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बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बदलती सोच के नए अर्थ के ये हैं कुछ सोपान

ये हैं कुछ झलकियाँ विश्व पुस्तक मेले की जहाँ मैं , अपने प्रथम संग्रह " बदलती सोच के नए अर्थ " और अपने सभी मित्रों के साथ ……… तबियत खराब होने की वजह से देर से आपके सामने आ पायी हूँ …………एक सुखद अहसास से भरपूर समय रहा जहाँ जाने कितने जाने और अनजाने मित्रों से मिलना हुआ मानो दूरियाँ सिमट गयी हों और एक जगह केन्द्रित हो गयी हों 


























 कुछ झलकियाँ और आपकी प्रतीक्षा में हैं ………सभी मित्रों से मिलना, उनके द्वारा उत्साहवर्धन किया जाना और उनके द्वारा पुस्तक खरीद कर पढे जाने की ज़िद ने इस बार पुस्तक मेले को एक नया आयाम दिया फिर चाहे वो बडे बडे साहित्यकार ही क्यों ना हों जो बताता है कि एक नयी परम्परा की तरफ़ आज की पीढी ने एक नया कदम रख दिया है और कोई शक नहीं कि आने वाला कल कविता के भविष्य को उज्ज्वलता प्रदान करेगा




















और अब सबसे जरूरी बात : 

जिसके अपरिमित सहयोग के बिना मेरी बुक आपको इस बार के पुस्तक मेले में दिख ही नही सकती थी तो वो है बेहद सहज , सरल और निश्छल हिंद युग्म के संचालक शैलेष भारतवासी जिसको शुक्रिया अदा करने के लिये मेरे पास शब्द ही नहीं हैं क्योंकि मेरे प्रकाशक का तो स्टाल इस मेले में था नही और ऐसे में किसी और प्रकाशक की पुस्तक को अपने स्टाल पर स्थान देना शैलेष के अद्भुत और बडे दिल वाले व्यक्तित्व को ही दर्शाता है और मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं जिनसे मैं शैलेष का शुक्रिया अदा कर सकूँ बस उसके लिये हर पल दिल से सिर्फ़ और सिर्फ़ दुआयें ही निकल रही हैं और चाहती हूँ मेरे सभी दोस्त उसके लिये दुआओं का ये सिलसिला कायम रखें मेरे साथ 


बाकी और सूचनायें और फ़ोटो बाद में :)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं

दोस्तों



इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं और हाजिर है " हिन्दी अकादमी दिल्ली " से स्वीकृत मेरी पुस्तक मेरी पुस्तक " बदलती सोच के नए अर्थ " आपके अपने जाने माने प्रकाशन हिन्द युग्म पर

हाल नंबर 18
स्टाल नंबर 14 

मूल्य मात्र ------ १२० रूपये

और मैं तो सभी दोस्तों से मिलने को आपकी सेवा में हाजिर रहूँगी ही 
 — 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

" चलो कुछ बात करें " -------मेरी नज़र से



मृदुला प्रधान का कविता संग्रह " चलो कुछ बात करें " एक प्रकृति प्रेमी का संग्रह सा लगा जहाँ कवयित्री अपनी हर बात को प्रकृति को माध्यम बनाकर कहने की कोशिश करती है और प्रकृति से कविता का संयोग इस तरह बैठाती है कि प्रकृति के रस मन के बीहड़ों को भी उपवन बना देते हैं क्योंकि प्रकृति जब अपना सौदर्य बिखेरती है तो पतझड़ भी बसंत सा खिलखिला जाता है तभी तो कवयित्री सबसे पहले " माँ सरस्वती " की वंदना से आह्वान करती है अपने लेखन का और फिर कहीं " दूब पर " .... हो या  " बसंत मालती " हो या " सूर्योदय " हो या " सूर्यास्त " या फिर हो " बरसात की रात " या फिर हो " नीम का एक पेड़ " , " पेड़ों के पीछे अलसाया " होली का त्यौहार " , " ओस " , " नारियल के पेड़ों " या " गुलमोहर की " या सूरज का घर " या " शीत का प्रथम स्वर " या " महानगर की धुप " जाने कितनी ही कवितायेँ और हैं जहाँ प्रकृति के रंगों की छटा के साथ दिल के रंग भी उकेरे हैं और दोनों का ऐसा तादात्म्य हो जाता है कि पता ही  नहीं चलता फर्क प्रेम और प्रकृति में। कभी पहले कवि प्रकृति के माध्यम से मन के भावों को उकेरा करते थे मगर अब बहुत वक्त से ये माध्यम लुप्तप्राय: सा हो गया था ऐसे में  बहुत दिनों बाद कुछ प्रकृति से सामंजस्य बैठाते हुए जीवन के विविध रंगों को किसी ने उकेरा है  और वो भी महिला कवयित्री ने जो अपने आप में कुछ अलग सा अहसास संजोता है। ना केवल कवयित्री के प्रकृति प्रेम को दर्शाता है बल्कि प्रकृति को देखने और समझने के नज़रिये को भी प्रस्तुत करता है कि कितना कवयित्री का जुड़ाव प्रकृति के हर अंग से है फिर मौसम हो या ज़िन्दगी सबका अपना एक परिवेश है , संरचना है जिनका सीधा सा सम्बन्ध मानव जीवन से है।  

कुछ प्रकृति से तादात्मय करती रचनाओं की एक झलक देखिये :

" कि ऋतु बसंत है " 

" सूरज की पहली किरण में / नहाकर / तुम / और / गूंथकर चांदनी को।/ अपने बालों में / मैं / चलो स्वागत करें / ऋतु बसंत का "

" सुन हवा का " 

"सुन हवा का मंद स्वर/कुछ कुछ थिरकने लगा हूँ /बादलों के साथ भी / अक्सर ज़रा / उड्ने लगा हूँ / खग विहग कल्लोल से / कल्लोल/ मै करने लगा हूँ "

" जब कभी " 

जब कभी तुम्हारी आँखों में / सावन के बादल डोलेंगे / मैं भी उस बादल में छुपकर/ उन आँखों में बस जाऊँगी "

इसके अलावा सामाजिक विडंबनाओं की तरफ भी उनका ध्यान उसी तरह से जाता है जैसे प्रकृति से नाता है वैसे ही तभी तो " बगल के मैदान में " कविता में एक ऐसी समस्या की ओर इशारा किया है जिससे हम सभी दो चार होते हैं और उसे भी ज़िन्दगी का हिस्सा मान घिसटते रहते हैं मगर हमारे काम सरकारी विभागों की पेचीदगियों में अटके रहते हैं आश्वासन के खोखले स्तम्भों पर जिसकी बानगी इस तरह देखिये :

" अधिकारी ने अपने भाषण में कुछ मुद्दे उठाये / तरक्की के अनेकों नुस्खे बताये / कहा फॉल्ट रेट घटाइये / विनम्रता से पेश आइये / विन विंडो कांसेप्ट अपनाइये/ और कस्टमर की साडी उलझें / एक ही खिड़की पर सुलझाइये / और दुसरे ही दिन अक्षरशः पालन किया गया / एक खिड़की छोड़ ताला जड़ दिया गया / हर मर्ज़ के लिए लोग / एक ही जगह आने लगे / सुबह से शाम तक / क्यू में बिताने लगे"

" मजूरों की रोटी " मानवीय संवेदनाओं की जीती जागती मिसाल है जहाँ मेहनत की रोटी के स्वाद की बात ही कुछ और होती है को इस तरह दर्शाया है कि आज की हाइटैक होती ज़िन्दगी की सुविधायें भी बेमानी सी लगती हैं एक सजीव चित्रण 

" थाक रोटी की बडी सोंधी नरम लिपटे मसालों में बना आलू गरम / बैठकर एक झुण्ड में / सब खा रहे थे/ और चांपा -कल का पानी / हाथ का दोना बनाकर / पी रहे थे / और इस आधार पर ही आज हमने / गर्म रोटी/ काट आलू फ़ाँक वाले / थी बनाई/ पर ना कोई स्वाद आया "

 " विदेशी भारतियों के नाम " एक ऐसी कविता है जो उन प्रवासी पक्षियों को बुलाने के लिए एक बार फिर से प्रकृति का सहारा लेती है और हर मौसम के माध्यम से संदेसा भेजती हैं मगर ग्रीन कार्ड की विडंबना हर मौसम पर भारी पड़  जाती है जिसका चित्रण बेहद खूबसूरती से किया गया है :

" मैं जाड़ों की शीतलहरी  को समझाई थी / जाकर कहना / कि बैठ धुप में / मूंगफलियों के दानों के संग / गर्म चाय के ग्लासों से / तलहथियों को गरमा जाएँ "

" सर्द सन्नाटा" समय के बोये अकेलेपन के बीजों को बिखेरने की व्यथा है ताकि खुद से मुखातिब हुआ जा सके और रूह की गहराई तक उतरा सर्द सन्नाटा कुछ कम हो सके फिर चाहे उसके लिए कुछ लिखना ही क्यों न पड़े 

" बंद हो जायेगी " कारगिल युद्ध की त्रासदी का चित्रण है जहाँ युद्ध तो सिर्फ एक वक्त विशेष का रूप होता है मगर उसके बाद भी उसके निशाँ उम्र भर उन शहीदों के घरों में सुलगा करते हैं। 

" तुम्हारी आँखों में " , " प्रिय जब मैं "  कविताओं में प्रेम के रंगों को संजोया है तो कहीं बेटियों के प्रेम  में डूबी माँ की व्यथा का चित्रण " एक दिन " कविता के माध्यम से ऐसे किया है मानो खुद उन क्षणों को जीया हो। 

" आज की नारी " के माध्यम से नारी के गौरव और सम्मान को भी मान दिया है तो " टूटी हुयी कड़ाही " के माध्यम से माँ को याद किया है। 

कवयित्री की पकड़ केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि हास्य व्यंग्य पर भी है तभी " समय यहाँ " और " सुबह सवेरे " कविता के माध्यम से आज के लाइफ स्टाइल और स्त्री के उस स्वरुप के भी दीदार कराये हैं जिनके कारण बाकि स्त्रियों को भी उसी दृष्टि से देखा जाता है कैसे फैशन और अपनी जरूरतों में जीती स्त्री कब सिर्फ अपने ही सुख के बारे में सोचने लगती है उसका बहुत ही शानदार शैली में विवेचन किया है जहाँ विशुद्ध हास्य तो है ही मगर सोचने के लिए भी एक स्पेस है। 

कवयित्री के लेखन का एक वृहद् आकाश है जहाँ ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं जो अछूता रहा हो।छोटी छोटी कवितायेँ जीवन के विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत तो कराती ही हैं साथ ही कवयित्री के भाव मानस की पुष्टि का भी संकेत देती हैं कि हर तरफ कवयित्री की नज़र है जिसे वो इस तरह उद्धृत करती है मानो भोगा हुआ यथार्थ हो जो हर ह्रदय को छू लेता है।  कवयित्री इसी तरह अपनी सोच के पंखों को उड़ान देते हुए आगे बढ़ती रहें और हमें भी अपने अनुभवों से अवगत कराती रहे ऐसी कामना करते हुए कवयित्री को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ।  

देवलोक प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को प्राप्त करने के लिए आप कवयित्री से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : 

 M : 9810908099
दूरभाष : 26963355

डी ---१९१ , ग्राउंड फ्लोर 
साकेत , नयी दिल्ली --११००१७ 


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

रोम रोम में छाये 
तुम्हारे नव पल्लव 
आम्र मंजरी जो बौरायी 
जब आयी उस पर तरुणाई
धरा की प्यास जो बुझाई 
पीली सरसों भी इठलाई 
ये कैसे खुमारी छायी 
खिल उठी मन अंगनाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

जीवन में खिल उठे 
अब कुसुमित पल 
पुष्प पुष्प पर कैसे 
गुन गुन करते भ्रमर 
प्यास के पंछियों की 
कैसी प्यास बुझाई 
हर मुख पर मानो 
सरसों ही खिल आयी 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

मालती चंपा चमेली 
संग संग खिलें सहेली 
हरसिंगार ने मानो 
धरा पर बिछौना बनाया 
मानो करे आह्वान प्रेमी युगल का 
अभिसार रुत है आयी 
मानो किसी इठलाई मचलायी तरुणी की 
आँख गयी है  शर्मायी 
मानो सोमरस के पान को 
व्याकुल धरा है अकुलाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !
तुम्हारा आगमन भला कैसे हो निर्रथक …… 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

" एक थी माया " ...........मेरी नज़र से



विजय कुमार सपत्ति के कहानी संग्रह " एक थी माया " को उन्होंने सस्नेह मुझे भेजा तो ह्रदय गदगद हो गया।   संग्रह में कुल दस कहानियाँ हैं जिसमे ज़िन्दगी के रंगों का समावेश किया गया है फिर चाहे वो प्रेम हो , शक हो , मौत हो , भय हो , व्यंग्य हो , देशभक्ति हो या अध्यात्म सबको समेटने का लेखक का प्रयास सराहनीय है। पहला कहानी संग्रह के लिहाज से काफ़ी विचारपरक कहानियों को समेटा है लेखक ने जो जीवन के विभिन्न आयामों से परिचित कराता हुआ मानो एक यात्रा पर ले चलता हो । 

एक थी माया ,मुसाफिर , आभार ऐशो, आठवीं सीढ़ी ये चारों कहानियां प्रेम के विविध रंग समेटे हैं जिसमे एक थी माया के माध्यम से लेखक ने देहजनित प्रेम से परे आत्मिक प्रेम को तो दर्शाया ही है साथ ही प्रेम के विशुद्ध स्तर को भी प्रस्तुत किया है कि जरूरी नहीं होता प्रेम में मिलन , एक नया दृष्टिकोण देता लेखक प्रेम को ज़िंदा रखने की कवायद करता दीखता है साथ ही ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से मुँह ना मोड़ते हुए प्रेम को ज़िंदा रखना ही तो वास्तविक प्रेम है क्योंकि प्रेम में शारीरिक मिलन मायने नहीं रखता।  प्रेम शरीर से परे का वो आभास है जिसमे पूरी ज़िन्दगी भी गुजर जाये मगर क्षणिक मालूम दे और ऐसे ही प्रेम को माया के माध्यम से दर्शाया है लेखक ने जिसमे कहीं कोई प्रतीक्षा नहीं , कोई आदि नहीं , कोई अंत नहीं मगर प्रेम फिर भी है और रहेगा क्योंकि शाश्वत है।  जिसकी बानगी इन पंक्तियों में दृष्टिगोचर होती है :

"तुम मेरे साथ कभी खुश नही रह सकते थे । थोडी देर खुशी रहती और फिर ज़िन्दगी भर का चिडचिडापन । तुम्हारे लिये प्रेम सिर्फ़ बोझ बनकर रह जाता और हर बीतते वक्त के साथ तुम खत्म होते जाते और मै चाहती हूँ कि तुम ज़िन्दा रहो , न सिर्फ़ शरीर में बल्कि ज़िन्दगी के विचारों में भी "

" मुसाफिर " तो जैसे प्रेम की पराकाष्ठा ही है जहाँ इक उम्र बीती , युग बदला मगर प्रेम का दरिया अनवरत बहता ही रहा फिर क्या फर्क पड़ता है उम्र का कोई सिरा मिला या नहीं , न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन , जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन बस जैसे इन्ही पंक्तियों को चरितार्थ किया है लेखक ने जहाँ संतो और करतारे  के प्रेम की इंतेहा थी , जहाँ दो दिल कभी एक दूजे से जुदा थे ही नहीं एक की सांस पर ही दूसरे के जीवन की आस थी और जैसे ही दीया बुझा आस भी इक दूजे में ही समाहित हो गयी , शायद प्रेम के मुसाफिरों की यही मंज़िल हुआ करती है जो जीते जी नहीं मिलते मरने पर ही उनकी चिताओं पर मेले लगा करते हैं। 

"आठवीं सीढ़ी " सपना के जीवन का चमत्कारिक रोमांच है जहाँ प्रेम तो है मगर प्रेम के भी कई रूप हैं , जहाँ भटकन भी है , सम्मोहन भी है , और अतीत और वर्त्तमान में उलझी मनोदशा का भी चित्रण है कैसे किसी एक शख्स में अपने प्रेमी को पाना शादीशुदा होते हुए भी , एक ऐसी स्त्री की मनोदशा का चित्रण है जो अपने खोये प्रेम को एक जैसी शख्सियत होने के कारण उसमे पाना चाहती है और घर टूटने की हद तक जुड़ने को आतुर हो जाती है मगर शुभांकर द्वारा सही समय पर उसे सम्भालना और जीवन को दिशा देना कहानी को रोचक अंत पर ख़त्म करता है जो सन्देश देती है कि खुशियां चाहो तो तुम्हारे आस पास ही होती हैं बस देर होती है तो तुम्हारी सोच को बदलने और समझने की और यहाँ भी प्रेम सिर्फ देह तक सीमित नहीं रहा यही प्रेम की उच्चता है जिसका निर्वाह लेखक ने कहानी में सही तरीके से किया है।  

" आभार ऐशो " अनिमा के जीवन में आये पुरुषों के विभिन्न रूपो को तो चरितार्थ करती ही है साथ में अनिमा का अपनी शर्तों पर जीने के स्वाभिमान को भी उजागर करती है।  

" चमनलाल की मौत " अकेलेपन की त्रासदी झेल रहे उन सभी वृद्धों के जीवन का लेखा जोखा है जिससे मुख नहीं मोड़ा जा सकता , देखते , जानते हुए भी असंवेदनशील होती आज की पीढ़ी द्वारा उनसे किनारा करना एक ऐसा कड़वा सच है जो होना तो सभी के साथ घटित है मगर हम सोचते कहाँ हैं इस बारे में और छोड़ देते हैं वक्त के जंगल में उन्हें अकेला , निसहाय और जब नहीं झेल पाते वो इस अकेलेपन की घुटन को तो एक दिन खुद ही कर लेते हैं जीवन का अंत क्योंकि अकेलेपन से बड़ी सजा कोई नहीं होती। 

" हम बूढों को पैसों से ज्यादा प्यार चाहिए । अपनों का अपनापन चाहिये । हमें ज़िन्दगी नहीं मारती , बल्कि एकांत ही मार देता है ।"


"अटेंशन " आज के समाज का चेहरा उजागर करती व्यंग्यात्मक कहानी है जहाँ एक इंसान सिर्फ समाज में खुद को साबित करने के लिए कैसे कैसे हथकंडे अपनाता है और एक दिन खुद को साबित करके कैसे ठाठ से जीता है उसका प्रमाण है।  सिर्फ एक अटेंशन पाने की खातिर अच्छे  बुरे का सोचे बगैर ऐसी दलदल में जा गिरता है जहाँ से निकलना आसान नहीं होता और नेतागिरी किसी दलदल से कम कब हुयी है , कुर्सी का चस्का भला किसने छोड़ा है , ऐसे ही ख्याल का चित्रण है इस कहानी में।  

" द  परफेक्ट मर्डर " दांपत्य सम्बन्धो में उमड़े शक के कीड़े का वो दंश है जिससे न काटने वाला बचता है और न ही कटने वाला और जब अंत में शक के ताबूत से पर्दा उठता है तो सिवाय पछतावे के कुछ हाथ में नहीं बचता जिसे प्रस्तुत करने में लेखक पूरी तरह सक्षम रहा।  

" टिटलागढ़ की एक रात " भय और रोमांच की दुनिया की सैर कराती है जिसे बखूबी , पूरी शिद्दत से लेखक ने पेश किया है।  

" आसक्ति से विरक्ति की ओर " बुद्ध के उपदेशों का चित्रण है जहाँ विचित्रसेन के माध्यम से ये बताया गया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने सारी इंद्रियों पर तो नियंत्रण कर ही लिया बल्कि साथ में उसके आचरण में ऐसी दिव्य शक्ति आ जाती है कि जो उसके संसर्ग में आता है फिर चाहे वो नगरवधू के रूप में देवयानी ही क्यों न हो , उसके भी जीवन को परिवर्तित किया जा सकता है , देखा जाए तो ये जैसे किसी प्रमेय को सिद्ध करना होता है उसी तरह का प्रयोग है जिसे बुद्ध ने विचित्रवीर्य के जरिये दिखाया उस समय के धर्मभीरुओं को , ढकोसलों पर विश्वास करने वालों को और एक जाग्रति का आह्वान किया।  

" मैन इन यूनिफार्म " देश के सैनिक के बलिदान का एक ऐसा कथानक है जो सोचने को तो विवश करता ही है साथ में लेखक द्वारा उठाया  प्रश्न दिलों को कचोटता है आखिर एक शहीद के बलिदान की कीमत क्या है ?

" दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा बदलाव नज़र नहीं आया मुझे अपने देश में , जिसके लिये मैने जान दे दी ………"

ये लेखक का पहला कहानी संग्रह है इस दृष्टिकोण से बेहद सार्थक और सफल है जो पाठक को वो सब देता है जिसकी तलाश में एक पाठक निकलता है और पढ़कर जब संतुष्ट हो जाता है तो वहीँ लेखक का लेखन सफ़र हो जाता है।  

हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर से प्रकाशित कहानी संग्रह " एक थी माया " उम्मीद है अपनी एक पहचान बनाएगा और अपना एक पाठक वर्ग भी इसी के साथ लेखक को उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं देती हूँ कि वो इसी तरह लेखन करते रहे और आगे बढ़ते रहे।  

२५ ० रूपये में उपलब्ध ये किताब प्राप्त करने के लिए आप यहाँ संपर्क कर सकते हैं : 

विजय सपत्ति 
M : 09849746500

EMAIL : vksappatti@gmail.com 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

अब बूझने को बचा क्या ?

साँस पर गाँठ 
मौत की अंतिम अरदास 
अब बूझने को बचा क्या ?

चल बंजारे 
डेरा उठाने का वक्त आ गया 
क्योंकि 
अंतत: बंजारे ही तो हैं हम सब

ज़िन्दगी से बहुत कर चुके यारा
अब
मौत से इश्क करने का जो वक्त आ गया

रूह के लिबास को दुरुस्त करने का वक्त आ गया ……

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

मेरे मन का राग हो तुम



हे तमहारिणी ! 
प्रकाश का भंडार हो तुम
सदबुद्धि का आधार हो तुम 
लेखनी का प्रमाण हो तुम 
वाणी में सुरों का सार हो तुम 
मानव के रोम- रोम में बसा 
प्रेम का संचार हो तुम 


हे वरदायिनी !
वरदहस्त बनाये रखना 
अपनी कृपा बरसाये रखना 
जीवन में ज्ञान का उजास जगाये रखना 
पथरीले पथ भी सुगम बनाये रखना 
बस अपने शिशुओं पर इतना स्नेह बनाये रखना 

हे वीणावादिनी !
नवयुग का आगाज़ हो तुम 
ज्ञानोदय का भंडार हो तुम 
जीवन का आधार हो तुम 
प्रकृति के कण- कण में बजता 
सदियों से बहता अजस्र नाद हो तुम 


हे वागीश्वरी !
मेरी वाणी को आधार देता 
कृपामय प्रसाद हो तुम 
हे कादम्बरी !
मेरे जीवन की नयी सुबह का 
एक गुनगुनाता भाव हो तुम 
हे वरप्रदायिनी !
कोटि कोटि नमन करता 
मेरे मन का राग हो तुम 

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

जिस्म की परछाईं भी लुप्त हो गयी

कुछ चली ऐसी बयार चिंगारियों की
जिस्म की परछाईं भी लुप्त हो गयी

अब परछाइयों की परछाइयाँ ढूँढती हूँ

पुराने मकाँ में इक आशियाना ढूँढती हूँ

देवदार शीशम चैल की लकडियों में गुम

वजूद के टूटे - बिखरे निशाँ ढूँढती हूँ

वो जो तल्खी से बंद किये थे किवाड

उन किवाडों के बीच इक दरार ढूँढती हूँ

झिर्रियों के पार रौशनी के दरीचों में

मैं उम्र की सफ़ेदी के चराग ढूँढती हूँ

इस अंधेरी शाम की सुर्खियों के बीच

होम हुये ख्वाबों के कलाम ढूँढती हूँ

जाने क्यूँ सुलगती नहीं सूखी हुई लकडी

जबकि रोज उसमें घी की आहूति बीजती हूँ

बुधवार, 22 जनवरी 2014

असभ्य हूँ मैं !!!

जंगल 
जहाँ सब तरह के जानवर 
सबका एक स्थान 
अपनी एक पहचान 
अपना एक मुकाम 
सबके अपने अपने चेहरे 
अपनी अपनी वर्जनायें 
फिर संघर्षबाजी हो या गुटबाजी 
चेहरों के समीकरण बदलने लाज़िमी हैं 
दोस्त दुश्मन बनने लाज़िमी हैं 
अहंकार के बिच्छू जब ज़हर उगलते हैं 
दंश तो तड़पायेगा ही 
और ऐसे में यदि 
कोई चेहरा मोहरा बन जाए 
वक्त की मुखर आवाज़ बन जाए 
कोई चेहरा समझौता ना कर पाये 
दोषी ठहराया जाना लाज़िमी है 
सारी अवगुंठाओं की गाज़ 
उसी पर गिरनी लाज़िमी है 
जिसने विद्रोह किया 
उसका कुचलना लाज़िमी है 
क्योंकि असहयोग आंदोलन का 
प्रणेता जो बन जाता है 
फिर जंगल को भला 
कब दूसरा राजा  सुहाता है 
इसलिए जरूरी हो जाता है पासे पलटना 
अपनी मान्यताओं पर खरा उतरने को 
असहयोगी सहयोगी बन
बनाते हैं नव कीर्तिमान 
बदलने को हवा का रुख 
और साबित करने को 
खुद को पाक साफ 
मुखौटे लगा सिद्ध कर देते हैं 
ये जो उभरा है नया चेहरा 
हमारे जंगल का नहीं है 
या तो हमारे जैसा बन जा 
जो हम कहते हैं वैसा करता जा 
नहीं तो आता है हमें सिद्ध करना स्वयं को 
निर्दोष और तुम्हें दोषी 
और इस फरमान के साथ 
जंगल में असहयोग आंदोलन का 
प्रणेता हो जाता है धराशायी 
जानकार ये सत्य 
क्योंकि 
जंगलों के क़ानून से अवगत नहीं हूँ 
इसलिए 
उसूलों आदर्शों पर चलने वाला 
असभ्य हूँ मैं !!!

शनिवार, 18 जनवरी 2014

भूख भूख भूख ...........5

और एक खास भूख और होती है
जो अपना सर्वस्व खो देती है
फिर भी ना मिलकर मिलती है
प्रेम की भूख 
शाश्वत प्रेम की चाहना 

आदिम युग से अन्तिम युग तक भटकती 
जो मिटकर भी ना मिटती 
जिसकी चाह में 
सृष्टि भी रंग बदलती है
पेड पौधे , पक्षी, प्राणी, मानव, दानव
सभी भटकते दिखते हैं 
निस्वार्थ प्रेम की भूख 
ऐसा आन्दोलित करती है
जो अच्छा बुरा ना कुछ देखती है
बस पाने की चाह में 
वो कर गुजरती है 
कि इतिहास भर जाता है
नाम अमर हो जाता है
मगर प्रेमी जोडा ना मिल पाता है

फिर चाहे मीरा हो या राधा 
लैला हो या हीर 
रैदास हो या तुलसीदास 
कबीर हो या सूरदास 
प्रेम की भूख तो सबसे भयावह होती है 

जो दीदार होने पर और बढती है 
और शांत होकर भी अशांत कर जाती है
कभी विरह में भी सुकून देती है 
और अशांति में शांति का दान कर जाती है 
अजब प्रेम की भूख के गणित होते हैं
जिसके ना कोई समीकरण होते हैं 


और भी ना जाने 
कितने रूपों में समायी है ये भूख
जो शांत होकर भी शांत नहीं होती
क्योंकि
सबके लिये अलग अलग कारण होते हैं भूख के
और सबके लिये अलग अलग अर्थ होते हैं भूख के

जायज नाजायज के पलडे से परे 
भूख का अपना गणित होता है 
जो सारे समीकरणों को बिगाड देता है
इसलिये तब तक भूख के खूँटे से बँधी गाय उम्र भर रंभाती रहेगी 
जब तक कि निज स्वार्थ से ऊपर उठकर 
नैतिक आचरणों और संस्कारों की संस्कृति 
एक नयी सभ्यता को ना जन्म देगी 

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

बालार्क की दसवी किरण

बालार्क की दसवी किरण डॉक्टर कौशलेन्द्र मिश्र

डॉक्टर कौशलेन्द्र मिश्र एक उद्देश्य के साथ लेखन करते हैं।  साहित्य के माध्यम से अपने आदर्शों , संस्कृति और मूल्यों को बचाने के लिए प्रयासरत रहना और इसी का दर्शन उनकी कविताओं   में होता है जब "एक ही दृश्य " कविता में ह्रास होते जीवन मूल्यों को देखते हैं कवि मन पीड़ा से भर उठता है जब देखता है आज के युग की विडम्बना कि कैसे शैतान काबिज़ हो रहा है , उसी की जय जयकार हो रही है हर तरफ और दूसरी तरफ इंसानियत किसी हारे जुआरी सी मूँह छुपाये किसी कोने में दुबकी सिसक रही है उस क्षण कवि मन ईश्वर से प्रश्न कर ही उठता है कि आखिर ऐसा भेदभाव क्यों कुछ इस तरह :

"कभी मिलेगा ईश्वर / तो पूछूंगा जरूर/ मीठे कुएं इतने कम क्यों हैं / और सागर इतने फैले हुए क्यों हैं "

"विश्व मानचित्र में " यही पीड़ा आगे आकार लेती है जब कवि उद्द्वेलित होता है ये सोचकर कि जिन मूल्यों से उसके देश की पहचान थी आज वो कहाँ खो गए हैं कि अगर कोई दूर खड़ा देखे तो उसे वो भारत दिखेगा ही नहीं जहाँ राम , सीता , लक्ष्मण  कृष्ण जैसे चरित्रों ने जन्म लिया था और एक आदर्श स्थापित किया था क्योंकि आज तो चारों तरफ नैतिक मूल्यों का सिर्फ ह्रास ही हो रहा है, कहीं कोई मर्यादा नहीं रही , चरों तरफ फैली अराजकता ही दया , प्रेम और करुणा को लील चुकी है , ये कैसा परिदृश्य है , दुखी होने के साथ चकित है कवि :

"आर्यों के देश में / आर्य ही मिलता नहीं / आर्यत्व का अब कोई / अनुसन्धान करता नहीं / सीता के हरण पर / उद्वेलन होता नहीं / रावणों की भीड़ से निकलकर / कोई एक / लक्ष्मण को निति का / उपदेश अब देता नहीं। / मूल्य कहाँ होंगे शेष?"

"नाली का कीड़ा " के माध्यम से स्वदेश से पलायन करती प्रतिभाओं और विदेश के  कटाक्ष किया है और देशप्रेम की भावना को भी चंद  शब्दों में ही भर दिया है साथ ही एक सन्देश भी दिया है कि इंसान चाहे तो अपने देश में रहकर भी उत्थान और प्रेरणा की अलख जगा सकता है। 

"पहरुए" अर्थात पहरेदार………आज की जीवन शैली का आने वाली पीढ़ी पर पड़ते हुए असर को इंगित करती है कि आज हम चकाचौंध में खो गए हैं और उसी में आने वाली पीढ़ी को डुबो रहे हैं जबकि आने वाली पीढ़ी का दोष नहीं , कहीं न कहीं हमारी ही पहरेदारी में कमी है , हम ही नहीं दिखा पा रहे सही राहें क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं और जो और जैसे संस्कार हैम उन्हें देंगे वैसे ही देश का निर्माण होगा , वैसे ही चरित्र बनेगे और वो वक्त आने से पहले हमें जागना होगा और अपने कर्त्वयों को समझना होगा :

"सहिष्णुता को भगाकर / उद्दंडता आयी है / संयम को भगाकर / उच्छृखलता आयी है / घरवाली गयी है बहार / घर में कामवाली आयी है /बच्चे घर से भागने लगे है / शहर शहर / गली गली भटकने लगे हैं / बच्चे स्वयं को बच्चा नहीं जानते / सामाजिक नियमों को अच्छा नहीं मानते "

कुल मिलाकर कवि व्यथित है आज गिरते जीवन मूल्यों से , प्रभाव खोती संस्कृति से जो किसी भी देश की पहचान होते हैं और दोबारा उन्ही को स्थापित करने का स्वप्न देखते हैं अपने लेखन के माध्यम से बस यही तो है लेखन का औचित्य और सार्थकता जो किसी उद्देश्य के तहत किया जाए , जो समाज को सही दिशा दे सके और आने वाली पीढ़ी का सही मार्गदर्शन कर सके और उसमे कवि सक्षम है।  कवि की सूक्ष्म दृष्टि इसी तरह सभी बुराइयों पर पड़ती रहे और वो इसी तरह जागरूकता की अलख जगाता रहे इसी कामना के साथ कवि को उत्तम व् प्रेरक लेखन के लिए बधाई देती हूँ। 

मिलती हूँ अगले कवि के साथ जल्दी ही………… 

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

मानसिक विक्षिप्त

ज़िन्दगी भर की अपनो की दी हुयी
कुंठा, पीडा ,बेचैनी, घुटन , तिरस्कार
उपेक्षा, दर्द , मजबूरी , विषमता
अकेलेपन की त्रासदी का जब जमावडा होता है
तब एक जुनूनी तेजाब उबलता है
जो खदक कर बाहर आने को आतुर होता है
दिल दिमाग की गुत्थमगुत्था में जब भी
कुछ बूँदें छलकती हैं
वो कविता नहीं होतीं
कुछ कह ना सकने
कुछ कर ना सकने की विवशता ही
वहाँ अवसाद रूप में बहती है
जिसे तुम कविता कहते हो
या कविता समझते हो
वो तो वास्तव में
अवसाद रूप में बहती विक्षिप्तता के कगार पर खडी
वो आकृति होती है जो गर
शब्दों के सहारे अवसाद का
पतनाला बन ना बहती तो
मानसिक विक्षिप्त करार दी जाती
मगर उसकी पीडा ना कभी समझी जाती
कि
अपनों के बीच , अपनेपन को तरसते
हजारों सपनों के ज़मींदोज़ होने पर
जिन सभ्यताओं के नामोनिशान भी नहीं रहते
उन्हें कितना खोद लो
कितने अन्वेषण कर लो
कितना ही पत्थरों की
मौन भाषा को लिपिबद्ध कर लो
उस वास्तविक अवस्था की तो
परछाईं भी ना हाथ में आती है
और ज़िन्दगी ना जाने कब लिहाफ़ बदल जाती है
और मानसिक विक्षिप्त सी कवितायें ही यहाँ आकार पाती हैं
अब वो कविता होती है या मानसिक विक्षिप्त का अवसाद
उन सुलगते रेशमी तागों कौन छूकर देखे और अपने हाथ जलाये
आज तो दो लोटे वाहवाही के जल का उँडेलना ही काफ़ी है अभिषेक के लिये ………

शनिवार, 11 जनवरी 2014

भूख भूख भूख …4

नेता की भूख 
पद के लालच में
नहीं देख पाती 
बेबस जनता की तकलीफ़ें 
जनता का रुदन
उसे चाहिये होता है एक उच्च पद
जहाँ वो सारे कुकृत्य करके भी बच जाये
स्वंय को पाक साफ़ सिद्ध कर सके 
क्योंकि जानता है वो
कीडे मकौडों सी जनता का गणित
भूल जायेगी उसके हर कुकृत्य को
समय हर घाव भर देता है की तर्ज़ पर
और फिर पद यूँ ही नहीं मिला करते
जोड तोड की नीति में 
क्या क्या कुर्बानी नहीं दी होती
तब जाकर एक प्रतिष्ठित पद की भूख शांत होती है
और उसे कायम रखने के लिये 
कितने पापड बेलने पडते हैं
नेता जी अच्छे से जानते हैं
इसलिये भूख तो आखिर भूख है
हर संभव उपायों से शांत करने को प्रयासरत रहना आसान नहीं होता
फिर चाहे उच्छिष्ट के रूप में 
कुछ भरम ही क्यों ना कायम करना पडे 
जनता के बीच …अगले चुनाव से पहले
भूख की जडों को सींचने के लिये 
हथियारबंद होकर 
डर का साम्राज्य पैदा करके 
या फिर शुभचिन्तक बनकर 
रोज नये मुखौटे लगाकर
जरूरी है हर दांवपेंच की जानकारी का होना 

क्रमश : ……………

सोमवार, 6 जनवरी 2014

बालार्क की नवीं किरण


प्रतिभा कटियार एक जाना पहचाना नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं।  रोने की कोई वजह नहीं होती सुना तो होगा न मगर जो आंसुओं का समंदर बहाकर रोया जाए तो वो रोना भी कोई रोना है क्या ? एक ऐसा प्रश्न उठाती कविता है "रोने के लिए आत्मा को निचोड़ना पड़ता है " कितना गहरे उतरी हैं कवयित्री ये तो इस कविता को पढ़कर ही समझा जा सकता है।  आँख से आंसू टपके और रो लिए रोना इसे नहीं कहते बल्कि जब रोने का तुम्हें सलीका आ जाये वो है असल रोना , वो है आत्मा का निचुड़ना जहाँ उदासियों की टंकारें तो गूंजती हों मगर देखने वाले को मुस्कराहट का नमक लगे……… एक सलीकेदार दुनिया का निर्माण करती कवयित्री जीने का ढंग सिखा जाती हैं।  


"रोना वो नहीं जो आँख से टपक जाता है /रोना वो है जो सांस सांस जज़्ब होता है "

"उम्र सोलह की " एक ऐसा पायदान जो आता है तो जाने कितने गुलाबी पंखों को समेटे आता है और उड़ान का पंछी बिना पंखों के परवाज़ भरने  लगता है मगर एक स्त्री जो सारे संसार की धुरी बन एक उम्र गुजार देती है वो भी उम्र के आखिरी पड़ाव तक भी सोलह की उम्र सी होती है , उसमे भी कुछ गुलज़ार उमंगें आसमान चढ़ती हैं जिन्हें उसने बेशक कुछ वक्त के लिए ताक पर रख दिया होता है मगर असल में तो सोलह की उम्र सा जज्बा तो उसमे ता - उम्र रहता है सांसों सा , धड़कन सा जिस पर कभी कोई राग गाया ही नहीं गया , कोई सरगम बनायीं ही नहीं गयी वर्ना एक स्त्री सिर्फ स्त्री ही नहीं होती , एक षोडशी की तरंगें उमंगें गीत बन उसके लहू में बहती हैं सिर्फ एक हसरत में कोई तो हो जो सोया है सावन उसे जगा दे जो खोया है सावन उसे वापस ला दे : 

एक दिन में बरसों का सफ़र तय करते हुए / वो भूल ही चुकी है कि / ज़िन्दगी की दीवार पर लगे कैलेण्डर को बदले / ना जाने कितने बरस हुए / कौन लगा पायेगा पाँव की बिवाइयों की उम्र का अंदाजा / और बता पायेगा सही उम्र , उस स्त्री की ?

"बेसलीका ही रहे तुम " एक प्रेयसी के भावों का जीवंत चित्रण है जो प्रेमी को जाने कितने बहानों से याद भी कर रही है और उसके विरह में जल भी रही है।  प्रेमी का हवा के झोंके सा आना और अचानक चले जाना फिर वो चाहे किसी भी वजह से हो प्रेमिका ढूंढ ही लेती है वजहें उसके आने और जाने के बीच के संसार में जीने की।  उसकी छोटी छोटी चीजें हों या उसका होना हो सबमे प्रेमी का दर्शन ही प्रेमिका के प्रेम की पराकाष्ठा है तभी तो कितनी शिद्दत से कह उठती है :

"आज सफाई करते हुए पाया मैंने कि / तुम तो अपना होना भी यहीं भूल गए हो "

वैसे इस कविता का एक और पहलू हो सकता है जब कोई अपने जीवनसाथी को खो दे हमेशा के लिये जो उसे छोड दूसरी दुनिया में चला जाये तब भी ऐसे ही भावों का उद्धृत होना लाज़िमी है मगर नज़रिया चाहे जो हो मगर एक प्रेयसी/पत्नी के भाव तो इसी तरह उमडेंगे उससे इंकार नहीं किया जा सकता ।


आज स्त्री जान चुकी है खुद को शायद तभी नहीं पड़ती अब झूठे प्रलोभनों में तभी तो जरूरत नहीं उसे किसी साज श्रृंगार की , किसी प्रशंसा की क्योंकि अपने होने के औचित्य को  समझ चुकी है , जान चुकी है कि एक कर्मठ स्त्री का "सौदर्य "उसका रूप रंग नहीं उसका कर्म होता है , उसकी सांवली त्वचा नहीं बल्कि उसका स्वाभिमान होता है जिसे दर्प से उसका चेहरा दमकता है तभी तो प्रश्न करती है आज के पुरुष समाज से कि मैंने तोड़ दिए तुम्हारे बनाये सभी घेरे , बताओ , अब कौन से नए प्रलोभन दोगे  , कौन से नए षड्यंत्र रचोगे मुझे लुभाने के , अपना गुलाम बनाने के ।

"उनके लहू का रंग नीला है " जैसे एक सभ्यता खोज रही हो अपने निशान , जैसे सारे शोध यहाँ आकर भस्मीभूत हो गए हों। …… कुछ ऐसे भावों को संजोया है कवयित्री ने।  प्रेम मानव जीवन की प्रथम आवश्यकता है जिसके बिना जीवन सम्भव ही नहीं और जब वो ही प्रेम लहूलुहान होता है , जब वो ही प्रेम सूली पर चढ़ता है , जब उसी प्रेम के होने पर बंदिशों के घेरे बंध जाते हैं तब दर्द की अंगड़ाइयां बहते लहू को मानो नीला कर देती हैं , मानो कहती हों आओ करो हम पर शोध , करो हमारा अन्वेषण , करो हमारे पर योगिक क्रियाएं और बताओ तो ज़रा क्या ज़िंदा है ……इंसान या प्रेम ? आज के साइंस ज़दा मानव को चुनौती देती कवयित्री प्रेम को एक ऐसा शोध का विषय बता रही हैं जो युगों से अकाट्य सत्य की तरह हमारे बीच है , जिससे सभी बीमार हैं मगर कोई कह नहीं सकता देखकर बीमार की शक्ल कि हाल अच्छा नहीं है यही है प्रेम का होना जो होने पर भी अदृश्यता के सभी प्रतिमानो को तोड़ देता है और एक अपना ही अलग व्यास का निर्माण करता है :

उदासियाँ किसी टेस्ट में नहीं आतीं / झूठी मुस्कुराहटें जीत जाती हैं हर बार / और रिपोर्ट सही ही आती है / जबकि सही कुछ बचा ही नहीं "

स्त्री के मनोभावों का चित्रण करने में कवयित्री पूर्णतः सक्षम है साथ ही सोच को नए आयाम देती हैं , वहाँ जहाँ कुछ नहीं है उसमे से भी कुछ को पकड़ लेती हैं और एक चित्र कायम करने में सक्षम होती हैं यही होती है एक कवि की दृष्टि, सोच और परिपक्वता जो उसे नहीं होने में से भी कुछ होने को ढूंढने में मदद करती है और उसको एक नया मुकाम देती है।  कवयित्री को सटीक और हृदयस्पर्शी लेखन के लिए बधाई देती हूँ।  

फिर मिलती हूँ अगले कवि  के साथ जल्दी ही : ………… 

शनिवार, 4 जनवरी 2014

भूख भूख भूख ........3

भूख आगे बढने की 
कभी देख ही नहीं पाती
कौन मरा कौन जीया
किसकी लाश पर पैर रखकर 
किसने कौन सा खिताब पाया 
भूख तो आखिर भूख है 
शांत होने के लिये 
कहीं ना कहीं कोई तो अलाव जलाना होगा 
रोटियाँ बिना आग के नहीं पका करतीं 
फिर चाहे सारे नियमों , नीतियों को ही 
नेस्तनाबूद क्यों ना करना पडे 
क्योंकि
"जो जीता वो सिकन्दर " कहावत का मोल भी तो चुकाना है


प्रशंसा, सम्मान , उपलब्धियों की भूख भी 
दलालों के शोषण का शिकार हो जाती है
मान सम्मान की भूख कब
नैतिकता के सिंहासन से उतार देती है
और कब निज स्वार्थ के वशीभूत 
सारी बातों को दरकिनार कर 
सिर्फ़ स्वंय को स्थापित करने की चाह जड पकडती है
पता ही नहीं चलता
और शुरु हो जाता है वहीं से शोषण का सिलसिला ……प्रतिभाओं के 
बस प्रतिभायें ही मजदूरी करती हैं 
और अपना पेट भरती हैं
और दूसरी ओर अवांछित तत्व 
कभी पैसे के बल पर 
तो कभी पद के बल पर 
अपनी तुच्छ भूख को शांत करते
पेज थ्री पर छपते हैं 
क्योंकि
भूख तो आखिर भूख होती है
जरूरत है तो उन उपायों की 
जो उसे शांत कर सकें
फिर चाहे उसके लिये 
खुद की प्रतिष्ठा ही क्यों ना गिरवीं रखनी पडे 

क्रमश : ………

बुधवार, 1 जनवरी 2014

अर्ध रात्रि की टंकार

अर्ध रात्रि की टंकार 
और  
दोनो कांटो के मिलन के साथ 
मेरा हर लम्हा मानो 
एक युग में  बदल गया 
गुजरे हुये ज़माने में तब्दील हो गया 


अर्ध रात्रि की टंकार 
और  
दोनो कांटो के मिलन के साथ 
मेरे जीवन में मानो 
नव सूर्योदय हुआ 
रूह का पोर पोर खिल गया 

अर्ध रात्रि की टंकार 
और  
दोनो कांटो के मिलन के साथ 
कोई अंतरघोष हुआ मानो 
अवचेतन में चेतन दर्शन हुआ 
खुदी से खुदा मिल गया 


और आखिर में इन शुभकामनाओं के साथ


रोंप खुशियों की कोंपलें
सदभावना की भरें उजास
शुभकामनाओं से कर आगाज़
नववर्ष 2014 में भरें मिठास

नववर्ष 2014 आपके और आपके परिवार के लिये मंगलमय हो ,सुखकारी हो , आल्हादकारी हो