पृष्ठ

समर्थक

अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

बृहस्पतिवार, 23 मई 2013

.ओ मेरे !...........1

सपनों के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं जो तुम्हें ठंडी हवा के झोंके सी लगती, फिर भी हूँ .......सोचती हूँ , शायद , कुछ ...........तुम्हारी भी या तुम्हारी बेरुखी की सजायाफ्ता तस्वीर ...........इस उम्मीद के चराग को बुझने नहीं देना चाहती इसलिए खूब डालती हूँ तेल तुम्हारे दिए ज़ख्मों पर आंसुओं का ........आहा ! फिर जो सुरूर चढ़ता है , फिर जो नशा होता है , फिर जो रवानी होती है ............कब सुबह हुयी और कब शाम .........कौन पता करता है ...............एक मखमली सुकून की तलाश ख़त्म हो जाती है जैसे ही तुम्हारे दिए ज़ख्मों को जलते चिमटे से सहलाती हूँ ...........उम्र ठहर जाती है कुछ देर मेरी दहलीज पर ...............और मैं करती हूँ अट्टाहस अपने गुरूर पर , उस सुरूर पर जो सिर्फ मेरा है और मैं ...............हूँ , का अहसास चुरा लेता है तुम्हारी नींद भी फिर चाहे नहीं हूँ मैं तुम्हारी चाहत की दुल्हन , तुम्हारे सपनो का कोहिनूर ..............नशे के लिए जरूरी नहीं होता हर बार जाम को पीना ..............जो सुरूर बिना पीये चढ़ते हैं उम्र फ़ना होने पर भी न उतरते हैं ........जानां !!!


बस इतना जानती हूँ ..............तुम्हारे सपनो के संसार की अनुपम सुंदरी नहीं एक धधकती ज्वाला हूँ मैं, गर्म लू सी जो झुलसा देती है चमड़ी तक भी  ...........कहो , जी सकोगे अब साथ मेरे या मेरे ना होने पर भी ...........तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

रविवार, 19 मई 2013

और आज चलन नहीं है आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का

नहीं जानती कविता का 
अर्थशास्त्र गणित या भूगोल 
क्योंकि ना कभी समकालीनों को पढ़ा 
ना ही कभी भूत कालीनों को गुना 
फिर कैसे जान सकती हूँ 
उस व्याकरण को 
जहाँ भाषा में शिल्प हो 
सौन्दर्य हो 
प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग हो 
फिर चाहे उनके दोहरे अर्थ ही 
क्यों ना निकलते हों 
और सब अपने अपने अर्थ उसके गढ़ते हों 
मगर कविता तो बस वो ही हुआ करती है 
जिसमें गेयता हो 
छंदबद्धता हो 
सपाटबयानी तो कोई भी कर सकता है 
उसके भावों को कौन गिनता है 
क्योंकि उसने नहीं जाना बाहरी सौन्दर्य 
और आज चलन नहीं है 
आंतरिक सौन्दर्य को सराहे जाने का 
आज चलन नहीं है सपाटबयानी का 
ऐसे में तुमने ही मेरे लिखे में 
जाने कैसे कविता ढूंढ ली 
जाने कैसे कविता के पायदान पर 
मेरी लेखनी को रख दिया 
मगर मैंने तो ना कभी कहा 
कि मैंने कविता को है गढ़ा 
जाने कौन से भाव तुम्हें 
उन्मत्त कर गए 
जाने कौन सा तार 
तुम्हारे दिल को छू गया 
जो तुम्हें सपाटबयानी में भी 
कविता का सम्पुट दिख गया 
और मैं हो गयी तल्लीन आराधना में 
साधना में , उपासना में 
बिना जाने 
बिना पुष्पों के अर्घ्य के 
आज के देवता प्रसन्न नहीं हुआ करते 
और मुझमे वो कूवत नहीं 
जो मछली की ग्रीवा से 
सागर में चप्पू चला सकूं 
या नए बिम्ब और प्रतीकों के प्रतिमान गढ़ूं 
जिनका कोई स्वेच्छाचारी अपने ही अर्थ निकाले 
और मेरी रचना का मूल स्वर ही शून्य में समाहित हो जाए 
मैं तो बस भावों का मेला लगाती हूँ 
और उसमे ज़िन्दगी के अनुभवों को 
बिना किसी सजावट के परोसा करती हूँ 
क्योंकि ज़िन्दगी कब दुल्हन सी श्रृंगारित हुयी है 
ये तो हर पल चूल्हे की आंच सी ही भभकती रही है 
और फिर जलती चिताओं की ज्वालाओं में 
कब श्रृंगार पोषित , सुशोभित , सुवासित हुआ है .............बस सोच में हूँ 

गर तुम स्वीकारो बिना दहेज़ की दुल्हन को 
जिसमे ना शिल्प है ना सौन्दर्य , ना बिम्ब ना प्रतीक 
तो इतना कर सकती हूँ 
जलती आँच से एक लकड़ी उठा सकती हूँ दुल्हन के श्रृंगार को
जो तुम्हारे सिंहासन को हिलाने को काफी है 
वैसे मेरी भावों की दुल्हन किसी श्रृंगार की मोहताज नहीं ..........जानती हूँ 

अब तुम खोजते रहना किसी भी कथ्य में "कविता या उसके अर्थ "
मगर आज के वक्त में तुम्हारा ये जानना भी जरूरी है 
भावों के तूफानों में कब सजावट सजी संवरी रहा करती है 

बुधवार, 15 मई 2013

कभी देखा है कोई पीर फ़कीर दरवेश ऐसा …………

चाहती थी
नींद , ख्वाब
भंवरा, पपीहा
पीहू - पीहू
पी कहाँ ,पी कहाँ
सारे बोल गुनगुनाऊँ
मै भी जोगन बन जाऊँ
मै भी एक बार
मोहब्बत मे गुम हो जाऊँ
पर ज़रूरी तो नही ना

हर रस्म निभायी ही जाये
या हर ख्वाब सच हो ही जाये
ओ मेरे
अन्जान देश के अन्जान पंछी
मेरी आखिरी कसक का आखिरी सलाम लेता जा
देख ले आज तू भी
एक अन्दाज़ ये भी होता है जीने का
न ख्वाब मे ना हकीकत मे
कुछ हथेलियों पर मोहब्बत की लकीर ही नही होती
फिर भी
जो अन्जानों की इबादत करता हो ………

कभी देखा है कोई पीर फ़कीर दरवेश ऐसा …………

रविवार, 12 मई 2013

फिर फसल को काटने से डर कैसा ?

पलायनवादिता के अंकुर
फूट ही जाते हैं एक दिन
जो बीज रोप दिए जाते हैं
बचपन में ही
हाँ ..........बचपन में
जब कुछ कम ना कर सको
तो छोड़ दो कह देना
जब कोई मुश्किल आये
तो ईश्वर पर छोड़ देना
मगर कभी मुश्किल का
सामना करने के लिए
ना प्रेरित करना
कभी खुद के हौसलों पर
विश्वास करने के लिए ना कहना
और फिर उम्मीद करना
बस ये पहाड़ खोद कर सडकें बना दे
कैसे संभव है ...........
जब जीवन से लड़ना ही नहीं सिखाया
जब कठिनाइयों से जूझने का
जज्बा ही ना पनपाया
आसान होता है
किसी भी बात से पलायन
आसान रास्ता तो सभी अपना लेते हैं
और उन रास्तों पर चलने वाले
कभी मील का पत्थर नहीं बनाते
हिमालय पर तिरंगा तो जीवट ही फहराते हैं .........पलायनवादी नहीं
पलायनवादी प्रवृत्ति  के लिए
शायद कहीं ना कहीं हम ही जिम्मेदार हैं
फिर क्यों कह देते हैं
ये अपना कर्त्तव्य सही ढंग से नहीं निभाता
बूढ़े माँ बाप की सेवा नहीं करता
आखिर पलायनवादी गुणों के पकने
का भी तो समय आता ही है एक दिन
फिर फसल को काटने से डर कैसा ?

बृहस्पतिवार, 9 मई 2013

मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना

एक छटपटाती चीख 
रुँधता गला 
कुछ ना कर सकने की विडंबना 
मुझे रोज कचोटती है 
अंतस को झकझोरती है 
और सैलाब है कि बहता ही नहीं 
आखिर क्यों हुआ ऐसा ?
प्रश्न मेरी व्याकुलता पर 
मेरी असहजता पर 
प्रश्नचिन्ह बन 
मुझे सलीब पर लटका देता है 
और मैं हूँ 
रोज सिसकियों के लावे को 
खौलाती हूँ और जीती हूँ 
क्योंकि .........तुम हो 
हाँ तुम ...........तुम्हारा प्रथम स्पर्श 
तुम्हारी ख़ामोशी 
तुम्हारी मासूमियत 
तुम्हारा बिना कहे सब कह देना 
"मैं हूँ ना "...........मुझे भिगो जाता है 
तुम्हारा बिना कहे जतला देना 
जन्म जन्मान्तर के सम्बन्ध की डोर पर 
हमारा रिश्ता थिरकता है 
जो मोहताज नहीं किसी रस्मी उल्फत का 
कुछ पल की देरी पर असह्य ना होकर 
समीकरण न बिगाडना 
बल्कि खामोश निगाहों से 
लबों की मुस्कान से 
मुझे अहसास कराना .........मैं हूँ ना 
फिर कैसा अजनबीपन 
अजब प्रीत का अजब सम्बन्ध 
हमारे रिश्ते का साक्षी बना 
और फिर एक दिन तुम्हारा देर से आना 
आते ही मुझसे अमरबेल से लिपट जाना 
मेरे वक्षों में खुद को छिपा लेना 
और तुम्हें अपनी बाहों के सुरक्षित घेरे में 
और कस के चिपटा लेना 
तभी कुछ अजनबी आहटों का तुम तक पहुंचना 
कुछ शोर के शोर से मुखातिब होना 
और एक ही पल में 
रेत के महल का धराशायी होना 
यूं ही तो नहीं हुआ था ना 
जब एक आवाज़ कानों को चीरती 
आकाश को फाड़ती , धरती पर जलजला लाती 
मेरी शिराओं में बहते रक्त को जमाती टकराई 
अरे ! ये तो हरिजन है 
अरे ! ये तो गूंगा है 
अरे ! ये तो अनाथ है 
आश्रम से भागा है 
बस जैसे किसी उड़ान भरते पंछी के 
पर कुतर दिए गए हों 
जैसे अचानक हवाओं की साँय साँय 
इतनी बढ़ गयी हो 
कि उसमे सारी कायनात सिमट गयी हो 
ये हरिजन है , ये हरिजन है 
शब्द ने मुझे शिथिल किया 
मेरा बंधन ढीला पड गया 
जो मुझे बोध हुआ 
उफ़ ! एक हरिजन का मैंने स्पर्श किया 
जाने क्यूं अपराधबोध हुआ 
और रात यूं ही सिसकती रही 
कहर बन कर टूटती रही 
बस रूह ही जैसे सजायाफ्ता हुयी 
मगर दिनकर ने तो उदय होना था 
समय ने गतिमान होना था 
मुझे भी तो नियत समय पर 
फिर वहीँ जाना था 
जैसे कोई आवाज़ लगा रहा हो 
जैसे कोई मेरा अपना बुला रहा हो 
जैसे बाग़ चाहे उजड़ जाए 
पतझड़ चाहे कितना तांडव मचाये 
मगर बहार तो फिर है आये 
बहारें न फर्क करती हैं
 हवाएं तो सभी को इकसा गिनती हैं 
खुशबू तो चहूँ  और बिखरती है 
फिर हरिजन हो या ब्राह्मण 
ये सोच जो आश्रम की ड्योढ़ी पर कदम रखा 
मानो गाँधी ने प्रश्नवाचक नज़रों से घूरा 
धरती पाँव से सरकती लगी
मगर मन वेदना तो थी बढ़ी 
खोज में सितारे दौड़ा दिए 
आस्मों को चाँद की तलब जो थी 
तभी मानो कोई ग्रहण था लगा 
जो पता ये चला …………
अब ना चाँद का दीदार होगा 
चाँद को है पूर्ण ग्रहण लगा 
जो न अब कभी उदय हो पायेगा 
वो तो उसी सांझ की बेला में काल का ग्रास था बना 
सुन , सुन्न हो गयी 
खुद से ही शर्मसार हो गयी 
मर्यादा भी मानो कुम्हला गयी 
सिर्फ एक प्रश्न ज़ेहन में अटक गया 
आखिर ऐसा कब तक होगा 
आखिर कब ये भेदभाव ख़त्म होगा 
आखिर कब तक मासूमियत लाचारी 
कठमुल्लाओं की भेंट चढ़ेगी 
कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के साथ 
बापू की मूरत थी मौन खड़ी 
बस एक ध्वनि  झकझोर रही है 
मेरी ममता को 
दिलो दिमाग पर हथौड़े सी बज रही है 
मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना 

और दूसरी तरफ मेरी ममता 
पर था प्रश्नचिन्ह लगा 
आखिर इसमें उसका क्या दोष था 
वो तो बस एक ममता को व्याकुल 
नन्हा फ़रिश्ता था 
जिसने मेरी ममता को आयाम दिया था 
फिर क्यों न कह सकी मैं 
फिर उसको क्यों न ये विश्वास दिला सकी मैं 
मैं हूँ ना ............मैं हूँ ना 

"और मै बडी हो गयी" काव्य संग्रह की "मासूम यादें" की लेखिका "कमला मोहन दास बेलानी" की कहानी पर आधारित कविता 

शनिवार, 4 मई 2013

वो सुपरवूमैन कहलाती हैं

वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं 
मेगज़ीनों में शीर्ष पर छाते हैं 
तभी तो हमारे सैनिकों के 
सिर काट लिए जाते हैं 
सच्चाई की आवाज़ को दबाया जाता है 
पर इनका खून ना  खौल पाता है 
इसलिए ये ना  हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं

वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
जहाँ वूमैन की इज़्ज़त ही 
तार- तार हुयी जाती है 
मगर उनमें ना 
क्रांति की अलख जगती है 
क़ानून का गलत इस्तेमाल कर 
कोई खुद को साफ़ बचाता है 
नाबालिगता के प्रमाण पत्र तले
 सरकारी सुरक्षा पाता है 
इन्साफ रौंदा जाता है 
मर्यादाएं कुचली जाती हैं 
वहशी दरिंदों को जहाँ 
हिफाज़त में रखा जाता है 
मगर इन पर न असर होता है 
ये ना हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


मँहगाई त्राहि त्राहि मचाती है 
आम जनता मारी जाती है 
भ्रष्टाचार जडें जमाता है 
इनके राज में खूब पनपे जाता है 
सब्र कर सब्र कर की धुन पर 
कोई सरबजीत मारा जाता है 
मगर इन पर ना असर होता है 
ये ना  हो -हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं 


कोई पाक को नापाक करता है 
पीठ में छुरा घोंपता है 
फिर भी उस पर ना  गुर्राते हैं 
बस अपनों पर ही लाठीचार्ज करवाते हैं 
जहाँ जुल्म ही जुल्म मुस्काता है 
बेबस तो आंसू बहाता है 
ये कैसा बेशर्मी से नाता है 
जो इनका दिल न पसीज पाता है 
तभी तो अंधे गूंगे बहरे बन 
देश को खाए जाते हैं 
पर ये न हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


कहीं लश्कर रौब जमाता है 
कहीं चीन अन्दर घुसा आता है 
पर गूंगे मोहन को तो बस 
चुप रहना ही सुहाता है 
सिर्फ कुर्सी ही कुर्सी दिखती है 
इसलिए हाँ में हाँ मिलाता है 
अर्थशास्त्री का सारा अर्थ तो 
तिजोरियों में सिमटा जाता है 
इसलिए ये ना हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते हैं


तभी तो ताकतवर देश ना  कहाता है 
मेरा भारत पिछड़ा जाता है 
ऐसे लोभियों के हाथों में पड़ 
अपनी किस्मत पर रोये जाता है 
क्योंकि जज्बा ना अमरीका सा पाता है 
जो दुश्मन के घर में घुस उसे मार गिराता है 
ऐसी जांबाजी की मिसाल ना दे पाता है 
बस कुछ लालचियों की भेंट चढ़ा जाता है 
ये कैसा अजब तमाशा है 
जहाँ बाड़ ही मेड को खाती है 
इसलिए ये ना  हो- हल्ला मचाते हैं 
बस 
वो  सुपरवूमैन कहलाती हैं 
वो शक्तिशाली कहलाते है


(फ़ोटो : साभार गूगल )

बृहस्पतिवार, 2 मई 2013

क्यूँकि सायों की मोहब्बत के मौसम नहीं हुआ करते

वो कौन सा जन्म था
वो कौन सी महफ़िल थी
वो कौन सा खुदा था 
वो कौन सी दुनिया थी
मेरे हमनशीं 
भरभराता हुआ आकाश जब 
तेरे दामन में सिमट गया था
एक टुकड़ा मेरी रूह का
वहीँ तेरे पाँव में छुप गया था
कोई वादा नहीं किया था
कोई जलज़ला नहीं आया था
कोई बिजली नहीं गिरी थी
कोई रुका हुआ फैसला नहीं हुआ था
फिर भी कायनात में 
एक चाँद के पहलू में 
दूजा चाँद उग आया था 
किसी खुदगर्ज़ मौसम की ताबीर बनकर
आज भी उसी खुदगर्ज़ मौसम का 
एक टुकड़ा फिर से 
इस जन्म में 
इस सुलगते मौसम में
इस ठहरे पल में
इस रूह की गुंजन में
इस सांस के स्पंदन में
अधखिले गुलाब सा उग आया है
और तुम जानते हो ना
मुझे अधखिले गुलाबों की महक कितनी अच्छी लगती है
बिल्कुल मिटटी पर गिरी बूँद की सौंधी सी खुशबू की तरह
जानती हूँ ना
गर खिल जायेगा गुलाब तो
सबकी निगाह में आ जायेगा
मगर अधखिला गुलाब तो सिर्फ मेरी नज़र को भायेगा
हे ............मेरे गुलाब में अपनी ओस भर दो और उसे जीवंत कर दो ना 
उसी युग की तरह
उसी जन्म की तरह
उसी झील में ठहरे हुए चाँद की तरह 
तुम्हें पता है ना .........
मुझे झील में ठहरा चाँद देखना कितना भाता है
क्योंकि जानती हूँ
कसकों को करार जल्दी नहीं आता है ...........
शायद तभी 
तुमसे ये गुजारिश की है
जो अधूरी ख्वाहिश थी 
उसने आज ये जुर्रत की है
मिटा दो आज खिंची हुई उस रेखा को
और ले चलो उस पार 
जहाँ चाँद के बगल में बैठा दूजा चाँद हमारे इंतजार में है 
उसका इंतजार ही मुकम्मल कर दो ना ..........आज बस इस पल को जी लो ना 
बेमौसमी बरसातों पर कभी तो भरोसा कर लो ना ..........ओ सनम !
क्यूँकि सायों की मोहब्बत के मौसम नहीं हुआ करते 

रविवार, 28 अप्रैल 2013

अपेक्षाओं के सिन्धु

सुनो 
अपनी अपेक्षाओं के सिन्धुओ पर 
एक बाँध बना लो 
क्योंकि जानते हो ना 
सीमाएं सबकी निश्चित होती हैं 
और सीमाओं को तोडना 
या लांघना सबके वशीभूत नहीं होता 
और तुम जो अपेक्षा के तट पर खड़े 
मुझे निहार रहे हो 
मुझमे उड़ान भरता आसमान देख रहे हो 
शायद उतनी काबिलियत नहीं मुझमें 
कहीं स्वप्न धराशायी न हो जाए 
नींद के टूटने से पहले जान लो 
इस हकीकत को 
हर पंछी के उड़ान भरने की 
दिशा , गति और दशा पहले से ही तय हुआ करती है 
और मैं वो पंछी हूँ 
जो घायल है 
जिसमे संवेदनाएं मृतप्राय हो गयी हैं 
शून्यता का समावेश हो गया है 
कोई नवांकुर के फूटने की क्षीण सम्भावना भी नहीं दिखती 
कोई उमंग ,कोई उल्लास ,कोई लालसा जन्म ही नहीं लेती 
घायल अवस्था , बंजर जमीन और स्रोत का सूख जाना 
बताओ तो ज़रा कोई भी आस का बीज तुम्हें दिख रहा है प्रस्फुटित होने को 
ऐसे में कैसे तुम्हारी अपेक्षा की दुल्हन की माँग सिन्दूर से लाल हो सकती है .......ज़रा सोचना !!!

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

गलती से एक नज़र इधर भी करिये :)

आदर्श नगर अपने क्षेत्र में पहली बार कविता पाठ करने का मौका मिला जिसका भी अपना ही मज़ा है…………21-4-2013 को  स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं पुण्यतिथि और नव संवत्सर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रसिद्ध मंचीय कवियों में कवि विनय विनम्र , महेन्द्र शर्मा, अनिल रघुवंशी , बलजीत कौर तन्हा , रसिक , सत्यवान आदि  के साथ मंच साझा करने का अपना ही अनुभव रहा जिसे बयान करना मुश्किल है …………राजीव तनेजा जी की शुक्रगुजार हूँ जो उन्होने इस कार्यक्रम का विडियो बनाकर यू-ट्यूब पर डाल दिया उनके साथ बलजीत जी ने भी हमारी हौसला अफ़ज़ाई की और यहाँ आकर मान बढाया ।



गर आप सुनना चाहते हैं तो इस लिंक पर सुन सकते हैं 

https://www.youtube.com/watch?v=hZcMlW9bbAA


https://www.youtube.com/watch?feature=player_detailpage&v=hZcMlW9bbAA



अजब बात रही सुबह एन डी टीवी के एक कार्यक्रम "हम लोग " में जाना हुआ और शाम को अपने क्षेत्र में ………सुबह का कार्यक्रम भी यहाँ उपलब्ध है :


http://www.ndtv.com/video/player/hum-log/video-story/272092


सोमवार, 22 अप्रैल 2013

इन्साफ हो जायेगा

माँ बचाओ बचाओ 
कहना चाहा मैने
मगर मूँह  बंधा था मेरा माँ 
मैं रो रही थी माँ 
तुम्हें आवाज़ देना चाह  रही थी माँ 
पता नहीं माँ 
वो बुरे अंकल ने 
मेरे कपडे उतार दिए 
मुझे काटा  , नोंचा , मारा 
पता नहीं क्या क्या किया माँ 
मुझे बहुत दर्द हुआ माँ 
मैं बोल नहीं सकती थी 
मुझे अब भी दर्द हो रहा है माँ 
मुझे भूख लगी थी माँ 
मैं तुम्हें बुला नहीं सकती थी माँ 
बुरे अंकल ने मुझे बहुत मारा  माँ 
वो बहुत बुरे हैं माँ 
होश में आने पर 
जब कुछ बोल सकने लायक हुयी 
तब बिलख बिलख  कर , सिसक सिसक कर , तड़प तड़प कर 
जब उस नन्ही जान ने 
खुद पर गुजरा वाकया बयां किया 
और बेटी की मार्मिक व्यथा सुन 
पिता ने जैसे ही सिर पर हाथ धरा 
सहम गयी मासूम हिरनी सी 
आँखों में दहशत का पाला  उभर आया 
और चेतना शून्य हो बिस्तर पर लुढ़क गयी 
आह ! किस मर्मान्तक पीड़ा से , किस वेदना से 
वो मासूम गुजरी होगी 
कि  नन्ही जान ने पिता के 
स्नेहमयी स्पर्श से भी सुध बुध खो दी 
और गश खाकर गिर पड़ी 
ज़रा सोचना हैवानों , दरिंदों 
कैसे न तुम्हारा कलेजा कांपा 
और कैसे इस देश का इन्साफ न अब तक जागा 
और क्यों तुम कानूनी दांव पेंच फंसाते हो 
क्यों नहीं इन दुर्दांत भेड़ियों को फांसी लगाते हो 
जो सीधा सन्देश पहुँच जाए 
कि  अब ना कोई बलात्कारी बच पायेगा 
जैसे ही पकड़ा जाएगा 
तुरंत फांसी  पर चढ़ाया जाएगा 
गर ऐसा अब तक किया होता 
तो मासूम गुडिया का ना  ये हश्र हुआ होता 
जिसने पांच वर्ष की उम्र में 
वो ज़हर पीया है 
वो वेदना सही है जो मौत से भी बदतर होती है 
जो नन्ही जान न इसका कोई अर्थ समझती है 
जो बस बिलख बिलख कर 
बेसुध होती रही होगी 
मगर बलात्कारी के चंगुल में फंसी 
पिंजरे के मैना सी तड़पती रही होगी 
मगर उस हैवान पर ना असर हुआ होगा 
तो अब तो जागो ओ देश के कर्णधारों 
कम से कम दूसरी 
मासूम गुडियों और निर्भयाओं 
को तो बचा लो 
कुछ तो ऐसा कर डालो 
जो ऐसा जुर्म करने से पहले 
बलात्कारी की रूह काँप जाए 
दो ऐसा दंड उसे कि 
आने वाली पीढ़ी भी सुधर जाए 
अब मत कानून की पेचीदगियों में उलझो 
अब न जनता को और भरमाओ 
ओ देश के कर्णधारों 
बस एक बार उस गुडिया में 
अपनी बेटी , पोती या नातिन का 
चेहरा देख लेना तब कोई निर्णय लेना 
कम से कम एक बार तो 
अपने जमीर को जगाओ 
और उस बलात्कारी दरिन्दे को 
जनता को सौंप जाओ 
इन्साफ हो जायेगा 
इन्साफ हो जायेगा 
इन्साफ हो जायेगा 

रविवार, 21 अप्रैल 2013

मत कहना दिलदार दिल्ली अब



मत कहना दिलदार दिल्ली अब 
कहो शर्मसार दिल्ली दागदार दिल्ली 
ना जाने और कितने देखेगी व्यभिचार दिल्ली 
ना जाने और कितनी निर्भया गुडिया की 
करेगी इज़्ज़त तार तार दिल्ली


काश इतना कहने से इति हो जाती 
मगर यहाँ न कोई फर्क पड़ता है 
उनका जीवन तो पटरी पर चलता है 
जो सत्ता में बैठे हैं 
कुर्सियों को दबोचे बैठे हैं 
उनका दिल , मन और आत्मा सब 
कुर्सी के लिए ही होता है 
बस कुर्सी बची रहे 
फिर चाहे जनता कितनी पिसती रहे 
फिर चाहे कितने आन्दोलन होते रहे 
दबाव पड़े तो एक दो क़ानून बना देंगे 
उसके बाद फिर कुम्भ्करनी नींद सो लेंगे 
मगर आरोपियों को न सजा देंगे 
बस क़ानून बनाने के नाम पर 
जनता की भावनाओं से खेलेंगे 
जैसे बच्चे को कोई लोलीपोप दिखता हो 
जैसे कोई दूर से चाँद दिखता हो 
बस इतना ही इन्होने करना होता है 
बाकि जनता ने ही पिसना होता है 
जनता ने ही मरना होता है 
उस पर मादा होना तो गुनाह होता है 
फिर क़ानून हो या प्रशासन 
उनके लिए तो वो सिर्फ ताडन की वस्तु होती है 
क्या यही मेरे देश की सभ्यता रह गयी है ?
क्या यही नारी की समाज में इज्ज़त रह गयी है ?
जो चाहे जब चाहे जैसे चाहे उससे खेल सकता है 
और विरोध करने पर उसी का शोषण हो सकता है 
आह ! ये कैसा राजतन्त्र है , ये कैसा लोकतंत्र है 
जहाँ न नारी महफूज़ रही 
दो दिन पहले जहाँ कन्याएं पूजी जा रही थीं 
वहां अगले दिन कन्याएं ही अपमानित, तिरस्कृत की जा रही थीं 
ये कैसी दोगली नीति है 
ये कैसा गणतंत्र हैं 
ये कैसे देश के नुमाइन्दे हैं 
जिन्हें हमने ही शीर्ष पर चढ़ाया था 
अपनी रक्षा की डोर सौंपी थी 
आज कान बंद किये बैठे हैं 
क्या तब तक न सुनवाई होगी 
जब तक यही विभत्सता ना उनके घर होगी 
सोचना ज़रा गर ऐसा हुआ तो 
इस बार जनता न तुम्हारा साथ देगी 
जिस दिन ये दरिंदगी तुम्हारे आँगन होगी 
देखने वाली बात होगी 
कैसी बिजली तुम पर गिरेगी 
क्या तब भी यूं ही चुप बैठ सकोगे ?
क्या तब भी आँखें मूँद सकोगे ?
क्या तब भी कान बंद रख सकोगे ?
अरे जाओ भ्रष्ट कर्णधारों 
उस दिन तुम्हारा आकाश फट जाएगा 
हर क़ानून तुम्हारे लिए बदल जाएगा 
और आनन् फानन अपराधी फांसी पर भी चढ़ जायेगा 
बस यही फर्क है तुम्हारी सोच में तुम्हारे कार्यों में 
पता नहीं कैसे आईना देख लेते हो 
कैसे खुद से नज़र मिला लेते हो 
कैसे न शर्मसार होते हो 
जब जनता की रक्षा के लिए न तत्पर होते हो 
सिर्फ कुर्सी की चाहत , राजनीती की रोटी 
ही तुम्हारा धर्म बन गया है 
मगर सोचना ज़रा कभी ध्यान से 
गर जनता का मिजाज़ पलट गया तो ............?
सुधर जाओ अब भी 
बदल डालो अपने को भी 
एक बार सच्चे मन से 
हर मादा में बहन बेटी की तस्वीर देखो 
आज हर गुडिया , निर्भया 
तुम्हारी और ताक रही है 
इन्साफ की तराजू पर तुमको तौल रही है 
फिर देखना खून तुम्हारा खौलता है या नहीं 
जिस न्याय को मिलने में देर हो रही है 
वो मिलता है या नहीं 
बस एक बार तुम जाकर गुडिया को देख आना 
और आकर गर खाना खा सको 
सुख की नींद सो सको 
एक पल चैन से रह सको 
तो बता देना ....................
क्योंकि सिर्फ कानून बनाने से न कुछ होता है 
जब से जरूरी तो उस पर अमल करना होता है 
गर समय रहते ऐसा किया होता 
तो शायद गुडिया का न ये हश्र हुआ होता 
कुछ तो वहशियों पर क़ानून के डर का असर हुआ होता 

बृहस्पतिवार, 18 अप्रैल 2013

हमारी ज़िन्दगी में भी ये लम्हा आ ही गया


शोभना सम्मान समारोह---- 2012  आयोजक सुमित प्रताप सिंह , संगीता सिंह तोमर और उनकी माता जी श्रीमति शोभना जी के तत्वाधान में सम्पन्न हुआ । फ़ेसबुक और ब्लोग पर कुछ विषय दिये गये जिन पर अपनी अपनी कवितायें भेजनी थीं और हम ने भी अपनी रचना वहाँ भेजी थी जिसके आधार पर शोभना काव्य सृजन सम्मान --2012 से हमें भी सम्मानित कर सुमित ने हमारा मान बढाया जिसके हम हृदय से आभारी हैं । ब्लोगजगत की मशहूर हस्तियों से मिलना , उन्हें ब्लोगर सम्मान से सम्मानित करना , साथ मे पत्रकारिता और तकनीकी सम्मान से भी कुछ हस्तियों को सम्मानित करना एक गौरवमयी क्षण थे । इसी के अन्तर्गत शोभना काव्य सृजन सम्मान से हमें और बाकी हस्तियों को सम्मानित किया गया जिसमें मुकेश कुमार सिन्हा, पूनम माटिया, ज्योतिर्मयी पंत जी आदि शामिल थे । साथ ही ब्लोग रत्न सम्मान के अन्तर्गत जेन्नी शबनम, उपासना सियाग , मीना , अन्नपूर्णा जी आदि को शामिल किया गया। एक बेहद अनौपचारिक माहौल में औपचारिकताओं को पूर्णता प्रदान करता आयोजन बेहद सुखद था जिसमें सोशल मीडिया के रोल और उसमें हिन्दी के महत्त्व पर भी गोष्ठी का आयोजन किया गया जिस पर उपस्थित माननीय अतिथिगणों ने अपने अपने वक्तव्य रखे और माना कि आज सोशल मीडिया ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है जिसे अपनी पहचान को और पुख्ता करने के लिये कुछ आवश्यक कदम और उठाने होंगे जिनसे सकारात्मकता के साथ संदेशपूर्ण माहौल भी बने और सोशल मीडिया अपनी उपस्थिति पूरी शिद्दत के साथ दर्ज कर सके । सुमित प्रताप सिंह ने पुलिस महकमे मे कार्यरत होते हुये भी जिस संजीदगी से ये आयोजन किया और उसे अंजाम तक पहुँचाया वो बेहद सराहनीय है । जिस प्रकार पहली बार उनके द्वारा ये आयोजन किया गया और उसे एक दिशा प्रदान की गयी वो बधाई और शुभकामनाओं के हकदार हैं कि आगे भी उनके द्वारा इसी तरह के अन्य आयोजन भी होते रहेंगे और उन्हें भी गरिमा मिलती रहेगी।

 राजीव तनेजा जी का हार्दिक आभार व्यक्त करती हूँ जिन्होंने इस आयोजन की खूबसूरती को अपने कैमरे में संजो कर हमारी यादों और हमारी ज़िन्दगी के अनमोल क्षणों को सुखकर बना दिया





























 इस आयोजन में हमारी जिस कविता के कारण हमें सम्मान मिला वो ये थी :


मुझे इंतज़ार रहेगा .........ओ समाज के ठेकेदारों !
*************************************



स्त्री पुरुष

विवादित स्वरुप
सदा से दो गोलार्ध
होता रहा हमेशा
संवेदनाओं का उत्खनन
नहीं हो पायी पहचान 
ना स्त्री ने जाना 
ना पुरुष ने जाना
बस लकीर के फकीर बने
दोनों चलते रहे 
अपने अपने हाशियों पर 
साथ होते हुए भी पृथक 
स्त्री की पवित्रता बनी उसकी देह
आखिर क्यों ?
क्या वो पुरुष जो हुआ दिग्भ्रमित
या जिसने जान बूझकर 
खुद को सौंप दिया 
किसी अनजान बिस्तर को 
क्या वो ना हुआ अपवित्र
फिर ये दोहरा अवलोकन क्यों ?
आचार विचार , मान्यताएं , रस्मों - रिवाज़ 
होते तो दोनों के लिए ही हैं
क्योंकि समाज कभी एक से नहीं बनता
और जब सह अस्तित्व की बात हो 
तो क्यों मापदंड बदल जाते हैं ?
क्या स्त्री का जन्म कोख से ना होकर
किसी श्राप से हुआ है 
जो सिर्फ वो ही उस दुराचार की शिकार बने 
क्या पुरुष जो खुद जान बूझकर 
खाई में उतरा है 
उसका जन्म ही सार्थक है 
क्योंकि वो पुरुष है 
इसलिए सब उसे माफ़ है 
क्यों हैं ये दोहरे मापदंड?
क्यों भरी गयी स्त्री के मन में ये आत्मग्लानि ?
क्यों हर दंश उसके हिस्से में ही आया ?
क्यों नहीं उसे भी समाज की एक 
बराबर की इकाई स्वीकारा गया ?
कहीं ना कहीं , कोई ना कोई तो कारण रहा होगा
रही होगी कहीं कोई दोषपूर्ण व्यवस्था 
जिसने स्त्री को दोयम दर्जा दिया होगा
जबकि शास्त्रों में तो स्त्री को सबसे ऊंचा दर्जा मिला है
फिर क्यूँ उसे देह ही समझा गया है
और भोग्या की छवि से नवाज़ा गया है 
जो कर्म एक के लिए अमान्य है 
वो दूजे के लिए कैसे स्वीकार्य हुआ 
अब ये विश्लेषण करना होगा 
एक नया शास्त्र गढ़ना होगा
और दोषपूर्ण व्यवस्था को बदलना होगा 
तभी स्त्री पुरुष 
विवादित स्वरुप ना रहकर
सह अस्तित्व के महत्त्व को सार्थक दर्शन दे पाएंगे 
और एक नए सभ्य समाज का निर्माण कर पाएंगे
 जैसे 
पुरुष की देह उसकी पवित्रता का मापदंड नहीं
वैसे ही स्त्री की देह भी उसकी पवित्रता का मापदंड नहीं
क्योंकि 
दोनों देह से इतर 
अपने अपने व्यक्तित्व से
आलोकित इन्सान हैं 
जिनके हर कर्त्तव्य और अधिकार समान हैं 
फिर कैसे देह के मापदंड पर पूरा चरित्र कसा जा सकता है 
हो कोई उत्तर तो जवाब देना 
मुझे इंतज़ार रहेगा .........ओ समाज के ठेकेदारों !