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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

श्वेत से श्याम की ओर .......

तुम और तुम्हारी खोज
तुम और तुम्हारी प्यास
तुम और तुम्हारी आस
जानती हूँ वो भी
जो न कहा कभी

वो जो जिंदा है आज भी
वो जो सुलग रही है आज भी
वो जिसने मढ़ी हैं
नज्मों में दर्द की सलवटें
गुनगुनाना चाहती है प्रेम गीत
जो एक अल्हड लड़की को कर दे बेनकाब

हाँ ....... उमगती है एक अल्हड नदी आज भी तुममे

बस प्रवाह मोड़ दिया है अब
श्वेत से श्याम की ओर ...............

शनिवार, 31 जनवरी 2015

आइये चुनाव चुनाव खेलें

आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख



आइये चुनाव चुनाव खेलें . चुनाव का मौसम है . अच्छा किसे चुनना है ?
कोई शर्ट है या जीन्स ? सब्जी हैं या फल ? या कोई सिने स्टार  है ? बोलो किसका चुनाव करना है ?या फिर उन्हें जो सब्जबागों की खेती करते हैं और जब फसल पक कर तैयार हो जाती है तो खुद ही सारी काट कर ले जाते हैं और किसान शक्ल ही देखता रह जाता है या फिर उन्हें जो सत्य का झंडा लेकर चलते हैं मगर अकेले खड़े दिखते हैं , जिनके सच को भी झूठ साबित करने के लिए सारे जहाँ के जोड़ तोड़ किए जाते हैं , जिनको सत्ता से दूर रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है ताकि अपनी सत्ता पर आंच न आये और वो अपनी रोटियां सेंकते रहे . अमां यार तुम भी अजीब खडूस हो , किन चक्करों में पड़ गए ........... हम कौन सा तुम्हें असल में चुनने को कह रहे हैं अगर ऐसा सच बोलोगे बाबू सच कहते हैं धर लिए जाओगे किसी न किसी दफा में फिर करना चुनाव का विश्लेषण . यहाँ सच किसे स्वीकार्य होता है , सब चाशनी में डूबे झूठ से ही खुश हुआ करते हैं . 

तो मियां फिर किस चुनाव की बात कर रहे हो हम तो यही समझे कि तुम चुनाव की बात कर रहे हो . तुम भी अजीब अहमक हो , चुनाव तो किसी का भी किया जा सकता है अब देखो बीवी भी तो चुनाव के बाद ही लाते हो घर में जब सबकी वोट उसके पक्ष में पड़ जाती हैं , बाज़ार से तुम कुछ खरीदने जाते हो तो भी चार चीजों में से बेहतर का चुनाव करते हो न तो बस इसी तरह हमने भी सोचा इस बार चुनाव करवा ही डालें .
अरे मियां कौन से चुनाव ?
 बस वो ही चुनाव जिसमे आँख होते हुए अंधे होते हैं हम , जुबां होते हुए गूंगे और कान होते हुए बहरे . 
मतलब ?
बस सिर्फ इतना गाँधी जी के बताये आदर्शों पर चलो 
क्या मतलब 
सीधा तो कह रहा हूँ ..........क्या होगा तुम्हारे चुनाव करने से ? कुछ भी तो नहीं ? मान लो तुमने किसी पर विश्वास कर उसे चुन लिया और वो जीत भी गया तो क्या होगा ? क्या उसे तब काम करने दिया जाएगा ? क्या उसकी राह में रोड़े नहीं अटकाए जायेंगे ? और यदि गलती से वो भी तुम्हारे भले के लिए वो पीछे मुड़ गया तो क्या तुम्हारे पास दिमाग है इतना की सोच और समझ सको कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया . तुम सिर्फ एक भीड़ हो , भीड़ के सिवा कुछ नहीं और भीड़ का कोई धर्म नहीं होता उसका सिर्फ एक ही नारा होता है ........जहाँ सब चलें , जहाँ की हवा चले उधर मुड़ जाओ क्योंकि तुम खुद कुछ नहीं सोच सकते , तुम्हारी सोच पर मीठी मीठी बातों के ताले लगे हैं , तुम एक कुंठित सोच के मालिक हो ........अभी तुम , तुम्हारी सोच नहीं हुई है आज़ाद इसलिए कहता हूँ छोड़ो मियां चुनाव के चक्कर , जहाँ हवा का रुख देखो बह जाना इससे ज्यादा कुछ तुम्हारी हैसियत नहीं और न है तुम्हारी सोच की ऊंगली में वो दम जो दिखा सके अपना दम . 

हवाओं का रुख बदलने के लिए सोच का बदलना जरूरी है और अभी तुम्हें चुनाव का अर्थ तो पता नहीं तो सही और गलत तो तब समझोगे न . जाओ , तुम सिर्फ आटे , दाल, सब्जी आदि ही चुनो क्योंकि जीवन की महती आवश्यकता हैं ये सब बाकी उन चुनावों की राजनीति तुम नहीं समझ सकते इसलिए खेलो सिर्फ चुनाव चुनाव अपने घर तक ही ..........देश और समाज को छोड़ दो उसके हाल पर क्योंकि वो जानते हैं तुमसे किसका , कब और कैसे चुनाव करवाना है ........जय हिन्द !!!

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

इक लड़की गली के मोडपर

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर

इश्क प्यार मोहब्बत लफ़्ज़ों से 
खेलेगी खिलखिलाएगी मुस्कुराएगी 
फिर काँच सी जब बिखर जायेगी
हर टूटे हिस्से में अपना ही अक्स पाएगी
बस यूं उसकी हर हसरत कुंवारी ही रह जायेगी 
कहीं टूटेंगे कुछ शाख से गुंचे 
कहीं बिखरेंगे आरजुओं के कंचे 
वो समेट समेट सहेजेगी आँचल में 
वो फिसल फिसल जायेंगे रेत की मानिंद 
इक रात की तफसील नहीं है ये 
उम्र के जोड़ों पर खुदे मिलेंगे किस्से 


बरसातों में भीगे बिना भी 
रूह में भीगे मिलेंगे हिस्से 
ऋतु के बदलने से नहीं बदलते मौसम 
यूं उसे रोज तकलीफ दिया करेंगे किस्से 
एक दिन की खता नहीं थी जो 
उम्र के उस पायदान पर रुके मिलेंगे 
अधूरे प्यार की अधूरी दास्ताँ बन 
उम्र से इश्क किया करेंगे वो हिस्से 

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

चुनावी मौसम की बरसातों में

सुना है एक बार फिर 
चुनाव का मौसम लहलहा रहा है 
निकल पड़े हैं सब दल बल सहित 
अपने अपने हथियारों के साथ 

शब्दबाणों का करके भयंकर वार 
करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी 
भूलकर इस सत्य को 
चुनाव है भाई 
यहाँ साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही 
जीती जा सकती है लड़ाई 

जी हाँ 
न केवल तोड़े जायेंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता 
बल्कि जरूरी है आज के समय में 
मीडिया पर भी शिकंजा 

जिसकी जितनी चादर होगी 
उतने पाँव पसारेगा 
मगर जिसका होगा शासन 
वो ही कमान संभालेगा 
करेगा मनमाने जोड़ तोड़ 
विरोधियों को करने को ख़ारिज 
जरूरी है आज 
अपनी जय जयकार स्वयं करनी 
और सबसे करवानी 

बस यही है सुशासन 
यही है अच्छे दिन की चाशनी 
जिसमे जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है 

फिर क्या फर्क पड़ता है 
बात पांच साल की है 
भूल जाती है जनता 
याद रहता है उसे सिर्फ 
अंतिम समय किया काम 

चुनावी मौसम की बरसातों में भीगने को 
कुछ ख़ास मुखौटों की जरूरत होती है 
जो बदले जा सकें हर घात प्रतिघात पर 
जहाँ बदला जा सके ईमान भी बेईमान भी 
और चल जाए खोटा सिक्का भी टंच सोने के भाव 

बस यही है अंतिम मौका 
करो शब्दों से प्रहार 
करो भीतरघात 
येन केन प्रकारेण जरूरी है आज 
बस चुनाव जीतना..........और कुर्सी हथियाना  

"भरोसा शब्द टूटने के लिए ही बना है ........सभी जानते हैं ........हा हा हा "

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

गोलियों का तांडव आखिर कब तक ???


आओ सिर जोडें और रो लें 
आओ दो आंसू बहा लें 
दुःख प्रकट कर दें 
कैंडल मार्च निकाल लें 
हम साथ हैं समूचे विश्व में होते संहार के 
और कर दें इतिश्री अपने कर्तव्यों की 
बस यहीं तक है हमारी संवेदनाएं दुःख और पीडाएं 

क्या सिर्फ यहीं तक सीमित रहेंगे हम ?
क्या यही है अंतिम विकल्प ?
सिर्फ रोना और श्रद्धांजलि प्रकट करना 
आखिर कब तक चलेगा ये सब ......... कभी सोचा है ?
आखिर कब तक हमारी सहिक्ष्णुता का मोल हम यूं चुकायेंगे 
जान दे देकर कौन सा इतिहास अमर बनायेंगे ?

वक्त आ गया है 
केवल जागने का नहीं 
जागे हुए तो हैं हम 
वक्त आ गया है 
एकजुट होने का 
आतंकवाद को शिकार बनाने का .......इस बार शिकार बनने का नहीं 

जानती हूँ 
कहने भर से कुछ नहीं होना 
फिर भी कह रही हूँ 
दिल का गुबार निकाल रही हूँ 
जबकि पता है 
यहाँ भी राजनीति ने सिर जोड़ा है 
सब अपने अपने घर बचाए हैं 
बिखरी तीलियों से नज़र आये हैं 
जानते हुए इस सत्य को 
अंधियारे वक्त में साये भी राजदार नहीं होते 
फिर कौन सी उम्मीद के दीप रौशन होंगे 

सब अपने अपने स्वार्थों से ग्रसित 
खड़े हैं अलग अलग दिशाओं में मुंह करे 
बिना सोचे समझे इस तथ्य को 
आज मेरी तो कल तेरी बारी है 

राजनीति की बिसात पर गोलियों का तांडव आखिर कब तक ???

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

मेरे इश्क की दुल्हन

मेरे इश्क की दुल्हन 
श्रृंगार विहीन होने पर ही सुन्दर लगा करती है 
फिर नज़र के टीके के लिए 
रात की स्याही कौन लगाये 
बस चाँद का फूल ही काफी है 
उसके केशों में सजने को 

जाने क्यों फिर भी 
एक मुट्ठी स्याह रात 
खिसक ही जाती है हाथों से 
और गिर जाती है 
मेरे इश्क की दुल्हन की चूनर पर 
और जल जाता है सारा आस्माँ 

उदास रातों के कहरों की 
डोलियाँ उठाने को 
जरूरी नहीं चार कहारों का होना ही …… 


मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

भाव समिधा

1
चुप की खाली ओखली में 

कूटने को नहीं बची 

कोई संवेदना अहसास या जज़्बात 

और सागर में न बचा हो पानी 

ऐसा भी नहीं 

फिर किस सुबह के इंतज़ार में 

भटक रही है रात्रि की त्रिज्या


एक अजीब सी कशमकश का शिकार है आज कोई !!!




2
अन्दर पसरा सन्नाटा जाने कब होगा प्रसवित 

मौन की विकल वेदना जाने कब होगी मुखरित 

ये कौन से जुनूनी इन्कलाब का साया है 

कि कुटिल गर्म हवाएं जाने कब होंगी अनुदित


3
एक शून्य जब 

अनंत की ओर 

विस्तार पाने लगे


तब खुद से मुखातिब होना भी दुष्कर लगे ..........



4
जरूरी तो नहीं रोज कुछ कहा जाए 

जरूरी तो नहीं रोज कुछ सुना जाए 

कहीं इसी कहने सुनने में ही 

ये ज़िन्दगी न हाथ से निकल जाए


5

कुछ सवालों के जवाब पहले से तैयार रखती है दुनिया 

जाने कैसे दूसरे को इतना नादान समझती है दुनिया 

कि भीड़ में भी पहचान हो जाती है कमज़र्फों की 

जाने कैसे रोज ढकोसले का नकाब बदलती है दुनिया



6
हैवानियत का कोहरा कब छंटेगा 

इंसानियत का सूरज कब उगेगा


कौन जाने ?


7

उन माओं के जाने कितने टुकड़े हो गए 

जिनके लाल वक्त से पहले कबों में सो गए


8

मेरे लिए बहुत सी बातें सिर्फ बातें थीं 

और तुम्हारे लिए 

सिर्फ बातें नहीं जाने कितने अर्थ थे


कोई शब्दकोष हो तो बताना 

आसान हो जायेगा समझना 

क्योंकि 

अब मैं उन अर्थों के अर्थ खोज रही हूँ ..........एक अरसे से

9
वो ख्वाब ही क्या जो बुना जाए 

वो इश्क ही क्या जो किया जाए

चलो किस्सा ही खत्म किया जाए 

न दिल दिया जाए न दर्द लिया जाए

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

समय तुम अपंग हो गए हो

आज हैवानियत के अट्टहास पर 
इंसानियत किसी बेवा के सफ़ेद लिबास सी 
नज़रबंद हो गयी है 
ये तुम्हारे वक्त की सबसे बड़ी तौहीन है 
कि तुम नंगे हाथों अपनों की कब्र खोद रहे हो 
और तुम  मजबूर हो  ऐसा  तुम सोचते हो 
मगर क्या ये वाकई एक सच है ?
क्या वाकई तुम मजबूर हो  ?
या मजबूर होने की दुहाई की आड़ में 
मुंह छुपा रहे हो 
गंदले चेहरों के नकाब हटाने की हिम्मत नहीं 
या सूरत जो सामने आएगी 
उससे मुंह चुराने का माद्दा नहीं 

न न वक्त रहम नहीं किया करता कभी खुद पर भी 
तो तुम क्यों उम्मीद के धागे के सहारे उड़ा रहे हो पतंग 

सुनो 
अब अपील दलील का समय निकल चुका है 
बस फैसले की घडी है 
तो क्या है तुममे इतना साहस 
जो दिखा सको सूरज को कंदील 
हाँ हाँ .........आज हैवानियत के सूरज से ग्रस्त है मनुष्यता 
और तुम्हारी कंदील ही काफी है 
इस भयावह समय में रौशनी की किरण बनकर 
मगर जरूरत है तो सिर्फ 
तुम्हारे साहस से परचम लहराने की 
और पहला कदम उठाने की 
क्या तैयार हो तुम ...............?

या फिर एक बार 
अपनी विवशताओं की दुहाई देना भर है 
तुम्हारे पलायन का सुगम साधन ?

निर्णय करो 
वर्ना इस अपंग समय के जिम्मेदार कहलाओगे 
तुम्हारी बुजदिली कायरता को ढांपने को 
नहीं बचा है किसी भी माँ का आँचल 
छातियों में सूखे दूध की कसम है तुम्हें 
या तो करो क्रान्ति 
नहीं तो स्वीकार लो 
एक अपंग समय के साझीदार हो तुम 

जो इतना नहीं कर सकते 
तो फिर मत कहना 
समय तुम अपंग हो गए हो 



बुधवार, 17 दिसंबर 2014

देखो ये है बच्चों की बारात




आओ आओ 
देखो ये है बच्चों की बारात 
जहाँ बच्चे ही दूल्हा 
बच्चे ही बाराती 
किसी की चिरी है छाती 
किसी की आँख है निकली 
किसी की अंतड़ियाँ 
तो किसी के भेजे में 
गोली है फंसी 
किसी का चेहरा यूँ लहुलुहान हुआ 
कि माँ से न पहचाना गया 
पिता रोते रोते बेदम हुआ 
माँ ने तो होश ही खो दिया 
जिसका लाल आज लाल हुआ 

ये कैसे जांबाज सिपाही 
बिन सेहरा पहने ही चल दीये 
मौत की दुल्हन से मिलने गले 
कब्र भी कम पड़ गयीं 
जिन्हें देख कबिस्तान की भी जान सूख गई 
ये कैसी  बारात आई है 
जहाँ हर ओर  रुसवाई है  
हर चेहरे पर मुर्दनी छाई है 
देख खुदा भी सहम गया 

क्या अब भी सियासतदारों न तुम्हारी आँख खुली ?

अब प्रश्न तुम से है 

ओ मानवता के दुश्मनों 
ये कैसा संहार किया 
ओ ताकतवर सियासी ताकतों (पाकिस्तान , अमेरिका )
ये फसल तो तुम्हारी ही है बोई हुई 
कल तुमने पाला जिसे 
आज छीना निवाला उसी ने 
अब तो जाग जाओ 
बच्चों की शहादत से तो सबक सीख जाओ 
वर्ना 
कल के तुम जिम्मेदार होंगे 
जब इन्ही में से किसी के अपने 
हाथ में बन्दूक पकड़ेंगे 
और निशाने पर होंगे ........... तुम 

क्योंकि 
मासूमियत के हत्यारे हो तुम सिर्फ तुम 
और तुम्हारी एकछत्र राज करने की ख्वाहिश 



शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

'तुम्हारा तुमको अर्पण'

जो तुम्हें स्वीकार्य नहीं 
उस अस्तित्व की नकारता 
थोड़ी तुम्हारी आँखों की कलुषता 
और थोडा साम दाम दंड भेद 
के वो सारे बाण 
जिनसे घायल होती रही युगों से 
तुम्हारा  दिया तिरस्कार , उपेक्षा , व्यभिचार 
शिव के त्रिशूल से चुभते वेदना के शूल 
सब 'तुम्हारा तुमको अर्पण' की मुद्रा में लौटा रही हूँ 

क्योंकि  
गूंथ दिए है मैंने इस बार 
तुम्हारे सब बेशकीमती हथियार 
तो स्वाद तो किरकिरा होगा ही……… 

मत गुंधवाना आटा अब फिर मुझसे !!!

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

तुम्हें कहानी का पात्र बनाऊँ

तुम्हें कहानी का पात्र बनाऊँ 
या रखूँ तुमसे सहानुभूति 

जाने क्या सोच लिया तुमने 
जाने क्या समझ लिया मैंने 
अब सोच और समझ दोनों में 
जारी है झगड़ा 
रस्सी को अपनी तरफ खींचने की कोशिश में 
दोनों तरफ बह रही है एक नदी 
जहाँ संभावनाओं की दलदल में 
फंसने को आतुर तुम 
पुरजोर कोशिशों के पुल बनाने में जुटे हो 
और इधर 
सूखी नदी में रेत के बिस्तर पर 
निशानों के चक्रवात में 
सूखा ठूँठ 
न हँस पाता है और न रो 

जानते हो क्यों ?

ईमानदार कोशिशें लहूलुहान ही हुआ करती हैं 
बंजर भूमि में न फसल उगा करती है 
सर्वमान्य सत्य है ये 
जिसे तुम नकारना चाहते हो 

मेरे खुले केशों पर लिखने को एक नयी कविता 
पहले तुम्हें होना होगा ख़ारिज खुद से ही 
और अतीत की बेड़ियों में जकड़ी स्मृतियों के साथ नहीं की जा सकती कोई भी वैतरणी पार 

सुनो 
ये मोहब्बत नहीं है 
और न ही मोहब्बत का कोई इम्तिहान 
बस तुम्हारी स्थिति का अवलोकन करते करते 
रामायण के आखिरी सम्पुट सी एक अदद कोशिश है 
तुम में चिनी चीन की दीवार को ढहाने की 
ताकि उस पार का दृश्य देख सको तुम बिना आईनों के भी 

समंदर होने को जरूरी तो नहीं न समंदर में उतरना 
क्यों न इस बार एक समंदर अपना बनाओ तुम 
जिसमे जरूरत न हो किसी भी खारे पानी की 
न ही हो लहरों की हलचल 
और न ही हो तुम्हारी आँख से टपका फेनिल आंसू 

हो जाओगे हर जद्दोजहद से मुक्त 
बस जरूरत है तो सिर्फ इतनी 
अपनी कोशिशों के पुल से मेरा नाम हटाने की 
क्योंकि 
मेरी समझ की तीसरी आँख जानती है 
तुम्हारी सोच की आखिरी हद ……… 

तोडना तो नहीं चाहती तुझे 
मगर जरूरी है सम्मोहन से बाहर निकालना 

कैसे कहूँ 
नाकाम कोशिशों का आखिरी मज़ार मत बना मुझे 
बुतपरस्ती को ढूँढ ले बस अब एक नया खुदा.........

सुकून की दहलीज को सज़दा करने को ले झुका दी मैंने गर्दन 
बस तू भी एक बार माथा रखकर तो देख 

वैसे भी 
सूखी नदी 
बंजर भूमि 
सूखे ठूँठ 
सम्भावना के अंत को दर्शाती लोकोक्तियों से 
कर रहे हैं आगाह 
ज़ख्मों की मातमपुर्सी पर नहीं बजा करती शहनाइयाँ .……

फिर क्यों फरहाद से होड़ करने को आतुर है तेरे मन की प्रीत मछरिया ???

शनिवार, 29 नवंबर 2014

बाकी है

नहीं है मेरी मुट्ठी में चाहे सारा आस्माँ 
आस्माँ को छूने की अभी इक उडान बाकी है 

नहीं निकलतीं जिन पर्वतों से पीर की नदियाँ 
उनके सीनों में भी अभी इक तूफ़ान बाकी है 

नहीं हैं वाकिफ़ जो शहर रास्तों की खामोशियों से 
उन शहरों के कफ़न में भी अभी इक ख्वाब बाकी है 

नहीं है मेरी झोली  में समन्दर तो क्या 
ओक भर पीने की इक प्यास तो अभी बाकी है 

नहीं हूँ किसी भी आँख का नूर तो क्या 
खुद से आँख मिलाने का इक हुनर तो अभी बाकी है 

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

हाँ ,आ गया हूँ तुम्हारी दुनिया में



हाँ, आ गया हूँ 
तुम्हारी दुनिया में
अरे रे रे ...........
अभी तो आया हूँ
देखो तो कैसा 
कुसुम सा खिलखिलाया हूँ

देखो मत बाँधो मुझे
तुम अपने परिमाणों में 
मत करो तुलना मेरे 
रूप रंग की 
अपनी आँखों से
अपनी सोच से 
अपने विचारों से
मत लादो अपने ख्याल 
मुझ निर्मल निश्छल मन पर

देखो ज़रा 
कैसे आँख बंद कर 
अपने नन्हे मीठे 
सपनो में खोया हूँ
हाँ वो ही सपने
जिन्हें देखना अभी मैंने जाना नहीं है
हाँ वो ही सपने
जिनकी मेरे लिए अभी 
कोई अहमियत नहीं है
फिर भी देखो तो ज़रा
कैसे मंद- मंद मुस्काता हूँ
नींद में भी आनंद पाता हूँ

रहने दो मुझे 
ब्रह्मानंद के पास
जहाँ नहीं है किसी दूजे का भास
एकाकार हूँ अपने आनंद से
और तुम लगे हो बाँधने मुझको
अपने आचरणों से
डालना चाहते हो 
सारे जहान की दुनियादारी 
एक ही क्षण में मुझमे
चाहते हो बताना सबको
किसकी तरह मैं दिखता हूँ
नाक तो पिता पर है
आँख माँ पर 
और देखो होंठ तो 
बिल्कुल दादी या नानी पर हैं
अरे इसे तो दुनिया का देखो
कैसा ज्ञान है
अभी तो पैदा हुआ है
कैसे चंचलता से सबको देख रहा है
अरे देखो इसने तो 
रुपया कैसे कस के पकड़ा है
मगर क्या तुम इतना नहीं जानते
अभी तो मेरी ठीक से 
आँखें भी नहीं खुलीं
देखो तो
बंद है मेरी अभी तक मुट्ठी
बताओ कैसे तुमने 
ये लाग लपेट के जाल 
फैलाए हैं
कैसे मुझ मासूम पर
आक्षेप लगाये हैं

मत घसीटो मुझको अपनी
झूठी लालची दुनिया में
रहने दो मुझे निश्छल 
निष्कलंक निष्पाप

हाँ मैं अभी तो आया हूँ
तुम्हारी दुनिया में
मासूम हूँ मासूम ही रहने दो न
क्यों आस के बीज बोते हो
क्यों मुझमे अपना कल ढूंढते हो
क्यों मुझे भी उसी दलदल में घसीटते हो
जिससे तुम न कभी बाहर निकल पाए
मत उढाओ मुझे दुनियादारी के कम्बल
अरे कुछ पल तो मुझे भी 
बेफिक्री के जीने दो 
बस करो तो इतना कर दो
मेरी मासूम मुस्कान को मासूम ही रहने दो............

शनिवार, 8 नवंबर 2014

जाने क्यों?

अपने अन्दर झाँकती एक लडकी से मुखातिब हूँ मैं
जो रोज उम्र से आगे मुझे मिला करती है
जिरह के मोड मुडा करती है
देखती है समय की आँखों से परे एक हिंडोला
जिस पर पींग भरने को मेरा हाथ पकडती है

सोच में हूँ
चलूँ संग संग उसके
या छुडाकर हाथ
रंगूँ अपने रंग उसे

मन की दहलीज से विदा करूँ
या उम्र के स्पर्श से परे शगुन का तिलक करूँ

क्या यूँ ही बेवजह या वजह भी वजह ढूँढ रही है
और अन्दर झाँकती लडकी से कह रही है
शहर अब शहर नहीं रहे
बदल चुकी है आबोहवा
जाओ कोई और दरवाज़ा खटखटाओ
कि यहाँ अब नहीं ठहरती है कोई हवा

कराकर इल्म शहर के बदले मिज़ाज़ का
फिर भी
अपने अन्दर झाँकती एक लडकी से मुखातिब हूँ मैं ……जाने क्यों?

रविवार, 2 नवंबर 2014

आखिरी अभिलाषा



करना चाहते हो तुम कुछ मेरे लिए
तो बस इतना करना
जब अंत समय आये तो
खुद से ना मुझे जुदा करना

किसी मसले कुचले अनुपयोगी

पुष्प सम ना मुझे दुत्कार देना
माना देवता पर चढ़ नहीं सकता
मगर किसी याद की किताब में तो रह सकता हूँ

इन सूखी मुरझाई टहनियों पर

अपने स्नेह का पुष्प पल्लवित करना
जब बसंतोत्सव मना रहे हों
कुसुम चहुँ ओर मुस्कुरा रहे हों
कर सको तो बस इतना करना
मुझ रंगहीन, रसहीन ठूंठ में भी
तुम संवेदनाओं का अंकुरण भरना

अपने स्नेह जल से सिंचित करना

अपनी सुरभित बगिया का
मुझे भी इक अंग समझना
संग संग तुम्हारे मैं भी खिल जाऊँगा
तुम्हारी नेह बरखा में भीग जाऊँगा

माना बुझता चिराग हूँ मैं

रौशनी कर नहीं सकता
मगर फिर भी मुझको
अनुपयोगी बेजान जान
देहरी पर ना रख देना
अपने प्रेम के तेल से
मुझमे नव जीवन भर देना
बुझना तो है इक दिन मुझको
पर जीते जी ना दफ़न करना

अपने नवजात शिशु सम मुझे भी

अपना प्यार दुलार देना
महाप्रयाण का सफ़र आसान हो जायेगा
तुम्हारा भी पुत्र ऋण उतर जायेगा