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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

यही है मेरा कल

यूँ तो भूलने की आदत बरसों पहले शुरू हो गयी थी जो अब इतनी पक गयी है कि उसके असमय बाल सफ़ेद हो गए हैं . आज इन्हें रंगने का कोई रंग भी नहीं बना बाज़ार में जो जाएँ खरीदें और रंग दें . अब इन्होने तो सोच लिया है इसका तो जनाजा निकाल कर ही रहना है तभी तो जब चाहे जहाँ चाहे दगा दे जाती है खासतौर से तब जब किसी से बात करती हूँ  शब्द नदारद . दिमाग में होते हुए भी अदृश्य . एक अजीब सी बेचैनी से घिर उठती हूँ .

यूँ आये दिन सबसे कहती हूँ मुझे याद नहीं रहता लेकिन सबके लिए वो भी महज एक साधारण बात है फिर चाहे भूलने की वजह से जाने कितनी महाभारत हुईं घर में लेकिन तब भी सबके लिए इसमें कुछ ख़ास नहीं तो मैं ही भला क्यों सोचूं कि मुझे कुछ हुआ है . ठीक हूँ , ऐसा तो उम्र के साथ होता ही है , सब कहते हैं , मान लेती हूँ . क्या सच में ऐसा होता है ? क्या ये किसी रोग का कोई लक्षण तो नहीं ? डरती हूँ कभी कभी . जब सोचती हूँ ऐसा न हो किसी दिन अपना नाम ही भूल जाऊँ , अपना घर , अपना पता और अपने रिश्ते . होता है कभी कभी आभास सा . जैसे भूल सा गयी हूँ सब कुछ . एक कोरा कागज़ बिना किसी स्मृति के . तब ? तब क्या होगा?

आवाज़े घोषणापत्र होती हैं जीवन्तता का तो  स्मृति उसकी धड़कन . बिना धड़कन के कैसा जीवन ? शून्य का पसर जाना तो ज़िन्दगी नहीं . विस्मृति से नहीं होंगे चिन्हित रास्ते . जानती हूँ . तो फिर क्या करूँ , कौन सा उपाय करूँ जो खुद को एक अंधी खाई में उतरने से बचा सकूँ .

न अब ये मत कहना लिख कर रखो तो याद रहता है क्योंकि तब भी याद रहना जरूरी है कि कहीं कुछ लिखा है . गाँठ मार लो पल्लू को , चुन्नी को या चोटी को मगर क्या करूँ गाँठ तो दिख जाती है मगर याद तब भी धोखा दे जाती है आखिर ये बाँधी क्यों ?

एक अजीब सी सिम्फनी है ज़िन्दगी की . जब यादों में उगा करते थे सुरमई फूल तब सोचा भी नहीं था ऐसा वक्त आएगा या आ सकता है . आज लौटा नहीं जा सकता अतीत में लेकिन भविष्य के दर्पण से मुँह चुराने के अलावा कोई विकल्प नज़र नहीं आता .

वो मेरा कौन सा वक्त था ये मेरा कौन सा वक्त है . दहशत का साया अक्सर लीलता है मुझे . यूं उम्र भर विस्मृत करना चाहा बहुत कुछ लेकिन नहीं हुआ . मगर आज विस्मृति का दश झकझोर रहा है . आज विस्मृति के भय से व्याकुल हैं मेरी धमनियाँ और उनमे बहता रक्त जैसे यहीं रुक जाना चाहता है . आगे बढ़ना भयावह समय की कल्पना से भी ज्यादा भयावह प्रतीत हो रहा है .

मैं बैठी हूँ . कहाँ नहीं मालूम . शायद कोई कमरा . कोई नहीं वहां . शायद मैं भी नहीं . एक शून्य का शून्य से मिलन . जहाँ होने को सूर्य का प्रकाश भी है और हवा का स्पर्श भी मगर नहीं है तो मेरे पास उसे महसूसने की क्षमता . शब्द , वाक्य सब चुक चुके . जोर नहीं दे सकती स्मृति पर . जानती जो नहीं जोर देना होता है क्या ? ये एक बिना वाक्य के बना विन्यास है जहाँ कल्पना है न हकीकत . वस्तुतः अंत यहीं से निश्चित हो चुका है क्योंकि अवांछित तत्व बेजान वस्तु अपनी उपादेयता जब खो देते हैं , उनके सन्दर्भ बदल जाते हैं . शायद यही है मेरा कल जो आज मुझसे मिलवा रहा है . भविष्यवक्ता तो नहीं लेकिन बदलते सन्दर्भ बोध करा जाते हैं आने वाली सुनामियों का .

स्मृति ह्रास तो विलाप का भी मौका नहीं देता इसलिए शोकमुक्त होने को जरूरी था ये विधवा विलाप . समय अपनी चाल चलने को कटिबद्ध है .

बुधवार, 7 सितंबर 2016

एक प्रतिक्रिया ऐसी भी



जैसे दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम
वैसे ही किताब किताब पर लिखा होता है पढने वाले का नाम

ऐसा ही मेरे उपन्यास अँधेरे का मध्य बिंदु के साथ हुआ जब जन्माष्टमी पर एक फ़ोन आया .

हैलो , क्या मैं वंदना  गुप्ता जी से बात कर सकता हूँ
जी मैं बोल रही हूँ
(थोडा हिचकिचाते हुए) मैं अवधेश बोल रहा हूँ
मैम (फिर से हिचकिचाते हुए बोले) आप की एक बुक मुझे अपनी दोस्त के माध्यम से मिली
कौन सी ?
अँधेरे का मध्य बिंदु
(मैं अलर्ट) जी , किस दोस्त के ?
देखिये, न मैं आपको जानता हूँ न आप मुझे लेकिन मैंने आपकी ये किताब पढ़ी तो मुझे लगा आपसे बात करनी चाहिए .
जी , आपको किस दोस्त से मिली ?
आपने उसे भेंट की थी
किसे ?
जी खनक
खनक नाम की तो मेरी कोई दोस्त नहीं है
आपने आर जे खनक को दी थी
ओह , हाँ , बिग ऍफ़ एम वाली खनक
जी जी , वो ही
तो बताइए आपको कैसी लगी ?
बहुत बढ़िया . आपके इस उपन्यास से मैंने बहुत कुछ सीखा . मैं भी इसी दौर से गुजर रहा हूँ . मुझे ऐसा लगा  रिश्ता कोई भी हो उसे एक स्पेस की जरूरत होती है तभी निभ सकता है . फिर वो लिव इन हो या शादी का .
जी बिल्कुल
जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारा जाए . उस पर अपने आपको थोपा न जाए . फिर  तो रिश्ता ब्रह्माण्ड के अंत तक निभ सकता है . मुझे तो पढ़कर ऐसा ही लगा .
बिल्कुल सही पकडे हैं आप . यही कहने की कोशिश की है जो जैसा है न तो उसे बदलें न उस पर खुद को थोपें तभी रिश्ते निभ सकते हैं ,
जानती हैं , खनक मेरी पत्नी हैं
अरे वाह
और मैं उसे ये किताब कई बार पढ़ते देखता तो पूछता आखिर ऐसा इसमें है क्या ? और फिर जब मैंने इसे पढ़ा तो अपने आपको फ़ोन करने से रोक नहीं पाया
मैं शुक्रगुजार हूँ जो आपने अपनी प्रतिक्रिया दी
मैंने काफी कुछ सीखा इससे . वो जो वकील वाला हिस्सा है उससे भी . वैसे अच्छा नहीं लगता इतनी बात कर लूं लेकिन अपना पूरा परिचय न दूँ
जी बताइए
मैं अवधेश श्रीवास्तव हूँ . आपने सुना हो कभी रेडियो सिटी पर . आर जे अवधेश .
अरे वाह , ये तो बढ़िया है इसी बहाने आप से बात करने का मौका मिला
उपन्यास का जब अंत आता है तो यूं लगा जैसे हम वहीँ बैठे हैं और सुन रहे हैं शीना की कहानी उसकी जुबानी . आँखों के आगे चित्र साकार हो उठा .
ये मेरा सौभाग्य है जो आपको पसंद आया .
वादा तो नहीं करता लेकिन यदि कभी आपको बुलाएं तो आप आ सकेंगी रेडियो सिटी पर ?
जी जरूर
फिर हम इस पर और काफी सारी बात करेंगे
जी मैं खुद चाहती हूँ आज की युवा पीढ़ी जो लिव इन में रह रही है या रहने की सोच रही है उस तक ये बात पहुंचे . अपने जीवन को बर्बाद न करें वो . जैसा कि आजकल पेपर में देखिये तो कहीं अलगाव तो कहीं मर्डर या कहीं आत्महत्या ही हो रही हैं ऐसे संबंधों में .
जी , मैं तो खुद ऐसे रिलेशन में हूँ
यानि आप भी लिव इन में रह रहे हैं
नहीं मैं शादी शुदा हूँ . दस साल हो गए और हमारी अरेंज्ड मैरिज थी . लेकिन इससे मुझे सीखने को मिला कि लिव इन हो या शादीशुदा जीवन सब का अपना अस्तित्व होता है . उसके अस्तित्व को बदले बिना ही उसको स्वीकारना . तभी रिलेशन लम्बे चल सकते हैं .
जी , आपसे एक रिक्वेस्ट है
जी कहिये
आप फेसबुक पर हैं
हाँ
तो वहां ही चाहे हिंदी में चाहे इंग्लिश में अपनी प्रतिक्रिया लिख कर दे सकते हैं तो दे दीजिये . आपकी बात सब तक पहुंचे . क्योंकि आपकी प्रतिक्रिया एक विशुद्ध पाठकीय प्रतिक्रिया है जो मेरे लिए अनमोल है ,
जी जरूर लिखूँगा
शुक्रिया
अच्छा मैम
आपका बहुत वक्त लिया ,बाय
बाय

ये थी बात जो आज जन्माष्टमी पर हुई .अब मैंने सोचा वो जाने कब अपनी प्रतिक्रिया लिख कर दें और जरूरी नहीं दे भी पायें . कहना मेरा फ़र्ज़ बनता था . हर कोई अपनी ज़िन्दगी में बिजी है तो क्यों न मैं ही सारी बातचीत पढवा दूँ और खुद भी सहेज  कर रख लूं क्योंकि ये भी तो प्रतिक्रिया ही है फिर क्या जरूरी हो कि वो लिखित ही हो . मौखिक प्रतिक्रिया का भी अपना महत्त्व है . 

 
और फिर मेरे जैसी नवोदित के लिए तो हर प्रतिक्रिया महत्त्वपूर्ण है जो मेरे लेखन को दिशा देगी क्योंकि एक अंजान पाठक न आपसे न आपके व्यक्तित्व से प्रभावित होता है . वो तो सिर्फ आपके लेखन से प्रभावित होता है और वो ही एक सबसे उत्तम प्रतिक्रिया होती है .

बुधवार, 31 अगस्त 2016

ये इश्क नहीं तो क्या है ?

ये रात का पीलापन
जब तेरी देहरी पर उतरता है
मेरी रूह का ज़र्रा ज़र्रा
सज़दे में रुका रहता है

खामोश परछाइयों के खामोश शहरों पर
सोये पहरेदारों से गुफ्तगू
बता तो ज़रा , ये इश्क नहीं तो क्या है ?

चल बुल्लेशाह से बोल
अब करे गल(बात)खुदा से

नूर के परछावों में अटकी रूहें इबादतों की मोहताज नहीं होतीं

शनिवार, 20 अगस्त 2016

खरोंचों के इतिहास

ज़िन्दगी की बालकनी से देखती हूँ अक्सर
हर चेहरे पर ठहरा अतीत का चक्कर

ये चेहरे पर खिंची गहरी रेखाएं गवाह हैं
एक सिमटे दुबके भयभीत जीवन की

ज़िन्दगी के पार ये सब कुछ है
मगर नहीं है तो बस 'ज़िन्दगी' ही

मज़ा तब था जब याद रहता
एक खुशगवार मौसम आखिरी साँस पर भी
होती तसल्ली
जी लिए ज़िन्दगी जी भर के

खरोंचों के कोई इतिहास नहीं हुआ करते
रुदाली का तमगा यूँ ही नहीं मिला तुझे ... ए ज़िन्दगी 

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

मंतव्य ...मेरी नज़र से




मंतव्य पत्रिका का दूसरा विशेषांक पाँच लम्बी कहानियों का संकलन है . मंतव्य का क्या मंतव्य है ये जानने के लिए उन कहानियों से गुजरना जरूरी है . पहली कहानी ‘ललिता मैडम’ लेखक सूरज प्रकाश जी द्वारा लिखित है . ललिता मैडम की शख्सियत ही कहानी का मूल है . आज के वक्त में जब कोई स्त्री यदि पुरुषोचित रवैया अपना लेती है तो कटघरे में खड़ी हो जाती है और ऐसा ही इस कहानी में हुआ है . यहाँ किसी पात्र से कोई सहानुभूति नहीं क्योंकि सब एक दूसरे से अपने मतलब से जुड़े हैं . लेखक ने सिर्फ हर पात्र को रखा भर है और सोचने का काम पाठक पर छोड़ दिया है . तीन स्त्री पात्र ललिता मैडम , जूही और मंजू . तीनो की अपनी जरूरतें . जब आप अपनी जरूरत से किसी से जुड़ोगे तो जरूरी नहीं जैसा आप चाहते हैं सब वैसा ही मिले . चकाचौंध कई बार आँख बंद कर देती है ऐसा ही जूही के साथ हुआ . बेशक बाद में उसे पछतावा होता है और वो खुद को अलग कर लेती है लेकिन दोष सिर्फ मैडम पर नहीं मढ़ा जा सकता क्योंकि वो खुद जुडी थी न कि मैडम ने उसे फ़ोर्स किया तो कैसे दोष दिया जा सकता है . आखिर मैडम का एक लाइफ स्टाइल है वो उसे फॉलो करती है और चाहती है जैसा वो चाहे सब उसके मन के अनुसार हो तो बुराई क्या है . आज के वक्त में एक बिज़नस वीमेन वो सब कर सकती है जो पुरुष करता है तो भला उसके लिए दोष कैसे दिया जा सकता है फिर वो उसका दिखावा हो या शारीरिक जरूरत या फिर बिज़नस से सम्बंधित कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय . ललिता मैडम के रहने का एक अपना तरीका है जिसमे यदि आप फिट हों तो उनके साथ चल सकते हो और यदि नहीं तो बाहर का रास्ता आपके सामने हैं और ऐसा ही जूही के साथ होता है . वो खुद को उस माहौल में फिट नहीं पाती और बाहर आ जाती है . बेशक कहानी में फेसबुक के माध्यम से मिले हैं करैक्टर फिर वो जूही हो या ललिता मैडम या फिर सतीश जो कि ललिता मैडम के शौक का माध्यम बना . बेशक वो भी अपनी जरूरत से ही जुड़ा उससे और फिर अलग भी हुआ तो क्या हुआ . कल तक यही सब कुछ एक पुरुष करता था तो कभी किसी को नहीं अखरा क्योंकि अक्सर कहा जाता रहा ये तो पुरुष की आदत होती है लेकिन यदि वो ही कार्य एक सक्सेसफुल स्त्री करे तो प्रश्नचिन्ह के घेरे में खड़ी हो जाती है . यहाँ ललिता मैडम बहुत प्रैक्टिकल लेडी है जो आने वाले का स्वागत तो करती ही है तो जाने वाले को रोकती भी नहीं लेकिन उससे रिलेशन पूरी तरह ख़त्म न करके वापस आने का आप्शन भी रखती है जो यही दर्शाता है वो यूं ही नहीं एक सक्सेसफुल बिज़नेस वूमेन है . यही होती है वक्त की मांग किसी से भी सम्बन्ध एकदम ख़त्म मत करो क्योंकि यदि ख़त्म कर दिए तो हमेशा के लिए रास्ता बंद हो जाता है और वो उसे पूरी तरह जीती है . समझौता उसकी डिक्शनरी में नहीं है . अपनी शर्तों पर जीवन जीना ही उसका ध्येय है और वो जानती है उसे कैसे पाना है . बाकि जूही का किरदार तो आम किरदार ही है जो अक्सर स्त्रियों का होता है .जो अपनी अस्मिता और स्वाभिमान की कीमत पर कोई भी समझौता नहीं करती हैं .और मंजू एक अपोरचुनिस्ट है वो जानती है कैसे अपना काम निकालना है फिर उसके लिए समझौते ही क्यों न करने पड़ें . तीन स्त्री किरदार लेकिन तीनो का अपना जीवन जीने का अपना दर्शन है . 

संग्रह की दूसरी कहानी ‘स्टील कंपनी’ लेखक विशम्भर मिश्रा द्वारा लिखित है . स्टील कंपनी के माध्यम से लेखक ने राजनीति और कंपनियों की सांठ गाँठ से कैसे जमीनों के सौदे किए जाते हैं उसका कच्चा चिटठा उपलब्ध है . वैसे इस कहानी को यदि उपन्यास के रूप में लाया जाता तो ज्यादा बेहतर था जैसे अकाल में उत्सव उपन्यास के माध्यम से पंकज सुबीर ने न केवल किसानों की समस्या को उकेरा है बल्कि साथ साथ प्रशासन और राजनीति के मुंह पर भी तमाचा जड़ा है . यदि इस तरह इसकी प्रस्तुति होती तो ज्यादा असरकारक होती . कुछ ऐसा ही चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आवां’ का परिदृश्य है तो जहाँ इतना विस्तार देना हो वहां वो कहानी नहीं रहती बल्कि उसे उपन्यास की श्रेणी में ही लेकर आना चाहिए . बाकि तो कैसे ठेके लिए जाते हैं , कैसे जमीन हडपी जाती हैं और कैसे एक दूसरे के प्रति भोले लोगों को भड़काया जाता है , कैसे पुलिस और प्रशासन की मिली भगत से निर्दोषों पर अत्याचार होता है सबका कच्चा चिटठा है ये कहानी जो एक मुकम्मल कहानी तो नहीं बन पायी क्योंकि जिसका कोई अंत नहीं वो मुकम्मल कहानी तो नहीं हो सकती . लेकिन इस कहानी के माध्यम से बहुत से गहरे राजों से पर्दा उठता है वहीँ कोयला घोटाले पर भी प्रकाश डालती चलती है ये कहानी , जो कि पिछले सालों राजनीति का मुख्य केंद्र रहा . बात किरदारों की नहीं है क्योंकि ये किरदार हर जगह पाए जाते हैं बस नाम और चेहरे दूसरे होते हैं , बात है कैसे एक पूरा तंत्र सक्रिय किया जाता है तब जाकर कोई प्लांट लगता है या कहिये कोई उद्देश्य पूरा होता है , खरीद फरोख्त का एक पूरा ताना बाना बनाया जाता है मानो यही लेखक के कहने का प्रयास रहा हो . 

संग्रह की तीसरी कहानी ‘अपना खून’ विक्रम सिंह द्वारा लिखित है . एक छोटे से मुद्दे को कैसे घुमा कर कहा गया है ये इस कहानी को पढ़कर पता चलता है जिसमे जरूरत ही नहीं थी अनावश्यक चीजों को जोड़ने की . कहानी इतनी भर कि पहली पत्नी को बच्चा नहीं हो सकता तो पहाड़ की लड़की से शादी की जाती है और उससे भी एक के बाद एक दो लड़की होती हैं और तीसरा लड़का होते ही मर जाता है और उसके बाद वो माँ भी नहीं बन सकती तो उसके द्वारा दिया सुझाव कि वंश चलाने को एक लड़का गोद ले लेते हैं वो सोचने को मजबूर करता है जब उसकी पहली पत्नी ने भी यही आप्शन रखा था . आदमी के लिए अपना खून ही अपना होता है . कहानी इतनी सी लेकिन एक तरफ तो पहाड़ का सौन्दर्य और वहां के जीवन की दास्तान बताते बताते लेखक ईजा के जीवन तक पहुँच जाता है कैसे उसे सब कुछ मिला उसके लिए अंग्रेज राज भी शामिल हो जाता है जो कहानी को कहानी नहीं रहने देता क्योंकि यहाँ भी बात आती है यदि इतने किरदार और उनमें से सबकी यदि जीवन दास्तान कहनी है तो उसे उपन्यास की शक्ल दीजिये . लम्बी कहानी हो लेकिन विषय पर केन्द्रित हो वही पाठक मन तक पहुँचती है . 

चौथी कहानी ‘कूकर’ बलराज सिंह सिद्धू जी की है जो पंजाबी में लिखी गयी है और जिसका अनुवाद सुभाष नीरव जी ने किया है . ये कहानी वास्तव में कहानी के ढाँचे में फिट बैठती है . पूरे संग्रह में यदि कहानी कही जाए तो यही मुकम्मल कहानी है . कच्ची उम्र का राजू और जीती कहानी के मुख्य किरदार हैं . राजू एक युवावस्था की ओर अग्रसित लड़का है जो हाई सोसाइटी को बिलोंग करता है तो उसकी सोच भी वैसी ही होती है . लड़की उसके लिए हाथ के मैल की तरह ही है लेकिन साथ में कहीं न कहीं कुछ संस्कार बचे हैं उसमे जो अंत में जागृत हो उठते हैं. लेखक ने कहानी में पंजाब की समस्याओं आतंकवाद के बाद नशे की समस्या आदि पर प्रकाश तो डाला ही है साथ में वहां के गाँव , रहन सहन आदि का भी यथोचित वर्णन किया है . यहाँ बेशक राजू के माध्यम से उसकी उम्र के लड़के में लड़की के प्रति उठने वाले भावों को लेखक ने दर्शाया है मगर साथ ही जीती के माध्यम से मानो ये बताया है एक लड़की चाहे तो किसी के भी मन के भावों को परिवर्तित कर देती है . कहानी के अंत में जीती को उसके घर छोड़ने के दृश्य में कुत्तों के आतंक से बचने के लिए हॉकी स्टिक काम आती है लेकिन इंसान के अन्दर के कूकर के लिए रिश्ते की सोटी जब पड़ती है तभी वो अपने वहशीपन से बाहर आ पाता है . मानो कहानी के माध्यम से लेखक ने रिश्तों की गरिमा को न केवल बनाए रखा बल्कि बचाए भी रखा जब जीती उसे राजू वीरे के नाम से संबोधित करती है तो उसके अन्दर का कूकर निष्प्राण हो उठता है और मानवीयता इंसानियत जाग उठती है तो मन कहता है तूने ये वीरे शब्द की सोंटी पहले मारी होती तो ये हवस के कूकर जागृत ही नहीं होते मानो यहाँ लेखक ने एक उदाहरण रखा कि एक शब्द ही काफी होता है कभी कभी इंसानियत को जगाने के लिए , रिश्तों की मर्यादा को बनाये रखने के लिए . वहीँ मानो लेखक कहना चाहता है कितना ही उच्छ्रंखल लड़का क्यों न हो यदि उसे भी ऐसा कुछ कह दिया जाए तो वो भी रिश्ते की गरिमा समझता है और उसे तोडना उसके लिए संभव नहीं होता जैसा राजू के साथ होता है . शुरू से आखिर तक उसके मन में चलता कल्पनाओं का स्वप्न अंत में धराशायी हो उठता है लेकिन कल्पना में वो हर हद पार करने की जुर्रत करना चाहता है मानो इस माध्यम से हर मानव मन की कमजोरी पर लेखक ने प्रहार किया है . मानो लेखक कहना चाहता है शायद इसीलिए समाज में रिश्तों का निर्माण हुआ क्योंकि रिश्तों की मर्यादा ही इंसान को इंसान बनाए रखती है वर्ना तो वो स्वभावगत अन्दर से किसी कूकर से कम नहीं . 

अंतिम कहानी ‘बालकनी’ बांगला कहानीकार शिर्शेंदु मुखोपाध्याय जी द्वारा लिखित और शेष अमित द्वारा अनुवाद की गयी है . इस कहानी को पढ़कर याद आ जाता है वो ज़माना जब गुलशन नंदा और रानू के उपन्यास पढ़े जाते थे और वहां प्रेम की एक उच्चतम स्थिति दर्शायी जाती थी , दर्द होता था विरह होता था . ऐसा ही कुछ तो इस कहानी में भी है . इस कहानी में एक उपन्यास की पूरी संभावनाएं हैं . बेशक अन्य कहानियों की तुलना में काफी छोटी है ये कहानी लेकिन अपने कथ्य में पाठक मन तक पहुँचने की सामर्थ्य रखती है . किरदारों के माध्यम से मानो लेखक इंसान के मन में घुसपैठ करता है . हम कुछ भी करें उसे कोई जाने न जाने लेकिन हम जानते हैं हमने क्या किया है और अनचाहे ही एक अपराधबोध से ग्रस्त हो उठाते हैं खासतौर से तब जब हमने वो पा लिया जो चाहते थे और हमें लगे हमने ये किसी से छीना है क्योंकि वो किरदार हमेशा आपकी आँख के आगे रहे लेकिन एक शब्द भी न कहे . कोई गिला शिकवा नहीं बस एक बार उसे देखते रहने की चाहत भर में खुद को भी भुला बैठे . यही तो सच्चे प्रेम की परिणति होती है . मगर आपके अन्दर का अपराधबोध आपको जीने नहीं देता ऐसा ही तो तुषार के साथ होता है जो कल्याणी से प्यार करता है और दोनों शादी कर लेते हैं लेकिन तब भी एक चैन का जीवन नहीं जी पाते क्योंकि खुद को अरुण का दोषी मानते हैं . शायद यही मानव मन की वो बालकनी है जहाँ से वो , वो सब देख पाता है जो उससे हमेशा अदृश्य रहता है . अरुण जिसने चाहत में खुद को भुला दिया और पागल की श्रेणी में पहुँच गया . आह ! कहाँ मिलता है आज ऐसा प्यार और कहाँ लिखते हैं आज के लेखक ऐसी प्रेम कहानी . यहाँ लेखक ने मानो तुषार के मन के अन्दर उठे झंझावात को इंगित किया है क्योंकि वो समझ ही नहीं पाता आखिर कैसे कोई इंसान किसी के लिए पागल हो सकता है कि खुद की सुध ही खो बैठे और ढूंढता है वो कल्याणी के शरीर में जबकि प्रेम में शरीर तो गौण होता है वहां तक आत्माओं का मिलन होता है और अरुण एक ऐसा ही प्रेमी तो था जबकि प्यार तो तुषार और कल्याणी ने भी किया था लेकिन उनका प्यार सतही ही रहा सिर्फ शरीर तक सीमित वो प्रेम की उच्चतम स्थिति को कभी समझ ही नहीं सके फिर उसके प्रायश्चित स्वरुप कहो या खुद को तसल्ली देने के लिए वो अरुण को खाना इत्यादि देते रहे मगर कभी तुषार जान ही नहीं पाया वास्तव में प्रेम होता है क्या . प्रेम का अविरल रूप प्रस्तुत करने में कहानीकार सफल हुए हैं तो वहीँ मानव मन की कमजोरियों को भी बखूबी उजागर किया है उन्होंने . यही होता है एक सफल लेखक जो कम शब्दों में काफी कुछ कह दे और झकझोर दे पाठक मन को . पाठक तो उद्वेलित होगा ही जब प्रेम का ऐसा स्वरूप देखेगा और सोचेगा यही कहते हुए कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता जैसा कि कहानी के तीनो किरदारों के साथ होता है . सभी किरदार अधूरे , एक फीके कैनवस पर जैसे हर रंग धुंधला सा ही दिखता है . सोचने पर विवश करती प्रेम कहानी . यहाँ बेशक अरुण बल्कि उन दोनों के मध्य ही आया था फिर भी प्रेम क्या होता है और उसे कैसे जीया जाता है शायद वो ही जान पाया था तभी कहते हैं जो प्रेम करते हैं और शादी कर लेते हैं जरूरी नहीं उन्होंने प्रेम के वास्तविक अर्थ को समझा ही हो .

मंतव्य का ये कहानी विशेषांक आज के समय की सभी जटिलताओं और संभावनाओं को समेटे है . बेशक इसे एक बेहतरीन अंक की श्रेणी में न रखा जा सके लेकिन संपादक ने अपने समय की विभिन्न समस्याओं को इस संग्रह के माध्यम से सहेजने की कोशिश की है . फिर वो मानवीय समस्याएं हों , राजनीतिक या सामाजिक . यदि संपादक औपन्यासिक परिवेश की कहानियाँ न चुनकर कूकर जैसे विषय से न्याय करती कहानी चुनते तो मंतव्य का ये अंक एक बेहतरीन अंक की श्रेणी में आ जाता . अब क्योंकि ये एक नया प्रयोग किया है संपादक ने तो कुछ सोच कर ही किया होगा और वैसे भी जरूरी नहीं जो पाठक का दृष्टिकोण हो वो ही संपादक का भी हो . हो सकता है मेरी इतनी मुखरता थोड़ी नागवार गुजरे लेकिन मेरी नजर में अच्छा पाठक वो ही होता है जो कमियों पर भी ध्यान आकर्षित करे ताकि अगले अंकों में पाठक को उसकी पूरी खुराक मिल सके . बाकी कोई कहे वाह वाही करो तो वो सबसे आसान काम होता है जो अक्सर हम सभी करते रहे हैं . ये मेरे निजी विचार हैं जरूरी नहीं सभी इससे इत्तफाक रखें . 

संपादन का कार्य सबसे मुश्किल कार्य की श्रेणी में आता है . सभी कहानियों को पढना और उसमे से श्रेष्ठ चुनना कोई आसान कार्य नहीं होता . संपादक बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने इतनी मेहनत की और एक ऐसा अंक निकाला जो आज के समय में सब निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते .

रविवार, 31 जुलाई 2016

चटखारों की आवाज़

कोई ज़िन्दगी से संवाद करे भी तो कितना
जहाँ प्रश्नों का ज़खीरा हो
समय कम हो
और उत्तर नदारद

नमक मिर्च वाली ज़िन्दगी में
इश्क नाकामियों का ही तो दूसरा नाम है
और तुम ... पहला

अब चटखारों की आवाज़ मौन के गुम्बद में अज़ान भरती है

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

एक सच

मरखनी गाय और कटखने कुत्तों से हम
भूल चुके हैं अपनी सभ्यताएं भी

अब
आने वाली
पीढियां मशगूल हैं
अंतर्विरोधों को ताबीज बना
पहनने में

समय सिर धुन रहा है ...

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

चिड़िया पंखहीन नहीं .........

अकेलेपन के गीतों पर
डोलता है धरती का सीना
जाने कैसे
निष्ठुर हो गया आसमां

यूँ
चिडिया ने चुग्गे तो खूब खिलाये थे
फिर कैसे
बाँझ हो गयी इंसानियत
जो पराये दर्द पर तिलमिला उठो
और उसके लिए खुद ही दर्द के बायस बन जाओ

आह !
जान लो इतना सा सच बस
चाहे न मिले धरती न मिले आसमां
फिर भी जानती है वो जीना
क्यूँकि
चिड़िया पंखहीन नहीं .........

शनिवार, 2 जुलाई 2016

अँधेरे का मध्य बिंदु ... सुनीता शानू की नज़र से



अँधेरे से उजाले की ओर ले जाती प्रेम-कहानी

"अँधेरे का मध्य बिंदु " वंदना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है । इससे पहले उनकी पहचान एक कवयित्री और एक ब्लॉगर के रूप में ही थी...

सबसे पहली बात मेरे मन में जो आती है वह ये है कि जिस विषय पर हमारा समाज कभी बात करना पसंद नहीं करता, जिसे नई पीढी की उच्छंखलता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, या पाश्चात्य समाज की नकल कह कर नक्कार दिया गया है, उसी विषय को उठाकर सामाजिक बेडियां तोड़ते हुए कलम चलना कोई मामूली बात नहीं है। शायद पाठक यह नहीं जानते कि लेखिका के मन में समाज में फैली बुराइयों के प्रति आक्रोश के बीज बहुत समय पहले से ही पनप चुके थे, जिन्हें वह अपनी कविताओं के माध्यम से कई बार समाज के सामने लेकर आई भी हैं, इसी समाज को, और सदियों से चले आ रहे वैवाहिक बंधनों को चुनौती देता यह उपन्यास वाकई काबिले तारीफ़ कहा जायेगा।

वन्दना गुप्ता के उपन्यास का नाम है, “अंधेरे का मध्य बिंदु” उपन्यास के प्रथम अध्याय में पाठक यह विचार लगातार करता है कि कहीं कुछ ऎसा मिले जिससे यह ज्ञात हो कि इसका नाम अँधेरे का मध्य बिंदु ही क्यों रखा गया है, तो सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ने के उपरान्त ही आप भली-भांति इस बात से परीचित भी हो जायेंगें, कि सिर्फ़ विवाह के बंधन में बंध जाने से ही ज़िंदगी में उजाला नही आता, रिश्तों में दोहरापन, शक, और अभिमान ऎसे मुद्दे हैं जिनके रहते विवाह के बाद भी जीवन में अँधकार छाया रहता है, एक दूसरे के प्रति प्रेम,विश्वास और समर्पण द्वारा ही जीवन में खुशियाँ लाई जा सकती है तथा समाज में फैले अज्ञानता के अंधेरे को दूर करना ही इस उपन्यास का मकसद है...।

मै यह नहीं कहूँगी कि वन्दना का यह उपन्यास पूरी तरह से अपनी बात कह पाया है, या इसमें कोई कमी नहीं है, लेकिन यह अवश्य कहूँगी कि यह वन्दना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है, इस नाते कुछ सामान्य गलतियों अथार्त दोहराव को नक्कारा जा सकता है, जैसे पूरे उपन्यास में एक शब्द “मानो” का प्रयोग अत्यधिक किया गया है, जिसे कम किया जा सकता है। इन छोटी-मोटी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते हुए हम कह सकते हैं कि वन्दना गुप्ता अपनी बात कहने में सफ़ल रही है। उपन्यास में निहित उनके तमाम विचार जनसाधारण को आकर्षित करते है। भाषा का फूहड़पन कहीं पर भी परिलक्षित नहीं होता है, न ही सपाट बयानी नजर आती है, वरन उपन्यास पढ़ते हुए वंदना गुप्ता की कल्पनाशक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।

विवाह चाहे अरेंज हो या प्रेम विवाह दोनों में ही प्रेम, विश्वास, और स्वतंत्रता का होना जरूरी है, वन्दना उपन्यास के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि कोई भी किसी दूसरे को जबरन रिश्तों में बाँधकर नहीं रख सकता, अगर रिश्तों में परस्पर प्रेम, विश्वास तथा स्वतंत्रता बनी रहेगी तो वह रिश्ता अधिक टिकाऊ होगा, और ज़िंदगी खुशी-खुशी जी जायेगी, वरना ज़िंदगी भर यही रोना चलता रहेगा कि विवाह करके गलती की, या प्रेम करके गलती की। उपन्यास में बहुत से उदाहरणों द्वारा वंदना ने लीव इन रिलेशन के हानिकारक परिमाणों की ओर इशारा किया है, जिन्हें पढ़कर लगता है कि वह सब सच्ची घटनायें है, इसके साथ ही कुछ ऎसे उदाहरण भी आपको पढ़ने को मिल जायेंगे जहाँ शादी-शुदा जोड़े एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए जीवन जीने पर मज़बूर हैं... इन सभी बातों को रखते हुए वंदना की उपन्यास को रोचक बनाने की मेहनत साफ़ दिखाई दे रही है।

अंधेरे के मध्य बिंदु के नायक-नायिका विवाह जैसे बंधन में नहीं बँधना चाहते हैं वह चाहते हैं कि उनका रिश्ता एक दूसरे के प्रति प्रेम-समर्पण तथा विश्वास का रिश्ता हो, जिसमें कोई भी एक दूसरे से किसी प्रकार की अपेक्षाऎं न रखें वरन ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को दोनों ही मिलकर उठायें। उपन्यास में नायक-नायिका के प्रेम-समर्पण-विश्वास को इतना अधिक दिखाया गया है कि पाठक जब स्वयं की ज़िंदगी से तुलना करने लगता है तो उसे यह सब महज़ एक कल्पना सी लगती है, क्योंकि पाठक अपने आप को नायक-नायिका की तरह नहीं देख पाता है, उसकी स्थिती “लोग क्या कहेंगे” में आकर अटक जाती है, इसी समस्या को एक सोशल वर्कर के रूप में शीना को दिखाते हुए लेखिका ने हल किया है, साथ की एड्स जैसे रोग को बड़ी सावधानी के साथ उपन्यास का एक महत्वपूर्ण अंश बनाते हुए कारण-निवारण तक समझा दिये हैं।

अंत में वंदना गुप्ता को उनके प्रथम उपन्यास पर मै शुभकामनायें देते हुए इतना ही कहना चाहूंगी कि उनकी कलम रूकनी नहीं चाहिये, साथ ही यह आशा करती हूँ कि वे जल्द ही पाठकों को एक और नया उपन्यास देगीं...
सुनीता शानू


ये समीक्षा राजस्थान डायरी पत्रिका के जून अंक में जगह की कमी की वजह से कम  प्रकाशित हुई है .


सोमवार, 13 जून 2016

यूं ही नहीं वैधव्य में भी आकर्षण होता है ..........

छंदबद्ध कविता 
गेयता रस से ओत प्रोत 
जैसे कोई सुहागिन 
सोलह श्रृंगार युक्त 
और दूसरी तरफ 
अतुकांत छन्दहीन कविता 
जैसे कोई विधवा श्रृंगार विहीन 
मगर क्या दोनों के 
सौष्ठव में कोई अंतर दीखता है 
गेयता हो या नहीं 
श्रृंगार युक्त हो या श्रृंगार विहीन 
आत्मा तो दोनों में ही बसती है ना 
फिर चाहे सुहागिन हो 
या वैधव्य की ओढ़ी चादर 
कैसे कह दें 
आत्मिक सौंदर्य 
कला सौष्ठव 
वैधव्य में छुप गया है 
वैधव्य हो या अतुकांत कविता 
भाव सौंदर्य - रूप सौन्दर्य 
तो दोनों में ही समाहित होता है 
ये तो सिर्फ देखने वाले का 
दृष्टिकोण होता है 
कृत्रिम श्रृंगार से बेहतर तो 
आंतरिक श्रृंगार होता है 
जो विधवा के मुख पर 
उसकी आँख में 
उसकी मुस्कराहट में 
दर्पित होता है 
तो फिर कविता का सौंदर्य 
चाहे श्रृंगारित हो या अश्रृंगारित 
अपने भाव सौंदर्य के बल पर 
हर प्रतिमान पर 
हर कसौटी पर 
खरा उतारकर 
स्वयं को स्थापित करता है 
यूं ही नहीं वैधव्य में भी आकर्षण होता है ..........

गुरुवार, 9 जून 2016

गीताश्री की नज़र से 'अँधेरे का मध्य बिंदु'



एक लेखक के लिए जन्मदिन का इससे प्यारा तोहफा क्या होगा जब उसे उपहार स्वरुप उसकी कृति की समीक्षा मिले ........ जी हाँ , ये तोहफा दिया है हम सबकी जानी मानी सुप्रसिद्ध लेखिका ‪#‎geetashreeगीताश्री‬ ने और सुबह सबसे पहले फ़ोन पर शुभकामना सन्देश भी उन्ही का मिला .........तो प्रस्तुत है गीताश्री जी का गहन समीक्षात्मक दृष्टिकोण , जो सिद्ध करता है कितनी गहनता से उपन्यास का उन्होंने अध्ययन किया और उस पहलू पर उनकी कलम चली जो उपन्यास का मूल है वर्ना कहानी पर तो सभी लिखते हैं :
प्रस्तुत है @geetashreeगीताश्री जी की प्रतिक्रिया उनके मूल शब्दों में जो उन्होंने फेसबुक पर दी :

Geeta Shree
Yesterday at 8:57am ·


"अंधेरे का मध्य बिंदू " की तलाश करते करते ठिठक गई मैं. आखिर लेखक की मंशा क्या है? जिसका जीवन में बहुत विरोध हो, लेखन में उसके पक्ष में खड़ा हो जाने के पीछे कौन सी मंशा काम कर रही थी ! वह विषय ही क्यों चुना, जिसका जीवन में स्वीकार नहीं. बहुत सारे सवालो के जवाब मिलते हैं, जैसे जैसे हम अंधेरी सुरंग में घुसते हैं. हर सुरंग का मुहाना रोशन होता है. विषय चाहे कितना भी नापसंद हो, असली बात तो पक्षधरता की है. लेखक बिना विषय का पक्ष लिए, छीजती हुई मनुष्यता की खोज तो कर ही सकता है. उन अंधेरे बिंदूओं की तरफ संकेतित तो हो ही सकता है. रिश्तों से गुमशुदा प्रेम, विश्वास और स्पेस को तो खोज ही सकता है.
हंसमुख, सहजमना कवि -ब्लॉगर वंदना गुप्ता का पहला उपन्यास मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश कर गया. हम रिश्तो से भाग कर रिश्तों से ही जा उलझते हैं. एक जाल टूटे है तो कई डोर खींचे हैं. विडंबनाएं इच्छाओं के साथ लगी चली आती हैं जो कई बार त्रासद अंत में बदल जाती हैं. मानवीय स्वभाव का सबसे बड़ा संकट ये कि हम सब जानते हुए दलदल की तरफ बड़े आराम से यात्रा करते हैं.
वंदना ने इस उपन्यास में लिव-इन रिश्तों को " डिकोड" किया है. पूरी तरह. प्रभा खेतान की थ्योरी पर यहां लेखिका खड़ी दिखाई देती हैं कि जीवन, रोमांस, सेक्स-संबंध सबके अलग अलग कोड होते हैं ! मैं जरा आगे जाकर मानती हूं कि लेखक उनको डिकोड करता चलता है. वंदना ने इस रिश्तों को " डिकोड" किया है , अपनी निजी असहमतियों के वाबजूद.
इतालो कल्वीनों की तरह कह सकती हूं कि साहित्य हमेशा उन गुप्त अर्थों या अज्ञात जगहों की तलाश करता है जिनके मूल अर्थ बदल देने की कोशिश करता है. वंदना यहां यही करती दिखाई देती है. वह रिश्तों के बेहद जरुरी अवयवों की न सिर्फ तलाश करती है बल्कि उन्हें नए सिरे से परिभाषित भी. यही होती है लेखकीय दृष्टि. जो हिंसा के खिलाफ अहिंसक स्थापनाएं दें.
ऐसा नहीं कि वैवाहिक हिंसा का निदान लिव-इन रिश्ते में है. दोनों विफल संस्थाएं साबित हो रही हैं इस दौर में, जहां जीवन ही संदिग्ध हो गया है.
लेखिका दोनों रिश्तों के खोल उतारती चलती है, चोट करती चलती है और तपती हुई ऊंगली मूल अवयव पर धर देती है. इन दोनों में कुछ चीजें खो गई हैं या घिस गई हैं. उनकी पड़ताल जरुरी. उसकी तलाश की यात्रा है यह उपन्यास जिसमें
प्रेम और भरोसे की उपस्थिति को मूर्त किया गया है और अवचेतन के गहरे अंधेरे में उतर कर वे points ढूंढ लिए गए हैं जहां उजाले बसते हैं.
यही तो है जॉनथन स्वीफ्ट की कलादृष्टि !
"Vision is the art of seeing, what is invisible to others. "
ब्लॉगिंग के जमाने से मेरी मित्र वंदना ने इस बार पुस्तक मेले में मुझे चौंका दिया था. उपन्यास की भनक तक नहीं लगने दी. उपन्यास देखते ही सुखद आश्चर्य से भर गई. हम सोचते रह गए, वंदना ने अंधेरे के मध्य बिंदू को खोज लिया. वाह !! उजाले की तलाश ऐसे ही होती है , बिना ढ़ोल -नगाड़े के.
वंदना का आज जन्म दिन भी है! इससे अच्छा दिन क्या होगा !! बहुत बहुत बधाई वंदना !!

शनिवार, 4 जून 2016

तमंचे पर डिस्को

वक्त का जालीदार बिछौना है ज़िन्दगी
जर्रे जर्रे से रेत सी फिसलती
मौत के स्पंदन ख़ारिज करने से खारिज नहीं होते

ज़िन्दगी न साहस है न दुस्साहस
अम्लीय क्षार ने कब दी है दुहाई
एकतारे से चाहे जितनी धुनें निकालो
आखिरी कतार में तो मिलेगी रामनामी धुन ही

अब पालो पोसो पुचकारो दुलारों
गर्दिशों की पाँव में जंजीरें नहीं हुआ करतीं
और ज़िन्दगी , दहशतगर्दी का दूसरा नाम है
अक्सर कह देते हैं कुछ लोग
जो नहीं जानते
अरूप और कुरूप के मध्य
रूप है ज़िन्दगी
श्रृंगार है ज़िन्दगी
अलंकार है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से इश्क तमंचे पर डिस्को सा है ...

बुधवार, 1 जून 2016

फ्री सेक्स ...वक्त का बदलता मापदंड

तेरी जिद की रेत को उलट कर
ले मैंने भर दी है 
अब अपने जिद के गिलास में

यूं आसमां के चुहचुहाने के दिनों का
हो चुका है अब वाष्पीकरण
सुना है न 'फ्री सेक्स'' के बारे में
और अब
समझ चुकी हूँ
वास्तव में स्त्री की फ्रीडम

न न , गलत मत समझना
मेरा वो मतलब नहीं
तुम और तुम्हारी सोच
हमेशा खूँटी पर लटकी कमीज सी ही रही
जिसे जब चाहे पहना
और जब चाहे उतारा
लेकिन
मेरे मायने हमेशा तुमसे उलट ही रहे

मैंने बदला है सिर्फ केशों का रंग
केश नहीं
और देखो
दर्प से जगमगाता चेहरा
कैसे तुम्हारे न केवल गले की
बल्कि
आँख की भी फांस बन गया है

सुनो
शब्दों को तोड़ो मरोड़ो मत
उनके वास्तविक अर्थ को समझो
ये सेक्स वो सेक्स नहीं है
बल्कि वो है
जो अक्सर पूछा जाता रहा है
सेक्स : मेल/फीमेल ...वाला 

और इस बार जिद की आंच पर 
चढ़ा है फीमेल वाला
और फ्री
इसका अर्थ भी
तुम्हारी मानसिक कलुषता और दिमागी दिवालियेपन
तक सीमित नहीं है
यानि हो गयी है वो स्वतंत्र
स्वयं के निर्णय को कार्यान्वित करने को
हाँ या न कहने को
फिर वो जीवनसाथी का चुनाव हो
या शारीरिक सम्बन्ध
या फिर सामाजिक आर्थिक निर्णयों में भागीदारी
लेकिन
तुम वहीँ के वहीँ रहे
हंगामाखेज ... 

यूं चाहे जितने निकाल ले कोई 
फ्री सेक्स के मनचाहे अर्थ 

बस यही है फर्क
तुम्हारी और मेरी सोच में
अब तुम सोच लो
तुम कहाँ हो खड़े ?

जानते हो .....जिदों के पर्याय नहीं होते
और वक्त की आंच पर
जो सुलगी होती हैं
उन दोपहरों को ख़ारिज करने के कोई मौसम नहीं होते

ये है वक्त का बदलता मापदंड ...


सोमवार, 30 मई 2016

मत सता गरीब को

"क्या हुआ जयंती ? आज बड़े उदास हो ? "

"हाँ , वो शशांक की माँ से जब से मिलकर आया हूँ मन बहुत खराब है ."


"क्यों, क्या हुआ उन्हें?"


"क्या कहें अब ऐसी औलाद को जिसे आज माँ ही बुरी लगने लगी . कल तक तो आगे पीछे डोलते थे लेकिन जिस दिन से बेचारी ने बेटों को मुख्तियार बना दिया मानो अपने हाथ ही काट लिए . अब घर पर कब्ज़ा कर लिया और माँ को एक कोठरी में जगह दे दी . यहाँ तक कि उससे एक तरह से सब सम्बन्ध ही ख़त्म से कर लिए . लाखों रुपया कमाने वाले न बोलते हैं न हाल चाल पूछते हैं . बस दो वक्त की रोटियां भी उनकी बीवियाँ अहसान सा करके देती हैं . शरीर भी साथ नहीं देता लेकिन हौसले से सब झेलती रही ये सोच माना पति से हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रहा , उसके लिए सिर्फ एक भोग्या ही रही , उससे इतर भी स्त्री होती है या उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं , उसका कोई लेना देना नहीं रहा लेकिन औलाद तो मेरी है , वो मेरा दर्द समझेगी , ये सोच हर आतंक पति का सहती गयी . आज न पति उसका न बेटे . जाए तो कहाँ जाए ? किसके सहारे जीवन यापन करे ?" बहुत ही परेशान स्वर में जयंती ने कहा .

"अजी छोड़े ऐसे पति को और लात मारे ऐसी औलाद के . अपने दम पर जीये ." राम ने जवाब दिया .

"कहना जितना आसान होता है न सहना उतना ही मुश्किल . अपने पेट जाए जब ऐसा व्यवहार करते हैं तो खून के आंसू रोती है एक माँ ."

"जानते हैं हम इस बात को तभी कह रहे हैं एक तो उनकी परवाह करना छोड़ दे . दूसरे क्यों कोठरी में जीवन यापन करती है , अपने हक़ के लिए लडे ."

"वो तो ठीक है लेकिन अपनों से लड़ना सबसे मुश्किल होता है और फिर कोई सहारा तो हो जिसके दम पर लड़ाई लड़ी जाए . वो इसी बात का तो फायदा उठा रहे हैं जानते हैं अकेली है . बेचारी बस चुपके चुपके आंसू बहाती है ."

"देखना उसके आँसू , उसकी आहें एक दिन ऐसी तबाही लायेंगी बेटे कहीं के नहीं रहेंगे शायद उस दिन उन्हें अपनी माँ का दर्द समझ आये लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो ...."

"कमज़र्फ औलादें आजकल की जाने किस मिटटी की बनी होती हैं . माँ दर्द से बिलबिला भी रही हो तो भी उसकी चीख सुनाई नहीं देती और यदि बीवी या बच्चे के सर में दर्द भी हो जाए तो सारे काम छोड़ उसकी तरफ दौड़ पड़ते हैं . कैसे इतने निर्मोही और कृतघ्न हो जाते हैं समझ नहीं आता . कैसे भूल जाते हैं यही माँ थी जिसने सब कुछ सहा सिर्फ उनकी खातिर"

"चिंता न कर जयंती भाई ,वो कहते हैं न --- मत सता गरीब को वो रो देगा , गर सुन लेगा उसका खुदा तुझे दुनिया से खो देगा."

मत भूल जो तूने बोई है वो ही फसल काटेगा
अपने किये पर एक दिन चकरघिन्नी सा नाचेगा
ये वक्त वक्त की बात है लाठी तेरे हाथ है
जिस दिन पड़ेगी उसकी बेहिसाब काँपेगा

रविवार, 1 मई 2016

हाशिये का नवगीत

ये हाशिये का नवगीत है
जो अक्सर
बिना गाये ही गुनगुनाया जाता है

एक लम्बी फेहरिस्त सा
रात में जुगनू सा
जो है सिर्फ बंद मुट्ठियों की कवायद भर

तो क्या हुआ जो
सिर्फ एक दिन ही बघार लगाया जाता है
और छौंक से तिलमिला उठती हैं उनकी पुश्तें

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास


सन्दर्भ --- मजदूर दिवस

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

भूले बिसरे गीत

भूले बिसरे गीत हो गए हैं हम .......उसने कहा और मैं सोच में पड़ गयी

सच ही तो कहा

एक दिन सभी भूले बिसरे गीत बन जाने हैं

नहीं नहीं ये भी सत्य नहीं
गीत तो फिर भी कभी कोई गुनगुना ही लेगा
समय असमय
लेकिन हम
किसकी यादों की पालकी में जगह बनायेंगे
एक दिन निश्चित ही मिट जायेंगे

अमिट बनने के लिए जरूरी है
एक सम विषम का मध्यकाल बनना
जहाँ तुम्हारा होना एक अनिवार्य आवश्यकता हो ...

गुरुवार, 24 मार्च 2016

रंग भरी होली


जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 

रंगभरी होली की सभी को मंगलकामनाएं

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

तिरछी पड़ी यादें

आज भी तिरछी पड़ी हैं तुम्हारी यादें
और मैं रोज सुबकता न होऊं
ऐसा कोई लम्हा गुजरा ही नहीं
क्योंकि
इश्क का चन्दन जितना घिसा
उतना ही सुगन्धित होता गया

अब चिकनी सपाट सड़क पर भाग रहा हूँ
निपट अकेला ...

उधर
इख्तियार है तुम्हें भी
जुदाई की कोंपलों पर अश्रुपात करने का
कि
उग आये एक दास्ताँ हर दिल के सफ़हे पर
दिन-ब-दिन
और हो जाए मोहब्बत श्रृंगारिक ,अलंकारिक , गुंजारित

बस इतना सा तो सबब है
बाकि इस सत्य से कौन अनभिज्ञ है
रूहों के मिलन के मौसम आज के ज़माने का चलन नहीं ...