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रविवार, 13 अप्रैल 2014

राकेश कुमार की नज़र में



वन्दना गुप्ता का प्रथम काव्य संग्रह बदलती सोच के नये अर्थ एक युवा कवियित्री का ऐसा संग्रहणीय लिखित दस्तावेज है जिसमें प्रेम के साथ विरह भी है, दर्शन भी है, एक स्त्री का सुंदर चारित्रिक चित्रण भी है, तमाम वर्जनाओं के प्रति मुखरता है और समाज के बदलते प्रतिमानों के प्रति एक प्रकार का विद्रोह भी है। यद्यपि पाठकों के पठन की सहजता की दृष्टि से कवियित्री ने इसे चार विभिन्न खण्डों में विभक्त करने की चेष्टा की है तथापि प्रत्येक खण्ड एक दूसरे से स्वयं को संबद्ध करती, प्रश्न-प्रतिप्रश्न के बीच उलझनों का स्वयं निवारण करती, प्रेम और दैहिक सम्मिलन जैसे जटिल विषयों में दर्शन का समावेश करती प्रत्येक पंक्तियां सात्विकता की कल्पना रूपी घृत में पवित्र लौ की भांति प्रज्जवलित प्रतीत होती है। अपनी कविता संग्रह का आरंभ उन्होने प्रेम रचनादेखो आज मुहब्बत के हरकारे ने आवाज दी है“, से की है। आज के युग में संचार माध्यमों के द्वारा आपस में दूरस्थ दो अन्जान व्यक्तियों के मध्य प्रेम के बीज का स्वआरोपण एवं अंकुरण तथा पल्लवन को कविता में श्रृंगार के माध्यम से उकेरने की चेष्टा के बीच पाठक के हृदय चक्षु में विरह अश्रु का अनायास आयातित होना, उनके लेखन कौशल का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यद्यपि उन्होने रचना के आरंभ को श्रृंगार से प्रारंभ करने का प्रयास किया है, किंतु मध्य में ही उन्होने विरह की कल्पनाओं से पाठकों को द्रवित करने की चेष्टा की हैं। शायद कवियित्री यह भलीभांति जानती हैं कि मिलन तो प्रेम का सतही एवं मलिन स्वरूप होता है, वास्तव में विरह उसे सुंदरता प्रदान करता है। अपनी दूसरी कविता तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हस्ताक्षर हो में वे द्वापर युग की श्रीकृष्ण की परिकल्पना को शब्दों में उकेरती प्रतीत होती हैं। नायक के उन श्रृंगारिक अनुभूतियों को जिसमें वह नायिका को स्वयं की प्रतिकृति के रूप में महसूस करने लगता है, कदाचित् अकल्पनीय किंतु प्रेम की पराकाष्ठा को प्रतिबिंबित करता है। यह प्रेम के चरमोत्कर्ष की अवस्था है, जब मैं और तुम का भेद नायक और नायिका के मध्य सदा के लिये समाप्त हो जाता है। राधाजी, श्रीकृष्ण से यही प्रश्न करती हैं, वे कहती हैं किकान्हा तुमने मुझसे अपार प्रेम किया किंतु विवाह रूक्मणी से, यह कदाचित् उचित नही“, तब श्रीकृष्ण प्रेम की पराकाष्ठा को परिभाषित करते हुये कहते हैं किराधा विवाह तो उनके बीच किया जाता है जिनके मध्य तुम और मैं का भेद विद्यमान हो। किंतु जब प्रेम अपने उच्चतम उत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है, तब तुम और मैं का भेद भला कहाँ रह जाता है, मैं तो तुममे और स्वयं में कोई भेद ही नहीं कर पाता हूँ और क्या यह संभव है कि मैं स्वयं से विवाह कर लूँ? अपनी अगली कविताओं में भी कवियित्री ने प्रेम के सात्विकता पर बल देने की चेष्टा की है, प्रेम दैहिक आकर्षण से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है, यह कवियित्री ने बार-बार रेखांकित करने की चेष्टा की है। आज के युग में जब प्रेम पूरी तरह स्वार्थपरक और शारीरिक आकर्षण से इतर कुछ भी नहीं रह गया है, ऐसे में इस तरह की अलहदा विचार को जिंदा रख शब्दों में उकेर पाठकों तक परोसना, कवियित्री के उज्जवल दृढ़ सोंच को प्रतिबिंबित करता है। कवियित्री अपनी कविता प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या...? में अपनी कविता के माध्यम से पाठकों को वैचारिक द्वंद में धकेल देती हैं। प्रेम की संपूर्णता दैहिक समर्पण में है अथवा आत्मिक मिलन में ? क्या प्रेम बिना दैहिक अनुभूति के अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकता ? दो देह का मिलन प्रेम की पराकाष्ठा को परिलक्षित करता है अथवा प्रेम के निरंतर हव की ओर अग्रसर होने वाले एक चरम बिंदु को चिन्हित करता है ? इन सभी विचारों के द्वंद में पाठक स्वयं को जैसे ही उलझा हुआ महसूस करता है हीं इसके पश्चात की कवितायें इन प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने में स्वयं मददगार साबित होती हैं। अपनी कविताएक अधूरी कहानी का मौन पनघटमें कवियित्री अपनी इन पंक्तियों के सहारे इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे देती हैं
फिर क्या करूंगा तुम्हे पाकर
हाँ तुम्हे ही खो दूं हाँ...
खोना ही तो हुआ ना
एक निश्छल प्रेम का
काया के भंवर में डूबकर
और मैं जिंदा रखना चाहता हूं,
हमारे प्रेम को,
अतृप्ति के क्षितिज पर देह के भूगोल से परे
वास्तव में प्यार सत्यम् ,शिवम्, सुन्दरम् के गूढ़ अर्थों को स्वयं में समेटे ईश्वर का दिया अनुपम उपहार है। यह उम्र की सीमाओं से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है। जहाँ प्यार है, वहाँ जीवन है और जहाँ सत्य है, संयम है, विश्वास और पारदर्शिता है, वहाँ प्यार के बीज सीप से निकले मोती की तरह चमकते हैं।प्रेम कभी प्रौढ़ नहीं होतामें कवियित्री जैसे इन्ही विचारों को रेखांकित करने की चेष्टा करती प्रतीत होती हैं। कवियित्री प्रेम कविताओं के आगे स्त्री विषयक प्रसंगों को जैसे ही छूने की चेष्टा करती हैं, उनके भीतर की ज्वालामुखी फट पड़ती है। बरसों से घर की चारदीवारी के भीतर सतायी हुई एक स्त्री की संवदेनायें जब भीतर तक आहत होती हैं, तब किस़ तरह मर्यादा की सीमारेखा तटबंधनों को तोड़ पूरी व्यवस्था को नेस्तनाबू कर देती है। इसे उन्होने बखूबी चित्रित करने की कोशिश की है। इसे विडंबना ही कहें कि इस प्रगतिशील समाज का दंभ भरने वाले हर घरों में आज स्त्री किसी ना किसी रूप में शोषित और प्रताड़ित है। कवियित्री अपनी कविताघायी औरतके माध्यम से उत्पीड़ित स्त्री के मन में उपज रहे इस विद्रोह को शब्दों का रूप देने का प्रयत्न करती है। कविताऋतुस्त्राव से मीनोपाज तक के सफर में एक कन्या से स्त्री बनने तक के शारीरिक एवं मानसिक मनोभावों का प्रभावपूर्ण रेखांकन है। एक कन्या में शनैः-शनैः विकसित होने वाले शारीरिक एवं मानसिक भावनात्मक लक्षण तथा एक संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना के लिये तैयार होने के पूर्व उभरने वाले शारीरिक लक्षणों के मध्य कन्या के मासिक उद्वेग एवं मनोभावों का चित्रण बेहद प्रभावी है वहीं इसके अवसान काल के प्रति एक स्त्री की आशंका का चित्रण पढ़ जैसे हृदय कांप उठता है। कवियित्री जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, वैसे-वैसे स्त्रीगत् संवदेनाएं और मुखर होते जाती है। पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों के लिये वर्जनात्मक विषयों के प्रति कवियित्री के विद्रोह के स्वर आज की प्रगतिशील नारी के सोच को प्रतिबिंबित करती है। वंदना अपनी कविताइतना विरोध का स्वर क्यूँमें एक स्त्री के प्रति पुरूष की परंपरागत सोच को बदलते हुये जैसे वह कहना चाहती है कि अब स्त्री केवल पुरूष के सौदर्य उपासना का साधन मात्र नहीं है और ना ही वह उसके चक्षुओं को तृप्त करने अथवा दैहिक उपभोग के लिये कोई वस्तु है। अब वह पुरूषों के परंपरागत सौंदर्य विशेषणों, उपमाओं एवं चिकने-चुपड़े अलंकारों से मुक्त होकर समाज के भीतर अपने अधिकारों की अपेक्षा रखती है। वह अजंता-एलोरा की भित्तचित्रों से निकलकर समाज में अपनी उपस्थिति का अहसास चाहती हैं। यह बेहद संवेदनशील नितांत मौलिक एवं नया विषय है, जिस पर कवियित्री ने अपने कलम से आधुनिक स्त्रियों के भीतर कुलबुलाती आहत किंतु मौन संवेदनाओं को शब्द देने की चेष्टा की है।
कवियित्री ने कुछ पौराणिक पात्रों को भी अपनी विषयवस्तु का आधार बनाया है और वर्तमान प्रगतिशील नारी के सापेक्ष उस चरित्र के समालोचना करने की चेष्टा की है। यह सत्य है कि पुरातन भारतीय समाज, स्त्रियों के संदर्भ में तमात तरह की वर्जनाओं एवं परिहार प्रथाओं का शिकार रहा है। एक पुरूष की अंधत्व की पीड़ा को स्वयं की नियति समझ कर स्वीकार कर लेना गांधारी के पतिव्रत धर्म के स्वस्वीकारोक्ति को दर्शाता है अथवा पुरूषप्रधान समाज के द्वारा एक स्त्री को नैतिकता के दलदल में धकेल पुरूष के दुर्भाग्य को ही भाग्य स्वीकार करवाने की पुरूषोचित कुंठित सोच को, यह बहस का विषय हो सकता है किंतु माता के रूप में गांधारी के कर्तव्य पलायन पर ना तो कोई प्रश्नचिन्ह है और ना ही कोई विवाद। एक संपूर्ण समाज के विलोपन के लिये गांधारी को दोषी ठहरा जब अपनी पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री लिखती हैं
मैं इक्कीसवीं सदी की नारी
नकारना चाहती हूं,
तुम्हारे अस्तित्व को .....
देना चाहती हूं, तुम्हे श्राप
तो जैसे समस्त पंक्तियां अपने विचारों के ज्वार के साथ कंपन करने लगती हैं
स्त्रियां आज सभ्रांत घरों में शोषित और उपेक्षित है। उसकी प्रतिभायें अधिकतम संघर्ष के पश्चात स्वीकार्य होती हैं और स्थापित होने में तो कदाचित् बरसों लग जाते हैं। कवियित्री अपनी रचनाकागज ही तो काले करती होमें जिस व्यथा का चित्रण करती हैं, वह रचनाकार के रूप में उभरती कमोबेश हर स्त्री की प्रारंभिक व्यथा है,जिससे उबरने में या तो उन्हे अपनी पूरी ताकत झोंक देनी होती है या फिर उबरने के पहले ही घर की देहरी पर दम तोड़ देती हैं। कवियित्री समाजिक विषयों में, भ्रूण हत्या, स्त्रियों के शोषण,बदलते सामाजिक चरित्र को बड़ी बेबाकी से कहने का प्रयास करती हैं, कई बार ऐसा करते हुये उनकी पंक्तियां उनके अतिशय क्रोध का भी शिकार हुई हैं, कदाचित् ज्वलंत विषयों की ओर ध्यान आकृष्ट करते ऐसा हुआ होगा किंतुखोज में हूं अपनी प्रजाति के अस्तित्व कीमें वे घटते लिंगानुपात पर बेहद चतुराई से प्रहार करती हैं। कवियित्री जब अंत में सभी तरह के विषयो से होते हुये दर्शन में प्रवेश करती हैं, तो उसके लिये प्रेम की संपूर्णता मिलन ना होकर विरह हो जाता है। वह यह स्वीकार कर लेती है कि वास्तव में विरह प्रेम का सौंदर्य है, प्रेम रूपी नन्हा सा पौधा तो विरह के अश्रु से सिंचित हो सर्वाधिक पुष्ट होता है। प्रेम वह स्वर्ण कणिका है जो विरह की धधकती ज्वाला में जितनी तपती है उतनी ही अधिक दृढ़ता से आलोकित होती है।अपनी कविताओह मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतममें अपनी इन पंक्तियों में अपने भाव को व्यक्त करती हैं।
अपूर्णता में संपूर्णता का आधार ही तो
व्याकुलता को पोषित करता है। ...
प्रेम के बीच विरह की कणिकायें जब और अधिक पल्लवित और पुष्टित होने लगती है अर्थात जब यह चमोत्कर्ष की ओर बढ़ने लगता है तो प्रेम पूजा का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। वास्तव में जब कोई वस्तु एवं भाव अलभ्य हो जाये तो उसमें श्रद्धा का अंकुरण अनायास किंतु स्वाभाविक है। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम के स्वरूप को इसी नजरिये से देखा जा सकता है।प्रेम अध्यात्म और जीवन दर्शनमें जैसे वे यही कहती हैं। अपने दर्शन विषयों से संबंधित अगली कविताओं में कवियित्री नेमैंके विलोप पर बल देने की चेष्टा की है। कवियित्री ने आचार्य रजनीश से संबंधित एक विषय को अपनी कविता में उठाया हैसम्भोग से समाधि तक इस कविता में भी उन्होने पुरूष केमैंसे संबद्ध दृष्टिकोण को नकारने की चेष्टा की है। दैहिक सम्मिलन में पुरूष का अहम्, सर्वत्रमैंके प्रति उसका अभिमान, स्त्रियों के प्रति इस अवस्था में भी दोयम सोच और इन सबके बीच आत्मिक आनंद से वंचित, इसके वास्तविक स्वरूप आध्यात्म से इस अवस्था में भी साक्षात्कार ना कर पाने, वासना के दलदल से बाहर ना निकल पाने के पुरूषवादी सतही मानसिकता को कवियित्री जैसे सिरे से नकारना चाहती हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में एक स्थान पर लिखा गया हैसंभोग आनंद की पराकाष्ठा हैकिंतु इसका वास्तविक अर्थ वासनात्मक भोग-विलास नहीं है बल्कि जीवों का सम सम्मिलन है, जिसे वंदना गुप्ता अपनी कविता में उठाते हुये इसके वास्तविक अर्थ से जोड़ने का प्रयत्न करती हैं, वे एक स्थान पर लिखती हैं
जीव रूपी यमुना का,
ब्रह्म रूपी गंगा के साथ,
संभोग उर्फ संगम होने पर
सरस्वती में लय हो जाना ही आनंद या समाधि है।
और यही उपनिषदों में लिखे उपरोक्त शब्दों का भी उद्देश्य है, इस लिहाज से उनकी दर्शन से संबंधित कवितायें उपनिषदों एवं वेदों में लिखे उद्धरणों के करीब हैं। प्रायः यह कहा जाता है किसाहित्य समाज का दर्पण होता है” , किंतु मेरी नजर में जब तक उसमें भविष्य की बेहतर संभावनाओं के प्रति एक दृष्टि ना हो, उसमें समस्याओं के समाधान के मौलिक सृजन के संकेत विद्यमान ना हो तब तक ऐसा साहित्य निहायत ही खोखला एवं केवल समय व्यतीत करने तथा मनोरंजन के योग्य मात्र होता है और मुझे ऐसे साहित्य से परहेज है। वंदना गुप्ता के साहित्य सृजन में समस्या भी है, समाधान भी है और इन समस्याओं के समाधान की दिशा में एक साहित्यकार की स्वयं की दृष्टि एवं मौलिक सो भी है। कवियित्री एक साहित्यकार होने के साथ-साथ प्रबुद्ध सामाजिक प्राणी भी है जिनमें समाज में हो रहे नकारात्मक परिवर्तन के प्रति आक्रोश है और यही आक्रेाश उनकी कविताओं में कहीं घटते लिंगानुपात तो कहीं स्त्रियों के शोषण की व्यथाओं के आक्रेाश के रूप में उभरा है। कवियित्री समाधान चाहती हैं, पुरूषवादी सोंच में परिवर्तन कर तथा समाज में स्त्रियों के भीतर चेतना की लौ जगाकर। वह स्त्रियों की बेचारगी की पुरूषवादी दृष्टिकोण से उबरना चाहती है और हमें इस विचार का स्वागत करना चाहिये।
अंत में का जा सकता है कि सभी कवितायें बेहद प्रभावी, वैचारिक समझ एवं नयी सोच का बीजारोपण करने वाली है, सरल शब्दों का प्रयोग कर कवियित्री ने अधिकाधिक पाठकों के बीच हुँचने का प्रयत्न किया गया है। रस, अलंकार, छंद स्वआयातित हैं। कहीं-कहीं कविताओं ने अनावश्यक विस्तार पाया है, कदाचित् इसे बचा जा सकता था, किंतु संभवतः प्रत्येक कवि के साथ उनकी प्रारंभिक रचनाओं में इस तरह की स्वाभाविकता देखने को मिलते हैं, जो आने वाली रचनाओं के साथ स्वतः ठीक हो जाती है। पुस्तक पठन के योग्य है, साहित्य के क्षेत्र में यह एक संग्रहणीय रचना है। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ, साहित्य के विशाल क्षितिज पर उनका अभिनंदन करता हूं।
सादर
राकेश कुमार
प्रशासनिक कार्यालय
हिर्री डोलोमाईट माईंस
भिलाई इस्पात संयंत्र
जिला-बिलासपुर (छतीसगढ. )

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4 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और सार्थक समीक्षा...शुभकामनायें!

Anil Kumar ने कहा…

हार्दिक बधाई!

pran sharma ने कहा…

VANDANA JI MEREE PRIY KAVITRIYON
MEIN HAI .UNKAA GADYA HEE NAHIN PADYA BHEE MUJHE HAMESHAA BHAAYAA HAI . UNKE KAVYA SANGRAH PAR SHREE RAAKESH KUMAAR KI SMEEKSHA
BADEE SAARTHAK LAGEE HAI . UNHEN
HARDIK BADHAAEE .

kiran sahu ने कहा…

Very nice article hamesha aise behtareen lekh post karte rahen*
Bahut bahut dhanyawad*
Aapse request hai aap hamare blog par v jarur visit karen hame behat khushi hogi and apko v shayad bahut achha lage.


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Hope aap visit karen.
Thanks again*
with regards
Kiran Sahu*