पृष्ठ

अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

शनिवार, 31 मई 2014

हाशिया



हाशिये पर रहने वालों के 
न पेट होते हैं न जुबाँ न दिल 
न होती हैं उनकी जरूरतें 
आखिर सुरसा भी क्यों 
उन्ही के यहाँ डेरा जमाये 
तो क्या नहीं होती उनकी कोई पहचान 
क्या नहीं होता उनका कोई अस्तित्व 
जब नहीं होता पेट जुबाँ या दिल 
तो कैसे स्वीकारा जाए अस्तित्व  ....... 
एक सोच , एक प्रश्न 
अस्तित्व की देहलियों पर पाँव पसारे 
उत्तर के लिए दक्षिण दिशा में देख रहा है 
क्योंकि सुना है 
दक्षिण की तरफ पाँव तो अंतिम यात्रा में ही हुआ करते हैं 
तो क्या ये अंत है ?
हाशिये की आँख में ठहरा ये प्रश्न देख रहा है 
अपने  अंतिम विकल्प की ओर 


समाज की सुंदरता में दाग भर होना 
ही क्या इस समय का कोढ़ है 
जिसे खुजाने पर रिसता लहू 
नहीं देता पहचान उनके होने की 
नपुंसकों के जंगल में 
जाने कौन सी आदिम परम्परा 
वाहक बनी इठलाती है 
जो नहीं दिखता  हाशिया 
न हाशिये पर खड़ी 
एक पूरी जमात 
फिर वो किसी रेखा से नीचे के तबके हों 
या फिर दलित 
या संसार को आधार देने वाली स्त्री 
सभी  को हाशिया ही नसीब हुआ 
जिन्हें नहीं गिना जाता किसी जनाधार में 
जिनके नहीं होते कोई गणित 
एक पूरी संकुचित श्रेणी में शामिल 
एक ऐसा वर्ग जिसके होने पर ही 
प्रश्नचिन्ह लगा होता है 
आखिर ये है तो है क्यों ?


प्रश्न यहीं खड़ा हुआ 
फिर कौन सा समाज 
हाशिये के दूसरी तरफ खड़ा 
बना रहा है नियम मर्यादाएं अपनी सुविधानुसार 
जहाँ नहीं हैं स्त्रियों का अस्तित्व 
जहाँ नहीं है कोई तबका या दलित 

ये किस जंगल के क़ानून को 
लागू करने की जद्दोजहद है 
जहाँ सिर्फ बाघ , शेर और चीते ही 
अपनी चिंघाड़ों , अपनी दहाड़ों से 
दहला रहे हैं जंगल का सीना 
और बन्दर , खरगोश , लोमड़ी ,भालू 
अपनी मांद  में दुबकने को मजबूर 
क्या यही है लोकतंत्र ?
क्या यही है मानवीयता का उज्जवल पक्ष 
जहाँ बाकी सब पक्ष हो जाते हैं विपक्ष 

समानता सामाजिकता की बुनियादें 
जहाँ चूल सहित उखड चुकी हैं 
नहीं बचे अवशेष 
किस खुरदुरी मानसिकता का पोषण 
कर रहा है किस खुरदुरे समाज का निर्माण 
जहाँ किसी मर्यादा का कोई औचित्य ही नहीं 
जहाँ सब ओर सिर्फ शकुनि ही बिछाए हैं बिसात 
और दांव पर लगा है हाशिया 
जिसके चीर को बढ़ाने अब नहीं आता कोई कृष्ण 
बस है तो सिर्फ एक सभा अंधों की 
और दुश्शासन खींच रहा है मर्यादा के अंतर्वस्त्र 

आखिर कब तक होता रहेगा चीरहरण 
हाशिये पर खड़ी  मर्यादाओं का 
सभ्य समाज का निर्माण 
क्या स्वप्न ही रहेगा ?
मर्यादा का हनन ही बस 
जंगल का कानून रहेगा ?
प्रश्नों के जंगल कुलबुला रहे हैं 
मगर शेर , चीते और बाघों की दहाड़ें 
जज़्ब कर रही हैं सब कुलबुलाहटें 

क्योंकि 

हाशिया तो हाशिया है 
उसे कब तवज्जो मिली है 
उसके अस्तित्व को कब स्वीकारा गया है 
कुचले मसले जाना ही उसकी नियति है 
अधिकारों के लिए लड़ना उसे कहाँ आता है 
आवाज़ ऊंची करना उसे कहाँ आता है 
जानते हैं कर्णधार 
इसलिए 
चल रहा है सुशासन जंगल में 
हा हा हा के शोर के नीचे दब जाती हैं सारी आवाज़ें 
क्योंकि 
पीड़ित सिर्फ पीड़ा भोगने को ही जन्मते हैं जानता है जंगल का कानून 
इसलिये
पीडित को ही दण्डित करना है जंगल का कानून !!!

गुरुवार, 29 मई 2014

कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!


ख्यालों के बिस्तर भी 
कभी नर्म तो कभी गर्म हुआ करते हैं 
कभी एक टॉफ़ी की फुसलाहट में 
परवान चढ़ा जाया करते हैं 
तो कभी लाखों की रिश्वत देने पर भी 
न दस्तक दिया करते हैं 
ये तो वो पंछी हुआ करते हैं 
जो बिन पंख परवाज़ भरा करते हैं 
तभी तो ये अजीबोगरीब ख्याल 
टकराने आ गए 
मुझमे भी इक कौतुहल जगा गया
 
ईश्वर ने दो को बना सृष्टि बनायीं 
स्त्री और पुरुष में ही सारी प्रकृति समायी 
इक दूजे से भिन्न प्रकृति बना 
दो अलग व्यक्तित्व बना डाले 
और दुनिया के जंजाल में फंसा डाले 
दोनों न संतुष्ट हो पाते हैं 
इक दूजे पर इलज़ाम लगाते 
दुनिया से कूच  कर जाते हैं 

अजब खेल के अजब नियम बनाये 
कोई न किसी को समझ पाये 
तब ख्यालों ने इक जुम्बिश ली 
और बन्दूक की गोली सी 
जैसे इक ख्याल की लकीर उभरी 
गर विधाता ने इक करम अता किया होता 
चन्द्रमा के पुत्र बुध की तरह 
स्त्री और पुरुष दोनों को  
कुछ महीने स्त्री और कुछ महीने पुरुष बनने का 
सुअवसर दिया होता 
तो सारा झगड़ा ही निबट गया होता 
दोनों इक दूजे के आचरण , व्यवहार , स्वभाव 
से वाकिफ हो गए होते 
दोनों को इक दूजे के कामों और उनकी दुरुहता 
से पहचान हो गयी होती 
फिर न इक दूजे पर आक्षेप लगाए जाते 
फिर न इक दूजे को कमतर आँका जाता 
फिर न इक दूजे से कोई अपेक्षा होती 
फिर न कोई लिंगभेद होता 
एक सभ्य सुसंस्कृत स्त्री पुरुष से भरा 
ये जहान  होता 

बेशक कहने वाले कह सकते हैं 
वो भला कब स्वीकार्य हुआ था 
तो उसका जवाब यही है 
तब तो एक ही तरह की सृष्टि थी 
जिसमे इस तरह का भेद कैसे स्वीकार्य होता 
मगर यदि विधाता ने 
ऐसी सृष्टि का निर्माण किया होता 
जहाँ दोनों को दोनों रूपों में ढलने का 
समान अवसर दिया होता 
फिर न शिकवों शिकायतों का ये दौर होता 
न पुरुष स्त्री के कामों की समीक्षा करता 
न स्त्री की तरह सोचने या उसके कार्यकलापों का 
वर्णन करने का प्रयत्न करता 
क्योंकि वाकिफ हो गया होता वो 
स्त्री होने के अर्थों से 
और स्त्री भी जान चुकी होती 
पुरुष के दम्भ और पौरुष के 
गहरे नीले स्रोतों को 
तो कितना सुखद जीवन होता 
कोई न किसी के प्रति जवाबदेह होता 
बल्कि सहयोग और समझदारी का 
इक सुखद वातावरण होता 

मगर विधाता तो विधाता ठहरे 
उन्हें क्या फर्क पड़ता है 
उनका काम तो अब भी चलता है 
ये तो मानव की कमजोरी है 
जो उसे खोज के नए सूत्र देती है 
और नए अविष्कारों के प्रति आकर्षित करती है 
तभी तो इस ख्याल ने दस्तक दी होगी 
यूँ  ही नहीं ख्याल के बिस्तर पर 
सिलवट पड़ी होगी 
कोई तो ऐसी बात हुयी होगी 
जिसने ख्याल को ये  आकार दिया होगा 
कभी सोचना इस पर भी ……… ओ विधाता !!!


तब न सीता की अग्निपरीक्षा होती 
तब न कोई कहीं अहिल्या किसी राम की 
प्रतीक्षा में होती 
तब न पांचाली के शीलहरण का 
प्रयास हुआ होता 
और न ही तुम्हें वस्त्रावतार लेना पड़ता 
तो इतिहास का हर अध्याय ही बदल गया होता 
घर घर न महाभारत का दृश्य होता 
भाई भाई का न यूं दुश्मन होता 
हर स्त्री घर बाहर सुरक्षित होती 
उसकी अस्मिता न हर पल 
दांव पर लगी होती 
न ही आज निर्भया जैसी 
कितनी ही हवस की भेंट चढ़ी होती 
स्त्री पुरुष का एक समान अस्तित्व ही 
उनकी पहचान हुआ होता 
कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!

सृष्टि बनायीं तो 
कम से कम समान 
अवसर भी दिए होते 
एक को कमजोर 
और दूसरे को ताकतवर बना 
न यूं भेदभाव किये होते 
कभी सोचना इस पर भी ………… ओ विधाता !!!


क्या करूँ ऐसी ही हूँ मैं 
तुम्हारी बनायीं कृति 
तुम पर ही आरोप न लगाएगी 
तो भला किसे दिल गुबार सुनाएगी 
वैसे उम्मीद है
फितूरों के जंगल में उगी नागफनी सा ये ख्याल कचोटेगा तो जरूर तुम्हें भी ....... ओ विधाता !!!


( डायरैक्ट पंगा गॉड से :) )

शनिवार, 24 मई 2014

विदाई की बेला में

मैं ,तुम, वह से परे भी 
इक संसार हुआ करता था 
पता नहीं 
वक्त की साज़िशें हुईं
या रुत ने करवट बदली 
जाने कहाँ खो गया
अब 
क्या होगा कहने से 
भुला देना मुझे 
मेरे जाने के बाद 
जबकि जानता हूँ ये सत्य 
कौन याद रखता है किसी को 
किसी के जाने के बाद 
इसलिए 
कहता हूँ यारों 
भुला दो मुझे 
मेरे जाने से पहले 
कम से कम इत्मीनान रहे 
आया था अकेला 
तो कहाँ मिलते हैं साथी 
विदाई की बेला में साथ 
मोह के बंधन शायद
कुछ कम हो जाएं ..........   और जाना सुगम 

यूँ भी दरख़्त से पत्तों के झड़ने का मौसम गवाह है चिन्हित दिशा का 

बुधवार, 21 मई 2014

कशमकश के इस दौर में .....

बेटी 
क्या कहूँ 
जाने उम्र का तकाज़ा है 
या मेरी आकांक्षाएं बढ़ गयी हैं 
नहीं जानती 

जबकि जानती हूँ 
तुम्हारी प्रतिबद्धता 
तुम्हारा समर्पण 
परिवार के प्रति 

ये भी जानती हूँ 
तुम उम्र के जिस दौर में हो 
वहाँ अठखेलियाँ करती होंगी 
तुम्हारी भी चाहतें 
वहाँ आकार लेती होंगी 
तुम्हारी भी उमंगें 
अपने मन से सब कुछ करने की 
बिना रोक टोक जीने की 
अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ 

जानती हूँ 
तुम हो पूरी तरह समर्पित परिवार को 
फिर भी जाने क्यों 
कभी कभी हो जाती हूँ निराश 
जाने क्यूँ चिड़चिड़ाहट पाँव जमा 
कर देती है घाव मेरी सोच के वृक्ष पर 
और उतार देती हूँ अपना सारा कलुष 
तुम पर , तुम्हारे रहन सहन पर 
ये हर वक्त तुम्हारा व्हाट्स अप या फेसबुक 
या दोस्तों के साथ चैटिंग  पर लगा रहना 
कर देता है विचलित मेरी मनोदशा को 
आखिर कब समझोगी तुम अपनी जिम्मेदारी 

जबकि जानती हूँ 
किसी भी तरह पीछे नहीं हटतीं तुम 
अपनी जिम्मेदारियों से 
नहीं पीछे हटतीं तुम अपने कर्तव्यों से 
मगर फिर भी 
एक फितूर की लहर 
खींच देती है विषम रेखा 
तुम्हारे और मेरे बीच 
और फूट पड़ता है मेरा लावा सारा 
बेवजह ही तुम पर 
जबकि नहीं चाहती ऐसा करना 
फिर भी हो जाता है 
सब कुछ जानते समझते भी 

अजब दोराहे से गुजरती हूँ 
एक तरफ समय के साथ 
तुम्हें चलते देख 
गौरान्वित महसूस करती हूँ 
दूसरी तरफ खुद को 
जब असहाय या अकेला महसूस करती हूँ 
तब कर देती हूँ विषवमन बिना सोचे समझे 
शायद उम्र के इस मोड़ पर 
जहाँ एक तरफ मीनोपॉज 
दस्तक देता हो 
दूसरी तरफ शारीरिक स्तर गिर रहा हो 
संभव है गुजरती हो हर माँ इस दौर से 
लगता है कभी कभी ऐसा 

इसलिये आत्म ग्लानि से ग्रसित हो जाती हूँ 
जब जानते समझते भी 
खुद पर काबू नहीं कर पाती हूँ 
और सोच में पड़ जाती हूँ 
क्या होगा कल 
जब तुम चली जाओगी 
और दूसरे घर की बेटी को 
अपनी बेटी बना जब लाऊँगी 
कैसे खुद पर काबू कर पाऊँगी 
क्या वो समझ सकेगी मेरी मनोदशा 
जैसे तुम समझती हो 
और मेरे मानसिक और शारीरिक 
परिवर्तन को समझ  
मेरे कहे पर तवज्जो न दे 
हँस कर हवा में उडा देती हो 
जबकि जानती हूँ 
जरूरी है परिवर्तन 
मेरे स्वयं में 
अपनी सोच में , अपने व्यवहार में 
अपनी बोलचाल में 
और यही सोच अंदर ही अंदर 
पैदा कर रही है एक भय 
साथ ही दे रही है एक सन्देश भी 
कि शायद 
यही तो नहीं वो वजह होती 
जिसकी वजह से 
सास बहू में नहीं पटती 
दोनों एक दूसरे को नहीं समझतीं 
क्योंकि 
न सास के लिए बहू बेटी होती है 
और न ही बहू के लिए सास माँ 
जबकि उमंगों के रथ पर आरूढ़ 
नयी नवेली दुल्हन के भी तो 
कुछ अरमान होते हैं 
ये मैं जानती हूँ 
क्योंकि गुजरी हूँ उस दौर से भी 
मगर फिर भी यही भय सताता है 
कैसे खरी उतरूँगी रिश्ते की कसौटी पर 
जब तुम्हारे संग ही नहीं 
खरी उतर पाती 

जबकि जड़ सोच की नहीं हूँ मैं 
ये तुम जानती हो 
न ही परम्पराओं की दुहाई दे 
कुछ मनवाने की इच्छा रखती हूँ 
बल्कि खुद तोड़ देती हूँ 
हर उस बेड़ी को 
जो राह में रुकावट बनती दिखती है 
आज की आधुनिक नारी का 
खुद में दिग्दर्शन करती हूँ 
फिर भी 
जाने कैसी जद्दोजहद है ये 
मेरी मुझसे ही 
सब कुछ जानते समझते भी 
अँधेरी गलियों में 
घसीटे जा रही है 

क्या उम्र के तकाज़े यूँ बेबस किया करते हैं 
सोच के स्तर को भी 
जिसे धरती मिलती है न आस्मां ……
जानने को प्रयासरत है एक माँ , एक नारी 
उम्र की बढ़ती दहलीज पर प्रश्न दस्तक  दे रहा है ………

क्यूंकि 
सास भी कभी बहू थी 
क्यूंकि 
माँ भी कभी बेटी थी 
ये जानते हुए भी 
फिर कैसे विडंबनाओं के त्रिशूल 
निकल आते हैं पहाड़ों के शिखरों पर 
सोच की कंदराओं को भेदते हुए 

अपेक्षा और उपेक्षा की 
कशमकश के इस दौर में 
झूलती मेरी संवेदनाएं 
खरोंच रहीं हैं प्रतिपल 
इसलिए खुद से मुखातिब होने को 
खुद को अपनी कसौटी पर कसने को 
लिख रही हूँ ये मेरा खत मेरे नाम 
और 
प्रश्न उम्र की चौखट पर मुँह बाए उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा है........आदिकाल से !!!

सोमवार, 19 मई 2014

जो हो इक रिश्ता ख्वाब सा


लिखती हूँ कलम से
दिल की किताब पर
एक नाम अनाम सा
शायद कहीं वो मिल जाये
जो हो इक रिश्ता ख्वाब सा
हाथो की चूडियों सा खनकता
पैरों की पैंजनिया सा छनकता
दुल्हन के जोडे मे सिमटा
इक हया की ओट मे दुबका
वो कल्पना की आब सा
शायद कहीं वो मिल जाये
इक रिश्ता गुलाब सा
अनाम मोहब्बत का पैगाम
अनाम मोहब्बत के नाम सा
शायद कहीं वो मिल जाये
जो हो इक रिश्ता ख्वाब सा

चलो जी लें इक ख्वाब को हकीकत सा शायद यूँ भी बन्दगी हो जाए ………

मंगलवार, 13 मई 2014

ओ इंसानियत के दुश्मनों

  सुना है 
दे दिया उन्होने 
तालिबानी हुक्म 
करो धर्मान्तरण 
वरना कर दिये जाओगे कत्ल 
और कर दिया धर्म परिवर्तन 
क्या वास्तव में 
इस तरह होता है धर्म परिवर्तन ?

ये कौन सी व्याख्या प्रस्तुत की 
ये कौन सा धर्म हुआ 
जो बन्दूक की नोक पर बदल गया 
जिसने बन्दूक की नोक पर 
शरण में ले लिया 
क्या वास्तव में 
इस तरह होता है धर्म परिवर्तन ?

जबकि हमने तो सुना है 
वास्तविक धर्म तो इंसां के दिल मे रहता है 
और हमने तो सुना है 
सबसे बड़ा धर्म तो इंसानियत होता है 
तो क्या 
इंसानियत से बड़ा भी कोई धर्म होता है 
जो ज़िबह करने के नाम पर परिवर्तित होता है ?

ओ इंसानियत के दुश्मनों 
कुछ समझो तुम भी 
कोई धर्म गलत नही होता 
गलत तो तुम्हारे मंसूबे होते हैं 
जो गलत बीजों को बो 
एक जड़ पीढ़ी को जन्म देते हैं 
और काटती रहती हैं पीढ़ियाँ 
तुम्हारी बोई फसलों की नस्लों को 
सदियों तक 

मगर सोचना कभी 
क्या तुम्हारे ऐसा करने से 
क्या कभी बदल गयी तसवीरें 
क्योंकि 
धर्म कोई कपडा नही 
जो बदल कर दूसरा पहन लिया जाये 
धर्म तो इंसां की रूह में बसता है 
जिसकी वो इबादत करता है 
ये सिर्फ शरीर या मुख से उच्चारण करना भर 
किसी भी धर्म का मापदंड नहीँ होता 

आज बन्दूक की नोक पर 
किये जाने वाले  धर्म के  परिवर्तन 
का कोई औचित्य नहीं 
जब तक मानव मन से न उसे कबूले 
मन से न स्वीकारे 
तब तक व्यर्थ हैं तुम्हारे फैलाये हताशाओं के मकडज़ाल 

चाहे जितना बोको हरम बवाल काटो 
बस इतना जान लो 
वो अल्लाह हू अकबर कहें या गॉड या जीसस क्राइस्ट 
सबमें एक उसी का है नूर बसता 
इसलिये 
धर्म किसी गोली किसी बन्दूक की रखैल नहीं 
जो हुक्म की तामील भर से बदल दिया जाए 
और रूह पर एक नयी इबारत लिख दी जाए  



शनिवार, 10 मई 2014

और मुझे चाहिए मखमली पैबंद रहित रिश्ता

ना जाने रिश्ता किसका किससे होता है
बदन का बदन से
या रूह का रूह से
या सिर्फ पानी की सतह पर तैरती
कागज़ की किश्ती सा
जिसकी जडें ही नहीं होतीं
तो सींचा किसे जाये
खोखले आईनों के अक्स
भी तो खोखले ही होते हैं ना
फिर किस बाज़ार में जाएँ
बोली लगायें
मोल भाव करें
और खरीद लायें
मनपसंद रिश्ता
भावनात्मक गर्माहट वाला
जिस्म से किलोल करने वाला नहीं
जिस्म को तहों में लपेटने वाला
और ओढ़ना ना पड़े उस पर
कोई जादुई कम्बल
क्योंकि
खरीदी हुई चीजें तो प्रदर्शनी के लिए होती हैं ना ...........
हाँ .........प्रदर्शनी जरूरी है
निस्वार्थता की , अपनेपन की , रूह के मिलन की
जानते हो क्यों
आज का ज़माना ही ऐसा है
जो रिश्तों पर पैबंद लगाये बिना नहीं छोड़ता
और मुझे चाहिए
मखमली पैबंद रहित रिश्ता
जिसमे हाथ पकड़ लूं तो भी स्पर्श ना हो जिस्म का जिस्म से
सिर्फ आत्मिक अनुभूति सा सात्विक स्पर्श हो कोई और जीवन गुलफाम हो जाये ........

शनिवार, 3 मई 2014

कौन बहस में उलझे ?.......550 वीं पोस्ट

पता नहीं
प्रेम …कविता है
या कविता में प्रेम है 

मैं तो खोजी प्रवृत्ति की नहीं
बस प्रेम शब्द को सुन लिया 
और उड चली आसमानों को छूने 
एक नहीं ..... सुना है आसमान सात होते हैं 
और मैने भेदना चाहा हर आसमान प्रेम का सिर्फ़ प्रेम से …………

मैं मरजानी जान ही नहीं पायी 
प्रेम तो सिर्फ़ बुतों से किया जाता है 
बाकि और किसी प्रेम के लिये तो 
ना धरा है ना आकाश 

जितना उडी उतनी ही सहमी 
उतनी ही सिसकी उतनी ही तडपी
प्रेम के सियासतदारों ने 
प्रेम का पहला पाठ पढा दिया 
और प्रेम नाम का इकतारा 
मेरे हाथ में पकडा दिया 

अब मीरा प्रेम - प्रेम गुनगुनाती है 
मगर प्रेम का स्वरूप ना जान पाती है 
प्रेम सिर्फ़ शब्द भर अंकित हुआ 
उसके बाद तो प्रेम पर 
इक तेज़ाब सा उँडेला गया 
और उसका आकार 
छिन्न भिन्न हो गया
फिर उसके बाद तो प्रेम
सिर्फ़ कविताओं की ही थाती भर रह गया 

अब उसे कविता मयी प्रेम कहो 
या प्रेममयी कविता 
फ़र्क नहीं पडता 
क्योंकि प्रेम तो किसी ठूँठ की जड सा 
बस ज़मीन में ही धंसा रह गया 

प्रेम निशब्द होती किसी गुनगुनाहट का नाम है 
या कविता किसी गुनगुनाहट को मुखर कर 
प्रेम की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है .......कौन बहस में उलझे ?

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

बालार्क की बारहवीं किरण



बालार्क की बारहवीं किरण है नीता पोरवाल जो अपने दामन में संजो कर लायी हैं अपने अनुभवों का खजाना जहाँ सादगी के साथ सोच का स्तर जब दस्तक देता है तो पाठक वहीँ ठहर जाता है खुद का अवलोकन करने लगता है एक ख्याल उसकी सोच की बेल पर चढ़ने लगता है , आह , यही , बिलकुल यही तो है मेरे मन की भाषा जो मैं कभी कह नहीं पाया , जिसे कभी व्यक्त नहीं कर पाया और यही किसी भी लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है जब पाठक खुद को लेखक के लेखन से जुड़ा महसूसता है।  

" क्या होते हैं प्रेम में हम " जीवन का वो सत्य है जिसे जानते हुए भी अनभिज्ञ रहना चाहते हैं हम , एक परत ओढ़े प्रेम का स्वांग रचते हम कभी खुद से भी सच नहीं कह पाते तभी तो कवयित्री कहती है :

" क्योंकि सोच में जी लेना 
सच में जीने से कहीं ज्यादा होता है आसान " 

एक हकीकत से पर्दा उठाते हुए अंत में :

" दरअसल , अपना ख्यालों के सिवाय 
हम कभी नहीं होते किसी के प्रेम में " 

शायद ही किसी ने प्रेम की ऐसी सटीक व्याख्या की हो। 

" सजा " आज के इंसान की बदलती फितरत पर गहरा कटाक्ष है जहाँ शैतान भी सर झुका  दे इस हद तक मानव की फितरत बदल चुकी है फिर ऐसे में शैतानी ताकतों की जरूरत ही क्या रह गयी जब हर इंसान कहे जाने वाली शख्सियत में शैतानियत भर गयी। 

": दे दी है पटखनी 
कुछ सीधे पैरों वाले इंसानों ने 
इस आखिरी मुकाबले में भी उसे "

" ओढ़ी गयी चुप्पियाँ " एक यथार्थ को शब्दों में पिरो दिया हो जैसे , बिना सजा दिए भी मुजरिम करार कर दिया गया हो जैसे , चुप्पियों के यथार्थ का मानो आईना हो जहाँ चुप्पियाँ अपने होने का जश्न मनाती सी दिखीं , जहाँ चुप्पियों ने राजतिलक किया हो और एक नया इतिहास लिखा हो , यूं भी प्रतिकार  किये जाते हैं , यूं भी जीवन जिए जाते हैं और खुद पर रश्क किया जाता है जहाँ वेदना भी खिलखिला उठे और एक नया इतिहास जिवंत हो उठे कुछ ऐसे भावों को संजोये ओढ़ी हुयी चुप्पियाँ धीमे से पाठक के मन मस्तिष्क पर प्रहार करती हैं और चुपके से निकल लेती हैं पाठक को स्तब्ध छोड़ और यही कवयित्री के लेखन की पराकाष्ठा है जो चुप्पियों में भी मुखर हो उठती है :

" ओढ़ी गयी चुप्पियाँ 
न्याय पुस्तिका में नहीं लिखे जा सके एक गंभीर अपराध सी 
गवाह के आभाव में 
मुजरिम करार दिया जाने के भय से मुक्त 
औरों को ताउम्र कैद की सजा सुना जाती हैं चुप्पियाँ "

" दूरियां " जीवन की आपाधापी के साथ जीवन से आँख मिलाने और किसी समय खुद से ही दूर हो जाने का ऐसा ख्याल है जहाँ इंसान कब खुद के नज़दीक होता है और कब दूर उसे पता ही नहीं चलता और जब एक दिन सारे निष्कर्ष निकालने बैठता है तो हाथ खाली ही दिखते हैं क्योंकि खुद से खुद का फासला तब भी उतना ही कायम रहता है अब चाहे वो फासला रिश्तों का हो या खुद का खुद से महज कोरा  भ्रम भर साबित होता है। 

" ठहराव भी मौली धागे सा नहीं " जीवन एक ऐसी धारा जिसमे सिर्फ बहना ही है , बेशक कितने मोड़ आये , ऊबड़ खाबड़ रस्ते बने मगर चलना नियति है अब उसके लिए की गई जद्दोजहद कोई विशेष परिशिष्ट नहीं बनाती क्योंकि ठहरना संभव ही नहीं फिर क्यों किसी से कोई अपेक्षा की जाए क्योंकि जीवन में खुशियाँ किसी प्रतिस्थापन की मोहताज नहीं होतीं उन्हें आना है आएँगी और उन्हें जाना है जाएँगी बिना किसी आडम्बर को ओढ़े या हाथ में शगुन की मौली बांधने भर से ही नही आतीं : 

" एक उसके ही ठहराव से 
मुकम्मल हैं कई ज़िंदगियाँ " 

" हाँ , खुशियों का प्रतिस्थापन 
किसी विशेष अपेक्षा के बगैर भी संभव " 

नीता पोरवाल की कवितायेँ संवाद करती हैं , मन के कोने को छूती हैं और फिर पाठक को यथार्थ से परिचित कराती हैं।  कवयित्री का चिंतन उसके लेखन में परिलक्षित होता है जो दर्शाता है संभावनाओं की जमीन बहुत उर्वर है , भविष्य सुखद है , पाठक को पाठन  का एक नया आकाश हर बार मिलता रहेगा।  कवयित्री को उनके उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए मिलती हूँ अगली बार। 

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

ओ हताशा !

कृपया गुणीजन ध्यान दें ----

कवि का धर्म होता है अपने लेखन से समाज मे जागृति पैदा करना ये जानते हुए भी कुछ ऐसे भावों से रु-ब-रु हुयी हूँ कि खुद आश्चर्यचकित हूँ ……अब आप ही लोग मार्गदर्शन करें क्या सही और क्या गलत है या ऐसे भावों का जन्म भी होता है ........अब आपकी अदालत में 

हताशा पंख पसारे 
चुपके सा आ 
मुझे डराती है 
मेरे मन की खिड़कियों पर 
अनिश्चितता की थाप दे 
बंद कर जाती है 

जो उपजे थे 
थोड़े सुमन उपवन में 
सब पर अपनी 
नाकामी का ग्रहण 
लगा जाती है 

जाने कैसे 
मुझमे उपजी कुंठाओं का 
पता लगा जाती है 
और फिर दिन ढलने से पहले 
अपना अक्स दिखा जाती है 
हताशा के जंगलों को फैला 
खुद का रौद्र रूप दिखा जाती है 

मेरी सरसता सरलता पर 
ग्रहण लगा 
सूर्यकिरण सा नृत्य दिखाती है 
मुझे मुझमे झुलसा 
अपने होने का जश्न मनाती है 

एक फंतासी सा जब 
जीवन बन जाता है 
तब अपने स्वरुप पर 
गर्वोन्मत्त हो इठलाती है 

मेरे गौरव को नष्ट भ्रष्ट कर 
मुझसे मुझे चुराती है 
यूँ हताशा नर्तन कर 
रक्कासा सी 
मेरा मखौल उड़ाती है 


हताशा के वीभत्स रूप का दिग्दर्शन 
जब हो जाता है 
मैं 
हताशा को ही अपना सखा बना 
खुद से विमुख हो जाता हूँ 
और फिर 
मैं हताशा के भंवर में फँसा खुद का सीना चीरा करता हूँ 
हर मोड़ , हर गली 
हर चौराहे पर 
खुद ही खुद का क़त्ल किया करता हूँ 
मगर भंवर से निकलने का 
कोई उपाय न सोचा करता हूँ 

ओ धैर्य की सौतेली बहन 
आखिर कब तक मुझे 
यूं ही छलती रहोगी 
मेरे मन मस्तिष्क को जड़ कर 
मेरी चाहतों का बलात्कार करती रहोगी 
आखिर कब तक मेरा दोहन कर 
मुझे मुर्दा करती रहेगी 

क्योंकि 
मैं वो हूँ जो 
तेरे गर्भगृह में जब सिमट जाता हूँ 
उम्र भर न बाहर आ पाता हूँ 
और तू 
गर्भवती बन अट्टहास कर 
जब समय को ठेंगा दिखाती है 
तेरी क्षमताओं पर न शक रहता है 
बस मेरा ही स्वरूप विनष्ट होता है 
और मैं 
तेरे अट्टहासों तले प्रसव की पीड़ा झेलते 
मृत भ्रूण बन जब जन्मता हूँ 
वास्तव में वो 
तेरी जीत और मेरी हार का संध्याकाल होता है 
जहाँ तेरे पंख विस्तार पाते हैं 
और मेरी कुंठाएं , मेरी चाहतें 
छिन्न भिन्न हो 
प्रेत बन मुझसे लिपट जाती हैं 
और मैं 
फिर कभी प्रेतयोनि से न मुक्त हो पाता हूँ 

ओ हताशा !
तेरा भयानक विस्तार जब 
सृष्टि के कण कण में 
आकार पाता है 
सृजनकर्ता भी विस्मृत हो जाता है 
क्योंकि 
विनाश के चिन्हों का प्रकट होना 
सूचित कर जाता है 
प्रलय निकट है 
तेरे साम्राज्य का विस्तार 
मानो  विराट रूप धारी 
कोई कृष्ण खड़ा हो 
कौरवों की सभा में 
और नष्ट होने को हो सारा ब्रह्माण्ड 

जाने क्यों तेरे चेहरे पर 
फनधारी सर्प ही रेंगते दिखा करते हैं 
जिनका विषाक्त विष 
मेरी रग़ों में जब दौड़ा करता है 
मैं नीला पड़ जाता हूँ 
तेरे चरणों में नतमस्तक हो जाता हूँ 
जहाँ कोई सीढ़ी नहीं होती 
सिर्फ और सिर्फ 
तेरे सर्प ही डंसा करते हैं 
मेरी आकुलता को 
मेरी व्याकुलता को 
मेरी आकांक्षाओं को 
मेरी इच्छाओं को 
मेरी चाहतों को 
और मैं 
निसहाय निराश्रित बेबस शिशु सा हो जाता हूँ तुझे तकने को मजबूर !!!

रविवार, 27 अप्रैल 2014

इक अरसे बाद

इक अरसे बाद 

बिना पटकथा के संवाद कर गया कोई 
दिल धड़कन रूह तक उत्तर गया कोई 
अब धमकती है मिटटी मेरे आँगन की 
जब से नज़रों से जिरह कर गया कोई


मैं ही लक्ष्य 
मैं ही अर्जुन 
कहो 
कौन किस पर निशाना साधे अब ?

उल्लास के पंखों पर सवार हुआ करती थी 
वो जो चिडिया मेरे आँगन में उतरा करती थी
इस दिल की राज़दार हुआ करती थी 
नरगिसी अंदाज़ में जब आवाज़ दिया करती थी

मुझसे मैं खो गयी 
क्या से क्या हो गयी 
ज़िंदा थी जो कल तलक
आज जाने कहाँ खो गयी

दर्द जब भी पास आया 
दिल ने इक गीत गाया 
नैनो ने अश्रु जब भी ढलकाया 
रात ने इक जश्न मनाया


जाने कहाँ खो गयी इक दुनिया 
अब खुद को ढूँढ रही हूँ मैं 
न शब्द बचे न अर्थ 
वाक्यों में खो गयी हूँ मैं

चुप्पी का कैनवस जब गहराता है 
अक्स अपना ही कोई उभर आता है 
खुद के पहलू से जब भी दूर जा बैठे
कोई मुझे ही मुझसे मिला जाता है

बूँद बूँद रिसती ज़िन्दगी 
फिर किस पर करूँ गुमान

बस इंसाँ में इंसानियत बाकी रहे 
लम्हा एक ही काफ़ी है जीने के लिए

कोशिशों के पुल तुम चढते रहो 
बचने की तजवीजें मैं करती रहूँ 

इसी बेख्याली में गुजरती रहेगी ज़िन्दगी

जाने कौन से कैल ,चीड, देवदार हैं 
चीरे जाती हूँ मगर कटते ही नहीं 
मौन के सुलगते अस्थिपंजरों के 
अवशेष तक अब मिलते ही नहीं

जरूरी नहीं 
धधकते लावे ही कारण बनें 
शून्य से नीचे जाते 
तापमाप पर भी 
पड जाते हैं फ़फ़ोले .........