दोस्तों
मैं आपकी जानी - पहचानी ब्लॉगर ओह नो सिर्फ जानी, पहचानी नहीं ,क्यूँकि जो भी मिलता है पहचानता ही नहीं .......हाँ जनता जरूर है तो सिर्फ जानी ब्लोगर वन्दना गुप्ता आपके लिए ब्लॉगवुड के ताजा गरमागरम समाचार लेकर हाजिर हूँ ...........
देखिये गर्मी का मौसम आ रहा है और इसका अंदाज़ आप इसी से लगा सकते हैं कि ब्लॉगवुड का माहौल भी गरम होने लगा है .......आप जानते ही हैं यहाँ मौसम कब - कब गरम होता है ........अरे भई जब या तो कोई विवादास्पद लेखन हो या सम्मान मिलना हो या पुस्तक का विमोचन आदि हो और अब ये सब होना शुरू हो चुका है तो माहौल का गरम होना भी लाजिमी है ...........और ऐसे हालात में जब मौसम गरम होने लगे थोड़ी एहतियात बरतनी चाहिए मगर कुछ मानिकलाल जैसे ब्लॉगर दूसरे के फटे में टांग अडाये बिना नहीं रहते या कहिये दूर से रहकर अवलोकन करते हैं , मौसम को गरमी को सहने के लिए पहले से ही अपने इंतजामात कर लेते हैं ..........पर इस बार तो मानिकलाल बेचारा बहुत परेशान था आया मेरे पास और कहने लगा ...........
यार ये पेट में बहुत मरोड़ उठ रही थी ........आखिर इतने दिन हो गए कोई controversy नहीं हुई ना ........जब तक ऐसा ना हो मज़ा कहाँ आता है वैसे भी होली आ रही है और रंग ना बरसे , चूनर वाली ना भीगे तो होली का क्या आनंद .........सोचो तो सही ..........अभी मानिकलाल ये सोच ही रहा था कि पैदा हो गया एक नया झोलझाल लेकर गोलमाल और मानिकलाल की तो हो गयी जी बल्ले बल्ले हो जायेगी बल्ले बल्ले .........होली आई रंग बिरंगी होली आई साथ में देखो कैसी कैसी controversy लायी मानिकलाल की बाँछें खिल आयीं .........मानिकलाल लगा कूदने .....कभी कभी भगवान कितनी जल्दी सुनता है मुँह मांगी मुराद जो मिल गयी थी उसे .........आखिर बेचारा क्या करता इतने वक्त से ब्लॉगिंग कर रहा था और उसका कोई नतीजा जो नहीं निकल रहा था ..........यूँ तो ब्लॉगजगत में अपनी पहचान बना चुका था छोटी मोटी सी मगर रहता थोडा अलग - थलग सा ही था .........उसे देख लोग उसके गुणगान करते और वो उसी में खुश कि आखिर हम भी तो कुछ बन ही गए हैं अपनी एक पहचान के साथ इतने लोग जानने लगे हैं सोच- सोच मूंछों पर ताव देता ............मगर बेचारा मानिकलाल आखिर इज्जत भी कोई चीज है उसे कायम रखना आसान कहाँ होता है इसलिए बेचारा कुछ ना कहता सबको प्रोत्साहित करता, अच्छेपन का नकाब हर वक्त ओढना पड़ता कई बार तो गलत को भी गलत नहीं कह पाता और अन्दर ही अन्दर कसमसाता .........यार ये अच्छा होना भी गुनाह हो जाता है कई बार ..........चलो कोई बात नहीं इतने साल से सब देखता सुनता पढता और मुस्कुराता इस दुनिया कि अजीबोगरीब बंदिशों पर .........मगर दुनिया है ऐसी ही है ऐसे ही चलेगी के फंडे में खुश रहता ...........मगर ये क्या ? उसकी खुशियों पर तो तुषारापात होना शुरू हो गया उसी दिन से जबसे उसने सम्मानों पुरस्कारों के बारे में सुना .........अन्दर ही अन्दर सोचता इस बार तो पुरस्कार पर अधिकार मेरा होगा कम से कम एक तो जरूर मिलेगा मगर ये क्या जैसे ही मौका आया बेचारे ने अपने नाम का कहीं अता -पता ही नहीं पाया और उस दिन उसे लगा बेटे यहाँ पर सिर्फ अच्छे बने रहने से कुछ नहीं होगा .........यहाँ तो जुगाड़ लड़ाने पड़ते हैं , भाई बहन बनाने पड़ते हैं, गुरु - चेला बनाना पड़ता है वो ही तो नाम recommend करता है .........चलो कोई नहीं अगली बार तो करिश्मा करना ही पड़ेगा और बेचारा मानिकलाल बैठ गया किनारे में दो चार गुब्बारे खाकर और चोटों को सहलाकर .........मगर अन्दर का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा आखिर अच्छाई के कीड़े भी तो बाज नहीं आते ना कुलबुलाने से बेचारे फिर अपने राह निकल पड़ा मगर ये क्या हर बार की तरह फिर निराशा ही हाथ लगी ...........उसके बाद आने वाले आगे बढ़ गए और वो खड़ा- खड़ा गुबार देखता रहा ........लोगों ने उसके चेहरे पर दिखावे का रंग मला और आगे बढ़ गए और वो उनके लिए तालियाँ ही बजाता रह गया ...........रोज सबकी पुस्तकों का विमोचन होना सुनता और खुद को तसल्ली देता कोई नहीं अपने दिन भी फिरेंगे कभी हम भी इस खेमे में जुड़ेंगे ...........दुश्मनों को दोस्त बनते देख रहा था सिर्फ पुस्तक छपनी चाहिए फिर चाहे उसकी कोई भी कीमत क्यूँ ना चुकानी पड़े , आत्मसम्मान ही गिरवीं क्यूँ ना रखना पड़े मगर इससे नाम तो होगा ना साहित्यकारों की जमात में शामिल तो हुआ जा सकेगा ना ..........इस अजीबोगरीब खेल को देख रहा था ख़ामोशी से ..........कैसे दुनिया रंग बदलती है कल जो बुरा था आज वो कैसे अच्छा हो गया .........ये बात उसके पेट में मरोड़ मार रही थी और वो इतने दिनों से कसमसा रहा था आखिर ये कैसे संभव हुआ और फिर जब उसे सारा चाल - हाल मिला तो गुंझिया , मालपुए सब एक बार में उसके स्वाद में उतर आये होली के रंग उसकी ख़ुशी में चार चाँद लगा गए .......अब तो उसे चारों तरफ रंग ही रंग दिख रहे थे क्योंकि कहने वालों ने कहना शुरू कर दिया था ........खामियां निकालने वालों ने खामियां निकलना शुरू कर दिया था ............जो कल जीरो थे आज हीरो बन गए थे और जो कल हीरो थे वो अपनी बराबरी देख जल रहे थे ..........आखिर आग लगे और धुंआ ना उठे ऐसा तो नहीं हो सकता ना ...........और अब वो देख रहा था कैसे एक दूसरे का इस्तेमाल किया और फिर मीठी मार से मार दिया ...........ऐसा रँगा कि ज़िन्दगी भर रंग ना उतरे .............अब शोलों की पिचकारियाँ चलनी शुरू हो गयी थीं और मानिकलाल की होली तो मन गयी थी ..........कान पकड़ तौबा कर रहा था अगर यही हाल होना है तो उससे अच्छा ना छपना ही था ये बात उसने समझ ली थी........छपास का रोग बड़ा बुरा बड़ा बुरा जी बड़ा बुरा .............चलो जो भी हो अपने बाप का क्या जाता है ........हमें तो होली में ऐसा ही रंग भाता है सोच कर मानिकलाल आज दोनों हाथों में गुब्बारे लिए दौड़ रहा था रंग भरे ...........कोई कहीं किसी पर मारे वो क्यूँ कुढ़े आखिर होली का त्यौहार एक बार आता है और मस्ती का आलम तो तभी भाता है जब सामने वाला पस्त नज़र आता है और आज तो उसकी मन की मुराद पूरी हो गयी थी ,अब पड़ेंगे रंग बिरंगे गुब्बारे , सबके चेहरों और कपड़ों पर रंग ही रंग दिखेंगे ये सोच वो मस्त हो गया अपनी होली में .......बिन पीये भंग का नशा तारी हो गया ....और तरह तरह के गाने गा रहा था ...........
क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में ............
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ....इस शेर को सालन लगा रहा था
अब मानिकलाल ठहरा मानिकलाल और उसका दिमाग तो उसका दिमाग ही ठहरा ........सोचने पर टैक्स थोड़े लगता है सो एक बात और सोच बैठा ...............
कहीं ये एक दूसरे पर कीचड उछालना , कहना सुनना भी कोई राजनीति तो नहीं ..........अरे भाई राजनीति तो सबमे होती है आखिर जैसे फिल्म का promotion होता है वैसे ही किताबों का भी तो होना चाहिए फिर उसके लिए चाहे जैसे publicity मिले और लोगों में curiocity बढे ............
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.दिमागी कीड़ा एक नया फंडा कब उछल पड़े कोई कुछ नहीं कह सकता .............:))
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तो दोस्तों ये है मोरल ऑफ़ द स्टोरी
होली है जी होली है
बुरा ना मानो होली है :))))))))))))))
ये हम मस्तों की टोली है
बुरा ना मानो होली है :)))))))))))))))
आज तो हम भी शब्द बाण चलाएंगे
होली के रंगों में सबको नहलायेंगे
ज्यादा गरम माहौल न किसी को भाता है
तभी तो जल्दी ही गले वो मिल जाता है
वैसे भी होली की मस्त फुहारों में
सब गिले शिकवे मिट जायेंगे
होली है जी होली है
बुरा न मानो होली है :))))))))))))))
तो दोस्तों ............ये थी मानिकलाल की व्यथा और उसका निराकरण जिसका किसी भी बिरादरी से कोई सम्बन्ध नहीं है ये सब सिर्फ और सिर्फ उसकी सोच की उपज है ...........अब कोई अपने ऊपर ना ले और ले तो ले ले भाई ..........उसके बाप का क्या जाता है ..............वो तो अपनी मस्ती में गाता है
ये पब्लिक है सब जानती है ..........पब्लिक है
अजी अन्दर क्या है अजी बाहर क्या है
ये सब कुछ पहचानती है
पब्लिक है सब जानती है............
चलो आज के ब्लॉग बुलेटिन लिए इतना ही .........कुछ दिनों में ऐसे माहौल गरमाता रहना चाहिए इससे जीवन्तता बनी रहती है और जो छुपे दुबके खरगोश कछुए आदि हैं उन्हें भी निकलने का मौका मिलता रहना चाहिए तभी संतुलन कायम रहता है ..........तो दोस्तों वैसे भी होली आ रही है तो उसमे इतनी मस्ती तो होनी ही चाहिए
बिना छेड़ छड के होली किसे भाती है
भांग के सुरूर बिना होली कब आती है
अब दीजिये आज्ञा .........जब तक कोई नया मुद्दा नहीं गरमाता तब तक आनंद लीजिये होली का
और गाइये ये गाना............
पिया संग खेलूँ होरी फागुन आयो रे .........हो फागुन आयो रे .........चाहे तो इस लिंक पर जाकर सुन भी सकते हैं ............:)))))