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मंगलवार, 31 मार्च 2015

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

एक मुद्दत हुई 
न अपना कोई धर्म बना पायी 
न ही अपनी कोई जाति 
जबकि पायी जाती है ये 
हर धर्म और जाति में 
क्योंकि संभव नहीं इसके बिना 
सृष्टि की संरचना 

जिसने जो धर्म बताया अपना लिया 
जिसने जो जाति बताई अपना ली 
जिसने जो घर बताया उम्र बिता दी 


उसका धर्म क्या है 
उसकी जाति क्या है 
ओ समाज के ठेकेदारों 
आओ उगलो उगलदानों में 
पीक अपने तालिबानी फतवों की 

क्योंकि एक मुद्दत से 
निष्कासित है वो 
घर , धर्म और जाति से 

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

बुधवार, 25 मार्च 2015

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


आज मैंने रखा है ब्रह्मभोज
ब्राह्मणों के लिए नहीं 
कहाँ आज वैसे ब्राह्मण बचे 
जिनके शाप से शापित हो जाएँ पूरी नस्लें ही 

ये भोज है तुम्हारे लिए 
सिर्फ तुम्हारे लिए ..... आखिरी बार
भोज की सामग्री में है 
इंतज़ार के पीले फूल , गुलाबों की सूखी पत्तियाँ
और मेरी कभी न टूटने वाली आस की महक 

शायद अब टूट जाए हर रस्मी दीवार 
और तुम पुकार लो एक बार 
हो जाए मेरी आखिरी आरजू का तर्पण 
और हो जाए मेरी युगों से प्यासी प्यास का अंत 


आज आखिरी दिन है 
और आखिरी लम्हा 
करो विदा मुझे 

सुनो 
चाहो या न चाहो 
मरने पर तो सभी विदा किया करते हैं 
और मुझे होना है जीते जी विदा 
तुमसे , तुम्हारी याद से , तुम्हारे नाम से 


क्या देखा है कभी मेरी तरह 
मौत का आखिरी जश्न मनाते किसी को

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


सोमवार, 16 मार्च 2015

' आइये स्टिंग करें '

' आइये स्टिंग करें ' शनिवार के 'हमारा मेट्रो' में प्रकाशित आलेख






आइये स्टिंग करें भाई कोई काम धंधा नहीं है आजकल , बेरोजगार हूँ समझ नहीं आता क्या करूँ ? तो है न सबसे आसान काम जिसमे तुम्हारा कुछ नहीं जाता बस क्रेडिट तुम्हें मिल जाता है जीवन मज़े से गुजरने लगता है वो क्या बताइए जरा भाईजान यहाँ तो हालत पतली हो गयी है , जेब खाली है और बीवी ने भी घर में घुसने से मना कर दिया है जब तक जेब भर नहीं जाती तो भैये काहे चिंता करते हो , हम किस मर्ज़ की दवा हैं .हम तो वक्त देखकर चाल बदल लिया करते हैं , अब देखो मौसम स्टिंग का देखो कितना सुहाना है , तो आइये स्टिंग करें , लोग अपनों के ही स्टिंग कर रहे हैं और देखो तो कैसे छा रहे हैं टीवी चैनलों पर , अख़बारों में . सिर्फ जरूरत है एक बार स्टिंग करने की वो भी किसी नेता , अभिनेता की बस , तुम्हें प्यारे छाने से कोई नहीं रोक सकता . देखो टीवी वालों को तो अपनी टी आर पी बढाने को मसाला चाहिए फिर वो झूठा है या सच्चा उन्हें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि देखने वाला तो सिर्फ वो ही चैनल देखता है जहाँ ऐसी मसालेदार खबर आती है . हर किसी को अपने से ज्यादा दुसरे की ज़िन्दगी में झाँकने की आदत होती है तो ये स्टिंग ऐसे मनोरोगियों के लिए दवा का काम करते हैं , घर बैठे उनका इलाज हो जाता है तो इसमें किसी के बाप का क्या जाता है फिर साथ में मनोरंजन का मनोरंजन . और सबसे बड़ी बात यदि इसमें कोई अपने आस पास का जानकार फंस जाता है तो फिर तो पूछो ही मत बन्दे की बल्ले बल्ले हो जाती है , हर तरफ खुद की इमानदारी के ढोल पीटते हुए उसकी बेईमानी के ऐसे परखच्चे उड़ाता है कि बेचारा स्वप्न में भी सिर्फ तुम्हें ही देखता है , देखो कहता था न साला रिश्वत लेता है , बिना रिश्वत लिए तो अपने बाप की तरफ भी नहीं थूकता तो और लोग तो क्या चीज हैं , कल तक सबको गाजर मूली की तरह काटता था न अब काटेगा साला जेल में गाजर मूली तब भाव समझ आएगा . देखो बाबू इसके लिए कोई ज्यादा मेहनत नहीं करनी सिर्फ एक ऐसी तकनीक से लैस चीज ले लो जिसके बिना तुम्हारा गुजारा भी न हो और कोई तुम्हें उसे बाहर ही छोड़कर आने को न कहे बस फिर देखो जिसे जब चाहे स्टिंग कर सकते हो और अपने काम निकलवा सकते हो फिर वो घर का हो बाहर का , पडोसी हो या रिश्तेदार .......यूं समझो प्यारे ये तो अंधे के हाथों बटेर लग गई .........तुम चाहो तो इससे सत्ता पलट सकते हो फिर तुम्हारे जीवन की छोटी मोटी समस्याएं तो हैं क्या चीज बस इतना ध्यान रखना अपने बच्चों को मत सिखाना वर्ना कहीं ऐसा न हो तुम कामवाली बाई को देख रहे हों या पड़ोसन से नैन मटक्का कर रहे हों या सेक्रेटरी के साथ डेट पर हों और तुम ही हो जाओ स्टिंग के शिकार ........फिर मत कहना स्टिंग है बेकार , ये तो झूठी स्टिंग है , ये तो फेक है , इसमें मैं नहीं मेरे जैसा दिखने वाला कोई और है क्योंकि प्यारे जिसे एक बार स्टिंग का चस्का लग जाता है तो बहुत सी बार शिकारी भी शिकार हो जाता है इसलिए अपने बचाव के सारे उपाय करने के बाद स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना वर्ना अभिमन्यु का चक्रव्यूह में फंसकर मरना निश्चित है इस सबक को हमेशा याद रखना और जय हो स्टिंग देवता कह स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना . अब जाओ प्यारे ....सामने से हमारी महबूबा तशरीफ ला रही हैं तुम्हें देख बेवजह हिचक जायेंगी और आगे निकल जायेंगी और हमारा तो दिन ही पनौती की भेंट चढ़ जाएगा वैसे ही सुबह सुबह पनौती की शक्ल ही तो देखकर आया हूँ शायद अब थोडा सुकून मिले आहा क्या जोरदार उपाय बताया है .......जय हो स्टिंग देवता बचकर रहना मियां क्योंकि सोचता हूँ तुम से ही कारोबार शुरू करता हूँ क्योंकि जेब खाली है और शाम को बीवी के लिए डोमिनोज से पिज़्ज़ा खिलाने की फरमाइश भी पूरी करनी है .........क्या ख्याल है ?

गुरुवार, 12 मार्च 2015

ख़ामोशी चुप्पी मौन

ख़ामोशी चुप्पी मौन 
इनका तुमने एक ही अर्थ लगाया 
मगर कभी नहीं आँक पाए वास्तविक अर्थ 
खामोशियों के पीछे जाने कितने तूफ़ान छुपे होते हैं 
चुप्पी के पीछे जाने कितने चक्रवात चला करते हैं 
मौन की आँधियों में भी शोर हुआ करते हैं 

सावधान रहना , मत छेड़ना कभी 
किसी के मौन को 
किसी की ख़ामोशी को 
किसी को चुप्पी को 

क्योंकि 
फिर कुछ नहीं बचेगा बचाने को 

महज वहम है तुम्हारा ख़ामोशी चुप्पी और मौन पर्याय हैं विकल्पहीनता के 

रविवार, 8 मार्च 2015

फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

कितना अच्छा लगता है न 
जब एक दिन में ज़िन्दगी सिमट जाती है 
तुम्हें मुक्ति की लोलीपॉप हाथ में पकड़ाई जाती है 
और तुम एक बार फिर 
अदृश्य चक्रव्यूह की शिकार हो 
रख देती हो खुद को गिरवीं 

आह ! स्त्री मुक्ति , स्त्री विमर्श , महिला दिवस 
सिर्फ एक दिन मुक़र्रर किया गया है तुम्हें साँस लेने को 
क्या संतुष्ट हो एक दिन से ओ स्त्री ?

शायद तभी तो खुश हो दे देती हो 
'महिला दिवस की शुभकामनाएं '
बिना जाने महिला दिवस के अर्थहीन औचित्य को 
क्योंकि 
तुम हो तो जीवन है 
जीवन का अर्थ है 
ये संसार है 
इसका आधार है 
बस इतना सा ही तो समझना है तुम्हें 
फिर हर दिन तुम्हारा है 
फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

शनिवार, 7 मार्च 2015

जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया


जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया ........बता दिया देर से मिला न्याय भी अन्याय ही होता है जिसका उदाहरण रहा बीबीसी द्वारा दिखाया विडियो तो जब जनता देखेगी कि यहाँ कोई सुनवाई नहीं है , न्याय की आस में आस भी टूट जाती है मगर न्याय नहीं मिलता तो जनता को ही पहल करनी पड़ती है . बेशक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का नाटक किया जाए मगर न्याय तो अब तक नहीं मिला और जनता के सब्र का बाँध टूट गया जिसने बता दिया यदि सरकार आँख मूंदेंगी और न्याय के नाम पर जनता की भावनाओं से खिलवाड़ होगा तो जनता खुद न्याय कर देगी . सिर्फ कैंडल मार्च निकाल देने भर तक नहीं है कर्तव्य शायद जनता अब जान चुकी है .

इस वाकये से ये तो सिद्ध हो गया कि अब जनता के सब्र का बाँध टूटने लगा है और सरकार को चेत जाना चाहिए और क़ानून में भी बदलाव करना चाहिए नहीं तो ऐसी घटनाएं हर गली चौराहों पर होती दिखेंगी क्योंकि जिस तरह से रेप की घटनाएं बढ़ी हैं उस अनुपात में कोई सख्त कार्यवाही अब तक नहीं की गयी जिससे उनमे कोई डर हो न ही जाग्रति के लिए कोई प्रयास किया गया . कहीं कल ऐसा न हो कि जनता अपनी अदालत में खुद ही न्याय की कुर्सी पर बैठ इस तरह न्याय करने लगे . ऐसा वक्त आने से पहले जरूरी है सोई हुई सरकार जागे और उचित व निर्णायक कदम उठाये ताकि एक स्वस्थ सन्देश तो जनता में जाए ही साथ में उन रेपिस्टों को भी डर हो कि यदि ऐसा कुछ किया तो उनका क्या हश्र होगा . 

अब तो ये हाल देख वैसे मन तो यही होता है कि क़ानून ही ये बन जाए जो ये दुष्कर्म करेगा उसे जनता के हवाले कर दिया जाएगा जो उसकी बोटी बोटी जब नोचेगी तब शायद एक पीडिता के दर्द का अहसास होगा और शायद वो ही न्याय होगा कुछ हद तक ...........

सोमवार, 2 मार्च 2015

नहीं होना हमें अमर अविजित .............

क्या फर्क पड़ता है नाम से
अक्सर कहा गया
और हमने मान लिया

नाम कोई हो
पहचान करा देता है
तुम्हारे धर्म की
और हो जाते हो तुम निष्कासित

अभिव्यक्ति की आज़ादी
महज स्लोगन भर है
नहीं जान पाए तुम
और गँवा बैठे जान

आसान है खोल में दुबके रहना
मुश्किल है हलक में ऊंगली डाल सच को कहना
क्या नाम अविजित होने से संभव था तुम्हारा अविजित रहना
शायद इसी सच से तुम अनजान रहे

सुनो
तुमसे जाने कितने आये और चले गए
धर्म की चिता पर जिंदा जलना नियति है
जानते हो क्यों ?
एक नपुंसक समाज में जन्मे थे
जहाँ इंसानियत से ऊपर मजहब हुआ करता है

कह तो सकते हैं
तुम्हारी आहुति निरर्थक नहीं जाएगी
विचार के रूप में जिंदा रहोगे हमेशा
आसान है इस तरह कहकर पल्ला छुड़ाना
या खुद को खैर ख्वाह सिद्ध करना
मगर
मुश्किल है तुम्हारी जलाई मशाल को पकड़ क्रांति का बीज बोना

अभी एक डरे सहमे समाज का हिस्सा हूँ मैं
कठमुल्लाओं की देहरी पर सजदा करने तक ही है अभी मेरी पहुँच
आम इंसान हूँ न
और एक आम इंसान की पहुँच सिर्फ देहरियों तक ही हुआ करती है

उम्मीद का कोई धागा मत बांधना हमसे
हम कागज के बने वो पुतले हैं
जो पहली बारिश में ही गल जाते हैं

सबकी अपनी अपनी लडाइयां हैं
तुम अपनी लड़ाई लड़ चुके
और हम चाहते हैं बिना लडे ही अविजित रहना

अभिव्यक्ति की आज़ादी का अंतिम छोर है मौत
और अभी जीना है हमें अपनी नपुंसकता के साथ

जाओ तुम अमर रहो और हमें हमारे हरम में दफ़न रहने दो
नहीं होना हमें अमर अविजित .............

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाय


अब तुम्हें और क्या दूँ मैं दिल के सिवाय ........२७ साल का सफ़र में :)



प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ……
****************************

1.
जो वस्तु में , दृष्टि में , सृष्टि में उल्लास भर दे , 
खिलखिलाहट से सराबोर कर दे ……
जहाँ निगाह डालो उसी का रूप दमके , 
उसी के ख्याल धमके , उसी की पायल छनके 
फिर ना कोई दूजा रूप निगाह में अटके  
यही तो प्रेम का चिरजीवी स्वरूप है 
जो नित नवीन रूप धारण कर 
नवयौवना सा खिलखिलाता रहता है 
जितनी प्रेम की सीढी चढो उतना ही 
उसके यौवन पर निखार आता जाता है ………
प्रेम कभी प्रौढ नही होता ……जानाँ !!! 

2.
और तुम मेरी आँख में ठहरा वो बादल हो 
जो बरसे तो मैं भीगूँ , जो रुके तो मैं थमूँ ,
जो लहलहाये तो मैं थरथराऊँ , 
जो मेरी रूह को चूमे तो मैं पिघल जाऊँ , 
रसधारा सी बह जाऊँ , 
नूर की बूँद बन जाऊँ और तेरी पलकों में ही समा जाऊँ 
फिर ना अधरामृत के पान की लालसा रहे , 
फिर ना मिलन बिछोह के पेंच रहें , 
फिर ना दिन रात का होश रहे 
सूक्ष्म तरंग सी मैं बह जाऊँ
तुझमें समा नवजीवन पाऊँ 
फिर नवयौवना सी खिल खिल जाऊँ 
क्योंकि प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

3.
और मेरे प्रेम की धुरी भी तुम हो , 
तुम्हारे आँखों की वो गहराई है 
जो भेद जाती है मुझे अन्दर तक 
खोल देती है सारे परदे खिडकियों के 
आने देती है एक महकती प्राणवायु को अन्दर 
और कर देती है समावेश मुझमें 
साँसों की सरसता का , महकता का , मादकता का 
और मैं खुले आकाश पर विचरती एक उन्मुक्त पंछी सी 
तुम्हारे प्रेम के बाहुपाश में बँधी जब भरती हूँ उडान
हवायें झुक कर करती हैं सलाम 
मेरे पंखों को परवाज़ देती हैं , 
मेरी उडान मे सहायक होती हैं 
और मैं बन जाती हूँ तुम्हारे प्रेम का जीता जागता जीवन्त प्रमाण 
जो हमेशा तरुणी सा इठलाता है 
क्योंकि प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

4.
ये तो सिर्फ़ तरंगों पर बहते हमारे प्रेम के स्फ़ुरण हैं जानाँ 
गर कहीं तुमने कभी छू लिया मुझको और जड दिया एक चुम्बन 
मेरे कपोलों पर , ग्रीवा पर , नासिका पर , नेत्रों पर या अधरों पर
 मैं ना मैं रह पाऊँगी 
फिर चाहे केश कितने ही पके हों , 
झुर्रियों से हाथों का श्रृंगार क्यों ना हुआ हो , 
कदमों में चाहे कितने ही दर्द के फ़फ़ोले पडे हों 
मन मयूर नृत्य करने को बाध्य कर देगा 
और फिर हो जायेगा नव सृष्टि का निर्माण 
तुम्हारे प्रेम की ताल पर मेरे पाँव की थिरकन के साथ 
उद्दात्त तरंगों पर फिर होगा एक नवयौवना शोडष वर्षीय तरुणी का आगमन 
क्योंकि प्रेम के पंखों पर कभी किसी भी वक्त की परछाइयाँ नहीं पडा करतीं , 
किसी भी मौसम का प्रभाव नहीं पडता तभी कभी झुर्रियाँ नहीं पडतीं , 
चिरयौवन होता है प्रेम का ……
फिर उम्र चाहे कोई भी क्यों ना हो , 
लम्हे चाहे कितने दुरूह क्यों ना हों 
प्रेम का होना ही प्रेम को तरुण बनाये रखता है 
शायद इसीलिये प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

5.
और मेरे प्रेम हो तुम, जो आज तक बदली के उस तरफ़ हो 
और मैं उम्र के हर मोड पर सिर्फ़ तुम्हें ही ढूँढ रही हूँ ………
विश्वास है मिलोगे तुम मुझे किसी ना किसी मोड पर 
इसलिये मेरा प्रेम आज तक जीवन्त है , 
अपनी मोहकता के साथ तरुण है और हमेशा रहेगा 
क्योंकि जान चुकी हूँ ये गहन रहस्य ……………प्रेम कभी प्रौढ नहीं होता ………जानाँ !!! 

मेरे कविता संग्रह 'बदलती सोच के नए अर्थ ' से ये कविता 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा


आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख 

१४ तारीख से पुस्तक मेला प्रारंभ हो रहा है . 

सभी जानते हैं नया क्या है . आपने कौन सी अनोखी सूचना दे दी जनाब . 

नहीं जी हमने कोई अनोखी सूचना नहीं दी लेकिन मैं तो सोच में पड़ गया हूँ ?

किस सोच में ? अब पुस्तक मेला हो और सोच भी हो कमाल है आपका ?

अरे भाई सोचना तो पड़ेगा ही न .......

मगर पता तो चले किस बारे में ?

जनाब देखो हम हैं फेसबुकिया मित्र (और लेखक और कवि) जैसा कि आजकल मित्र लोग कहने लगे हैं अब हैं या नहीं इसका हमें नहीं मालूम .........हाँ तो बात ये है जब भी पुस्तक मेला आता है हमारी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे होने लगती है .

अरे भाई क्यों ? कौन सा पुस्तक मेला आपको पहाड़ की चढवाई करवा देता है जो सांस ऊपर नीचे होने लगती है ?

भैये देखो ये फेसबुक है तो यहाँ मित्रों की संख्या तो पूछो ही मत और ऐसे में सभी या तो कवि मिलेंगे या लेखक माने हो न 

बिलकुल 

तो सोचो जरा सब इसी दिन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं कब पुस्तक मेला आये और हम सबकी पुस्तकें आयें मगर मगर मगर ............ यहीं आकर हम जैसे लोगों की मुश्किल शुरू होती है 
अरे तुम द्रौपदी के चीर सी बात को खींचे मत चले जाओ बस ये बताओ तुम्हारी आखिर मुश्किल है क्या ?

अरे बाबा ..........बहुत बड़ी मुश्किल है .........जब सभी मित्रों की किताबें छप कर आती हैं तो वो हमें लोकार्पण में बुलाते हैं और हम जाते भी हैं अब सोचो ऐसे में यदि हम खाली सूखी शुभकामनाएं दे आयें तो वो भी तो ठीक नहीं न .............और अगर गीली शुभकामनाएं दें तो जेब ढीली होती है क्योंकि वैसे भी यहाँ थोक के भाव पुस्तकें छपती हैं और थोक के भाव लोकार्पण होते हैं सोचो जरा ऐसे में हम किस हद तक जेब ढीली करते रहे ........अमां यार हर इंसान का एक बजट होता है और यहाँ लोकार्पण तो बे - बजट होता है .

तो क्या मुश्किल है जितना जेब कहे उतना खर्च करो किसने कहा है ज्यादा करो .

जनाब यहीं आकर तो मुश्किल शुरू होती है .......सभी अपने अभिन्न मित्र होते हैं और यदि गलती से उनकी पुस्तक न लो तो खफा हो जाते हैं या बाद में पूछेंगे आपने मेरी पुस्तक पढ़ी ? कैसी लगी ? आपने तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया ही नहीं दी ? हम तो सोचते थे आप हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं इसलिए आप तो एक ऐसी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया देंगे जो हमें रातों रात स्थापितों की श्रेणी में खड़ा कर देंगे ? आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी ..........सोचो जरा कितना घड़ों पानी हमारे ऊपर डल जाता होगा उस वक्त ? हम तो अभी से भरी सर्दी में पसीने पसीने हुए जा रहे हैं , दिल की धडकनें देखिये शताब्दी को मात कर रही हैं .अब हम कोई धन्ना सेठ की औलाद तो हैं नहीं जो बाप दादे अकूत संपत्ति छोड़ गए हों और हम बेफिक्री से खर्च कर सकें ..........दूसरी बात भैये , दिल्ली जैसे शहर में रहते हैं तो खर्च ही नहीं जीने देते ऐसे में खुद के शौक पूरे करने को हजार बार सोचना पड़ता है उस पर साहित्य के साथ जिसके फेरे पड़ गए हों सोचो वो कहाँ जाए और कैसे अपनी सांसें दुरुस्त करे जब घर का खर्च मुश्किल से निकलता हो वहां पूरे साल एक एक पैसा बचाकर रखा है कि पुस्तक मेले में पुस्तकें खरीदेंगे मगर ये नहीं पता था यहाँ तो जेब पर ही डाका पड़ेगा ............किसे छोडें और किसे पकडें वाली स्थिति में फंस गए हैं हम तो .

अरे इतने क्यों हलकान हो रहे हो ........कोई बीच का उपाय सोचो ?

क्या सोचें कुछ समझ नहीं आ रहा ........एक एक लेखक और कवि की ४-५ से कम तो पुस्तकें नहीं आ रहीं ऐसे में हम क्या करें 

अरे बीच का मार्ग ............

कौन सा ?

अरे कुछ को कहो न कि तुम्हें भेंट कर दें और कुछ खरीद लेना और एक दो दिन जाना ही मत कह देना जरूरी काम से बाहर जाना पड़ गया और इस तरह तुम्हारा बजट भी नहीं बिगड़ेगा और दोस्ती भी बनी रहेगी :)

अरे मियाँ लगता है तुम तो बिलकुल ही अनजान हो आजकल के ट्रेंड से ?

क्यों ऐसा कौन सा ट्रेंड चल रहा है आजकल ?

अजी ये जो लेखक कवि बिरादरी है न इसने एक और नया शगूफा बाज़ार में छोड़ा हुआ है ......पुस्तक खरीद कर पढो गिफ्ट में मत दो 

ओह ....ऐसा क्या ? फिर तो भैये तुम सच में मुश्किल में आ गए हो अब तो बस आखिरी उपाय एक ही बचता है .

हाँ हाँ बताओ न जल्दी से मेरी तो जान ही निकली जा रही है 

तुम बस ये करो अभी से स्टेटस लगाने शुरू कर दो .............जो मित्र अपनी पुस्तकों की समीक्षा करवाना चाहते हैं नीचे दिए पते पर पुस्तकें प्रेषित करें .

वो मारा .........ये हुई न बात ............हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ......हाहाहा 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

सिन्धी में अनुवाद

पिछले साल २० फरवरी को मेरे कविता संग्रह ' बदलती सोच के नए अर्थ ' 
का पुस्तक मेले में विमोचन हुआ था और आज एक साल बाद मेरे संग्रह

की कविता का पहली बार अनुवाद हुआ .


आंतरिक ख़ुशी मिली  क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ है. जब आज जैसे ही 

मेल खोली तो देवी नागरानी जी की मेल मिली जिसमे उन्होंने 

मेरी कविता का सिन्धी में अनुवाद किया है 


जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं ..........




http://ajmernama.com/guest-writer/134057/

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

जय जय लोकतंत्र की

आइये जनाब आइये 
एक नया खेल देखिये 
राजनीति की उठापटक में 
कल तक जो भगोडे कहे जाते थे 
आज उन्हीं का स्वागत देखिए 
जनता जाग गयी है
उनको धूल चटा गयी है
जो सब्जबाग दिखा रहे थे
आँख में धूल डाल रहे थे
कोरे आश्वासनों के घोडों पर सवार हो
नहीं जीती जातीं हैं जंग
कर्मण्येवाधिकारस्ते ही जंग जीता करते हैं
जनता ने बतला दिया है
कीचड कितनी उछाली जाये
चाँद पर न दाग लगता है
आस्माँ पर थूका खुद पर ही गिरता है
इस बार जनता ने बतला दिया
अहंकारियों को धूल चटा दिया
ये लोक के तंत्र की शक्ति है
न किसी दल की भक्ति है
कछुआ एक बार फिर जीत गया
खरगोश अपने अहंकार में हार गया
इकतरफ़ा जीत बताती है
जनता जागरुक हो गयी है
बहलाव फ़ुसलाव में नहीं आती है
लोकतंत्र के चौथे खंभे के बदलते रंग देखिये
जो कल तक जिन्हें न किसी गिनती में गिनते थे
आज पीछे पीछे दौडे जाते हैं
आम आदमी की शक्ति को पहचान गये हैं
तो बोलो भक्तों जय जय लोकतंत्र की

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

श्वेत से श्याम की ओर .......

तुम और तुम्हारी खोज
तुम और तुम्हारी प्यास
तुम और तुम्हारी आस
जानती हूँ वो भी
जो न कहा कभी

वो जो जिंदा है आज भी
वो जो सुलग रही है आज भी
वो जिसने मढ़ी हैं
नज्मों में दर्द की सलवटें
गुनगुनाना चाहती है प्रेम गीत
जो एक अल्हड लड़की को कर दे बेनकाब

हाँ ....... उमगती है एक अल्हड नदी आज भी तुममे

बस प्रवाह मोड़ दिया है अब
श्वेत से श्याम की ओर ...............

शनिवार, 31 जनवरी 2015

आइये चुनाव चुनाव खेलें

आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख



आइये चुनाव चुनाव खेलें . चुनाव का मौसम है . अच्छा किसे चुनना है ?
कोई शर्ट है या जीन्स ? सब्जी हैं या फल ? या कोई सिने स्टार  है ? बोलो किसका चुनाव करना है ?या फिर उन्हें जो सब्जबागों की खेती करते हैं और जब फसल पक कर तैयार हो जाती है तो खुद ही सारी काट कर ले जाते हैं और किसान शक्ल ही देखता रह जाता है या फिर उन्हें जो सत्य का झंडा लेकर चलते हैं मगर अकेले खड़े दिखते हैं , जिनके सच को भी झूठ साबित करने के लिए सारे जहाँ के जोड़ तोड़ किए जाते हैं , जिनको सत्ता से दूर रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है ताकि अपनी सत्ता पर आंच न आये और वो अपनी रोटियां सेंकते रहे . अमां यार तुम भी अजीब खडूस हो , किन चक्करों में पड़ गए ........... हम कौन सा तुम्हें असल में चुनने को कह रहे हैं अगर ऐसा सच बोलोगे बाबू सच कहते हैं धर लिए जाओगे किसी न किसी दफा में फिर करना चुनाव का विश्लेषण . यहाँ सच किसे स्वीकार्य होता है , सब चाशनी में डूबे झूठ से ही खुश हुआ करते हैं . 

तो मियां फिर किस चुनाव की बात कर रहे हो हम तो यही समझे कि तुम चुनाव की बात कर रहे हो . तुम भी अजीब अहमक हो , चुनाव तो किसी का भी किया जा सकता है अब देखो बीवी भी तो चुनाव के बाद ही लाते हो घर में जब सबकी वोट उसके पक्ष में पड़ जाती हैं , बाज़ार से तुम कुछ खरीदने जाते हो तो भी चार चीजों में से बेहतर का चुनाव करते हो न तो बस इसी तरह हमने भी सोचा इस बार चुनाव करवा ही डालें .
अरे मियां कौन से चुनाव ?
 बस वो ही चुनाव जिसमे आँख होते हुए अंधे होते हैं हम , जुबां होते हुए गूंगे और कान होते हुए बहरे . 
मतलब ?
बस सिर्फ इतना गाँधी जी के बताये आदर्शों पर चलो 
क्या मतलब 
सीधा तो कह रहा हूँ ..........क्या होगा तुम्हारे चुनाव करने से ? कुछ भी तो नहीं ? मान लो तुमने किसी पर विश्वास कर उसे चुन लिया और वो जीत भी गया तो क्या होगा ? क्या उसे तब काम करने दिया जाएगा ? क्या उसकी राह में रोड़े नहीं अटकाए जायेंगे ? और यदि गलती से वो भी तुम्हारे भले के लिए वो पीछे मुड़ गया तो क्या तुम्हारे पास दिमाग है इतना की सोच और समझ सको कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया . तुम सिर्फ एक भीड़ हो , भीड़ के सिवा कुछ नहीं और भीड़ का कोई धर्म नहीं होता उसका सिर्फ एक ही नारा होता है ........जहाँ सब चलें , जहाँ की हवा चले उधर मुड़ जाओ क्योंकि तुम खुद कुछ नहीं सोच सकते , तुम्हारी सोच पर मीठी मीठी बातों के ताले लगे हैं , तुम एक कुंठित सोच के मालिक हो ........अभी तुम , तुम्हारी सोच नहीं हुई है आज़ाद इसलिए कहता हूँ छोड़ो मियां चुनाव के चक्कर , जहाँ हवा का रुख देखो बह जाना इससे ज्यादा कुछ तुम्हारी हैसियत नहीं और न है तुम्हारी सोच की ऊंगली में वो दम जो दिखा सके अपना दम . 

हवाओं का रुख बदलने के लिए सोच का बदलना जरूरी है और अभी तुम्हें चुनाव का अर्थ तो पता नहीं तो सही और गलत तो तब समझोगे न . जाओ , तुम सिर्फ आटे , दाल, सब्जी आदि ही चुनो क्योंकि जीवन की महती आवश्यकता हैं ये सब बाकी उन चुनावों की राजनीति तुम नहीं समझ सकते इसलिए खेलो सिर्फ चुनाव चुनाव अपने घर तक ही ..........देश और समाज को छोड़ दो उसके हाल पर क्योंकि वो जानते हैं तुमसे किसका , कब और कैसे चुनाव करवाना है ........जय हिन्द !!!

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

इक लड़की गली के मोडपर

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर


इश्क प्यार मोहब्बत लफ़्ज़ों से 
खेलेगी खिलखिलाएगी मुस्कुराएगी 
फिर काँच सी जब बिखर जायेगी 
हर टूटे हिस्से में अपना ही अक्स पाएगी 
बस यूं उसकी हर हसरत कुंवारी ही रह जायेगी 

कहीं टूटेंगे कुछ शाख से गुंचे 
कहीं बिखरेंगे आरजुओं के कंचे 
वो समेट समेट सहेजेगी आँचल में 
वो फिसल फिसल जायेंगे रेत की मानिंद 
इक रात की तफसील नहीं है ये 
उम्र के जोड़ों पर खुदे मिलेंगे किस्से 


बरसातों में भीगे बिना भी 
रूह में भीगे मिलेंगे हिस्से 
ऋतु के बदलने से नहीं बदलते मौसम 
यूं उसे रोज तकलीफ दिया करेंगे किस्से 
एक दिन की खता नहीं थी जो 
उम्र के उस पायदान पर रुके मिलेंगे 
अधूरे प्यार की अधूरी दास्ताँ बन 
उम्र से इश्क किया करेंगे वो हिस्से 

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

चुनावी मौसम की बरसातों में

सुना है एक बार फिर 
चुनाव का मौसम लहलहा रहा है 
निकल पड़े हैं सब दल बल सहित 
अपने अपने हथियारों के साथ 

शब्दबाणों का करके भयंकर वार 
करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी 
भूलकर इस सत्य को 
चुनाव है भाई 
यहाँ साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही 
जीती जा सकती है लड़ाई 

जी हाँ 
न केवल तोड़े जायेंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता 
बल्कि जरूरी है आज के समय में 
मीडिया पर भी शिकंजा 

जिसकी जितनी चादर होगी 
उतने पाँव पसारेगा 
मगर जिसका होगा शासन 
वो ही कमान संभालेगा 
करेगा मनमाने जोड़ तोड़ 
विरोधियों को करने को ख़ारिज 
जरूरी है आज 
अपनी जय जयकार स्वयं करनी 
और सबसे करवानी 

बस यही है सुशासन 
यही है अच्छे दिन की चाशनी 
जिसमे जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है 

फिर क्या फर्क पड़ता है 
बात पांच साल की है 
भूल जाती है जनता 
याद रहता है उसे सिर्फ 
अंतिम समय किया काम 

चुनावी मौसम की बरसातों में भीगने को 
कुछ ख़ास मुखौटों की जरूरत होती है 
जो बदले जा सकें हर घात प्रतिघात पर 
जहाँ बदला जा सके ईमान भी बेईमान भी 
और चल जाए खोटा सिक्का भी टंच सोने के भाव 

बस यही है अंतिम मौका 
करो शब्दों से प्रहार 
करो भीतरघात 
येन केन प्रकारेण जरूरी है आज 
बस चुनाव जीतना..........और कुर्सी हथियाना  

"भरोसा शब्द टूटने के लिए ही बना है ........सभी जानते हैं ........हा हा हा "