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बुधवार, 18 जुलाई 2018

भीड़

भीड़ का कोई धर्म नहीं होता
सच ही तो कहा गया
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
सच ही तो कहा गया
फिर आज प्रश्न क्यों?
फिर आज उस पर लगाम लगाने की जरूरत क्यों?

आदत है तुम्हारी
हर उक्ति-लोकोक्ति को स्वीकारना
उसी की बनायी लकीर पर चलना
बिना सोचे समझे उसके परिणाम
तो फिर आज क्यों डर रहे हो
क्यों आज प्रश्न उठ रहे हैं ?

सोचने का वक्त अब आया
तब न सोचा
बिना सोचे समझे मानते गए
जबकि जानते हैं वो तुम्हारी कमजोरी
फायदा उठाना है उनका धर्म
नहीं है कोई एक कातिल
नहीं है कोई एक मुजरिम
और दुनिया की किसी अदालत में
नहीं दी गयी आज तक भीड़ को सजा

कहो कैसे चेहरे पहचानोगे?
पहचान भी लिया तो क्या कर लोगे?
कोई मूक दर्शक ही होगा
तो देखना उसका जुर्म हुआ?
किस किस को सजा दोगे?

क्या दे सकते हो भीड़ को फाँसी क़त्ल पर?

लेकिन एक बात का जवाब देना
ये भीड़ आखिर पैदा किसने की और कैसे?
कहाँ कमी रही जो आज भीड़ उग्र हुई
या फिर जान गयी है वो अपने होने का अर्थ
क्या ये आकलन का वक्त नहीं है?
क्या ये अपने गिरेबान में झाँकने का समय नहीं है?

भीड़ स्वयं से नहीं होती
भीड़ पैदा की जाती है
और तुमने पैदा की
और आज अपनी ही पैदा संतानों से भयभीत हो उठे ओ हुक्मरानों ?
सवालिया निगाहों के प्रश्नों पर तुम्हारा मौन
सांत्वना का फाहा नहीं

जान लो
सिर्फ कानून बनाने भर से कुछ नहीं होना
उग्रता के बीज बोये हैं तो काटोगे भी तुम ही
कल राजनीति की बिसात पर भीड़ एक मोहरा थी
आज जिंदगी की बिसात पर
सोचो जरा
ये किस मोड़ पर खड़े हो तुम
और तुम्हारी भीड़
क्योंकि
कहते हैं चोर को नहीं उसकी माँ को पकड़ो
अब है कोई हल आपके पास
या निरुत्तर भीड़
दिशाहीन भीड़ ही बचा है अब इस देश का भविष्य ?





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