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रविवार, 27 अप्रैल 2014

इक अरसे बाद

इक अरसे बाद 

बिना पटकथा के संवाद कर गया कोई 
दिल धड़कन रूह तक उत्तर गया कोई 
अब धमकती है मिटटी मेरे आँगन की 
जब से नज़रों से जिरह कर गया कोई


मैं ही लक्ष्य 
मैं ही अर्जुन 
कहो 
कौन किस पर निशाना साधे अब ?

उल्लास के पंखों पर सवार हुआ करती थी 
वो जो चिडिया मेरे आँगन में उतरा करती थी
इस दिल की राज़दार हुआ करती थी 
नरगिसी अंदाज़ में जब आवाज़ दिया करती थी

मुझसे मैं खो गयी 
क्या से क्या हो गयी 
ज़िंदा थी जो कल तलक
आज जाने कहाँ खो गयी

दर्द जब भी पास आया 
दिल ने इक गीत गाया 
नैनो ने अश्रु जब भी ढलकाया 
रात ने इक जश्न मनाया


जाने कहाँ खो गयी इक दुनिया 
अब खुद को ढूँढ रही हूँ मैं 
न शब्द बचे न अर्थ 
वाक्यों में खो गयी हूँ मैं

चुप्पी का कैनवस जब गहराता है 
अक्स अपना ही कोई उभर आता है 
खुद के पहलू से जब भी दूर जा बैठे
कोई मुझे ही मुझसे मिला जाता है

बूँद बूँद रिसती ज़िन्दगी 
फिर किस पर करूँ गुमान

बस इंसाँ में इंसानियत बाकी रहे 
लम्हा एक ही काफ़ी है जीने के लिए

कोशिशों के पुल तुम चढते रहो 
बचने की तजवीजें मैं करती रहूँ 

इसी बेख्याली में गुजरती रहेगी ज़िन्दगी

जाने कौन से कैल ,चीड, देवदार हैं 
चीरे जाती हूँ मगर कटते ही नहीं 
मौन के सुलगते अस्थिपंजरों के 
अवशेष तक अब मिलते ही नहीं

जरूरी नहीं 
धधकते लावे ही कारण बनें 
शून्य से नीचे जाते 
तापमाप पर भी 
पड जाते हैं फ़फ़ोले .........


9 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-04-2014) को "मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी" (चर्चा मंच-1596) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-04-2014) को "मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी" (चर्चा मंच-1596) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

shikha kaushik ने कहा…

very well written .today i have read your poems in janvani's magazine ravivani .nice to read .

shikha kaushik ने कहा…

very well written .today i have read your poems in janvani's magazine ravivani .nice to read .

Neeraj Kumar ने कहा…

बहुत ही उत्कृष्ट रचना ...बहुत बधाई ..

महेश कुशवंश ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति काव्य नई ऊचाई छू रहा है बधाई

मन के - मनके ने कहा…

पंक्तियां जो मन को छू गईं---वैसे तो हर एक शब्द बायां-ए-जिंदगी है.
बिन पटकथा के संवाद--
मैं ही लक्षय,मैं ही अर्जुन
वो चिडिया----
नरगिसी अंदाज में---
दर्द जब भी पास आया--
बूंद-बूंद रिसती जिंदगी--
वाह!!

dr.mahendrag ने कहा…

चुप्पी का कैनवस जब गहराता है
अक्स अपना ही कोई उभर आता है
बहुत सुन्दर प्रस्तुति मनोभावना को साकार कर दिया है

Unknown ने कहा…

Aap ki har prastuti man ko chu lete hai sadhu wad