Tuesday, July 14, 2009

नदिया की रवानी अभी देखी कहाँ है

तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है
बहते पानी की मदमस्त जवानी
अभी देखी कहाँ है
बलखाती ,मदमाती , अल्हड नदिया की
लहरों से छेड़खानी
अभी देखी कहाँ है
लहरों के गीतों पर
उछलती नदिया की
अंगडाइयां अभी देखी कहाँ हैं
तूफानों के साये में
पलने वाली नदिया की
तूफानों को बहा ले जाने की अदा
अभी देखी कहाँ है
तूने नदिया की रवानी
अभी देखी कहाँ है

Friday, July 10, 2009

कुछ ख्याल

लाश का मेरी
जो चाहे करना यारों
मैं नही पूछने
आने वाला
जिंदा हूँ जब तलक
जी लेने दो
मैं नही यहाँ
अमर होने वाला




वो


एक वो थी
कौन ?
जिसे कभी देखा नही
फिर ?
फिर भी उसे चाहा
क्यूँ ?
पता नही
क्या था उसमें ?
मगर जो था
वो शायद या
सिर्फ़ मेरा था



जिसने चाहा ,शरीर को चाहा
मुझे तो किसी ने चाहा ही नही
जिसने पाया शरीर को पाया
मुझे तो किसी ने पाया ही नही
ये रूप के लोलुप भंवरों को
कभी प्रेम रंग भाया ही नही

Sunday, June 21, 2009

धरती और आकाश का क्षितिज

धरती और आकाश का क्षितिज
दूर बहुत दूर ..........अनन्त में
कभी मिलकर भी
नही मिल पाते
धरती यूँ ही
आकाश की तरफ़
एकटक , टकटकी बांधे
ताकती रहती है
नेह को उसके
तरसती रहती है
और आकाश
जब मन चाहे तब
बरस जाता है
उसकी चुनरिया को
धानी कर जाता है
और धरती प्रेम के
अथाह सागर में
डूब जाती है
और कभी कभी
ऐसा भी होता है
धरती जो आकाश की ओर
निहारते - निहारते
अपने वजूद को भी
खोने लगती है
तब भी आकाश
अपने अहम् में चूर
धरती की प्रीत को
उसके स्नेह को
उसके धैर्य को
भुलाकर , उसे
वृक्ष के ठूंठ सा
बाँझ बना देता है
उसके रूप - सौष्ठव को
उसकी गरिमा को
उसके त्याग को
बंजर बना देता है
प्रेम के अंकुर को सुखा देता है
उसकी सहनशीलता को
तीक्ष्ण ताप से
कुम्हला देता है
इतनी उपेक्षित होकर भी
धरती आकाश से
मिलन की चाह में
अपने को मिटाती रहती है
एक क्षितिज की चाह में
ख़ुद को भुलाती रहती है
और क्षितिज कभी
नही मिलता उसे
कभी नही मिलता ..........

Monday, June 8, 2009

सिर्फ़ एक दिन

अपनी ज़िन्दगी से
सिर्फ़ एक दिन
उधार दे दो मुझे
उस एक दिन में
उम्र गुजार लेने दो मुझे
एक -एक पल को
यादों में सजा लेने दो मुझे
मेरे संग ,
उम्र के हर बंधन को तोड़ते हुए
कुछ पलों के लिए
ज़िन्दगी को जी लेने दो मुझे
तुम मुझमें और मैं तुम में
ऐसे डूब जायें जहाँ
तुम आंखों से बोलो
और मैं उन अंखियों की
हर भाषा को
हर शब्द को
दिल में उतार लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
और उस एक दिन में
मेरी उम्र बीत जाए
फिर आँख न खुले
फिर ये सपना न टूटे
बस
ज़िन्दगी की हर तमन्ना
पूरी हो जाए
तुम्हारा हाथ हो मेरे हाथ में
उस स्पर्श को
दिल के एक खास हिस्से में
सहेज लूँ
उस अहसास को कुछ पलों
में ही जी लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
उस एक दिन में
मेरी ज़िन्दगी बसर हो जाए
तुम्हारे हाथों में
रजनीगंधा के फूल हों
मेरे दिल के हर कोने को
उसकी खुशबू से ऐसे महका दो
फिर कोई सुगंध न बसे मन में
तुम्हारी यादों की खुशबू में
तन मन रच बस जाए
बस एक दिन
तुम मुझे अपना उधार दे दो
मुझे मेरी ज़िन्दगी
जी लेने दो
सिर्फ़ एक दिन तुम
प्रेमी बन जाओ
मैं तुमसे रूठ जाऊँ
और तुम
मनुहार करके
मनाओ मुझे
एक दिन के लिए
प्रेमिका अपनी बनाओ मुझे
और उस एक दिन में
प्रेम के सारे रंग
दिखाओ मुझे
प्रेम रंग में ऐसे डूब जाऊँ
फिर न कोई रंग चढ़े
हर ख्वाहिश पूरी हो जाए
और फिर
उसी प्रेम रंग में
ज़िन्दगी तमाम हो जाए
फिर उस दिन की
कोई शाम न हो
कोई सुबह न हो
कोई कल न हो
कोई दिन न हो
कोई रात न हो
सिर्फ़ इसी एक दिन में
पूरी उम्र गुजर जाए

Wednesday, June 3, 2009

एक मुलाक़ात -----सायों की

एक अनजाने
अनदेखे
अजनबी से मोड़ पर
तेरा साया
मेरे साये से
टकरा गया
चारों आँखें
जब टकराई
तो देखा
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
वहां शमशान की
वीरानी थी
सूखे हुए
अश्कों के निशान
तेरी कहानी
कह गए
एक वीराने की
खामोशी
एक अजनबियत
लिए तेरी आँखें
सब हाल बयां
कर गयीं
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
मेरी तस्वीर
ढूंढनी चाही
राख के ढेर में
चाहत की
इक चिंगारी
ढूंढनी चाही
पर वहां तो
एक बेजुबान चीख
दबी दिखी
बिना किसी हलचल के
बिना किसी चाहत के
छुपी हुयी खामोशी देखी
तेरी चाहत की
इंतहा देखी
कोई उम्मीद
न बाकी देखी
पहचानना तो
दूर की बात थी
तेरे साये की
आंखों में
मेरे साये ने
लाश की सी
वीरानी दखी
और फिर
उस अजनबी मोड़ पर
बिना रुके
बिना मुडे
बिना देखे
बिना बात किए
तेरा साया
आगे बढ़ता गया
और मेरा साया
तेरे साये के
क़दमों के निशां तले
तेरे मेरे रिश्ते की
राख को
संजोता रहा

Friday, May 29, 2009

बेदर्द मौसम

मौसम का क्या है
बदलता ही रहता है
और फिर लौट कर
भी आता रहता है
मगर कुछ मौसम
ऐसे भी होते हैं
एक बार जो चले जायें
फिर कभी लौट कर नही आते
फिर कितना भी पुकारो
कितने ही पैगाम भेजो
बंजर जमीन की तरह
फिर वहां कोई फूल नही खिलता
बड़े बेदर्द मौसम होते हैं कुछ
यादों में ही बरसते हैं
यादों में ही उलझते हैं
कभी सर्द रातों की तरह
तो कभी धूप की चादर की तरह
कभी मौसमी बरसात की तरह
तो कभी पतझड़ में ठूंठ हुए
पेड़ की तरह
ये बेदर्द मौसम
सिर्फ़ दर्द देकर चले जाते हैं
ऊम्र भर का
लौट कर फिर न आने के लिए।

Monday, May 25, 2009

एक दास्ताँ ये भी ..........भाग २

आज मौन को तोड़ती हूँ
और बताती हूँ तुम्हें
हम तो सिर्फ़ अहसास हैं
ख्यालों में आस पास हैं
रिश्ता नही कहूँगी इसे
वरना बंधन बन जाएगा
एक बेनामी सा अहसास है
तू कभी मेरा था ही नही
और न ही मैं कभी तेरी
फिर भी ख्यालों में अपने- अपने
हम दोनों पास-पास हैं
मैंने तो कोई वादा किया ही नही
कभी कोई कसम खायी ही नही
और तू जानता है ये
तुझे कभी चाहा भी नही
फिर भी एक अहसास है तू मेरा
जिसे खो भी नही सकती
और पा भी नही सकती
न तूने मुझे देखा
न मैंने तुझे देखा
ऐ मेरे बिन देखे अहसास
न भटक इस मृगतृष्णा में
तुझसे दूर होकर भी पास हूँ मैं
फिर भी न जाने क्यूँ
तुमने या कहो
तेरी चाहत ने खुदा बनाया मुझे
तेरे अनकहे जज़्बात
तेरी भटकती भावनाएं
तेरे खामोश अल्फाज़
तेरे दर्द की इम्तिहान कह जाते हैं
तेरी चाहत का इल्म करा जाते हैं
फिर क्यूँ तू उन्हें
शब्दों में ढालना चाहता है
शब्दों का जामा पहनाकर
इक नया रूप देना चाहता है
कुछ तार दिल से बंधे होते हैं
शब्द जहाँ गौन हो जाते हैं
बंधन दिल के होते हैं
शब्दों के नही
फिर क्यूँ तू मुझे अपनी
ख्याली चाहत में बांधना चाहता है
क्यूँ हर बात का इकरार चाहता है
कुछ बातें बिना किए भी होती हैं
कुछ चाहतें खामोश भी हुआ करती हैं
बिना किसी आडम्बर के
बिना किसी बंधन के
बिना किसी वादे के
और तुम हो कि
चाहत को बाँध रहे हो
शब्दों के तराजू में
तोल रहे हो
क्या हर बात का
इकरार जरूरी होता है
शब्दों में बांधने का
व्यापार जरूरी होता है
मेरे अनकहे जज्बातों को
तुझे समझना होगा
मुझे मुझसे छीनने का जूनून
तुझे छोड़ना होगा
अपने ख्यालों के बंधन में
न बांधना होगा
कुछ मेरे जज्बातों को भी
समझना होगा
चाहत के रंग को
बदलना होगा
मुझे खुदा बनाने वाले
अब तुझे ख़ुद बदलना होगा
क्या अपने खुदा की
एक बात नही मानोगे
सिर्फ़ अहसासों में
चाहत को समेटना होगा
दिल की बात को
जुबान पर न लाना होगा
खामोश रहकर चाहत को
निभाना होगा
तेरी चाहत न रुसवा कर दे मुझको
अब अपनी चाहत को
तुझे दफ़न करना होगा
अरमानों की कब्र सजानी होगी
क्या ये इम्तिहान दे पायेगा
इश्क के इम्तिहान दुनिया ने लिए
आज तेरा इम्तिहान है
तेरे इश्क का इम्तिहान है
जहाँ इश्क तुझसे
तेरी चाहत का
तेरे जूनून का
तेरे सब्र का
इम्तिहान लेगा
तेरी चाहत को
दोस्ती का कफ़न उढाकर
उसे एक नया रूप देगा
क्या इतना तू कर पायेगा
चाहत को दोस्ती में
बदल पायेगा
गर तू ऐसा कर पाया
तो तेरा नाम भी
इश्क की किताब में
अमर हो जाएगा

Saturday, May 23, 2009

एक दास्ताँ ये भी ..............भाग १

न जाने कैसे और कब
तुमने ज़िन्दगी में दस्तक दी
धीरे धीरे खामोशी से
अपने जज्बात बयां करते रहे
तुम कहते रहे और
मैं सुनती रही
बिना कुछ पूछे
बिना कुछ जाने
तुम्हारे साथ बहती रही
तुम्हारे दिल की हर बात को
तुम्हारे नगमों में
तो कभी
तुम्हारी ग़ज़लों में
बार बार पढ़ती रही
तुम्हें जानने का
तुम्हारे जज़्बात पहचानने का
दावा करती रही
तुम्हारे अंदाजे बयां पर
मिटती रही
मेरी खामोशी को
तुम इकरार समझ लोगे
मेरे मौन को मेरा
इकरार समझ लोगे
मौन की भी अपनी
भाषा होती है
कभी इकरार की
तो कभी इंकार की
जानती हूँ मैं
आज मौन को शायद
तोड़ना होगा
अपने मौन को
परिभाषित करना होगा
जानती हूँ तुम तन का नही
मन का रिश्ता चाहते हो
मुझे अपनी प्रेरणा
बनाना चाहते हो
अपनी छवि देखी है मैंने
तुम्हारे हर गीत में
उस गीत में छुपे
हर दर्द में
हर शब्द में
हर भाव में
देह से परे
भावों के रिश्ते
कुछ खास होते हैं
जिन्हें न कोई
समझ पाता है
इसलिए आज
मौन को तोड़ना होगा
तुझे ये समझना होगा
ये सिर्फ़ और सिर्फ़
तेरे जज़्बात हैं
मुझे अपनी चाहत न मान
अपने मचलते हुए अरमानों में
न भटकना होगा तुझे
मैं तो सिर्फ़ एक पड़ाव हूँ .....................

क्रमशः .................

Friday, May 15, 2009

जिस्म के रिश्ते

प्यार यहाँ होता है कहाँ
सिर्फ़ शरीरों का व्यापर होता है यहाँ
रोटी , कपड़ा और मकान के बदले
सिर्फ़ शरीरों के सौदे होते हैं यहाँ
सौदों का बाज़ार सजा है
जिस्म जहाँ व्यापार बना है
जरूरत के बाज़ार में सिर्फ़
जरूरतों के सौदे होते हैं
कीमत चुकाकर शरीरों की
आत्मा को बेचा जाता है
प्यार की कीमत न जाने कोई
शरीरों को जाना जाता है
जिस्म की भूख से पीड़ित जो
वो रूह की भूख को क्या जाने
ये शरीर के भूखे भेडिये
दिलों की आवाज़ कब सुन पाते हैं
शरीरों को चाहने वाले कब
प्यार को पहचान पाते हैं
जिस्मों के बाज़ार में
प्यार का कोई मोल नही
ख़ुद को मिटा देती है जो
उसके अरमानों का कोई मोल नही
जिस्म खुदा बन जाए जहाँ
वहां जज्बातों का मोल कहाँ
ये जिस्मों से बंधे जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों के बाज़ार में ख़रीदे बेचे जाते हैं
जिस्मफरोशी की रूह भी काँपे जहाँ
ये इतनी क़यामत ढाते हैं
ये जिस्मों के रिश्ते
जिस्मों पर ही सिमट जाते हैं

Wednesday, May 13, 2009

तेरा नाम

मुझे आइना दिखाने वाले
मुझे मुझसे मिलाने वाले
कल तक तुझे था इंतज़ार
आज तुम बन गए हो मेरा प्यार
मेरे इस जनम को सजाने वाले
कल तक थे तुम अजनबी
आज तुम बन गए हो हमराही
मेरी रूह की प्यास बुझाने वाले
मेरी जन्मों की थकन मिटाने वाले
मेरी खामोशी को जुबान देने वाले
मेरे दर्द को भी पी जाने वाले
कल तक तुझे था प्यार
आज मेरी जुबान पर है
बस तेरा नाम , तेरा नाम, तेरा नाम .......................