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अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

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शनिवार, 29 जुलाई 2017

थोडा सा खुश होना तो बनता है न

मित्रों मुझे ये सूचना अभी अभी Surjit Singh जी की वाल से मिली. न उन्होंने मुझे टैग किया न शेयर का आप्शन है इसलिए स्क्रीन शॉट लेकर ही लगा रही हूँ

ये तो मेरे लिए एक बहुत बड़ा सरप्राइज है .......मैं तो कभी सपने में भी नहीं सोच सकती थी ऐसा हो सकता है ......रेडियो 'देश प्रदेश' के स्टूडियो में मेरे दो कविता संग्रहों 'प्रश्नचिन्ह...आखिर क्यों?' और 'कृष्ण से संवाद' से 10 कविताओं की रिकॉर्डिंग की गयी .

अब उन्ही के शब्दों में :
आज रेडियो 'देश-प्रदेश' के स्टूडियो में दिल्ली की रहने वाली प्रसिद्ध हिन्दी कहानीकार व कवयित्री वन्दना गुप्ता के काव्य संग्रह 'प्रश्न चिन्ह...आखिर क्यों ?' और 'कृष्ण से संवाद' से दस कविताओं की रिकार्डिग मेरे द्वारा करवाई गई। इस अवसर पर पंजाबी के प्रसिद्ध कथाकार गुरपाल लिट्ट भी स्टूडियो में मौजूद रहे। श्री लिट्ट ने वन्दना गुप्ता की कविताओं और काव्य शैली को उच्च स्तरीय बताया। उन्होंने कहा कि कविताएँ सरल, गम्भीर, दार्शनिक ओर रोचक हैं।
इस अवसर पर पंजाबी के प्रसिद्ध कथाकार गुरपाल लिट्ट भी स्टूडियो में मौजूद रहे। श्री लिट्ट ने वन्दना गुप्ता की कविताओं और काव्य शैली को उच्च स्तरीय बताया। उन्होंने कहा कि कविताएँ सरल, गम्भीर, दार्शनिक ओर रोचक हैं।


यदि कोई मित्र इस प्रसारण को सुनता हो तो यदि वो उसे रिकॉर्ड कर सके तो मेरी ख़ुशी दोगुनी हो जायेगी.
मेरा थोडा सा खुश होना तो बनता है न :) :) 

https://www.facebook.com/surjit.vishad/posts/1979122112365996?comment_id=1979135779031296&reply_comment_id=1979141412364066&notif_t=feed_comment_reply&notif_id=1501323969310319 

 



 

 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

शोकगान

गुस्से के धुएं में जल रही है चिता
अपनी ही आजकल
पंगु जो हो गयी है व्यवस्था
और लाचार हो गयी है जनता

तो क्या हुआ जो न मिले न्याय
दस वर्षीय गर्भवती को
उनके घर नहीं होते ऐसे हादसे
'इतना बड़ा देश है, आखिर किस किस की संभाल करें'
कारण से हो जाओ संतुष्ट
कि तालिबानी देश के वासी हो अब तुम

जहाँ इतिहास को खुरचा जा रहा हो
बदली जा रही हों इबारतें
वहाँ छोटे मोटे हादसों से परेशान करने की जुर्रत ?
मरे हुए देश के मरे हुए लोगों
न्याय वो अबला है
जिसकी मांग में सिन्दूर भर
सुहागिन करने के रिवाज़ बदले जा चुके हैं

आओ शोकगान में सम्मिलित होओ

रविवार, 23 जुलाई 2017

मैं सन्नाटा बुन रही हूँ ...


मैं सन्नाटा बुन रही हूँ ...जाने कब से
न, न अकेलापन या एकांत नहीं है ये
और न ही है ये ख़ामोशी

तेरे शहर के सन्नाटे का एक फंद
मेरी रूह के सन्नाटे से जुड़ कर
बना रहा है तस्वीर-ए-यार

सुनो
तुम ओढ़ लेना
मैं पढ़ लूँगी जुबाँ
हो जायेगी बस गुफ्तगू
काफी है जीने के लिए

इश्क की प्यालियों का नमक है ये
जिसका क़र्ज़ कायनात के अंतिम छोर तक भी चुकता नहीं होता ...

रविवार, 16 जुलाई 2017

एक शाम ब्लॉगिंग के नाम .....

 
 
एक शाम ब्लॉगिंग के नाम ......जी हाँ, हम सबके प्रिय मित्र Mahfooz Ali द्वारा आयोजित ब्लॉगर मीट (ये वो वाला मीट नहीं है जनाब जो गौरक्षकों के हथियार निकल आयें और पेल दें सब पर दे दनादन, लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता तो कोई डर नहीं था क्योंकि आयोजन करने वाला भी तो हमारा मोहम्मद अली था :) ) हाँ तो जब महफूज़ बुलाये और कोई न आये ऐसा तो हो ही नहीं सकता. जितने प्यार और सम्मान से महफूज़ बुलाता है उसके बाद अपनी तबियत को भी कहना पड़ता है ठीक हो जा वर्ना महफूज़ आ जायेगा :)

दोस्तों, एक अरसे बाद घर से अकेली निकली और जब अपने ब्लॉगिंग की दुनिया के दोस्तों से मिली तो एक अलग सी ख़ुशी मिली. कुछ नए लोगों से भी मिलना हुआ जो फेसबुक पर तो दोस्त हैं लेकिन अभी तक मिले नहीं थे. ब्लॉगिंग का दौर वो दौर था जिसमे जब बात होती थी तो पोस्ट पर होती थी लेकिन सम्बन्ध ज्यों के त्यों कायम रहते थे और ऐसी ही आत्मीयता आज तक बनी हुई है तभी तो एक बुलावे पर सब दौड़े चले गए. अंजू चौधरी, डॉ दराल, मुकेश कुमार सिन्हा, शाहनवाज़, डॉ दराल, तारकेश्वर गिरी, सुनीता शानू, वंदना गुप्ता, हितेश शर्मा, आलोक खरे, ब्रजभूषण खरे जिनका कल जन्मदिन भी था , संंजय जी जो एनएसडी से जुड़े अभिनेता मॉम, तलवार जैसी कई फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं, उनका पिछली बार जब मिले थे जब जन्मदिन था, रमेश सिंह बिष्ट, शाहनवाज़, खुशदीप सहगल आदि बच्चों सी चपलता के साथ वहाँ मौजूद थे तो फोटो सेशन का भी खूब लाभ उठाया गया.

१ जुलाई से जब से एक बार फिर ब्लॉगिंग की तरफ सबने कदम बढाया तो लगा जैसे वो ही दौर लौट आएगा. कल की मीट में इन्ही बातों पर फोकस किया गया कि कैसे एक बार फिर लेखक को उसके ब्लॉग की तरफ मोड़ा जाए. कैसे अपने कंटेंट को आकर्षक बनाया जाए जो पाठक खुद ढूंढता हुआ आ जाये. कैसे आज ब्लॉगिंग से कमाई की जा सकती है उस के बारे में भी चर्चा की गयी. और सही बात है लेखक लिख रहा है तो चाहता है उसका लेखन सारे संसार तक पहुँचे मगर वो रास्ते नहीं जानता . इस मीटिंग में यही समझाने और बताने की कोशिश की गयी शाहनवाज़ और खुशदीप जी द्वारा. वहीँ एग्रेगेटर की कमी को भी दूर करने की कोशिश पर ध्यान दिलाया गया.
यूँ तो हम सभी एक दूसरे को जानते थे लेकिन जो नए आये थे वो थोड़े संकोच में थे इसलिए कम बोले. हाँ, हितेश एक युवा, जो यात्राओं पर रहता है अक्सर उसका यात्रा पर घुमक्कड़ी डॉट कॉम वेबसाइट है उस पर लिखता है , उसने जरूर थोड़ी बहुत इस बारे में बातचीत की. मगर अभी अभी मेरी बात हुई रमेश सिंह बिष्ट जी से जो कल पहली बार मिले थे तो बोले मैंने आपको पहचाना ही नहीं वर्ना आपके साथ एक अलग से फोटो तो जरूर ही खिंचवाता और आपसे कुछ देर बात भी होती, जिसका उन्हे बहुत अफ़सोस हुआ. कभी कभी संकोच के कारण काफी कुछ छूट जाता है तो आगे से ये ध्यान रखा जाएगा जब सब आ जाएँ तो सबका इंट्रोडक्शन दिया जाए ताकि कोई भी एक दूसरे से अनभिज्ञ न रहे और उसे बाद में कोई अफ़सोस भी न रहे.

गज़ाला जी का घर हो और उनकी मेहमान नवाजी हो तो कौन होगा जो उससे वंचित रहना चाहेगा. सबसे पहले ड्राइंग रूम में बैठे तो वहाँ कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स चलते रहे फिर बाहर लॉन में बैठे तो वहाँ इडली सांभर, समोसे चटनी के साथ, खांडवी, दो तरह की बर्फी और साथ में कोल्ड ड्रिंक और चाय भी .......एक शानदार शाम के लिए महफूज़ और गज़ाला जी का जितना शुक्रिया अदा किया जाए कम ही है . ऐसे आयोजन न केवल संबंधों को प्रगाढ़ करते हैं बल्कि एक नयी दिशा भी देते हैं .

हिंदी ब्लॉगिंग का नया दौर एक बार फिर ब्लॉगर्स की सक्रियता की ओर देख रहा है तो आइये ब्लॉगिंग को उसका नया स्वरुप देकर अपना योगदान दें ताकि जिंदा रहे हिंदी और आपका लेखन ...
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
 











 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

चल अकेला

साथ कब किसी का होता है 
सब अकेले ही चलते हैं 
ये तो मन के भरम होते हैं 
वो मेरा है 
वो मेरा अपना है 
वो मेरा प्रियतम है 
जब भीड़ में भी तन्हाई डंसती है 
तब पता लगता है 
किस साथ के भरम में 
उम्र के शहतूत गिर गए 
वो जो चिने थे सदियों ने 
सारे पर्वत पिघल गए 
फिर इक नया सफ़र शुरू होता है 
चल अकेला चल अकेला चल अकेला का सिद्धांत मुखर होता है 

क्योंकि 
अंतिम सत्य तो यही है 
अकेले आगमन होता है 
और अकेले ही गमन 
तो कैसे सम्भव है 
बीच में काफिलों का बनना 
बस इस सबब को समझते समझते 
टूट जाती हैं सारी शाखें वक्त के वृक्ष से 
और उस पल का अकेलापन 
काफी होता है उम्र भर को तोड़ने को 
और दूसरे की थाली से रोटी खाने से कब किसी का पेट भरा है 
जब तक कोई खुद न उस दोज़ख से गुजरा है 
अपने हिस्से के आस्माँ को जिसने खुद ना निरखा है 
कैसे सम्भव है 
रेगिस्तान की रेत से पानी उलीचना ?

खुद के मरे बिना कब स्वर्ग मिला करता है 
आश्वासनों की तहरीरों पर ना जीवन गुजरा करता है 
जब समझ आता है तब तक 
देर की देहरियों पर सांझ उतर आती है 
और रात्रि के अंतिम पड़ाव से पहले 
अकेलेपन के जंगलों में फिर कोई सूरजमुखी नहीं खिला करती 
जानना जरूरी है ............
अकेलेपन की त्रासदी को भोगने से पहले 
जानना जरूरी है …………चल अकेला के सिद्धांत को 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

शनिवार, 1 जुलाई 2017

हम सब जुनैद हैं

मैं मर चुकी हूँ
हाँ , चुक चुकी है
मेरी खोज
मेरी अंतर्वेदना
मेरा मन

नही रही चाह किसी खोजी तत्व की
एक गूंगा मौसम फहरा रहा है
अपना लम्पट आँचल
और मैं हूँ गिरफ्त में

जीने की चाह न बचना
आखिर है क्या ?
मौत ही तो है ये भी
साँस लेना जिंदा होने का सबूत नहीं

राम रोज बरस रहा है धरती पर
कभी बरखा बन कर तो कभी कहर बन कर
मासूमों का क़त्ल
मेरे समय का शून्यकाल है
संवेदनाएं पक्ष विपक्ष कब देखती हैं
शून्य चित्त से नहीं किये जाते आह्वान

समय दरोगा बन कर रहा है शासन
हुक्म उदूली करना पर्याय है विद्रोह का
देश बन गया है कत्लगाह
जुनैद हैं यहाँ सभी
हम सब जुनैद हैं
मारे जा चुके हैं
तो बताओ कैसे कहूँ - जिंदा हूँ मैं ?

मगर "राम" जिंदा हो गया
अपने समय के वीभत्स स्वरुप पर अट्टहास करता हुआ
अल्लाह की सिसकियों से बोझिल है सारी कायनात
जुनैद का मरना जरूरी है शान्ति पाठ के लिए ....

आज मौत मेरा स्वाभाविक अवलंबन है
और विद्रोह मेरा गुनाह ...

#हिंदी_ब्लोगिंग

सोमवार, 26 जून 2017

किस्मत की धनी




चूंकि मैं एक औरत हूँ
नहीं जी पाती मनमाफिक ज़िन्दगी
फिर जी भर के जीना किसे कहते हैं ...नहीं पता

बस उम्र के दौर बदलते रहे
नहीं बदला तो जिम्मेदारियों का शिड्यूल
क्या उमंगों की बारात नहीं निकलती थी मेरे मन की गली से
क्या चाहतों के शामियाने नहीं टंगा करते थे मेरी हसरतों पे
सब था मगर नहीं था हक़
अपनी उमंगों, चाहतों, जज्बातों , हसरतों के गुलदस्तों को सजाने का
'लड़की हो , जो करना हो अपने घर जाकर करना'
'या फिर शादी के बाद करना'
तक सिमटी रही दुनिया
और फिर बदल गयी सभ्यता

नयी सभ्यता के नए साजो सामान
करना था मुझे ही खुद को अभ्यस्त
और निकल गया वक्त मुट्ठी से
और मैं 'अपना घर' ढूँढती रही राख के ढेर में

चाहत थी उडूं पंछी बन आकाश में
कभी अकेले कभी दुकेले
तो कभी सामूहिक
चाहत थी एक बार चूम लूँ चाँद के काफिर पैर
और हसरतों की धवल चांदनी से खिल उठे मन कँवल
चाहत थी भर लूँ साँसों में सारे जहान की खुशबू
जो रोम रोम कर दे सुवासित
चाहत थी कर लूँ दुनिया मुट्ठी में मीत संग
और गा लूँ ज़िन्दगी का गीत प्रीत संग
मगर वक्त के तीतर कब रहम खाते हैं
उम्र तियापांच में ही गुजार जाते हैं
मीत भी कब मन की ड्योढ़ी चढ़ पाते हैं

मेरा औरत होना अक्सर प्रश्नचिन्ह की ड्योढ़ी पर कीला मिला
और जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की पोटली से सर मेरा झुका मिला
अच्छी माँ, अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी बनते हुए भी
न कभी अच्छी माँ, बेटी या पत्नी का खिताब मिला
मेरे त्याग मेरे समर्पण का बस यही सिला मिला
तुम अनोखी नहीं जो ये करती हो ...

जब शरीर ने भी साथ छोड़ दिया
और तमन्नाओं ने विद्रोह का बिगुल मन में छेड़ दिया
खुद को मिटा दिया तब ये इल्म हुआ
आखिर कब उम्र वापस मुड़ी है
जो अब आस की कोई कड़ी हो और तू जी जाए एक मुकम्मल ज़िन्दगी
चाहतों भरी, उम्मीदों भरी, हसरतों भरी

अब सुलगती चटखती उम्र की लकड़ियाँ
अक्सर बतियाती हैं
जहाँ इश्क का छींटा भी नहीं लगा होता 
वहीँ धोक देने की परंपरा निभाती है
कितनी पारंगत होती है अभिनय में 
जो दिल की ख्वाहिशों को न कभी लब पर लाती है
बस अन्दर ही अन्दर खुद को मिटाती है
और एक बेसबब उम्र जी जाती है

अपनी हसरतों का कफ़न ओढ़ कर 
तमन्नाओं की चिता पर 
अपनी चाहतों की अग्नि से 
करती है खुद का अंतिम संस्कार
कितनी किस्मत की धनी होती है एक औरत
जीने को ज़िन्दगी मिली तो सही
बस यही होती है एक औरत के अंतिम संस्कार की अंतिम रस्म
जहाँ समय का बिजूका गुनगुनाते हुए मरहम यूँ लगाता है 
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ....





बुधवार, 21 जून 2017

ज़िन्दगी के कोष्ठक में...

जाने कैसे चलते चलते किसी को कोई यूं ही मिल जाया करता है ...यहाँ तो उम्र के सिरे हाथ से छूटते रहे मगर किसी गुनगुनी धूप का कोई साया भी न पसरा किसी कोने में ...जाने कौन से लोग थे जिन्हें तुम और मैं दो रूपक मिले यहाँ तो सिर्फ उम्र से ही बावस्ता रहे ...कि किरच किरच चटखती है अक्सर रूह की वादियों में और सावन है कि कभी बरसा ही नहीं फिर कैसे और कौन कहे सावन को आने दो ...तुम आ गए हो नूर आ गया है एक कागज़ी ख्याल भर रहा जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा सुलगता ही रहा ...ये अकेलेपन के तांबई रंग हैं जो किसी बाज़ार में नहीं चला करते ...तांबे के सिक्कों का चलन तो एक युग बीता बंद हो चुका है फिर क्यों रूह की बतखें कुलबुलाते हुए क्वैक क्वैक करती हैं ...आओ आमीन के साथ बंद करो चैप्टर कि संगसार होने का वक्त है ये जहाँ तुम्हारे अपने सिवा तुमसे कोई नहीं मुखातिब ...विषकन्या का रोल ख़त्म होता है कि वो पैदाइश है तुम्हारी , तुम्हारे सपनो की, तुम्हारे मिटने की ...अब टन टन की आवाज़ से बजता समय का घंटा सूचना है रुखसती की कि यहाँ विदाई की रस्में गाजे बाजे से नहीं निभायी जातीं ...करो विषपान जीवन की निस्सारता का ...और गाओ गीत ...मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया ...लो अंतिम अध्याय सम्पूर्ण हुआ ...मिलेंगे फिर किसी ज़िन्दगी के किसी कोष्ठक में ...तब तक अलविदा ज़िन्दगी

रविवार, 18 जून 2017

आवाज़ - पिता की या बेटी की ?

लाठी पकड़ चलते पिता
कितने अशक्त
एक एक कदम
मानो मनो शिलाओं का बोझ उठाये
कोई ढो रहा हो जीवन/सपने/उमीदें

फिर भी सिर्फ अपनी ममता से हार जाते
खुद को ढ़ोकर
टुक-टुक करते लाठी पकड़
पहुँच ही जाते दूसरे कमरे में टेलीफोन के पास
मोबाइल का ज़माना नहीं था वो
यदि था भी
तो इनकमिंग ही इतनी महँगी थी
कि चाहकर भी
खुद को नहीं दे सकते थे ये उपहार
आखिर पेंशनर जो ठहरे

पिता की ममता
उनका स्नेह
सिमट आता था चंद पंक्तियों में
और हो जाते थे वो संतुष्ट
सुन बेटी की आवाज़
मानो मिली हो उन्हें
सारे जहान की सौगात

कैसी है ?
अच्छी हूँ
आप कैसे हैं ?
मैं भी ठीक हूँ
बच्चे कैसे हैं ?
वो भी ठीक हैं
बस हो गया संवाद सम्पूर्ण
बस मिला गया उन्हें अनिर्वचनीय सुख
बस हो गयी तसल्ली
बेटी सुखी है
सुन ली उसकी आवाज़

तो क्या हुआ
जो कुछ कदम चल
खुद को तकलीफ दे दे
आवाज की आवाज़ से मुलाक़ात तो हो गयी
ब्याह दी जाती हैं जिन घरों से बेटियां
अकेलेपन की लाठी बहुत भारी होती है
तोड़ने को उस लाठी की चुप्पी
पिता, टुक-टुक कर पहुँच सकते थे कहीं भी

बेटियां, पिता की दुलारी बेटियां
पिता को खोने के बाद याद करती हैं
देती हैं आवाज़
एक बार आओ
करो फिर से संवाद
उसी तरह ... बाउजी
कि आवाज़ ही माध्यम है तसल्ली की
कुशलता की
की हो वहाँ सकुशल आप

इस बार फर्क सिर्फ इतना है
पिता की जगह बेटी ने ले ली है...

सोमवार, 5 जून 2017

महज - सिफर

एकतरफा खेल है ज़िन्दगी
तुम ही चाहो तुम ही पुचकारों
उस तरफ कोई नहीं तुम्हें चाहने वाला
फिर वो खुदा हो या संसार

उठाये थे कुछ मोहरे
चली थीं कुछ चालें
कभी सीधी कभी तिरछी
हर चाल पे शह और मात

अब
न खुदा की खुदाई है
न ज़िन्दगी की रुसवाई है

घूँघट की ओट से झाँक रही है मेरे मन की कुँवारी दुल्हन
जिस गली में तेरा घर न हो
उसी गली से अब तो गुजरना हमें

आस विश्वास परिहास महज एक शब्दकोष ज़िन्दगी का
और पढने पर महज - सिफर

गुरुवार, 1 जून 2017

ये मेरा इश्क था

देखा है कभी भटकी हुई रूह का मातम
दीवानगी की दुछत्ती पर
जर्रा जर्रा घायल मगर नृत्यरत रहा
एक तेरे लिए
और तू बेखबर

अब कौन गाये सुहाग गीत
बेवाओं के मातम हैं ये
और तुम खुश रहे अपनी मुस्कुराहटों में
ऐसे में
उम्मीद का आखिरी गज़र भी तोड़ दिया

अब सोखने को गंगा जरूरत नहीं किसी जन्हु की
ये मेरा इश्क था
जो मुस्कुराहटें गिरवीं रख ख़रीदा था मैंने

फिरअलविदा कहने  की रस्म का भला क्या औचित्य ?