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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

बालार्क की ग्यारहवीं किरण




बालार्क की ग्यारहवीं किरण तो खुद किरण है तो कैसे ने उसकी आभा प्रस्फुटित होगी , कैसे न अपनी रश्मि से आलोकित करेगी पाठकों के मन का कोना कोना।  जी हाँ मैं बात कर रही हूँ किरण आर्य की जिनकी सात रचनाओं को संग्रह में स्थान मिला।  

" गिरगिट " के माध्यम से आज के इंसान की रंग बदलती प्रवृत्ति पर करारा प्रहार किया है कैसे सारे मूल्यों को एक तरफ कर इंसान आज सिर्फ स्वार्थ की वेदी पर सिर्फ अपनी आकांक्षाओं के फूल खिलाने को आतुर है कि सही और गलत का फर्क भी भूल गया है. 

" स्वछन्द विचरते भाव " तो कविता के उद्देश्य को स्वयं ही प्रस्तुत कर रहे हैं कि भाव रुपी पंछी जब मन के धरातल पर उतरता है तो कैसे अठखेलियां करता है , कभी सपनो को तो कभी हकीकत को बयां करता है और कवि को कर देता है मुक्त सृजन की पीड़ा से जब स्वयं प्रस्फुटित होता है. 

" आत्मचिंतन " के माध्यम से यही कहना चाहा है कि जब मानव चारों तरफ से परेशां हताश हो जाता है तब आत्मचिंतन की ओर उन्मुख होता है तभी उसका खुद से साक्षात्कार होता है , तभी ईश्वर और जीव का फर्क दूर होता है। 

" पानी जीवन स्त्रोत " में बूँद बूँद पानी की क्या कीमत है वो बतायी है। 

" मन की उदासी " जीवन जीने की जीजिविषा का शानदार चित्रण है जिसे चींटी के माध्यम से चंद लफ़्ज़ों में कवयित्री ने उकेरा है कि कैसी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हों कभी हौसला नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि हौसला रखने वाले ही अगले दिन का सूरज देखा करते हैं , सर उठा कर जिया करते हैं।  

"चाँद और मानुष " में भावों का उत्कृष्ट संगम किया है साथ ही चाँद से मानव के सम्बन्ध को तो उकेरा ही है साथ ही उसकी और पाने की लालसा को भी बड़ी खूबी से बयां किया है कि आखिर कब तक हम ईश्वर प्रदत्त प्रकृति का शोषण करते रहेंगे महज अपनी तुच्छ लालसाओं , इच्छाओं की आपूर्ति हेतु कुछ इस प्रकार :

" प्रकृति और पृथ्वी से कर खिलवाड़ वो हारा 
अब लालसाओं ने उसकी चाँद को है निहारा " 

 अंतिम कविता " आग " सबसे सुन्दर और सार्थक रचना है जिसमें कवयित्री ने आग को माध्यम बना ज़िन्दगी में उमड्ती घुमडती चाहतों और हवस पर प्रहार किया है कि आग सार्थक भी है यदि उसका सदुपयोग किया जाये , यदि उसमें संभावनायें तलाशी जायें और दूसरी आग वो जिस पर हम अपनी स्वार्थ की रोटियाँ सेंकने को आतुर होते हैं , जहाँ सिर्फ़ अपना मैं ही अहम होता है , जहाँ सिर्फ़ खुद की पहचान बनाना ही सर्वोपरि होता है फिर उसके लिये अपनी खुद्दारी को भी ताक पर क्यों न रख दिया जाये , उसके लिये चाहे देश , समाज की भी अनदेखी क्यों न कर दी जाये क्योंकि पेट की आग तो बुझ भी जाती है मगर तुच्छ कामनाओं की आग से बचना संभव नहीं । 

कवयित्री में सम्भावनाओं की फसल लहलहा रही है बस जरूरत है उस दिशा में कदम बढ़ाने की।  कवयित्री के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए फिर मिलेंगे जल्दी ही। 

इस बार की देरी की वजह सभी जानते हैं मेरी खुद की बुक आयी थी तो उसी में लगी रही और कुछ तबियत ठीक नहीं रही इसलिए श्रृंखला बीच में टूट गयी उम्मीद है आगे सिलसिला जारी रहेगा।  

जल्द मिलती हूँ अगले कवि के साथ ……… 

रविवार, 30 मार्च 2014

अब कौन करे चिन्तन या मनन

मुझमे ज़हर भर चुका  है और वो भी इतना कि  अब संभालना मुश्किल हो रहा है इसलिए आखिरी हथियार के तौर पर मैंने  विष वमन करने का रास्ता अख्तियार  किया  . क्योंकि यहाँ तो चारों तरफ विष का नाला बह रहा है . दुनिया में सिवाय विष के और कुछ दिख ही नहीं रहा . हर चेहरे पर एक जलती आग है , हर मन में एक उबलता तूफ़ान है , चारों तरफ मचा हाहाकार है , जिसने जितना मंथन किया उतना ही विष निकला और उसे उगल दिया फिर चाहे व्यवस्था से नाराज़गी हो या घर से मिली उपेक्षा हो , फिर चाहे अपनी पहचान बनाने के लिए जुटाए गए हथकंडे हों या खुद को पाक साफ़ दिखाने की कवायद में दूसरे  को नीचा दिखाने की कोशिश , या फिर बेरोजगारी , भ्रष्टाचार , दरिंदगी, व्यभिचार , घोटालों से घिरा आम आदमी हो या उच्च पदासीन या उच्च वर्ग को देख खुद को कमजोर समझने की लिप्सा हो विष ने जकड लिया है चारों तरफ से ........सभी को चाहे नेता हो या राजनेता या आम आदमी , उच्च वर्गीय या मध्यम या निम्न वर्गीय सबकी अपनी अपनी परेशानियों से उपजी अव्यवस्था विष का कारण  बनी ...............और मैं कैसे अछूता रह सकता था ..........नाम कमाने की लिप्सा ने मुझे भी आंदोलित किया , जल्द से जल्द अपनी पहचान बनाने की चाह में मैंने न जाने कितने सह्रदयों के ह्रदयों को दुख दिया , अवांछित हस्तक्षेप किया उनकी ज़िन्दगी में , सिर्फ खुद की पहचान बनाने के लिए ........उनके खिलाफ विष वमन किया और हल्का हो गया .................और मुझे एक स्थान मिल गया ....... और आज मैं खुश हो गया बिना परवाह किये कि  जिसके खिलाफ विष वमन किया उसकी ज़िन्दगी में या उस पर क्या प्रभाव पड़ा ..............बस इस सोच ने ही आज ये स्थिति ला खडी की है और हम ना जाने क्यों चिंतित नहीं हैं …………खुश हैं व्यवस्था की असमाजिकता से,इस अव्यवस्था से………आदत हो चुकी है और जो आदतें पक जाती हैं वो जल्दी बदली नहीं जातीं फिर चाहे मानसिक गुलामी हो या शारीरिक …………फिर क्या फ़र्क पडता है समाजिक व्यवस्था सुधरे ही या नहीं ………अब कौन करे चिन्तन या मनन।



गुरुवार, 27 मार्च 2014

एक आम चेहरा भर ही तो हूँ

एक आम चेहरा भर ही तो हूँ 

नहीं लिखनी मुझे बनारस की सुबह , नहीं लिखनी मुझे दिल्ली की सर्दी , नहीं लिखनी मुझे मुंबई की शाम ...........बहुत हो चुका लिखना ये सब तो ........कब से इसी के आस पास तो घूम रही है ज़िन्दगी  और ज़िन्दगी के दर्शन ...........मैं हूँ कौन लिखने वाला ..........एक आम चेहरा भर ही तो हूँ ........अपने मौन के मगध में भ्रमण करता .............दर्शक दीर्घा का एक अंजान चेहरा जो वो देखता  है जो तुम दिखाते हो , वो जानता है जो तुम जनाते हो और वो करता है जो तुम करवाते हो ............तुम कौन ? कुछ अदद सरपरस्त जिन्हें शौक है सरपरस्ती का , जिन्हें शौक है खुद को सिद्ध करने का , जिन्हें शौक है विश्व पटल पर छाये रहने का और मैं दौड़ पड़ता हूँ तुम्हारी दिखाई झबरीली राहों पर बिना जाने , बिना सोचे , बिना विचारे ............क्योंकि मेरा कोई गणित है ही नहीं .............मैं वो इकाई हूँ जो है तो बस सिर्फ इसलिए क्योंकि संख्या बढाई जा सके .........एक वाकया लिखा जा सके या एक समूह बनाया जा सके .........इतना भर है मेरा कोना , इतनी भर है मेरी पहचान, इतनी भर है मेरी अहमियत .............जिसे बताया ही नहीं जाता उसका उपयोग .............बस पढाया जाता है इतना पाठ तुम्हें लड़ना नहीं है जीना है एक सादी सुकून भरी ज़िन्दगी और इसी को लक्ष्य बनाता मैं चल पड़ता हूँ भीड़ का हिस्सा बनकर ..........फिर कैसे मैं कुछ कह सकता हूँ या लिख सकता हूँ .............जब आँख होते हुए अँधा हूँ , जुबान होते गूंगा हूँ, कान होते बहरा हूँ .............नौ से पांच की ड्यूटी करता मेरा ढांचा दूसरा कोई दायरा जानता ही नहीं या जानना ही नहीं चाहता ............

मैं करता हूँ भ्रमण अपने विचारों के जंगल में जहाँ हवा किलोल कर रही होती है और कान में फुसफुसा जाती है कभी राजनितिक गलियारों की हलचलों को और मैं निकल पड़ता हूँ बिना जाने भीड़ का हिस्सा बनने  के लिए आखिर देश मेरा है , चलो एक आन्दोलन का हिस्सा बन जाने से शायद कोई अवार्ड मिल जाए , शायद व्यवस्था सुधर जाए , शायद कल आज़ादी की लडाई की तरह इसकी भी चर्चा हो और उन्हें सम्मानित करने का बीड़ा उठाया जाए तो मैं भी सम्मान की एक तश्तरी अपने सर पर रख सकूँ और गर्व से छाती ठोंककर कह सकूँ .....हाँ , हमने देखे हैं वो आन्दोलन , हम थे उसका हिस्सा .............आह ! कपोल कल्पना के रथ पर सवार मेरी विचारधारा का भ्रमण बिना आधार के कैसे धार पाए जब आँख मूंदकर चलना मैंने अपनी नियति बना लिया है , सवाल करना मैंने सीखा ही नहीं , सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रहना ही मेरा  लक्ष्य है ..........

मैंने सीखा ही नहीं चीत्कार करना ............क्या हुआ अगर हो गया कहीं कोई बलात्कार .........रोज का वाकया भर ही तो है ............क्या हुआ जो हो रही है रोज छेड़छाड़ ...........मुझे अपना पेट भरना है क्योंकि मेरे साथ कुछ नहीं हुआ .............आखिर किस किस से लड़ते रहे ............ ऐसे थोड़े जीया जाता है कि कुछ हुआ और चल पड़ो झंडा बुलंद करने ............अरे , मुझे अपने बीवी बच्चे , घर परिवार देखना है कहाँ है मेरे पास इतना वक्त जो इन बातों के लिए परेशां होता फिरूँ ...........ये काम तो नेताओं का है, ये काम तो स्वयंसेवी संगठनों का है , ये काम तो मानवाधिकार आयोग का है ...........और मैं इन सबसे परे हूँ ............आम चेहरा भर ही तो हूँ जिसे अपने दाल रोटी के अलावा सिर्फ वो ही दिखता है जो उसे दिखाया जाता है , वो ही सुनता है जो सुनाया जाता है और कहने भर को वो होता है जो पढवाया जाता है ...............अब ऐसे में कैसे आवाज़ बुलंद करूँ ?

मैं नियति का खेल हूँ , विधना का विधान हूँ जिसकी कोई पहचान नहीं ...............चल पड़ता हूँ जिधर हाँक दिया जाऊँ ............शोर जहाँ सुनाई दे , भीड़ जहाँ दिखाई दे , लहुलुहान जहाँ कोई दिखाई दे , बम विस्फोटों  में मरा  जहाँ कोई दिखाई दे ..............बस वो ही तो एक चेहरा हूँ जो सीख गया हूँ हालातों से समझौता करना , आज मरे कल दूजा सवेरा को अपने जीवन का दर्शन बनाना सीख गया हूँ ...........उधार  के सिन्दूर से मांग भरना सीख गया हूँ क्योंकि मैं नहीं बदल सकता तस्वीर को , क्योंकि हालात मेरे वश में नहीं, क्योंकि सिर्फ कोसना मेरी आदत है , क्योंकि सिर्फ जिरह करने पर मेरा अख्तियार है , क्योंकि लकीर का फ़क़ीर भर हूँ मैं जो वक्त के आईने में कोई तस्वीर देखना ही नहीं चाहता सिवाय अपने , क्योंकि मैं मान बैठा हूँ अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा , क्योंकि अपनी संगठित होने की शक्ति को मैं पहचान नहीं पाया , अपने अधिकार जान नहीं पाया , अपने कर्त्तव्य निभा नहीं पाया ............इसलिए कोई शिकायत नहीं , कोई गिला नहीं ..............मुझे पता है मेरा धर्म ..........हाँ धर्म पर चलने वाला ही मोक्ष पाता  है इसलिए कर आता हूँ हर 12 साल में कुम्भ स्नान और छोड़ आता हूँ पापों की गठरी गंगा के तट पर या कभी भीड़ का हिस्सा बन हादसे का शिकार बन जाता हूँ तो मुक्त कहलाता हूँ क्योंकि तीर्थस्थल पर प्राणों का जाना मुक्ति का संकेत है धर्मग्रंथों में वर्णित है और मैं बन जाता हूँ उस भीड़ का हिस्सा , मिल जाता है मेरी रूह को सुकून फिर चाहे वहां गंडे  ताबीजों के चक्कर में फंस जाऊं या हादसों का शिकार होकर मर जाऊँ ...........मोक्ष पक्का है और यही मेरा धर्म है अब चाहे उसके लिए व्यवस्था पर दोष लगाना पड़े मगर मैं खुद को धर्म विरुद्ध कैसे सिद्ध कर सकता हूँ ...........आखिर धर्म पर ही तो ये धरा टिकी है , आखिर धर्म ही तो हमारी संस्कृति की पहचान है और मैं उससे विमुख होने का पाप कैसे अपने सर ले सकता हूँ ...............फिर चाहे वहाँ कितनी ही अव्यवस्था फैले, चाहे सुगम साधन न हों तब भी मेरी धार्मिकता में कोई कमी नहीं आती , मैं पढ़ा लिखा होकर भी धर्मभीरु हूँ ............पढाई तो पेट भरने की विद्या है और धर्म मुक्ति की इतना तो जानता हूँ इसलिए कैसे अपने धर्म को तज सकता हूँ ..............मैं इस समाज की वो इकाई हूँ जिसके दम पर ही ये संस्कृति फूल फल रही है ऐसे में कैसे मैं इसमें दोष देख सकता हूँ और अपने सिर पाप ले सकता हूँ .............यही तो है मेरा चेहरा

मुझे पता भी चल जाए अपने अधिकारों का तब भी शॉर्टकट अपनाने से बाज नहीं आता क्योंकि वक्त नहीं है , क्योंकि सीधे रास्ते  जाने पर बहुत सी मुश्किलें हैं इसलिए रिश्वत देने और लेने में विश्वास रखता हूँ और जीवन सुचारू रूप से चलाता हूँ ..........आदि हो गया हूँ इन बातों का इसलिए फर्क नहीं पड़ता ..............क्या फायदा उस राह  जाने का जो वक्त पर काम ही न हो पाए उससे अच्छा है इस हाथ दे और उस हाथ ले .............कोई झंझट ही नहीं और वक्त पर काम भी हो गया सीख चुका हूँ काम निकलवाना ............. अब एक मेरे कुछ करने से सारी  व्यवस्था तो बदलने वाली है नहीं जो मैं उसके खिलाफ चलकर अपना समय बर्बाद करूँ ..............मेरी आवाज़ तो नक्कारखाने में तूती  की आवाज़ भर है किसी के खिलाफ शिकायत लेकर जाऊँगा तो उलटे मुझे ही अपना गला छूडाना महंगा पड़ेगा और जिसके खिलाफ लेकर जाऊँगा वो चैन से सोयेगा तो क्या फायदा ऐसा कदम उठाने का जिसमे खुद की जान ही सांसत में पड़ जाए इसलिए अपने अधिकारों को जानता हूँ और अपना कर्त्तव्य निभा देता हूँ एक अंगूठा लगाकर क्योंकि तस्वीर का जमा गुना तय करने वाला मैं कौन ............राजनितिक परिदृश्य के पीछे का चेहरा मैं नहीं होता , मैं नहीं लगाता  वहाँ बोलियाँ, मैं नहीं खरीदता वहाँ वोट तो क्यों सोचूँ और अपना वक्त बर्बाद करूँ ............मैं तो अधिकार और कर्त्तव्य निभा देता हूँ बाकि तो खरीद फरोख्त की दुनिया में मुझे क्या लेना देना कोई आये कोई जाए .........मेरी तस्वीर नहीं बदलनी, मेरा मुकाम नहीं बदलना , मेरा चेहरा नहीं बदलना ,,,,,,,,,,,,,मैं भीड़ हूँ, भीड़ का हिस्सा हूँ जो भीड़ में गुम  हो जाता हूँ और भीड़ के साथ ही चलता हूँ ..............फिर क्या फर्क पड़ता है मैं कुछ बोलूँ, कहूँ  या लिखूँ क्योंकि वक्ता नहीं, श्रोता हूँ ...........त्रासदियों , नाकामियों, हताशाओं  का वाहक !!!

सोमवार, 24 मार्च 2014

वो जो ढाँप कर नकाब मिलते हैं

वो जो ढाँप कर नकाब मिलते हैं 
दोस्त बन कर ही मुझे ठगते हैं 

प्याज की परत से जिनके छिलके उतरते हैं 
एक चेहरे में उनके हजार चेहरे दिखते  हैं 

सत्य के फेरों से जब गुजरते हैं 
मेरे अपने बन मुझे ही ठगते हैं 

रोने को न जब आँसू बचते हैं 
हम गिर गिर कर तब संभलते हैं 

मेरे पाँव से जो कालीन सरकाते हैं 
वो ही मुस्कुराकर गले अब मिलते हैं 

क़त्ल करने को तीर न तलवार चलाते हैं 
अपनेपन की बर्छियों से ही आस्तीनें काटे जाते हैं 

भरी दुनिया में गैर से खुद को लगते हैं 
जब अपनों द्वारा नकारे जाते हैं 

शनिवार, 22 मार्च 2014

इश्क की जुबाँ से

इश्क की जुबाँ से काला धागा उतरता ही नहीं 
जाने किस मौलवी ने बाँधा है 
कौन सा मन्त्र फूँका है 
जितना खोलने की कोशिश करूँ 
उतना ही मजबूत होता है 

सुना है 
काले धागे में बंधे ताबीज़ों की तासीर 
परेशान आत्माओं की मुक्ति का 
या फिर नज़र न लगने का सन्देश होती हैं 
और 
इश्क की नज़रें भला कब उतरी हैं 
इश्क में तो जिए या मरें 
आत्माएं न कभी मुक्त हुयी हैं 
शायद इसीलिए 
इश्क की जुबाँ पर काले धागों की नालिश हुयी है 




मंगलवार, 18 मार्च 2014

वो जो दहकते हैं मुझमें पलाश

ए 
सुलगती आग 
तुझे और दहकाऊँ कैसे 
झुलस तो चुकी  हूँ 
और भडकाऊँ कैसे 

और जो आँच 
बिना आग के सुलगा करती हैं 
वो उम्र भर न बुझा करती हैं 

फिर जलने के भी अपने नियम हुआ करते हैं  
मजबूरियों के पाँव भी सुलगा करते हैं 
वो जो दहकते हैं मुझमें पलाश 
वो न किसी सागर से बुझा करते हैं 

जलने के भी अपने शऊर हुआ करते हैं 
हर बार चूल्हे की आग से ही जलना जरूरी तो नहीं होता ना

शनिवार, 15 मार्च 2014

लागा चुनरी में दाग मिटाऊँ क्यों कर …

एक खूँखार वक्त में जीते हैं हम या खूँखार हैं हम तो वक्त सहम गया है हमारी खूँखारी तबियत से क्योंकि वक्त की आँख में आँसू नहीं होते मगर निशान बहुत दूर तक साथ साथ चलते हैं , कुछ गुनाह किसी कसौटी पर न तुलते हैं ऐसे में आम आदमी जाए कहाँ किधर देखे , किसे अपना समझे , कहाँ आवाज़ बुलन्द करे जब उसे कुचलने को धारदार हथियार तैयार हों , शब्दों के बाणों से धराशायी करने को , चरित्र की उज्ज्वलता को लहुलुहान करने को तैयार हों सारे रावण एक साथ क्योंकि कैसे किसी राम ने किसी रावण की बनायी लंका में प्रवेश किया , कैसे उसके बनाए प्रतिमानों को ध्वस्त किया आखिर इतने वक्त से जो घडा भरा था लहू से कैसे उससे वंचित हों , ये तो रावण के वंशजों का अधिकार है , कैसे कलई खुल जाए , कैसे रावण के वंशजों का समापन हो जाए आखिर एकजुटता से ही तो साम्राज्य बना करते हैं , आखिर घोटालों के लिये अपने ही तो काम आया करते हैं , ये दाग ही तो उनकी पहचान बनते हैं ऐसे में यदि बेदागों को स्थान दे दिया जाये तो कैसे संभव है आतंक के साम्राज्य का कायम रहना , आखिर इतनी मेहनत से सफ़ेद दामन पर दाग लगाया जाता है नज़र के टीके की तरह और उसी से वंचित रहना पडे तो सारी मेहनत पर पानी न फ़िर जाए , आखिर एक मुकम्मल स्थान पाने के लिये तो ये सारी जद्दोजहद की जाती है और फिर जब वो वक्त आता है जब अलग अलग स्थान देने के तो उस समय यही दाग काम आते हैं , आखिर दागी होना ही तो आज के युग मे ईमानदारी , सच्चाई की मिसाल बन कर सामने आया है तभी तो हर रावण अपने मंत्रिमंडल में हर दागी को स्थान देने को लालायित रहता है , आखिर पहचान दाग से ही बना करती है , लागा चुनरी में दाग मिटाऊँ क्यों कर ………जाके मंत्रिमंडल में स्थान पाऊँ अब तो ………जब तालाब मे सिर्फ़ खराब मछलियों का ही साम्राज्य हो तो कैसे कोई अच्छी मछली भला टिक सकती है , दागी मगरमच्छों की भेंट चढना ही उसकी नियति है ………आखिर इतना बडा साम्राज्य अनाडी नये नये पैदल मार्च करने वालों को तो नहीं सौंपा जा सकता इसलिये अलग अलग प्रान्तों के रावणों का एकजुट होना लाज़िमी है , सभी दागियों तो मंत्रिमंडल में स्थान देना लाज़िमी है आखिर मंत्रिमंडल के विस्तार में यही तो काम आयेंगे तभी तो जनता के बीच खौफ़ के बादल लहरायेंगे और फिर सब ठीक है की तर्ज पर रावण राज में सभी सुखी हो जायेंगे क्योंकि चुनने की , कुछ कहने या करने की हिम्मत आम जनता में कहाँ होती है , सारी राजनीति तो रावण के घर से शुरु होकर वहीं खत्म होती है , जनता तो मूकदर्शक होती है बस मूकदर्शक जिसका कोई कद नहीं , कोई परिमाण नहीं , कठपुतलियों की न दिशा होती है न दशा बस डोर खींचने वालों के हाथ में रहना ही उनकी नियति होती है क्योंकि जागकर क्या होना है आज के युग में तो राम का ही कत्ल होना है सच की चिता पर तो राम को ही जलना है और रावण ने राम के मरण पर अट्टहास ही करना है ……हा हा हा 

बुधवार, 12 मार्च 2014

ले तेरे शहर से आज हम अंजान हो गये

कोई भीगा हो तो जानेगा गीलेपन का अहसास
और यहां तो जंगल के जंगल रेगिस्तान हो गये

ना तुम वो रहे ना मैं वो रही
बस सब उम्र के बियाबान हो गये

जाने हुये अजनबी और दर्द की लकीरें
सब के सब खुद से अंजान हो गये

जो बोये थे कभी तुमने बबूल के बोर

सब के सब आज मेरी जान हो गये

कभी जीये थे जो इश्क की दास्तानों में

लम्हे वो सभी मेरे बेजुबान हो गये

क्या करे कोई फ़रमाईश क्या करे कोई शिकायत
जितने रकीब थे सभी मेरे मेहमान हो गये

अब जीने की आरज़ू ना मरने का रहा गम

जिस भी कूचे से गुजरे वहीं बदनाम हो गये

जिन रहबरोंसे गुजरा करते थे रात दिन

ले तेरे शहर से आज हम अंजान हो गये

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

यूँ ही नहीं नरक के दरोगा का तमगा खुद को दिया है उसने ..............

वो
मर्यादा की दहलीज पर
आस्था के बीज उगाती है
फिर 
रोज झाड़ू लगाती है 
कूड़ा कचरा साफ़ करती है
और 
रोज चौखट को लीपा करती है
रंगोलियाँ बनाया करती है
फिर 
उस पर पानी फेरा करती है
हर रंग मिटाया करती है
यूँ ही रोज वो 
एक नया जन्म दिया करती है
मगर किसे ?
खुद को या ज़िन्दगी को ?
शायद यूँ ही वो 
ज़िन्दगी से मुखातिब होती  है
और 
सिलसिला चलता रहता है
बनने मिटने का 
आस के दीप जलने बुझने का 
मौसम के बदलने का 
वक्त के कपडे बदलने का 
दिनचर्या 
चाहे कितनी बदली जाये 
वक्त की सीढियां चढ़ती 
अपनी ज़िन्दगी की पगडण्डी पर 
रौशन चिराग बुझाया करती है
वो यूँ इठलाया करती है 
और 
ज़िन्दगी से बतियाया करती है 
गर दे सकती है तू 
तो दे एक बार इम्तिहान
कसम है
पास नहीं होगी ........ए ज़िन्दगी 
तलवार की नोक पर नृत्य करना 
जो सीखा होता 
तुझे भी धारों पर चलना आया होता 

यूँ ही नहीं नरक के दरोगा का तमगा खुद को दिया है उसने ..............


बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बदलती सोच के नए अर्थ के ये हैं कुछ सोपान

ये हैं कुछ झलकियाँ विश्व पुस्तक मेले की जहाँ मैं , अपने प्रथम संग्रह " बदलती सोच के नए अर्थ " और अपने सभी मित्रों के साथ ……… तबियत खराब होने की वजह से देर से आपके सामने आ पायी हूँ …………एक सुखद अहसास से भरपूर समय रहा जहाँ जाने कितने जाने और अनजाने मित्रों से मिलना हुआ मानो दूरियाँ सिमट गयी हों और एक जगह केन्द्रित हो गयी हों 


























 कुछ झलकियाँ और आपकी प्रतीक्षा में हैं ………सभी मित्रों से मिलना, उनके द्वारा उत्साहवर्धन किया जाना और उनके द्वारा पुस्तक खरीद कर पढे जाने की ज़िद ने इस बार पुस्तक मेले को एक नया आयाम दिया फिर चाहे वो बडे बडे साहित्यकार ही क्यों ना हों जो बताता है कि एक नयी परम्परा की तरफ़ आज की पीढी ने एक नया कदम रख दिया है और कोई शक नहीं कि आने वाला कल कविता के भविष्य को उज्ज्वलता प्रदान करेगा




















और अब सबसे जरूरी बात : 

जिसके अपरिमित सहयोग के बिना मेरी बुक आपको इस बार के पुस्तक मेले में दिख ही नही सकती थी तो वो है बेहद सहज , सरल और निश्छल हिंद युग्म के संचालक शैलेष भारतवासी जिसको शुक्रिया अदा करने के लिये मेरे पास शब्द ही नहीं हैं क्योंकि मेरे प्रकाशक का तो स्टाल इस मेले में था नही और ऐसे में किसी और प्रकाशक की पुस्तक को अपने स्टाल पर स्थान देना शैलेष के अद्भुत और बडे दिल वाले व्यक्तित्व को ही दर्शाता है और मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं जिनसे मैं शैलेष का शुक्रिया अदा कर सकूँ बस उसके लिये हर पल दिल से सिर्फ़ और सिर्फ़ दुआयें ही निकल रही हैं और चाहती हूँ मेरे सभी दोस्त उसके लिये दुआओं का ये सिलसिला कायम रखें मेरे साथ 


बाकी और सूचनायें और फ़ोटो बाद में :)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं

दोस्तों



इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं और हाजिर है " हिन्दी अकादमी दिल्ली " से स्वीकृत मेरी पुस्तक मेरी पुस्तक " बदलती सोच के नए अर्थ " आपके अपने जाने माने प्रकाशन हिन्द युग्म पर

हाल नंबर 18
स्टाल नंबर 14 

मूल्य मात्र ------ १२० रूपये

और मैं तो सभी दोस्तों से मिलने को आपकी सेवा में हाजिर रहूँगी ही 
 — 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

" चलो कुछ बात करें " -------मेरी नज़र से



मृदुला प्रधान का कविता संग्रह " चलो कुछ बात करें " एक प्रकृति प्रेमी का संग्रह सा लगा जहाँ कवयित्री अपनी हर बात को प्रकृति को माध्यम बनाकर कहने की कोशिश करती है और प्रकृति से कविता का संयोग इस तरह बैठाती है कि प्रकृति के रस मन के बीहड़ों को भी उपवन बना देते हैं क्योंकि प्रकृति जब अपना सौदर्य बिखेरती है तो पतझड़ भी बसंत सा खिलखिला जाता है तभी तो कवयित्री सबसे पहले " माँ सरस्वती " की वंदना से आह्वान करती है अपने लेखन का और फिर कहीं " दूब पर " .... हो या  " बसंत मालती " हो या " सूर्योदय " हो या " सूर्यास्त " या फिर हो " बरसात की रात " या फिर हो " नीम का एक पेड़ " , " पेड़ों के पीछे अलसाया " होली का त्यौहार " , " ओस " , " नारियल के पेड़ों " या " गुलमोहर की " या सूरज का घर " या " शीत का प्रथम स्वर " या " महानगर की धुप " जाने कितनी ही कवितायेँ और हैं जहाँ प्रकृति के रंगों की छटा के साथ दिल के रंग भी उकेरे हैं और दोनों का ऐसा तादात्म्य हो जाता है कि पता ही  नहीं चलता फर्क प्रेम और प्रकृति में। कभी पहले कवि प्रकृति के माध्यम से मन के भावों को उकेरा करते थे मगर अब बहुत वक्त से ये माध्यम लुप्तप्राय: सा हो गया था ऐसे में  बहुत दिनों बाद कुछ प्रकृति से सामंजस्य बैठाते हुए जीवन के विविध रंगों को किसी ने उकेरा है  और वो भी महिला कवयित्री ने जो अपने आप में कुछ अलग सा अहसास संजोता है। ना केवल कवयित्री के प्रकृति प्रेम को दर्शाता है बल्कि प्रकृति को देखने और समझने के नज़रिये को भी प्रस्तुत करता है कि कितना कवयित्री का जुड़ाव प्रकृति के हर अंग से है फिर मौसम हो या ज़िन्दगी सबका अपना एक परिवेश है , संरचना है जिनका सीधा सा सम्बन्ध मानव जीवन से है।  

कुछ प्रकृति से तादात्मय करती रचनाओं की एक झलक देखिये :

" कि ऋतु बसंत है " 

" सूरज की पहली किरण में / नहाकर / तुम / और / गूंथकर चांदनी को।/ अपने बालों में / मैं / चलो स्वागत करें / ऋतु बसंत का "

" सुन हवा का " 

"सुन हवा का मंद स्वर/कुछ कुछ थिरकने लगा हूँ /बादलों के साथ भी / अक्सर ज़रा / उड्ने लगा हूँ / खग विहग कल्लोल से / कल्लोल/ मै करने लगा हूँ "

" जब कभी " 

जब कभी तुम्हारी आँखों में / सावन के बादल डोलेंगे / मैं भी उस बादल में छुपकर/ उन आँखों में बस जाऊँगी "

इसके अलावा सामाजिक विडंबनाओं की तरफ भी उनका ध्यान उसी तरह से जाता है जैसे प्रकृति से नाता है वैसे ही तभी तो " बगल के मैदान में " कविता में एक ऐसी समस्या की ओर इशारा किया है जिससे हम सभी दो चार होते हैं और उसे भी ज़िन्दगी का हिस्सा मान घिसटते रहते हैं मगर हमारे काम सरकारी विभागों की पेचीदगियों में अटके रहते हैं आश्वासन के खोखले स्तम्भों पर जिसकी बानगी इस तरह देखिये :

" अधिकारी ने अपने भाषण में कुछ मुद्दे उठाये / तरक्की के अनेकों नुस्खे बताये / कहा फॉल्ट रेट घटाइये / विनम्रता से पेश आइये / विन विंडो कांसेप्ट अपनाइये/ और कस्टमर की साडी उलझें / एक ही खिड़की पर सुलझाइये / और दुसरे ही दिन अक्षरशः पालन किया गया / एक खिड़की छोड़ ताला जड़ दिया गया / हर मर्ज़ के लिए लोग / एक ही जगह आने लगे / सुबह से शाम तक / क्यू में बिताने लगे"

" मजूरों की रोटी " मानवीय संवेदनाओं की जीती जागती मिसाल है जहाँ मेहनत की रोटी के स्वाद की बात ही कुछ और होती है को इस तरह दर्शाया है कि आज की हाइटैक होती ज़िन्दगी की सुविधायें भी बेमानी सी लगती हैं एक सजीव चित्रण 

" थाक रोटी की बडी सोंधी नरम लिपटे मसालों में बना आलू गरम / बैठकर एक झुण्ड में / सब खा रहे थे/ और चांपा -कल का पानी / हाथ का दोना बनाकर / पी रहे थे / और इस आधार पर ही आज हमने / गर्म रोटी/ काट आलू फ़ाँक वाले / थी बनाई/ पर ना कोई स्वाद आया "

 " विदेशी भारतियों के नाम " एक ऐसी कविता है जो उन प्रवासी पक्षियों को बुलाने के लिए एक बार फिर से प्रकृति का सहारा लेती है और हर मौसम के माध्यम से संदेसा भेजती हैं मगर ग्रीन कार्ड की विडंबना हर मौसम पर भारी पड़  जाती है जिसका चित्रण बेहद खूबसूरती से किया गया है :

" मैं जाड़ों की शीतलहरी  को समझाई थी / जाकर कहना / कि बैठ धुप में / मूंगफलियों के दानों के संग / गर्म चाय के ग्लासों से / तलहथियों को गरमा जाएँ "

" सर्द सन्नाटा" समय के बोये अकेलेपन के बीजों को बिखेरने की व्यथा है ताकि खुद से मुखातिब हुआ जा सके और रूह की गहराई तक उतरा सर्द सन्नाटा कुछ कम हो सके फिर चाहे उसके लिए कुछ लिखना ही क्यों न पड़े 

" बंद हो जायेगी " कारगिल युद्ध की त्रासदी का चित्रण है जहाँ युद्ध तो सिर्फ एक वक्त विशेष का रूप होता है मगर उसके बाद भी उसके निशाँ उम्र भर उन शहीदों के घरों में सुलगा करते हैं। 

" तुम्हारी आँखों में " , " प्रिय जब मैं "  कविताओं में प्रेम के रंगों को संजोया है तो कहीं बेटियों के प्रेम  में डूबी माँ की व्यथा का चित्रण " एक दिन " कविता के माध्यम से ऐसे किया है मानो खुद उन क्षणों को जीया हो। 

" आज की नारी " के माध्यम से नारी के गौरव और सम्मान को भी मान दिया है तो " टूटी हुयी कड़ाही " के माध्यम से माँ को याद किया है। 

कवयित्री की पकड़ केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि हास्य व्यंग्य पर भी है तभी " समय यहाँ " और " सुबह सवेरे " कविता के माध्यम से आज के लाइफ स्टाइल और स्त्री के उस स्वरुप के भी दीदार कराये हैं जिनके कारण बाकि स्त्रियों को भी उसी दृष्टि से देखा जाता है कैसे फैशन और अपनी जरूरतों में जीती स्त्री कब सिर्फ अपने ही सुख के बारे में सोचने लगती है उसका बहुत ही शानदार शैली में विवेचन किया है जहाँ विशुद्ध हास्य तो है ही मगर सोचने के लिए भी एक स्पेस है। 

कवयित्री के लेखन का एक वृहद् आकाश है जहाँ ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं जो अछूता रहा हो।छोटी छोटी कवितायेँ जीवन के विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत तो कराती ही हैं साथ ही कवयित्री के भाव मानस की पुष्टि का भी संकेत देती हैं कि हर तरफ कवयित्री की नज़र है जिसे वो इस तरह उद्धृत करती है मानो भोगा हुआ यथार्थ हो जो हर ह्रदय को छू लेता है।  कवयित्री इसी तरह अपनी सोच के पंखों को उड़ान देते हुए आगे बढ़ती रहें और हमें भी अपने अनुभवों से अवगत कराती रहे ऐसी कामना करते हुए कवयित्री को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ।  

देवलोक प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को प्राप्त करने के लिए आप कवयित्री से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : 

 M : 9810908099
दूरभाष : 26963355

डी ---१९१ , ग्राउंड फ्लोर 
साकेत , नयी दिल्ली --११००१७ 


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

रोम रोम में छाये 
तुम्हारे नव पल्लव 
आम्र मंजरी जो बौरायी 
जब आयी उस पर तरुणाई
धरा की प्यास जो बुझाई 
पीली सरसों भी इठलाई 
ये कैसे खुमारी छायी 
खिल उठी मन अंगनाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

जीवन में खिल उठे 
अब कुसुमित पल 
पुष्प पुष्प पर कैसे 
गुन गुन करते भ्रमर 
प्यास के पंछियों की 
कैसी प्यास बुझाई 
हर मुख पर मानो 
सरसों ही खिल आयी 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

मालती चंपा चमेली 
संग संग खिलें सहेली 
हरसिंगार ने मानो 
धरा पर बिछौना बनाया 
मानो करे आह्वान प्रेमी युगल का 
अभिसार रुत है आयी 
मानो किसी इठलाई मचलायी तरुणी की 
आँख गयी है  शर्मायी 
मानो सोमरस के पान को 
व्याकुल धरा है अकुलाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !
तुम्हारा आगमन भला कैसे हो निर्रथक …… 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

" एक थी माया " ...........मेरी नज़र से



विजय कुमार सपत्ति के कहानी संग्रह " एक थी माया " को उन्होंने सस्नेह मुझे भेजा तो ह्रदय गदगद हो गया।   संग्रह में कुल दस कहानियाँ हैं जिसमे ज़िन्दगी के रंगों का समावेश किया गया है फिर चाहे वो प्रेम हो , शक हो , मौत हो , भय हो , व्यंग्य हो , देशभक्ति हो या अध्यात्म सबको समेटने का लेखक का प्रयास सराहनीय है। पहला कहानी संग्रह के लिहाज से काफ़ी विचारपरक कहानियों को समेटा है लेखक ने जो जीवन के विभिन्न आयामों से परिचित कराता हुआ मानो एक यात्रा पर ले चलता हो । 

एक थी माया ,मुसाफिर , आभार ऐशो, आठवीं सीढ़ी ये चारों कहानियां प्रेम के विविध रंग समेटे हैं जिसमे एक थी माया के माध्यम से लेखक ने देहजनित प्रेम से परे आत्मिक प्रेम को तो दर्शाया ही है साथ ही प्रेम के विशुद्ध स्तर को भी प्रस्तुत किया है कि जरूरी नहीं होता प्रेम में मिलन , एक नया दृष्टिकोण देता लेखक प्रेम को ज़िंदा रखने की कवायद करता दीखता है साथ ही ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से मुँह ना मोड़ते हुए प्रेम को ज़िंदा रखना ही तो वास्तविक प्रेम है क्योंकि प्रेम में शारीरिक मिलन मायने नहीं रखता।  प्रेम शरीर से परे का वो आभास है जिसमे पूरी ज़िन्दगी भी गुजर जाये मगर क्षणिक मालूम दे और ऐसे ही प्रेम को माया के माध्यम से दर्शाया है लेखक ने जिसमे कहीं कोई प्रतीक्षा नहीं , कोई आदि नहीं , कोई अंत नहीं मगर प्रेम फिर भी है और रहेगा क्योंकि शाश्वत है।  जिसकी बानगी इन पंक्तियों में दृष्टिगोचर होती है :

"तुम मेरे साथ कभी खुश नही रह सकते थे । थोडी देर खुशी रहती और फिर ज़िन्दगी भर का चिडचिडापन । तुम्हारे लिये प्रेम सिर्फ़ बोझ बनकर रह जाता और हर बीतते वक्त के साथ तुम खत्म होते जाते और मै चाहती हूँ कि तुम ज़िन्दा रहो , न सिर्फ़ शरीर में बल्कि ज़िन्दगी के विचारों में भी "

" मुसाफिर " तो जैसे प्रेम की पराकाष्ठा ही है जहाँ इक उम्र बीती , युग बदला मगर प्रेम का दरिया अनवरत बहता ही रहा फिर क्या फर्क पड़ता है उम्र का कोई सिरा मिला या नहीं , न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन , जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन बस जैसे इन्ही पंक्तियों को चरितार्थ किया है लेखक ने जहाँ संतो और करतारे  के प्रेम की इंतेहा थी , जहाँ दो दिल कभी एक दूजे से जुदा थे ही नहीं एक की सांस पर ही दूसरे के जीवन की आस थी और जैसे ही दीया बुझा आस भी इक दूजे में ही समाहित हो गयी , शायद प्रेम के मुसाफिरों की यही मंज़िल हुआ करती है जो जीते जी नहीं मिलते मरने पर ही उनकी चिताओं पर मेले लगा करते हैं। 

"आठवीं सीढ़ी " सपना के जीवन का चमत्कारिक रोमांच है जहाँ प्रेम तो है मगर प्रेम के भी कई रूप हैं , जहाँ भटकन भी है , सम्मोहन भी है , और अतीत और वर्त्तमान में उलझी मनोदशा का भी चित्रण है कैसे किसी एक शख्स में अपने प्रेमी को पाना शादीशुदा होते हुए भी , एक ऐसी स्त्री की मनोदशा का चित्रण है जो अपने खोये प्रेम को एक जैसी शख्सियत होने के कारण उसमे पाना चाहती है और घर टूटने की हद तक जुड़ने को आतुर हो जाती है मगर शुभांकर द्वारा सही समय पर उसे सम्भालना और जीवन को दिशा देना कहानी को रोचक अंत पर ख़त्म करता है जो सन्देश देती है कि खुशियां चाहो तो तुम्हारे आस पास ही होती हैं बस देर होती है तो तुम्हारी सोच को बदलने और समझने की और यहाँ भी प्रेम सिर्फ देह तक सीमित नहीं रहा यही प्रेम की उच्चता है जिसका निर्वाह लेखक ने कहानी में सही तरीके से किया है।  

" आभार ऐशो " अनिमा के जीवन में आये पुरुषों के विभिन्न रूपो को तो चरितार्थ करती ही है साथ में अनिमा का अपनी शर्तों पर जीने के स्वाभिमान को भी उजागर करती है।  

" चमनलाल की मौत " अकेलेपन की त्रासदी झेल रहे उन सभी वृद्धों के जीवन का लेखा जोखा है जिससे मुख नहीं मोड़ा जा सकता , देखते , जानते हुए भी असंवेदनशील होती आज की पीढ़ी द्वारा उनसे किनारा करना एक ऐसा कड़वा सच है जो होना तो सभी के साथ घटित है मगर हम सोचते कहाँ हैं इस बारे में और छोड़ देते हैं वक्त के जंगल में उन्हें अकेला , निसहाय और जब नहीं झेल पाते वो इस अकेलेपन की घुटन को तो एक दिन खुद ही कर लेते हैं जीवन का अंत क्योंकि अकेलेपन से बड़ी सजा कोई नहीं होती। 

" हम बूढों को पैसों से ज्यादा प्यार चाहिए । अपनों का अपनापन चाहिये । हमें ज़िन्दगी नहीं मारती , बल्कि एकांत ही मार देता है ।"


"अटेंशन " आज के समाज का चेहरा उजागर करती व्यंग्यात्मक कहानी है जहाँ एक इंसान सिर्फ समाज में खुद को साबित करने के लिए कैसे कैसे हथकंडे अपनाता है और एक दिन खुद को साबित करके कैसे ठाठ से जीता है उसका प्रमाण है।  सिर्फ एक अटेंशन पाने की खातिर अच्छे  बुरे का सोचे बगैर ऐसी दलदल में जा गिरता है जहाँ से निकलना आसान नहीं होता और नेतागिरी किसी दलदल से कम कब हुयी है , कुर्सी का चस्का भला किसने छोड़ा है , ऐसे ही ख्याल का चित्रण है इस कहानी में।  

" द  परफेक्ट मर्डर " दांपत्य सम्बन्धो में उमड़े शक के कीड़े का वो दंश है जिससे न काटने वाला बचता है और न ही कटने वाला और जब अंत में शक के ताबूत से पर्दा उठता है तो सिवाय पछतावे के कुछ हाथ में नहीं बचता जिसे प्रस्तुत करने में लेखक पूरी तरह सक्षम रहा।  

" टिटलागढ़ की एक रात " भय और रोमांच की दुनिया की सैर कराती है जिसे बखूबी , पूरी शिद्दत से लेखक ने पेश किया है।  

" आसक्ति से विरक्ति की ओर " बुद्ध के उपदेशों का चित्रण है जहाँ विचित्रसेन के माध्यम से ये बताया गया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने सारी इंद्रियों पर तो नियंत्रण कर ही लिया बल्कि साथ में उसके आचरण में ऐसी दिव्य शक्ति आ जाती है कि जो उसके संसर्ग में आता है फिर चाहे वो नगरवधू के रूप में देवयानी ही क्यों न हो , उसके भी जीवन को परिवर्तित किया जा सकता है , देखा जाए तो ये जैसे किसी प्रमेय को सिद्ध करना होता है उसी तरह का प्रयोग है जिसे बुद्ध ने विचित्रवीर्य के जरिये दिखाया उस समय के धर्मभीरुओं को , ढकोसलों पर विश्वास करने वालों को और एक जाग्रति का आह्वान किया।  

" मैन इन यूनिफार्म " देश के सैनिक के बलिदान का एक ऐसा कथानक है जो सोचने को तो विवश करता ही है साथ में लेखक द्वारा उठाया  प्रश्न दिलों को कचोटता है आखिर एक शहीद के बलिदान की कीमत क्या है ?

" दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा बदलाव नज़र नहीं आया मुझे अपने देश में , जिसके लिये मैने जान दे दी ………"

ये लेखक का पहला कहानी संग्रह है इस दृष्टिकोण से बेहद सार्थक और सफल है जो पाठक को वो सब देता है जिसकी तलाश में एक पाठक निकलता है और पढ़कर जब संतुष्ट हो जाता है तो वहीँ लेखक का लेखन सफ़र हो जाता है।  

हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर से प्रकाशित कहानी संग्रह " एक थी माया " उम्मीद है अपनी एक पहचान बनाएगा और अपना एक पाठक वर्ग भी इसी के साथ लेखक को उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं देती हूँ कि वो इसी तरह लेखन करते रहे और आगे बढ़ते रहे।  

२५ ० रूपये में उपलब्ध ये किताब प्राप्त करने के लिए आप यहाँ संपर्क कर सकते हैं : 

विजय सपत्ति 
M : 09849746500

EMAIL : vksappatti@gmail.com 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

अब बूझने को बचा क्या ?

साँस पर गाँठ 
मौत की अंतिम अरदास 
अब बूझने को बचा क्या ?

चल बंजारे 
डेरा उठाने का वक्त आ गया 
क्योंकि 
अंतत: बंजारे ही तो हैं हम सब

ज़िन्दगी से बहुत कर चुके यारा
अब
मौत से इश्क करने का जो वक्त आ गया

रूह के लिबास को दुरुस्त करने का वक्त आ गया ……

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

मेरे मन का राग हो तुम



हे तमहारिणी ! 
प्रकाश का भंडार हो तुम
सदबुद्धि का आधार हो तुम 
लेखनी का प्रमाण हो तुम 
वाणी में सुरों का सार हो तुम 
मानव के रोम- रोम में बसा 
प्रेम का संचार हो तुम 


हे वरदायिनी !
वरदहस्त बनाये रखना 
अपनी कृपा बरसाये रखना 
जीवन में ज्ञान का उजास जगाये रखना 
पथरीले पथ भी सुगम बनाये रखना 
बस अपने शिशुओं पर इतना स्नेह बनाये रखना 

हे वीणावादिनी !
नवयुग का आगाज़ हो तुम 
ज्ञानोदय का भंडार हो तुम 
जीवन का आधार हो तुम 
प्रकृति के कण- कण में बजता 
सदियों से बहता अजस्र नाद हो तुम 


हे वागीश्वरी !
मेरी वाणी को आधार देता 
कृपामय प्रसाद हो तुम 
हे कादम्बरी !
मेरे जीवन की नयी सुबह का 
एक गुनगुनाता भाव हो तुम 
हे वरप्रदायिनी !
कोटि कोटि नमन करता 
मेरे मन का राग हो तुम