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शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत

याद है तुम्हें
वो पहला मिलन
जब हम
इक राह पर
इक मोड पर
अचानक मिले थे
और तुमने कहा था
तुम कौन हो?
तुम्हे देखकर
यूँ लगा
जैसे जन्मो की
तलाश को मुकाम
मिल गया हो
बताओ ना
कौन हो तुम?
तुम्हे तो मै
रोज अपने
ख्यालों मे
देखा करता था
कैसे आज
सपना साकार
हो गया
कैसे तुमने
आकार पा लिया
क्या मेरी खातिर?
और मै
सिर्फ़ तुम्हे
सुनती ही रही
और सोचती रही
ये कौन है अजनबी
कैसे इतना बेबाक
हो गया
कैसे इसका वजूद
मुझमे खो गया
और फिर हम
बिना हाथो मे हाथ डाले
निकल पडे अन्जाने सफ़र पर
बिना कोई वादा किये
बिना मोहब्बत का
इज़हार किये
बिना किसी आस के
सिर्फ़ एक विश्वास के साथ
हाँ ……कोई है इस जहाँ मे
जिसके सीने मे
मोम पिघलता है
है ना………कुछ ऐसा ही
क्योंकि बिन लफ़्ज़ों की मोहब्बत के घूंट का स्वाद 

उम्र भर के लिये जुबाँ  पर रुक जाता है 
की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत 
मगर नमकीन मोहब्बत के स्वाद ज़ेहन की धरोहर होते हैं
कहो ना…………ये है हमारी पहली मोहब्बत 
पहले मिलन की याद ……जिसमे कभी इतवार नही होते

बुधवार, 10 जुलाई 2013

ओ मेरे !.............9

रिदम वाद्य यंत्रों में कब होती है ............बिना साधे तो स्वर उसमे भी नहीं फूटा करते ............कसना पड़ता ही है तारों को , खींचनी पड़ती है नकेल तभी सप्त सुर एक संगीत की लड़ी में पिर जाते हैं ..........बस यूं ही ............तुम्हारा प्रेम है जिसे साधती हूँ मैं ..........अपनी साँसों की लड़ियों में , ह्रदय  के कम्पन में , धडकनों की झंकार में ............तब कहीं जाकर कभी कभी एक गीत झड़ता है तुम्हारी शुष्क प्रियता की शाख से ............और उसी में जीने की कोशिश करती हूँ मैं " पूरा एक  जीवन "............वरना  तो पीले पत्ते मूंह चिढाते रोज झड़ते हैं संवेदनहीन होकर और मैं समेट  लेती हूँ आँचल में उनका पीलापन ..........ना जाने कौन सी नीम की निम्बोली दाब रखी है तुमने दाढ़ के नीचे ...........कसैलापन जाता ही नहीं और मैं आदी  हो चुकी हूँ अब ...........तुम्हारे कसैलेपन की ......जानाँ !!!!!!!!

नमक ज़ख्म पर छिडकने से भी अब तो राहत मिलती है इसलिए गर्म करके चिमटे का सेंक दे देती हूँ कभी कभी ..........दर्द की बयारें कहीं बंद न हो जाएँ और मेरा जीना कहीं दुश्वार न हो जाए ...........आखिर आदत भी कोई चीज होती है ना ............सुनो ! तुमने भी क्या कभी ऐसी कोई आदत पाली है , जी सकते हो मेरी तरह ...........लबों पर मुस्कान धरे , ज़िन्दगी से भरपूर होकर ...............मगर दिल की जगह उसकी राख भी न बची हो ...............एक अंधकूप में रहकर रौशनी से बचकर ...............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ओ मेरे !……………8

दर्द कभी हुआ ही नहीं ..............हा हा हा ............सोच रहे होंगे फिर ये समंदर कैसे बना ............अरे जानां !!! कुछ फसलों को उगाने के लिए प्रेम का बीज रोंपा जाता है जिसमे से हरी हरी  कोंपलें जब फूटा करती हैं विरह की तब जाकर दर्द का जन्म हुआ करता है और दर्द को पैदा करने के लिए मौत से इश्क किया करती हूँ .............इसलिए दर्द होता नहीं है पैदा किया जाता है ........खुद की आहुति देकर , अपनी रूह को नोंच खसोट कर बीजना पड़ता है उसमे इश्क का कीला ........उम्र भर के लिए , एक जन्म के लिए नहीं ..............इस कायनात के आखिरी छोर तक के लिए ...............तब जाकर दर्द की खिलखिलाती , लहलहाती पैदावार होती है जो उम्र की चाशनी में डूबा डूबा कर , तीखी लहर बन लहू में दौड़ा करती है और इश्क की कहानी मुकम्मल होती है ..........जानां !!!

किसान हूँ ना किसना फिर भी बिना खेती के उपकरणों के पैदावार करना और बिना अधरों पर वंशी धरे खुद को सम्मोहित करने का हुनर जान गयी हूँ ........... रिस रिस कर तपती पटरी पर ज़िन्दगी की रेल धडधडाती गुजर रही है बिना आंच ताप को महसूस किये और मोहब्बत के जश्न भी मना रही है सिगार सी सुलग सुलग कर ...........क्या कभी मेरे साथ एक कश तुम भी लेने आओगे ........क्या कभी तुम कटौथी में गंगाजल भर एक घूँट भरोगे और करोगे इश्क का समंदर पार .............मेरी तरह !!!!!ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

गुरुवार, 27 जून 2013

ओ मेरे !...........7

बारातें तो बहुत देखी होंगी ............सूरतें भी बहुत गुजरी होंगी निगाहों से ..........मगर क्या देख पाए वो पुरनम नमी चेहरे की खिलखिलाहट में , जुल्फों की कसमसाहट में , आँखों की शरारत में , लबों की हरारत में .............नहीं देख पाए होंगे ...........जानती हूँ .............क्योंकि आँखें तो कब से मेरी आँखों में बसी हैं , दिल एक मुद्दत हुयी मेरे दिल में धड़कता है ...........तुम्हारे पास बचा क्या है तुम्हारा बताओ तो ज़रा ............सिवाय मेरे ! फिर भी  क्यों कोशिश करते हो जीने की .........मेरे बगैर , समझ नहीं पायी आज तक तुम्हारी मुफलिसी का दंश .............और वो जो मुस्कराहट का लिबास ओढ़े तुम्हारी ज़र्द निगाहें जब भेदती हैं आकाश हो ............ना जाने कैसे हवाएं डाल देती हैं पर्दा रुखसारों पर और मैं खोजती हूँ फिर तुम्हारे ना होने में होने को ............उठाती हूँ मिटटी तुम्हारे दफनायें वजूद से ...........उसी वजूद से जो है मगर जिस पर तुमने रात की कालिख मल दी है ...........और करती हूँ उसका अन्वेषण .......मेरे खोजी कुत्ते दौड़ते हैं तुम्हारी रूह के कब्रिस्तान मे बेधड़क ...........जानने को तुम्हारी ज़मींदोज़ सभ्यताओं को ..........शायद कहीं मिल जाए कोई शहादत की निशानी और मैं बन जाऊं मुकम्मल ग़ज़ल तुम्हारी आँखों में ठहरी ख़ामोशी की ............जानां !!!

इश्क की बारातों के दूल्हे तो सदा अंगारों पर चला करते हैं ..........घोड़ी चढ़ना उनका नसीब नहीं हुआ करता ............और दुल्हनें सदा सुहागिन ही रहती हैं उम्र भर बिना सात फेरों की रस्मों को निभाए ..............और देख एक मुद्दत हुयी ..............मेरे इश्क की दुल्हन ने घूंघट नहीं खोला है सिर्फ और सिर्फ तेरे इंतज़ार में ............कि  तुम एक दिन खुद उठाओगे घूंघट ..........क्या करोगे मुझे मुकम्मल मेरी मज़ार पर आरती का दीप जलाकर .........मेरी तरह  क्योंकि एक मुद्दत हुयी मेरी आरती का दीप बुझा नहीं है अब तक ...........तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

सोमवार, 24 जून 2013

ओ मेरे !............6

साहेबा ! इश्क की डली मूंह में रखी है मैंने ............ और कुनैन से कुल्ला किया है ...........खालिस मोहब्बत यूं ही नहीं हुआ करती ...........एक डोरी सूरज की तपिश की लेनी पड़ती है और एक डोरी रूह की सुलगती लकड़ी की ...फिर गूंथती हूँ चोटी अपने बालों के साथ लपेटकर ...........लपटें रोम रोम से फूटा करती हैं और देख आज तक जली ही नहीं मेरी ख्वाहिशें , तुझे चाहते रहने की कोशिशें , तुझ पर जाँ निसार करने की चाहतें ..........एक एक मनका प्रीत का पिरोया है ना मैंने जो सूत काता था कच्चे तारों का और कंठी बना गले में बाँध लिया है ........... सुना है इस कंठी को देख फ़रिश्ते भी सजदे किया करते है , सजायाफ्ता  रूहें भी सुकून पाया करती हैं ...........जानते हो क्यों ? क्योंकि इसमें तेरा नाम लिखा है ..............जानां !!!

सिन्दूर , पाजेब , बिंदिया , मंगलसूत्र कुछ नहीं चाहिए मुझे ..........ये ढकोसलों भरे रिवाज़ मेरी रूह की थाती नहीं ..........तुम जानते हो ............बस प्रेम की कंठी जो मैंने बाँधी है ...........क्या किसी जन्म में , किसी पनघट के नीचे , किसी पीपल की छाँव में , किसी चाहत की मुंडेर पर ...........आओगे तुम मुझमे से खुद को ढूँढने .........मेरी आवाज़ को , मेरी इबादत को मुकम्मल करने ...............ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

बुधवार, 19 जून 2013

पल पल सुलग रही है इक चिता सी मुझमें

पल पल सुलग रही है इक चिता सी मुझमें ………मगर किसकी ………खोज में हूँ 
पल पल बदल रहा है इक दृश्य सा मुझमें …………मगर कैसा …………खोज में हूँ 
पल पल बरस रहा है इक सावन सा मुझमें ………मगर कौन सा ………खोज में हूँ 

बुद्धिजीवी नहीं जो गणित के सूत्र लगाऊँ 
अन्वेषक नहीं जो अन्वेषण करूँ 
प्रेमी नहीं जो ह्रदय तरंगों पर भावों को प्रेषित करूँ 

और खोज लूं दिग्भ्रमित दिशाओं के पदचिन्ह 
इसलिए 
सुलग रही है इक चिता मुझमे जिसके 
हर दृश्य में बरसते सावन की झड़ी 
कहती है कुछ मुझसे ...........मगर क्या ..........खोज में हूँ 

और खोज के लिये नहीं मिल रहा द्वार 
जो प्रवेश कर जाऊँ अंत: पुर में और थाह पा जाऊँ 
सुलगती चिता की , बदलते दृश्य की , बरसते सावन की 

सोमवार, 17 जून 2013

" ज़िन्दगी के पन्ने " …………मेरी नज़र से



इस बार के पुस्तक मेले में इतने स्नेह और सम्मान से पवन अरोडा जी ने अपनी पुस्तक ना केवल भेंट की बल्कि उसके विमोचन का भी हमें हिस्सा बनाया और मैं अपनी मसरूफ़ियतों के चलते पढ नहीं पायी और जब पढ ली तो उसके बाद उस पर लिखे बिना कैसे रह सकती थी सो आज सब काम छोड कर सबसे पहला ये ही काम किया ।

ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित पवन अरोड़ा की " ज़िन्दगी के पन्ने " वास्तव में ज़िन्दगी की एक सीधी  सरल दास्ताँ है जिससे हम सब कहीं न कहीं गुजरते हैं .जहाँ कवि मन ज़िन्दगी को सूक्ष्म दृष्टि से विवेचित करता है और यही कवि  की दृष्टि होती है जो भेदों  को अभेद्ती है जो साधारण में से असाधारण को खोजती है और व्याख्यातित करती है फिर ज़िन्दगी तो है ही ऐसी शय जिसे जितना खोजो जितना चाहो जितना विश्लेषण करो अबूझी  ही लगती है .

"आस्था " कैसे जीवन के संग बढ़ी चलती है की हम सही गलत सोचते ही नहीं बस लकीर के फ़क़ीर बने दौड़ते हैं आँख पर अविवेक की पट्टी बांधे  . आस्था की डोर में बढे एक जिंदगी जी कर कब निकल जाते हैं और जान  ही नहीं पाते  आखिर जीवन है क्या और उसका मकसद क्या है . 

"नरक धाम " जीवन की वो सच्चाई है जो इंगित करती है कई  स्वर्ग और नरक की अवधारणा को जो हर इंसान चाहता ही की उसे स्वर्ग मिले जबकि ये एक सत्य है जिसे भी स्वर्ग मिला उसे फिर जन्म लेना पड़ा और दुनिया में आकर वो दुःख दर्द झेलना पड़ा जो किसी नरक से कम नहीं फिर क्या फायदा नरक धरती पर हो या आसमान में रहना तो नरक में ही है .
" धर्मयुद्ध " के माध्यम से इंसान की वृत्ति पर कटाक्ष किया है . 
धर्म के नाम पर आज खोली दूकान
जहाँ उगलता साँपों जैसी 
खुद को कहता 
भगवान या कैसा आज का इंसान 
एक ऐसी सच्चाई जिसमें फंसकर इंसान क्या कुछ नहीं गँवा देता और हाथ कुछ नहीं आता .

" कौन मैं " खुद को खोजता हर अस्तित्व जिसमें कोई साथ नहीं न दोस्त न माँ , , बाप भाई बहन कोई नहीं एक ऐसी सोच जिसने पा लिया उसे कुछ खोजना बाकी न रहा .

"सवाल उठते हैं मन मैं " हर मन की पीड़ा का अवलोकन है और कुछ प्रश्न हमेशा अनुत्तरित ही रहते हैं या वो कर्मों और भाग्य का लेख बन मूक रह जाते हैं . 
इंसानियत का हो रहा कत्लेआम 
ऐसे न लगवाओ इसके दाम 
कभी तूने भी 
सोचा क्या होगा उस माँ का हाल 
जिसने जिगर का टुकड़ा खो दिया अपना लाल 

"रिश्ते" में रिश्तों के सिमटते आकाश को बखूबी उकेरा है . आज के युग में जब एक दो बच्चे ही हो रहे हैं तो कैसे जान पायेगे वो कोई दूसरा रिश्ता भी होता है और फिर अकेले ही गिने चुने रिश्तों को सहेजना है और न सहेज पाने की स्थिति में गलत कदम उठाना कितना दुरूह होता है उसका आकलन किया है .

" आँखों की भाषा " में चंद  शब्दों में पूरा प्रेम का फलसफा गढ़ दिया .

" आओ कहीं आग लगायें " एक कटाक्ष है आज की राजनीती पर कैसे सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए जनता का दोहन किया जाता है .

 " आज फिर गूँज उठी आवाज़ " मौत एक शाश्वत सत्य है कि ओर  इंगित करती रचना बताती है चाहे कुछ कर लो मगर मौत ने तो आना ही आना है .

" एक इंतज़ार " में एक पिता की भावनायें कैसे बेटी के लिए उमगती हैं उसका खूबसूरत चित्रण है .

" माटी का यह " के माध्यम से ज़िन्दगी की हकीकत बताई है कि ये शरीर मिटटी है और एक दिन मिटटी में ही मिल जाना है बस इसे समझना जरूरी है .

" नेता रुपी नाग " के माध्यम से नेताओं की सोच को परिलक्षित किया है कि वो तुम्हें डँस ले उससे पहले जाग जाओ और सही कदम उठाओ .

ये तो सिर्फ कुछ रचनायें ही मैंने समेटी हैं बाकि पूरे काव्य संग्रह में हर कविता में ज़िन्दगी के हर पहलू को समेटने की कोशिश की है . सीधी सरल भाषा में हर पहलू को छूना और उसे व्यक्त करना ताकि मन की बात सब तक पहुँच सके यही पवन अरोड़ा की खासियत है. हर लम्हा लम्हा ज़िन्दगी को खोजने को प्रयासरत पवन अरोड़ा ने काफी रचनायें ज़िन्दगी पर ही लिखी हैं जैसे खोज रहे हों ज़िन्दगी के गर्भ में छुपी हकीकतें और वो मिलकर भी अधूरी हसरत सी तडपा रही हों .


पवन अरोड़ा से आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं 
M: 09999677033

ज्योतिपर्व प्रकाशन  
99,ज्ञान खंड  --- 3 , इन्दिरपुरम
 गाज़ियाबाद -------- 201012

मोबाइल  : 9811721147

शनिवार, 15 जून 2013

हसरतों के लकड़बग्गे ..........

मेरी नीम बेहोशी में 
बडबडाती आवाज़ का 
शब्द बने तुम 
और उतर गए 
ग्लूकोज की बोतल में 
चेतना को जागृत करते हुये
बूँद बूँद शिराओं में 
गूंजता तुम्हारा संगीत 
आत्मा को जिला रहा था 
सांसों को ठहरा रहा था 
एक अदृश्य हाथ 
चमत्कृत सा 
माथे को सहला रहा था 
जीवन तंतु बिखराव से 
जुड़ाव की ओर जा रहा था 
सम्मोहन का 
विष बाण  तारी  था 
और एक ही झटके में 
सांस की माला बिखर गयी 
सम्मोहन टूट गया 
जब धारा  का प्रवाह उल्टा हो गया 
जब ग्लूकोज की खाली बोतल 
लहू के कतरे कतरे से भर गयी 
सिर्फ सूईं गड़ी रह गयी जिस्म में 
और मेरी बेहोशी टूट गयी 

अब जीने को या कहो हंसने को 
मजबूर हैं 
हसरतों के लकड़बग्गे ..........

बुधवार, 12 जून 2013

ओ मेरे !.............5

कभी कभी जरूरत होती है किसी अपने द्वारा सहलाये जाने की ............मगर हम, उसी वक्त ,ना जाने क्यूँ ,सबसे ज्यादा तन्हा होते है..........ज़िन्दगी के पडावों में एक पडाव ये भी हुआ करता है शायद 
या तन्हाइयों की चोटों में आवाज़ नहीं हुआ करती शायद ............कुछ मौसम कितना ही भीगें , हरे हुआ ही नहीं करते शायद ………जरूरी तो नहीं ना सावन बारहों माह बरसे और रीती गागर भरे ही …………जानाँ !!! 

इश्क के मट्ठे खट्टे ही हुआ करते हैं और मैने सिर्फ़ उसी को पीया है जन्मों से ………जानते हो ना जबसे बिछडे हम …………मैने स्वाद बदला ही नहीं ………फिर तुमने कैसे स्वाद बदल लिया ..........ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

शनिवार, 8 जून 2013

मैं नहीं जानती अपने अन्दर की उस लडकी को

आज के दिन अपने लिये शायद यही उपयुक्त है :

मैं नहीं जानती
अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो आहटों के गुलाब उगाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो काफ़ी के कबाब बनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो मोहब्बत के सीने पर जलता चाँद उगाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो तुम्हारे ना होने पर तुम्हारा होना दिखाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो कांच की पारदर्शिता पर सुनहरी धूप दिखाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो चटक खिले रंगों से विरह के गीत बनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो सांझ के पाँव में भोर का तारा पहनाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो प्रेम में इंतिहायी डूबकर खुद प्रेमी हो जाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो खुद को मिटाकर रोज अलाव जलाया करती है

मैं नहीं जानती

अपने अन्दर की
उस लडकी को
जो जलते सूरज की पीठ पर बासी रोटी बनाया करती है

नहीं जानती

नहीं जानती
नहीं जानती
सुना है तीन बार जो कह दिया जाये
वो अटल सत्य गिना जाता है ………क्या सच में नहीं जानती ?
मानोगे मेरी इस बात को सच?
हो सके तो बताना ………ओ मेरे अल्हड स्वप्न सलोने 

जो आज भी 
ख्वाबों में अंगडाइयाँ लिया करता है बिना किसी ज़ुम्बिश के !!!
तारों में सज के अपने प्रीतम से देखो धरती चली मिलने …………गुनगुनाने को जी चाहता है मेरे अन्दर की लडकी का
अब ये तुम पर है …………किसे सच मानते हो ?
जो पहले कहा या जो बाद में …………सोच और ख्याल तो अपने अपने होते हैं ना
और मैं ना सोच हूँ ना ख्याल
बस जानने को हूँ बेकरार
क्या जानती हूँ और क्या नहीं ?
ये प्रीत के मनके इतने टेढे मेढे क्यों होते हैं ………मेरी जिजीविषा की तरह, मेरी प्रतीक्षा की तरह , मेरी आतुरता की तरह
वक्त मिला तो कभी जप के हम भी देखेंगे
शायद सुमिरनी का मोती बन जायें ………
अल्हड लडकी की ख्वाहिशों में 

चाहतों की शराब की दो बूँद काफ़ी है नीट पीने के लिये
ज़िन्दगी के लिये… ज़िन्दगी रहने तक
ओ साकी ! क्या देगा मेरी मिट चुकी आरज़ुओं को जिलाने के लिये 

अपने अमृत घट से एक जाम
फिर कभी होश में ना आने के लिये
मेरे पाँव थिरकाने के लिये
मेरे मिट जाने के लिये
क्योंकि
मैं नहीं जानती
अपने अन्दर की
उस लडकी को
कि आखिर उसका आखिरी विज़न क्या है…………



और अब अंत में जानिये ये भी 

दोस्तों आज आपको बताना चाहती हूँ कि कल रविवार को दिन में 12 : 05 से 1 : 05 के बीच मीडियम वेब 819 पर आल इंडिया रेडियो पर मेरा काव्य पाठ और बातचीत सुनियेगा अगर आपके यहाँ ट्रांजिस्टर या रेडियो है तो :) 

गुरुवार, 6 जून 2013

ओ मेरे !.............4

मेरी आँखों में ठहरे सूखे सावन की कसम है तुम्हें ............कभी मत कहना अब "मोहब्बत है तुमसे" ...........बरसों कहूं या युगों कहूं नहीं जानती मगर ये जो आँखों की ख़ामोशी में ठहरा दरिया है न कहीं बहा न ले जाए तुम्हें भी और इस बार सैलाब रोके नहीं रुकेगा चाहे जितने बाँध बना लेना ..............जानते हों क्यों ? क्योंकि मैंने दिल की मिटटी में खौलता  तेज़ाब उंडेल दिया था उसी दिन जब तुम मेरी आखिरी ख्वाहिश जानकर भी वो तीन लफ्ज़ ना कह सके , ना ही महसूस सके ...........और अब हाथों में मेहंदी लगाने की रुत नहीं रही जिसे देख सिहर सिहर उठूँ ..........बीती रुत , गिरे पत्ते और सिन्दूरी मोहब्बत वापस नहीं मुड़ा करती हैं ..........जानां !!!

इश्क और जूनून पर्याय हैं एक दूजे के और मैं उनका अर्थ ..........नागफनी सी उग आती हूँ  बंजर , रेतीली जमीनों पर भी या कभी डंस लेती हूँ स्वयं ही अपनी रूह की उड़ानों को ..........जज़्ब करने की रुतें नहीं हुआ करती ना ............क्या कर सकोगे कभी तुम मेरी दहकती , भभकती रूह को खुद में जज़्ब और जी सकोगे उसके बाद मुस्कुराकर .............मेरी तरह ? ..............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 2 जून 2013

ओ मेरे !..............3

जरूरी होता है खेत को सींचा जाना भी ऋतु आने पर ............यूं ही नहीं फसलें लहलहाती हैं ............सभी जानते हैं मगर मानता कौन है , करता कौन है ...............चाहे नेह का समंदर ठाठें मार रहा हो , चाहे सुनामी आने को आतुर हो मगर अहम की पोषित तुम्हारी वंशबेल कभी चप्पू उठाने ही नहीं देती  ...........चाहे किनारे नेस्तनाबूद हो जाएँ या नैया भंवर में ही डूब क्यों  न जाए .............एक अहम की कस्सी से तुम खोद ही नहीं पाते बंजर जमीन की  मिटटी को और नहीं रोंप पाते अपनी मनचाही फसल के बीजों को ............वैसे भी यहाँ तो खलिशों के रेगिस्तान की इकलौती मलिका हूँ मैं ...........हाँ , मैं , तुम्हारी चाहतों की कब्रगाह का फूल नहीं जो तोडा , सूंघा और मसल डाला ............जीने के लिए कुछ  रौशनदान बनाए हैं मैंने भी .............तुम्हारी दी बेरुखी से , तुम्हारी बदमजगी से , तुम्हारी बेअदबी से ................हवाये झुलसाने का शऊर बखूबी निभा रही हैं तब से .........जानां !!!

इश्क की कतरनें भी कभी क्या सीं जाती हैं ? और देख मैंने तो पूरा लिहाफ बना डाला ...........चाहो तो ओढ़ लो चाहो बिछा लो चाहो तो इबादत कर लो ..........कहो , कर सकोगे  इबादत , कर सकोगे बुतपरस्ती .......मुझसी ? .............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

गुरुवार, 30 मई 2013

ओ मेरे !..........2

कुछ आईने बार बार टूटा करते हैं कितना जोड़ने की कोशिश करो .............शायद रह जाता है कोई बाल बीच में दरार बनकर .............और ठेसों का क्या है वो तो फूलों से भी लग जाया करती हैं ............और मेरे पास तो आह का फूल ही है जब भी आईने को देख आह भरी ............टूटने को मचल उठा . आह ! निर्लज्ज , जानता ही नहीं जीने का सुरूर ...........जो कहानियाँ सुखद अंत पर सिमटती हैं कब इतिहास बना करती हैं और मुझे अभी दर्ज करना है एक पन्ना अपने नाम से ...........इतिहास में नहीं तुम्हारी रूह के , तुम्हारी अधखिली , अधपकी चाहत के पैबदों पर ...........जो उघडे तो देह दर्शना का बोध बने और ढका रहे तो तिलिस्म का .............मुक्तियों के द्वार आसान नहीं हुआ करते और जीने के पथ दुर्गम नहीं हुआ करते ............कशमकश में जीने को खुद का मिटना भी जरूरी है फिर चाहे कितना आईना देखना या टूटे आइनों में निहारना .........तसवीरें नहीं बना करतीं , अक्स नहीं उभरा  करते फ़ना रूहों के ........जानां !!!

मैंने तो सुपारी ले ली है अपनी बिना दुनाली चलाये भी मिट जाने की ...........क्या कभी देख सकोगे आईने में खुद के अक्स पर खुद को ऊंगली उठाये ............ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 26 मई 2013

एक यादगार शाम के दो रंग

25 मई 2013  की शाम डायलाग में "मुक्तिबोध" की प्रसिद्ध कविता " अंधेरे में " को पढने का मौका मिला जो एक यादगार क्षण बन गया क्योंकि उपस्थित गणमान्य अतिथियों ने भी उसी कविता के संदर्भ में अपने अपने विचार रखे तो लगा कि सही कविता चुनी मैने पढने के लिये :)

 पहली बार किसी दूसरे की कविता को पढना और उसके भावों को प्रस्तुत करना आसान नहीं था अपनी कविता का तो हम सभी को पता होता है मगर यहाँ तो मुक्तिबोध को पढना था जो साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं इसलिये कोशिश की कि उनके भावों को सही तरह से प्रक्षेपित कर सकूँ और इस तरह उन्हें नमन कर सकूँ 
क्योंकि कविता बहुत बडी है इसलिये सिर्फ़ उसके पहले भाग को ही पढा  










 इस कार्यक्रम के बाद क्योंकि दूसरे कार्यक्रम में जाना था इसलिये अतिथियों के विचार मुक्तिबोध की कविता के बारे में सुनने के बाद और आशुतोष कुमार जी का मुक्तिबोध की कविता का पाठ सुनने के बाद मुझे वहाँ से जाना पडा ।


एक शाम और दो दो कार्यक्रम ………लीजिये लुत्फ़ आप भी हमारे साथ चित्रों के माध्यम से 

 सुमन केशरी जी के काव्य संग्रह "मोनालिसा की आँखें" का लोकार्पण कल शाम "इंडिया इंटरनैशनल सैंटर" में किया गया तो वहाँ भी पहुँचना जरूरी था इसलिये डायलाग में कविता पाठ करके और गणमान्य अतिथियों को सुनने के बाद हमने यहाँ के लिये प्रस्थान किया 
 ये कम उम्र साथी संजय पाल जिसने खुद मुझे पहचाना और आकर मिला तो बेहद खुशी हुयी
 यहाँ राजीव तनेजा जी , संजय और रश्मि भारद्वाज के साथ यादों को संजोया

 ये हर दिल अज़ीज़ मुस्कान बिखेरती पंखुडी इंदु सिंह के साथ निरुपमा सिंह 
 सुमन केशरी जी के साथ शाम को जीवन्त किया 

इस प्रकार एक सुखद माहौल में काफ़ी लोगों से मिलना हुआ साथ ही आज के समय के वरिष्ठ हस्ताक्षर देवी प्रसाद त्रिपाठी जी और अशोक वाजपेयी जी को सुनने का भी मौका मिला जो एक अलग ही अनुभव था। 
राजीव तनेजा जी को आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होने ये तस्वीरें संजो कर  
हम सबके यादगार क्षणों को यहाँ कैद किया और हमें अनुगृहित किया।

गुरुवार, 23 मई 2013

.ओ मेरे !...........1

सपनों के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं जो तुम्हें ठंडी हवा के झोंके सी लगती, फिर भी हूँ .......सोचती हूँ , शायद , कुछ ...........तुम्हारी भी या तुम्हारी बेरुखी की सजायाफ्ता तस्वीर ...........इस उम्मीद के चराग को बुझने नहीं देना चाहती इसलिए खूब डालती हूँ तेल तुम्हारे दिए ज़ख्मों पर आंसुओं का ........आहा ! फिर जो सुरूर चढ़ता है , फिर जो नशा होता है , फिर जो रवानी होती है ............कब सुबह हुयी और कब शाम .........कौन पता करता है ...............एक मखमली सुकून की तलाश ख़त्म हो जाती है जैसे ही तुम्हारे दिए ज़ख्मों को जलते चिमटे से सहलाती हूँ ...........उम्र ठहर जाती है कुछ देर मेरी दहलीज पर ...............और मैं करती हूँ अट्टाहस अपने गुरूर पर , उस सुरूर पर जो सिर्फ मेरा है और मैं ...............हूँ , का अहसास चुरा लेता है तुम्हारी नींद भी फिर चाहे नहीं हूँ मैं तुम्हारी चाहत की दुल्हन , तुम्हारे सपनो का कोहिनूर ..............नशे के लिए जरूरी नहीं होता हर बार जाम को पीना ..............जो सुरूर बिना पीये चढ़ते हैं उम्र फ़ना होने पर भी न उतरते हैं ........जानां !!!


बस इतना जानती हूँ ..............तुम्हारे सपनो के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं एक धधकती ज्वाला हूँ मैं, गर्म लू सी जो झुलसा देती है चमड़ी तक भी  ...........कहो , जी सकोगे अब साथ मेरे या मेरे ना होने पर भी ...........तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 19 मई 2013

और आज चलन नहीं है आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का

नहीं जानती कविता का 
अर्थशास्त्र गणित या भूगोल 
क्योंकि ना कभी समकालीनों को पढ़ा 
ना ही कभी भूत कालीनों को गुना 
फिर कैसे जान सकती हूँ 
उस व्याकरण को 
जहाँ भाषा में शिल्प हो 
सौन्दर्य हो 
प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग हो 
फिर चाहे उनके दोहरे अर्थ ही 
क्यों ना निकलते हों 
और सब अपने अपने अर्थ उसके गढ़ते हों 
मगर कविता तो बस वो ही हुआ करती है 
जिसमें गेयता हो 
छंदबद्धता हो 
सपाटबयानी तो कोई भी कर सकता है 
उसके भावों को कौन गिनता है 
क्योंकि उसने नहीं जाना बाहरी सौन्दर्य 
और आज चलन नहीं है 
आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का 
आज चलन नहीं है सपाटबयानी का 
ऐसे में तुमने ही मेरे लिखे में 
जाने कैसे कविता ढूंढ ली 
जाने कैसे कविता के पायदान पर 
मेरी लेखनी को रख दिया 
मगर मैंने तो ना कभी कहा 
कि मैंने कविता को है गढ़ा 
जाने कौन से भाव तुम्हें 
उन्मत्त कर गए 
जाने कौन सा तार 
तुम्हारे दिल को छू गया 
जो तुम्हें सपाटबयानी में भी 
कविता का सम्पुट दिख गया 
और मैं हो गयी तल्लीन आराधना में 
साधना में , उपासना में 
बिना जाने 
बिना पुष्पों के अर्घ्य के 
आज के देवता प्रसन्न नहीं हुआ करते 
और मुझमे वो कूवत नहीं 
जो मछली की ग्रीवा से 
सागर में चप्पू चला सकूं 
या नए बिम्ब और प्रतीकों के प्रतिमान गढ़ूं 
जिनका कोई स्वेच्छाचारी अपने ही अर्थ निकाले 
और मेरी रचना का मूल स्वर ही शून्य में समाहित हो जाए 
मैं तो बस भावों का मेला लगाती हूँ 
और उसमे ज़िन्दगी के अनुभवों को 
बिना किसी सजावट के परोसा करती हूँ 
क्योंकि ज़िन्दगी कब दुल्हन सी श्रृंगारित हुयी है 
ये तो हर पल चूल्हे की आंच सी ही भभकती रही है 
और फिर जलती चिताओं की ज्वालाओं में 
कब श्रृंगार पोषित , सुशोभित , सुवासित हुआ है .............बस सोच में हूँ 

गर तुम स्वीकारो बिना दहेज़ की दुल्हन को 
जिसमे ना शिल्प है ना सौन्दर्य , ना बिम्ब ना प्रतीक 
तो इतना कर सकती हूँ 
जलती आँच से एक लकड़ी उठा सकती हूँ दुल्हन के श्रृंगार को
जो तुम्हारे सिंहासन को हिलाने को काफी है 
वैसे मेरी भावों की दुल्हन किसी श्रृंगार की मोहताज नहीं ..........जानती हूँ 

अब तुम खोजते रहना किसी भी कथ्य में "कविता या उसके अर्थ "
मगर आज के वक्त में तुम्हारा ये जानना भी जरूरी है 
भावों के तूफानों में कब सजावट सजी संवरी रहा करती है 

बुधवार, 15 मई 2013

कभी देखा है कोई पीर फ़कीर दरवेश ऐसा …………

चाहती थी
नींद , ख्वाब
भंवरा, पपीहा
पीहू - पीहू
पी कहाँ ,पी कहाँ
सारे बोल गुनगुनाऊँ
मै भी जोगन बन जाऊँ
मै भी एक बार
मोहब्बत मे गुम हो जाऊँ
पर ज़रूरी तो नही ना

हर रस्म निभायी ही जाये
या हर ख्वाब सच हो ही जाये
ओ मेरे
अन्जान देश के अन्जान पंछी
मेरी आखिरी कसक का आखिरी सलाम लेता जा
देख ले आज तू भी
एक अन्दाज़ ये भी होता है जीने का
न ख्वाब मे ना हकीकत मे
कुछ हथेलियों पर मोहब्बत की लकीर ही नही होती
फिर भी
जो अन्जानों की इबादत करता हो ………

कभी देखा है कोई पीर फ़कीर दरवेश ऐसा …………

रविवार, 12 मई 2013

फिर फसल को काटने से डर कैसा ?

पलायनवादिता के अंकुर
फूट ही जाते हैं एक दिन
जो बीज रोप दिए जाते हैं
बचपन में ही
हाँ ..........बचपन में
जब कुछ कम ना कर सको
तो छोड़ दो कह देना
जब कोई मुश्किल आये
तो ईश्वर पर छोड़ देना
मगर कभी मुश्किल का
सामना करने के लिए
ना प्रेरित करना
कभी खुद के हौसलों पर
विश्वास करने के लिए ना कहना
और फिर उम्मीद करना
बस ये पहाड़ खोद कर सडकें बना दे
कैसे संभव है ...........
जब जीवन से लड़ना ही नहीं सिखाया
जब कठिनाइयों से जूझने का
जज्बा ही ना पनपाया
आसान होता है
किसी भी बात से पलायन
आसान रास्ता तो सभी अपना लेते हैं
और उन रास्तों पर चलने वाले
कभी मील का पत्थर नहीं बनाते
हिमालय पर तिरंगा तो जीवट ही फहराते हैं .........पलायनवादी नहीं
पलायनवादी प्रवृत्ति  के लिए
शायद कहीं ना कहीं हम ही जिम्मेदार हैं
फिर क्यों कह देते हैं
ये अपना कर्त्तव्य सही ढंग से नहीं निभाता
बूढ़े माँ बाप की सेवा नहीं करता
आखिर पलायनवादी गुणों के पकने
का भी तो समय आता ही है एक दिन
फिर फसल को काटने से डर कैसा ?

गुरुवार, 9 मई 2013

मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना

एक छटपटाती चीख 
रुँधता गला 
कुछ ना कर सकने की विडंबना 
मुझे रोज कचोटती है 
अंतस को झकझोरती है 
और सैलाब है कि बहता ही नहीं 
आखिर क्यों हुआ ऐसा ?
प्रश्न मेरी व्याकुलता पर 
मेरी असहजता पर 
प्रश्नचिन्ह बन 
मुझे सलीब पर लटका देता है 
और मैं हूँ 
रोज सिसकियों के लावे को 
खौलाती हूँ और जीती हूँ 
क्योंकि .........तुम हो 
हाँ तुम ...........तुम्हारा प्रथम स्पर्श 
तुम्हारी ख़ामोशी 
तुम्हारी मासूमियत 
तुम्हारा बिना कहे सब कह देना 
"मैं हूँ ना "...........मुझे भिगो जाता है 

तुम्हारा बिना कहे जतला देना 
जन्म जन्मान्तर के सम्बन्ध की डोर पर 
हमारा रिश्ता थिरकता है 
जो मोहताज नहीं किसी रस्मी उल्फत का 
कुछ पल की देरी पर असह्य ना होकर 
समीकरण न बिगाडना 
बल्कि खामोश निगाहों से 
लबों की मुस्कान से 
मुझे अहसास कराना .........मैं हूँ ना 

फिर कैसा अजनबीपन 
अजब प्रीत का अजब सम्बन्ध 
हमारे रिश्ते का साक्षी बना 
और फिर एक दिन तुम्हारा देर से आना 
आते ही मुझसे अमरबेल से लिपट जाना 
मेरे वक्षों में खुद को छिपा लेना 
और तुम्हें अपनी बाहों के सुरक्षित घेरे में 
और कस के चिपटा लेना 
तभी कुछ अजनबी आहटों का तुम तक पहुंचना 
कुछ शोर के शोर से मुखातिब होना 
और एक ही पल में 
रेत के महल का धराशायी होना 
यूं ही तो नहीं हुआ था ना 

जब एक आवाज़ कानों को चीरती 
आकाश को फाड़ती , धरती पर जलजला लाती 
मेरी शिराओं में बहते रक्त को जमाती टकराई 
अरे ! ये तो हरिजन है 
अरे ! ये तो गूंगा है 
अरे ! ये तो अनाथ है 
आश्रम से भागा है 
बस जैसे किसी उड़ान भरते पंछी के 
पर कुतर दिए गए हों 
जैसे अचानक हवाओं की साँय साँय 
इतनी बढ़ गयी हो 
कि उसमे सारी कायनात सिमट गयी हो 
ये हरिजन है , ये हरिजन है 
शब्द ने मुझे शिथिल किया 
मेरा बंधन ढीला पड गया 
जो मुझे बोध हुआ 
उफ़ ! एक हरिजन का मैंने स्पर्श किया 
जाने क्यूं अपराधबोध हुआ 

और रात यूं ही सिसकती रही 
कहर बन कर टूटती रही 
बस रूह ही जैसे सजायाफ्ता हुयी 
मगर दिनकर ने तो उदय होना था 
समय ने गतिमान होना था 
मुझे भी तो नियत समय पर 
फिर वहीँ जाना था 
जैसे कोई आवाज़ लगा रहा हो 
जैसे कोई मेरा अपना बुला रहा हो 
जैसे बाग़ चाहे उजड़ जाए 
पतझड़ चाहे कितना तांडव मचाये 
मगर बहार तो फिर है आये 
बहारें न फर्क करती हैं
 हवाएं तो सभी को इकसा गिनती हैं 
खुशबू तो चहूँ  और बिखरती है 
फिर हरिजन हो या ब्राह्मण 
ये सोच जो आश्रम की ड्योढ़ी पर कदम रखा 
मानो गाँधी ने प्रश्नवाचक नज़रों से घूरा 
धरती पाँव से सरकती लगी
मगर मन वेदना तो थी बढ़ी 
खोज में सितारे दौड़ा दिए 
आस्मों को चाँद की तलब जो थी 
तभी मानो कोई ग्रहण था लगा 
जो पता ये चला …………

अब ना चाँद का दीदार होगा 
चाँद को है पूर्ण ग्रहण लगा 
जो न अब कभी उदय हो पायेगा 
वो तो उसी सांझ की बेला में काल का ग्रास था बना 
सुन , सुन्न हो गयी 
खुद से ही शर्मसार हो गयी 
मर्यादा भी मानो कुम्हला गयी 
सिर्फ एक प्रश्न ज़ेहन में अटक गया 
आखिर ऐसा कब तक होगा 
आखिर कब ये भेदभाव ख़त्म होगा 
आखिर कब तक मासूमियत लाचारी 
कठमुल्लाओं की भेंट चढ़ेगी 
कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के साथ 
बापू की मूरत थी मौन खड़ी 
बस एक ध्वनि  झकझोर रही है 
मेरी ममता को 
दिलो दिमाग पर हथौड़े सी बज रही है 
मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना 

और दूसरी तरफ मेरी ममता 
पर था प्रश्नचिन्ह लगा 
आखिर इसमें उसका क्या दोष था 
वो तो बस एक ममता को व्याकुल 
नन्हा फ़रिश्ता था 
जिसने मेरी ममता को आयाम दिया था 
फिर क्यों न कह सकी मैं 
फिर उसको क्यों न ये विश्वास दिला सकी मैं 
मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना 

"और मै बडी हो गयी" काव्य संग्रह की "मासूम यादें" की लेखिका "कमला मोहन दास बेलानी" की कहानी पर आधारित कविता 

शनिवार, 4 मई 2013

वो सुपरवूमैन कहलाती हैं

वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं 
मेगज़ीनों में शीर्ष पर छाते हैं 
तभी तो हमारे सैनिकों के 
सिर काट लिए जाते हैं 
सच्चाई की आवाज़ को दबाया जाता है 
पर इनका खून ना  खौल पाता है 
इसलिए ये ना  हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं

वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
जहाँ वूमैन की इज़्ज़त ही 
तार- तार हुयी जाती है 
मगर उनमें ना 
क्रांति की अलख जगती है 
क़ानून का गलत इस्तेमाल कर 
कोई खुद को साफ़ बचाता है 
नाबालिगता के प्रमाण पत्र तले
 सरकारी सुरक्षा पाता है 
इन्साफ रौंदा जाता है 
मर्यादाएं कुचली जाती हैं 
वहशी दरिंदों को जहाँ 
हिफाज़त में रखा जाता है 
मगर इन पर न असर होता है 
ये ना हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


मँहगाई त्राहि त्राहि मचाती है 
आम जनता मारी जाती है 
भ्रष्टाचार जडें जमाता है 
इनके राज में खूब पनपे जाता है 
सब्र कर सब्र कर की धुन पर 
कोई सरबजीत मारा जाता है 
मगर इन पर ना असर होता है 
ये ना  हो -हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं 


कोई पाक को नापाक करता है 
पीठ में छुरा घोंपता है 
फिर भी उस पर ना  गुर्राते हैं 
बस अपनों पर ही लाठीचार्ज करवाते हैं 
जहाँ जुल्म ही जुल्म मुस्काता है 
बेबस तो आंसू बहाता है 
ये कैसा बेशर्मी से नाता है 
जो इनका दिल न पसीज पाता है 
तभी तो अंधे गूंगे बहरे बन 
देश को खाए जाते हैं 
पर ये न हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


कहीं लश्कर रौब जमाता है 
कहीं चीन अन्दर घुसा आता है 
पर गूंगे मोहन को तो बस 
चुप रहना ही सुहाता है 
सिर्फ कुर्सी ही कुर्सी दिखती है 
इसलिए हाँ में हाँ मिलाता है 
अर्थशास्त्री का सारा अर्थ तो 
तिजोरियों में सिमटा जाता है 
इसलिए ये ना हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


तभी तो ताकतवर देश ना  कहाता है 
मेरा भारत पिछड़ा जाता है 
ऐसे लोभियों के हाथों में पड़ 
अपनी किस्मत पर रोये जाता है 
क्योंकि जज्बा ना अमरीका सा पाता है 
जो दुश्मन के घर में घुस उसे मार गिराता है 
ऐसी जांबाजी की मिसाल ना दे पाता है 
बस कुछ लालचियों की भेंट चढ़ा जाता है 
ये कैसा अजब तमाशा है 
जहाँ बाड़ ही मेड को खाती है 
इसलिए ये ना  हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते है


(फ़ोटो : साभार गूगल )

गुरुवार, 2 मई 2013

क्यूँकि सायों की मोहब्बत के मौसम नहीं हुआ करते

वो कौन सा जन्म था
वो कौन सी महफ़िल थी
वो कौन सा खुदा था 
वो कौन सी दुनिया थी
मेरे हमनशीं 
भरभराता हुआ आकाश जब 
तेरे दामन में सिमट गया था
एक टुकड़ा मेरी रूह का
वहीँ तेरे पाँव में छुप गया था
कोई वादा नहीं किया था
कोई जलज़ला नहीं आया था
कोई बिजली नहीं गिरी थी
कोई रुका हुआ फैसला नहीं हुआ था
फिर भी कायनात में 
एक चाँद के पहलू में 
दूजा चाँद उग आया था 
किसी खुदगर्ज़ मौसम की ताबीर बनकर
आज भी उसी खुदगर्ज़ मौसम का 
एक टुकड़ा फिर से 
इस जन्म में 
इस सुलगते मौसम में
इस ठहरे पल में
इस रूह की गुंजन में
इस सांस के स्पंदन में
अधखिले गुलाब सा उग आया है
और तुम जानते हो ना
मुझे अधखिले गुलाबों की महक कितनी अच्छी लगती है
बिल्कुल मिटटी पर गिरी बूँद की सौंधी सी खुशबू की तरह
जानती हूँ ना
गर खिल जायेगा गुलाब तो
सबकी निगाह में आ जायेगा
मगर अधखिला गुलाब तो सिर्फ मेरी नज़र को भायेगा
हे ............मेरे गुलाब में अपनी ओस भर दो और उसे जीवंत कर दो ना 
उसी युग की तरह
उसी जन्म की तरह
उसी झील में ठहरे हुए चाँद की तरह 
तुम्हें पता है ना .........
मुझे झील में ठहरा चाँद देखना कितना भाता है
क्योंकि जानती हूँ
कसकों को करार जल्दी नहीं आता है ...........
शायद तभी 
तुमसे ये गुजारिश की है
जो अधूरी ख्वाहिश थी 
उसने आज ये जुर्रत की है
मिटा दो आज खिंची हुई उस रेखा को
और ले चलो उस पार 
जहाँ चाँद के बगल में बैठा दूजा चाँद हमारे इंतजार में है 
उसका इंतजार ही मुकम्मल कर दो ना ..........आज बस इस पल को जी लो ना 
बेमौसमी बरसातों पर कभी तो भरोसा कर लो ना ..........ओ सनम !
क्यूँकि सायों की मोहब्बत के मौसम नहीं हुआ करते