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बुधवार, 7 मार्च 2012

ओ मेरे "रंगरेजिया"





सांवरे "रंगरेज़िया" 
मै हो गयी तिहारी 
जिस रंग चाहो चूनर रंग दो 
ओ मेरे "सांवरिया" 

प्रीत को चाहे अटरिया चढा दो 
रंग मे चाहे प्रीत सजा दो 
कब से कोरी पडी है चूनर 
लाल रंग मे रंग दो श्यामल 
कर दो मुझको भी श्यामल श्यामल 
ओ मेरे "श्याम पिया "

होरी का बना है बहाना
श्याम तुम्हें है मिलने आना
अपने ही रंग में रंग कर है जाना
ओ मेरे "रंगरेजिया" 

एक फाग हम संग भी खेलो
तुम हो मोहन राधे मुझे बना लो
जन्म जन्म की आस मिटा दो
एक ही बूँद में प्यास मिटा दो 
ओ मेरे "मोहनिया "


आज तो बाजी दिल की लगा दी
श्याम रंग में चूनर रंग दी
जीत गयी तो बनूंगी तुम्हारी
हार गयी तो अपनी बनाना
अब न चलेगा कोई बहाना
श्याम रंग में है रंग जाना
ओ मेरे "श्यामलिया "

ओ रंगरेजिया मेरी रंग दो चुनरिया 
ओ सांवरिया मेरी रंग दो चुनरिया
ओ बनवारी बनो मेरे खिवैया 
ओ गिरधारी पार लगा दो नैया 




सोमवार, 5 मार्च 2012

होली का हुडदंग

दोस्तों
इस बार होली का हुडदंग शुरू करती हूँ हाइकू के संग .........पहली बार कोशिश है आप सबके समक्ष रखने की .......... उम्मीद है खरी उतरूंगी और यदि कोई त्रुटि हो तो मार्गदर्शन कीजियेगा 









मुख गुलाल 
नखरे वाली नार 
नैन कटार




रंग में भंग 
लाज भरा घूंघट
बेस्वाद फाग 





भौजाई संग 
खेले देवर होली 
फागुनी रंग 


गोपी दीवानी 
प्रेम फुहार मारे 
वो बनवारी 




निगोड़ी फाग 
बालम परदेसी 
हो  कैसे होली 




टेसू अबीर 
रंग गुलाल खेलें
कटीली  नार 





सजीले पिया 
तेरे बिन दिल का 
जहान फीका 





लाज शरम 
गयी मारी उनकी 
छेड़ें मोहन 




नैन कटार 
मारते बनवारी 
लजाये राधा 




सूनी रे होरी
ना चटकीले रंग 
मैं इस पार 



टेसू का रंग 
मन का मकरंद
भंग में मस्त 





फागुनी रंग
होली का हुडदंग 
कान्हा के संग 




मैं ब्रजनार
तुम  माखनचोर 
लगाओ जोर 




प्रीत की डोरी
तुम संग है जोड़ी 
मतवाले जू 




जो तुम संग 
खेलूँ फाग मोहन 
हो अनुराग 




हो अनुराग 
प्रीत चढ़े अटारी
मिलें मुरारी 




मिलें मुरारी
हो जाऊँ बावरिया
मैं सांवरिया 




मैं सांवरिया 
की बनूँ दुल्हनिया
ओढ़ चुनरी 




लाल की लाली 
चढ़ी रंग ऐसे ही
जैसे सिन्दूर 




अब मैं लाल 
मेरा मोहन लाल 
लाल में लाल 




भक्ति की शक्ति 
बिन पिए है चढ़ी 
रूह की मस्ती 



शुक्रवार, 2 मार्च 2012

ब्लॉग समाचार ........ये पब्लिक है सब जानती है ....


दोस्तों 
मैं आपकी जानी - पहचानी ब्लॉगर  ओह नो सिर्फ जानी, पहचानी नहीं ,क्यूँकि जो भी मिलता है पहचानता ही नहीं .......हाँ जनता जरूर है तो सिर्फ जानी ब्लोगर वन्दना गुप्ता आपके लिए ब्लॉगवुड के ताजा गरमागरम समाचार लेकर हाजिर हूँ ...........

देखिये गर्मी का मौसम आ रहा है और इसका अंदाज़ आप इसी से लगा सकते हैं कि ब्लॉगवुड का माहौल भी गरम होने लगा है .......आप जानते ही हैं यहाँ मौसम कब - कब गरम होता है ........अरे भई जब या तो कोई विवादास्पद लेखन हो या सम्मान मिलना हो या पुस्तक का विमोचन आदि हो और अब ये सब होना शुरू हो चुका है तो माहौल का गरम होना भी लाजिमी है ...........और ऐसे हालात में जब मौसम गरम होने लगे थोड़ी एहतियात बरतनी चाहिए मगर कुछ मानिकलाल जैसे ब्लॉगर  दूसरे के फटे में टांग अडाये बिना नहीं रहते या कहिये दूर से रहकर अवलोकन करते हैं , मौसम को गरमी को सहने के लिए पहले से ही अपने इंतजामात कर लेते हैं ..........पर इस बार तो मानिकलाल बेचारा बहुत परेशान था आया मेरे पास और कहने लगा ...........


यार ये पेट में बहुत मरोड़ उठ रही थी ........आखिर इतने दिन हो गए कोई controversy नहीं हुई ना ........जब तक ऐसा ना हो मज़ा कहाँ आता है वैसे भी होली आ रही है और रंग ना बरसे , चूनर वाली ना भीगे तो होली का क्या आनंद .........सोचो तो सही ..........अभी मानिकलाल ये सोच ही रहा था कि पैदा हो गया एक नया झोलझाल लेकर गोलमाल और मानिकलाल की तो हो गयी जी बल्ले बल्ले हो जायेगी बल्ले बल्ले .........होली आई रंग बिरंगी होली आई साथ में देखो कैसी कैसी controversy लायी मानिकलाल की बाँछें खिल आयीं .........मानिकलाल लगा कूदने .....कभी कभी भगवान कितनी जल्दी सुनता है मुँह मांगी मुराद जो मिल गयी थी उसे .........आखिर बेचारा क्या करता इतने वक्त से ब्लॉगिंग कर रहा था और उसका कोई नतीजा जो नहीं निकल रहा था ..........यूँ तो ब्लॉगजगत में अपनी पहचान बना चुका था छोटी मोटी सी मगर रहता थोडा अलग - थलग सा ही था .........उसे देख लोग उसके गुणगान करते और वो उसी में खुश कि आखिर हम भी तो कुछ बन ही गए  हैं अपनी एक पहचान के साथ इतने लोग जानने लगे हैं सोच- सोच मूंछों पर ताव देता ............मगर बेचारा मानिकलाल आखिर इज्जत भी कोई चीज  है उसे कायम रखना आसान कहाँ होता है इसलिए बेचारा कुछ ना कहता सबको प्रोत्साहित करता, अच्छेपन का नकाब हर वक्त ओढना पड़ता कई बार तो गलत को भी गलत नहीं कह पाता और अन्दर ही अन्दर कसमसाता .........यार ये अच्छा होना भी गुनाह हो जाता है कई बार ..........चलो कोई बात नहीं इतने साल से सब देखता सुनता पढता और मुस्कुराता इस दुनिया कि अजीबोगरीब बंदिशों पर .........मगर दुनिया है ऐसी ही है ऐसे ही चलेगी के फंडे में खुश रहता ...........मगर ये क्या ? उसकी खुशियों पर तो तुषारापात होना शुरू हो गया उसी दिन से जबसे उसने सम्मानों पुरस्कारों के बारे में सुना .........अन्दर ही अन्दर सोचता इस बार तो पुरस्कार पर अधिकार मेरा होगा कम से कम एक तो जरूर मिलेगा मगर ये क्या जैसे ही मौका आया बेचारे ने अपने नाम का कहीं अता -पता ही नहीं पाया और उस दिन उसे लगा बेटे यहाँ पर सिर्फ अच्छे बने रहने से कुछ नहीं होगा .........यहाँ तो जुगाड़ लड़ाने पड़ते हैं , भाई बहन बनाने पड़ते हैं, गुरु - चेला बनाना पड़ता है वो ही तो नाम recommend करता है .........चलो कोई नहीं अगली बार तो करिश्मा करना ही पड़ेगा और बेचारा मानिकलाल बैठ गया किनारे में दो चार गुब्बारे खाकर और चोटों को सहलाकर .........मगर अन्दर का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा आखिर अच्छाई के कीड़े भी तो बाज नहीं आते ना कुलबुलाने से बेचारे फिर अपने राह निकल पड़ा मगर ये क्या हर बार की तरह फिर निराशा ही हाथ लगी ...........उसके बाद आने वाले आगे बढ़ गए और वो खड़ा- खड़ा गुबार देखता रहा ........लोगों ने उसके चेहरे पर दिखावे का रंग मला और आगे बढ़ गए और वो उनके लिए तालियाँ ही बजाता रह गया ...........रोज सबकी पुस्तकों का विमोचन होना सुनता और खुद को तसल्ली देता कोई नहीं अपने दिन भी फिरेंगे कभी हम भी इस खेमे में जुड़ेंगे ...........दुश्मनों को दोस्त बनते देख रहा था सिर्फ पुस्तक छपनी चाहिए फिर चाहे उसकी कोई भी कीमत क्यूँ ना चुकानी पड़े , आत्मसम्मान ही गिरवीं क्यूँ ना रखना पड़े मगर इससे नाम तो होगा ना साहित्यकारों की जमात में शामिल तो हुआ जा सकेगा ना ..........इस अजीबोगरीब खेल को देख रहा था ख़ामोशी से ..........कैसे दुनिया रंग बदलती है कल जो बुरा था आज वो कैसे अच्छा हो गया .........ये बात उसके पेट में मरोड़ मार रही थी और वो इतने दिनों से कसमसा रहा था आखिर ये कैसे संभव हुआ और फिर जब उसे सारा चाल - हाल मिला तो गुंझिया , मालपुए सब एक बार में उसके स्वाद में उतर आये होली के रंग उसकी ख़ुशी में चार चाँद लगा गए .......अब तो उसे चारों तरफ रंग ही रंग दिख रहे थे क्योंकि कहने वालों ने कहना शुरू कर दिया था ........खामियां निकालने वालों ने खामियां निकलना शुरू कर दिया था ............जो कल जीरो थे आज हीरो बन गए थे और जो कल हीरो थे वो अपनी बराबरी देख जल रहे थे ..........आखिर आग लगे और धुंआ ना उठे ऐसा तो नहीं हो सकता ना ...........और अब वो देख रहा था कैसे एक दूसरे का इस्तेमाल किया और फिर मीठी मार से मार दिया ...........ऐसा रँगा कि ज़िन्दगी भर रंग ना उतरे .............अब शोलों की पिचकारियाँ चलनी शुरू हो गयी थीं और मानिकलाल की होली तो मन गयी थी ..........कान पकड़ तौबा कर रहा था अगर यही हाल होना है तो उससे अच्छा ना छपना ही था ये बात उसने समझ ली थी........छपास का रोग बड़ा बुरा बड़ा बुरा जी बड़ा बुरा .............चलो जो भी हो अपने बाप का क्या जाता है ........हमें तो होली में ऐसा ही रंग भाता है सोच कर मानिकलाल आज दोनों हाथों में गुब्बारे लिए दौड़ रहा था रंग भरे ...........कोई कहीं किसी पर मारे वो क्यूँ कुढ़े आखिर होली का त्यौहार एक बार आता है और मस्ती का आलम तो तभी भाता है जब सामने वाला पस्त नज़र आता है और आज तो उसकी मन की मुराद पूरी हो गयी थी ,अब पड़ेंगे रंग बिरंगे गुब्बारे , सबके चेहरों और कपड़ों पर रंग ही रंग दिखेंगे ये सोच वो मस्त हो गया अपनी होली में .......बिन पीये भंग का नशा तारी हो गया ....और तरह तरह के  गाने  गा रहा था ...........


क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में ............

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ....इस शेर को सालन लगा रहा था 


अब मानिकलाल ठहरा मानिकलाल और उसका दिमाग तो उसका दिमाग ही ठहरा ........सोचने पर टैक्स थोड़े लगता है सो एक बात और सोच बैठा ...............


 कहीं ये एक दूसरे पर कीचड उछालना , कहना सुनना भी कोई राजनीति तो नहीं ..........अरे भाई राजनीति तो सबमे होती है आखिर जैसे फिल्म का promotion होता है वैसे ही किताबों का भी तो होना चाहिए फिर उसके लिए चाहे जैसे publicity मिले और लोगों में curiocity बढे ............
.
.दिमागी कीड़ा एक नया फंडा कब उछल पड़े कोई कुछ नहीं कह सकता  .............:))
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तो दोस्तों ये है मोरल ऑफ़ द स्टोरी 

होली है जी होली है
बुरा ना मानो होली है :))))))))))))))
ये हम मस्तों की टोली है 
बुरा ना मानो होली है :)))))))))))))))
आज तो हम भी शब्द बाण चलाएंगे
होली के रंगों में सबको नहलायेंगे
ज्यादा गरम माहौल न किसी को भाता है
तभी तो जल्दी ही गले वो मिल जाता है  
वैसे भी होली की मस्त फुहारों में
सब गिले शिकवे मिट जायेंगे 
होली है जी होली है
बुरा न मानो होली है :))))))))))))))


तो दोस्तों ............ये थी मानिकलाल की व्यथा और उसका निराकरण जिसका किसी भी बिरादरी से कोई सम्बन्ध नहीं है ये सब सिर्फ और सिर्फ उसकी सोच की उपज है ...........अब कोई अपने ऊपर ना ले और ले तो ले ले भाई ..........उसके बाप का क्या जाता है ..............वो तो अपनी मस्ती में गाता है 


ये पब्लिक है सब जानती है ..........पब्लिक है
अजी अन्दर क्या है अजी बाहर क्या है
ये सब कुछ पहचानती है 
पब्लिक है सब जानती है............


चलो आज के ब्लॉग  बुलेटिन लिए इतना ही .........कुछ दिनों में ऐसे माहौल गरमाता रहना चाहिए इससे जीवन्तता बनी रहती है और जो छुपे दुबके खरगोश कछुए  आदि हैं उन्हें भी निकलने का मौका मिलता रहना चाहिए तभी संतुलन कायम रहता है ..........तो दोस्तों वैसे भी होली आ रही है तो उसमे इतनी मस्ती तो होनी ही चाहिए 

बिना छेड़ छड के होली किसे भाती है 
भांग के सुरूर बिना होली कब आती  है 

अब दीजिये आज्ञा .........जब तक कोई नया मुद्दा नहीं गरमाता तब तक आनंद लीजिये होली का 

और गाइये ये गाना............

पिया संग खेलूँ होरी फागुन आयो रे .........हो फागुन आयो रे .........चाहे तो इस लिंक पर जाकर सुन भी सकते हैं ............:)))))



बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012

पाला पडी फ़सलो मे फ़ूल नही उगा करते

लो फिर दिन ढल गया
शाम हो गयी
मगर बता है ए दिल
आज कौन सी बात
खास हो गयी
क्या दिन अपने वक्त
पर नही ढला
या सांझ ने आने से
मना किया
या भोर ने रूप बदल लिया
बता ना
आज तुझे क्या हुआ
जो दिल ढलने का
तुझ पर असर हुआ
लगता है
कोई बिछडा रकीब तुझे मिल गया
जो दिन ढलने का तुझे गम हुआ
या शायद
कोई आंसू कहीं उलझ गया
जो आँख की किरकिरी बन गया

बता ना
आज मौसम कैसे बदल गया
लगता है
सांझ की चौखट पर पाला पड गया
तभी तू भी इतना बिखर गया
जानता है ना
पाला पडी फ़सलो मे फ़ूल नही उगा करते ……………

रविवार, 26 फरवरी 2012

यादों का झुरमुट समेट लायी हूँ मै एक गंगा साथ ले आयी हूँ

दोस्तों
कल मेरा अपने ननिहाल अनूपशहर (छोटी काशी ) जो कहलाता है वहां जाना हुआ . मौका तो ऐसा था कि क्या कहूं ? लेकिन पता था शायद अब आना संभव नहीं होगा तो कुछ यादें समेट लायी . यूं तो मेरी मामी जी ने ४-५ दिन पहले इस दुनिया से विदा ले ली तो उसी सन्दर्भ में जाना हुआ और अब न ही मामा जी रहे तो लगा जैसे अब फिर कभी जाना हो न हो तो क्यों न सब यादों को समेट लिया जाये ........वैसे उनके दो लड़के वहां रहते हैं मगर कहाँ जाना होगा .........जब अभी पिछले २७-२८ सालों में सिर्फ मामाजी और मामीजी के दुनिया से कूच करने पर ही जाना हुआ तो आगे का क्या सोच सकती हूँ ..........बस इसलिए कुछ यादें हमेशा के लिए ले आई हूँ ...........कुछ ऐसे पलों को संजो लायी हूँ जो अब हमेशा मेरे साथ रहेंगे .


गाडी मे से चलते -चलते एक नज़ारा ये भी उत्तर प्रदेश के खेत खलिहान का


 कहीं ठूंठ तो कहीं हरे- भरे



देखो मिल गया जमीं आसमाँ
कहाँ दीखते हैं ये नज़ारे 
इन कंक्रीट के गलियारों में 



आज भी खुला आसमान दिखता है 

आज भी कहीं खलिहान मिलता है





 ये है मेरे देश की मिट्टी जहाँ 


आज भी अपनापन मिलता है


राह के नज़ारे  
उपलों का संसार 
सिर्फ यहीं दिखता है  


 अनूपशहर का मन्दिर जिसके पास है ननिहाल मेरा

 ये एक छोटा सा मन्दिर जिसके साथ लगती सीढियाँ गंगा जी तक जाती हैं


आहा ! माँ गंगे के दर्शन किए 


अद्भुत आनन्द समाया 

लफ़्ज़ों मे वर्णित ना हो पाया


 बरसात के दिनो मे गंगा जी जो शेड दिख रहे हैं वहाँ तक पहुंच जाती हैं

 ना दिखा फ़र्क जहाँ धरती और आसमाँ मे

क्षितिज़ पर मिलन हुआ गंगा का दर्शन हुआ




हर हर गंगे तुमको नमन 

करो स्वीकार मेरा वन्दन



गंगा को नमन और आचमन
 मेरा भांजा ………राजू उर्फ़ उज्जवल


ये देखो त्रासदी मेरे देश की 

गंगा का पवित्र किनारा 
वहीँ बैठ करते ये मय का पान 
कहो कोई कैसे करे गुणगान



कल कल करती गंगा बहती जाये 

जिसके कदमों मे आस्माँ भी झुक जाये

 गंगा का किनारा 

शांत सुरम्य शीतल

 बहती जलधारा 

मन्द मन्द समीर ने 

मन को मोहा

 हनुमान जी की सेना ने भी लगाया डेरा

 अब कहाँ दिखता है ऐसा खुला आस्माँ और ये नज़ारे


ये वो सीढियाँ जो गंगा की तरफ़ जाती हैं


 मेरे देश के खेल खलिहान


शाम को सरसों के खेत का एक दृश्य

चलो चलें सरसों के खेत मे



 सरसों संग हम भी खिल गये


 राह के नज़ारे


 चलती गाडी से

अद्भुत आनन्द मे डूबे


सूरज को जल देते हुये


इतना अद्भुत आनंद था गंगा किनारे आने का मन ही नहीं हो रहा था .........यूं लग रहा था बस यहीं रुक जाऊं .........अन्दर तक उतार लूं इस अद्भुत आनंद को .......चारों तरफ खुला नीला आसमाँ , शांत सौम्य गंगा का किनारा , हलके -हलके बादल और मंद -मंद बहती हवा ........उफ़ !यूं लगा जैसे ओक बनाकर एक घूँट में सारा अमृत पी जाऊँ 




कमी थी तो सिर्फ एक उत्तर प्रदेश की सडकें जैसी पहले थीं आज भी वैसी ही हैं ..........अब सरकार कोई हो कुछ कब्रों पर फर्क नहीं पड़ता .....हिचकोले खाते , हड्डियाँ चटकवाते  जैसे तैसे पहुंचे हम बुलंदशहर से अनूपशहर तक ...........तौबा कर ली और इसीलिए लगा अब कभी वापस यहाँ आना नहीं होगा ........

बुधवार, 22 फरवरी 2012

मै ना बांटूँ श्याम आधा आधा

यूँ तो वो सबके हैं 
मगर केवल मेरे हैं
तभी कहता है इंसान 
जब पूरा उसमे डूब जाता है जैसे गोपियाँ …
तुम केवल मेरे हो ,
आँखों के कोटर मे बंद कर लूंगी श्याम 
पलकों के किवाड लगा दूंगी 
ना खुद कुछ देखूंगी 
ना तोहे देखन दूंगी 
ये मेरी प्रीत निराली है 
मैने भी तुझे बेडियाँ डाली हैं 
जैसे तूने मुझ पर अपना रंग डाला है 
अपनी मोहक छवि मे बांधा है 
अब ना कोई सूरत दिखती है 
सिर्फ़ तेरी मूरत दिखती है 
मेरी ये दशा जब तुमने बनायी है 
तो अब इसमे तुम्हें भी बंधना होगा 
सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा ………सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा 
अब ना चलेगा कोई बहाना 
ना कोई रुकमन ना कोई बाधा 
मुझे तो भाये श्याम सारा सारा 
मै ना बांटूँ श्याम आधा आधा 

रविवार, 19 फरवरी 2012

सीमांत सोहल जी की नज़र से ............


सीमांत सोहल जी की नज़र से भी देखिये .........कैसे कविता को नए आयाम और दृष्टि मिल जाती है और वो अनकहा भी सामने आ जाता है जहाँ तक नज़र नहीं जा पाती..........एक समीक्षक की निष्पक्ष दृष्टि ही किसी कविता का सही आकलन कर सकती है जिसका प्रमाण ये समीक्षा है ............ये फेसबुक पर पुस्तक मित्र पर की गयी समीक्षा है जिसे ज्यों का त्यों आपके सम्मुख रख दिया है अभी तक प्राप्त टिप्पणियों के साथ .................



पुस्तक "स्त्री होकर सवाल करती है "
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कवयित्री -वंदना गुप्ता
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वंदना गुप्ता हैं !उनकी दो असरदार कविताएं मौजूद हैं !वंदना गुप्ता की औरत एक झील है !एक ठहरी हुए झील !शांत ! बेखबर !लोग अपना अक्स देखने उसके पास आते रहते हैं !पहले शांत जल में अपना अक्स देखते हैं फिर उसे छेड्ने के बाद !मतलब उसमें कंकड़ फेंकने के बाद !अपने ही अक्स को बदलता हुआ देखते हैं !अपने ही अक्स का मूल्यांकन करते हैं !झील कुछ नहीं कहती !शांत रहती है !पत्थर फेंकने से पहले और पत्थर फेंकने के बाद भी !कुछ देर के लिए वह अपनी लहरों से उद्वेलित होती है !फिर शांत हो जाती है !
इस तरह पत्थर फेककर अपना अक्स देखने वालों की कमी नहीं है और पत्थर ना फेंकने वालों की भी !झील को कोई फर्क नहीं पड़ता !
झील की तकलीफ इस बात में है कि क्या पत्थर फेंके बिना काम नहीं चलता? पहले पत्थर फेंको !झील को उद्वेलित करो फिर अपना अक्स बिगाड़ो !ये समाज की किस समझदारी का नाम है ?
ऐसा भी हो सकता था कि आदमी झील के पास आकार शांत बैठ जाता !झील में अपना अक्स देखता रहता !आदमी भी शांत ,झील भी शांत !आदमी की रूह और झील की रूह दोनों साक्षात्कार करते !दोनों बेफिक्र बैठे रहते !वक्त का पता ना चलता !दिन क्या ,पूरी उम्र गुजर जाती !आदमी वृद्ध हो जाता बैठा -बैठा !झील सूख जाती धीरे -धीरे !
लेकिन ऐसा नहीं हो पाता !झील शांत रहती है !उसे कोई शिकायत नहीं है !
वंदना सच कहती हैं ,झीलें कब बोली हैं ?वो साक्षी बनती रहती हैं हर कुरूपता की ,हर गहनता की !हर तूफान को सहती हैं !अपने वजूद से ही उसे दिक्कत है !हर खामोशी की कब्र है उसमे !
बावजूद सबके, झीलें खामोश रहती हैं !
फिर वंदना एक ऐसी औरत की भी कल्पना करती हैं जिसे छूना भी गवारा ना हो !हवा का स्पर्श भी नहीं !अपना साया भी नहीं !अपने चाहने वालों से दूर !अपनी रूह से भी कोसों दूर !वंदना के शब्दों में ,वर्जित फल !ये बात अलग है कि ऐसा वर्जित फल दुर्लभ है !
वंदना की कविताओं में एक भोलापन है !निर्दोषपन है !वंदना क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं !ना ही क्लिष्ट भावों का !कविताओं में ज्यादा स्टेंजा नहीं रहते !सुस्पष्ट रहती हैं !पाठक भटकता नहीं है !कविताओं में चतुराई नहीं है !वंदना को पढ़ना सुखद लगता है !
वंदना की याद रह जाने वाली पंक्तियाँ
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खामोशी की कब्र में ही
दफन हुई हैं
मगर झीलें कभी नहीं बोली हैं
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 ·  ·  · 13 hours ago

    • Vasundhara Pandey Nishi धन्यवाद सीमांत जी ...सच कहे आप... इन बेतरतीब लाइनों में भी एक लय होता है ,कोई सवर्ण सजाना नहीं पर एक रिद्म होता है कितनी सहजता से असहज शब्दों को भी पिरो जाती हैं...पढने वाला एक ले में पढता जाये...बस पढता जाये.......खामोशी की कब्र में ही
      दफन हुई हैं
      मगर झीलें कभी नहीं बोली हैं..gajab ki panktiyan hai..

      13 hours ago ·  ·  4

    • Misir Arun वंदना गुप्ता की कवितायेँ सचमुच सुन्दर हैं लेकिन आपकी समीक्षा भी किसी कविता से कम नहीं सीमान्त जी !बधाई वंदना जी और आप दोनों को !
      13 hours ago ·  ·  4

    • सीमांत सोहल शुक्रिया वसुंधरा जी ,मिसिर जी
      12 hours ago ·  ·  1

    • अनु कोहली 'भावना' सीमान्त जी आपका आभार कि आप हमेँ कविताओँ की गहराई मेँ ले जा रहे है! कविताओँ का सौन्दर्य और निखर के आ रहा है! वन्दना जी व आपको हार्दिक बधाई!
      12 hours ago via mobile ·  ·  3

    • सीमांत सोहल शुक्रिया अनु
      12 hours ago ·  ·  1

    • Nidhi Tandon 
       वंदना की कविताओं में एक भोलापन है !निर्दोषपन है !वंदना क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं करतीं !ना ही क्लिष्ट भावों का !कविताओं में ज्यादा स्टेंजा नहीं रहते !सुस्पष्ट रहती हैं !पाठक भटकता नहीं है !कविताओं में चतुराई नहीं है !वंदना को पढ़ना सुखद लगता है !
      सीमान्त जी ..आपने बिलकुल सही विश्लेषण किया है...वन्दना जी की कवितायें जब मैंने पढ़ी ...तो वो सीधे डील में उतरी..उन्हें समझने आत्मसात करने में कोई भी प्रयास मुझे...यानी एक पाठक को नहीं करना पड़ा .
      वन्दना जी को बधाई.

      11 hours ago ·  ·  1

    • Kavita Vachaknavee आपकी नजर से कविताओं को देखने का क्रम अच्छा लग रहा है।
      7 hours ago ·  ·  2

    • Kalpana Pant bahut sundar!
      3 hours ago ·  ·  1

    • कोमल सोनी सीमांतजी, जिस द्रष्टि की आवश्यकता एक कविता को सम्पूर्ण आत्मसात करने के लिए जरूरी होती है, वो सभी में नहीं होती है, आपकी नज़र
      से इन कविताओ का रूप निखर कर आ रहा है,और इनका प्रभाव भी दुगुना हो गया है, आभार आपका...

      2 hours ago ·  ·  1

    • Vandana Gupta सीमांत सोहल जी आपने मेरी कविताओं की समीक्षा कर ना सिर्फ़ मुझे अनुगृहित किया है बल्कि कविता के सौंदर्य मे भी चार चांद लगा दिये हैं………इतनी सूक्ष्मता और गहनता से भावों को पकडा है कि एक बार कविता जिसने पढी होगी वो आपके विश्लेषण के बाद दोबारा पढना चाहेगा …………और ये मेरे लिये किसी उपलब्धि से कम नहीं …………आपकी ह्रदय से आभारी हूँ ॥
      a few seconds ago · 

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