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शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

ओ रे बदरवा आवत हो का !!!

आस का बादल 
गर झूम के बरसा 
इस बरस तो 
उग आएँगी खेत में 
सरला के ब्याह की किलकारियाँ 
माँ की दवा 
छोटे के ऑपरेशन का खर्च 
दो जून की रोटी 
और एक अदद धोती 
सरला की माँ के लिए 
टकटकी लगाये 
तपते आकाश से 
बुझा रहा था जीवन की पहेलियाँ 
आज फिर सुखिया अपना नाम सार्थक करने को 
गुजर गयी उम्र जिसकी 
फटी मैली कुचैली धोती में 

ओ रे बदरवा आवत हो का !!!
गूँज रहा था स्वर कम्पायमान ध्वनि में 


आस विश्वास और अविश्वास के मध्य 

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

दो बहनें

तीज और ईद अक्सर 
गलबहियाँ डाल 
प्रेम के हिंडोलों पर 
पींग बढ़ा 
सौहार्द का प्रतीक 
बनने की कोशिश करती हैं दो बहनों सा 
जाने कौन से खुदा का 
फ़रमान तारी हो जाता है 
जो बो जाता है नफ़रत की नागफ़नियाँ 
और हो जाती हैं दोनो बहनें जुदा 
और करती हैं 
अपने अपने अस्तित्व की तलाश 
गंगा जमुनी तहजीब में 

और मिट्टियों में चाहे कितनी सेंध लगा लो 
समा ही लेती है अपने आकार में हर प्रकार को 
क्योंकि 
सुना है जन्मदात्री तो एक ही है दोनों की 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

सोच की रोटी पर फ़फ़ूँद लगने से पहले

हाथ में कलम हो और
सोच के ताबूत में
सिर्फ़ कीलें ही कीलें गडी हों
तो कैसे खोली जा सकती है
ज़िन्दा लाश की आँख पर पडी पट्टी की गिरहें

चाहे कंगन कितने ही क्यों ना खनकते हों
सोच के गलियारों में पहनने वाले हाथ ही
आज नहीं मिला करते
और “ जंगल में मोर नाचा किसने देखा “
कहावत यूँ चरितार्थ होती है
मानो स्वंयवर के लिये दुल्हन खुद प्रस्तुत हो
मगर राजसभा मनुष्य विहीन हो
या रंगशाला में नर्तकी नृत्य को आतुर हो
मगर कद्रदान का ही अभाव हो
विडंबना की सूक्तियाँ मानो
कोई फ़कीर उच्चरित कर रहा हो
समय रहते बोध करा रहा हो
मगर हमने तो जैसे हाथ में माला पकडी हो
मनके फ़ेरने की धुन में कुछ सुनना
शास्त्राज्ञा का उल्लंघन लगता हो

अजब सोच की गगरी हो
जो सिर्फ़ कंकर पत्थरों से भरी हो
मगर पानी के अभाव में
ना किसी कौवे की प्यास बुझती हो
और कहीं कौवा प्यासा ही ना उड जाये
उससे पहले बरसनी ही चाहिये बरखा की पहली बूँद
मेरी सोच की मज़ार पर
ऐतिहासिक घटना के घटित होने से पहले
लिखी जानी चाहिये कोई इबारत
सोच की रोटी पर फ़फ़ूँद लगने से पहले
बदलनी ही चाहिये तस्वीर इस बार

कुंठित सोच
कुँठित मानसिकता
कुंठित पीढी को जन्म दे
उससे पहले
सोच की कन्दराओँ को
करना होगा रौशन
ज्ञान का दीप जलाकर
खुद का अन्वेषण कर के

(मेरे काव्य संग्रह बदलती सोच के नए अर्थ से एक कविता अन्तिम पंक्तियाँ वाजपेयी जी द्वारा भूमिका में उद्धृत)

शनिवार, 19 जुलाई 2014

नपुंसक समाज के नपुंसकों

वो कहते हैं 
नपुंसक समाज के नपुंसकों 
तुम हमारा कुछ नहीं बिगाड सकते 
हम तो ऐसा ही करेंगे 
कानून क्या बिगाडेगा हमारा 
जब अब तक न कुछ बिगाड सका 
अमानवीयता की हर हद को तोड कर 
नये नये तरीके ईजाद करेंगे 
मानवीयता की हर हद को तोड कर 
ब्लात्कार करेंगे ब्लात्कार करेंगे ब्लात्कार करेंगे 

बलात्कार अमानवीयता संवेदनहीनता महज थोथे शब्द भर रह गये

शर्मसार होने को क्या अब भी कुछ बचा रह गया है जो समाज देश कानून सब कुम्भकर्णी नींद सो रहे हैं जिन्हें पता नहीं चल रहा कि किस आग को हवा दे रहे हैं , कल जाने और कितना वीभस्त होगा ये तो सिर्फ़ एक शुरुआत है यदि अभी नहीं संभले तो कल तुम्हारी आँखों के आगे भी ये मानसिक विक्षिप्त कुछ भी कर सकते हैं और तुम नपुंसकों से कुछ नहीं कर पाओगे समय रह्ते चेतो , जागो और कुछ न्याय कानून से हटकर कदम उठाओ ताकि सीधा संदेश जाए ऐसे दरिंदों तक ……अब यदि कुछ किया तो क्या हश्र होगा उसका दम दिखाओ नहीं तो तैयार रहना बर्बादी हर घर के आगे दस्तक दे रही है ।

बुधवार, 16 जुलाई 2014

मेरी नज़र से


व्यस्तता इंसान को कितना लाचार कर देती है कि वो चाहकर भी हर काम को सही समय पर अंजाम नहीं दे सकता ऐसा ही कुछ मेरे साथ होता रहा है । पिछले कई महीनों से जाने कितने काम अधूरे पडे हैं , जाने कितना पढती रही मगर लिख नहीं पायी किसी के बारे में कुछ भी मगर इस बार ठान ही लिया कि कुछ वक्त चुराना होगा क्योंकि अंक है ही इतना शानदार कि रोक नहीं पायी खुद को । प्रवासी भारतीयों की पत्रिका हिन्दी चेतना जिसका सम्पादन सुधा ओम ढींगरा करती हैं अब भारत में प्रकाशित होने लगी है जिसे पंकज सुबीर देखते हैं ।

'हिन्दी चेतना' का जुलाई-सितम्बर 2014 अंक  मेरी नज़र से :

इस बार के अंक में रीता कश्यप की कहानी ; एक ही सवाल ' ज़िन्दगी की वो कटु सच्चाई है जिसे हम उम्र भर अनदेखा करते रहते हैं और कब हम अकेले और अवांछित तत्व में बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता । कहानी के पात्र की मनोदशा के साथ साथ बाकि के पात्रों की मन:स्थिति पर रौशनी डालते हुए लेखिका ने बडी सहजता से उस सच को कहा है कि इंसान सोचता तो बहुत कुछ है मगर जब उससे गुजरता है तो उसे अहसास ही नहीं होता कि यदि वैसा हो गया तो हालात कैसे होंगे । शायद पहले से भी बदतर क्योंकि स्वप्न और हकीकतों में बहुत फ़र्क होता है यही कहानी के माध्यम से दर्शाया गया है ।

रजनी गुप्त की कितने चेहरे हर दूसरी स्त्री की कहानी है जो घर से बाहर निकलती है और कैसे वासनामय दृष्टियों से टकराती है मगर उसके साथ प्रतिकार भी अब जरूरी है आवाज़ उठानी जरूरी है इस तथ्य को बल दिया गया है ताकि जन जागृति हो सके।

आस्था नवल की ' उसका नाम ' एक गृहिणी के जीवन का चित्रण है जहाँ वो खुद को मिटाकर एक संसार रचती है और बन कर रह जाती है सिर्फ़ , माँ , मौसी , बहन , चाची , मामी , भाभी , जाने वक्त की किन परतों में खो जाता है उसका नाम , उसकी पहचान और जब कोई उसे अहसास कराता है तब जाकर समझ पाती है कि इन सब सम्बोधनों से इतर भी जरूरी है उसकी एक पहचान , एक नाम ।

 नीरा त्यागी की ' क्या आज मैं यहाँ होती ' एक तलाकशुदा स्त्री के जीवन का दर्पण है तो दूसरी तरफ़  उसूलों , आदर्शों और मर्यादा के साथ जीने की एक स्त्री के अदम्य साहस की प्रत्यंचा है । तलाकशुदा होकर भी स्त्री चाहे तो अपनी शर्तों पर मर्यादा पूर्ण जीवन जी सकती है उसके लिए जरूरी नहीं होता किसी भी तरह का समझौता करना ।

वहीं कहानी भीतर कहानी में सुशील सिद्धार्थ द्वारा किया गया गहन विश्लेषण पाठक को वृहद दृष्टि देता है जो अन्तस को छू जाता है ।

शैली गिल की ' फ़ादर्स डे ' एक बार फिर बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीनता का दर्शन है । वहीं लघुकथायें कम शब्दों में प्रभावकारी असर छोडती हैं ।

 शशि पाधा का संस्मरण ' प्रथा कुप्रथा ' प्रभावशाली और अनुगमनीय संस्मरण है यदि सभी इसी तरह सोच सकें और कर सकें थोडी हिम्मत और थोडा जज़्बा रखें तो जाने कितनी ही ज़िन्दगियाँ बर्बाद होने से बच जायें और जाने कितनी ही ज़िन्दगियों में खुशियों की चमक बिखर जाए क्योंकि सरहद पर सिर्फ़ सैनिक ही शहीद नही होते उनके साथ उनका पूरा परिवार शहीद होता है यदि कुछ कुप्रथाओं का विरोध करने में पढे लिखे लोग आगे आकर साथ दें और रहने खाने की व्यवस्था कर दें तो एक जीवन किस तरह सुधर सकता है उसका वर्णन है जिसके लिए सरकारी महकमों के साथ जन जागृति भी जरूरी है ।

सौरभ पाण्डेय की गज़लें , शशि पुरुवार , सरस दरबारी, रश्मि प्रभा , रचना श्रीवास्तव,ज्योत्स्ना प्रदीप , सविता अग्रवाल , अदिति मजूमदार की कविताये , हरकीरत हीर , डॉ उर्मिला अग्रवाल , डॉअ सतीश राज पुष्करणा के हाइकू, अनुवादित कवितायें देकर पत्रिका को समृद्ध किया है । भारतेन्दु हरीशचन्द्र के  परिचय के साथ डॉ रेनु यादव का व्यंग्य ' क्योंकि औरतों की नाक नहीं होती ' पत्रिका को सम्पूर्णता प्रदान करता है । देवी नागरानी द्वारा की गयी पुस्तक समीक्षा कमल किशोर गोयनका द्वारा प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन , यात्रा संस्मरण पर आधारित नीले पानियों की शायराना हरारत की रघुवीर द्वारा की गयी समीक्षा और फिर पंकज सुबीर द्वारा गीता श्री की किताब प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ ' की समीक्षा पत्रिका को न केवल सम्पूर्णता प्रदान करती है बल्कि पत्रिका को गरिमामय के साथ पठनीय भी बनाती है । एक ही पत्रिका में सम्पूर्ण साहित्य को सहेजना साथ ही साहित्य समाचारों को भी स्थान देना संपादक के कुशल संपादन को दृष्टिगोचर करता है । एक कुशल संपादक को दूरदर्शी होने के साथ वर्तमान परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर पत्रिका का संपादन करना होता है और सुधा जी उसमें पूरी तरह सक्षम हैं तभी तो जब से प्रिंट में पत्रिका आयी है सभी दिग्गजों को पत्रिका में स्थान तो मिल ही रहा है साथ ही नवोदितों के लिए भी खास जगह बना रखी है और यही एक पत्रिका की सफ़लता का पैमाना है जहाँ नये और पुराने दोनो लेखकों का संगम हो वहीं तो साहित्य की गंगा निर्बाध रूप से बहा करती है । 

सोमवार, 30 जून 2014

ओ मेरे !.............11

तुम भटकी हुई दिशा की वो गणना हो जिसके उत्तर ना भूत में हैं और ना ही भविष्य में फिर वर्तमान से मगज़मारी क्यों .......कहा था ना तुमने एक दिन .........और उसी दिन से प्रश्नचिन्ह बनी वक्त की सलीब पर लटकी खडी हूँ मैं ......यूँ  इश्क की बदमिज़ाज़ी को लिबास बना पहना है मैने .........अब चाहे जितनी आग उगलो जलते हुये भी हँस रही हूँ मैं ............महबूब के तोहफ़े यूँ भी सहेजे जाते हैं ...........जानाँ !!!

खुमारी दिन चढ़ने पर ही ज्यादा अंगड़ाईयाँ लिया करती है ..........और मेरी मोहब्बत में कभी शाम होती ही नहीं ...........बस खुमारियों की पाजेबें छनछनाती रहती हैं और मैं उनकी धुन पर नाचती उमगती रहती हूँ एक तिलिस्मी दुनिया का तिलिस्म बनकर ..........क्या जी सकते हो तुम भी मेरी तरह ...........ओ मेरे !

बुधवार, 25 जून 2014

सफ़र के पडाव

डॉ हरीश अरोडा जी के संपादन में दो वर्षों के इंतज़ार के बाद ' पत्रकारिता का बदलता स्वरूप और न्यू मीडिया ' पुस्तक आ रही है जिसमें मेरा भी आलेख सम्मिलित है ये है बुक का कवर 





शोध दिशा' के 'फेसबुक कविता अंक' में प्रकाशित मेरी दो कवितायें

आदरणीय गिरिराज शरण अग्रवाल जी एवं लालित्य ललित जी हार्दिक आभार
 





 अनंग प्रकाशन से प्रकाशित  " समकालीन विमर्श --- मुद्दे और बहस " पुस्तक  जो हिमाचल यूनिवर्सिटी में कार्यरत रवि कुमार गौंड के सम्पादन में प्रकाशित हुयी है जिसमें स्त्री विमर्श पर मेरा द्वारा लिखित एक आलेख भी सम्मिलित है






गुरुवार, 19 जून 2014

मुझे मेरे अक्स ने आवाज़ दी………

हाथ उठाये यूँ
मुझे मेरे अक्स ने आवाज़ दी
सैंकड़ों कहानियां बन गयीं
दर्जनों अक्स चस्पां हो गए
कुछ गर्म रेतीले अहसासों के
बेजुबान लफ्ज़ रूप बदल गए
कहीं एक डाल से उड़ता
दूजी ड़ाल पर बैठता मेरा मन पंछी
उड़ान भरने को आतुर दिखता
तो कहीं ख़ामोशी के गहरे
अंधे कुएं में दुबक जाता
कहीं कोई चाहत की उमंग
ऊंगली पकडे ख्वाब को टहलाती
कहीं कोई उम्मीद की सब्ज़परी
अपनी बाहों के घेरे में
स्वप्नों के घर आबाद करती
कहीं गडमड होते ख्वाबों के दरख़्त
कहीं चेतना का शून्य में समाहित होना
एक अजब से निराकार में साकार का
आभास कराता विद्युतीय वातावरण
का उपस्थित होना
ना जाने कितनी अजन्मी कहानियों का जन्म हुआ
ना जाने कितने वजूदों को दफ़न किया
ना जाने कितने कल्पनाओं के पुलों पर
उड़ानों को स्थगित किया
फिर अक्स में ही सारा दृश्य सिमट गया
और रह गया
खाली हाथों को उठाये यूँ अकेला अस्तित्व मेरा
शून्य का कितना ही विस्तार करो
सिमट कर शून्य ही बचता है

और फिर अक्स की दुरुहता तो अक्स में ही सिमटी होती है
………

शनिवार, 14 जून 2014

" घट का छलछलाते रहना जरूरी है "


दर्द उदास है 
कि जुटा है आज 
इक कराह की तलाश में 

ये हिय की पीरों पर 
सावन के हिंडोले 
कब पडे हैं भला 
जो पींग भर पाती इक आह 

मोहब्बत के चश्मेशाही में तो 
बस दिलजलों के मेले लगा करते हैं जानाँ
हर खामोश चोट ही उनका समन्दर हुआ करती है 
और खारापन ………उनका जीवन 

तभी तो
उदासी की नेमत हर किसी को अता भी तो नहीं फ़रमाता खुदा 
इसलिये 
इश्क के चश्मों में नमी ज़रा कम ही हुआ करती है 
और मोहब्बत बेइंतेहा 
तभी तो 
हर चोट हर वार 
मोहब्बत की पुख्तगी का सबूत हुआ करता है 
और प्रेमियों के लिए सुधामृत 

ओह ! तभी दर्ज होता है   
प्रेम की पाठशाला में 
इश्क के कायदे का पहला और अन्तिम वाक्य 
" घट का छलछलाते रहना जरूरी है "

शुक्रवार, 13 जून 2014

तुम्हारा स्वागत है ……अन्तिम भाग



अभी जमीन उर्वर नहीं है 
महज ढकोसलों और दिखावों की भेंट चढ़ी है 
दो शब्द कह देना भर नहीं होता नारी विमर्श 
आन्दोलन  करना भर नहीं होता नारी मुक्ति 
नारी की मुक्ति के लिए नारी को  करना होता है 
जड़वादी ,   रूढ़िवादी सोच से खुद को मुक्त 

मगर अभी  जमीन उर्वर नहीं है 
अभी नहीं डाली गयी है इसमें 
उचित मात्रा में खाद ,बीज और पानी 
फिर कैसे बहे बदलाव की बयार 
कैसे पाए नारी अपना सम्मान 

अभी संभव नहीं हवाओं के रुख का बदलना 
जानती हो क्यों ………… क्योंकि 
यहाँ है जंगलराज ……… न कोई डर है ना कानून 
चोर के हाथ में ही है तिजोरी की चाबी 
ऐसे में किस किस से और कब तक खुद को बचाओगी
कैसे इस माहौल में जी पाओगी 
ये सब सोच लेना तब आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

और सुनो सबसे बडा सच 
नहीं हुयी मैं इतनी सक्षम 
जो बचा सकूँ तुम्हें 
हर विकृत सोच और निगाह से 
नहीं आयी मुझमें अभी वो योग्यता 
नहीं है इतना साहस जो बदल सकूँ 
इतिहास के पन्नों पर लिखी इबारतें 
पितृसत्तात्मक समाज के चेहरे से 

सिर्फ़ कहानियों , कविताओं ,आलेखों या मंच पर 
बोलना भर सीखा है मैनें 
मगर नहीं बदली है इक सभ्यता अभी मुझमें ही 
फिर कैसे तुम्हें आने को करूँ प्रोत्साहित 
कैसे करूँ तुम्हारा खुले दिल से स्वागत 

जब अब तक 
खुद को ही नहीं दे सकी तसल्लियों के शिखर 
जब अब तक 
खुद को नहीं कर सकी अपनी निगाह में स्थापित 
बन के रही हूँ अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ 
पुरुषवादी सोच और उसके हाथ का महज एक खिलौना भर 
फिर भी यदि तुम समझती हो 
तुम बदल सकती हो इतिहास के घिनौने अक्षर 
मगर मुझसे कोई उम्मीद की किरण ना रखना 
गर कर सको ऐसा तब आना इस दुनिया में ……तुम्हारा स्वागत है 


ये वो तस्वीर है  
वो कडवा सच है 
आज की दुनिया का 
जिसमें आने को तुम आतुर हो 
और कहती हो 
" जीना है मुझे " 



मंगलवार, 10 जून 2014

आखिर क्या दोष था उन नौनिहालों का ?

अन्दर ही अन्दर सुलग रहे हैं 
कुछ कर न पाने की बेबसी डँस रही है 
या खुदा तेरी ये विनाशलीला देख 
तुझी पर इल्ज़ाम रखने को मचल रहे हैं 


रविवार रात से दिल बहुत उदास हो गया जब से न्यूज सुनी कि 24 बच्चे व्यास में बह गये और कल से न नींद न चैन सुबह से न्यूज ही सुन रही थी और सोच सोच परेशान हो रही थी कि कैसी कुदरत की लीला है या कहूँ कैसा प्रशासन का तंत्र है कि एक पल में 24 घरों के चिराग बुझा दिए सिर्फ़ एक लापरवाही से , अब कौन जिम्मेदार होगा इसका ? और यदि अब जिम्मेदारी उठा भी लें तो क्या लौट आयेंगे उनके घर के चिराग ? यदि समय रहते सूचित किया गया होता तो ये भयानक हादसा टल सकता था , जाने क्या बीत रही होगी उनके परिवारों पर , कैसे एक एक पल भारी हो रहा होगा सोच सोच के ही हाल बेहाल हुआ जा रहा है तो उनका क्या हो रहा होगा ये तो हम समझ भी नहीं सकते ……20 साल के बी टैक के बच्चे ……उफ़्फ़ ! कल से यही दुआ कर रही हूँ कि हे ईश्वर ! कैसे भी करके वो बच्चे बच जायें  क्योंकि एक वो ही कोई चमत्कार कर सकता है और जो बच्चे बह गये हैं उन बच्चों को बचा सकता है जबकि उम्मीद कम होती जा रही है मगर उसी पर विश्वास है शायद कुछ बच जायें ……


 आखिर क्या दोष था उन नौनिहालों का ? क्या पढाई के स्ट्रैस से मुक्ति पाने को थोडा सा मनोरंजन करना गुनाह है ? आखिर क्यों हुआ ये सब ? कौन जिम्मेदार है ? अब ये प्रश्न बेमानी लगते हैं ………बस अब तो पीछे छुटे लोगों के गम बडे लगते हैं कैसे ज़िन्दगी को गुजारेंगे ? हो सकता है किसी का सिर्फ़ एक ही बच्चा हो , सोच कर ही दिल काँप उठता है , कैसे पहाड सी ज़िन्दगी गुजारेंगे वो? और दूसरी तरफ़ किसी को फ़र्क नहीं पड रहा क्या सरकार क्या प्रशासन , संसद मौन है क्योंकि उसका अपना कोई नहीं गया , दो मिनट का शोक तक नहीं रखा गया , इतनी संवेदनहीनता दर्शाती है अब नहीं बचे संस्कार , नहीं रहा कोई सरोकार ………जाने किसके सहारे जी रही है जनता ? क्या सिर्फ़ विकास का मंत्र ही काफ़ी है ? क्या ऐसे विकास का कोई औचित्य है जहाँ जनता की ही परवाह न हो वो मरती है तो मरे हम विकास के नाम की माला जपेंगे बस और इसी नाम पर वोट बैंक भरेंगे ……आखिर कहाँ खो गयी है मानवता और इंसानियत ……सोच में हूँ !!!

शुक्रवार, 6 जून 2014

तुम्हारा स्वागत है ……भाग 2



तुम कहती हो 
दुनिया  बहुत सुन्दर है 
देखना चाहती हो तुम 
जीना चाहती हो तुम 
हाँ सुन्दर है मगर तभी तक 
जब तक तुम " हाँ " की दहलीज पर बैठी हो 
जिस दिन " ना " कहना सीख लिया 
पुरुष का अहम् आहत हो जाएगा 
और तुम्हारा जीना दुश्वार 
तुम कहोगी …………क्यों डरा रही हूँ 
क्या सारी दुनिया में सारी स्त्रियों पर 
होता है ऐसा अत्याचार 
क्या स्त्री को कोई सुख कभी नहीं मिलता 
क्या स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं होता 
क्या हर स्त्री इन्ही गलियारों से गुजरती है 
तो सुनो ……………एक कडवा सत्य 
हाँ ……………एक हद तक ये सच है 
कभी न कभी , किसी न किसी रूप में 
होता है उसका बलात्कार 
कभी  इच्छाओं का तो कभी उसकी चाहतों का 
तो कभी उसकी अस्मिता का 
होता है उस पर अत्याचार 
यूं ही नहीं कुछ स्त्रियों ने आकाश पर परचम लहराया है 
बेशक उनका कुछ दबंगपना  काम आया है 
मगर सोचना ज़रा ……ऐसी  कितनी होंगी 
जिनके हाथों में कुदालें होंगी 
जिन्होंने खोदा होगा धरती का सीना 
सिर्फ मुट्ठी भर …………… एक सब्जबाग है ये 
नारी मुक्ति या नारी विमर्श 
फिर चाहे विज्ञापन की मल्लिका बनो 
या ऑफिस में  काम  करने वाली सहकर्मी 
या कोई जानी मानी हस्ती 
सबके लिए महज  सिर्फ देह भर हो तुम 
फिर चाहे उसका मानसिक शोषण हो या शारीरिक 
दोहन के लिए गर तैयार हो 
प्रोडक्ट के रूप में प्रयोग होने को गर तैयार हो 
अपनी सोच को गिरवीं रखने को गर तैयार हो 
तो आना इस दुनिया में ………… तुम्हारा स्वागत है 

क्रमश : …………

बुधवार, 4 जून 2014

तुम्हारा स्वागत है ……भाग 1


तुम   कहती  हो  
" जीना है मुझे "
मैं कहती हूँ ………… क्यों ?
आखिर क्यों आना चाहती हो दुनिया में ?
 क्या मिलेगा तुम्हे जीकर ?
बचपन से ही बेटी होने के दंश  को सहोगी 
बड़े होकर किसी की निगाहों में चढोगी
तो कहीं तेज़ाब की आग में खद्कोगी
तो कहीं बलात्कार की  त्रासदी सहोगी 
फिर चाहे वो बलात्कार 
घर में हो या बाहर 
पति द्वारा हो या रिश्तेदार द्वारा या अनजान द्वारा 
क्या फर्क पड़ता है या पड़ेगा 
क्योंकि 
शिकार तो तुम हमेशा ही रहोगी 
जरूरी नहीं की निर्वस्त्र करके ही बलात्कार किया जाए 
कभी कभी  जब निगाहें भेदती हैं कोमल अंगों को 
बलात्कृत हो जाती है नारी अस्मिता 
जब कपड़ों के अन्दर का दृश्य भी 
हो जाता है दृश्यमान देखने वाले की कुत्सित निगाह में 
हो जाती है एक लड़की शर्मसार 
इतना ही नहीं कोई फर्क नहीं पड़ता 
तुम बच्ची हो , युवा या प्रौढ़ 
तुम बस एक देह हो सिर्फ देह 
जिसके नहीं होते हाथ, पैर या मन 
होती है तो सिर्फ शल्य चिकित्सा की गयी देह के कामुक अंग 
उनसे इतर तुम कुछ नहीं हो 
क्या है ऐसा जो तुम्हें कुलबुला रहा है 
बाहर आने को प्रेरित  कर रहा है 
क्या मिलेगा तुम्हें यहाँ आकर 
देखो तो ………….
 कितनी निरीह पशु सी 
शिकार हो चुकी हैं न्याय की आस में 
मगर यहाँ न्याय
एक बेबस विधवा के जीवन की अँधेरी गली सा शापित खड़ा है 
कहीं नाबलिगता की आड़ में तो कहीं संशोधनों के जाल में 
मगर स्वयं निर्णय लेने में कितना सक्षम है 
ये आंकड़े बताते हैं 
कि न्याय की आस में वक्त करवट बदलता है 
मगर न्याय का त्रिशूल तो सिर्फ पीड़ित को ही लगता है 
हो जाती है वो फिर बार- बार बलात्कृत 
कभी क़ानून के रक्षक द्वारा कटघरे में खड़े होकर 
तो कभी किसी रिपोर्टर द्वारा अपनी टी आर पी के लिए कुरेदे जाने पर 
तो कभी गली कूचे में निकलने पर 
कभी निगाह में हेयता तो कभी सहानुभूति देखकर 
तो कभी खुदी  पर दोषारोपण होता देखकर 
अब बताओ तो ज़रा ………… क्या आना चाहोगी इस हाल में 
क्या जी सकोगी विषाक्त वातावरण में 
ले सकोगी आज़ादी की साँस 
गर कर सको ऐसा तो आना इस जहान में ……………तुम्हारा स्वागत है 

क्रमश : …………

शनिवार, 31 मई 2014

हाशिया



हाशिये पर रहने वालों के 
न पेट होते हैं न जुबाँ न दिल 
न होती हैं उनकी जरूरतें 
आखिर सुरसा भी क्यों 
उन्ही के यहाँ डेरा जमाये 
तो क्या नहीं होती उनकी कोई पहचान 
क्या नहीं होता उनका कोई अस्तित्व 
जब नहीं होता पेट जुबाँ या दिल 
तो कैसे स्वीकारा जाए अस्तित्व  ....... 
एक सोच , एक प्रश्न 
अस्तित्व की देहलियों पर पाँव पसारे 
उत्तर के लिए दक्षिण दिशा में देख रहा है 
क्योंकि सुना है 
दक्षिण की तरफ पाँव तो अंतिम यात्रा में ही हुआ करते हैं 
तो क्या ये अंत है ?
हाशिये की आँख में ठहरा ये प्रश्न देख रहा है 
अपने  अंतिम विकल्प की ओर 


समाज की सुंदरता में दाग भर होना 
ही क्या इस समय का कोढ़ है 
जिसे खुजाने पर रिसता लहू 
नहीं देता पहचान उनके होने की 
नपुंसकों के जंगल में 
जाने कौन सी आदिम परम्परा 
वाहक बनी इठलाती है 
जो नहीं दिखता  हाशिया 
न हाशिये पर खड़ी 
एक पूरी जमात 
फिर वो किसी रेखा से नीचे के तबके हों 
या फिर दलित 
या संसार को आधार देने वाली स्त्री 
सभी  को हाशिया ही नसीब हुआ 
जिन्हें नहीं गिना जाता किसी जनाधार में 
जिनके नहीं होते कोई गणित 
एक पूरी संकुचित श्रेणी में शामिल 
एक ऐसा वर्ग जिसके होने पर ही 
प्रश्नचिन्ह लगा होता है 
आखिर ये है तो है क्यों ?


प्रश्न यहीं खड़ा हुआ 
फिर कौन सा समाज 
हाशिये के दूसरी तरफ खड़ा 
बना रहा है नियम मर्यादाएं अपनी सुविधानुसार 
जहाँ नहीं हैं स्त्रियों का अस्तित्व 
जहाँ नहीं है कोई तबका या दलित 

ये किस जंगल के क़ानून को 
लागू करने की जद्दोजहद है 
जहाँ सिर्फ बाघ , शेर और चीते ही 
अपनी चिंघाड़ों , अपनी दहाड़ों से 
दहला रहे हैं जंगल का सीना 
और बन्दर , खरगोश , लोमड़ी ,भालू 
अपनी मांद  में दुबकने को मजबूर 
क्या यही है लोकतंत्र ?
क्या यही है मानवीयता का उज्जवल पक्ष 
जहाँ बाकी सब पक्ष हो जाते हैं विपक्ष 

समानता सामाजिकता की बुनियादें 
जहाँ चूल सहित उखड चुकी हैं 
नहीं बचे अवशेष 
किस खुरदुरी मानसिकता का पोषण 
कर रहा है किस खुरदुरे समाज का निर्माण 
जहाँ किसी मर्यादा का कोई औचित्य ही नहीं 
जहाँ सब ओर सिर्फ शकुनि ही बिछाए हैं बिसात 
और दांव पर लगा है हाशिया 
जिसके चीर को बढ़ाने अब नहीं आता कोई कृष्ण 
बस है तो सिर्फ एक सभा अंधों की 
और दुश्शासन खींच रहा है मर्यादा के अंतर्वस्त्र 

आखिर कब तक होता रहेगा चीरहरण 
हाशिये पर खड़ी  मर्यादाओं का 
सभ्य समाज का निर्माण 
क्या स्वप्न ही रहेगा ?
मर्यादा का हनन ही बस 
जंगल का कानून रहेगा ?
प्रश्नों के जंगल कुलबुला रहे हैं 
मगर शेर , चीते और बाघों की दहाड़ें 
जज़्ब कर रही हैं सब कुलबुलाहटें 

क्योंकि 

हाशिया तो हाशिया है 
उसे कब तवज्जो मिली है 
उसके अस्तित्व को कब स्वीकारा गया है 
कुचले मसले जाना ही उसकी नियति है 
अधिकारों के लिए लड़ना उसे कहाँ आता है 
आवाज़ ऊंची करना उसे कहाँ आता है 
जानते हैं कर्णधार 
इसलिए 
चल रहा है सुशासन जंगल में 
हा हा हा के शोर के नीचे दब जाती हैं सारी आवाज़ें 
क्योंकि 
पीड़ित सिर्फ पीड़ा भोगने को ही जन्मते हैं जानता है जंगल का कानून 
इसलिये
पीडित को ही दण्डित करना है जंगल का कानून !!!

गुरुवार, 29 मई 2014

कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!


ख्यालों के बिस्तर भी 
कभी नर्म तो कभी गर्म हुआ करते हैं 
कभी एक टॉफ़ी की फुसलाहट में 
परवान चढ़ा जाया करते हैं 
तो कभी लाखों की रिश्वत देने पर भी 
न दस्तक दिया करते हैं 
ये तो वो पंछी हुआ करते हैं 
जो बिन पंख परवाज़ भरा करते हैं 
तभी तो ये अजीबोगरीब ख्याल 
टकराने आ गए 
मुझमे भी इक कौतुहल जगा गया
 
ईश्वर ने दो को बना सृष्टि बनायीं 
स्त्री और पुरुष में ही सारी प्रकृति समायी 
इक दूजे से भिन्न प्रकृति बना 
दो अलग व्यक्तित्व बना डाले 
और दुनिया के जंजाल में फंसा डाले 
दोनों न संतुष्ट हो पाते हैं 
इक दूजे पर इलज़ाम लगाते 
दुनिया से कूच  कर जाते हैं 

अजब खेल के अजब नियम बनाये 
कोई न किसी को समझ पाये 
तब ख्यालों ने इक जुम्बिश ली 
और बन्दूक की गोली सी 
जैसे इक ख्याल की लकीर उभरी 
गर विधाता ने इक करम अता किया होता 
चन्द्रमा के पुत्र बुध की तरह 
स्त्री और पुरुष दोनों को  
कुछ महीने स्त्री और कुछ महीने पुरुष बनने का 
सुअवसर दिया होता 
तो सारा झगड़ा ही निबट गया होता 
दोनों इक दूजे के आचरण , व्यवहार , स्वभाव 
से वाकिफ हो गए होते 
दोनों को इक दूजे के कामों और उनकी दुरुहता 
से पहचान हो गयी होती 
फिर न इक दूजे पर आक्षेप लगाए जाते 
फिर न इक दूजे को कमतर आँका जाता 
फिर न इक दूजे से कोई अपेक्षा होती 
फिर न कोई लिंगभेद होता 
एक सभ्य सुसंस्कृत स्त्री पुरुष से भरा 
ये जहान  होता 

बेशक कहने वाले कह सकते हैं 
वो भला कब स्वीकार्य हुआ था 
तो उसका जवाब यही है 
तब तो एक ही तरह की सृष्टि थी 
जिसमे इस तरह का भेद कैसे स्वीकार्य होता 
मगर यदि विधाता ने 
ऐसी सृष्टि का निर्माण किया होता 
जहाँ दोनों को दोनों रूपों में ढलने का 
समान अवसर दिया होता 
फिर न शिकवों शिकायतों का ये दौर होता 
न पुरुष स्त्री के कामों की समीक्षा करता 
न स्त्री की तरह सोचने या उसके कार्यकलापों का 
वर्णन करने का प्रयत्न करता 
क्योंकि वाकिफ हो गया होता वो 
स्त्री होने के अर्थों से 
और स्त्री भी जान चुकी होती 
पुरुष के दम्भ और पौरुष के 
गहरे नीले स्रोतों को 
तो कितना सुखद जीवन होता 
कोई न किसी के प्रति जवाबदेह होता 
बल्कि सहयोग और समझदारी का 
इक सुखद वातावरण होता 

मगर विधाता तो विधाता ठहरे 
उन्हें क्या फर्क पड़ता है 
उनका काम तो अब भी चलता है 
ये तो मानव की कमजोरी है 
जो उसे खोज के नए सूत्र देती है 
और नए अविष्कारों के प्रति आकर्षित करती है 
तभी तो इस ख्याल ने दस्तक दी होगी 
यूँ  ही नहीं ख्याल के बिस्तर पर 
सिलवट पड़ी होगी 
कोई तो ऐसी बात हुयी होगी 
जिसने ख्याल को ये  आकार दिया होगा 
कभी सोचना इस पर भी ……… ओ विधाता !!!


तब न सीता की अग्निपरीक्षा होती 
तब न कोई कहीं अहिल्या किसी राम की 
प्रतीक्षा में होती 
तब न पांचाली के शीलहरण का 
प्रयास हुआ होता 
और न ही तुम्हें वस्त्रावतार लेना पड़ता 
तो इतिहास का हर अध्याय ही बदल गया होता 
घर घर न महाभारत का दृश्य होता 
भाई भाई का न यूं दुश्मन होता 
हर स्त्री घर बाहर सुरक्षित होती 
उसकी अस्मिता न हर पल 
दांव पर लगी होती 
न ही आज निर्भया जैसी 
कितनी ही हवस की भेंट चढ़ी होती 
स्त्री पुरुष का एक समान अस्तित्व ही 
उनकी पहचान हुआ होता 
कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!

सृष्टि बनायीं तो 
कम से कम समान 
अवसर भी दिए होते 
एक को कमजोर 
और दूसरे को ताकतवर बना 
न यूं भेदभाव किये होते 
कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!


क्या करूँ ऐसी ही हूँ मैं 
तुम्हारी बनायीं कृति 
तुम पर ही आरोप न लगाएगी 
तो भला किसे दिल गुबार सुनाएगी 
वैसे उम्मीद है
फितूरों के जंगल में उगी नागफनी सा ये ख्याल कचोटेगा तो जरूर तुम्हें भी ....... ओ विधाता !!!


( डायरैक्ट पंगा गॉड से :) )

शनिवार, 24 मई 2014

विदाई की बेला में

मैं ,तुम, वह से परे भी 
इक संसार हुआ करता था 
पता नहीं 
वक्त की साज़िशें हुईं
या रुत ने करवट बदली 
जाने कहाँ खो गया
अब 
क्या होगा कहने से 
भुला देना मुझे 
मेरे जाने के बाद 
जबकि जानता हूँ ये सत्य 
कौन याद रखता है किसी को 
किसी के जाने के बाद 
इसलिए 
कहता हूँ यारों 
भुला दो मुझे 
मेरे जाने से पहले 
कम से कम इत्मीनान रहे 
आया था अकेला 
तो कहाँ मिलते हैं साथी 
विदाई की बेला में साथ 
मोह के बंधन शायद
कुछ कम हो जाएं ..........   और जाना सुगम 

यूँ भी दरख़्त से पत्तों के झड़ने का मौसम गवाह है चिन्हित दिशा का 

बुधवार, 21 मई 2014

कशमकश के इस दौर में .....

बेटी 
क्या कहूँ 
जाने उम्र का तकाज़ा है 
या मेरी आकांक्षाएं बढ़ गयी हैं 
नहीं जानती 

जबकि जानती हूँ 
तुम्हारी प्रतिबद्धता 
तुम्हारा समर्पण 
परिवार के प्रति 

ये भी जानती हूँ 
तुम उम्र के जिस दौर में हो 
वहाँ अठखेलियाँ करती होंगी 
तुम्हारी भी चाहतें 
वहाँ आकार लेती होंगी 
तुम्हारी भी उमंगें 
अपने मन से सब कुछ करने की 
बिना रोक टोक जीने की 
अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ 

जानती हूँ 
तुम हो पूरी तरह समर्पित परिवार को 
फिर भी जाने क्यों 
कभी कभी हो जाती हूँ निराश 
जाने क्यूँ चिड़चिड़ाहट पाँव जमा 
कर देती है घाव मेरी सोच के वृक्ष पर 
और उतार देती हूँ अपना सारा कलुष 
तुम पर , तुम्हारे रहन सहन पर 
ये हर वक्त तुम्हारा व्हाट्स अप या फेसबुक 
या दोस्तों के साथ चैटिंग  पर लगा रहना 
कर देता है विचलित मेरी मनोदशा को 
आखिर कब समझोगी तुम अपनी जिम्मेदारी 

जबकि जानती हूँ 
किसी भी तरह पीछे नहीं हटतीं तुम 
अपनी जिम्मेदारियों से 
नहीं पीछे हटतीं तुम अपने कर्तव्यों से 
मगर फिर भी 
एक फितूर की लहर 
खींच देती है विषम रेखा 
तुम्हारे और मेरे बीच 
और फूट पड़ता है मेरा लावा सारा 
बेवजह ही तुम पर 
जबकि नहीं चाहती ऐसा करना 
फिर भी हो जाता है 
सब कुछ जानते समझते भी 

अजब दोराहे से गुजरती हूँ 
एक तरफ समय के साथ 
तुम्हें चलते देख 
गौरान्वित महसूस करती हूँ 
दूसरी तरफ खुद को 
जब असहाय या अकेला महसूस करती हूँ 
तब कर देती हूँ विषवमन बिना सोचे समझे 
शायद उम्र के इस मोड़ पर 
जहाँ एक तरफ मीनोपॉज 
दस्तक देता हो 
दूसरी तरफ शारीरिक स्तर गिर रहा हो 
संभव है गुजरती हो हर माँ इस दौर से 
लगता है कभी कभी ऐसा 

इसलिये आत्म ग्लानि से ग्रसित हो जाती हूँ 
जब जानते समझते भी 
खुद पर काबू नहीं कर पाती हूँ 
और सोच में पड़ जाती हूँ 
क्या होगा कल 
जब तुम चली जाओगी 
और दूसरे घर की बेटी को 
अपनी बेटी बना जब लाऊँगी 
कैसे खुद पर काबू कर पाऊँगी 
क्या वो समझ सकेगी मेरी मनोदशा 
जैसे तुम समझती हो 
और मेरे मानसिक और शारीरिक 
परिवर्तन को समझ  
मेरे कहे पर तवज्जो न दे 
हँस कर हवा में उडा देती हो 
जबकि जानती हूँ 
जरूरी है परिवर्तन 
मेरे स्वयं में 
अपनी सोच में , अपने व्यवहार में 
अपनी बोलचाल में 
और यही सोच अंदर ही अंदर 
पैदा कर रही है एक भय 
साथ ही दे रही है एक सन्देश भी 
कि शायद 
यही तो नहीं वो वजह होती 
जिसकी वजह से 
सास बहू में नहीं पटती 
दोनों एक दूसरे को नहीं समझतीं 
क्योंकि 
न सास के लिए बहू बेटी होती है 
और न ही बहू के लिए सास माँ 
जबकि उमंगों के रथ पर आरूढ़ 
नयी नवेली दुल्हन के भी तो 
कुछ अरमान होते हैं 
ये मैं जानती हूँ 
क्योंकि गुजरी हूँ उस दौर से भी 
मगर फिर भी यही भय सताता है 
कैसे खरी उतरूँगी रिश्ते की कसौटी पर 
जब तुम्हारे संग ही नहीं 
खरी उतर पाती 

जबकि जड़ सोच की नहीं हूँ मैं 
ये तुम जानती हो 
न ही परम्पराओं की दुहाई दे 
कुछ मनवाने की इच्छा रखती हूँ 
बल्कि खुद तोड़ देती हूँ 
हर उस बेड़ी को 
जो राह में रुकावट बनती दिखती है 
आज की आधुनिक नारी का 
खुद में दिग्दर्शन करती हूँ 
फिर भी 
जाने कैसी जद्दोजहद है ये 
मेरी मुझसे ही 
सब कुछ जानते समझते भी 
अँधेरी गलियों में 
घसीटे जा रही है 

क्या उम्र के तकाज़े यूँ बेबस किया करते हैं 
सोच के स्तर को भी 
जिसे धरती मिलती है न आस्मां ……
जानने को प्रयासरत है एक माँ , एक नारी 
उम्र की बढ़ती दहलीज पर प्रश्न दस्तक  दे रहा है ………

क्यूंकि 
सास भी कभी बहू थी 
क्यूंकि 
माँ भी कभी बेटी थी 
ये जानते हुए भी 
फिर कैसे विडंबनाओं के त्रिशूल 
निकल आते हैं पहाड़ों के शिखरों पर 
सोच की कंदराओं को भेदते हुए 

अपेक्षा और उपेक्षा की 
कशमकश के इस दौर में 
झूलती मेरी संवेदनाएं 
खरोंच रहीं हैं प्रतिपल 
इसलिए खुद से मुखातिब होने को 
खुद को अपनी कसौटी पर कसने को 
लिख रही हूँ ये मेरा खत मेरे नाम 
और 
प्रश्न उम्र की चौखट पर मुँह बाए उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा है........आदिकाल से !!!