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रविवार, 13 अप्रैल 2014

राकेश कुमार की नज़र में



वन्दना गुप्ता का प्रथम काव्य संग्रह बदलती सोच के नये अर्थ एक युवा कवियित्री का ऐसा संग्रहणीय लिखित दस्तावेज है जिसमें प्रेम के साथ विरह भी है, दर्शन भी है, एक स्त्री का सुंदर चारित्रिक चित्रण भी है, तमाम वर्जनाओं के प्रति मुखरता है और समाज के बदलते प्रतिमानों के प्रति एक प्रकार का विद्रोह भी है। यद्यपि पाठकों के पठन की सहजता की दृष्टि से कवियित्री ने इसे चार विभिन्न खण्डों में विभक्त करने की चेष्टा की है तथापि प्रत्येक खण्ड एक दूसरे से स्वयं को संबद्ध करती, प्रश्न-प्रतिप्रश्न के बीच उलझनों का स्वयं निवारण करती, प्रेम और दैहिक सम्मिलन जैसे जटिल विषयों में दर्शन का समावेश करती प्रत्येक पंक्तियां सात्विकता की कल्पना रूपी घृत में पवित्र लौ की भांति प्रज्जवलित प्रतीत होती है। अपनी कविता संग्रह का आरंभ उन्होने प्रेम रचनादेखो आज मुहब्बत के हरकारे ने आवाज दी है“, से की है। आज के युग में संचार माध्यमों के द्वारा आपस में दूरस्थ दो अन्जान व्यक्तियों के मध्य प्रेम के बीज का स्वआरोपण एवं अंकुरण तथा पल्लवन को कविता में श्रृंगार के माध्यम से उकेरने की चेष्टा के बीच पाठक के हृदय चक्षु में विरह अश्रु का अनायास आयातित होना, उनके लेखन कौशल का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यद्यपि उन्होने रचना के आरंभ को श्रृंगार से प्रारंभ करने का प्रयास किया है, किंतु मध्य में ही उन्होने विरह की कल्पनाओं से पाठकों को द्रवित करने की चेष्टा की हैं। शायद कवियित्री यह भलीभांति जानती हैं कि मिलन तो प्रेम का सतही एवं मलिन स्वरूप होता है, वास्तव में विरह उसे सुंदरता प्रदान करता है। अपनी दूसरी कविता तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हस्ताक्षर हो में वे द्वापर युग की श्रीकृष्ण की परिकल्पना को शब्दों में उकेरती प्रतीत होती हैं। नायक के उन श्रृंगारिक अनुभूतियों को जिसमें वह नायिका को स्वयं की प्रतिकृति के रूप में महसूस करने लगता है, कदाचित् अकल्पनीय किंतु प्रेम की पराकाष्ठा को प्रतिबिंबित करता है। यह प्रेम के चरमोत्कर्ष की अवस्था है, जब मैं और तुम का भेद नायक और नायिका के मध्य सदा के लिये समाप्त हो जाता है। राधाजी, श्रीकृष्ण से यही प्रश्न करती हैं, वे कहती हैं किकान्हा तुमने मुझसे अपार प्रेम किया किंतु विवाह रूक्मणी से, यह कदाचित् उचित नही“, तब श्रीकृष्ण प्रेम की पराकाष्ठा को परिभाषित करते हुये कहते हैं किराधा विवाह तो उनके बीच किया जाता है जिनके मध्य तुम और मैं का भेद विद्यमान हो। किंतु जब प्रेम अपने उच्चतम उत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है, तब तुम और मैं का भेद भला कहाँ रह जाता है, मैं तो तुममे और स्वयं में कोई भेद ही नहीं कर पाता हूँ और क्या यह संभव है कि मैं स्वयं से विवाह कर लूँ? अपनी अगली कविताओं में भी कवियित्री ने प्रेम के सात्विकता पर बल देने की चेष्टा की है, प्रेम दैहिक आकर्षण से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है, यह कवियित्री ने बार-बार रेखांकित करने की चेष्टा की है। आज के युग में जब प्रेम पूरी तरह स्वार्थपरक और शारीरिक आकर्षण से इतर कुछ भी नहीं रह गया है, ऐसे में इस तरह की अलहदा विचार को जिंदा रख शब्दों में उकेर पाठकों तक परोसना, कवियित्री के उज्जवल दृढ़ सोंच को प्रतिबिंबित करता है। कवियित्री अपनी कविता प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या...? में अपनी कविता के माध्यम से पाठकों को वैचारिक द्वंद में धकेल देती हैं। प्रेम की संपूर्णता दैहिक समर्पण में है अथवा आत्मिक मिलन में ? क्या प्रेम बिना दैहिक अनुभूति के अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकता ? दो देह का मिलन प्रेम की पराकाष्ठा को परिलक्षित करता है अथवा प्रेम के निरंतर हव की ओर अग्रसर होने वाले एक चरम बिंदु को चिन्हित करता है ? इन सभी विचारों के द्वंद में पाठक स्वयं को जैसे ही उलझा हुआ महसूस करता है हीं इसके पश्चात की कवितायें इन प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने में स्वयं मददगार साबित होती हैं। अपनी कविताएक अधूरी कहानी का मौन पनघटमें कवियित्री अपनी इन पंक्तियों के सहारे इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे देती हैं
फिर क्या करूंगा तुम्हे पाकर
हाँ तुम्हे ही खो दूं हाँ...
खोना ही तो हुआ ना
एक निश्छल प्रेम का
काया के भंवर में डूबकर
और मैं जिंदा रखना चाहता हूं,
हमारे प्रेम को,
अतृप्ति के क्षितिज पर देह के भूगोल से परे
वास्तव में प्यार सत्यम् ,शिवम्, सुन्दरम् के गूढ़ अर्थों को स्वयं में समेटे ईश्वर का दिया अनुपम उपहार है। यह उम्र की सीमाओं से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है। जहाँ प्यार है, वहाँ जीवन है और जहाँ सत्य है, संयम है, विश्वास और पारदर्शिता है, वहाँ प्यार के बीज सीप से निकले मोती की तरह चमकते हैं।प्रेम कभी प्रौढ़ नहीं होतामें कवियित्री जैसे इन्ही विचारों को रेखांकित करने की चेष्टा करती प्रतीत होती हैं। कवियित्री प्रेम कविताओं के आगे स्त्री विषयक प्रसंगों को जैसे ही छूने की चेष्टा करती हैं, उनके भीतर की ज्वालामुखी फट पड़ती है। बरसों से घर की चारदीवारी के भीतर सतायी हुई एक स्त्री की संवदेनायें जब भीतर तक आहत होती हैं, तब किस़ तरह मर्यादा की सीमारेखा तटबंधनों को तोड़ पूरी व्यवस्था को नेस्तनाबू कर देती है। इसे उन्होने बखूबी चित्रित करने की कोशिश की है। इसे विडंबना ही कहें कि इस प्रगतिशील समाज का दंभ भरने वाले हर घरों में आज स्त्री किसी ना किसी रूप में शोषित और प्रताड़ित है। कवियित्री अपनी कविताघायी औरतके माध्यम से उत्पीड़ित स्त्री के मन में उपज रहे इस विद्रोह को शब्दों का रूप देने का प्रयत्न करती है। कविताऋतुस्त्राव से मीनोपाज तक के सफर में एक कन्या से स्त्री बनने तक के शारीरिक एवं मानसिक मनोभावों का प्रभावपूर्ण रेखांकन है। एक कन्या में शनैः-शनैः विकसित होने वाले शारीरिक एवं मानसिक भावनात्मक लक्षण तथा एक संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना के लिये तैयार होने के पूर्व उभरने वाले शारीरिक लक्षणों के मध्य कन्या के मासिक उद्वेग एवं मनोभावों का चित्रण बेहद प्रभावी है वहीं इसके अवसान काल के प्रति एक स्त्री की आशंका का चित्रण पढ़ जैसे हृदय कांप उठता है। कवियित्री जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, वैसे-वैसे स्त्रीगत् संवदेनाएं और मुखर होते जाती है। पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों के लिये वर्जनात्मक विषयों के प्रति कवियित्री के विद्रोह के स्वर आज की प्रगतिशील नारी के सोच को प्रतिबिंबित करती है। वंदना अपनी कविताइतना विरोध का स्वर क्यूँमें एक स्त्री के प्रति पुरूष की परंपरागत सोच को बदलते हुये जैसे वह कहना चाहती है कि अब स्त्री केवल पुरूष के सौदर्य उपासना का साधन मात्र नहीं है और ना ही वह उसके चक्षुओं को तृप्त करने अथवा दैहिक उपभोग के लिये कोई वस्तु है। अब वह पुरूषों के परंपरागत सौंदर्य विशेषणों, उपमाओं एवं चिकने-चुपड़े अलंकारों से मुक्त होकर समाज के भीतर अपने अधिकारों की अपेक्षा रखती है। वह अजंता-एलोरा की भित्तचित्रों से निकलकर समाज में अपनी उपस्थिति का अहसास चाहती हैं। यह बेहद संवेदनशील नितांत मौलिक एवं नया विषय है, जिस पर कवियित्री ने अपने कलम से आधुनिक स्त्रियों के भीतर कुलबुलाती आहत किंतु मौन संवेदनाओं को शब्द देने की चेष्टा की है।
कवियित्री ने कुछ पौराणिक पात्रों को भी अपनी विषयवस्तु का आधार बनाया है और वर्तमान प्रगतिशील नारी के सापेक्ष उस चरित्र के समालोचना करने की चेष्टा की है। यह सत्य है कि पुरातन भारतीय समाज, स्त्रियों के संदर्भ में तमात तरह की वर्जनाओं एवं परिहार प्रथाओं का शिकार रहा है। एक पुरूष की अंधत्व की पीड़ा को स्वयं की नियति समझ कर स्वीकार कर लेना गांधारी के पतिव्रत धर्म के स्वस्वीकारोक्ति को दर्शाता है अथवा पुरूषप्रधान समाज के द्वारा एक स्त्री को नैतिकता के दलदल में धकेल पुरूष के दुर्भाग्य को ही भाग्य स्वीकार करवाने की पुरूषोचित कुंठित सोच को, यह बहस का विषय हो सकता है किंतु माता के रूप में गांधारी के कर्तव्य पलायन पर ना तो कोई प्रश्नचिन्ह है और ना ही कोई विवाद। एक संपूर्ण समाज के विलोपन के लिये गांधारी को दोषी ठहरा जब अपनी पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री लिखती हैं
मैं इक्कीसवीं सदी की नारी
नकारना चाहती हूं,
तुम्हारे अस्तित्व को .....
देना चाहती हूं, तुम्हे श्राप
तो जैसे समस्त पंक्तियां अपने विचारों के ज्वार के साथ कंपन करने लगती हैं
स्त्रियां आज सभ्रांत घरों में शोषित और उपेक्षित है। उसकी प्रतिभायें अधिकतम संघर्ष के पश्चात स्वीकार्य होती हैं और स्थापित होने में तो कदाचित् बरसों लग जाते हैं। कवियित्री अपनी रचनाकागज ही तो काले करती होमें जिस व्यथा का चित्रण करती हैं, वह रचनाकार के रूप में उभरती कमोबेश हर स्त्री की प्रारंभिक व्यथा है,जिससे उबरने में या तो उन्हे अपनी पूरी ताकत झोंक देनी होती है या फिर उबरने के पहले ही घर की देहरी पर दम तोड़ देती हैं। कवियित्री समाजिक विषयों में, भ्रूण हत्या, स्त्रियों के शोषण,बदलते सामाजिक चरित्र को बड़ी बेबाकी से कहने का प्रयास करती हैं, कई बार ऐसा करते हुये उनकी पंक्तियां उनके अतिशय क्रोध का भी शिकार हुई हैं, कदाचित् ज्वलंत विषयों की ओर ध्यान आकृष्ट करते ऐसा हुआ होगा किंतुखोज में हूं अपनी प्रजाति के अस्तित्व कीमें वे घटते लिंगानुपात पर बेहद चतुराई से प्रहार करती हैं। कवियित्री जब अंत में सभी तरह के विषयो से होते हुये दर्शन में प्रवेश करती हैं, तो उसके लिये प्रेम की संपूर्णता मिलन ना होकर विरह हो जाता है। वह यह स्वीकार कर लेती है कि वास्तव में विरह प्रेम का सौंदर्य है, प्रेम रूपी नन्हा सा पौधा तो विरह के अश्रु से सिंचित हो सर्वाधिक पुष्ट होता है। प्रेम वह स्वर्ण कणिका है जो विरह की धधकती ज्वाला में जितनी तपती है उतनी ही अधिक दृढ़ता से आलोकित होती है।अपनी कविताओह मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतममें अपनी इन पंक्तियों में अपने भाव को व्यक्त करती हैं।
अपूर्णता में संपूर्णता का आधार ही तो
व्याकुलता को पोषित करता है। ...
प्रेम के बीच विरह की कणिकायें जब और अधिक पल्लवित और पुष्टित होने लगती है अर्थात जब यह चमोत्कर्ष की ओर बढ़ने लगता है तो प्रेम पूजा का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। वास्तव में जब कोई वस्तु एवं भाव अलभ्य हो जाये तो उसमें श्रद्धा का अंकुरण अनायास किंतु स्वाभाविक है। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम के स्वरूप को इसी नजरिये से देखा जा सकता है।प्रेम अध्यात्म और जीवन दर्शनमें जैसे वे यही कहती हैं। अपने दर्शन विषयों से संबंधित अगली कविताओं में कवियित्री नेमैंके विलोप पर बल देने की चेष्टा की है। कवियित्री ने आचार्य रजनीश से संबंधित एक विषय को अपनी कविता में उठाया हैसम्भोग से समाधि तक इस कविता में भी उन्होने पुरूष केमैंसे संबद्ध दृष्टिकोण को नकारने की चेष्टा की है। दैहिक सम्मिलन में पुरूष का अहम्, सर्वत्रमैंके प्रति उसका अभिमान, स्त्रियों के प्रति इस अवस्था में भी दोयम सोच और इन सबके बीच आत्मिक आनंद से वंचित, इसके वास्तविक स्वरूप आध्यात्म से इस अवस्था में भी साक्षात्कार ना कर पाने, वासना के दलदल से बाहर ना निकल पाने के पुरूषवादी सतही मानसिकता को कवियित्री जैसे सिरे से नकारना चाहती हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में एक स्थान पर लिखा गया हैसंभोग आनंद की पराकाष्ठा हैकिंतु इसका वास्तविक अर्थ वासनात्मक भोग-विलास नहीं है बल्कि जीवों का सम सम्मिलन है, जिसे वंदना गुप्ता अपनी कविता में उठाते हुये इसके वास्तविक अर्थ से जोड़ने का प्रयत्न करती हैं, वे एक स्थान पर लिखती हैं
जीव रूपी यमुना का,
ब्रह्म रूपी गंगा के साथ,
संभोग उर्फ संगम होने पर
सरस्वती में लय हो जाना ही आनंद या समाधि है।
और यही उपनिषदों में लिखे उपरोक्त शब्दों का भी उद्देश्य है, इस लिहाज से उनकी दर्शन से संबंधित कवितायें उपनिषदों एवं वेदों में लिखे उद्धरणों के करीब हैं। प्रायः यह कहा जाता है किसाहित्य समाज का दर्पण होता है” , किंतु मेरी नजर में जब तक उसमें भविष्य की बेहतर संभावनाओं के प्रति एक दृष्टि ना हो, उसमें समस्याओं के समाधान के मौलिक सृजन के संकेत विद्यमान ना हो तब तक ऐसा साहित्य निहायत ही खोखला एवं केवल समय व्यतीत करने तथा मनोरंजन के योग्य मात्र होता है और मुझे ऐसे साहित्य से परहेज है। वंदना गुप्ता के साहित्य सृजन में समस्या भी है, समाधान भी है और इन समस्याओं के समाधान की दिशा में एक साहित्यकार की स्वयं की दृष्टि एवं मौलिक सो भी है। कवियित्री एक साहित्यकार होने के साथ-साथ प्रबुद्ध सामाजिक प्राणी भी है जिनमें समाज में हो रहे नकारात्मक परिवर्तन के प्रति आक्रोश है और यही आक्रेाश उनकी कविताओं में कहीं घटते लिंगानुपात तो कहीं स्त्रियों के शोषण की व्यथाओं के आक्रेाश के रूप में उभरा है। कवियित्री समाधान चाहती हैं, पुरूषवादी सोंच में परिवर्तन कर तथा समाज में स्त्रियों के भीतर चेतना की लौ जगाकर। वह स्त्रियों की बेचारगी की पुरूषवादी दृष्टिकोण से उबरना चाहती है और हमें इस विचार का स्वागत करना चाहिये।
अंत में का जा सकता है कि सभी कवितायें बेहद प्रभावी, वैचारिक समझ एवं नयी सोच का बीजारोपण करने वाली है, सरल शब्दों का प्रयोग कर कवियित्री ने अधिकाधिक पाठकों के बीच हुँचने का प्रयत्न किया गया है। रस, अलंकार, छंद स्वआयातित हैं। कहीं-कहीं कविताओं ने अनावश्यक विस्तार पाया है, कदाचित् इसे बचा जा सकता था, किंतु संभवतः प्रत्येक कवि के साथ उनकी प्रारंभिक रचनाओं में इस तरह की स्वाभाविकता देखने को मिलते हैं, जो आने वाली रचनाओं के साथ स्वतः ठीक हो जाती है। पुस्तक पठन के योग्य है, साहित्य के क्षेत्र में यह एक संग्रहणीय रचना है। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ, साहित्य के विशाल क्षितिज पर उनका अभिनंदन करता हूं।
सादर
राकेश कुमार
प्रशासनिक कार्यालय
हिर्री डोलोमाईट माईंस
भिलाई इस्पात संयंत्र
जिला-बिलासपुर (छतीसगढ. )

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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों

चरणबद्ध तरीके से 
ख़ारिज करने की 
कोशिशों में जुटे 
ओ मेरे हितैषियों 
तुम्हारे सुलगाये दावानल में 
हंसकर प्रवेश कर जाती हूँ 
मगर न तुम्हारे 
अंतर्वस्त्र उतरती हूँ 
नहीं करती तुम्हें निर्वस्त्र 
क्योंकि 
अभी सभ्यता बाकी है मुझमें 


बस यही फर्क है 
तुममे  और मुझमें 
मैं तुम्हारी सुलगायी अग्नि में 
स्नान कर हो जाती हूँ 
और देदीप्यमान 
और मुखरित 
और सुरभित 
और तुम 
अपनी ही ईर्ष्या के 
भभकते शोलों में 
जला बैठते हो अपने  ही हाथ 


वैसे 
मर्मस्थान पर चोट करना मुझे भी आता है 
मगर 
नहीं करती पलटवार 
क्योंकि  जानती हूँ ये भी एक सत्य 
कि 
नकारात्मकता ही उत्तम सृजन की वाहक होती है 
इसलिए 
स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों 
तुम्हारे छलने के लिए खुद को प्रस्तुत कर दिया है 

 देखे हैं कहीं ऐसे जीवट जो हथेली पर आग की खेती करते हैं ....... 

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

" दिन अपने लिए " .......एक नज़र



 हिंदी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित शोभा रस्तोगी का प्रथम लघुकथा संकलन " दिन अपने लिए " अयन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।  लघुकथा का कलेवर गागर में सागर भरने वाला होता है।  थोड़े शब्दों में मारक बात कहना ही लेखक के कहन और उसकी दूरदृष्टि को गोचर करता है और इस कार्य में शोभा रस्तोगी सिद्धहस्त हैं।  ज़िन्दगी की आपाधापी में से आस पास घटित घटनाएं यूँ तो सभी को व्यथित करती रहती हैं मगर सब उन्हें शब्दों में इस तरह से नहीं बुन पाते कि उन्हें एक आकार मिल सके और जब लेखिका कहीं भी जीवन की किसी भी त्रासदी से अवगत हुयी तो उनकी लेखनी रुकी नहीं।  सूक्ष्मता से अवलोकन कराती लेखनी अपनी राह बनाती गयी और एक इतिहास रचती गयी।  

समकालीनों में यदि देखा जाए तो आज लघुकथा लिखने में कुछ गिने चुने नाम ही सामने आयेंगे और उन सबमे भी एक स्त्री का इस क्षेत्र में दखल बेहद सराहनीय और गर्व करने योग्य प्रयास है यूँ ही नहीं अकादमियाँ सहयोग किया करती हैं।  ये तभी सम्भव है जब आपमें प्रतिभा हो और शोभा रस्तोगी इस कसौटी पर खरी उतरती हैं जब आप उनकी लेखनी से परिचित होते हैं तो नतमस्तक होते जाते हैं।  

जैसे- जैसे पाठक लेखिका की लेखनी से गुजरता है वैसे -वैसे अभिभूत होता जाता है।  कहीं मन के कोने से ये आवाज़ आती है अरे ये सब तो मैं भी देखता हूँ , सुनता हूँ , जानता हूँ मगर कह नहीं पाता और जब इस रूप में देखता है तो खुद को गौरान्वित महसूस करता है कि इतना उत्तम संग्रह उसके हाथ में आया।  पहली लघुकथा से लेकर आखिरी लघुकथा तक सभी समाज , व्यवस्था , आस- पास घटित घटनाओं से लबरेज है और पढ़ते ही दाद देने को मन करता है , शायद यही एक लेखक के लेखन का परिचय होता है कि पहले पेज से आखिरी पेज तक पाठक को बाँधे रखे।  

कौन सा ऐसा विषय है जिस पर लेखिका की कलम नहीं चली या कोई विषय छूटा हो ऐसा भी नहीं हुआ।  अपने जीवन के संघर्ष और निष्कर्ष जैसे लेखिका ने एक माला में पिरो दिए और देवता को अर्पित कर दिए हों।  

"माता का जागरण " पहली ही लघुकथा मनुष्य की सोच पर प्रहार करती है कि एक तरफ वो देवी बना पूजते हैं तो दूसरी तरफ उसी से मुख मोड़ते हैं तो "ब्रह्मभोज" सामाजिक व्यवस्था और संवेदनहीन होते रिश्तों का सजीव चित्रण है। वहीँ "मन्नत" भगवान से बड़ा इंसान और इंसानियत है के भाव को बड़ी खूबी से दर्शाती है साथ ही मुख पर एक मुस्कान बिखेर जाती है काश सब ऐसा ही सोच पाते तो आज अमीरी गरीबी की खाई कब की मिट गयी होती।  तो दूसरी तरफ "उजाला" के माध्यम से एक सन्देश दे रही हैं कि अब वक्त आ गया है हम अपनी सोच बदलें और बेटियों का भी बेटे सा स्वागत करें जिसे कुआँ पूजन से जोड़ एक नया अर्थ दिया है।  "खातिर" लघुकथा फिर एक बार रिश्तों की अवहेलना और मानव मन की संवेदनहीनता के नकाबों को खोलती सोचने पर विवश कर रही है।  वहीँ "नवरात्रे" इंसान के दोहरे चत्रित्र पर गहरा कटाक्ष है।  "क़त्ल किसका" राजनीति की रोटियाँ सेंकने वालों और उससे त्रस्त इंसान और इंसानियत का आकलन है वहीँ "पवित्रीकरण" फिर धर्म और जाति के झूठे फेरों में फंसे मानव के दोगले चरित्रों पर से  नकाब हटाती  है।  वहीँ "असलियत " भ्रष्टाचार से ग्रस्त व्यवस्था के काले चेहरे को उजागर करती है कि चाहे कितना जोर लगा लो भ्रष्टाचारी सुधरते नहीं जब तक कि सख्त कानून न बनें और उन पर अमल न हो वहाँ कार्य उनकी मर्ज़ी से ही होता है।  वहीँ "भलमनसाहत" दिल में एक कचोट उत्पन्न करती है कि कैसा हो गया है आज का इंसान यदि किसी का कोई भला भी करना चाहे तो खुद ही दोषारोपण का शिकार हो जाता है , भलमनसाहत का तो जैसे ज़माना ही ख़त्म हो चुका है।  वहीँ करप्ट सिस्टम के कारण होते गुनाह पर प्रहार करती लघुकथा "डोनेशन मनी" सोचने को विवश करती है कि आखिर कब तक सिर्फ दिखावे के कारण हम गलत राह पकड़ते रहेंगे।  "बाल  मजदूरी "फिर प्रहार करती है दोगली सोच और आचरण पर।  वहीँ "ऊपरी हवा" अन्धविश्वास पर प्रहार करती लघुकथा मन को छू जाती है।  "पत्नी मैनेजमेंट" तो जैसे मानवता की सारी हदों को पार करते चरित्र का चित्रण है सिर्फ अपने फायदे के लिए कैसे पत्नी का उपयोग किया गया और उसे इल्म भी नहीं हुआ।  "पराया दर्द" अन्धविश्वास से मुक्ति की ओर एक संकेत है वहीँ "चक्रव्यूह" जातिवाद के दंश की पीड़ा को उकेरती है।  "आदमी"  लघुकथा आदमियत पर गहरा कटाक्ष करती सोचने को विवश करती है कि आज आदमी किस हद तक पहुँच गया है कि शायद कहीं भी उसे सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता।  "बोये पेड़ बबूल के" आज के बच्चों और माता पिता के रिश्तों का एक ऐसा खाका है जो कहीं न कहीं आज की जीवन शैली की ही देन है जिसके लिए कहीं न कहीं खुद जिम्मेदार हैं। "उत्तरित प्रश्न" धर्म और अन्धविश्वास के साथ सत्य की आँख से पर्दा हटाती वो सच्चाई है जिसे धर्म की आड़ में भुनाया जाता है मगर हम देखकर भी अनदेखा किये जाते हैं।  वहीँ "साम्प्रदायिकता" वो चेहरा प्रस्तुत करती है जो वास्तव में सच है मगर जिसे हमेशा नफरत और दहशत के काँटों तले दबा दिया जाता है जिसके वास्तविक चेहरे को सामने आने ही नहीं दिया जाता वर्ना कुछ राजनीतिज्ञों की राजनीती की रोटियां शायद सिकें ही नहीं।  "बौना रिश्ता" मानवता के उज्जवल पक्ष का चित्रण करती है वहीँ "पाहन पूजा" धर्मान्धों पर करारा प्रहार है , "मधुशाला " एक बार फिर धर्म और राजनीति दोनों के चेहरों को बेनकाब करती लघुकथाएं हैं।  "कुत्ता जात" आदमी और पशु के अंतर को दर्शाती मारक लघुकथा है वहीँ "दाल" महंगाई के कारण होती दुर्दशा पर प्रहार है तो दूसरी तरफ "एकलव्य" अहसानफरामोशी की मिसाल।  भूख क्या न करवाये क्या न खिलवाये को दर्शाती "जर्म" लघुकथा मानो एक आईना बन खड़ी  हो जाती है।  "जांच नहीं" स्त्री की जागरूकता की और पहला कदम है वहीँ "पापा की बेटी" भी सोच के बदलाव को दर्शाती आदर्श लघुकथा है।  "डंक वाली मधुमक्खी" बलात्कार , असुरक्षा के कारण उत्पन्न भय के साम्राज्य का सजीव चित्रण है जो सोचने को विवश करता है कि कैसे समाज में रह रहे हैं हम , कैसा वक्त आ गया है कि सिर्फ डर का साया ही हर वक्त हावी रहता है।  "जात सुगंध की " एक बार फिर धर्म से परे सोचने को विवश करती है। "खतावार" ऐतिहासिक चरित्रों पर तो प्रहार करती ही है साथ ही सोचने को विवश कि आखिर कब तक हम लकीर के फ़क़ीर बने उन व्यवस्थाओं को ढोये  जायेंगे जिन्होंने समाज को सही राह नहीं दिखायी और आज जमाना बदलाव का है तो उसके लिए नयी पीढ़ी को ही कदम उठाना होगा। वहीँ "कैंडल मार्च" फिर इंसानियत के नैतिक पतन को दर्शाती मानसिकता की द्योतक है।  "नॉट फॉर सेल " इंसानियत , गरीबी के मुँह पर धब्बा है के भाव को उजागर करती है।  वहीँ "सौतेली" सोच के बदलाव की तरफ एक कदम है।  "बेटा  बेटी" एक बार फिर दोनों के फर्क को तो दर्शाती है साथ में एक स्वस्थ सन्देश भी देती है कि जितने उपदेश बेटी के लिए हैं उतने ही बेटे के लिए भी हों तो हर लड़की सुरक्षित हो।  ईमानदारी का सन्देश देती "साँस बाकी है ", वहीँ "मृगतृष्णा" विवाहेतर सम्बन्धों के बीहड़ों को खोलती साथ ही गलती का अहसास कराती एक सशक्त लघुकथा है। 
अंत में संग्रह की शीर्षक लघुकथा "दिन अपने लिए" एक स्त्री के जीवन और खुशियों के बीच का एक स्वाभाविक चित्रण है जो मन को छू जाता है। 

प्रगति , कीलें , पंख , विडियो , सर्कार , उद्धार , रिश्ता ,कदम आदि जाने कितनी लघुकथाएं हैं जो मानवीय सरोकारों से जुडी होने के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती हैं और साथ ही सोचने को विवश शायद यही किसी भी लेखन की सार्थकता है कि पाठक को अपने सम्मोहन में इस तरह जकड़े कि बाद में भी पाठक आसानी से उससे बाहर  न निकल सके और इस कार्य में लेखिका पूरी तरह से सक्षम रही है।मानव मन की कमजोरियों को पकडने और उन पर प्रहार करने में लेखनी सक्षम है तभी अन्याय , शोषण , राजनीति, अमानवीयता, स्त्री विमर्श , भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता , असमानता इत्यादि सभी विषयों का समावेश हो सका और ये सब कोई एक दिन या कुछ दिन की बात नहीं बल्कि लेखिका का वर्षों का अनुभव यहाँ बोला है जिसे उसने बहुत संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ सहेजा है ।   सौ लघुकथाओं से लबरेज ये संग्रह मन के तारों को झकझोरने के लिए काफी है।  एक बार पढ़ने बैठो तो हटने का दिल न करे ऐसी बांधने की क्षमता लेखिका के लेखन में है।  संग्रह पढ़ने के बाद पाठक खुद महसूस करेगा कि आज कुछ सार्थक पढ़ा जो पाठक और लेखक के बीच एक अच्छा रिश्ता बनाएगा ऐसी मुझे उम्मीद है।  संग्रह पाठक को कहीं भी निराश नहीं करता।  लेखिका का लेखन इसी तरह आगे बढ़ता रहे और वो प्रगति के नए मुकाम तय करती रहे , लेखिका के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए आज्ञा लेती हूँ। 

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अयन प्रकाशन 

१/२० महरौली , नयी दिल्ली --११००३० 
फ़ोन : २६६४५८१२ / ९८१८९८८६१३ 

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

बालार्क की ग्यारहवीं किरण




बालार्क की ग्यारहवीं किरण तो खुद किरण है तो कैसे ने उसकी आभा प्रस्फुटित होगी , कैसे न अपनी रश्मि से आलोकित करेगी पाठकों के मन का कोना कोना।  जी हाँ मैं बात कर रही हूँ किरण आर्य की जिनकी सात रचनाओं को संग्रह में स्थान मिला।  

" गिरगिट " के माध्यम से आज के इंसान की रंग बदलती प्रवृत्ति पर करारा प्रहार किया है कैसे सारे मूल्यों को एक तरफ कर इंसान आज सिर्फ स्वार्थ की वेदी पर सिर्फ अपनी आकांक्षाओं के फूल खिलाने को आतुर है कि सही और गलत का फर्क भी भूल गया है. 

" स्वछन्द विचरते भाव " तो कविता के उद्देश्य को स्वयं ही प्रस्तुत कर रहे हैं कि भाव रुपी पंछी जब मन के धरातल पर उतरता है तो कैसे अठखेलियां करता है , कभी सपनो को तो कभी हकीकत को बयां करता है और कवि को कर देता है मुक्त सृजन की पीड़ा से जब स्वयं प्रस्फुटित होता है. 

" आत्मचिंतन " के माध्यम से यही कहना चाहा है कि जब मानव चारों तरफ से परेशां हताश हो जाता है तब आत्मचिंतन की ओर उन्मुख होता है तभी उसका खुद से साक्षात्कार होता है , तभी ईश्वर और जीव का फर्क दूर होता है। 

" पानी जीवन स्त्रोत " में बूँद बूँद पानी की क्या कीमत है वो बतायी है। 

" मन की उदासी " जीवन जीने की जीजिविषा का शानदार चित्रण है जिसे चींटी के माध्यम से चंद लफ़्ज़ों में कवयित्री ने उकेरा है कि कैसी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हों कभी हौसला नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि हौसला रखने वाले ही अगले दिन का सूरज देखा करते हैं , सर उठा कर जिया करते हैं।  

"चाँद और मानुष " में भावों का उत्कृष्ट संगम किया है साथ ही चाँद से मानव के सम्बन्ध को तो उकेरा ही है साथ ही उसकी और पाने की लालसा को भी बड़ी खूबी से बयां किया है कि आखिर कब तक हम ईश्वर प्रदत्त प्रकृति का शोषण करते रहेंगे महज अपनी तुच्छ लालसाओं , इच्छाओं की आपूर्ति हेतु कुछ इस प्रकार :

" प्रकृति और पृथ्वी से कर खिलवाड़ वो हारा 
अब लालसाओं ने उसकी चाँद को है निहारा " 

 अंतिम कविता " आग " सबसे सुन्दर और सार्थक रचना है जिसमें कवयित्री ने आग को माध्यम बना ज़िन्दगी में उमड्ती घुमडती चाहतों और हवस पर प्रहार किया है कि आग सार्थक भी है यदि उसका सदुपयोग किया जाये , यदि उसमें संभावनायें तलाशी जायें और दूसरी आग वो जिस पर हम अपनी स्वार्थ की रोटियाँ सेंकने को आतुर होते हैं , जहाँ सिर्फ़ अपना मैं ही अहम होता है , जहाँ सिर्फ़ खुद की पहचान बनाना ही सर्वोपरि होता है फिर उसके लिये अपनी खुद्दारी को भी ताक पर क्यों न रख दिया जाये , उसके लिये चाहे देश , समाज की भी अनदेखी क्यों न कर दी जाये क्योंकि पेट की आग तो बुझ भी जाती है मगर तुच्छ कामनाओं की आग से बचना संभव नहीं । 

कवयित्री में सम्भावनाओं की फसल लहलहा रही है बस जरूरत है उस दिशा में कदम बढ़ाने की।  कवयित्री के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए फिर मिलेंगे जल्दी ही। 

इस बार की देरी की वजह सभी जानते हैं मेरी खुद की बुक आयी थी तो उसी में लगी रही और कुछ तबियत ठीक नहीं रही इसलिए श्रृंखला बीच में टूट गयी उम्मीद है आगे सिलसिला जारी रहेगा।  

जल्द मिलती हूँ अगले कवि के साथ ……… 

रविवार, 30 मार्च 2014

अब कौन करे चिन्तन या मनन

मुझमे ज़हर भर चुका  है और वो भी इतना कि  अब संभालना मुश्किल हो रहा है इसलिए आखिरी हथियार के तौर पर मैंने  विष वमन करने का रास्ता अख्तियार  किया  . क्योंकि यहाँ तो चारों तरफ विष का नाला बह रहा है . दुनिया में सिवाय विष के और कुछ दिख ही नहीं रहा . हर चेहरे पर एक जलती आग है , हर मन में एक उबलता तूफ़ान है , चारों तरफ मचा हाहाकार है , जिसने जितना मंथन किया उतना ही विष निकला और उसे उगल दिया फिर चाहे व्यवस्था से नाराज़गी हो या घर से मिली उपेक्षा हो , फिर चाहे अपनी पहचान बनाने के लिए जुटाए गए हथकंडे हों या खुद को पाक साफ़ दिखाने की कवायद में दूसरे  को नीचा दिखाने की कोशिश , या फिर बेरोजगारी , भ्रष्टाचार , दरिंदगी, व्यभिचार , घोटालों से घिरा आम आदमी हो या उच्च पदासीन या उच्च वर्ग को देख खुद को कमजोर समझने की लिप्सा हो विष ने जकड लिया है चारों तरफ से ........सभी को चाहे नेता हो या राजनेता या आम आदमी , उच्च वर्गीय या मध्यम या निम्न वर्गीय सबकी अपनी अपनी परेशानियों से उपजी अव्यवस्था विष का कारण  बनी ...............और मैं कैसे अछूता रह सकता था ..........नाम कमाने की लिप्सा ने मुझे भी आंदोलित किया , जल्द से जल्द अपनी पहचान बनाने की चाह में मैंने न जाने कितने सह्रदयों के ह्रदयों को दुख दिया , अवांछित हस्तक्षेप किया उनकी ज़िन्दगी में , सिर्फ खुद की पहचान बनाने के लिए ........उनके खिलाफ विष वमन किया और हल्का हो गया .................और मुझे एक स्थान मिल गया ....... और आज मैं खुश हो गया बिना परवाह किये कि  जिसके खिलाफ विष वमन किया उसकी ज़िन्दगी में या उस पर क्या प्रभाव पड़ा ..............बस इस सोच ने ही आज ये स्थिति ला खडी की है और हम ना जाने क्यों चिंतित नहीं हैं …………खुश हैं व्यवस्था की असमाजिकता से,इस अव्यवस्था से………आदत हो चुकी है और जो आदतें पक जाती हैं वो जल्दी बदली नहीं जातीं फिर चाहे मानसिक गुलामी हो या शारीरिक …………फिर क्या फ़र्क पडता है समाजिक व्यवस्था सुधरे ही या नहीं ………अब कौन करे चिन्तन या मनन।



गुरुवार, 27 मार्च 2014

एक आम चेहरा भर ही तो हूँ

एक आम चेहरा भर ही तो हूँ 

नहीं लिखनी मुझे बनारस की सुबह , नहीं लिखनी मुझे दिल्ली की सर्दी , नहीं लिखनी मुझे मुंबई की शाम ...........बहुत हो चुका लिखना ये सब तो ........कब से इसी के आस पास तो घूम रही है ज़िन्दगी  और ज़िन्दगी के दर्शन ...........मैं हूँ कौन लिखने वाला ..........एक आम चेहरा भर ही तो हूँ ........अपने मौन के मगध में भ्रमण करता .............दर्शक दीर्घा का एक अंजान चेहरा जो वो देखता  है जो तुम दिखाते हो , वो जानता है जो तुम जनाते हो और वो करता है जो तुम करवाते हो ............तुम कौन ? कुछ अदद सरपरस्त जिन्हें शौक है सरपरस्ती का , जिन्हें शौक है खुद को सिद्ध करने का , जिन्हें शौक है विश्व पटल पर छाये रहने का और मैं दौड़ पड़ता हूँ तुम्हारी दिखाई झबरीली राहों पर बिना जाने , बिना सोचे , बिना विचारे ............क्योंकि मेरा कोई गणित है ही नहीं .............मैं वो इकाई हूँ जो है तो बस सिर्फ इसलिए क्योंकि संख्या बढाई जा सके .........एक वाकया लिखा जा सके या एक समूह बनाया जा सके .........इतना भर है मेरा कोना , इतनी भर है मेरी पहचान, इतनी भर है मेरी अहमियत .............जिसे बताया ही नहीं जाता उसका उपयोग .............बस पढाया जाता है इतना पाठ तुम्हें लड़ना नहीं है जीना है एक सादी सुकून भरी ज़िन्दगी और इसी को लक्ष्य बनाता मैं चल पड़ता हूँ भीड़ का हिस्सा बनकर ..........फिर कैसे मैं कुछ कह सकता हूँ या लिख सकता हूँ .............जब आँख होते हुए अँधा हूँ , जुबान होते गूंगा हूँ, कान होते बहरा हूँ .............नौ से पांच की ड्यूटी करता मेरा ढांचा दूसरा कोई दायरा जानता ही नहीं या जानना ही नहीं चाहता ............

मैं करता हूँ भ्रमण अपने विचारों के जंगल में जहाँ हवा किलोल कर रही होती है और कान में फुसफुसा जाती है कभी राजनितिक गलियारों की हलचलों को और मैं निकल पड़ता हूँ बिना जाने भीड़ का हिस्सा बनने  के लिए आखिर देश मेरा है , चलो एक आन्दोलन का हिस्सा बन जाने से शायद कोई अवार्ड मिल जाए , शायद व्यवस्था सुधर जाए , शायद कल आज़ादी की लडाई की तरह इसकी भी चर्चा हो और उन्हें सम्मानित करने का बीड़ा उठाया जाए तो मैं भी सम्मान की एक तश्तरी अपने सर पर रख सकूँ और गर्व से छाती ठोंककर कह सकूँ .....हाँ , हमने देखे हैं वो आन्दोलन , हम थे उसका हिस्सा .............आह ! कपोल कल्पना के रथ पर सवार मेरी विचारधारा का भ्रमण बिना आधार के कैसे धार पाए जब आँख मूंदकर चलना मैंने अपनी नियति बना लिया है , सवाल करना मैंने सीखा ही नहीं , सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रहना ही मेरा  लक्ष्य है ..........

मैंने सीखा ही नहीं चीत्कार करना ............क्या हुआ अगर हो गया कहीं कोई बलात्कार .........रोज का वाकया भर ही तो है ............क्या हुआ जो हो रही है रोज छेड़छाड़ ...........मुझे अपना पेट भरना है क्योंकि मेरे साथ कुछ नहीं हुआ .............आखिर किस किस से लड़ते रहे ............ ऐसे थोड़े जीया जाता है कि कुछ हुआ और चल पड़ो झंडा बुलंद करने ............अरे , मुझे अपने बीवी बच्चे , घर परिवार देखना है कहाँ है मेरे पास इतना वक्त जो इन बातों के लिए परेशां होता फिरूँ ...........ये काम तो नेताओं का है, ये काम तो स्वयंसेवी संगठनों का है , ये काम तो मानवाधिकार आयोग का है ...........और मैं इन सबसे परे हूँ ............आम चेहरा भर ही तो हूँ जिसे अपने दाल रोटी के अलावा सिर्फ वो ही दिखता है जो उसे दिखाया जाता है , वो ही सुनता है जो सुनाया जाता है और कहने भर को वो होता है जो पढवाया जाता है ...............अब ऐसे में कैसे आवाज़ बुलंद करूँ ?

मैं नियति का खेल हूँ , विधना का विधान हूँ जिसकी कोई पहचान नहीं ...............चल पड़ता हूँ जिधर हाँक दिया जाऊँ ............शोर जहाँ सुनाई दे , भीड़ जहाँ दिखाई दे , लहुलुहान जहाँ कोई दिखाई दे , बम विस्फोटों  में मरा  जहाँ कोई दिखाई दे ..............बस वो ही तो एक चेहरा हूँ जो सीख गया हूँ हालातों से समझौता करना , आज मरे कल दूजा सवेरा को अपने जीवन का दर्शन बनाना सीख गया हूँ ...........उधार  के सिन्दूर से मांग भरना सीख गया हूँ क्योंकि मैं नहीं बदल सकता तस्वीर को , क्योंकि हालात मेरे वश में नहीं, क्योंकि सिर्फ कोसना मेरी आदत है , क्योंकि सिर्फ जिरह करने पर मेरा अख्तियार है , क्योंकि लकीर का फ़क़ीर भर हूँ मैं जो वक्त के आईने में कोई तस्वीर देखना ही नहीं चाहता सिवाय अपने , क्योंकि मैं मान बैठा हूँ अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा , क्योंकि अपनी संगठित होने की शक्ति को मैं पहचान नहीं पाया , अपने अधिकार जान नहीं पाया , अपने कर्त्तव्य निभा नहीं पाया ............इसलिए कोई शिकायत नहीं , कोई गिला नहीं ..............मुझे पता है मेरा धर्म ..........हाँ धर्म पर चलने वाला ही मोक्ष पाता  है इसलिए कर आता हूँ हर 12 साल में कुम्भ स्नान और छोड़ आता हूँ पापों की गठरी गंगा के तट पर या कभी भीड़ का हिस्सा बन हादसे का शिकार बन जाता हूँ तो मुक्त कहलाता हूँ क्योंकि तीर्थस्थल पर प्राणों का जाना मुक्ति का संकेत है धर्मग्रंथों में वर्णित है और मैं बन जाता हूँ उस भीड़ का हिस्सा , मिल जाता है मेरी रूह को सुकून फिर चाहे वहां गंडे  ताबीजों के चक्कर में फंस जाऊं या हादसों का शिकार होकर मर जाऊँ ...........मोक्ष पक्का है और यही मेरा धर्म है अब चाहे उसके लिए व्यवस्था पर दोष लगाना पड़े मगर मैं खुद को धर्म विरुद्ध कैसे सिद्ध कर सकता हूँ ...........आखिर धर्म पर ही तो ये धरा टिकी है , आखिर धर्म ही तो हमारी संस्कृति की पहचान है और मैं उससे विमुख होने का पाप कैसे अपने सर ले सकता हूँ ...............फिर चाहे वहाँ कितनी ही अव्यवस्था फैले, चाहे सुगम साधन न हों तब भी मेरी धार्मिकता में कोई कमी नहीं आती , मैं पढ़ा लिखा होकर भी धर्मभीरु हूँ ............पढाई तो पेट भरने की विद्या है और धर्म मुक्ति की इतना तो जानता हूँ इसलिए कैसे अपने धर्म को तज सकता हूँ ..............मैं इस समाज की वो इकाई हूँ जिसके दम पर ही ये संस्कृति फूल फल रही है ऐसे में कैसे मैं इसमें दोष देख सकता हूँ और अपने सिर पाप ले सकता हूँ .............यही तो है मेरा चेहरा

मुझे पता भी चल जाए अपने अधिकारों का तब भी शॉर्टकट अपनाने से बाज नहीं आता क्योंकि वक्त नहीं है , क्योंकि सीधे रास्ते  जाने पर बहुत सी मुश्किलें हैं इसलिए रिश्वत देने और लेने में विश्वास रखता हूँ और जीवन सुचारू रूप से चलाता हूँ ..........आदि हो गया हूँ इन बातों का इसलिए फर्क नहीं पड़ता ..............क्या फायदा उस राह  जाने का जो वक्त पर काम ही न हो पाए उससे अच्छा है इस हाथ दे और उस हाथ ले .............कोई झंझट ही नहीं और वक्त पर काम भी हो गया सीख चुका हूँ काम निकलवाना ............. अब एक मेरे कुछ करने से सारी  व्यवस्था तो बदलने वाली है नहीं जो मैं उसके खिलाफ चलकर अपना समय बर्बाद करूँ ..............मेरी आवाज़ तो नक्कारखाने में तूती  की आवाज़ भर है किसी के खिलाफ शिकायत लेकर जाऊँगा तो उलटे मुझे ही अपना गला छूडाना महंगा पड़ेगा और जिसके खिलाफ लेकर जाऊँगा वो चैन से सोयेगा तो क्या फायदा ऐसा कदम उठाने का जिसमे खुद की जान ही सांसत में पड़ जाए इसलिए अपने अधिकारों को जानता हूँ और अपना कर्त्तव्य निभा देता हूँ एक अंगूठा लगाकर क्योंकि तस्वीर का जमा गुना तय करने वाला मैं कौन ............राजनितिक परिदृश्य के पीछे का चेहरा मैं नहीं होता , मैं नहीं लगाता  वहाँ बोलियाँ, मैं नहीं खरीदता वहाँ वोट तो क्यों सोचूँ और अपना वक्त बर्बाद करूँ ............मैं तो अधिकार और कर्त्तव्य निभा देता हूँ बाकि तो खरीद फरोख्त की दुनिया में मुझे क्या लेना देना कोई आये कोई जाए .........मेरी तस्वीर नहीं बदलनी, मेरा मुकाम नहीं बदलना , मेरा चेहरा नहीं बदलना ,,,,,,,,,,,,,मैं भीड़ हूँ, भीड़ का हिस्सा हूँ जो भीड़ में गुम  हो जाता हूँ और भीड़ के साथ ही चलता हूँ ..............फिर क्या फर्क पड़ता है मैं कुछ बोलूँ, कहूँ  या लिखूँ क्योंकि वक्ता नहीं, श्रोता हूँ ...........त्रासदियों , नाकामियों, हताशाओं  का वाहक !!!

सोमवार, 24 मार्च 2014

वो जो ढाँप कर नकाब मिलते हैं

वो जो ढाँप कर नकाब मिलते हैं 
दोस्त बन कर ही मुझे ठगते हैं 

प्याज की परत से जिनके छिलके उतरते हैं 
एक चेहरे में उनके हजार चेहरे दिखते  हैं 

सत्य के फेरों से जब गुजरते हैं 
मेरे अपने बन मुझे ही ठगते हैं 

रोने को न जब आँसू बचते हैं 
हम गिर गिर कर तब संभलते हैं 

मेरे पाँव से जो कालीन सरकाते हैं 
वो ही मुस्कुराकर गले अब मिलते हैं 

क़त्ल करने को तीर न तलवार चलाते हैं 
अपनेपन की बर्छियों से ही आस्तीनें काटे जाते हैं 

भरी दुनिया में गैर से खुद को लगते हैं 
जब अपनों द्वारा नकारे जाते हैं 

शनिवार, 22 मार्च 2014

इश्क की जुबाँ से

इश्क की जुबाँ से काला धागा उतरता ही नहीं 
जाने किस मौलवी ने बाँधा है 
कौन सा मन्त्र फूँका है 
जितना खोलने की कोशिश करूँ 
उतना ही मजबूत होता है 

सुना है 
काले धागे में बंधे ताबीज़ों की तासीर 
परेशान आत्माओं की मुक्ति का 
या फिर नज़र न लगने का सन्देश होती हैं 
और 
इश्क की नज़रें भला कब उतरी हैं 
इश्क में तो जिए या मरें 
आत्माएं न कभी मुक्त हुयी हैं 
शायद इसीलिए 
इश्क की जुबाँ पर काले धागों की नालिश हुयी है 




मंगलवार, 18 मार्च 2014

वो जो दहकते हैं मुझमें पलाश

ए 
सुलगती आग 
तुझे और दहकाऊँ कैसे 
झुलस तो चुकी  हूँ 
और भडकाऊँ कैसे 

और जो आँच 
बिना आग के सुलगा करती हैं 
वो उम्र भर न बुझा करती हैं 

फिर जलने के भी अपने नियम हुआ करते हैं  
मजबूरियों के पाँव भी सुलगा करते हैं 
वो जो दहकते हैं मुझमें पलाश 
वो न किसी सागर से बुझा करते हैं 

जलने के भी अपने शऊर हुआ करते हैं 
हर बार चूल्हे की आग से ही जलना जरूरी तो नहीं होता ना

शनिवार, 15 मार्च 2014

लागा चुनरी में दाग मिटाऊँ क्यों कर …

एक खूँखार वक्त में जीते हैं हम या खूँखार हैं हम तो वक्त सहम गया है हमारी खूँखारी तबियत से क्योंकि वक्त की आँख में आँसू नहीं होते मगर निशान बहुत दूर तक साथ साथ चलते हैं , कुछ गुनाह किसी कसौटी पर न तुलते हैं ऐसे में आम आदमी जाए कहाँ किधर देखे , किसे अपना समझे , कहाँ आवाज़ बुलन्द करे जब उसे कुचलने को धारदार हथियार तैयार हों , शब्दों के बाणों से धराशायी करने को , चरित्र की उज्ज्वलता को लहुलुहान करने को तैयार हों सारे रावण एक साथ क्योंकि कैसे किसी राम ने किसी रावण की बनायी लंका में प्रवेश किया , कैसे उसके बनाए प्रतिमानों को ध्वस्त किया आखिर इतने वक्त से जो घडा भरा था लहू से कैसे उससे वंचित हों , ये तो रावण के वंशजों का अधिकार है , कैसे कलई खुल जाए , कैसे रावण के वंशजों का समापन हो जाए आखिर एकजुटता से ही तो साम्राज्य बना करते हैं , आखिर घोटालों के लिये अपने ही तो काम आया करते हैं , ये दाग ही तो उनकी पहचान बनते हैं ऐसे में यदि बेदागों को स्थान दे दिया जाये तो कैसे संभव है आतंक के साम्राज्य का कायम रहना , आखिर इतनी मेहनत से सफ़ेद दामन पर दाग लगाया जाता है नज़र के टीके की तरह और उसी से वंचित रहना पडे तो सारी मेहनत पर पानी न फ़िर जाए , आखिर एक मुकम्मल स्थान पाने के लिये तो ये सारी जद्दोजहद की जाती है और फिर जब वो वक्त आता है जब अलग अलग स्थान देने के तो उस समय यही दाग काम आते हैं , आखिर दागी होना ही तो आज के युग मे ईमानदारी , सच्चाई की मिसाल बन कर सामने आया है तभी तो हर रावण अपने मंत्रिमंडल में हर दागी को स्थान देने को लालायित रहता है , आखिर पहचान दाग से ही बना करती है , लागा चुनरी में दाग मिटाऊँ क्यों कर ………जाके मंत्रिमंडल में स्थान पाऊँ अब तो ………जब तालाब मे सिर्फ़ खराब मछलियों का ही साम्राज्य हो तो कैसे कोई अच्छी मछली भला टिक सकती है , दागी मगरमच्छों की भेंट चढना ही उसकी नियति है ………आखिर इतना बडा साम्राज्य अनाडी नये नये पैदल मार्च करने वालों को तो नहीं सौंपा जा सकता इसलिये अलग अलग प्रान्तों के रावणों का एकजुट होना लाज़िमी है , सभी दागियों तो मंत्रिमंडल में स्थान देना लाज़िमी है आखिर मंत्रिमंडल के विस्तार में यही तो काम आयेंगे तभी तो जनता के बीच खौफ़ के बादल लहरायेंगे और फिर सब ठीक है की तर्ज पर रावण राज में सभी सुखी हो जायेंगे क्योंकि चुनने की , कुछ कहने या करने की हिम्मत आम जनता में कहाँ होती है , सारी राजनीति तो रावण के घर से शुरु होकर वहीं खत्म होती है , जनता तो मूकदर्शक होती है बस मूकदर्शक जिसका कोई कद नहीं , कोई परिमाण नहीं , कठपुतलियों की न दिशा होती है न दशा बस डोर खींचने वालों के हाथ में रहना ही उनकी नियति होती है क्योंकि जागकर क्या होना है आज के युग में तो राम का ही कत्ल होना है सच की चिता पर तो राम को ही जलना है और रावण ने राम के मरण पर अट्टहास ही करना है ……हा हा हा 

बुधवार, 12 मार्च 2014

ले तेरे शहर से आज हम अंजान हो गये

कोई भीगा हो तो जानेगा गीलेपन का अहसास
और यहां तो जंगल के जंगल रेगिस्तान हो गये

ना तुम वो रहे ना मैं वो रही
बस सब उम्र के बियाबान हो गये

जाने हुये अजनबी और दर्द की लकीरें
सब के सब खुद से अंजान हो गये

जो बोये थे कभी तुमने बबूल के बोर

सब के सब आज मेरी जान हो गये

कभी जीये थे जो इश्क की दास्तानों में

लम्हे वो सभी मेरे बेजुबान हो गये

क्या करे कोई फ़रमाईश क्या करे कोई शिकायत
जितने रकीब थे सभी मेरे मेहमान हो गये

अब जीने की आरज़ू ना मरने का रहा गम

जिस भी कूचे से गुजरे वहीं बदनाम हो गये

जिन रहबरोंसे गुजरा करते थे रात दिन

ले तेरे शहर से आज हम अंजान हो गये

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

यूँ ही नहीं नरक के दरोगा का तमगा खुद को दिया है उसने ..............

वो
मर्यादा की दहलीज पर
आस्था के बीज उगाती है
फिर 
रोज झाड़ू लगाती है 
कूड़ा कचरा साफ़ करती है
और 
रोज चौखट को लीपा करती है
रंगोलियाँ बनाया करती है
फिर 
उस पर पानी फेरा करती है
हर रंग मिटाया करती है
यूँ ही रोज वो 
एक नया जन्म दिया करती है
मगर किसे ?
खुद को या ज़िन्दगी को ?
शायद यूँ ही वो 
ज़िन्दगी से मुखातिब होती  है
और 
सिलसिला चलता रहता है
बनने मिटने का 
आस के दीप जलने बुझने का 
मौसम के बदलने का 
वक्त के कपडे बदलने का 
दिनचर्या 
चाहे कितनी बदली जाये 
वक्त की सीढियां चढ़ती 
अपनी ज़िन्दगी की पगडण्डी पर 
रौशन चिराग बुझाया करती है
वो यूँ इठलाया करती है 
और 
ज़िन्दगी से बतियाया करती है 
गर दे सकती है तू 
तो दे एक बार इम्तिहान
कसम है
पास नहीं होगी ........ए ज़िन्दगी 
तलवार की नोक पर नृत्य करना 
जो सीखा होता 
तुझे भी धारों पर चलना आया होता 

यूँ ही नहीं नरक के दरोगा का तमगा खुद को दिया है उसने ..............