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मंगलवार, 26 जुलाई 2022

नए सफ़र की मुसाफिर बन ...

 


मेरे सीने में कुछ घुटे हुए अल्फाज़ हैं जिनकी ऐंठन से तड़क रही हूँ मैं
मगर मेघ हैं कि बरसते ही नहीं,
वो जो कुरेद रहा है जमी हुई परतों को
वो जो छील रहा है त्वचा पर पसरे अवसाद को
जाने कहाँ ले जाएगा, किस रंग में रंगेगा चूनर
मेरा हंस अकेला उड़ जाएगा
और मैं हो जाऊँगी असीम ... पूर्णतः मुक्त

ॐ शांति ॐ शांति ॐ शांति कहने भर से छूट जायेगा हर बंधन
उस पार से आती आवाजें ही करेंगी मेरा स्वीकार और सबका परिहार
ये अंतिम इबादत का समय है
रूकती हुई धडकनों की बांसुरी से अब नहीं बजेगी कोई धुन
घुटते गले से नहीं उचारा जाता राम नाम
बस आँखों के ठहरने भर से हो जाएगा सफल मुकम्मल

बहुत गा लिए शोकगीत
बस गाओ अब मुक्ति गीत
देह साधना पूर्णता की ओर अग्रसित है

तुम्हारा रुदन मेरी अंतिम यात्रा की अंतिम परिणति है
और मैं बैठी हूँ पुष्पक विमान में
नए सफ़र की मुसाफिर बन ...


 

4 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सुंदर रचना

Swarajya karun ने कहा…

बेहतरीन रचना।

vandan gupta ने कहा…

@Swarajya karun जी शुक्रिया

vandan gupta ने कहा…

@Onkar जी शुक्रिया