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शनिवार, 2 जून 2018

"अँधेरे का मध्य बिंदु" समीर लाल जी की नज़र में


कैनेडा में रहने वाले "उड़न तश्तरी " के नाम से प्रसिद्ध लेखक, कवि, उपन्यासकार "समीर लाल"जी द्वारा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु" की एक सारगर्भित समीक्षा सेतु पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित ..........समीर जी ब्लॉग के वक्त से मित्र हैं और ब्लॉग मित्र जितने हैं लगता है जैसे हम एक परिवार का हिस्सा हैं ......समीर जी की प्रतिक्रिया कितनी मायने रखती है इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता क्योंकि जब हम नए नए आये थे तब वो अपनी टिप्पणियों द्वारा उत्साहवर्धन किया करते थे ......शायद उनका उत्साहवर्धन ही नींव बना है लेखन की .......तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ समीर जी, आपने उपन्यास पढ़ा और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी...एक लेखक के लिए प्रतिक्रिया ही सबसे अनमोल पूँजी होती है क्योंकि यही तो हमारी खुराक है 




’अँधेरे का मध्य बिंदु’ – वन्दना गुप्ता: समीर लाल ’समीर’ की नजर में
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वन्दना गुप्ता रचित उपन्यास ’अँधेरे का मध्य बिंदु’ मिली. वन्दना गुप्ता से परिचय एक दशक के ऊपर ब्लॉग के समय से रहा है और दिल्ली में व्यक्तिगत मुलाकात भी रही और नियमित फोन से बातचीत भी होती रही. अक्सर उन्होंने मेरी कविताओं पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कविता को ही एक अलग अंदाज में आगे बढ़ाया है या एक अन्य नजरिया पेश किया है. उनका आत्मीय व्यवहार कुछ ऐसा रहा कि हमेशा अहसास एक परिवार के सदस्य सा रहा.
उनकी साहसी और बोल्ड लेखनी सदा काफी चर्चा का विषय रही ब्लॉगजगत में किन्तु उनसे मिलकर और उनकी लेखनी को देखकर अचरज होता रहा कि क्या यही वो वन्दना गुप्ता हैं जिन्हें मैने पढ़ा था? मगर यही एक लेखक, एक कवियत्री, एक चिंतक को अलग श्रेणी में लाकर खड़ा करता है. लेखक की पहचान उसका लेखन है, को निश्चित ही वन्दना गुप्ता चरितार्थ करती है. बातचीत और मिलने पर सहज एक घरेलु सी महिला, अपने लेखन में कितना उन्मुक्त और साहस प्रस्तुत करती है, यह सीखने लायक है.
कविताओं से इतर जब उनकी किताब ’अँधेरे का मध्य बिंदु’ मैने उठाई तो मुझे उम्मीद थी कि कोई न कोई समाज का ऐसा पहलु, जिस पर लिखने से लोग कतरा जाते हैं उसे जरुर छुआ होगा. और आशा के अनुरुप ही आज के समाज की नई सोच, नई उपज के रुप में पनप रही ’लिव इन रिलेशन’ पर ही कहानी को केन्द्रित पाया. अक्सर कहानीकार इस तरह की नई सामाजिक मान्याताओं का विरोध करते नजर आते हैं या पुरातनकालीन मान्यताओं की वकालत करते हुए विवाह के स्थापित संस्थान की दुहाई देते हुए नई सोच को गलत ठहराने की पुरजोर कोशिश में नजर आते हैं. कहानीकार अक्सर लेखन में किसी भी विवादात्मक विषय से बचता है.
मगर इसके विपरीत, लेखिका ने इस उपन्यास के मुख्य पात्र रवि और शीना के माध्यम से, न सिर्फ स्थापित मान्यताओ को तोड़ा है वरन इस सोच में निहित एक बेहतर समाज की स्थापना की परिकल्पना भी जाहिर की है. न कोई विरोध और न कोई नई सोच पर आक्षेप. एक सकारात्मक सोच..एक साक्षी भाव.
रवि और शीना, दो अलग मजहबों से आकर भी जिस तरह से विवाह की स्थापित मान्यताओं से अलग लिव इन रिलेशनशीप में सफल और खुशहाल जीवन बसर करने के लिए सफल प्रयास करते हैं वो एक आईना सा बनता दिखता है इन स्थापित माध्यमों से विवाहित हो लड़ते झगड़ते, अपने अहम का परचम लहराते, तलाक की कागार पर खड़े नई पीढ़ी के युवा युगलों के लिए जो भूल गया है कि खुशहाल जीवन साथ गुजारने के लिए विवाह के बंधन से ज्यादा जरुरी एक दूसरे को समझना, कम्प्रोमाईज करना और एक दूसरे की खुशियों का ख्याल रखना है.
जैसे जैसे उपन्यास से पन्ना दर पन्ना गुजरता गया, बस एक ही ख्याल मन में उपजता रहा कि काश!! यह सोच आज के विवाहित जोड़े अपना लें तो कितना कुछ बदल जाये. कितनी खुशहाल हो जाये जिन्दगी.
रवि की सोच..’मैं और शीना एक दूसरे से कोई अपेक्षा नहीं रखते, कभी कहीं आना जाना हो तो दोनों अपने हिसाब से अपना कार्यक्रम तय रखते हैं. जिस सोसाइटी में हम रहते हैं वहाँ अभी किसी को हमारे बारे में नहीं पता लेकिन हर शक्स हमें जानता है फिर बच्चा हो, बड़ा या बूढ़ा क्योंकि हम सबसे बराबर मिलते जुलते हैं, एक आम जीवन जीते हैं. कोई दूसरे ग्रह से आये प्राणी थोड़े हैं जो अपना सामाजिक दायरा ही बिसरा दें जैसे आप सब की तरह सिर्फ एक सम्बन्ध नहीं स्वीकारते शादी का, बाकी आप बताइए क्या कमी है? और सबसे बड़ी बात हम खुश हैं.
वाकई सबसे बड़ी बात हम खुश हैं...यही तो कोशिश है हर हमसफर साथी की..चाहे विवाहित हों या लिव इन रिलेशन...
एक और बानगी देखें शीना की सोच से:
जब मैने और रवि ने ये जीवन शुरु करने की सोची तो मैने उसे यह कहानी बताई और कहा कि रवि वैसे तो हम लिव इन में रहेंगे ही और अगर साथ रहना संभव नहीं होगा तो अपनी डगर भी पकड़ लेंगे मगर हमेशा इस सीख को भी याद रखेंगे ताकि हमारा सम्बन्ध सही दिशा में आकार ले सके और जानती हैं उसी गुरुमंत्र पर हम इस साथ को जी पायें क्योंकि अच्छाईयों और बुराईयों का पुतला होता है इन्सान. वह मुझमें भी है और रवि में भी मगर हमने उन बुराईयों को थोड़ी दूरी पर रखा बल्कि एक दूसरे की अच्छाईयों के साथ उनकी अहमियत को समझा तब जाकर यह संबंध आगे बढ़ पाया और इसने यह मुकाम पायावर्ना छोटी छोटी बातों पर लड़ते झगड़ते रहते और अपना जीवन हम बर्बाद कर लेते.
बिना किसी वकालत..बिना किसी का पक्ष लिए..बिना कोई दलील...बहुत कुछ सोचने विचारने को छोड़ देती है यह एक सांस में पढ़ ली जाने को बाध्य करती पुस्तक.. क्या सही और क्या गलत..एक सोच मात्र और वो भी हमारी.
बदलते समाज पर चली एक सधी हुई कलम का नाम ’वन्दना गुप्ता’.
आप पसंद करें या नापसंद करें...मगर इग्नोर करना अफोर्ड नहीं कर सकते मित्र वन्दना गुप्ता की ’अँधेरे का मध्य बिन्दु’.
सोचिये मत..आर्डर करिये और पढ़िये इस पुस्तक को..एक अति आवश्यक पठन आज की जिन्दगी को समझने के लिए ..सही तरीके से!!
किताब: ’अँधेरे का मध्य बिन्दु’
लेखक: वन्दना गुप्ता
मूल्य: ₹ १४०.००
प्रकाशक: एपीएन पब्लिकेशन, नई दिल्ली
फोन: ९३१०६७२४४३
ईमेल: apnlanggraph@gmail.com
सेतु के मई २०१८ के अंक में:
http://www.setumag.com/2018/05/Book-Andhere-Ka-Madhya.html

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