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सोमवार, 26 जून 2017

किस्मत की धनी




चूंकि मैं एक औरत हूँ
नहीं जी पाती मनमाफिक ज़िन्दगी
फिर जी भर के जीना किसे कहते हैं ...नहीं पता

बस उम्र के दौर बदलते रहे
नहीं बदला तो जिम्मेदारियों का शिड्यूल
क्या उमंगों की बारात नहीं निकलती थी मेरे मन की गली से
क्या चाहतों के शामियाने नहीं टंगा करते थे मेरी हसरतों पे
सब था मगर नहीं था हक़
अपनी उमंगों, चाहतों, जज्बातों , हसरतों के गुलदस्तों को सजाने का
'लड़की हो , जो करना हो अपने घर जाकर करना'
'या फिर शादी के बाद करना'
तक सिमटी रही दुनिया
और फिर बदल गयी सभ्यता

नयी सभ्यता के नए साजो सामान
करना था मुझे ही खुद को अभ्यस्त
और निकल गया वक्त मुट्ठी से
और मैं 'अपना घर' ढूँढती रही राख के ढेर में

चाहत थी उडूं पंछी बन आकाश में
कभी अकेले कभी दुकेले
तो कभी सामूहिक
चाहत थी एक बार चूम लूँ चाँद के काफिर पैर
और हसरतों की धवल चांदनी से खिल उठे मन कँवल
चाहत थी भर लूँ साँसों में सारे जहान की खुशबू
जो रोम रोम कर दे सुवासित
चाहत थी कर लूँ दुनिया मुट्ठी में मीत संग
और गा लूँ ज़िन्दगी का गीत प्रीत संग
मगर वक्त के तीतर कब रहम खाते हैं
उम्र तियापांच में ही गुजार जाते हैं
मीत भी कब मन की ड्योढ़ी चढ़ पाते हैं

मेरा औरत होना अक्सर प्रश्नचिन्ह की ड्योढ़ी पर कीला मिला
और जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की पोटली से सर मेरा झुका मिला
अच्छी माँ, अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी बनते हुए भी
न कभी अच्छी माँ, बेटी या पत्नी का खिताब मिला
मेरे त्याग मेरे समर्पण का बस यही सिला मिला
तुम अनोखी नहीं जो ये करती हो ...

जब शरीर ने भी साथ छोड़ दिया
और तमन्नाओं ने विद्रोह का बिगुल मन में छेड़ दिया
खुद को मिटा दिया तब ये इल्म हुआ
आखिर कब उम्र वापस मुड़ी है
जो अब आस की कोई कड़ी हो और तू जी जाए एक मुकम्मल ज़िन्दगी
चाहतों भरी, उम्मीदों भरी, हसरतों भरी

अब सुलगती चटखती उम्र की लकड़ियाँ
अक्सर बतियाती हैं
जहाँ इश्क का छींटा भी नहीं लगा होता 
वहीँ धोक देने की परंपरा निभाती है
कितनी पारंगत होती है अभिनय में 
जो दिल की ख्वाहिशों को न कभी लब पर लाती है
बस अन्दर ही अन्दर खुद को मिटाती है
और एक बेसबब उम्र जी जाती है

अपनी हसरतों का कफ़न ओढ़ कर 
तमन्नाओं की चिता पर 
अपनी चाहतों की अग्नि से 
करती है खुद का अंतिम संस्कार
कितनी किस्मत की धनी होती है एक औरत
जीने को ज़िन्दगी मिली तो सही
बस यही होती है एक औरत के अंतिम संस्कार की अंतिम रस्म
जहाँ समय का बिजूका गुनगुनाते हुए मरहम यूँ लगाता है 
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता ....





3 टिप्‍पणियां:

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही उम्दा बहुत कुछ कहती नज़्म

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (27-06-2017) को
"कोविन्द है...गोविन्द नहीं" (चर्चा अंक-2650)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Jyoti Dehliwal ने कहा…

एक औरत के मनोभावों को बहुत ही खूबसूरती से पिरोया है आपने। औरत जो कुछ करना चाहती है असल मे वो सपने ही बन कर रह जाते है।