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शुक्रवार, 22 जून 2018

एक बार फिर इश्क की होली

दर्द की नदी में
छप छप करते नंगे पाँव
आओ
तुम और मैं खेलें
एक बार फिर इश्क की होली

उदासियों के चेहरे पर
बनाते हुए आड़ी तिरछी रेखाएं
आओ
तुम और मैं लायें
एक बार फिर इश्क का मौसम

सूनी आँखों के संक्रमण काल में
डालकर बेखुदी की ड्राप
आओ
तुम और मैं करें
एक बार फिर इश्क का मोतियाबिंद दूर

रकीब के दरवाज़े पर
सजदा करते हुए
आओ
तुम और मैं बनाएं
एक बार फिर इश्क को खुदा

प्यास के जंगल में
खोदकर आँसुओं का कुआं
आओ
तुम और मैं बुझायें
एक बार फिर इश्क की अबूझ प्यास

यहाँ सुलग रही हैं भट्टियाँ सदियों से
इश्क का घी है कि खत्म ही नहीं होता
सुकून के लम्हे इश्क की तौहीन है रब्बा
क्योंकि
बेपरवाही इश्क की लाचारी है आदत नहीं

फासले हों तो तय करे कोई ...

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