अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

जिस्म की परछाईं भी लुप्त हो गयी

कुछ चली ऐसी बयार चिंगारियों की
जिस्म की परछाईं भी लुप्त हो गयी

अब परछाइयों की परछाइयाँ ढूँढती हूँ

पुराने मकाँ में इक आशियाना ढूँढती हूँ

देवदार शीशम चैल की लकडियों में गुम

वजूद के टूटे - बिखरे निशाँ ढूँढती हूँ

वो जो तल्खी से बंद किये थे किवाड

उन किवाडों के बीच इक दरार ढूँढती हूँ

झिर्रियों के पार रौशनी के दरीचों में

मैं उम्र की सफ़ेदी के चराग ढूँढती हूँ

इस अंधेरी शाम की सुर्खियों के बीच

होम हुये ख्वाबों के कलाम ढूँढती हूँ

जाने क्यूँ सुलगती नहीं सूखी हुई लकडी

जबकि रोज उसमें घी की आहूति बीजती हूँ

11 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

इन चिंगारियों से क्या घबराना ...
सुंदर शब्द !! बेहतरीन !!

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत खूब ... जीवन के सफर में कुछ उलझे हुए धागों से रूबरू होती नज़्म ...

Er. AMOD KUMAR ने कहा…

very romantic post

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (31-01-2014) को "कैसे नवअंकुर उपजाऊँ..?" (चर्चा मंच-1508) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावी , शब्द शिल्प खूबसूरत बन पडा है और भाव एकदम कमाल के निकले हैं । बहुत ही बढिया .....जारी रहिए , हम आते रहेंगे और पढते रहेंगे .....

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत रचना.

रामराम.

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुन्दर !
सियासत “आप” की !
नई पोस्ट मौसम (शीत काल )

Shikha Gupta ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना गहरे भाव
बार-बार पढ़ने का जी करता है

वाणी गीत ने कहा…

उम्र की सफेदी के चराग !
बहुत सुन्दर है ये शब्दों की आहुति !

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़ज़ल

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब .