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रविवार, 13 अगस्त 2017

बच्चे सो रहे हैं

बच्चे सो रहे हैं
माँ अंतिम लोरी सुना रही है

मत ले जाओ मेरे लाल को
वो सो रहा है
चिल्ला रही है , गिडगिडा रही है , बिलबिला रही है

उसके कपडे, खिलौने , सामान संवार रही है
सोकर उठेगा उसका लाल
तब सजाएगी संवारेगी
मत करो तुम हाहाकार
कह, समझा रही है

सुनिए ये सदमा नहीं है
हकीकत है
दर्द है
बेबसी है
हकीकत को झुठलाने की

क्योंकि
मौत तो एक दिन आनी ही होती है , आ गयी
जान जानी ही होती है , चली गयी
कर्णधारों के कान पर जूँ नहीं रेंगनी होती, नहीं रेंगी

फिर नाहक शोर मचाते हो
एक माँ रो रही है , रोने दो उसे
मनाने दो मातम उसे
उम्र भर के लिए
कि
बच्चों की बारात जो निकली है

ये माओं के सम्मिलित रुदन की घड़ी है
जाने क्यों फिर भी
आसमां नहीं फटा
खुदा भी नहीं रोया आज

शायद माओं से डर गया
गर दे दिया श्राप तो?

शायद इसीलिए
अब कंसों से मुक्ति के लिए नहीं जन्म लेते कन्हाई ...

3 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सटीक और सार्थक प्रस्तुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (14-08-2017) को "छेड़छाड़ से छेड़छाड़" (चर्चा अंक 2696) (चर्चा अंक 2695) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena Sharma ने कहा…

बच्चों की मौत के जिम्मेदार जो कलियुगी कंस हैं, उन्हें सजा कौन देगा ? सच,यह सवाल तो मन में आए बिना नहीं रहता कि कन्हैया तुम कहाँ हो ?