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रविवार, 26 जुलाई 2015

' नया क्या ?'

वो कहते हैं 
नया क्या ?

अरे भाई 
नया दिन है 
हर पल नया है 
हर पल गुजरती ज़िन्दगी नयी है 

उस पर रोज 
तुम्हारी बातें नयी हैं 
तुम्हारे विचार नए हैं 
तुम्हारी सोच नयी है 
तुम्हारे चेहरे के भाव नए हैं 

उस पर भी प्रश्न 
नया क्या ?
सिर्फ नयी चीजें खरीदना 
नयी फिल्म देखना 
नए गाने सुनना 
नयी चीजें खाना ही नयेपन की श्रेणी में नहीं आता 

कभी देखना बाग़ में खिले फूलों को 
रोज़ नए ही लगेंगे 
रोज नयी ही बातें करेंगे 
रोज नयी ही खुशबू से सराबोर होंगे 

बच्चों की मुस्कान में 
उनकी बातों में 
उनके क्रियाकलाप में 
खोजोगे तो भी न मिलेंगे  
कोई पुरा अवशेष 

सिर्फ शब्दों का रोज घटजोड़ ही नया नहीं होता 
रंगों से खींची आड़ी टेढ़ी लकीरों से ही नया नहीं बनता 
प्रकृति की कूची नित्य नए अलंकार गढ़ती है 
जो मौसम के साथ बदलती है 

नया यहाँ सब है 
बस जरूरत है तुम्हें 
वो दृष्टि विकसित करने की 
जो आदिम युग में भी नयापन देख ले 
क्योंकि यहाँ तो 
हर सरकते पल में बदल जाती है सृष्टि 
आत्मा भी देह त्याग बदल लेती है नया चोला 
जब एक दिन पहले तुम जैसे थे 
वैसे न अगले दिन रहे 
तो फिर कैसे पूछते हो तुम .... ' नया क्या ?'

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

चाँद मेरे हिस्से का


आज मुझे गुनगुनाना है दुनिया का हर एक गाना , जीना है जी भर के , कल हो न हो ........कहाँ से आये कहाँ है जाना ये सत्य भला कौन है जाना तो क्यों न जी ली जाए एक दिन में एक उम्र कि शिकायत न हो फिर खुदा से भी कोई . 

अब इस पार और उस पार के फेर में कौन पड़े .........रात दोनों ही तरफ गहरी अंधियारी है और बीच में जो मिली है रौशनी की   चार लकीरें तो क्यों न इस रौशन जहान से मोहब्बत कर लें .........वर्ना किसने कब क्या पाया , कोई न भेद जान पाया ..........इस पार उस पार की खोज करता रहा और वर्तमान को खोता रहा ...........मूल मकसद से ही भटक गया ..........क्या होगा जानकर उधर क्या ? जो है यही है खुली आँखों से जो दिख रहा है , बंद होते ही तो सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है ये जानते हैं फिर भी अदृश्य की खोज में लगे हैं.... न भविष्य से और न भूत से निकल रहे हैं बस इसी भूलभुलैया में घूम रहे हैं ये जानते हुए कि इस चक्कर में वर्तमान को भी खो रहे हैं .........तो क्या रहा औचित्य फिर जीवन का जब खाली ही हाथ रहा .......... न आगत का पता मिला न विगत का और जीवन के मध्यांतर को खोज के प्रांगण में बिता दिया ...........जैसा आया था वैसा ही चल दिया कसकता हुआ , रोता हुआ ...........

नहीं , मुझे नहीं गंवाना अपना अमूल्य क्षण इस तरह .............गुनगुनाना है आज हर वो गीत जो बना है और जो नहीं बना .............शायद बन जाए मेरा जीवन ही संगीत , किसी के प्रेम का मीत , कोई सांझी रीत , एक झबरीली प्रीत .............और कह उठूँ मैं एक दिन ..............पंछी बनूँ उडती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में . 

सोमवार, 20 जुलाई 2015

इश्क के चटकारे, मेरा खोना .....एक रस्म है ये भी


ये मेरा खोना ही है 
जब खुद को भी ढूंढ न पाऊँ 
पलकों की ओट में छुप जाऊँ 
किसी बहेलिये के डर से 
डरी सहमी हिरणी सी सकुचाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब आदमखोर बन जाए मनवा 
भरी थाली को लात मारे जियरा 
किसी सजन की पीहू पीहू पर भी 
न उमगे ये निगोड़ा मन भंवरा 

ये मेरा खोना ही है 
निष्क्रिय निस्पंद हो ठहर जाऊँ 
किसी मोड़ पर न मुड़ पाऊँ 
आगे पीछे आजू बाजू चलती रेल से 
खुद को न उतार पाऊँ 
मन की भीड़ में ही कहीं गुम हो जाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब तुम हो सामने 
और मैं मौन हो जाऊँ 
प्रेम के अवलंब लम्बवत पड़े रह जाएँ 
और मैं शोकमुक्त हो जाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
श्वेत श्याम से परे 
एक शीशमहल बनवाऊँ 
उसमे खुद को चिनवाऊँ
और आखिरी ईंट तुमसे लगवाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब भी खुद से मिलना चाहूँ 
तुम से मिल जाऊँ 
किसी उधडी सींवन सी 
किसी कांटे से उलझ जाऊँ 
और बूँद बूँद रिस  जाऊँ 

भरी बरसातों के अहातों में पानी भरने पर नहीं चला करतीं कुँवारी कश्तियाँ 
क्यूंकि 
अस्थि कलशों की स्थापना को उच्चरित नहीं किये जाते वेद मन्त्र 
और तुम जानते हो 
यहाँ सह्स्त्राब्धियों की मोहब्बतों ने बीजे हैं आखिरी प्रपत्र 
बिना बीजमंत्रों के 
फिर भोर के तारे से करके इश्क 
कैसे कर दोगे तवारीख में दर्ज 
विधना के विधान को उलट कर 
मान भी लो अब ...........ये मेरा खोना ही है 

और खोये हुए दस्तावेज सिद्ध नहीं किये जा सकते और न ही ताबीज में पहन कैद किये जा सकते हैं 

एक बूंद अश्क की ढलके जिस दिन .......मान लेना ये मेरा खोना ही है 

बन्दनवार लगाने से 
दहलीजों पर नहीं रुका करतीं 
इश्क की मिश्रियाँ 
इश्क के चटकारे लगाना खोने का ही पर्याय  है .......... 

एक रस्म है ये भी  .......निभानी तो पड़ेगी ही न !!!



बुधवार, 15 जुलाई 2015

किसी भी प्रकाशन , प्रकाशक के लिए क्या जरूरी है ?

रश्मि प्रभा दी द्वारा आयोजित परिचर्चा " #किसी _भी_प्रकाशन_प्रकाशक_के_लिए_क्या-जरूरी_है ?" में मेरे विचार इस आलेख में पढ़ सकते हैं :


आज के दौर में जब चारों तरफ लेखकों और प्रकाशनों की बाढ़ सी आ रही हो उसमे ये प्रश्न उठाना भी लाजिमी है कि किसी भी प्रकाशन और प्रकाशक के लिए क्या जरूरी है अर्थात कौन सा पहलू ऐसा है जो सबसे जरूरी है तो इस सन्दर्भ में केवल एक मोड़ पर रुके रहना संभव ही नहीं है . आज गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में सबसे पहले तो अपनी एक पहचान बनाना जरूरी है और पहचान बनाने के लिए कुछ नियम कायदे बनाने जरूरी हैं जिनका सख्ती से पालन किया जाए .

एक प्रकाशक के लिए जरूरी है सबसे पहले वो उस लेखक को ढूंढें या उस लेखन को पकडे जिसमे उसे लगे हाँ , इसमें है समाज को बदलने की कूवत और साथ ही बन सकेगा हर आँख का तारा अर्थात जो सहज संप्रेषणीय होने के साथ सर्वग्राह्य हो न कि चलता नाम देखकर उसे ही छापे जाए बल्कि थोडा जोखिम उठाने की भी हिम्मत रख सके . आज बड़े बड़े प्रकाशन ऐसे ही बड़े नहीं बने उन्होंने भी अपने वक्त पर जोखिम उठाये नयों में से ऐसे मोती ढूंढें जो साहित्य का आकाश पर अपना परचम लहरा सकें और वो उसमे सफल भी हुए तो क्यों नहीं आज का प्रकाशक ये जोखिम उठाये और अपनी राह खुद बुने .

दूसरी जरूरी बात है सिर्फ पैसे के पीछे न भागे जैसा कि आजकल हो रहा है पैसे लो और जिस किसी को भी छाप दो फिर चाहे लेखक कहीं न पहुँच अपनी जेब तो गरम हो ही गयी न तो उससे प्रकाशक की साख पर ही बट्टा लगेगा तो जरूरी है पहले पाण्डुलिपि मंगवाई जाए , कुछ सिद्धहस्तों से पढवाई जाए और फिर लगे ये छापने योग्य है तो जरूर छापी जाए और लेखक से कीमत न लेकर उसके लेखन का प्रचार और प्रसार प्रकाशक करे ताकि वो जन जन तक पहुँच सके . आज तो वैसे भी इन्टरनेट के माध्यम से कहीं भी किताब पहुंचाई जा सकती है तो जरूरत है तो सिर्फ प्रचार और प्रसार की फिर तो पाठक खुद ही मंगवाने का जुगाड़ कर लेगा मगर उसे पता तो चले कि आखिर उस किताब को वो क्यों पढ़े ? प्रचार प्रसार ऐसा हो जो पाठक के मन को झकझोरे और वो उसे पढने को लालायित हो उठे तो प्रकाशन को स्वयमेव फायदा होगा . जितनी प्रतियाँ बिकेंगी प्रकाशक को ही मुनाफा होगा .

एक जरूरी चीज और है लेखक और प्रकाशक में आईने की तरफ साफ़ रिश्ता हो जो कि आज कहीं नहीं दिखता बल्कि लेखक प्रकाशक पर और प्रकाशक लेखक पर दोषारोपण करते रहते हैं जो रिश्ते को कटु बनाते हैं क्योंकि पारदर्शिता नहीं होती तो लेखक को पता नहीं चलता कितनी प्रतियाँ बिक गयी हैं और उस हिसाब से कितनी रॉयल्टी बनी . रॉयल्टी मिलना तो आज दूर की ही बात हो चुकी है बल्कि प्रकाशक यही रोते हैं कि बिकी ही नहीं तो आखिर कहाँ गयीं ? जबकि सरकारी खजाने में भी किताबें पहुंचाई जाति हैं जो लेखक भी जानता है मगर उसके पास कोई सबूत नहीं होता तो कुछ साबित नहीं कर सकता ऐसे में दोनों के बीच गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं जिनका सुखद भविष्य नहीं होता बल्कि जरूरी है एक ऐसा अग्रीमेंट जिसके तहत दोनों बंधे हों .

एक सच ये भी है कि कोई भी प्रकाशन बिना पैसों और धर्म हेतु नहीं चलाया जाता बल्कि प्रकाशक तभी काम करना चाहेगा जब उससे उसे कुछ लाभ हो तो इसके लिए जरूरी है आज के वक्त में तकनीक का सहारा लेना और उसके माध्यम से लेखकों और पाठकों से जुड़ना . पाठकों की समय समय पर राय लेना आखिर वो पढना क्या चाहते हैं अर्थात किस तरह का लेखन पाठक की पहली पसंद है ऐसी रायशुमारी समय समय पर की जाती रहे तो कोई ताकत नहीं जो प्रकाशक कभी घाटा उठाये बल्कि जब पाठक को उसके मतलब की सामग्री मिलेगी तो वो और कहीं नहीं भागेगा और लेखक भी ऐसे ही प्रकाशक की ओर आकर्षित होगा जो उसे पहचान दिलाये न कि उसका शोषण करे . इस तरह के प्रयोगों से दीर्घकाल में प्रकाशन को लाभ ही लाभ होगा मगर उसके लिए जरूरी है समझौता न करके सच्चाई और ईमानदारी से अपने प्रकाशन को आगे बढाए और अपनी एक मुकम्मल पहचान बनाए .

एक आखिरी बात और प्रकाशक को चाहिए प्रचार प्रसार के अलावा बड़े बड़े आलोचकों तक किताब पहुंचाए , उनकी समीक्षाएं करवाए फिर वो अच्छी हों या बुरी उससे प्रकाशक का कोई सरोकार नहीं होना चाहिए क्योंकि यही सही और मुकम्मल तस्वीर होगी आंकने की ताकि उसी हिसाब से आगे निर्णय वो ले सके . केवल साहित्यकारों की निगाह में स्थान पाने के लिए जो लेखन किया जाता है वो आम पाठक की समझ से परे होता है इसलिए जरूरी है आम पाठक की सोच को आधार बनाकर लेखक और उसके लेखन को तवज्जो दी जाए और सही व् उचित मूल्यांकन करवाया जाए तो निसंदेह लेखक के साथ प्रकाशक और प्रकाशन दोनों अपना मुकाम पा लेंगे क्योंकि वहां मूल्यों से समझौता नहीं होगा और जब ये बात बाज़ार में होगी तो हर लेखक जुड़ने में गौरव महसूस करेगा साथ ही चाहेगा कि वो ऐसा लिखे तो उसी प्रकाशन से छपे .

लेखक और प्रकाशक का मजबूत रिश्ता किसी भी प्रकाशन की सफलता का एक आधार स्तम्भ होता है जिसे हर प्रकाशक के लिए समझना जरूरी है .

http://parikalpnaa.blogspot.in/2015/07/blog-post_15.html

रविवार, 12 जुलाई 2015

इस प्यार को अब क्या नाम दूँ

कभी कभी खुद को चाह लेना बुरी बात नहीं होती
 .... आज खुद से इश्क करने को जी चाहता है .....
मगर करूँ या नहीं .......उहापोह में हूँ
इश्क लफ्ज़ से ही जहाँ खिंच जाती हों म्यान से तलवारें
वहाँ खुद को किस जमीन किस आसमां का सितारा बनाऊँ
जो खुद से इश्क भी करूँ और जिंदा भी रहूँ ........

कहीं ये
फकत मौसम की दिल्लगी भर तो नहीं
जो इश्क के घोड़े पर सवार हो निकला हो महज फाकापरस्ती को .........

( गुम है किसी के प्यार में दिल सुबह शाम ..... इस प्यार को अब क्या नाम दूँ )

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

यूँ तो नहीं बदलते देखा था कभी समुन्दरों का रंग

आह ! ये क्या हुआ
ये रक्त मेरा 
पीला कैसे पड़ गया
उफ़ ! अरे ये तो 
तुम्हारा भी सफ़ेद हो गया
कौन सा विकार 
घर कर गया
जो लहू दोनों का 
रंग बदल गया 
जितनी जल्दी नहीं बदलते 
मौसम भी रंग
उससे जल्दी कैसे
हल्दी घुल गयी 

सुना है हल्दी का रंग
जल्दी नहीं छूटा करता 
कपड़ों से
फिर शिराओं में बहता ये रंग
कैसे बदलेगा
जब त्वचा भी उसी रंग में रंग गयी है
और देखो तो सही
तुमने तो सफ़ेद चादर ही ओढ़ ली है 
सुना है कफ़न सफ़ेद ही होता है
जो चिता के साथ ही होम होता है

कैसे हो गया इतना सब कुछ
कौन से चेनाब का पानी पीया था
जो लाल रंग पर दूजा रंग चढ़ गया 
ये खुदपरस्ती , खुदगर्जी , खुदमुख्तारी 
कब और कैसे नकली जेवरों पर 
सोने का पानी चढ़ा देती है 
और सोने को भी फीका बना देती है 
पता ही नहीं चलता 

उफ़ क्या हो गया 
ये आज की दुनिया को

यूँ तो नहीं बदलते देखा था कभी समुन्दरों का रंग 

रविवार, 5 जुलाई 2015

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?.........5



आज मेरा बेटा ईशान २१ साल का हो गया . पीछे मुड़कर देखती हूँ तो पता ही नहीं चलता कहाँ गुजरा इतना वक्त 
और ज़िन्दगी में पहली बार है कि मुझसे दूर हैदराबाद में माइक्रोसॉफ्ट में इंटर्नशिप के लिए गया हुआ है ........उसकी उन्नति की कामना करते हुए अपने मन के उदगार पांच दिनों से प्रगट कर रही थी क्योंकि ५ जुलाई जन्मदिन है पता नहीं कैसे पांच ही कविताओं ने आकार लिया इस बार ........अनंत शुभकामनाओं के साथ 

नौकरी जरूरी है 
उस पर मन का काम मिल जाए 
तो सोने पर सुहागा हो जाता है 
और तुमने वो सब पाया जो तुमने चाहा 
और कहीं न कहीं शायद मैंने भी 

माँ हूँ न , कैसे तुम्हारी तरक्की की राह में रोड़ा बन सकती हूँ 
जबकि अन्दर ही अन्दर जानती हूँ इस सत्य को 
कि तुम्हारी चाहत का मतलब है बिछोह 
होना होगा तुमसे दूर ...

' मैं यहाँ तू वहां '
गुजरना होगा इस दौर से 
फिर भी तुम्हारी तरक्की हेतु 
तुम्हारी इच्छा हेतु 
मान लेती हूँ मनौती 

कैसी माँ हूँ मैं ..........है न 
करने को खुद से दूर हो जाती हूँ आतुर 
और कर बैठती हूँ वो ही जो तुम चाहते हो मेरे बच्चे !!!


शनिवार, 4 जुलाई 2015

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?.........4

अनगिनत चिंताओं की लेके थाती 
'बाट जोहेगी तुम्हारी माँ' कह 
नहीं विदा किया तुझे 
फिर भी जाने कहाँ से 
चिंताओं के बादल घुमड़ रहे हैं 

क्योंकि जानती हूँ समय के चक्र को 
ये कब बाज आया है 
तुम्हें जाना ही होगा एक दिन दूर 
अभी तो फिर भी आस जिंदा है 
कुछ दिनों की बात है मगर 
क्या होगा उस दिन 
जब तुम चले जाओगे अपने लिए राह बनाने ...........शायद हमेशा के लिए 

दूरियों और नजदीकियों के बीच उलझी 
तुम्हारे भविष्य हेतु खुश हूँ 
तो दूरियां सशंकित करती हैं 

जानती हूँ 
आंवल नाल से जुड़े रिश्ते में दूरियों की कोई गुंजाईश नहीं होती 
फिर भी 
माँ हूँ न 
अक्सर हो जाती हूँ सशंकित 
जब भी उमड़ता है ख्याल 
आने वाले कल में बदल जायेगी तस्वीर 
और तुम्हें जाना होगा हमेशा के लिए मुझसे दूर 

दिन के कंकडों में से 
बीनने को न बची होगी जब कोई आस 
एक माँ का क्या जीतेगा तब विश्वास 
इंतज़ार में हूँ ...........


शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?..........3

पहली बार 
तुम मुझसे दूर हुए 
सबकी उम्मीदों को पूर्णतयः नकारते हुए 
मैंने बाँधी छाती पर सिल 
और किया तुम्हें विदा 
बिना आँख में पानी लाये 
आखिर तुम्हारे भविष्य का सवाल है 
कैसे कर सकती थी अपशकुन 

मगर माँ हूँ न 
धक् धक् करता रहा सीना 
हर पल ध्यान तुम पर ही लगा रहा 
जब तक नहीं पहुँच गए तुम अपने गंतव्य पर 

अब हर पल एक कमी कचोट रही है 
रह रह मुझे मथ रही है 
भविष्य दर्शन कर रही हूँ 
अन्दर ही अन्दर सिहर रही हूँ 

'ये तो सिर्फ ट्रेलर था 
पिक्चर अभी बाकी है' का स्लोगन मुंह चिढ़ा रहा है 
भविष्य दर्शन करा रहा है 
हाँ , जाना ही होगा तुम्हें मुझसे दूर 
अपने सुखद भविष्य हेतु ..........

सीखना होगा जीना मुझे मेरे एकांत के साथ ........

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?..........2

कर्त्तव्य भावना से बड़ा होता है 
फिर जीवन जीने को जरूरी है आगे बढ़ना 
'पके पान' कब डाल से टूट गिरें कौन जानता है 
और तुम्हारे आगे पूरा जीवन पड़ा है 
तो छोड़ना ही होगा तुम्हें वृक्ष का मोह 
बढ़ना होगा आगे और आगे पाने को एक मुकाम 

जीवन संघर्ष का ही तो दूसरा नाम है 
और ये भी तो एक संघर्ष ही है 
जिस आँचल की छाँव तले बचपन बीता 
उसी से दूर जा करना होता है निर्माण अपने लिए एक नीड़ का 


हाँ , जाना ही होगा तुम्हें छोड़कर माँ की गोद मेरे बच्चे !!!


बुधवार, 1 जुलाई 2015

कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?........1

उड़ ही जाते हैं पंछी घोंसला छोड़ 
जब उग आते हैं पंख 
और निर्भरता हो जाती है ख़त्म 

छोड़ चुका है पंछी अब नीड़
उड़ने दो उसे 
भरने दो उसे परवाज़ 
तोलने दो उसे अपने पंखों को 
कि 
नापने को धरती और आकाश की दूरियां 
जरूरी होता है 
खुद उड़ान भरना 
अपना आकाश खुद बनाना

ये समय की माँग है 
तो मानना ही पड़ेगा इस सत्य को 
' बच्चे बड़े हो गए हैं  '
मगर क्या सच में ?

विश्वास और अविश्वास की गुल्झट सुलझाते हुए 
अन्दर की माँ पसोपेश में है 
कहीं बच्चे भी कभी बड़े होते हैं ?
वो तो माँ के लिए उम्र भर बच्चे ही रहते हैं 
फिर कैसे करूँ इस कटु सत्य को स्वीकार ?

रविवार, 28 जून 2015

कौन कहता है अच्छे दिन नहीं आये

कौन कहता है 
अच्छे दिन नहीं आये 
देखिये तो ज़रा 
कितने अच्छे दिन आ गए 

चोर उच्चक्के सब बिलों में दुबक गए 
चोरी डाके सब बंद हो गए 
लूटपाट सीनाजोरी का बाजार नर्म हो गया 
झूठ मक्कारी दगाबाजी जाने कहाँ सो गए 
बलात्कार के किस्से तो बस स्वप्न हो गए 
खाप हो या आप हो सबकी जुबानों पर ताले लग गए

कैसी कायापलट हो गयी 
राम और अल्लाह की नज़र एक हो गयी 
चारों तरफ देखो तो 
रामराज्य की तूती बोल गयी 

अब थानों में केस दिखाई नहीं देते 
अदालतों में मुलजिमों के शोर सुनाई नहीं देते 
बकरी और शेर एक घाट पर पीते पानी हैं 
यही तो भैया अच्छे दिनों की निशानी हैं 

न यहाँ बाढ़ आती है 
न भूकंप 
और न ही कोई त्रासदी 
किसान आत्महत्या एक जुमला भर रह गया है 
देखो तो जरा मेरा मुल्क कैसे संवर गया है 
और ये सब यूँ ही नहीं हो गया है 
ये सब नसीबवालों के नसीब का ही तो बोलबाला है 

वो मन की बात कहते हैं 
और सब मन से सुन लेते हैं 
वो योगा करवाते हैं 
विश्व में नाम कमाते हैं 
ये सब काम ऐसे ही नहीं हो जाते हैं 
अच्छे दिनों की आमद ऐसे ही होती है 
जुबानी जमा खर्च पर ही तो सत्ता चला करती है 

तभी तो देखो जरा
कितना सुशासन आ गया है 
कहीं भैंस तो कहीं मुर्गी ढूँढने का काम 
ही तो पुलिस का रह गया है 
देखा 
सरहद पर 
चारों तरफ कितनी अमन शांति व्याप्त है 
उग्रवादी आतंकवादी बस शब्द भर रह गए हैं 

वो जानते हैं 
कैसे नाम कमाना है 
विश्व भ्रमण कर विश्व में डंका बजवाना है 
तभी तो ख्वाब में ही सही मेरा भारत विश्वशक्ति बन गया है 

मन की बात कहने से ही तो 
अच्छे दिनों की आमद होती है 
तो मान जाओ भैया 
ये सब अच्छे दिनों का तोहफा है 
जो नसीबवालों के नसीब से ही होता है 

गुरुवार, 25 जून 2015

पहली बरसात में


ऊँहूँ ......नहीं कह सकती 
(तेरा नाम गुनगुना रही हूँ मैं .........यादों की छुअन से गुजरे जा रही हूँ मैं )

ए 
पहली बरसात से कहो न 
यूँ जेहन की कुण्डियाँ न खडकाया करे 
अब यहाँ थाप पर प्रतिध्वनियाँ नहीं हुआ करतीं 
क्यूंकि 
पहली बरसात हो और कोई इश्क में भीगा न हो 
तो 
रूह के छालों पर सारे ज़माने का चंदन लगा लेना 
फफोले तो पड़ कर ही रहेंगे 
ज़ख्म तो रिस कर ही रहेंगे 

क्योंकि यहाँ तो 
पहली बरसात में भीगने का शगल 
जाने कब चौखट लाँघ गया 

सुना है 
तन से ज्यादा तो 
मन भीगा करता है 
जब उमंगों का सावन बरसता है 
मगर जरूरी तो नहीं न 
उमंगों की मछलियों का सुनहरी होना 
हर बरसात में ........

एक अरसा बीता 
तो कभी कभी लगता है 
एक युग ही बदल चुका

मगर मन का कोहबर है कि खुलता ही नहीं ..........

सोमवार, 22 जून 2015

अभी बहुत दूर है दिन



रात्रि और सूर्योदय के मध्य की बेला में भी 
खिल जाया करते हैं जवाकुसुम 
गर हसरतों के ताजमहल पर 
जला दे कोई एक दिया 

भोर के तारे सी किस्मत 
अभिमंत्रित नहीं होती 
जो चाहतों के सोपानों तक ही सिमट जाए ज़िन्दगी 

यहाँ अँधियारा हो 
ऐसा भी नहीं है 
मगर फिर भी 
अभी बहुत दूर है दिन .............

गुरुवार, 18 जून 2015

'कल किसने देखा '

ये जानते हुए भी 
कि अनिश्चित है भविष्य 
डर का बायस बन जाता है 

'कल किसने देखा '
महज जुमला भर ही साबित होता है 

भविष्य की अज्ञानता 
बिछुओं के डंक सी 
लील लेती है ज्ञान के सारे प्रपत्र 
और पूरा जीवन बीत जाता है 
महज डर की कंदराओं में भटकते 

ओ आड़ी टेढ़ी रेखाएं खींच 
चक्रव्यूह रचने वाले 
अनिश्चितता के बादलों पर 
डर की संज्ञाएँ लिपिबद्ध कर 
कहो तो कौन से महाकाव्य का निर्माण किया ?


पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे 
और देखो 
यहाँ किसी के भी पाँव में घुँघरू नहीं फिर भी नाच रहे हैं सभी  ........

शुक्रवार, 5 जून 2015

प्रधानमंत्री बीमा योजना........तेरा ही चून तेरा ही पुन

प्रधानमंत्री बीमा योजना तो लगता है काफी कारगर रहेगी .

वो कैसे ?

देखो १८ साल से ७०  साल तक के लोग इसका फायदा उठा सकते हैं तो सभी दौड़ लगा रहे हैं बैंक की तरफ और करा रहे हैं १२ रूपये में अपना बीमा जिसका फायदा बीमा कंपनी को ही तो होगा न तो हो गयी न कारगर और सब सरकार के गुण गायेंगे ये सरकार तो बहुत अच्छी है सबका बीमा करवा दिया तो एक पंथ दो काज निबटाये जा रहे हैं .

अच्छा , लेकिन खुलकर बताओ  कैसे कारगर होगी ?

देखो , ७० साल कि उम्र तक ही मरना पड़ेगा क्योंकि उसके बाद मरे तो पीछे वालों को कुछ नहीं मिलेगा और बेकार में आपके १२ रूपये भी मोरी में चले जायेंगे .

वो कैसे भाई ?

वो ऐसे कि एक तो हर साल १२ रुपये जमा कराओ उस पर  १२ रूपये में से ११ तो जो बीमा कम्पनी है वो ले जायेगी बचा एक रुपया उस बैंक को जाएगा जहाँ तुमने अकाउंट खोला है और बीमा कराया है तो तुम्हें क्या मिलेगा बाबाजी का ठुल्लू !

तो तुम्हारा कहने का मतलब है ७० से पहले मरने पर ही बीमित राशी मिलेगी मगर कोई कैसे अनुमान लगा सकता है कि वो कब मरेगा .........आखिर मृत्यु के बारे में कैसे जानें कोई उपाय हो तो बताओ भाई .

तो सुनो एक ही आखिरी उपाय बचता है , किसी प्रकांड ज्योतिषी की शरण में चले जाओ , जो लाल किताब का सम्पूर्ण ज्ञाता हो तो फिर अक्षरक्षः सही उम्र का पता चल जाएगा फिर सोच समझ कर बीमा करवाना बेकार में विदेशियों का पेट हम क्यों भरें यहाँ तो अपने खाने के लाले पड़े हुए हैं वहां वो उनका पेट भरने में लगे हैं .

बात तो तुम्हारी सही है मगर ये तो बताओ उसे खोजें कहाँ और मान लो मिल भी गया तो जितना बड़ा नाम होगा उसका उतना ही बड़ा दाम होगा ?

हाँ वो तो होगा ही मगर उसमे तुम्हें परेशानी क्या है ?

अरे भाई , यदि उसने बताया जल्दी मरोगे अर्थात ७० से पहले तब तो सही है मगर उसके बाद मरोगे तो मेरे तो जीते जी ही मेरा पैसा मिटटी हो जाएगा और उस ज्योतिषी की जेब में चला जाएगा. फिर उसकी फीस भी तो कितनी मोटी होगी क्या पता ? अब १२ रूपये से कम तो होगी नहीं न जो ये रिस्क उठाऊँ ? 

बात तो पते की कही तुमने मगर सोचो जरा इसमें देश का पैसा देश में रहेगा जबकि वहां तो विदेशी के हाथों चला जाएगा . सोचो जरा यहाँ तो वैसे ही प्रधानमंत्री ने जन धन योजना के जरिये सभी का अकाउंट खुलवा दिया है तो करोड़ों अकाउंट खुल चुके हैं ऐसे में ११ से गुना करोगे तो कितने अरबों रुपया तो उनके खाते में चला ही गया एडवांस में और करोड़ों रुपया १ रूपये के हिसाब से बैंक के खाते में चलो बैंक के खाते में जाए तो कोई नहीं कम से कम अपने देश में तो है लेकिन बाकि का सोचो वो तो गया न १२ के भाव . फिर यदि कोई मरता भी है तो सौ कानूनी लफड़े , सौ पेंच इसी में उलझा रहेगा और जब तक ये जंग जीतेगा उतना पैसा तो लगा चूका होगा बीमित राशी  पाने में तो क्या फायदा होगा उससे तो अच्छा है भैये एक बार बड़े ज्योतिष के पास जाकर सुनिश्चित कर लेना कम से कम तसल्ली तो रहेगी जो राशी लगायी है वो मयसूद वापस मिल जाएगी . सिर्फ विदेशी बीमा कंपनी को ही फायदा नहीं होना चाहिए बल्कि अपना भी हो तब तो फायदा है वर्ना तो मुफ्त में भी नुक्सान कोई क्यूँ उठाये भला . हमारे १२ रूपये कोई फ़ालतू के थोड़े हैं जो यूँ ही बीमा करवाते रहे और बाद में खाली हाथ रहे . 

अरे भाई ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था , तुम तो बहुत होशियार हो जो मेरी आँखें खोल दीं अब तो इसका प्रचार प्रसार रेडियो टीवी अखबार आदि में होना चाहिए ताकि समय रहते सबको चेताया जा सके . यूँ ही नहीं कोई अपने पैसे का दुरूपयोग होने दे . 

हाँ हाँ जल्दी करो ऐसा ही 

मगर एक बात बताओ भाई यदि भविष्यवाणी फेल हो गयी तो ?

तो भी क्या कौन सी सभी भविष्यवाणियाँ फेल होती हैं कोई इक्का दुक्का होगी भी तो भी भला तो देश के लोगों का ही होगा न , उनका इन्वेस्टमेंट मिटटी के भाव तो नहीं जाएगा , अब इतना रिस्क तो उठाना ही पड़ेगा . ज्योतिषियों की भविष्यवाणी कोई मौसम विभाग थोड़े हैं जो हर भविष्यवाणी फेल हो . सोचो भला यदि इनकी सभी भविष्यवाणी यदि फेल होतीं तो इनका धंधा बताओ कैसे चलता . अरे भाई इनकी तो रोजी रोटी है तो आकलन ज्यादातर सही ही उतरते हैं और फिर कहते हैं जहाँ सबका भला हो रहा हो तो एक की कुर्बानी दी जा सकती है तो फिर भैये निकल पड़ो इस अभियान पर , अब सोचना क्या . आखिर देश की बात है और तुम ठहरे राष्ट्रप्रेमी . कैसे देश हित की नहीं सोचोगे और देशहित में कैसे नहीं कदम उठाओगे . आखिर देश की नाक का सवाल है क्योंकि वो तो विदेशियों पर देश से ज्यादा भरोसा करते हैं तो क्या तुम अपने देश के लिए अपनों पर भरोसा नहीं कर सकते ? आखिर ये हमारे रुपये की इज्जत का सवाल है . तुम्हें उसकी नाक बचानी होगी अपनी पूँजी वापस लानी होगी और उसके लिए कुछ तो कुर्बानी सभी को देनी पड़ती हैं यदि तुम भी दे दोगे तो नाम इतिहास में अमर हो जाएगा . वो देखो 'प्रधानमंत्री बीमा योजना का नया पहलू दिखाने वाला है वो' चलो उसे सलाम ठोको , फिर देखना कैसे फर्शी सलाम ठोकेगी दुनिया तुम्हारे आगे .देखना कैसे जीरो से एक दिन में हीरो बन जाओगे , हर टीवी चैनल पर तुम ही तुम छाओगे , हर अखबार के पहले पेज पर तुम्हारी ही तस्वीर होगी साथ ही साथ इससे ज्योतिषियों की भी निकल पड़ेगी . 

और गज्जू भविष्य के ख्वाब गुनता चल पड़ा मिशन पर ..........

ये है मेरा हिंदुस्तान जिसे जहाँ चाहे जैसे चाहे जो चाहे जब चाहे घुमा दे और घूमने वाले को पता ही न चले आखिर उसके साथ हुआ क्या है .बस कान हाथ घुमाकर पकड़ा दिया जाता है तो भी किसी को कुछ समझ नहीं आता है .तेरा ही चून तेरा ही पुन वाला मुहावरा शायद ऐसे ही लोगों के लिए बना है . 



आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख 

शनिवार, 30 मई 2015

हे मेरे परम मित्र !

प्रिय मित्र 
शुक्रगुजार हूँ जो तुमने इतना आत्मीय समझा कि अपनी मित्रता सूची से बाहर का रास्ता चुपके से दिखा दिया और खुद को पाक साफ़ भी सिद्ध किया . जानती हूँ कुछ दिनों से तुम्हारे स्टेटस पर नहीं जा पा रही थी और उसी गुस्से में शायद तुमने मुझसे पल्ला झाड लिया या हो सकता है तुम चाहते हों ऐसा कोई मौका हाथ लगे और तुम्हारी किस्मत से तुम्हें वो मौका मिल गया और तुमने उसका फायदा उठा लिया ..........सुनो जानकर अचरज नहीं हुआ क्योंकि ये आभासी रिश्ते हैं पल में बनते और मिटते हैं फिर हमने भी कौन सी अग्नि को साक्षी रख कसम उठाई थी कि ज़िन्दगी भर एक दूसरे का साथ देंगे , गलतफहमियों का शिकार नहीं होंगे , कह सुन कर मन की  भड़ास निकाल लेंगे ..........अब सात वचन भरने के नियम यहाँ थोड़े ही चला करते हैं जो तुम पर कोई आक्षेप लगा सकूं . शायद तुम्हारी उम्मीद मुझसे कुछ ज्यादा थी और तुम्हारी उम्मीद पर खरा उतरने की हमने भी कसम नहीं खायी थी इसलिए चल रहे थे आराम से . वो तो अचानक एक दिन याद आया बहुत दिन हुए तुम्हारे स्टेटस नहीं देखे और आशंका के बादल कुलबुलाने लगे ..........हाय ! कल तक तो तुम हमारे वेल विशर थे ये अचानक क्या हुआ सोच तुम्हारी वाल का चक्कर लगाया तो माजरा समझ आया . ओह ! हम तो निष्कासित हो गए . बड़े बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले गाना गुनगुनाते हुए सोच में पड़ गए सच आखिर क्या था ? वो जहाँ तुम हमारी जरा सी परेशानी से चिंताग्रस्त हो जाते थे और राहें बतलाते थे या फिर ये कि महज कुछ स्टेटस पर तुम्हारे लाइक या कमेंट नहीं किया तो तुमने बाहर का रास्ता दिखा दिया जबकि हम तो आभासी से व्यक्त की श्रेणी में आ चुके थे फिर भी तुमने ये कहर बरपाया . 

हे मेरे परम मित्र ! आभारी हूँ तुम्हारी इस धृष्टता के लिए , तुमसे तुम्हारी पहचान करवाने के लिए . हे मेरे परम मित्र तुम्हारी उदारता निस्संदेह सराहनीय है क्योंकि शायद मैं सहे जाती बिना कुछ कहे और तुमने कर दिखाया और मुझे अपने मित्रता के ऋण से उऋण कर दिया .  फेसबुककी महिमा सबसे न्यारी फिर भी लगे सबको प्यारी ......जय हो जय हो जय हो कहे ये मित्रता की मारी .

देकर अपनी वाल से विदाई 
कुछ मित्रों ने यूं मित्रता निभाई 
बस ये बात हमें ही जरा देर से समझ आई 
जो न करे आपकी बात का समर्थन 
उसी का होता है इस तरह चुपचाप निष्कासन 

बुधवार, 27 मई 2015

जनाब आप किसे बहला रहे हैं

बिना अवकाश लिए 
सरकारी दौरों के नाम पर 
विदेश यात्रा किए जा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

मेक इन इंडिया के नाम पर 
बड़े देशों से प्राप्त कर सहायता 
छोटे देशों को देकर किसका कद बढ़ा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

कफ़न नहीं दिया 
१२ रूपये में बीमा के नाम पर 
बस ऊंगली घुमा कान पकडे जा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

अपना गुणगान खुद करने के 
नए नए पैंतरे सिखा 
सेल्फी खींच मशहूर होने  के 
ये कैसे अंदाज़ सिखा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं

टीवी मीडिया की सुर्ख़ियों में 
प्रतिदिन छाए रहने के लिए  
आप तो बस बातों के बतोले खिला रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी 
सब्जबागों के शहर में बस 
अपनी हांड़ी ही चढ़ेगी 
जाने कैसे कैसे करतब दिखा रहे हैं 
जनाब आप किसे बहला रहे हैं 

ये जनता सब जानती है
वक्त रहते संभल जाओ 
वर्ना तख़्त भी उखाड़ती है 
बस इतना आप भी समझ जाओ 
जनाब अब और न बातों से बहलाओ 
कुछ काम भी करके दिखाओ अब कुछ काम भी करके दिखाओ ............

गुरुवार, 21 मई 2015

उम्र के विभाजन और तुम्हारी कुंठित सोच

सिन्धी और पंजाबी के बाद अब नेपाली में मेरी कविता का अनुवाद नेपाल से निकलने वाली पत्रिका " शब्द संयोजन " में भी ........वासुदेव अधिकारी जी का हार्दिक आभार जो उन्होंने कविता का अनुवाद कराया और पत्रिका भी भेजी .जिस कविता का अनुवाद हुआ है वो ये है जिसका शीर्षक बदला हुआ है :





स्त्रियां नहीं होतीं हैं 
चालीस ,  पचास या अस्सी साला 
और न ही होती हैं सोलह साला 

यौवन धन से भरपूर  
हो सकती हैं किशोरी या तरुणी  
प्रेयसी या आकाश विहारिणी  
हर खरखराती नज़र में  
गिद्ध दृष्टि वहाँ नहीं ढूँढती  
यौवनोचित्त आकर्षण  
वहाँ होती हैं बस एक स्त्री   
और स्खलन तक होता है एक पुरुष  

प्रदेश हों घाटियाँ या तराई  
वो बेशक उगा लें 
अपनी उमंगों की फ़सल 
मगर नहीं ढूँढती 
कभी मुफ़ीद जगह  
क्योंकि जानती हैं  
बंजरता में भी 
उष्णता और नमी के स्रोत खोजना  
इसलिये  
मुकम्मल होने को उन्हें  
नहीं होती जरूरत उम्र के विभाजन की  
स्त्री , हर उम्र में होती है मुकम्मल 
अपने स्त्रीत्व के साथ  

भीग सकती है  
कल- कल करते प्रपातों में 
उम्र के किसी भी दौर में  
उम्र की मोहताज नहीं होतीं 
उसकी स्त्रियोचित  
सहज सुलभ आकांक्षाएं
देह निर्झर नहीं सूखा करता 
किसी भी दौर में 
लेकिन अतृप्त इच्छाओं कामनाओं की 
पोटली भर नहीं है उसका अस्तित्व  


कदम्ब के पेड ही नहीं होते 
आश्रय स्थल या पींग भरने के हिंडोले  
स्वप्न हिंडोलों से परे  
हकीकत की शाखाओं पर डालकर 
अपनी चाहतों के झूले 
झूल लेती हैं बिना प्रियतम के भी 
खुद से मोहब्बत करके  
फिर वो सोलहवाँ सावन हो या पचहत्तरवाँ 
पलाश सुलगाने की कला में माहिर होती हैं 
उम्र के हर दौर में  

मत खोजना उसे 
झुर्रियों की दरारों में 
मत छूना उसकी देहयष्टि से परे 
उसकी भावनाओं के हरम को 
भस्मीभूत करने को काफी है 
उम्र के तिरोहित बीज ही 

तुम्हारी सोच के कबूतरों से परे है 
स्त्री की उड़ान के स्तम्भ 
जी हाँ ……… कदमबोसी को करके दरकिनार 
स्त्री बनी है खुद मुख़्तार 
अपनी ज़िन्दगी के प्रत्येक क्षण में 
फिर उम्र के फरेबों में कौन पड़े 

अब कैसे विभाग करोगे  
जहाँ ऊँट किसी भी करवट बैठे  
स्त्री से इतर स्त्री होती ही नहीं  
फिर कैसे संभव है 
सोलह , चालीस या पचास में विभाजन कर 
उसके अस्तित्व से उसे खोजना  

ये उम्र के विभाजन तुम्हारी कुंठित सोच के पर्याय भर हैं ………ओ पुरुष !!!

बुधवार, 13 मई 2015

खोल सकते हो तो खोल देना



मेरी मुखरता के सर्पदंश से जब जब आहत हुए
दोषारोपण की आदत से न मुक्त हुए
इस बार बदलने को तस्वीर
करनी होगी तुम्हें ही पहल

क्योंकि
इस ताले की चाबी सिर्फ तुम्हारे पास है

सुनो
खोल सकते हो तो खोल देना
मेरी चुप को इस बार
क्योंकि
मुखर किंवदंतियों का ग्रास बनने के लिए जरूरी है तुम्हारा समर्पण

रविवार, 10 मई 2015

मातृ दिवस पर


1
माँ ने जिसका ख्याल रखा उम्र भर
वो ही आज ख्याल रखे जाने की मोहताज
ये कैसी नियति की बिसात ?

2
कल तक जिसके पाँव तले जन्नत दिखती थी
आज अकेलेपन उदासी के कमरों में सिमटी बैठी है
तुझे बात करने की फुर्सत नहीं मिलती
उसी माँ के मुख से तेरे लिए दुआएं निकलती हैं

3
जिसके नेह की बरसात में भीगा रहा बचपन
उसी माँ का ममता भरा साया जो सिर से हट गया
उसी एक पल से जान लेना
ज़िन्दगी में कड़ी धूप का सफ़र शुरू हो गया 


4
ये माँ की दुआओं का ही असर होता है
कि खुदा भी अपना नियम बदल देता है
जब उसकी पुकार चीरती है आसमां का सीना
तब खुदा का सिर भी सजदे में झुका होता है



मंगलवार, 5 मई 2015

' कतरा कतरा ज़िन्दगी '......मेरी नज़र से




धूप के सफ़र से  शुरू हुआ सफ़र जब आकार लेता है तो ' कतरा कतरा ज़िन्दगी ' जन्म लेती है जो जाने कितने मोड़ो से गुजरते हुए एक लम्हे में तब्दील हो जाती है  .  मुकेश दुबे जी का दूसरा उपन्यास ' कतरा कतरा ज़िन्दगी 'शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है जो उन्होंने मुझे पुस्तक मेले में सप्रेम भेंट दिया .

कतरा कतरा ज़िन्दगी यूँ तो देखा जाए एक आम कहानी कह देगा पाठक मगर उसको जिस तरह से प्रस्तुत किया है ये लेखक के लेखन का कमाल है . सीधे सरल सहज शब्दों का प्रयोग मगर प्रवाहमयी प्रस्तुति कहीं न तो कहानी को बोझिल करती है और न ही ऊब को कोई स्थान बल्कि पाठक के मन में एक उत्सुकता बनी रहती है आखिर हुआ क्या अभिजीत और सुखविंदर की ज़िन्दगी में या अभिजीत और शुभ्रतो की ज़िन्दगी में . और पढ़ते पढ़ते जब पाठक अंत तक पहुँचता है तो आँख से अश्रुप्रवाह स्वतः होने लगता है जो कहीं न कहीं पाठक को पात्रों से बांधे होता है इसलिए पाठक खुद को उनसे जुड़ा पाता है और घटनाएँ कैसे ज़िन्दगी में आकार ले नियंत्रण से बाहर होती हैं और फिर कैसे पात्र उनके प्रवाह में बहता जाता है सारी कहानी उसी का दिग्दर्शन है . मिलन और बिछोह  जाति - पांति की अग्नि में कैसे स्वाहा होते हैं और उस वजह से कैसे ज़िंदगियाँ हाशियों पर आ जाती हैं कि किसी भी ज़िन्दगी को किनारा नहीं मिलता का एक बेहतरीन चित्रण है . लेखक ने बारीक से बारीक चीज को इस तरह लिखा है कि सब जैसे सामने ही घटित हो रहा हो . एक एक पल , एक एक क्षण का ब्योरेवार लिखना और उसमे पाठक को भी बांधे रखने की कूवत रखना ही लेखन की सफलता है जिसमे लेखक सफल हुआ है . हर बार घटनाओं को ऊंचाई पर ले जाकर फिर सतह पर ले आने की कला में लेखक माहिर हैं जहाँ रिश्तों के बनने और बिगड़ने की प्रक्रिया के अंतर्गत जाने कितने मोड़ कितने लम्हे ऐसे आते हैं पाठक को लगता है बस शायद अब बिजली कडकड़ाएगी या अब खिलेंगे कहीं किसी छोर पर बुरांस के फूल वही लेखन की सीमाओं पर नियंत्रण रखते हुए एक मर्यादा कायम रखी जबकि संभव नहीं होता किसी भी लेखक के लिए इस सीमा का अतिक्रमण किये बिना लिखना लेकिन एक साफ़ सुथरी कहानी पाठक को आकर्षित करती है जिसे कोई भी बड़ा हो या बच्चा पढ़ सकता है , समझ सकता है और लेखन की सरलता पर मंत्रमुग्ध हो सकता है .

इंसान जितना कतरा कतरा ज़िन्दगी को सहेजने की ताउम्र कोशिश करता रहता है वो रेत सी कब और कैसे फिसलती जाती है पता ही नहीं चलता और एक वक्त आता है जब वो खुद को ठगा हुआ महसूसता है तो ज़िन्दगी बेमानी लगने लगती है और मौत खूबसूरत .......मानो लेखक ने इसी सोच को इंगित किया है .

मुकेश दुबे जी का लेखन इसी प्रकार आकार लेता रहे और अनवरत चलता रहे यही दुआ है . शुभकामनाओं के साथ .

शुक्रवार, 1 मई 2015

'आय ऍम नॉट मजदूर '

'आय ऍम नॉट मजदूर '

स्वीकार रही हैं कुछ स्त्रियाँ 
हाँ , आज मजदूर दिवस है 
और गर्व है मुझे 
अपने मजदूर होने पर 

ये किस सोच को जन्म दिया 
स्त्री होकर स्त्री को मजदूर का दर्जा दिला 
कौन सा महान कृत्य किया 
समझ से परे नज़र आया 

आज की आधुनिक पढ़ी लिखी स्त्री भी 
गर खुद को मजदूर की श्रेणी में रखेगी 
तो अनपढ़ पिछड़ी तो कभी 
अपने होने के अर्थ को न समझ सकेगी 

ये कैसे मापदंड हम बना रहे 
ये कौन सी आग जला रहे 
जो स्त्री को स्त्री की समुचित पहचान न करवा 
उसे खुद ही दोजख की आग में झोंक रहे 

नहीं , नहीं स्वीकारती मैं ये तमगा 
मेरे लिए सबसे पहले है मेरा अस्तित्व 
मेरा होना , मेरी पहचान 
जो नहीं गुजरती किसी भी तंग गली से 

नहीं  , नहीं हूँ मैं मजदूर 
और मैं ही क्या 
नहीं है कोई मेरी नज़र में मजदूर 
क्योंकि 
जीवनयापन हेतु किया कार्य 
नहीं बनाता किसी को मजदूर 

मैं हूँ एक ऐसा व्यक्तित्व 
जो देश समाज और घर में देकर अपना योगदान 
करती है भविष्य निर्माण 

हाँ , निर्मात्री हूँ मैं भविष्य की 
मगर नहीं हूँ मजदूर 
इसलिए कह सकती हूँ गर्व से 
'आय ऍम नॉट मजदूर '

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

मिट्टियों की सिर्फ कहानियां होती हैं निशानियाँ नहीं .......

करते रहे दोहन 
करते रहे शोषण 
आखिर सीमा थी उसकी भी 
और जब सीमाएं लांघी जाती हैं 
तबाहियों के मंज़र ही नज़र आते हैं 


कोशिशों के तमाम आग्रह 
जब निरस्त हुए 
खूँटा तोडना ही तब  
अंतिम विकल्प नज़र आया 
वो बेचैन थी .....जाने कब से 
वो बेचैनी यूँ बाहर आ गयी 
थरथरा गयी कंपकंपा गयी
धरा की हलचल 
समूचा वजूद हिला गयी 

रह रह उठते रुदन की हलचल से 
बेशक तुम दहल उठो अब 
मगर उसकी ख़ामोशी 
उसकी शांति 
उसकी चुप्पी से सहमे तुम 
आज खुद को कितना ही कोसो 
जानती है वो 
न बदले हो न बदलोगे कभी 

सब्र का आखिरी इम्तिहान और आखिरी तिलक भी 
क्या कभी कोई यूं लगाया करता है का इल्ज़ाम 
सहना नियति है उसकी 
फिर वो धरा हो या स्त्री .........
ओ अजब फितरत के मालिक 
उस पर कहते हो भूचाल आ गया !!!


जानते हो न 
मिट्टियों की सिर्फ कहानियां होती हैं निशानियाँ नहीं .......

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

जा बेटी जा ..........जी ले अपनी ज़िन्दगी !!!

हो जाती हूँ कभी कभी बेहद परेशां 
जब भी बेटी कहीं जाने को कहती है 
और मेरी आँखों के आगे 
एक विशालकाय मुखाकृति आ खड़ी होती है 
जिसका कोई नाम नहीं , पहचान नहीं , आकृति नहीं 
लेकिन फिर भी उसकी उपस्थिति 
मेरी भयाक्रांत आँखों में दर्ज होती है 
जबकि बेटे द्वारा किये गए इसी प्रश्न पर 
मैं निश्चिन्त होती हूँ 


उसके आँखों में उठे , ठहरे 
अनगिनत प्रश्नों से 
घायल होती मैं 
अक्सर अनुत्तरित हो जाती हूँ 
नज़र नहीं मिला पाती 
जवाब नहीं दे पाती 
बेटी और बेटे में फर्क न करने वाली मैं 
बराबरी का परचम लहराने वाली मैं 
उस वक्त हो जाती हूँ 
निसहाय , असहाय , उदास , परेशां , हताश 

एक भयावह समय में जीती मैं 
आने वाली पीढ़ी के हाथ में 
सुकून के पल संजो नहीं पाती 
फिर काहे का खुद को 
स्त्री सरोकारों का हितैषी समझती हूँ 
कहीं महज ढकोसला तो नहीं ये 
या मेरा कोरा भ्रम भर है 
तमाम स्त्री विमर्श 
जानते हुए ये सत्य 
कि 
जंगल में राज शेर का ही हुआ करता है 

विरोधाभासी मैं हूँ , मेरी सोच है या इस दुनिया का यही है असली चेहरा 
जो मुझे अक्सर डराता है 
नींद मेरी उड़ाता है 
और यही प्रश्न उठाता है 
आखिर क्यों दोनों के लिए नहीं है ये संसार समान ?
हूँ इसी पसोपेश में ............

समय की रेत में जाने कौन सा बालू मिला है चाहूँ तो भी अलग नहीं कर पाती 
क्या होगा संभव कभी जब समय के दर्पण में छलावों का दीदार न हो 
और कह सकूं सुकूँ से मैं 
बिना किसी प्रतिबन्ध के 
जा बेटी जा ..........जी ले अपनी ज़िन्दगी ?