड़ती है और वो कोशिश करते हैं उन्हें पहचानने की लेकिन पहचान नहीं पाते तब पूछते हैं – “सुमुखी आप कौन हैं?” उफ़! कितना बड़ा कुठाराघात होगा किसी स्त्री के लिए, किसी पत्नी के लिए जब पति पूछे तुम कौन हो? शायद ही ऐसा उदाहरण कहीं देखने को मिले सिवाय दुष्यंत और शकुन्तला के वो भी श्राप के वशीभूत. यहाँ पत्नी 18 साल से सामने हैं लेकिन वो अपने मनन और चिंतन में खुद को भी भूल गए इस हद तक कि अंत में पत्नी को भी न पहचान पाए. बेशक समाजोपयोगी कार्य किया, जिसकी देश को बहुत आवश्यकता थी लेकिन वहीँ पतिधर्म से तो च्युत ही रहे. वो कैसा जीवन जिसमे सांसारिक निर्वाह का कर्तव्य भी कोई न निभा पाए. हम कह सकते हैं बुद्ध ने भी तो गृहत्याग किया और फिर समाज को एक दिशा दी, जीने का मूलमंत्र दिया तो इन्होने भी ऐसा किया तो क्या बुरा किया? लेकिन कम से कम वहां बुद्ध ने गृहत्याग तो किया था , पत्नी को उनके लौटने की कोई आशा तो नहीं बची थी लेकिन यहाँ पति सामने है, उसका हर कार्य पत्नी कर रही है फिर भी वो इतना डूब गया कि अपनी पत्नी को ही भूल गया. यौवन का स्वर्णिम काल जिसने पति के कार्य में होम कर दिया हो और वो जब ऐसा प्रश्न करे तो विचारिये उस पत्नी के दिल के कितने टुकड़े टुकड़े हो गए होंगे लेकिन फिर भी वो खुद को संभालती है और जवाब देती है – ‘भामती, आपकी अर्धांगिनी स्वामी’ जाने कितने ज्वालामुखी फट जाते हैं एक साथ वाचस्पति के ह्रदय में और तब अहसास होता है उन्हें अपनी भूल का. तब याद आता है क्या रूप था उसका जब विवाह किया था और आज एक भी चिन्ह नहीं बचा. हृदय ग्लानि से भर उठता है लेकिन ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ यहीं लागू होता है जब भामती के ह्रदय में एक काँटा हर पल चुभता है और वो व्यक्त करती है –‘मैं आपकी कुल परंपरा को आगे बढाने योग्य नहीं रही’. स्त्री मन की व्यथा. अपना पूरा यौवन दीप की बाती सा होम कर दिया जैसे दीप संग वो खुद जली और मातृत्व सुख से भी वंचित हो गयी इतना लम्बा समय उसने बिना किसी शिकायत के बिता दिया. सौदामिनी एक वैद्य है वो कहती भी है उसकी ये तपस्या देख कि ऐसी औषधि दे दूंगी जिससे पंडित जी थोडा समय तुम्हें भी दे सकेंगे लेकिन भामती जैसी दृढ निश्चयी शायद ही मिले जो जानती है लोक कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हैं उसके स्वामी इसलिए वो सौदामिनी का प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है. बेशक स्त्री है तो स्त्री सुलभ चाहतें जन्म लेती हैं लेकिन स्वयं पर कितना नियंत्रण है उसका ये पढ़कर ही जाना जा सकता है. अंत में वाचस्पति का जय जयकार होना, उत्तर से दक्षिण तक की पैदल यात्रा पत्नी संग करना और वहां शंकराचार्य और अन्य विद्वानों में मध्य अपने लेखन को मान दिलवाना, फिर वापस आना और वापसी में भामती का बीमार पड़ जाना और इस हद तक कि अंत में सौदामिनी जैसी वैद्य जिसका डंका दूर दूर तक फैला होता है , जो मुर्दे तक को जिला सकती थी वो भी हार जाती है और भामती इस दुनिया से चली जाती है और छोड़ जाती है अपने पीछे अपना अस्तित्व. पूरा जीवन पति के लिए होम किया, कुछ पल पति का सानिध्य मिला तब वो वक्त आया था जब वो उसके साथ सुख का जीवन व्यतीत कर सकती थी लेकिन वो भी उसकी किस्मत में नहीं था. क्या मिला भामती को आखिर उसके पूरे जीवन की तपस्या का फल? क्या सिर्फ इतना कि वाचस्पति जब जानते हैं कि उनकी पत्नी का कितना बड़ा योगदान रहा उनके लेखन को स्थायित्व प्रदान करने में तो कहने वालों ने बेशक कह दिया ये तो खुद को ग्लानि से मुक्त करने हेतु किया या फिर पत्नी को जैसे बहलाने का साधन किया, तब उन्होंने अपनी पत्नी के अतुलनीय योगदान के निमित्त अपने भाष्य का नाम रखा- ‘भामती टीका’ और पत्नी को कहा – पुत्र पुत्री या वंश परंपरा तो कभी भी नष्ट हो जाती है. किसकी आज तक चली है लेकिन तुम्हारे और मेरे युग्म से जो उत्पन्न हुआ है उसका युग युगांत तक संसार में नाम होगा अर्थात ये जो भामती टीका लिखी है यही हमारी वंश परंपरा है अब. क्या इतना कर देना भर काफी है एक स्त्री की उम्र भर की तपस्या का प्रतिफल? ये कहने सुनने में बेशक अच्छा लगे लेकिन हकीकत के धरातल पर उससे गुजरना कोई आसान नहीं होता. पल पल सिर्फ दीप की बाती को देखते बिताना क्या संभव है? 

वहीँ लेखिका ने उस समय की व्यवस्था का भी दिग्दर्शन कराया है. कैसे उस समाज में स्त्री हो या पुरुष सभी का वेद पुराण पढने पर समान अधिकार था. स्त्रियाँ भी परम ज्ञानी थीं लेकिन समय एक सा नहीं रहता और सौदामिनी के वाकये ने उनके क्षेत्र में भी स्त्रियों को घर गृहस्थी तक सीमित कर दिया. वो स्त्रियाँ जो परम ज्ञानी थीं अब घर गृहस्थी तक सीमित रह गयीं. देश के अन्य भागों में बेशक स्त्री के लिए रोक टोक बढ़ने लगी थी लेकिन उनके गाँव में ऐसा नहीं था लेकिन एक तांत्रिक द्वारा सौदामिनी को उठा ले जाना वहां की सभी स्त्रियों के लिए जैसे एक शाप बन उभरा. क्योंकि गुरुकुल में भामती सुलक्षणा और वाचस्पति सबने साथ ही शिक्षा ली थी. तभी तो परम ग्यानी थी भामती. वो देश और समाज में आये अंतर से व्यथित थी. वहीँ वो अपना योगदान समय समय पर देती रही. अपनी विद्या को उसने समाज के कल्याण में उपयोग किया जब घर बैठे लड़कियों को शिक्षा देने लगी क्योंकि लड़कियों का पाठशाला जाना बंद हो गया था. उस समय की स्त्रियाँ सुनकर ही सब याद कर लिया करती थीं. लेकिन सुना हुआ धीरे धीरे जब ख़त्म होने लगा तब जरूरत महसूस हुई उसे लिपिबद्ध करने की और उसी दिशा में कार्य को अंजाम दिया गया उस समय के विद्वानों द्वारा. स्त्री पुरुष का भेद उसी काल से शुरू हुआ जो आज तक इतना बढ़ चुका है कि सुरसा का मुख हो गया है. शायद यही कारण है आज जब फिर से शिक्षा का प्रचार प्रसार बढ़ा है तब स्त्री ने खुद को पहचाना है, अपने अस्तित्व के लिए वो उठ खड़ी हुई है. यानि शिक्षा का कितना बड़ा योगदान रहा हमेशा. 

लेखिका ने उस काल में अन्य धर्मों जैसे बौद्ध धर्म के प्रति लोगों की कैसी धारणा थी उस पर भी प्रकाश डाला है तो वहीँ उस समय के राजा कैसे थे उस पर भी कलम चलाई है - कोई कमजोर तो कोई शक्तिशाली, कोई विद्वानों का सम्मान करने वाला तो कोई सबसे पहले विद्या को ही जड़ में मिटा देने को उत्सुक. एक युग परिवर्तन का दौर था वो जिसे लेखिका ने अपनी कलम द्वारा बखूबी उकेरा है. 

यूँ तो जाने और भी कितने पहलू हैं इस उपन्यास में यदि सब पर लिखूँगी तो एक और उपन्यास तैयार हो जायेगा. लेखिका ने 'भामती-एक अविस्मर्णीय प्रेमकथा' नाम दिया है जो यही सिद्ध करता है लेखिका ने वहाँ प्रेम को तरजीह दी है और यदि देखा जाए तो शायद एक सत्य भी है जब वाचस्पति को भामती के त्याग और समर्पण का अहसास होता है तो उन्हें अपना लेखन तुच्छ लगने लगता है क्योंकि जो भामती ने लिखा बेशक वो कलमबद्ध नहीं हुआ लेकिन उसे सिर्फ और सिर्फ वाचस्पति ने ही गुना , महसूस किया और फिर अपनी हर रचना में अपना परिचय भामती पति वाचस्पति मिश्र के नाम से दिया. शायद प्रेम का इतना सुन्दर प्रतिदान किसी ने नहीं दिया होगा. न भामती का प्रेम कम था और न वाचस्पति का मानो यही लेखिका कहना चाहती हैं. शायद यही सच्चे प्रेम की पहचान है. 

ब्रह्म तत्व का निरूपण वाचस्पति द्वारा किया जाना, उसकी स्थापना करना , द्वैत और अद्वैत के मध्य के  भेद पर अपनी कलम चलाना कोई आसान नहीं रहा होगा, जाने कितना अध्ययन मनन लेखिका ने किया होगा तभी इतने पुख्ता रूप में प्रस्तुत कर पायीं . 

सबसे बड़ी बात लेखिका अपनी कलम के माध्यम से उस पात्र को संज्ञान में लायीं जिसके बारे में शायद ही लोगों को पता हो या कहा जाए बहुत ही कम पता होगा. कैसे हमारे देश की स्त्रियाँ नींव की ईंट बनी जिसके ऊपर के सुदृढ़ ईमारत खड़ी हो सकी ये हमें ऐसे ही प्रकरणों के माध्यम से पता चल सकता है. इतिहास कभी गवाह नहीं रहा स्त्री के योगदान का क्योंकि लिखा पुरुषों द्वारा गया. ये तो स्त्री ही स्त्री की व्यथा को समझ सकती है और उकेर सकती है जिसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं क्योंकि ये मैथिली  में लिखा गया उपन्यास है जिसे लेखिका ने खुद अनुवाद कर हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाया, जो एक बेहद सराहनीय कदम है. शायद हम जैसे लोग तो अनभिज्ञ ही रह जाते यदि ये उपन्यास न पढ़ते कि कैसे समय समय पर स्त्रियों ने अपनी चुप्पी से भी नव निर्माण किया और एक इतिहास रच दिया. हो सकता है इसमें भी कुछ शब्द पाठकों को समझ न आयें क्योंकि विशुद्ध हिंदी में लेखिका ने अनुवाद किया है फिर भी मूल तत्व पाठक को बांधे रखेगा. वो पूरा पढ़े बिना खुद को उससे अलग नहीं कर सकेगा. अंत में उपन्यास पढ़कर यही पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ जो भामती के जीवन पर पूरी तरह लागू होती हैं. उपन्यास पढने के बाद पाठक मन इतना व्यथित हो जाता है कि उससे बाहर ही नहीं आ पाता. सोच में पड़ जाता है पाठक मन ये कौन सी गली में ले गया समय हमें जिसकी हर दरो दीवार किसी स्त्री के आंसुओं से लाल है जिसका मोल तो खुद समय भी नहीं चुका सकता. एक कालजयी कृति के लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं. उनके पाठकों को आगे भी उनसे ऐसे ही उपेक्षित पात्रों पर अन्य कृतियाँ मिलती रहेंगी और पाठक उन्हें पढ़ लाभान्वित होते रहेंगे.

गुरुवार, 8 मार्च 2018

मुँह फाड़ हँसती लड़की

मुँह फाड़ हँसती लड़की
आज बन चुकी है
आश्चर्य का प्रतीक

हँसी का फूटता फव्वारा
जब गुजरता है कानों के बीहड़ से गुजरकर
ह्रदय की संकुचता तक
मुड़कर ठहरकर देखी जाती है
कभी ईर्ष्या से
तो कभी अचम्भे से

कल बेशक अशोभनीय था
उसका मुँह फाड़ हँसना

तो क्या हुआ
बदली है सभ्यता
मगर सोच तो नहीं

खटकती है वो आज भी
आँख में किरकिरी सी

पहले उपदेशों से होती थी ग्रस्त
और आज तमगों से
कितनी बेहया है
चालू दिखती है
तेज तर्रार  होगी
घाट घाट का पानी पीये दिखती है 

मगर छोड़ चुकी है वो परवाह करना तमगों की
क्योंकि
उसके हवा में उड़ते बाल
आँखों में ख़्वाबों का संसार
और मुँह फाड़ कर हँसने से खिली उसकी सुन्दरता
आज किसी पर्याय की मोहताज नहीं

उन्मुक्तता का भी अपना दर्शन होता है...

स्त्रीशतक मेरी नज़र में

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शुभ अवसर है तो मुझे लगा आज के लिए इससे उपयुक्त प्रस्तुति और क्या होगी जब एक पुरुष स्त्री मन को, उसकी भावनाओं को इतना मान सम्मान दे तो सार्थक हो जाता है महिला दिवस .....इसी बदलाव की तो समाज को जरूरत है ..... पवन करण जी ने जो स्त्री शतक लिखा है उस पर मेरे विचार पढ़िए .....आसान काम नहीं था ये जिसे उन्होंने सार्थक बनाया और उपेक्षितों को महिमामंडित किया ...

स्त्रीशतक मेरी नज़र में
*****************
जो पुरुष ये कहता हो ‘स्त्री मेरे भीतर’ वो कितना संवेदनशील होगा, अंदाज़ा लगाया जा सकता है. स्त्री होना बेशक अलग है और स्त्री को अपने अन्दर जीना एक अलग ही अहसास है. पुरुष जब स्त्री को अपने अन्दर जीने लगे अर्थात स्त्री की मनोदशा का गहन चिंतन करने लगे तब एक अलग ही रचना का जन्म होता है. वहाँ वो पुरुष भाव का त्याग कर देता है, भूल जाता है वो पुरुष है. शरीर से ही तो स्त्री और पुरुष हैं जबकि आन्तरिक चेतना के स्तर पर न कोई स्त्री है न पुरुष तो ऐसे में जब चेतना का प्रसार होता है तब स्त्री के भावों से लबरेज होना कोई आश्चर्य नहीं. ऐसा ही कवि ‘पवन करण’ जी के साथ होता है शायद तभी तो जब भी कोई कृति आती है उसमें स्त्रीमन को जैसे किसी स्त्री ने ही पढ़कर लिखा हो, ऐसा लगता है. शायद यही है आंतरिक चेतना की वो शक्ति जो इंसान को बहुत ऊपर उठा देती है. 


ज्ञानपीठ से प्रकाशित हाल में आया कविता संग्रह ‘स्त्रीशतक’ कवि पवन करण का नया संग्रह है जिसमें महाभारत, रामायण, पुराणों और उपनिषदों से स्त्री पात्रों को चुना गया है. यूँ जो स्त्री पात्र हम सभी जानते हैं उनके बारे में न लिखकर कवि ने एक नया जोखिम उठाया है. कवि ने वहाँ से ऐसे उपेक्षित पात्रों को उठाया है जिन्हें समाज किसी गिनती में नहीं गिनता या फिर जिनका होना किसी की निगाह में कोई महत्त्व नहीं रखता. वंचितों को तो वैसे भी इतिहास में कभी स्थान मिला ही नहीं फिर ये तो पौराणिक पात्र हैं जिन्हें उनकी उपयोगिता तक ही सराहा गया अन्यथा स्त्रियों का वहाँ कभी कोई रोल रहा ही नहीं सिवाय भोग्या के और कवि ने मानो उसकी उसी छवि के माध्यम से उस समाज पर कटाक्ष किया है. प्रश्न उठाये हैं, सोचने को विवश किया है. स्त्री कोई हो राजमहिषी या फिर वेश्या या अप्सरा वो सिर्फ एक देह भर है जैसे, फिर चाहे वो देवता हों, राजा हों या फिर ऋषि मुनि. ये तो अक्सर पुराणों में कथाओं आदि में सबने पढ़ा और सुना भी है तो इस सत्य को कतई नकारा नहीं जा सकता कि आदिकाल से स्त्री को कभी किसी ने उसके अस्तित्व के साथ नहीं स्वीकारा और वो संघर्ष आज तक जारी है. ऐसे में ये पहल करना कवि का स्त्रियों के प्रति उसके कोमल भाव को तो दर्शाता ही है बल्कि यहाँ कवि की मेहनत भी परिलक्षित होती है. आसान था कवि के लिए नामचीन स्त्री पात्रों पर लिख इतिश्री करना लेकिन कवि ने वो जोखिम उठाया जिसे उठाने की हिम्मत करना आसान नहीं होता. सभी पुराण आदि पढना और फिर उनमें से वंचितों के भावों, उनकी मनोदशा को आत्मसात करना और फिर उन पर लिखना कोई आसान कार्य नहीं. कई वर्षों की मेहनत का नतीजा ही है ये. 

कवि ने कई ऐसे पात्र लिए हैं जिनके बारे में हमने कभी न पढ़ा न सुना तो पाठक आश्चर्य से भर उठता है जब उसे पता चलता है गोकुल में कृष्ण की कोई बहन ‘एका’ भी थी. उसकी मनोदशा या उसके भाव व्यक्त करना तो अलग बात हो गयी यहाँ तो यही सत्य हलक से नीचे उतारना आसान नहीं होता. कृष्ण ने तो सभी वंचितों को उपेक्षितों को अपनाया तो फिर उस बहन का जिक्र क्यूँ गायब रहा इतिहास से? क्या ये विचारणीय नहीं? मानो उसका जिक्र कर कवि यही प्रश्न उठाना चाहता है. यहाँ कवि का उद्देश्य महज कविता करना नहीं है बल्कि प्रश्नों की अदालत ही लगाईं है कवि ने .

अप्सराओं का जीवन क्या होता है किस से छुपा है. नाम बेशक सुन्दर दे दिया जाए लेकिन कार्य तो उनका वेश्या वाला ही होता है बस फर्क है वहां देव और ऋषि मुनि भोगी होते हैं. ऐसे में उन्हें कठपुतली बनना होता है इंद्र की और उसकी आज्ञा का पालन भर करना होता है. फिर चाहे वो किसी के प्रति अनुरक्त हो भी जाएँ तो भी उनकी आकांक्षाओं का वहां कोई महत्त्व नहीं होता फिर वो पूर्वचित्ति हो या उर्वशी, मेनका या रम्भा. 

इसी तरह पिता पुत्री के संबंधों की मर्यादा भी कब और कैसे खंडित हो जाती रही या फिर रिश्तों को ताक पर रख अपनी ही पत्नी को संसर्ग हेतु किसी भी ऋषि या देवता के पास भेज देना क्या है ऐसे संबंधों का औचित्य जिन्हें हम देवता मान हाथ जोड़ देते हैं लेकिन वो अपने स्वार्थ के लिए स्त्री को हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं फिर भी पूजनीय कहलाते हैं. मानो इन सन्दर्भों को देकर कवि यही प्रश्न उठाना चाहता है क्यों आदिकाल से विरोध नहीं किया गया गलत का? क्यों हम पूजनीय मानें और इस रोग को पीढ़ी दर पीढ़ी फैलाएं? क्यों न सत्य सामने लाकर बेनकाब करें? और यही किया है कवि ने. 

ऐसा ही दासियों का जीवन रहा. दासी चाहे रानी से कितनी ही सुन्दर और सुशील हो, जिसकी यदि रानियाँ भी प्रशंसा क्यों न करती हों लेकिन वो रहती ही दासी है. उसका स्थान कभी ऊंचा नहीं हो सकता. वो बेशक भोग्या बन जाए लेकिन राजमहिषी होने का स्वप्न नहीं देख सकती क्योंकि वो दासी है कोई राजकन्या नहीं. मानो उंच नीच के भेद के माध्यम से कवि यही कहना चाहता है ये वर्गभेद परम्परा से चली आ रही वो प्रथा है जिसने जाने कितनी ही स्त्रियों के जीवन को दांव पर लगा दिया. जो इतिहास के पन्नों में कहीं दबी रह गयीं. यहाँ कवि ने उन दासियों के मनों में झाँका है और उनके मन के भावों को उल्लखित किया है क्योंकि थीं तो वो भी हाड मांस का इंसान ही तो भावनाएं तो उनमें भी जन्मती थीं. वो भी सोचने समझने की शक्ति रखती थीं तो किसी राजकुमार को देखकर उनके मन में भी तो उसका होने की भावना जग सकती थी. कवि ने उसी नब्ज़ पर ऊंगली रखी जिसमें दर्द था. ये एक भावुक ह्रदय ही कर सकता था. वहीँ दासियों के मध्य अपनी रानी को लेकर किये गए संवाद भी हिस्सा बने संग्रह का जहाँ वो अपनी रानी से इतनी जुडी हुई हैं कि उसके दुखदर्द अपने लगते हैं जैसे गांधारी के विषय में केशनी और वासंती का संवाद होता है मानो कहना चाहता हो कवि कैसे अपने मन की कसक को गांधारी ने दबाया होगा और कैसे उसका दर्द उसकी दासियों ने महसूस किया होगा क्योंकि एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के दर्द को बेहतर तरीके से महसूस कर सकती है:


मैं चाहती हूँ कि मेरा पति/ अपने सुसज्जित रथ पर नहीं/ अपने अश्व की पीठ पर/ पीछे बिठाकर/ आर्यावर्त की सभी/ नदियों के किनारे ले जाए मुझे/ गांधारी का यह कहना / तुम्हें याद है न वासंती 

वहीँ ‘अनामिका’ के माध्यम से कवि ने करारी चोट की है वर्ण व्यवस्था पर, पितृ सत्ता की सोच पर जहाँ पवित्रता और अपवित्रता को वर्ण से बाँध दिया गया. अरे गया तो पुरुष ही है एक स्त्री के पास फिर वो दासी हो या देवी लेकिन नहीं, ये देवता स्वीकार नहीं कर सकते, देवता यानि उच्च कुल वाले. ये कैसी शुद्र प्रथाएं थीं जिन्होंने पूरे समाज को एक ऐसे दुश्चक्र में बाँध दिया जिससे मुक्त होने को आज भी छटपटा रहा है लेकिन मुक्त नहीं हो पा रहा. ये पीढ़ियों की बोई फसल है जो आज भी जितना काटो उतनी ही बढती जा रही है शायद यही खोज कवि को पुराणों तक घसीट लायी क्योंकि परम्पराएं कोई अकेला नहीं बना सकता. ये तो इतिहास की धरोहर होती हैं जिन्हें वक्त के साथ और कड़ा कर दिया जाता है ताकि जो उपेक्षित है वो उपेक्षित ही रहे. कभी सिर न उठा सके. जो आदिकाल से होता रहा वो ही परंपरा बन दीमक की तरह पीढ़ियों को काटता रहा बस मानो यही कवि कहना चाहता है :

दासी होना स्त्री होना नहीं/ बस दासी होना है, जिस तरह देवी होना/ बस देवी होना है, स्त्री होना नहीं / मैं दासी थी तो मेरे साथ/ संसर्ग अपवित्र था, अजामिल के लिए/ मैं देवी होती तो मेरे साथ सहवास/ पवित्र होता उसके लिए 

ऐसे अनेक पात्रों से भरा पड़ा है संग्रह जो किसी ने कभी न पढ़े न सुने लेकिन जिनकी मर्मभेदी आवाज़ शायद कवि के कर्णरंध्रों तक पहुँची और कवि की कलम ने रच दिया एक नया इतिहास. यूँ पूरा संग्रह यदि देखा जाए तो स्त्री मन का आईना है. मगर कहीं कहीं कवि कुछ पात्रों के भावों को यदि थोडा और विस्तार देता तो सन्दर्भ और साफ़ हो जाते क्योंकि सबको नहीं पता कौन पात्र कहाँ से आया है और उसका वहां क्या रोल था. बेशक सन्दर्भ के रूप में कविता के नीचे दिया गया है कौन क्या था लेकिन फिर भी कहीं कहीं एक कमी सी खलती है जहाँ कवि ने कुछ एक पात्रों को उनके अधूरेपन के साथ छोड़ दिया है, वो पात्र विस्तार चाहते थे. लेकिन फिर भी इन कुछ एक पात्रों को यदि छोड़ दिया जाए तो पूरे संग्रह में हर पात्र के साथ न्याय करता नज़र आया है कवि. वहीँ शिव हों या पार्वती या विष्णु किसी पर भी आक्षेप लगाने से नहीं चूका कवि. यही कविकर्म है जहाँ भी विसंगति देखे करे प्रहार. ऐसा ही संग्रह में जगह जगह दिखाई देता है. संग्रह बेशक पठनीय और संग्रहणीय है. छोटी मगर मारक कविताओं का दस्तावेज है स्त्रीशतक. कवि की बरसों की मेहनत साफ़ परिलक्षित हो रही है. उम्मीद है आगे भी उनके पाठकों को उनकी लेखनी के माध्यम से ऐसे ही नए सन्दर्भों का पता चलता रहेगा.

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

आइये फटकारें खुद को

आइये फटकारें खुद को
थोडा झाडें पोंछें
कि
भूल चुके हैं सभी तहजीबों की जुबान

संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के मध्य
ख़ामोशी अख्तियार कर रुकें , सोचें, समझें
वक्त बेशक बेजुबान है
मगर जालिम है
नहीं पूछेगा तुमसे तुम्हारे इल्म
धराशायी करने को काफी है उसकी एक करवट

आरोपों आक्षेपों तक ही नहीं हो तुम प्रतिबद्ध
चिंतन मनन से मापी जायेगी तुम्हारी प्रमाणिकता
जानते हो
न वक्त की कोई जुबाँ होती है और न मौत की

ये जानते हुए भी कि
करवटों के भारी शोर तले दब चुकी हैं मुस्कुराहटें
तुम कैसे बजा सकते हो बाँसुरी
जिसमे न सुर हैं न लय न ताल

खुरदुरी सतहों पर चलने वालों
चलना जरा संभल कर
यहाँ घुटने छिलने के रिवाज़ से वाकिफ हैं सभी

ये वक्त का वो दौर है
जहाँ नदारद हैं पक्ष प्रतिपक्ष
और
कल जो हुआ
आज जो हुआ
कल जो होगा के मध्य खड़े हो तुम भी ... पता है न
या तो ठोको वक्त को फर्शी सलाम
या फिर हो जाओ तटस्थ
अन्यथा अगला निशाना तुम भी बन सकते हो
बस यही है
तुम्हारे चिंतन मनन की सही दिशा
खुद की झाड पोंछ का मूलमंत्र




गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

सफ़र 30 वर्षों का


सफ़र 30 वर्षों का पल में सिमट गया
दामन ज़िन्दगी का खुशियों से भर गया

कि गुजर चुकी उम्र शिकवो शिकायतों की
कि बदल चुकी इबारत दिल की इनायतों की
ये दौर है कोई और
वो दौर था कोई और

अब
नयी है वर्णमाला
नए हैं अक्षर
और नया है व्याकरण रिश्ते का
जहाँ
कोई कोमा नहीं
कोई अर्ध विराम नहीं
अब पूर्ण विराम की अवस्था है
जीवन राग अपने सातवें सुर पर गुनगुना रहा है आदिम गीत

कि धरा ने साँस भरी
और आकाश सिमट गया
लम्हा जो अब तक भटका था
उसके पहलू में ठिठक गया
फिर सजदा कौन किसे करे
जब
मैं तुम...हुए हम

कहो तो अब किस देवता की करें इबादत
जब ज़िन्दगी सुर्खरू है हमारी :) :)



पलक झपकते बीत गए 30 वर्ष और पता भी न चला कैसे ज़िन्दगी गुजर जाती है......लगता ही नहीं, जैसे कल की ही बात हो या फिर कोई स्वप्न जिसमें हम चल रहे थे किसी मदहोशी में......

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

"बुरी औरत हूँ मैं" गंगा शरण सिंह की नजर में

जब एक सजग पाठक और सच्चे आलोचक के द्वारा आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया मिले तो शायद वो ही एक लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है. उसमे भी गंगा शरण सिंह जी जैसे साहित्य के सजग प्रहरी आपको पढ़ें और आपके कहानी संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो ये किसी भी लेखक के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं क्योंकि ये वो पाठक हैं जो साहित्य की राजनीति से बहुत दूर हैं लेकिन साहित्य उनकी रग रग में बसा है.
मैं धन्य हुई गंगा जी आपकी बेबाक और सच्ची प्रतिक्रिया पाकर ....आशा है आप समय समय पर इसी तरह हम नव आगंतुकों को अपने विचारों से इसी तरह लाभान्वित करते रहेंगे ..........हार्दिक आभारी हूँ :) :)
"बुरी औरत हूँ मैं" कहानी संग्रह पर गंगा जी द्वारा लिखी समीक्षा आप सबकी नज़र :


Vandana Gupta की पहचान मूलतः एक कवियित्री के रूप में है किन्तु गद्य की अन्य विधाओं मसलन कहानी , उपन्यास, आलोचना, व्यंग्य आदि में भी उनका खासा दखल है।
"बुरी औरत हूँ मैं" उनका पहला कहानी संग्रह है जो 2017 में ए.पी.एन. पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। व्यक्तिगत रूप से यह शीर्षक मुझे अच्छा नहीं लगा। दरअसल आजकल दौर ही सनसनीे का है। ये सनसनी चाहे शीर्षक द्वारा फैलाई जाय, चाहे किसी घटिया आवरण द्वारा। हालाँकि Kunwar Ravindra साहब द्वारा निर्मित इस किताब का आवरण बहुत बढ़िया है।
शीर्षकों से जुड़ा एक दूसरा पक्ष ये भी है कि तमाम प्रसिद्ध कहानी संग्रहों की तरह शीर्षक धाँसू हो किन्तु पूरे संग्रह में कहानी छोड़कर बाकी सारे तत्व हों , तो भी पाठक के किस काम के।
अपने कई स्वनामधन्य कथाकारों, जिन्हें वे बड़े आदर से समकालीन रचनाकार का ख़िताब देती हैं और बड़े उत्साह से उन्हें पढ़कर बड़ी बड़ी समीक्षाएँ लिखती हैं, से बहुत बेहतर वे स्वयं लिखती हैं। कथ्य के लिहाज से एक दो कमजोर कहानियों को छोड़कर अधिकांश रचनाएँ अलग अलग विषयों और पात्रों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कुछ प्रेम कहानियों की मूल थीम में भी थोड़ा सा दोहराव जैसा लगा। बावजूद इसके अधिकांश किस्सों में व्याप्त किस्सागोई की विविधता ये दर्शाती है कि रचनाकार अपने आसपास हो रही घटनाओं और चरित्रों को कितनी सजगता और सूक्ष्मता से ग्रहण करने में सक्षम है। किसी भी कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक अपनी अपनी रुचि की कहानियाँ चुन लेते हैं। मैं भी वही कर रहा हूँ। कुछ ऐसी कहानियाँ जो बेहद उल्लेखनीय लगीं उनका हल्का सा विवरण संग्रह के परिचय के रूप में समझा जाए।

संग्रह की पहली कहानी "ब्याह" एक ऐसी नारी की कथा है जिसका विवाह एक नपुंसक व्यक्ति से हो जाता है। नायिका दुर्भाग्य के इस अध्याय को अपनी नियति मानकर उस घर में शान्ति और सद्भाव से रहने का प्रयास करती है। घर के सदस्यों को एक लड़की के भविष्य खराब करने पर कोई पश्चाताप नहीं है। यहाँ तक कि उसकी सास अपने बेटे की कमी को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए अपने पति यानी नायिका के ससुर को रात उसके कमरे में भेजने से गुरेज नहीं करती।
झूठ और छल के सहारे की गयी बहुत सी निरर्थक और विवादित शादियों की स्मृति इस कहानी के साथ ताजा हो आयी।

"उम्मीद" एक अलग सी कथावस्तु पर आधारित प्रेम-कथा है जहाँ कहानी का नायक एक विवाहित महिला से प्यार करने लगता है। पूरी तरह मानसिक धरातल पर स्थित इस प्यार में न तो कोई शारीरिक आकर्षण है न कोई चाहत। नायिका भी उसके नियमित संपर्क में है और वो भी नायक को पसन्द करती है किंतु अपनी अपनी सरहदों और प्रतिबद्धताओं से दोनों बखूबी वाकिफ़ हैं। न कोई इक़रार न इज़हार। अचानक कुछ यूँ होता है कि इस अव्यक्त प्रेम की पीड़ा से त्रस्त नायक धीरे धीरे बीमार पड़ जाता है। लेखकीय नियंत्रण में जरा सी छूट इसे एक साधारण कहानी बना सकती थी, किन्तु एक बेहद नाज़ुक विषय को बड़ी कुशलता से निभाया है वंदना जी ने।
"एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे" एक असंतुष्ट प्रवृति के व्यक्ति की कथा है जो विवाहित होने के बावजूद अपनी प्रकृति के कारण संपर्क में आने वाली महिला मित्रों से सदैव अंतरंग होने का प्रयास करता था। कहानी की आख़िरी पात्र उसे इस मानसिकता से किस तरह मुक्त करती है, यह पढ़ना रोचक है।
"पत्ते झड़ने का मौसम" एक ऐसे ख़ुशमिज़ाज़, सहृदय और सुलझे हुए लेखक की आत्मकथा है जो अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी की मृत्यु के बाद खुद को लेखन और यात्राओं में इस कदर व्यस्त कर लेते हैं कि देखने वाली ज़िंदादिली और जज्बे से रश्क़ करते हैं और कौतुक भी कि क्या इस इंसान को क्या कभी अकेलापन नहीं व्यापता होगा?
एक दिन जब वो नहीं रहते और कथावाचक मित्र के हाथ उनकी डायरी लगती है तब उसे मालूम पड़ता है कि वो अपनी पत्नी और उसे कितना याद करते रहे।

"बुरी औरत हूँ मैं" यह शीर्षक कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी औरत की ज़िन्दगी को बयान करती है जो अपने शौक पूरा करने के लिए कॉलेज के समय से ही कॉल गर्ल बन जाती है। उसके सौंदर्य पर मोहित कहानी का नायक सब कुछ जानते हुए भी उसे एक बेहतर जीवन देने का वायदा करते हुए उससे विवाह कर लेता है। इस कहानी का भयावह अंत ऐसे लोगों के लिए एक सबक है जो भौतिक सुख सुविधाओं की अनंत भूलभुलैया में खोकर अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। इस बार भी व्यक्तिगत जीवन में देखी कुछ इसी तरह की घटनाओं की स्मृति के कारण यह कहानी मेरे लिए प्रासंगिक हो उठी।
"कितने नादान थे हम" एक ऐसे पति पत्नी की कथा है जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं किंतु भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से बहुत दूर निकल जाते हैं। तलाक आदि कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा रास्ता तय करने के बाद अचानक वे खुद को ज़िन्दगी के रेगिस्तान में अकेले खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे की मूल भावनाओं का समुचित एहसास होता है।
"वो बाइस दिन" इस संग्रह की सबसे बेहतरीन और संवेदनशील कहानी है। नायिका के पिता कोमा की अवस्था में हैं। आसन्न मृत्यु की आहट और पीछे अकेले रह जाने को बाध्य परिजनों की उस विवशता के दौर को बेहद सधे शब्दों और अप्रतिम संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है वंदना जी ने।
"स्लीप मोड" इस संग्रह की अंतिम और गुणवत्ता में "वो बाइस दिन" के बाद सबसे अच्छी कहानी है। विस्मरण जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार होते जा रहे उम्रदराज परिजन कभी कभी हम सबकी अनजाने में की गई उपेक्षा का शिकार होते हैं। हम उनके बताने पर भी ध्यान नहीं देते और अपनी इन लापरवाहियों पर हमारा ध्यान तब जाता है जब संभावनाओं के सारे दरवाज़े बंद हो चुके रहते हैं।
इस कहानी संग्रह की आरंभिक कहानियों में वंदना जी की भाषा बहुत खटकती है। उनकी कविता का दुष्प्रभाव वाक्य विन्यासों पर बार बार नज़र आता है। शायद ये पुरानी कहानियाँ होंगी जब उनकी भाषा परिमार्जित नहीं थी। किन्तु उत्तरार्द्ध की रचनाएँ पढ़ते हुए स्पष्ट दिखता है कि भाषा और शिल्प पर उनकी पकड़ क्रमशः मजबूत होती गयी है और संभवतः इसीलिए आखिर की कुछ कहानियाँ बेहद असरदार बन पड़ी हैं।

सोमवार, 22 जनवरी 2018

हे वीणावादिनी हे तमहारिणी

 
 
हे वीणावादिनी हे तमहारिणी
होकर दयाल दे ये वरदान
खुशहाल हो सकल संसार

सुबुद्धि का वास हो
कोई न उदास हो
जीवन में उल्लास हो
बस तुझ पर ही विश्वास हो

बसंत सा हर मन हो
हर आँगन तेरा घर हो
उमंग का नर्तन हो
सप्त सुरों सा जीवन हो

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें



सोमवार, 8 जनवरी 2018

प्रोफेसर संजीव जैन की नज़र में - गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं


जब आपके  संग्रह का जिस दिन विमोचन हुआ हो और रात को सूचना मिले आपके संग्रह को दूर बैठे मर्मज्ञ ने पढ़कर उसपर समीक्षा भी लिख दी तो मेरे ख्याल से ये किसी के लिए भी कितना महत्वपूर्ण हो सकता है ये कोई लेखक/कवि ही समझ सकता है. समीक्षा पढ़कर मुझे लगा बाकी सब काम बाद में पहले ये आवाज़ सब तक पहुँचनी चाहिए. यूँ लगा जैसे उन्होंने संग्रह की नब्ज़ पर हाथ धर दिया हो . किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ नहीं जानती बस नतमस्तक हूँ .
 
भोपाल में रहने वाले प्रोफेसर संजीव जैन जी की नज़र में गिद्धों ने कैसा गिद्दा किया है वो आपके समक्ष है :

मोहित, विकृत और उल्टे समय में
‘गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं’ एक जरूरी किताब

वंदना गुप्ता का अभी हाल में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं’ समय की विकृत होती चाल और असंगत मानव बोध को रेखांकित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। आज की व्यवस्था ने समाज की ऊपरी सतह पर तैरनेवाली एक आत्ममुग्ध पीढ़ी को पैदा किया है। यह वह पीढ़ी है, ये वे लोग हैं जिनकी दृष्टि में नियोनलाईट की चमक है। रेप म्यूजिक का संगीत है और जेब में प्लास्टिक मनी है। ये अपनी सुख सुविधाओं के प्रति इतने आत्ममुग्ध हैं कि इस पूंजीवाद की झूठन को न देख पा रहे हैं न उसकी क्रूरताओं और मानवीयताओं को महसूस कर पाने की क्षमता उनके पास है। वंदना जी इस समय की आत्ममोहित, विकृत और उल्टीगति को बखूबी महसूस करती हैं और अपनी कविताओं में नये भाषाई अंदाज में बयां करती हैं।

‘‘क्योंकि/दिन उगते नहीं किसी शाख पर/और/विडम्बनाओं की सूक्तियाँ हैं कि/ लुभावने संगीत सी/रस घोलने की कोशिश में/चादर ताने खड़ी हैं।’’

‘‘शोर/अंदर और बाहर बराबर है/ सन्नाटा/अंदर और बाहर बराबर है/’’ (शोर और एक सन्नाटे के बीच, कविता से) क्या हम इस सन्नाटे और शोर के अंतर को महसूस कर पाने में सक्षम हैं? क्या भूमंडलीय भोंपू (मीडिया) आज की सतह पर तैरती हुई पीढ़ी को इस सन्नाटे के पीछे के शोर को सुनने का अवकाश और समय देता है? शायद नहीं, यही कारण है कि सतह के नीचे का जीवन अत्यंत क्रूर और विसंगत होता जा रहा है यद्यपि सतह के ऊपर भी विकृतियाँ कम तीखी नहीं हैं।

इन तीखी विकृतियों को वंदना जी ‘सन्नाटे का दौर’ में इस समय और सोच के बीच की असंगत फांक पर अंगुली रखते हुये इस तरह बयां करतीं हैं - ‘‘ये सन्नाटों का दौर है/कोलाहल विकल्प नहीं तोड़ने का/.......एक दौड़ते भागते/और एक ठहरे हुए समय के मध्य/ नहीं है कोई प्रतिस्पर्धा/अपने अपने वजूद हैं/ और / है उनकी अपनी अपनी पुण्यतिथि/.....तुम सोचो/ कौन से समय के साक्षी हो/ अपनी सोच की जड़ता से पैदा सन्नाटे के/ या फिर/ हहराती मानवता के कोलाहल से उपजी चिंघाड़ के।’’ मानवता के प्रति एक गहरी व्याकुलता का निदर्शन यहाँ दिख रहा है। ‘चिंघाड़ती मानवता’ में चिंघाड़ शब्द गहरी पीड़ा और कुछ न कर पाने की विडम्बना को रेखांकित कर रहा है। चिंघाड़ शब्द सामान्यतया हाथी की आवाज के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। हाथी की यह चिंघाड़ उसकी विवश पीड़ा को व्यक्त करती है। हाथी एक सक्षम जानवर है पर जब चारों ओर से शेर या शिकारी उसे घेर कर आक्रमण करते हैं और घायल कर देते हैं तो वह विवशता में चिंघाड़ता है। मानवता भी इसी तरह अपनी विकृति और विंसगति की पीड़ा में चिंघाड़ रही है। प्रसाद जी ने कामायनी में लिखा था - ‘विषमता की पीड़ा में व्यस्त’ यह इसी समय का संकेत था।

आज की जिस तैरती हुई पीढ़ी की मैंने बात की थी ‘तुम सोचो’ पदबंध उसी के लिये संबोधित है। कविता उस विडम्बना के प्रति है जो सोच अपनी जड़ता से पैदा सन्नाटे की साक्षी है न कि हहराती चिंघाड़ती मानवता की।

दुर्दांत समय के प्रति वंदना जी संवेदनशील हैं, परंतु वे उस समय के प्रति मौन नहीं रहना चाहती हैं और न हमें रहने देना चाहती हैं। वे चीख का संविधान रचना चाहती हैं। उन अनगिनत चीखों से मानवता की चेतना को रंगना चाहती हैं, जो वास्तव में अन्याय और शोषण के खिलाफ होना चाहिये थीें। सत्ता और व्यवस्था ने जिस तरह से मानव चेतना को आतंकित किया है और डर को उसकी रग रग में भर दिया है, उसके खिलाफ सार्थक और सामूहिक चीख ही कारगर प्रतिरोध हो सकती है।

‘‘आओ चलो/गढ़ें एक चीखों का संविधान/ कि / चीखें अप्रसांगिक तो नहीं/ बना डालें चीखों को जिंदों का पर्याय/ ये समय है/ चीखों की अंतरात्मा को कुरेदने का/ एक दुर्दांत समय के (यह(निरीह) लेखक द्वारा लिखा गया है मूल कविता में नहीं है) साक्षी बनने से बेहतर है/ चीखो चीखो चीखो।’’ ...........‘चीखो/ कि चीख भी एक अभिव्यक्ति है।’’

इस अभिव्यक्ति की सामूहिक आवश्यकता है हमारे देश और समाज को। यदि ऐसा नहीं किया गया, या ऐसा करना लगातार स्थगित किया जाता रहा तो जीवन के आकाश पर ‘गिद्ध गिद्दा करते नजर आयेंगे। गिद्ध जब गिद्दा करते हैं तो वह समय मानवता के पतन और सड़न का होता है। मानवता जमीं पर क्षतविक्षत पढ़ी होती है मनुष्य जब लाश में बदल जाता है तो यह स्थिति पैदा होती है।

इस स्थिति का चित्र देखिये - ‘‘एक शहर रो रहा है/ सुबह की आस में/....यहाँ नग्न परछाइयों के रेखाचित्र/ समय एक अंधी लाश पर सवार / ढो रहा है वृत्तचित्र/ नहीं धोये जाते अब मलमल के कुरते सम्हालियत से/ साबुन का घिसा जाना भर जरूरी है/ बेतरतीबी बेअदबी ने जमाया है जबसे सिंहासन / इंसानियत की सांसें शिव के त्रिशुल पर अटकी / अंतिम साँसें ले रही है / और कोई अघोरी गा रहा है राग मल्हार/’’

मानवता के जिंदा लाश में तब्दील होते जाने की स्थितियों को पूरे कविता संग्रह में धागे की तरह पिरोया गया है। और जब ऐसा होता है तो अघोरी का राग मल्हार गाना और ‘गिद्धों का गिद्दा करना’ अपने कहन और संवेदना में नश्तर की तरह हमारे जेहन में उतर जाता है।

बेफ्रिक तैरती हुई पीढ़ी ने विकास की थोथी और विडम्बना ग्रस्त स्थिति को युग का सबसे सार्थक नारा बना कर पेश करने की स्थितियाँ पैदा की हैं और जब मानवता और संवेदनायें रसातल में जाने को उतावली हों तो ऐसे समय में विकास के नाम पर राज करना और जनता को भ्रमित करने में इस तैरती हुई पीढ़ी की बेफ्रिकी ही एक वजह है। वंदना जी ने इसे इस तरह अभिव्यक्त किया है - ‘‘ये समय का सबसे स्वर्णिम युग है/ क्योंकि / अंधेरों का साम्राज्य चहुँ ओर से सुरक्षित है/ फिर सुबह की फिक्र कौन करे।’’

सुबह की फिक्र करने के लिये हमें निर्णय लेना होगा कि हम किस के साथ अपने मानवीय दायित्व को महसूस करते हैं। समय के अपंग होते जाने के पक्ष में या अपंग हो चुके समय को बदलने के पक्ष में। वंदना जी चुनौती देती हैं अपने आपको भी और हमें भी कि ‘‘निर्णय करो / वर्ना इस अपंग समय के जिम्मेदार कहलाओगे / तुम्हारी बुजदिली कायरता को ढांपने को / नहीं बचा है किसी भी माँ का आंचल/ छातियों में सूखे दूध की कसम है तुम्हें / या तो करो क्रांति / नहीं तो स्वीकार लो / एक अपंग समय के साझीदार हो तुम /

इस कविता संग्रह का मूल स्वर राजनैतिक है। जीवन अपने समय और गति में जिस तरह वक्रता ग्रहण करता जा रहा है। कवियत्री उससे बखूबी परिचति है। लोकतंत्र की सड़ांध अब असहनीय होती जा रही है। जनता को आंकड़ों में बदला जा रहा है और चेतना को अनुकूलित किया जा रहा है निरंतर। डर और आतंक, विकास और प्रलोभन इस भीड़तंत्र के मुख्य राजनैतिक हथकंड़ें हैं - ‘‘वास्तव में तो भीड़तंत्र है ये / प्रतिकार हो, विरोध या बहिष्कार/ स्लोगन भर हैं / हथियार है इनके / खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करने भर के / असलियत में तो सभी तमाशाई है या जुगाडू / ऊँट के करवट बदलने भर से / बदल जाती हैं जिनकी सलवटें / मिला लिये जाते हैं / सिर से सिर, हाथ से हाथ / और बात से बात / वहाँ / मौका परस्त नहीं किया करते / मौकापरस्तों का विरोध, बहिष्कार या प्रतिकार/ ........हाँफते रहो और चलते रहो / बस यही मूलमंत्र है विकास की राह का।’’

लोकतंत्र का भीड़तंत्र में बदलते जाना इसकी नियति है। दरअसल यह पूँजीवादी लोकतंत्र है इसका निहित उद्देश्य ही जनता को भीड़तंत्र में बदलना होता है। क्योंकि जागरूक और सचेत मानव समूह विकास की इतनी फूहड़ और विषमतामूलक परिभाषा को स्वीकार नहीं कर सकता। इस लोकतंत्र में ही तमाम चीजे नारों में बदल दी जाती हैं, ‘विकास’ भी विरोध भी। मानवता भी अमानवीयता भी। हिंसा भी और अहिंसा भी। नारे ही एक मात्र राजनैतिक गतिविधि बन जाते हैं। नारे जो जनता को लुभाते हैं, उनकी चेतना को कुंद करते हैं और अपने पक्ष में मत देने के लिये उसे अनुकूलित करते हैं। यही इस पूंजीवादी लोकतंत्र की तकनीक है, जनता की मानवीय चेतना को भीड़तंत्र में बदलने की। इसे पाओलो फ्रेरे ने रेवणीकरण की संज्ञा दी है। लोकतंत्र में जनता को कुछ सुविधाएं रेवणी की तरह बांटी जाती हैं ताकि उसमें क्रांति या परिवर्तन की चेतना पैदा न हो। हमारे लोकतंत्र के लिये में ‘तमाशाई और जुगाडू’ बहुत सार्थक और कारगर टिप्पणी है राजनैतिक चेतना पर। आज का समय या तो हमें तमाशाई बनाता है और ताली बजाकर लोकतंत्र का समर्थन करना सिखाता है या अपने स्वार्थ साधने के लिये जुगाडू बनाता है। जो जुगाडू बन जाते हैं, वे तमाशाई नहीं रहते वे तमाशा दिखाने वालों में शामिल हो जाते हैं फलस्वरूप लोकतंत्र एक फूहड़ और बर्बरतापूर्ण तंत्र में बदल जाता है।

‘‘यहाँ अपने-अपने अर्थ / और अपने अपने स्यापे हैं/ जुगाड़ के पेंचों पर जहाँ / खड़ी की जाती हैं प्रसिद्धि की इमारत / वहाँ दोष ढूंढने वालों पर ही / भाँजी जाती हैं अनचाही तलवारें / छिन्नमस्तक की लाशों पर / लगाये जाते हैं जहाँ कहकहे / वहाँ प्रतिबद्धतायें वेश्या सी नोची खसौटी जाती हैं / राजनीति के मर्मज्ञ जानते हैं / क्षेत्र कोई हो / कैसे जुगाड़ के साम्राज्य को किया जाये पोषित / जो उनकी सत्ता रहे निर्विघ्न कायम।’’

वर्तमान लोकतंत्र की अलोकतांत्रिकता पर एक सार्थक टिप्पणी है यह। इस राजनीतिक समझ को जिस दिन ‘तैरती हुई पीढ़ी’ समझ लेगी उसका मोहभंग हो जायेगा पर ऐसा होना संभव नहीं दिखता क्योंकि इस पीढ़ी ने व्यापक मानवीय जीवन से अपना नाता तोड़ लिया है। यह अपने नपुंसक स्वर्ग में मस्त है। सुविधाओं का मायाजाल इन्हें घेरे हुये है। इसीलिये वंदना जी ने लिखा - ‘‘नपुंसक से ओढ़े आवरण से खुद को मुक्त करने का समय है ये।’’ किस आवरण की ओर संकेत है? यह विचारणीय है। यह कविता ‘ स्यापा’ हमें बहुत कुछ सोचने विचारने का विवश करती है। जब वे कहती हैं कि - ‘‘शायद हुक्मरानों के कानों में / पड़ जायें कर्णभेदी शहनाइयाँ / और बच जाये एक मसीहा कत्ल होने से / वर्ना अपने समय की विडम्बनाओं को दोहते-दोहते / रीत जायेंगी जाने कितनी पीढ़ियाँ / नपुंसक से ओढ़े आवरण से खुद को मुक्त करने का समय है ये।’’

हमने बहुत से मानव जीवन के सच्चे मसीहाओं को अभी हाल के कुछ वर्षों में कत्ल होते हुए देखा है। यह कत्लेआम न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में घटित होता रहा है। क्या पूरी मानवता इसके खिलाफ चीख नहीं सकती? चीख सकती है, परंतु सत्ता और पूँजी ने सुविधाओं की हड्डी जो गले में डाल रखी है। कैसे चीखेगी यह तैरती हुई पीढ़ी? जब स्थिति यह हो - ‘‘ये शापित वक्त है / जहाँ फलने-फूलने के मौसम / सिर्फ चरण चारण करने वालों को ही नसीब होते हैं।’’ सत्ता ने चरण चारण करने की इतनी गहरी नींव डाल रखी है कि सिर उठाकर चलने वालों के सिर कलम कर दिये जाते हैं ताकि कोई व्यक्ति सिर उठाकर चलने की हिम्मत न करे। और इसके विपरीत वे यह बताना भी नहीं भूलतीं सत्ता कि कदमबोसी ही तुम्हें वक्त के सीने की तहरीर बना सकते हैं - ‘‘कायदे पढ़ना जरूरी है / किसी भी क्षेत्र में पदार्पण से पहले/ क्योंकि / वक्त के सीने की तहरीर बनने को जरूरी है कदमबोसी।’’

वंदना जी बहुत सार्थक और मानवीय राजनैतिक समझ रखती हैं। वे समय की घड़कन और जीवन के बीच की फांक को भी बखूबी समझती हैं। इस पूरे संग्रह में स्त्री विमर्श विषयक कवितायें नहीं है यह आश्चर्यजनक हो सकता है पर यह सुखद है इसलिये कि एक स्त्री जीवन को उसकी समग्रता में देख समझ रही है और मानवीय विकृतियों को व्यापक संदर्भ में परिभाषित कर रही है। यह आधी आबादी में राजनैतिक चेतना के विस्तार का संकेत है। ऐसा नहीं है कि वंदना जी ने स्त्री विमर्श विषयक कवितायें नहीं लिखी हैं। इनके पहले के संग्रहों में बहुत सी गहरी समझ वाली कवितायें हैं।

अंत में कुछ और उम्मीद और निर्णय की चुनौती के साथ बात समाप्त करता हूँ - ‘‘सुनो / अब अपील दलील का समय निकल चुका है / बस फैसले की घड़ी है / तो क्या है / तुममें इतना साहस / जो दिखा सको सूरज को कंदील / हाँ हाँ आज हैवानियत के सूरज से ग्रस्त है मनुष्यता / और तुम्हारी कंदील ही काफी है / इस भयावह समय में रोश्नी की किरण बनकर / मगर जरूरत है तो सिर्फ / तुम्हारे साहस से परचम लहराने की / और पहला कदम उठाने की / क्या तुम तैयार हो।’’ हमें तैयार होना ही होगा इस प्रश्न के उत्तर में नहीं तो समय और स्थितियाँ हाथ से निकलती जायेंगी और शायद हम यह साहस दिखाने की स्थिति में ही न रहें। ऐसा वक्त आये उससे पहले परचम लहराना निहायत ही आवश्यक है।

डॉ. संजीव जैन
भोपाल

शनिवार, 6 जनवरी 2018

एक नज़र इधर भी




विश्व पुस्तक मेले में 7 जनवरी 2018 को मेरे नए कविता संग्रह 'गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं' का विमोचन वनिका पब्लिकेशन के स्टॉल पर आदरणीय लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी, सुशील सिद्धार्थ जी और लालित्य ललित जी के करकमलों द्वारा होगा. आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है :
वनिका पब्लिकेशन
7 जनवरी 2018
स्टॉल नंबर - 368
समय - 12 बजे
हाल नंबर - 12-12A

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

द्वन्द जारी है ...

क्योंकि
सत्य तो यही है
देते हैं हम ही उपाधियाँ
और बनाते हैं समाधियाँ
वर्ना क्या पहचान किसी की
और न भी हो तो क्या फर्क पड़ जायेगा
अंतिम सत्य तो यही रहेगा
कोई जन्मा और मर गया
छोड़ गया अपने पीछे अपनी निशानियाँ
गायक, चित्रकार, कवि, लेखक के रूप में

जो जिसने कहा
सिर झुका मान लिया
और जिसने नही माना
तो उसे भी किया स्वीकार नतमस्तक हो

कितना आसान होगा कहना एक दिन
जिसे दिए आपने ये नाम
और उसने किये स्वीकार - सप्रेम 

जो तुमने बनाया बनती गयी
जबकि नहीं पाया उसने कभी खुद को किसी गिनती में
कवयित्री , समीक्षक, उपन्यासकार
'वंदना गुप्ता इज नो मोर'
हृदयतल से दे श्रद्धांजलि
हो जाएगी एक और रस्म अदा

जबकि
हकीकत के आईने दुरूह होते हैं
जब देखती हूँ खुद को अनंत की यात्रा पर जाते
सोचती हूँ
बस यही था क्या जीवन का औचित्य?
एक दिन सिमट जायेगी जीवन यात्रा क्या सिर्फ इन चंद लफ़्ज़ों में ?

द्वन्द जारी है ...

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

हम आधुनिकाएं

हम आधुनिकाएं
जानती हैं , मानती हैं
फिर क्यों संस्कारगत बोई रस्में
उछाल मारती हैं
प्रश्न खड़ा हो जाता है 
विचारबोध से युक्त संज्ञाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा जाता है

हम आधुनिकाएं
निकल रही हैं शनैः शनैः
परम्पराओं के ओढ़े हुए लिहाफ से
जानते बूझते भी आखिर क्यों ढोती हैं उन प्रथाओं को
जो मानसिक और शारीरिक गुलामी का पर्याय बनें
तो हम आज की स्त्री
नहीं मानती पति को देवता
नहीं पूजती उसे
जानती हैं
नहीं बढती उम्र किसी व्रत उपवास से
साँसों की माला में नहीं बढ़ता एक भी मनका
किसी अंधविश्वास से

हम आज की नायिकाएं नहीं ढोतीं अवैज्ञानिक तथ्यों को
हम तो बनाती हैं नयी लकीर प्रेम और विश्वास की
जहाँ कोई बड़ा छोटा नहीं
जहाँ कोई मालिक गुलाम नहीं
यहाँ तो होता है भजन बराबरी का
यहाँ तो होता है कीर्तन आत्मविश्वास का
तभी तो धता बता सब परम्पराओं को
आज की आधुनिकाओं ने
खोज लिया है अपना 'मुस्कान-बिंदु'


बस खुद की ख़ुशी के लिए 
खुद पर मर मिटने के लिए
एक अलग से अहसास को जीने के लिए
बहती हैं कभी कभी बनी बनायी परिपाटियों पर
तो वो
न तो खुद का शोषण है
न ही मान्यताओं का पोषण
ये 'स्व' उत्सव है
ये हमारी मर्ज़ी है
ये हमारी चॉइस है 

वैसे भी बनाव श्रृंगार हमारा गहना जो ठहरा 
तो खुद पर मोहित होना हमारा अधिकार 

बाज़ारवाद महज उपकरण है हमारे 'स्व' को श्रृंगारित करने का
और करवा चौथ एक अवसर

सदियों के सड़े-गले कवच तोड़ 
आज
आत्ममुग्ध हैं हम आधुनिकाएं


हैप्पी करवाचौथ :) :)