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बुधवार, 27 मई 2015

जनाब आप किसे बहला रहे हैं

बिना अवकाश लिए 
सरकारी दौरों के नाम पर 
विदेश यात्रा किए जा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

मेक इन इंडिया के नाम पर 
बड़े देशों से प्राप्त कर सहायता 
छोटे देशों को देकर किसका कद बढ़ा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

कफ़न नहीं दिया 
१२ रूपये में बीमा के नाम पर 
बस ऊंगली घुमा कान पकडे जा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

अपना गुणगान खुद करने के 
नए नए पैंतरे सिखा 
सेल्फी खींच मशहूर होने  के 
ये कैसे अंदाज़ सिखा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं

टीवी मीडिया की सुर्ख़ियों में 
प्रतिदिन छाए रहने के लिए  
आप तो बस बातों के बतोले खिला रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी 
सब्जबागों के शहर में बस 
अपनी हांड़ी ही चढ़ेगी 
जाने कैसे कैसे करतब दिखा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

ये जनता सब जानती है
वक्त रहते संभल जाओ 
वर्ना तख़्त भी उखाड़ती है 
बस इतना आप भी समझ जाओ 
जनाब अब और न बातों से बहलाओ 
कुछ काम भी करके दिखाओ अब कुछ काम भी करके दिखाओ ............

गुरुवार, 21 मई 2015

उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच

सिन्धी और पंजाबी के बाद अब नेपाली में मेरी कविता का अनुवाद नेपाल से निकलने वाली पत्रिका " शब्द संयोजन " में भी ........वासुदेव अधिकारी जी का हार्दिक आभार जो उन्होंने कविता का अनुवाद कराया और पत्रिका भी भेजी .जिस कविता का अनुवाद हुआ है वो ये है जिसका शीर्षक बदला हुआ है :





स्त्रियां नहीं होतीं हैं 
चालीस ,  पचास या अस्सी साला 
और न ही होती हैं सोलह साला 

यौवन धन से भरपूर  
हो सकती हैं किशोरी या तरुणी  
प्रेयसी या आकाश विहारिणी  
हर खरखराती नज़र में  
गिद्ध दृष्टि वहाँ नहीं ढूँढती  
यौवनोचित्त आकर्षण  
वहाँ होती हैं बस एक स्त्री   
और स्खलन तक होता है एक पुरुष  

प्रदेश हों घाटियाँ या तराई  
वो बेशक उगा लें 
अपनी उमंगों की फ़सल 
मगर नहीं ढूँढती 
कभी मुफ़ीद जगह  
क्योंकि जानती हैं  
बंजरता में भी 
उष्णता और नमी के स्रोत खोजना  
इसलिये  
मुकम्मल होने को उन्हें  
नहीं होती जरूरत उम्र के विभाजन की  
स्त्री , हर उम्र में होती है मुकम्मल 
अपने स्त्रीत्व के साथ  

भीग सकती है  
कल- कल करते प्रपातों में 
उम्र के किसी भी दौर में  
उम्र की मोहताज नहीं होतीं 
उसकी स्त्रियोचित  
सहज सुलभ आकांक्षाएं
देह निर्झर नहीं सूखा करता 
किसी भी दौर में 
लेकिन अतृप्त इच्छाओं कामनाओं की 
पोटली भर नहीं है उसका अस्तित्व  


कदम्ब के पेड ही नहीं होते 
आश्रय स्थल या पींग भरने के हिंडोले  
स्वप्न हिंडोलों से परे  
हकीकत की शाखाओं पर डालकर 
अपनी चाहतों के झूले 
झूल लेती हैं बिना प्रियतम के भी 
खुद से मोहब्बत करके  
फिर वो सोलहवाँ सावन हो या पचहत्तरवाँ 
पलाश सुलगाने की कला में माहिर होती हैं 
उम्र के हर दौर में  

मत खोजना उसे 
झुर्रियों की दरारों में 
मत छूना उसकी देहयष्टि से परे 
उसकी भावनाओं के हरम को 
भस्मीभूत करने को काफी है 
उम्र के तिरोहित बीज ही 

तुम्हारी सोच के कबूतरों से परे है 
स्त्री की उड़ान के स्तम्भ 
जी हाँ ……… कदमबोसी को करके दरकिनार 
स्त्री बनी है खुद मुख़्तार 
अपनी ज़िन्दगी के प्रत्येक क्षण में 
फिर उम्र के फरेबों में कौन पड़े 

अब कैसे विभाग करोगे  
जहाँ ऊँट किसी भी करवट बैठे  
स्त्री से इतर स्त्री होती ही नहीं  
फिर कैसे संभव है 
सोलह , चालीस या पचास में विभाजन कर 
उसके अस्तित्व से उसे खोजना  

ये उम्र के विभाजन तुम्हारी कुंठित सोच के पर्याय भर हैं ………ओ पुरुष !!!

बुधवार, 13 मई 2015

खोल सकते हो तो खोल देना



मेरी मुखरता के सर्पदंश से जब जब आहत हुए
दोषारोपण की आदत से न मुक्त हुए
इस बार बदलने को तस्वीर
करनी होगी तुम्हें ही पहल

क्योंकि
इस ताले की चाबी सिर्फ तुम्हारे पास है

सुनो
खोल सकते हो तो खोल देना
मेरी चुप को इस बार
क्योंकि
मुखर किंवदंतियों का ग्रास बनने के लिए जरूरी है तुम्हारा समर्पण

रविवार, 10 मई 2015

मातृ दिवस पर


1
माँ ने जिसका ख्याल रखा उम्र भर
वो ही आज ख्याल रखे जाने की मोहताज
ये कैसी नियति की बिसात ?

2
कल तक जिसके पाँव तले जन्नत दिखती थी
आज अकेलेपन उदासी के कमरों में सिमटी बैठी है
तुझे बात करने की फुर्सत नहीं मिलती
उसी माँ के मुख से तेरे लिए दुआएं निकलती हैं

3
जिसके नेह की बरसात में भीगा रहा बचपन
उसी माँ का ममता भरा साया जो सिर से हट गया
उसी एक पल से जान लेना
ज़िन्दगी में कड़ी धूप का सफ़र शुरू हो गया 


4
ये माँ की दुआओं का ही असर होता है
कि खुदा भी अपना नियम बदल देता है
जब उसकी पुकार चीरती है आसमां का सीना
तब खुदा का सिर भी सजदे में झुका होता है



मंगलवार, 5 मई 2015

' कतरा कतरा ज़िन्दगी '......मेरी नज़र से




धूप के सफ़र से  शुरू हुआ सफ़र जब आकार लेता है तो ' कतरा कतरा ज़िन्दगी ' जन्म लेती है जो जाने कितने मोड़ो से गुजरते हुए एक लम्हे में तब्दील हो जाती है  .  मुकेश दुबे जी का दूसरा उपन्यास ' कतरा कतरा ज़िन्दगी 'शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है जो उन्होंने मुझे पुस्तक मेले में सप्रेम भेंट दिया .

कतरा कतरा ज़िन्दगी यूँ तो देखा जाए एक आम कहानी कह देगा पाठक मगर उसको जिस तरह से प्रस्तुत किया है ये लेखक के लेखन का कमाल है . सीधे सरल सहज शब्दों का प्रयोग मगर प्रवाहमयी प्रस्तुति कहीं न तो कहानी को बोझिल करती है और न ही ऊब को कोई स्थान बल्कि पाठक के मन में एक उत्सुकता बनी रहती है आखिर हुआ क्या अभिजीत और सुखविंदर की ज़िन्दगी में या अभिजीत और शुभ्रतो की ज़िन्दगी में . और पढ़ते पढ़ते जब पाठक अंत तक पहुँचता है तो आँख से अश्रुप्रवाह स्वतः होने लगता है जो कहीं न कहीं पाठक को पात्रों से बांधे होता है इसलिए पाठक खुद को उनसे जुड़ा पाता है और घटनाएँ कैसे ज़िन्दगी में आकार ले नियंत्रण से बाहर होती हैं और फिर कैसे पात्र उनके प्रवाह में बहता जाता है सारी कहानी उसी का दिग्दर्शन है . मिलन और बिछोह  जाति - पांति की अग्नि में कैसे स्वाहा होते हैं और उस वजह से कैसे ज़िंदगियाँ हाशियों पर आ जाती हैं कि किसी भी ज़िन्दगी को किनारा नहीं मिलता का एक बेहतरीन चित्रण है . लेखक ने बारीक से बारीक चीज को इस तरह लिखा है कि सब जैसे सामने ही घटित हो रहा हो . एक एक पल , एक एक क्षण का ब्योरेवार लिखना और उसमे पाठक को भी बांधे रखने की कूवत रखना ही लेखन की सफलता है जिसमे लेखक सफल हुआ है . हर बार घटनाओं को ऊंचाई पर ले जाकर फिर सतह पर ले आने की कला में लेखक माहिर हैं जहाँ रिश्तों के बनने और बिगड़ने की प्रक्रिया के अंतर्गत जाने कितने मोड़ कितने लम्हे ऐसे आते हैं पाठक को लगता है बस शायद अब बिजली कडकड़ाएगी या अब खिलेंगे कहीं किसी छोर पर बुरांस के फूल वही लेखन की सीमाओं पर नियंत्रण रखते हुए एक मर्यादा कायम रखी जबकि संभव नहीं होता किसी भी लेखक के लिए इस सीमा का अतिक्रमण किये बिना लिखना लेकिन एक साफ़ सुथरी कहानी पाठक को आकर्षित करती है जिसे कोई भी बड़ा हो या बच्चा पढ़ सकता है , समझ सकता है और लेखन की सरलता पर मंत्रमुग्ध हो सकता है .

इंसान जितना कतरा कतरा ज़िन्दगी को सहेजने की ताउम्र कोशिश करता रहता है वो रेत सी कब और कैसे फिसलती जाती है पता ही नहीं चलता और एक वक्त आता है जब वो खुद को ठगा हुआ महसूसता है तो ज़िन्दगी बेमानी लगने लगती है और मौत खूबसूरत .......मानो लेखक ने इसी सोच को इंगित किया है .

मुकेश दुबे जी का लेखन इसी प्रकार आकार लेता रहे और अनवरत चलता रहे यही दुआ है . शुभकामनाओं के साथ .

शुक्रवार, 1 मई 2015

'आय ऍम नॉट मजदूर '

'आय ऍम नॉट मजदूर '

स्वीकार रही हैं कुछ स्त्रियाँ 
हाँ , आज मजदूर दिवस है 
और गर्व है मुझे 
अपने मजदूर होने पर 

ये किस सोच को जन्म दिया 
स्त्री होकर स्त्री को मजदूर का दर्जा दिला 
कौन सा महान कृत्य किया 
समझ से परे नज़र आया 

आज की आधुनिक पढ़ी लिखी स्त्री भी 
गर खुद को मजदूर की श्रेणी में रखेगी 
तो अनपढ़ पिछड़ी तो कभी 
अपने होने के अर्थ को न समझ सकेगी 

ये कैसे मापदंड हम बना रहे 
ये कौन सी आग जला रहे 
जो स्त्री को स्त्री की समुचित पहचान न करवा 
उसे खुद ही दोजख की आग में झोंक रहे 

नहीं , नहीं स्वीकारती मैं ये तमगा 
मेरे लिए सबसे पहले है मेरा अस्तित्व 
मेरा होना , मेरी पहचान 
जो नहीं गुजरती किसी भी तंग गली से 

नहीं  , नहीं हूँ मैं मजदूर 
और मैं ही क्या 
नहीं है कोई मेरी नज़र में मजदूर 
क्योंकि 
जीवनयापन हेतु किया कार्य 
नहीं बनाता किसी को मजदूर 

मैं हूँ एक ऐसा व्यक्तित्व 
जो देश समाज और घर में देकर अपना योगदान 
करती है भविष्य निर्माण 

हाँ , निर्मात्री हूँ मैं भविष्य की 
मगर नहीं हूँ मजदूर 
इसलिए कह सकती हूँ गर्व से 
'आय ऍम नॉट मजदूर '

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

मिट्टियों की सिर्फ कहानियां होती हैं निशानियाँ नहीं .......

करते रहे दोहन 
करते रहे शोषण 
आखिर सीमा थी उसकी भी 
और जब सीमाएं लांघी जाती हैं 
तबाहियों के मंज़र ही नज़र आते हैं 


कोशिशों के तमाम आग्रह 
जब निरस्त हुए 
खूँटा तोडना ही तब  
अंतिम विकल्प नज़र आया 
वो बेचैन थी .....जाने कब से 
वो बेचैनी यूँ बाहर आ गयी 
थरथरा गयी कंपकंपा गयी
धरा की हलचल 
समूचा वजूद हिला गयी 

रह रह उठते रुदन की हलचल से 
बेशक तुम दहल उठो अब 
मगर उसकी ख़ामोशी 
उसकी शांति 
उसकी चुप्पी से सहमे तुम 
आज खुद को कितना ही कोसो 
जानती है वो 
न बदले हो न बदलोगे कभी 

सब्र का आखिरी इम्तिहान और आखिरी तिलक भी 
क्या कभी कोई यूं लगाया करता है का इल्ज़ाम 
सहना नियति है उसकी 
फिर वो धरा हो या स्त्री .........
ओ अजब फितरत के मालिक 
उस पर कहते हो भूचाल आ गया !!!


जानते हो न 
मिट्टियों की सिर्फ कहानियां होती हैं निशानियाँ नहीं .......

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

जा बेटी जा ..........जी ले अपनी ज़िन्दगी !!!

हो जाती हूँ कभी कभी बेहद परेशां 
जब भी बेटी कहीं जाने को कहती है 
और मेरी आँखों के आगे 
एक विशालकाय मुखाकृति आ खड़ी होती है 
जिसका कोई नाम नहीं , पहचान नहीं , आकृति नहीं 
लेकिन फिर भी उसकी उपस्थिति 
मेरी भयाक्रांत आँखों में दर्ज होती है 
जबकि बेटे द्वारा किये गए इसी प्रश्न पर 
मैं निश्चिन्त होती हूँ 


उसके आँखों में उठे , ठहरे 
अनगिनत प्रश्नों से 
घायल होती मैं 
अक्सर अनुत्तरित हो जाती हूँ 
नज़र नहीं मिला पाती 
जवाब नहीं दे पाती 
बेटी और बेटे में फर्क न करने वाली मैं 
बराबरी का परचम लहराने वाली मैं 
उस वक्त हो जाती हूँ 
निसहाय , असहाय , उदास , परेशां , हताश 

एक भयावह समय में जीती मैं 
आने वाली पीढ़ी के हाथ में 
सुकून के पल संजो नहीं पाती 
फिर काहे का खुद को 
स्त्री सरोकारों का हितैषी समझती हूँ 
कहीं महज ढकोसला तो नहीं ये 
या मेरा कोरा भ्रम भर है 
तमाम स्त्री विमर्श 
जानते हुए ये सत्य 
कि 
जंगल में राज शेर का ही हुआ करता है 

विरोधाभासी मैं हूँ , मेरी सोच है या इस दुनिया का यही है असली चेहरा 
जो मुझे अक्सर डराता है 
नींद मेरी उड़ाता है 
और यही प्रश्न उठाता है 
आखिर क्यों दोनों के लिए नहीं है ये संसार समान ?
हूँ इसी पसोपेश में ............

समय की रेत में जाने कौन सा बालू मिला है चाहूँ तो भी अलग नहीं कर पाती 
क्या होगा संभव कभी जब समय के दर्पण में छलावों का दीदार न हो 
और कह सकूं सुकूँ से मैं 
बिना किसी प्रतिबन्ध के 
जा बेटी जा ..........जी ले अपनी ज़िन्दगी ?

मंगलवार, 31 मार्च 2015

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

एक मुद्दत हुई 
न अपना कोई धर्म बना पायी 
न ही अपनी कोई जाति 
जबकि पायी जाती है ये 
हर धर्म और जाति में 
क्योंकि संभव नहीं इसके बिना 
सृष्टि की संरचना 

जिसने जो धर्म बताया अपना लिया 
जिसने जो जाति बताई अपना ली 
जिसने जो घर बताया उम्र बिता दी 


उसका धर्म क्या है 
उसकी जाति क्या है 
ओ समाज के ठेकेदारों 
आओ उगलो उगलदानों में 
पीक अपने तालिबानी फतवों की 

क्योंकि एक मुद्दत से 
निष्कासित है वो 
घर , धर्म और जाति से 

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

बुधवार, 25 मार्च 2015

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


आज मैंने रखा है ब्रह्मभोज
ब्राह्मणों के लिए नहीं 
कहाँ आज वैसे ब्राह्मण बचे 
जिनके शाप से शापित हो जाएँ पूरी नस्लें ही 

ये भोज है तुम्हारे लिए 
सिर्फ तुम्हारे लिए ..... आखिरी बार
भोज की सामग्री में है 
इंतज़ार के पीले फूल , गुलाबों की सूखी पत्तियाँ
और मेरी कभी न टूटने वाली आस की महक 

शायद अब टूट जाए हर रस्मी दीवार 
और तुम पुकार लो एक बार 
हो जाए मेरी आखिरी आरजू का तर्पण 
और हो जाए मेरी युगों से प्यासी प्यास का अंत 


आज आखिरी दिन है 
और आखिरी लम्हा 
करो विदा मुझे 

सुनो 
चाहो या न चाहो 
मरने पर तो सभी विदा किया करते हैं 
और मुझे होना है जीते जी विदा 
तुमसे , तुम्हारी याद से , तुम्हारे नाम से 


क्या देखा है कभी मेरी तरह 
मौत का आखिरी जश्न मनाते किसी को

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


सोमवार, 16 मार्च 2015

' आइये स्टिंग करें '

' आइये स्टिंग करें ' शनिवार के 'हमारा मेट्रो' में प्रकाशित आलेख






आइये स्टिंग करें भाई कोई काम धंधा नहीं है आजकल , बेरोजगार हूँ समझ नहीं आता क्या करूँ ? तो है न सबसे आसान काम जिसमे तुम्हारा कुछ नहीं जाता बस क्रेडिट तुम्हें मिल जाता है जीवन मज़े से गुजरने लगता है वो क्या बताइए जरा भाईजान यहाँ तो हालत पतली हो गयी है , जेब खाली है और बीवी ने भी घर में घुसने से मना कर दिया है जब तक जेब भर नहीं जाती तो भैये काहे चिंता करते हो , हम किस मर्ज़ की दवा हैं .हम तो वक्त देखकर चाल बदल लिया करते हैं , अब देखो मौसम स्टिंग का देखो कितना सुहाना है , तो आइये स्टिंग करें , लोग अपनों के ही स्टिंग कर रहे हैं और देखो तो कैसे छा रहे हैं टीवी चैनलों पर , अख़बारों में . सिर्फ जरूरत है एक बार स्टिंग करने की वो भी किसी नेता , अभिनेता की बस , तुम्हें प्यारे छाने से कोई नहीं रोक सकता . देखो टीवी वालों को तो अपनी टी आर पी बढाने को मसाला चाहिए फिर वो झूठा है या सच्चा उन्हें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि देखने वाला तो सिर्फ वो ही चैनल देखता है जहाँ ऐसी मसालेदार खबर आती है . हर किसी को अपने से ज्यादा दुसरे की ज़िन्दगी में झाँकने की आदत होती है तो ये स्टिंग ऐसे मनोरोगियों के लिए दवा का काम करते हैं , घर बैठे उनका इलाज हो जाता है तो इसमें किसी के बाप का क्या जाता है फिर साथ में मनोरंजन का मनोरंजन . और सबसे बड़ी बात यदि इसमें कोई अपने आस पास का जानकार फंस जाता है तो फिर तो पूछो ही मत बन्दे की बल्ले बल्ले हो जाती है , हर तरफ खुद की इमानदारी के ढोल पीटते हुए उसकी बेईमानी के ऐसे परखच्चे उड़ाता है कि बेचारा स्वप्न में भी सिर्फ तुम्हें ही देखता है , देखो कहता था न साला रिश्वत लेता है , बिना रिश्वत लिए तो अपने बाप की तरफ भी नहीं थूकता तो और लोग तो क्या चीज हैं , कल तक सबको गाजर मूली की तरह काटता था न अब काटेगा साला जेल में गाजर मूली तब भाव समझ आएगा . देखो बाबू इसके लिए कोई ज्यादा मेहनत नहीं करनी सिर्फ एक ऐसी तकनीक से लैस चीज ले लो जिसके बिना तुम्हारा गुजारा भी न हो और कोई तुम्हें उसे बाहर ही छोड़कर आने को न कहे बस फिर देखो जिसे जब चाहे स्टिंग कर सकते हो और अपने काम निकलवा सकते हो फिर वो घर का हो बाहर का , पडोसी हो या रिश्तेदार .......यूं समझो प्यारे ये तो अंधे के हाथों बटेर लग गई .........तुम चाहो तो इससे सत्ता पलट सकते हो फिर तुम्हारे जीवन की छोटी मोटी समस्याएं तो हैं क्या चीज बस इतना ध्यान रखना अपने बच्चों को मत सिखाना वर्ना कहीं ऐसा न हो तुम कामवाली बाई को देख रहे हों या पड़ोसन से नैन मटक्का कर रहे हों या सेक्रेटरी के साथ डेट पर हों और तुम ही हो जाओ स्टिंग के शिकार ........फिर मत कहना स्टिंग है बेकार , ये तो झूठी स्टिंग है , ये तो फेक है , इसमें मैं नहीं मेरे जैसा दिखने वाला कोई और है क्योंकि प्यारे जिसे एक बार स्टिंग का चस्का लग जाता है तो बहुत सी बार शिकारी भी शिकार हो जाता है इसलिए अपने बचाव के सारे उपाय करने के बाद स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना वर्ना अभिमन्यु का चक्रव्यूह में फंसकर मरना निश्चित है इस सबक को हमेशा याद रखना और जय हो स्टिंग देवता कह स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना . अब जाओ प्यारे ....सामने से हमारी महबूबा तशरीफ ला रही हैं तुम्हें देख बेवजह हिचक जायेंगी और आगे निकल जायेंगी और हमारा तो दिन ही पनौती की भेंट चढ़ जाएगा वैसे ही सुबह सुबह पनौती की शक्ल ही तो देखकर आया हूँ शायद अब थोडा सुकून मिले आहा क्या जोरदार उपाय बताया है .......जय हो स्टिंग देवता बचकर रहना मियां क्योंकि सोचता हूँ तुम से ही कारोबार शुरू करता हूँ क्योंकि जेब खाली है और शाम को बीवी के लिए डोमिनोज से पिज़्ज़ा खिलाने की फरमाइश भी पूरी करनी है .........क्या ख्याल है ?

गुरुवार, 12 मार्च 2015

ख़ामोशी चुप्पी मौन

ख़ामोशी चुप्पी मौन 
इनका तुमने एक ही अर्थ लगाया 
मगर कभी नहीं आँक पाए वास्तविक अर्थ 
खामोशियों के पीछे जाने कितने तूफ़ान छुपे होते हैं 
चुप्पी के पीछे जाने कितने चक्रवात चला करते हैं 
मौन की आँधियों में भी शोर हुआ करते हैं 

सावधान रहना , मत छेड़ना कभी 
किसी के मौन को 
किसी की ख़ामोशी को 
किसी को चुप्पी को 

क्योंकि 
फिर कुछ नहीं बचेगा बचाने को 

महज वहम है तुम्हारा ख़ामोशी चुप्पी और मौन पर्याय हैं विकल्पहीनता के 

रविवार, 8 मार्च 2015

फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

कितना अच्छा लगता है न 
जब एक दिन में ज़िन्दगी सिमट जाती है 
तुम्हें मुक्ति की लोलीपॉप हाथ में पकड़ाई जाती है 
और तुम एक बार फिर 
अदृश्य चक्रव्यूह की शिकार हो 
रख देती हो खुद को गिरवीं 

आह ! स्त्री मुक्ति , स्त्री विमर्श , महिला दिवस 
सिर्फ एक दिन मुक़र्रर किया गया है तुम्हें साँस लेने को 
क्या संतुष्ट हो एक दिन से ओ स्त्री ?

शायद तभी तो खुश हो दे देती हो 
'महिला दिवस की शुभकामनाएं '
बिना जाने महिला दिवस के अर्थहीन औचित्य को 
क्योंकि 
तुम हो तो जीवन है 
जीवन का अर्थ है 
ये संसार है 
इसका आधार है 
बस इतना सा ही तो समझना है तुम्हें 
फिर हर दिन तुम्हारा है 
फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

शनिवार, 7 मार्च 2015

जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया


जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया ........बता दिया देर से मिला न्याय भी अन्याय ही होता है जिसका उदाहरण रहा बीबीसी द्वारा दिखाया विडियो तो जब जनता देखेगी कि यहाँ कोई सुनवाई नहीं है , न्याय की आस में आस भी टूट जाती है मगर न्याय नहीं मिलता तो जनता को ही पहल करनी पड़ती है . बेशक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का नाटक किया जाए मगर न्याय तो अब तक नहीं मिला और जनता के सब्र का बाँध टूट गया जिसने बता दिया यदि सरकार आँख मूंदेंगी और न्याय के नाम पर जनता की भावनाओं से खिलवाड़ होगा तो जनता खुद न्याय कर देगी . सिर्फ कैंडल मार्च निकाल देने भर तक नहीं है कर्तव्य शायद जनता अब जान चुकी है .

इस वाकये से ये तो सिद्ध हो गया कि अब जनता के सब्र का बाँध टूटने लगा है और सरकार को चेत जाना चाहिए और क़ानून में भी बदलाव करना चाहिए नहीं तो ऐसी घटनाएं हर गली चौराहों पर होती दिखेंगी क्योंकि जिस तरह से रेप की घटनाएं बढ़ी हैं उस अनुपात में कोई सख्त कार्यवाही अब तक नहीं की गयी जिससे उनमे कोई डर हो न ही जाग्रति के लिए कोई प्रयास किया गया . कहीं कल ऐसा न हो कि जनता अपनी अदालत में खुद ही न्याय की कुर्सी पर बैठ इस तरह न्याय करने लगे . ऐसा वक्त आने से पहले जरूरी है सोई हुई सरकार जागे और उचित व निर्णायक कदम उठाये ताकि एक स्वस्थ सन्देश तो जनता में जाए ही साथ में उन रेपिस्टों को भी डर हो कि यदि ऐसा कुछ किया तो उनका क्या हश्र होगा . 

अब तो ये हाल देख वैसे मन तो यही होता है कि क़ानून ही ये बन जाए जो ये दुष्कर्म करेगा उसे जनता के हवाले कर दिया जाएगा जो उसकी बोटी बोटी जब नोचेगी तब शायद एक पीडिता के दर्द का अहसास होगा और शायद वो ही न्याय होगा कुछ हद तक ...........

सोमवार, 2 मार्च 2015

नहीं होना हमें अमर अविजित .............

क्या फर्क पड़ता है नाम से
अक्सर कहा गया
और हमने मान लिया

नाम कोई हो
पहचान करा देता है
तुम्हारे धर्म की
और हो जाते हो तुम निष्कासित

अभिव्यक्ति की आज़ादी
महज स्लोगन भर है
नहीं जान पाए तुम
और गँवा बैठे जान

आसान है खोल में दुबके रहना
मुश्किल है हलक में ऊंगली डाल सच को कहना
क्या नाम अविजित होने से संभव था तुम्हारा अविजित रहना
शायद इसी सच से तुम अनजान रहे

सुनो
तुमसे जाने कितने आये और चले गए
धर्म की चिता पर जिंदा जलना नियति है
जानते हो क्यों ?
एक नपुंसक समाज में जन्मे थे
जहाँ इंसानियत से ऊपर मजहब हुआ करता है

कह तो सकते हैं
तुम्हारी आहुति निरर्थक नहीं जाएगी
विचार के रूप में जिंदा रहोगे हमेशा
आसान है इस तरह कहकर पल्ला छुड़ाना
या खुद को खैर ख्वाह सिद्ध करना
मगर
मुश्किल है तुम्हारी जलाई मशाल को पकड़ क्रांति का बीज बोना

अभी एक डरे सहमे समाज का हिस्सा हूँ मैं
कठमुल्लाओं की देहरी पर सजदा करने तक ही है अभी मेरी पहुँच
आम इंसान हूँ न
और एक आम इंसान की पहुँच सिर्फ देहरियों तक ही हुआ करती है

उम्मीद का कोई धागा मत बांधना हमसे
हम कागज के बने वो पुतले हैं
जो पहली बारिश में ही गल जाते हैं

सबकी अपनी अपनी लडाइयां हैं
तुम अपनी लड़ाई लड़ चुके
और हम चाहते हैं बिना लडे ही अविजित रहना

अभिव्यक्ति की आज़ादी का अंतिम छोर है मौत
और अभी जीना है हमें अपनी नपुंसकता के साथ

जाओ तुम अमर रहो और हमें हमारे हरम में दफ़न रहने दो
नहीं होना हमें अमर अविजित .............

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाय


अब तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाय ........२७ साल का सफ़र में :)



प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ……
****************************

1.
जो वस्तु में , दृष्टि में , सृष्टि में उल्लास भर दे , 
खिलखिलाहट से सराबोर कर दे ……
जहाँ निगाह डालो उसी का रूप दमके , 
उसी के ख्याल धमके , उसी की पायल छनके 
फिर ना कोई दूजा रूप निगाह में अटके  
यही तो प्रेम का चिरजीवी स्वरूप है 
जो नित नवीन रूप धारण कर 
नवयौवना सा खिलखिलाता रहता है 
जितनी प्रेम की सीढी चढो उतना ही 
उसके यौवन पर निखार आता जाता है ………
प्रेम कभी प्रौढ नही होता ……जानाँ !!! 

2.
और तुम मेरी आँख में ठहरा वो बादल हो 
जो बरसे तो मैं भीगूँ , जो रुके तो मैं थमूँ ,
जो लहलहाये तो मैं थरथराऊँ , 
जो मेरी रूह को चूमे तो मैं पिघल जाऊँ , 
रसधारा सी बह जाऊँ , 
नूर की बूँद बन जाऊँ और तेरी पलकों में ही समा जाऊँ 
फिर ना अधरामृत के पान की लालसा रहे , 
फिर ना मिलन बिछोह के पेंच रहें , 
फिर ना दिन रात का होश रहे 
सूक्ष्म तरंग सी मैं बह जाऊँ
तुझमें समा नवजीवन पाऊँ 
फिर नवयौवना सी खिल खिल जाऊँ 
क्योंकि प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

3.
और मेरे प्रेम की धुरी भी तुम हो , 
तुम्हारे आँखों की वो गहराई है 
जो भेद जाती है मुझे अन्दर तक 
खोल देती है सारे परदे खिडकियों के 
आने देती है एक महकती प्राणवायु को अन्दर 
और कर देती है समावेश मुझमें 
साँसों की सरसता का , महकता का , मादकता का 
और मैं खुले आकाश पर विचरती एक उन्मुक्त पंछी सी 
तुम्हारे प्रेम के बाहुपाश में बँधी जब भरती हूँ उडान
हवायें झुक कर करती हैं सलाम 
मेरे पंखों को परवाज़ देती हैं , 
मेरी उडान मे सहायक होती हैं 
और मैं बन जाती हूँ तुम्हारे प्रेम का जीता जागता जीवन्त प्रमाण 
जो हमेशा तरुणी सा इठलाता है 
क्योंकि प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

4.
ये तो सिर्फ़ तरंगों पर बहते हमारे प्रेम के स्फ़ुरण हैं जानाँ 
गर कहीं तुमने कभी छू लिया मुझको और जड दिया एक चुम्बन 
मेरे कपोलों पर , ग्रीवा पर , नासिका पर , नेत्रों पर या अधरों पर
 मैं ना मैं रह पाऊँगी 
फिर चाहे केश कितने ही पके हों , 
झुर्रियों से हाथों का श्रृंगार क्यों ना हुआ हो , 
कदमों में चाहे कितने ही दर्द के फ़फ़ोले पडे हों 
मन मयूर नृत्य करने को बाध्य कर देगा 
और फिर हो जायेगा नव सृष्टि का निर्माण 
तुम्हारे प्रेम की ताल पर मेरे पाँव की थिरकन के साथ 
उद्दात्त तरंगों पर फिर होगा एक नवयौवना शोडष वर्षीय तरुणी का आगमन 
क्योंकि प्रेम के पंखों पर कभी किसी भी वक्त की परछाइयाँ नहीं पडा करतीं , 
किसी भी मौसम का प्रभाव नहीं पडता तभी कभी झुर्रियाँ नहीं पडतीं , 
चिरयौवन होता है प्रेम का ……
फिर उम्र चाहे कोई भी क्यों ना हो , 
लम्हे चाहे कितने दुरूह क्यों ना हों 
प्रेम का होना ही प्रेम को तरुण बनाये रखता है 
शायद इसीलिये प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

5.
और मेरे प्रेम हो तुम, जो आज तक बदली के उस तरफ़ हो 
और मैं उम्र के हर मोड पर सिर्फ़ तुम्हें ही ढूँढ रही हूँ ………
विश्वास है मिलोगे तुम मुझे किसी ना किसी मोड पर 
इसलिये मेरा प्रेम आज तक जीवन्त है , 
अपनी मोहकता के साथ तरुण है और हमेशा रहेगा 
क्योंकि जान चुकी हूँ ये गहन रहस्य ……………प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

मेरे कविता संग्रह 'बदलती सोच के नए अर्थ ' से ये कविता 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा


आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख 

१४ तारीख से पुस्तक मेला प्रारंभ हो रहा है . 

सभी जानते हैं नया क्या है . आपने कौन सी अनोखी सूचना दे दी जनाब . 

नहीं जी हमने कोई अनोखी सूचना नहीं दी लेकिन मैं तो सोच में पड़ गया हूँ ?

किस सोच में ? अब पुस्तक मेला हो और सोच भी हो कमाल है आपका ?

अरे भाई सोचना तो पड़ेगा ही न .......

मगर पता तो चले किस बारे में ?

जनाब देखो हम हैं फेसबुकिया मित्र (और लेखक और कवि) जैसा कि आजकल मित्र लोग कहने लगे हैं अब हैं या नहीं इसका हमें नहीं मालूम .........हाँ तो बात ये है जब भी पुस्तक मेला आता है हमारी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे होने लगती है .

अरे भाई क्यों ? कौन सा पुस्तक मेला आपको पहाड़ की चढवाई करवा देता है जो सांस ऊपर नीचे होने लगती है ?

भैये देखो ये फेसबुक है तो यहाँ मित्रों की संख्या तो पूछो ही मत और ऐसे में सभी या तो कवि मिलेंगे या लेखक माने हो न 

बिलकुल 

तो सोचो जरा सब इसी दिन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं कब पुस्तक मेला आये और हम सबकी पुस्तकें आयें मगर मगर मगर ............ यहीं आकर हम जैसे लोगों की मुश्किल शुरू होती है 
अरे तुम द्रौपदी के चीर सी बात को खींचे मत चले जाओ बस ये बताओ तुम्हारी आखिर मुश्किल है क्या ?

अरे बाबा ..........बहुत बड़ी मुश्किल है .........जब सभी मित्रों की किताबें छप कर आती हैं तो वो हमें लोकार्पण में बुलाते हैं और हम जाते भी हैं अब सोचो ऐसे में यदि हम खाली सूखी शुभकामनाएं दे आयें तो वो भी तो ठीक नहीं न .............और अगर गीली शुभकामनाएं दें तो जेब ढीली होती है क्योंकि वैसे भी यहाँ थोक के भाव पुस्तकें छपती हैं और थोक के भाव लोकार्पण होते हैं सोचो जरा ऐसे में हम किस हद तक जेब ढीली करते रहे ........अमां यार हर इंसान का एक बजट होता है और यहाँ लोकार्पण तो बे - बजट होता है .

तो क्या मुश्किल है जितना जेब कहे उतना खर्च करो किसने कहा है ज्यादा करो .

जनाब यहीं आकर तो मुश्किल शुरू होती है .......सभी अपने अभिन्न मित्र होते हैं और यदि गलती से उनकी पुस्तक न लो तो खफा हो जाते हैं या बाद में पूछेंगे आपने मेरी पुस्तक पढ़ी ? कैसी लगी ? आपने तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया ही नहीं दी ? हम तो सोचते थे आप हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं इसलिए आप तो एक ऐसी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया देंगे जो हमें रातों रात स्थापितों की श्रेणी में खड़ा कर देंगे ? आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी ..........सोचो जरा कितना घड़ों पानी हमारे ऊपर डल जाता होगा उस वक्त ? हम तो अभी से भरी सर्दी में पसीने पसीने हुए जा रहे हैं , दिल की धडकनें देखिये शताब्दी को मात कर रही हैं .अब हम कोई धन्ना सेठ की औलाद तो हैं नहीं जो बाप दादे अकूत संपत्ति छोड़ गए हों और हम बेफिक्री से खर्च कर सकें ..........दूसरी बात भैये , दिल्ली जैसे शहर में रहते हैं तो खर्च ही नहीं जीने देते ऐसे में खुद के शौक पूरे करने को हजार बार सोचना पड़ता है उस पर साहित्य के साथ जिसके फेरे पड़ गए हों सोचो वो कहाँ जाए और कैसे अपनी सांसें दुरुस्त करे जब घर का खर्च मुश्किल से निकलता हो वहां पूरे साल एक एक पैसा बचाकर रखा है कि पुस्तक मेले में पुस्तकें खरीदेंगे मगर ये नहीं पता था यहाँ तो जेब पर ही डाका पड़ेगा ............किसे छोडें और किसे पकडें वाली स्थिति में फंस गए हैं हम तो .

अरे इतने क्यों हलकान हो रहे हो ........कोई बीच का उपाय सोचो ?

क्या सोचें कुछ समझ नहीं आ रहा ........एक एक लेखक और कवि की ४-५ से कम तो पुस्तकें नहीं आ रहीं ऐसे में हम क्या करें 

अरे बीच का मार्ग ............

कौन सा ?

अरे कुछ को कहो न कि तुम्हें भेंट कर दें और कुछ खरीद लेना और एक दो दिन जाना ही मत कह देना जरूरी काम से बाहर जाना पड़ गया और इस तरह तुम्हारा बजट भी नहीं बिगड़ेगा और दोस्ती भी बनी रहेगी :)

अरे मियाँ लगता है तुम तो बिलकुल ही अनजान हो आजकल के ट्रेंड से ?

क्यों ऐसा कौन सा ट्रेंड चल रहा है आजकल ?

अजी ये जो लेखक कवि बिरादरी है न इसने एक और नया शगूफा बाज़ार में छोड़ा हुआ है ......पुस्तक खरीद कर पढो गिफ्ट में मत दो 

ओह ....ऐसा क्या ? फिर तो भैये तुम सच में मुश्किल में आ गए हो अब तो बस आखिरी उपाय एक ही बचता है .

हाँ हाँ बताओ न जल्दी से मेरी तो जान ही निकली जा रही है 

तुम बस ये करो अभी से स्टेटस लगाने शुरू कर दो .............जो मित्र अपनी पुस्तकों की समीक्षा करवाना चाहते हैं नीचे दिए पते पर पुस्तकें प्रेषित करें .

वो मारा .........ये हुई न बात ............हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ......हाहाहा