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गुरुवार, 15 मार्च 2018

भामती मेरी नज़र में








प्राचीन ग्रंथों वेदों उपनिषदों से आम इंसान अनजान ही रहता है. जितना उसे कहीं सुनने को या थोडा बहुत पढने को मिलता है उसी के आधार पर अपनी सोच बना लेता है. ऐसी सोच खतरनाक होती है क्योंकि आधा ज्ञान कभी समाज को सही दिशा नहीं दे सकता. ऐसे में जरूरी है ज्ञान का प्रचार प्रसार. उसके लिए जरूरी है उन ग्रंथों को खंगालना और फिर उनके मूल तत्व की व्याख्या सरल शब्दों में करना. इसके लिए जरूरी है किसी प्रकांड पंडित का होना और ऐसा ही किरदार है Ushakiran Khan उषा किरण खान जी के उपन्यास ‘भामती’ में वाचस्पति का, जिसके बचपन में माता पिता मर जाते हैं और गाँव के लोग और गुरु के आश्रम में उनका और उनकी बहन सुलक्षणा का जीवन यापन होता है. 


उपन्यास का मुख्य तत्व है उस समय के लोगों का आपसी विश्वास, प्यार और भाईचारा. जहाँ आज के जीवन जैसे मतलब के रिश्ते नहीं थे. जैसे कण कण अपना हो ऐसा प्यार वाचस्पति और सुलक्षणा को मिलता है. विद्वानों का गाँव है तो विद्वता कण कण से फूटती है. जिसने आधार दिया वाचस्पति को, उनके लेखन को. वहीँ समयानुसार बहन का विवाह होना, वाचस्पति का बीमार पड़ना और फिर गुरुपुत्री भामा से विवाह होना. यहाँ तक सब सहज लगेगा लेकिन सहज है नहीं. वाचस्पति जब प्रकांड पंडित बन जाते हैं तो उन पर जिम्मेदारी आ जाती है ग्रंथों की टीका लिखने की और वो लिखते भी हैं. यहाँ वाचस्पति का चरित्र कितना जुझारू था वो जानना जरूरी है. जिसने अपने आप को पूरी तरह टीका में झोंक दिया. कोई मतलब नहीं संसार से. सिर्फ अपने कमरे में दीये की रोशनी में संलग्न रहना. भोजन पानी के लिए उठना उसमे भी बात न करना. कोई आ जाए तो जरूरी बात का संक्षिप्त उत्तर देना बस. ऐसा व्यक्तित्व जो तीन पहर सोता है बाकी पूरा वक्त टीका करने में लगा देता है. ऐसा समर्पण जिसका हो वो कैसे नहीं इतिहास रचेगा. दूसरी बात उनकी ख्याति का फैलना, राजा द्वारा उचित सहायता देना, बेशक राजा कमजोर है, दरबारी भी स्वार्थी हैं फिर भी वो वक्त ऐसा था जब विद्वान का सम्मान हुआ करता था. उनके लेखन पर राजा का अधिकार होता था. वो उन्हें सभी तरह की सुविधाएँ मुहैया करवाया करते थे. ये तो बात हुई वाचस्पति की. लेकिन यहाँ एक मुख्य किरदार है जो अँधेरे में बेशक रहा लेकिन उसी के त्याग ने वाचस्पति को वो स्थान दिलवाया जो शायद तब तक संभव ही नहीं होता जब तक ऐसा न हुआ होता. ये है वाचस्पति की पत्नी ‘भामती’. भामती सिर्फ पत्नी ही नहीं रही बल्कि जैसे एक माँ बच्चे का पालन पोषण करती है उस तरह वाचस्पति की सेवा की. पति पत्नी के सम्बन्ध क्या होते हैं वो तो उसने जाने ही नहीं. उसने सिर्फ ये जाना स्वामी एक बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं तो उनके कार्य में कोई विघ्न न आये. रात और दिन एक कर यदि वाचस्पति टीका करने में व्यस्त रहे तो भामती ने उन्हें समय से भोजन देने, कलम तैयार करने, दीपक में तेल डालने में ही अपना जीवन होम कर दिया. क्या संभव है आज की किसी स्त्री में ऐसा समर्पण. जहाँ पति दीं दुनिया से इतना बेखबर हो जाए कि उसे पता ही न चले कि 18 साल लग गए उसे इस कार्य में और वो भूल चुका है कि उसकी कोई पत्नी भी है. 18 साल साथ रहकर भी वियोगी का जीवन जीती है भामती शायद सीता ने भी इतना वियोग राम का न सहा होगा जितना भामती ने सहा. और सबसे बड़ी विडंबना उसके जीवन की तब थी जब अंत में वो पति का मुख देख समझ जाती है आज कार्य पूर्ण हो गया पंडित जी का, तब दीपक में तेल डालती है तब उनकी दृष्टि जब भामती पर पड़ती है और वो कोशिश करते हैं उन्हें पहचानने की लेकिन पहचान नहीं पाते तब पूछते हैं – “सुमुखी आप कौन हैं?” उफ़! कितना बड़ा कुठाराघात होगा किसी स्त्री के लिए, किसी पत्नी के लिए जब पति पूछे तुम कौन हो? शायद ही ऐसा उदाहरण कहीं देखने को मिले सिवाय दुष्यंत और शकुन्तला के वो भी श्राप के वशीभूत. यहाँ पत्नी 18 साल से सामने हैं लेकिन वो अपने मनन और चिंतन में खुद को भी भूल गए इस हद तक कि अंत में पत्नी को भी न पहचान पाए. बेशक समाजोपयोगी कार्य किया, जिसकी देश को बहुत आवश्यकता थी लेकिन वहीँ पतिधर्म से तो च्युत ही रहे. वो कैसा जीवन जिसमे सांसारिक निर्वाह का कर्तव्य भी कोई न निभा पाए. हम कह सकते हैं बुद्ध ने भी तो गृहत्याग किया और फिर समाज को एक दिशा दी, जीने का मूलमंत्र दिया तो इन्होने भी ऐसा किया तो क्या बुरा किया? लेकिन कम से कम वहां बुद्ध ने गृहत्याग तो किया था , पत्नी को उनके लौटने की कोई आशा तो नहीं बची थी लेकिन यहाँ पति सामने है, उसका हर कार्य पत्नी कर रही है फिर भी वो इतना डूब गया कि अपनी पत्नी को ही भूल गया. यौवन का स्वर्णिम काल जिसने पति के कार्य में होम कर दिया हो और वो जब ऐसा प्रश्न करे तो विचारिये उस पत्नी के दिल के कितने टुकड़े टुकड़े हो गए होंगे लेकिन फिर भी वो खुद को संभालती है और जवाब देती है – ‘भामती, आपकी अर्धांगिनी स्वामी’ जाने कितने ज्वालामुखी फट जाते हैं एक साथ वाचस्पति के ह्रदय में और तब अहसास होता है उन्हें अपनी भूल का. तब याद आता है क्या रूप था उसका जब विवाह किया था और आज एक भी चिन्ह नहीं बचा. हृदय ग्लानि से भर उठता है लेकिन ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ यहीं लागू होता है जब भामती के ह्रदय में एक काँटा हर पल चुभता है और वो व्यक्त करती है –‘मैं आपकी कुल परंपरा को आगे बढाने योग्य नहीं रही’. स्त्री मन की व्यथा. अपना पूरा यौवन दीप की बाती सा होम कर दिया जैसे दीप संग वो खुद जली और मातृत्व सुख से भी वंचित हो गयी इतना लम्बा समय उसने बिना किसी शिकायत के बिता दिया. सौदामिनी एक वैद्य है वो कहती भी है उसकी ये तपस्या देख कि ऐसी औषधि दे दूंगी जिससे पंडित जी थोडा समय तुम्हें भी दे सकेंगे लेकिन भामती जैसी दृढ निश्चयी शायद ही मिले जो जानती है लोक कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हैं उसके स्वामी इसलिए वो सौदामिनी का प्रस्ताव अस्वीकार कर देती है. बेशक स्त्री है तो स्त्री सुलभ चाहतें जन्म लेती हैं लेकिन स्वयं पर कितना नियंत्रण है उसका ये पढ़कर ही जाना जा सकता है. अंत में वाचस्पति का जय जयकार होना, उत्तर से दक्षिण तक की पैदल यात्रा पत्नी संग करना और वहां शंकराचार्य और अन्य विद्वानों में मध्य अपने लेखन को मान दिलवाना, फिर वापस आना और वापसी में भामती का बीमार पड़ जाना और इस हद तक कि अंत में सौदामिनी जैसी वैद्य जिसका डंका दूर दूर तक फैला होता है , जो मुर्दे तक को जिला सकती थी वो भी हार जाती है और भामती इस दुनिया से चली जाती है और छोड़ जाती है अपने पीछे अपना अस्तित्व. पूरा जीवन पति के लिए होम किया, कुछ पल पति का सानिध्य मिला तब वो वक्त आया था जब वो उसके साथ सुख का जीवन व्यतीत कर सकती थी लेकिन वो भी उसकी किस्मत में नहीं था. क्या मिला भामती को आखिर उसके पूरे जीवन की तपस्या का फल? क्या सिर्फ इतना कि वाचस्पति जब जानते हैं कि उनकी पत्नी का कितना बड़ा योगदान रहा उनके लेखन को स्थायित्व प्रदान करने में तो कहने वालों ने बेशक कह दिया ये तो खुद को ग्लानि से मुक्त करने हेतु किया या फिर पत्नी को जैसे बहलाने का साधन किया, तब उन्होंने अपनी पत्नी के अतुलनीय योगदान के निमित्त अपने भाष्य का नाम रखा- ‘भामती टीका’ और पत्नी को कहा – पुत्र पुत्री या वंश परंपरा तो कभी भी नष्ट हो जाती है. किसकी आज तक चली है लेकिन तुम्हारे और मेरे युग्म से जो उत्पन्न हुआ है उसका युग युगांत तक संसार में नाम होगा अर्थात ये जो भामती टीका लिखी है यही हमारी वंश परंपरा है अब. क्या इतना कर देना भर काफी है एक स्त्री की उम्र भर की तपस्या का प्रतिफल? ये कहने सुनने में बेशक अच्छा लगे लेकिन हकीकत के धरातल पर उससे गुजरना कोई आसान नहीं होता. पल पल सिर्फ दीप की बाती को देखते बिताना क्या संभव है? 

वहीँ लेखिका ने उस समय की व्यवस्था का भी दिग्दर्शन कराया है. कैसे उस समाज में स्त्री हो या पुरुष सभी का वेद पुराण पढने पर समान अधिकार था. स्त्रियाँ भी परम ज्ञानी थीं लेकिन समय एक सा नहीं रहता और सौदामिनी के वाकये ने उनके क्षेत्र में भी स्त्रियों को घर गृहस्थी तक सीमित कर दिया. वो स्त्रियाँ जो परम ज्ञानी थीं अब घर गृहस्थी तक सीमित रह गयीं. देश के अन्य भागों में बेशक स्त्री के लिए रोक टोक बढ़ने लगी थी लेकिन उनके गाँव में ऐसा नहीं था लेकिन एक तांत्रिक द्वारा सौदामिनी को उठा ले जाना वहां की सभी स्त्रियों के लिए जैसे एक शाप बन उभरा. क्योंकि गुरुकुल में भामती सुलक्षणा और वाचस्पति सबने साथ ही शिक्षा ली थी. तभी तो परम ग्यानी थी भामती. वो देश और समाज में आये अंतर से व्यथित थी. वहीँ वो अपना योगदान समय समय पर देती रही. अपनी विद्या को उसने समाज के कल्याण में उपयोग किया जब घर बैठे लड़कियों को शिक्षा देने लगी क्योंकि लड़कियों का पाठशाला जाना बंद हो गया था. उस समय की स्त्रियाँ सुनकर ही सब याद कर लिया करती थीं. लेकिन सुना हुआ धीरे धीरे जब ख़त्म होने लगा तब जरूरत महसूस हुई उसे लिपिबद्ध करने की और उसी दिशा में कार्य को अंजाम दिया गया उस समय के विद्वानों द्वारा. स्त्री पुरुष का भेद उसी काल से शुरू हुआ जो आज तक इतना बढ़ चुका है कि सुरसा का मुख हो गया है. शायद यही कारण है आज जब फिर से शिक्षा का प्रचार प्रसार बढ़ा है तब स्त्री ने खुद को पहचाना है, अपने अस्तित्व के लिए वो उठ खड़ी हुई है. यानि शिक्षा का कितना बड़ा योगदान रहा हमेशा. 

लेखिका ने उस काल में अन्य धर्मों जैसे बौद्ध धर्म के प्रति लोगों की कैसी धारणा थी उस पर भी प्रकाश डाला है तो वहीँ उस समय के राजा कैसे थे उस पर भी कलम चलाई है - कोई कमजोर तो कोई शक्तिशाली, कोई विद्वानों का सम्मान करने वाला तो कोई सबसे पहले विद्या को ही जड़ में मिटा देने को उत्सुक. एक युग परिवर्तन का दौर था वो जिसे लेखिका ने अपनी कलम द्वारा बखूबी उकेरा है. 

यूँ तो जाने और भी कितने पहलू हैं इस उपन्यास में यदि सब पर लिखूँगी तो एक और उपन्यास तैयार हो जायेगा. लेखिका ने 'भामती-एक अविस्मर्णीय प्रेमकथा' नाम दिया है जो यही सिद्ध करता है लेखिका ने वहाँ प्रेम को तरजीह दी है और यदि देखा जाए तो शायद एक सत्य भी है जब वाचस्पति को भामती के त्याग और समर्पण का अहसास होता है तो उन्हें अपना लेखन तुच्छ लगने लगता है क्योंकि जो भामती ने लिखा बेशक वो कलमबद्ध नहीं हुआ लेकिन उसे सिर्फ और सिर्फ वाचस्पति ने ही गुना , महसूस किया और फिर अपनी हर रचना में अपना परिचय भामती पति वाचस्पति मिश्र के नाम से दिया. शायद प्रेम का इतना सुन्दर प्रतिदान किसी ने नहीं दिया होगा. न भामती का प्रेम कम था और न वाचस्पति का मानो यही लेखिका कहना चाहती हैं. शायद यही सच्चे प्रेम की पहचान है. 

ब्रह्म तत्व का निरूपण वाचस्पति द्वारा किया जाना, उसकी स्थापना करना , द्वैत और अद्वैत के मध्य के  भेद पर अपनी कलम चलाना कोई आसान नहीं रहा होगा, जाने कितना अध्ययन मनन लेखिका ने किया होगा तभी इतने पुख्ता रूप में प्रस्तुत कर पायीं . 

सबसे बड़ी बात लेखिका अपनी कलम के माध्यम से उस पात्र को संज्ञान में लायीं जिसके बारे में शायद ही लोगों को पता हो या कहा जाए बहुत ही कम पता होगा. कैसे हमारे देश की स्त्रियाँ नींव की ईंट बनी जिसके ऊपर के सुदृढ़ ईमारत खड़ी हो सकी ये हमें ऐसे ही प्रकरणों के माध्यम से पता चल सकता है. इतिहास कभी गवाह नहीं रहा स्त्री के योगदान का क्योंकि लिखा पुरुषों द्वारा गया. ये तो स्त्री ही स्त्री की व्यथा को समझ सकती है और उकेर सकती है जिसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं क्योंकि ये मैथिली  में लिखा गया उपन्यास है जिसे लेखिका ने खुद अनुवाद कर हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाया, जो एक बेहद सराहनीय कदम है. शायद हम जैसे लोग तो अनभिज्ञ ही रह जाते यदि ये उपन्यास न पढ़ते कि कैसे समय समय पर स्त्रियों ने अपनी चुप्पी से भी नव निर्माण किया और एक इतिहास रच दिया. हो सकता है इसमें भी कुछ शब्द पाठकों को समझ न आयें क्योंकि विशुद्ध हिंदी में लेखिका ने अनुवाद किया है फिर भी मूल तत्व पाठक को बांधे रखेगा. वो पूरा पढ़े बिना खुद को उससे अलग नहीं कर सकेगा. अंत में उपन्यास पढ़कर यही पंक्तियाँ याद आती हैं - ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ जो भामती के जीवन पर पूरी तरह लागू होती हैं. उपन्यास पढने के बाद पाठक मन इतना व्यथित हो जाता है कि उससे बाहर ही नहीं आ पाता. सोच में पड़ जाता है पाठक मन ये कौन सी गली में ले गया समय हमें जिसकी हर दरो दीवार किसी स्त्री के आंसुओं से लाल है जिसका मोल तो खुद समय भी नहीं चुका सकता. एक कालजयी कृति के लिए लेखिका को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं. उनके पाठकों को आगे भी उनसे ऐसे ही उपेक्षित पात्रों पर अन्य कृतियाँ मिलती रहेंगी और पाठक उन्हें पढ़ लाभान्वित होते रहेंगे.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-03-2017) को "छोटी लाइन से बड़ी लाइन तक" (चर्चा अंक-2912) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'