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शुक्रवार, 22 जून 2018

एक बार फिर इश्क की होली

दर्द की नदी में
छप छप करते नंगे पाँव
आओ
तुम और मैं खेलें
एक बार फिर इश्क की होली

उदासियों के चेहरे पर
बनाते हुए आड़ी तिरछी रेखाएं
आओ
तुम और मैं लायें
एक बार फिर इश्क का मौसम

सूनी आँखों के संक्रमण काल में
डालकर बेखुदी की ड्राप
आओ
तुम और मैं करें
एक बार फिर इश्क का मोतियाबिंद दूर

रकीब के दरवाज़े पर
सजदा करते हुए
आओ
तुम और मैं बनाएं
एक बार फिर इश्क को खुदा

प्यास के जंगल में
खोदकर आँसुओं का कुआं
आओ
तुम और मैं बुझायें
एक बार फिर इश्क की अबूझ प्यास

यहाँ सुलग रही हैं भट्टियाँ सदियों से
इश्क का घी है कि खत्म ही नहीं होता
सुकून के लम्हे इश्क की तौहीन है रब्बा
क्योंकि
बेपरवाही इश्क की लाचारी है आदत नहीं

फासले हों तो तय करे कोई ...

2 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

Dhruv Singh ने कहा…

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २५ जून २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति मेरा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

निमंत्रण

विशेष : 'सोमवार' २५ जून २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय 'प्रबोध' कुमार गोविल जी से करवाने जा रहा है। जिसमें ३३४ ब्लॉगों से दस श्रेष्ठ रचनाएं भी शामिल हैं। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/