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सोमवार, 30 मई 2016

मत सता गरीब को

"क्या हुआ जयंती ? आज बड़े उदास हो ? "

"हाँ , वो शशांक की माँ से जब से मिलकर आया हूँ मन बहुत खराब है ."


"क्यों, क्या हुआ उन्हें?"


"क्या कहें अब ऐसी औलाद को जिसे आज माँ ही बुरी लगने लगी . कल तक तो आगे पीछे डोलते थे लेकिन जिस दिन से बेचारी ने बेटों को मुख्तियार बना दिया मानो अपने हाथ ही काट लिए . अब घर पर कब्ज़ा कर लिया और माँ को एक कोठरी में जगह दे दी . यहाँ तक कि उससे एक तरह से सब सम्बन्ध ही ख़त्म से कर लिए . लाखों रुपया कमाने वाले न बोलते हैं न हाल चाल पूछते हैं . बस दो वक्त की रोटियां भी उनकी बीवियाँ अहसान सा करके देती हैं . शरीर भी साथ नहीं देता लेकिन हौसले से सब झेलती रही ये सोच माना पति से हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रहा , उसके लिए सिर्फ एक भोग्या ही रही , उससे इतर भी स्त्री होती है या उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं , उसका कोई लेना देना नहीं रहा लेकिन औलाद तो मेरी है , वो मेरा दर्द समझेगी , ये सोच हर आतंक पति का सहती गयी . आज न पति उसका न बेटे . जाए तो कहाँ जाए ? किसके सहारे जीवन यापन करे ?" बहुत ही परेशान स्वर में जयंती ने कहा .

"अजी छोड़े ऐसे पति को और लात मारे ऐसी औलाद के . अपने दम पर जीये ." राम ने जवाब दिया .

"कहना जितना आसान होता है न सहना उतना ही मुश्किल . अपने पेट जाए जब ऐसा व्यवहार करते हैं तो खून के आंसू रोती है एक माँ ."

"जानते हैं हम इस बात को तभी कह रहे हैं एक तो उनकी परवाह करना छोड़ दे . दूसरे क्यों कोठरी में जीवन यापन करती है , अपने हक़ के लिए लडे ."

"वो तो ठीक है लेकिन अपनों से लड़ना सबसे मुश्किल होता है और फिर कोई सहारा तो हो जिसके दम पर लड़ाई लड़ी जाए . वो इसी बात का तो फायदा उठा रहे हैं जानते हैं अकेली है . बेचारी बस चुपके चुपके आंसू बहाती है ."

"देखना उसके आँसू , उसकी आहें एक दिन ऐसी तबाही लायेंगी बेटे कहीं के नहीं रहेंगे शायद उस दिन उन्हें अपनी माँ का दर्द समझ आये लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो ...."

"कमज़र्फ औलादें आजकल की जाने किस मिटटी की बनी होती हैं . माँ दर्द से बिलबिला भी रही हो तो भी उसकी चीख सुनाई नहीं देती और यदि बीवी या बच्चे के सर में दर्द भी हो जाए तो सारे काम छोड़ उसकी तरफ दौड़ पड़ते हैं . कैसे इतने निर्मोही और कृतघ्न हो जाते हैं समझ नहीं आता . कैसे भूल जाते हैं यही माँ थी जिसने सब कुछ सहा सिर्फ उनकी खातिर"

"चिंता न कर जयंती भाई ,वो कहते हैं न --- मत सता गरीब को वो रो देगा , गर सुन लेगा उसका खुदा तुझे दुनिया से खो देगा."

मत भूल जो तूने बोई है वो ही फसल काटेगा
अपने किये पर एक दिन चकरघिन्नी सा नाचेगा
ये वक्त वक्त की बात है लाठी तेरे हाथ है
जिस दिन पड़ेगी उसकी बेहिसाब काँपेगा

रविवार, 1 मई 2016

हाशिये का नवगीत

ये हाशिये का नवगीत है
जो अक्सर
बिना गाये ही गुनगुनाया जाता है

एक लम्बी फेहरिस्त सा
रात में जुगनू सा
जो है सिर्फ बंद मुट्ठियों की कवायद भर

तो क्या हुआ जो
सिर्फ एक दिन ही बघार लगाया जाता है
और छौंक से तिलमिला उठती हैं उनकी पुश्तें

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास


सन्दर्भ --- मजदूर दिवस

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

भूले बिसरे गीत

भूले बिसरे गीत हो गए हैं हम .......उसने कहा और मैं सोच में पड़ गयी

सच ही तो कहा

एक दिन सभी भूले बिसरे गीत बन जाने हैं

नहीं नहीं ये भी सत्य नहीं
गीत तो फिर भी कभी कोई गुनगुना ही लेगा
समय असमय
लेकिन हम
किसकी यादों की पालकी में जगह बनायेंगे
एक दिन निश्चित ही मिट जायेंगे

अमिट बनने के लिए जरूरी है
एक सम विषम का मध्यकाल बनना
जहाँ तुम्हारा होना एक अनिवार्य आवश्यकता हो ...

गुरुवार, 24 मार्च 2016

रंग भरी होली


जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 

रंगभरी होली की सभी को मंगलकामनाएं

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

तिरछी पड़ी यादें

आज भी तिरछी पड़ी हैं तुम्हारी यादें
और मैं रोज सुबकता न होऊं
ऐसा कोई लम्हा गुजरा ही नहीं
क्योंकि
इश्क का चन्दन जितना घिसा
उतना ही सुगन्धित होता गया

अब चिकनी सपाट सड़क पर भाग रहा हूँ
निपट अकेला ...

उधर
इख्तियार है तुम्हें भी
जुदाई की कोंपलों पर अश्रुपात करने का
कि
उग आये एक दास्ताँ हर दिल के सफ़हे पर
दिन-ब-दिन
और हो जाए मोहब्बत श्रृंगारिक ,अलंकारिक , गुंजारित

बस इतना सा तो सबब है
बाकि इस सत्य से कौन अनभिज्ञ है
रूहों के मिलन के मौसम आज के ज़माने का चलन नहीं ...

मंगलवार, 8 मार्च 2016

उत्सवकाल

वो देह का संधिकाल था
जिसे दफ़न करना जरूरी था

ये देह का नहीं
स्त्री का उत्सवकाल है
जिसे सिरमौर बनाना जरूरी है

देह से स्व तक के सफ़र में
देकर आहुतियाँ
निखर उठी हैं अविछिन्न रश्मियाँ
स्वाभिमान की , स्वत्व की , गौरत्व की

अब दे चुकी है तिलांजलि , जलांजलि
वो
नर्तन की बदल चुकी हैं मुद्राएँ
तिनका तोड़ दिया है
निब तोड़ चुकी है
फिर क्यों अलाप रहे हो वो ही बेसुरे राग
जिनके गायन से अब नहीं बरसा करते बेमौसम बादल
नहीं जला करते बुझे हुए चिराग फिर से

ये आज उसके बदले हुए तौर तरीके हैं
उत्सव मनाने को जरूरी नहीं
पुरातन तौर तरीके ही आजमाए जाएँ
क्या हुआ जो आज थिरक लेती है
उसकी ख़ामोशी डी जे की धुन पर होकर मतवाली

आधुनिकता को न केवल
ओढा बिछाया या लपेटा है उसने
बल्कि
जान गयी है कैसे पौंछे जाते हैं
जूते , मुंह और हाथ
तुम्हारे गरियाने से पहले .......

आज बदलनी ही पड़ेगी वो इबारतें जिन्होंने खोदी हैं कब्रें

ये आज की स्त्री की गौरवमयी गाथा है
स्वीकारनी तो पड़ेगी ही
फिर माथा नवाकर स्वीकारो या हलक में ऊंगली डलवाकर ......निर्णय तुम्हारा है !!!

सोमवार, 7 मार्च 2016

हरारत

1

दिल से उतर रहे हैं
रिश्ते करवट बदल रहे हैं

पेड़ छाल बदलें जो इक बार फिर से
उससे पहले
चलो शहर को धो पोंछ लो

शगुन अच्छा है

दिल की हरारत से
रिश्तों की हरारत तक के सफ़र में
इस बार मुझे नहीं होना नदी .........
 
2
किससे करें अब यहाँ वफ़ा की उम्मीद
सारे शहर में उनकी बेवफाई के चर्चे हैं 


हकीकत की कश्ती में सभी कच्चे हैं
यहाँ सभी बेमानी बेसबब रिश्ते हैं


3
काश ! दिल खोलकर रखा जाता
जिसने जो दर्द दिया उसे दिख जाता 


फिर ज़ख्मों का न यूं बाज़ार लगा होता
दिल की किताब से उसका नाम मिटा होता


 

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

'सैफ्रीन' मेरी नज़र से

भोपाल से प्रकाशित 'लोकजंग' समाचार पत्र में "सेफ्रीन" कथा-संग्रह पर मेरे विचार :



उत्कर्ष प्रकाशन से प्रकाशित मुकेश दूबे का कहानी संग्रह ‘सैफ्रीन’ अपने नाम से ही सबसे पहले आकर्षित करता है . सैफ्रीन एक नया शब्द आखिर इसका क्या होगा अर्थ . मन में व्याकुलता का होना स्वाभाविक है और यही व्याकुलता कहानी संग्रह को पढवाने के लिए काफी है . मानो शब्दकोष को एक नया शब्द दे दिया हो लेखक ने . 

संग्रह की पहली ही कहानी ‘सैफ्रीन’ है तो मानो पाठक को मनचाही मुराद मिल गयी हो . छोटी सी कहानी  गहन अर्थ समेटे . एक नयी विवेचना करते हुए तो साथ ही सोच को भी विस्तार देते हुए . यूँ तो मजहबी सियासत और मजहबी रंग से कौन वाकिफ नहीं है मगर जब बात आती है प्रेम की तो दोनों तरफ तलवारे खिंच जाती हैं और खिंची तलवारों के मध्य ही लेखक ने एक नया रंग दिया प्रेम को . हिन्दू के सैफ्रोन और मुस्लिम के ग्रीन को मिला एक नए रंग का न केवल निर्माण किया बल्कि प्रेम करने वालों को मानो एक नया मजहब ही प्रदान कर दिया और यही इस कहानी का मूल तत्व है .
‘केमिस्ट्री ऑफ़ फिजिक्स’ न केवल सम्पूर्ण विज्ञान को समेटे है बल्कि विज्ञानं के माध्यम से वैवाहिक जीवन की ग्रंथियों को भी खोलती है और बताती है जीवन में सही समीकरण तभी बनते हैं जब दोनों तरफ बराबर का आकर्षण हो . एक स्तर हो और ये किसी भी सफल दांपत्य जीवन का मूल सूत्र है वो तभी निभ सकते हैं जब दोनों स्त्री और पुरुष अपनी फिजिक्स सही कर लें तो केमिस्ट्री स्वयमेव आकार ले लेती है , एक छोटी सी कहानी पूरे विज्ञान के माध्यम से बयां करना लेखक के कुशल लेखन कौशल का चमत्कार है .
‘सुचित्रा’ एक पेंटर की कल्पना और हकीकत का खूबसूरत चित्रण है . जहाँ वो कल्पना से बतियाता है और हकीकत में कमाल करता है . दीपांशु कल्पना को जीता है जिस कारण उसकी पेंटिंग खुद बोल उठती हैं तो दूसरी तरफ उसे अपनी कल्पना पर इतना विश्वास है कि वो कह उठता है यदि हकीकत में भी तुम मिल गयीं तो तुम्हारा जो भी नाम हो मैं सुचित्रा ही कहूँगा ......इतना जिवंत कर देना लगे ही नहीं पाठक को कि वो किस्से बात कर रहा है कल्पना से या हकीकत से .......एक खूबसूरत कविता सी कहानी .
‘परछाइयों के शहर में’ एक सस्पेंस के भंवर में ले जाती कहानी है जहाँ दो मुसाफिर जंगल के रास्ते जा रहे हैं और तेज बारिश के कारण रास्ते में रुकना पड़ता है और फिर रात जो होता है उसका जब सबको बताते हैं तो कोई विश्वास नहीं करता . तो दूसरी तरफ एक भ्रम भी पैदा करने की कोशिश की गयी है मानो लेखन कहना चाहता हो भूत प्रेत भी होते हैं लेकिन आज के विज्ञान के युग में कोई इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता . हाँ , ये हो सकता है कहने वाले ने सिर्फ डराने के लिए कहा हो और उन दोनों ने विश्वास कर लिया हो या फिर रात के अँधेरे में जब थोड़ी राहत मिली हो तो आँख लग गयी हो और वहां एक स्वप्न देखा हो और वो ही हकीकत सा लगा हो .........हो कुछ भी सकता है मगर कहानी अपनी रोचकता बनाए रखने में कामयाब रही .
‘चदरिया झीनी रे’ रिश्तों की झीनी चादर को तो इंगित करती ही है वहीँ संसार से जाने के बाद कैसे रिश्ते छीजते हैं और जो देह रुपी चदरिया आत्मा ने ओढ़ी है वो निकल जाती है तो क्या होता है उसे भी रेखांकित करने में सक्षम रहे हैं लेखक .
‘सिम्बायोसिस’ यानि एक दूसरे की जरूरत पूरी करो और आगे बढ़ते रहो के सिद्धांत को प्रतिपादित किया है लेखक ने कहानी में स्मिता और रविन्द्र के माध्यम से . कैसे एक लड़की अपने जीवन में समझौते के पगडण्डी पर पाँव रख अपने भविष्य की नींव रखती है बेशक आम मानव मन इसे स्वीकारेगा नहीं लेकिन आजकल कुछ लोग अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु इस राह को अपनाते हैं और इसमें बुराई भी नहीं समझते .
‘तर्पण’ एक तवायफ की ज़िन्दगी की जद्दोजहद की दास्तान है जो एक औरत बनाना चाहती है मगर तंगदिल सोच के मालिक बनने नहीं देते और उसका आखिरी ख़त एक मार्मिक मगर हकीकत पेश करता है तब तंगदिली के कुहासे छंटते हैं .इंसान किन्ही कमजोर क्षणों में निर्णय तो ले लेता है लेकिन खुमार उतरने पर अपनी कुंठित सोच से बाहर नहीं आ पाता और अपनी असलियत पर उतर आता है मानो तवायफ औरत होती ही नहीं या कहिये उसे औरत बनने ही नहीं दिया जाता . तवायफ के रूप में ही संसार से विदा होना होता है लेकिन उसका आखिरी ख़त काफी है सारा कुहासा छांटने को और उसे सम्पूर्ण औरत बनाने को ......मानो लेखक यही कहना चाहता हो .
‘कादम्बरी का कन्यादान’ एक अनोखे कन्यादान की कहानी है जिसे लेखक ने इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि अंत में पाठक को पता चलता है आखिर कन्यादान है किसका और ये ही किसी भी लेखक के लेखन की खूबसूरती होती है कि अंत तक पाठक की जिज्ञासा बनी रहे और अंत आने पर वो मुस्कुराए बिना न रह सके तो दूसरी तरफ सोचने पर विवश भी कि है आज भी भविष्य उज्जवल किताबों का .ऐसी सोच सबकी हो तो क्या बात हो .
‘मृगतृष्णा’ एक अलग ही कलेवर लिए .वैसे देखो तो आम लगे लेकिन पात्र की नज़र से देखो तो कितनी ख़ास . उसके अंतस में जाने कितने ज़ख्म होंगे जिन्हें जब मरहम लगाया एक नया घाव हर बार ताज़ा करता गया तो वहीँ कहीं न कहीं लेखक शायद ये कहना चाहता हो कि जब प्यार की तलाश को मुकाम नहीं मिलता तो उस पर क्या बीतती है ये कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है . और शायद यहीं से एक नयी सोच और नए जीवन की शुरुआत होती है कोई भटक सकता है इतनी ज़िन्दगी की मायूसियों से तो कोई अवसादग्रस्त भी हो सकता है . अंत के बाद भी एक कहानी स्वतः जन्म ले रही है ........एक ऐसी कहानी है मृगतृष्णा . शायद और पाठक वहीँ तक पढ़ें जहाँ तक लेखक ने लिखा लेकिन जाने क्यों मुझे लगा इसके बाद भी ज़िन्दगी तो रुकनी नहीं और जिसका ज़िन्दगी से विश्वास उठ जाता होगा , जिसने कदम कदम पर ज़िन्दगी और किस्मत से धोखे खाएं हों क्या उसका मानसिक रूप से संतुलित रहना संभव हो सकता होगा ? एक ऐसा प्रश्न छोडती है कहानी जो सोचने को मजबूर करती है . इस कहानी के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं क्योंकि जो प्रस्तुति है वो मानो एक आधार दे रही है एक नयी कहानी के जन्म को .
‘इत्तेफाक’ संबंधों और किस्मत के कनेक्शन का एक ऐसा सम्मिश्रण है कि कोई नहीं चाहेगा उसके साथ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ घटे लेकिन वक्त और हालात कब किसे कहाँ ले जाते हैं और कैसे ज़िन्दगी को पलट देते हैं कोई समझ ही नहीं सकता . शादी किसी से होनी हो और ले किसी और को आयें . सामूहिक विवाह में हुए हादसे कैसे ज़िन्दगी को बदल देते हैं उसकी तस्वीर उकेरती है वहीँ याद दिलाती है ऐसी ही कुछ कहानियों की जो हम पहले पढ़ा सुना और देखा करते थे जैसे कहीं ट्रेन हादसा हो गया और दुल्हनें बदल गयीं या लम्बा घूँघट होने के कारण बदल गयीं कुछ ऐसा ही दृश्य यहाँ उकेरा गया लेकिन उसको मोड़ यहाँ दुसरे ढंग से देना ही लेखक के लेखन की सफलता है . बस यही है इत्तेफाक .
‘तुम याद आये’ मानो अकेले जीवन जीने वाली लड़कियों के मन में उपजे खालीपन को तो परिभाषित कर ही रही है वहीँ विवाह के बंधन को न स्वीकारने के कारण उपजे एकाकीपन के दोष को भी इंगित कर रही है तो दूसरी तरफ ये भी कहना चाह रही है कि शरीर और उसकी जरूरतें एक सीमा तक ही या एक उम्र तक ही होती हैं उसके बाद वो स्त्री हो या पुरुष सभी को एक साथ की जरूरत होती ही है बस अपनी स्वतंत्रता न छीने इस डर से स्त्री और पुरुष एकाकी जीवन जीने का निर्णय लेते हैं लेकिन एक दिन वो भी आभास करा ही देता है परिवार होने के महत्त्व का , किसी के साथ के महत्त्व को .मानो लेखक कहना चाह रहा हो इंसान एक सामाजिक प्राणी है तो उसे कभी न कभी समाज की जरूरत पड़ती है फिर वो उम्र का कोई भी पड़ाव हो और साथ ही देह मुक्ति या यौन स्वतंत्रता तक ही नहीं होता स्त्री विमर्श . स्त्री के अन्दर की स्त्री को भी जरूरत होती है एक साथ की ........
‘चेहरे पर चेहरों की किताब’ आज के फेसबुक के दौर के गुण और दोषों को तो व्याख्यातित करती ही है वहीँ एक पीढ़ी जो अपने कर्तव्यों से जब मुक्त हो चुकी होती है तो उसे जीने को एक अवलंबन चाहिए होता है और वो अवलंबन जब फेसबुक के रूप में मिलता है तो वो उसी को अपने समय बिताने का जरिया बना लेता है लेकिन यहाँ भी अनेक गुण दोष हैं यदि उनसे सावधान रहे तो आप सफलतापूर्वक अपने समय का सदुपयोग कर सकते हैं वर्ना अवांछित मन की शान्ति भंग होने का भी डर बना रहता है . मौलिक और इंदु एक जोड़े के माध्यम से लेखक यही कहने का प्रयास कर रहा है .
‘टीचर ऑफ़ द इयर’ कहानी व्यवस्था पर कटाक्ष है. कैसे हर जगह चाटुकारिता ने अपने पाँव जमाये हुए हैं . कैसे एक शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार उसका वो सम्मान है जो एक स्टूडेंट उसे देता है तो कुछ लोगों के लिए जुगाड़ के कन्धों पर सवार होकर प्राप्त किया सम्मान ही मायने रखता है ......इस दोहरे आकलन की कहानी के माध्यम से कहने की लेखक की कोशिश कामयाब रही है .
‘फूल तितली भंवरा और खुशबू’ के माध्यम से लेखक कहना चाह रहा है कि जब यौवन की दहलीज पर पैर रखते हैं लड़के और लड़कियां यदि उन्हें उस समय सही गाइड करने वाला मिल जाए तो उनका जीवन संवर सकता है और वो सही हमसफ़र चुन सकते है नहीं तो कई बार समझ की कमी की वजह से अपनी जिंदगियां भी खराब कर लेते हैं .
‘डैडी’ अंतिम कहानी और लम्बी कहानी . एक पिता और पुत्र के मध्य वैसे तो हमारे समाज में अक्सर ३६ का सा आंकड़ा होता है लेकिन यहाँ उससे उलट है . बेटे की सारी दुनिया ही उसके पिता हैं , बेशक माँ भी है और बहन भी लेकिन जितना अपने पिता से जुड़ा है उतना किसी से नहीं और ये संभव हो सका तो सिर्फ इस वजह से कि अपने पिता में उसने हमेशा एक दोस्त पाया और जब उसके पिता नहीं रहे तो मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त हो गया कि उन्हें जिंदा ही समझता रहा . जब घरवालों को अहसास हुआ तो उसका इलाज कराया गया जहाँ यही तथ्य निकल कर आया कि हर इंसान को अपने जीवन में एक सच्चे दोस्त की जरूरत होती है और जब वो उसे पा लेता है तो उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता ऐसा ही यहाँ होता है जब मोहित को मोनिका में एक दोस्त , एक हमसफ़र मिलता है तो वो पत्थरों से अपना मोह तोड़ लेता है जिन्हें अपने पिता के जाने के बाद अपना दोस्त समझने लगा था और जाने के बाद क्या बचपन से ही उन्हें भी दोस्त मानता आया था . कहानी के माध्यम से लेखक ने बिमारी और उसके इलाज के साथ मानवीय रिश्तों की महत्ता को भी दर्शाया है .

समग्रतः सैफ्रीन कहानी संग्रह में कहानियों में मानवीय मूल्यों और जीवन की उलझनों से कैसे निजात पाया जाए , उन पर लेखक ने काम किया है .धर्म हो या स्त्री पुरुष सम्बन्ध या प्रेम या सोशल मीडिया हो या किताबें या व्यवस्था हर पहलू पर लेखक की नज़र है और हर पहलू को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया है जो बताता है लेखक की सोच का फलक कितना विस्तृत है . सभी कहानियां छोटी छोटी . मगर गहन अर्थ लिए . अब तक लेखक के उपन्यासों से ही वास्ता पड़ा था लेकिन लेखक की कहानियों पर भी अच्छी पकड़ है .मुकेश दूबे जी बधाई के पात्र हैं जो थोड़े शब्दों में गहरे अर्थ समेटने का हुनर भी रखते हैं . उम्मीद है पाठक को आगे भी ऐसी अनेक और परिपक्व कहानियां पढने को मिलती रहेंगी और उनकी कलम अनवरत चलती रहेगी .अपनी अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ ...

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

संवेदनहीन होना


मैं नहीं चढ़ाती अब किसी भी दरगाह पर चादर
फिर चाहे उसमे किसी फ़क़ीर का अस्तित्व हो
या आरक्षण का या अफज़ल की फांसी के विरोध का
या फिर हो उसमे रोहित वेमुला
या उस जैसे और सब
जिनके नाम पर होती हैं अब मेरे देश में क्रांतियाँ

भुखमरी बेजारी महंगाई
किसान द्वारा आत्महत्या
रोज एक जैसी ख़बरों ने
इतना संवेदनाओं के चूल्हे को लीपा
कि अब
जड़ हो गया है एक पूरा साम्राज्य

ये जानते हुए भी
कि आजकल नहीं बदला करती तस्वीर किसी भी क्रांति से
बेवजह भटकाए जाते हैं मुद्दे
मैंने दे दी है अंतिम आहुति
राष्ट्र के हवन में
अपनी हहराती भावनाओं की

बस यही है कारण
मर चुकी हैं संवेदनाएं मुझमे .........