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शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

मंगलाचरण

 

मैंने अक्सर छोड़ा हर वो रास्ता
जिससे दूसरे को तकलीफ हुई
छवि मेरी यूँ बनती बिगड़ती रही
क्योंकि
छवियाँ बनती ही टूटने के लिये हैं

पलायन नहीं था ये और न होगा
बस फितरत है
खुद को बदलने की
एक नयी राह पर चलने की
अकेले, बिल्कुल अकेले
कि
नहीं निभाए जाते झूठ फरेब के रिश्ते
कि
पेट में उगी दाढ़ियों से नहीं बना सकती द्वार पर तोरण
कि
तुम्हारे गणित से नहीं मिल सकता कभी मेरा गणित

तुम्हारी भीड़ से भरा है हर गली मोहल्ला हर चौराहा
मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे मध्य अपने लिये स्थान
मैं बनाती हूँ हर बार अपने लिये अपना स्थान
पाती हूँ एक नया मुकाम
और तुम हर बार
चेहरे बदल काटते हो मेरी राहें
सिलसिला है कि खत्म ही नहीं होता

मैंने न सड़क पर चलना छोड़ा है और न ही पकड़ी है पगडंडी
मेरी अपनी गति है और अपना लक्ष्य
चयनित मार्ग ही तय करते हैं अक्सर मंज़िलें मगर
तुम काटोगे जितनी बार मेरे हाथ
बंद करोगे जितनी बार द्वार
मंज़िलें स्वयं बनाएंगी मेरे लिये नयी राहें
जाना है जब से
मुस्कुराहट के फूल उछाल देती हूँ आसमाँ की तरफ

ये मेरी यात्रा है
अंतिम पड़ाव नहीं
जो दो दो हाथ करने पर निर्धारित हो जीत हार
जीने का हुनर जरूरी नहीं मरकर ही सीखा जाए
मैंने यथार्थ के गिट्टों से जीती हैं बाजियाँ
और इस बार भी विदाईगीत मुझे ही गाना है
नियति ने पकड़ी हुई है मेरी ऊँगली
तय कर रही है दिशा
हर बार की तरह
मुड़ना है फिर मुझे एक नए मोड़ पर
एक नयी यात्रा का मुसाफिर बन

सुप्रभात से आरम्भ दिन का अंत शुभरात्रि ही हुआ करता है एक नए आरम्भ हेतु
मंगलाचरण इसे ही कहते हैं

2 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सुंदर

Pallavi saxena ने कहा…

यात्रा यूं ही गतिमान रहे शुभकामनायें आपको।