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गुरुवार, 24 मई 2018

चलूँ कि बहुत अँधेरा है

चलूँ कि बहुत अँधेरा है 
हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता
रूह जाने किस द्वारका में प्रवेश कर गयी है 

कि अजनबियत तारी है खुद पर ही...

रुके हुए हों रस्ते जैसे, मंजिलों ने किया हो अलगाववाद का शोर 
और किसी रहस्यमयी जंगल में घूम रहा हो मन का मोर ...

संवाद के लिए जरूरी हैं शब्द और शब्दों के लिए जरूरी है अक्षरज्ञान 
एक निपट अज्ञानता से सूख चुकी हैं उम्मीद की कड़ियाँ 
हिज्जों में बंटा है अस्तित्व 
खुद से संवाद के लिए भी मुझमें मेरा होना तो जरूरी है और मैं ...प्रश्नचिन्ह सा टंगा हूँ वक्त के ताखे पर

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-05-2018) को "अक्षर बड़े अनूप" (चर्चा अंक-2981) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Dhruv Singh ने कहा…

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २८ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

Kusum Kothari ने कहा…

प्रश्न चिन्ह सा टंगा हूं वक्त केताखे पर,
अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह ?
सुंदर लेखन।