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गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

दर्द्जा और हलाला मेरी नज़र में



धर्म एक ऐसी अफीम है जिसके नाम पर सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं. धर्म की अफीम जिसने चाटी वो बुलंदियों पर पहुँच गया, कौन नहीं जानता. सबसे आसान है धर्म के नाम पर शोषण. उसमें भी यदि धर्म इस्लाम हो तो वहाँ की जटिलताओं से कौन वाकिफ नहीं. आम इंसान को नहीं पता होता आखिर उनके शास्त्रों में क्या वर्णित है और क्या नहीं. वो जो अपने गुरुओं पैगम्बरों से जो सुनता है उसे ही धर्म मान लेता है और फिर उसी के अनुसार जीवन व्यतीत करता है. उसमें यदि जरा भी व्यवधान आये तो डर का भूत उसकी बुद्धि के पाँव को जकड लेता है फिर वो कितना ही पढ़ा लिखा हो या जाहिल या अशिक्षित. शायद यही सबसे बड़ा कारण है किसी भी धर्म को मनवाने का वो भी अपनी इच्छानुसार. डर से बढ़कर दुनिया में कोई राक्षस नहीं. लेकिन इसी डर के कारण कैसे इस्लाम में जीवन भयावह होता है इसका दिग्दर्शन यदि करना है तो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित जॉय श्री रॉय का उपन्यास ‘दर्द्जा’ और भगवान् दास मोरवाल जी का उपन्यास ‘हलाला’ पढ़ा जाना चाहिए. 

दर्द्जा हव्वा की बेटियों की दर्दभरी दास्तान का मानीखेज दस्तावेज है. लेखिका ने अफ्रीका के सोमाली देश को चुना जहाँ आज भी सुन्नत जैसी प्रथा ने स्त्रियों के जीवन को नरक बना रखा है. आज इक्कीसवीं सदी में जबकि इतनी जागरूकता आ गयी है तब भी बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहाँ अभी तक अशिक्षा का अन्धकार व्याप्त है. यहीं बंजारों का सा जीवन जीते लोग हैं जो सुन्नत को ऐसे मानता देते हैं जैसे कोई अपने ईश्वर को देता है. माहरा नाम की लड़की को कैसे लड़की से स्त्री बनाया जाता है वो भी छोटी सी उम्र में जब अभी वो मासिक धर्म से भी नहीं होती वो एक भयावह दृश्य है. लेकिन उससे भी भयावह है उनका जीवन जो स्त्रियाँ इस नारकीय यंत्रणा से गुजरती हैं जब या तो सुन्नत की वजह से वो दर्द और इन्फेक्शन होने, अधिक रक्तस्त्राव होने के कारण मर जाती हैं या फिर एड्स जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाती हैं या फिर कच्ची उम्र में ही जब वो माँ बनती हैं तो प्रसव पीड़ा में उनके आन्तरिक हिस्से इतने कमजोर हो जाते हैं कि हर वक्त पेशाब रिसता रहता है जिसके कारण छोटी सी उम्र में ही पति द्वारा निकाल दी जाती हैं और बल्कि समाज से भी निष्कासित हो जाती हैं. फिर एक अलग झोंपड़ी बना रहने को विवश, उसमें भी टाँगे और गुठने जोड़ कर बैठने के कारण कुछ सालों में चलने फिरने से भी मोहताज. वहीँ जो बच जाती हैं , सह जाती हैं तो आगे जीवन भर इसी प्रक्रिया से गुजरती हैं. बचपन में सुन्नत, फिर पति द्वारा उसका छेदन, फिर प्रसव उपरान्त सुन्नत जैसे स्त्री न हो कोई खिलौना हो या कोई जानवर जिसे चाहे जितनी बार जिबह किया जा सके. 

इतना सब होते हुए भी कभी उनके मन में ये भाव न उठना कि ये गलत है. बचपन से घुट्ठी में घोटकर पिलाया जाता है औरत का शरीर पति को सुख देना और उसके लिए बच्चे पैदा करना है. तभी जन्नत मिलेगी. दादियों द्वारा उल्टी सीधी कहानियां सुना डराया जाता है जो कच्चे मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. शायद यही है भय का भूत जिससे पार जाने की कोई स्त्री कभी कोशिश भी नहीं कर पाती और पुरुष के हाथ का उम्र भर खिलौना बनी रहती है मगर विद्रोह उसकी रग में नहीं होता. फिर वो चाहे लड़की दस बारह साल की ही क्यों न हो और पति 65-70 साल का ही क्यों न हो. फिर चाहे पांच सात साल में ही वो परलोक क्यों न सिधार जाए और लड़की जो अभी खुद एक बच्ची होती है उसके सर पर दो तीन बच्चों की जिम्मेदारी छोड़ जाए, कैसे संभाल सकती है? इन बातों से किसी को कोई लेना देना नहीं. धर्म की आड़ में औरत देह का ऐसा शोषण शायद ही कहीं और देखने को मिले, जिसे लेखिका ने बखूबी वर्णन किया है. वहीँ लेखिका ने इसमें कैसे बड़ी बड़ी संस्थाएं इस बारे में जागृति लाने का प्रयास कर रही हैं, कहानी के माध्यम से उस पर भी प्रकाश डाला है. 

लेकिन अभी भी पूर्ण रूप से इस भयावह दुखदायी प्रक्रिया से औरतों को मुक्ति नहीं मिली है क्योंकि उनकी सोच को भी धर्म के धागे से ही सीला गया है तो वो भी उससे बाहर आने का नहीं सोचतीं. लेखिका ने माहरा के माध्यम से सुन्नत कराने से उपजी समस्याओं पर प्रकाश डाला है वहीँ उसे इतना जागरूक दिखाया है कि अपनी बेटी का जब वक्त आता है तो वो उसके खिलाफ भी जाती है क्योंकि इसी वजह से उसने अपनी बहन को एड्स की वजह से मरते देखा था और उसका विश्वास था जैसे उसकी बेटी के रूप में उसकी बहन ने ही जन्म लिया है. और अंत में बेशक खुद मिट जाती है लेकिन बेटी को एक सुरक्षित जीवन दे जाती है. एक मर्मान्तक वर्णन लेखिका शुरू से आखिर तक करती रही मानो कहना चाहती हो हम किस विकास के दौर में जी रहे हैं जहाँ एक ओर प्रकाश ही प्रकाश है तो दूसरी ओर अंधकार ही अंधकार. आखिर कब स्त्री को इस दोजख से मुक्ति मिलेगी? ब्यौरेवार लेखिका ने इस प्रथा पर प्रकाश डाला है कि कितने देशों में आज भी ये प्रथा जारी है और कहाँ कहाँ इस प्रथा से मुक्ति मिली है, कहाँ कितनी जागरूकता आई है, सिलसिलेवार लेखिका बयां करती गयी हैं. 


एक ऐसे विषय को उठाना और लिखना कोई आसान काम नहीं होता वो भी एक स्त्री के लिए जब धर्म से जुड़ा हो लेकिन लेखिका ने ये साहस किया है, निश्चित ही वो सराहनीय हैं. आज धर्म के नाम पर पल में बबाल खड़ा हो जाता है ऐसे में ये जोखिम उठाना निश्चित ही साहस का विषय है. लेकिन ये साहस एक लेखक को उसकी कलम प्रदान करती है और वो ही लेखिका ने किया है.

भगवान् दास मोरवाल जी का उपन्यास ‘हलाला’ भी इस्लाम में फैली एक विसंगति को ही दर्शाता है. इसमें भी धर्म के नाम पर एक बार फिर स्त्री का ही शोषण है. कैसे अपनी गलती होते हुए भी स्त्री को दोषी ठहरा उसका शोषण किया जाता है उसे वर्णित किया गया है. यहाँ उत्तरप्रदेश के गाँव को दर्शाया गया है जो मुस्लिम बहुल है और जहाँ वहीँ की बोली, बोली जाती है. पूरा उपन्यास उसी बोली में है जैसे बृज में बोली जाती है बस वैसे ही.
यहाँ एक पात्र है डमरू जो बेहद काला है कि जिसे देख कोई उससे बात भी नहीं करता , यही कारण रहा उसकी शादी नहीं हुई. उसका परिवार है जिसमे उसके तीन बड़े भाई और तीन भाभियाँ हैं जिनमे से आमना भाभी से उसका छत्तीस का आंकड़ा रहता है. जिस कारण उसे जमात में भी जाना पड़ता है. वहीँ एक और परिवार है जहाँ नियाज़ और उसकी पत्नी नजराना हैं. नज़राना बेहद सुशील बहु, तीन बच्चे, घर भर की लाडली. ऐसे ही किसी बात पर नाराज होकर उसका शौहर उसे तलाक दे देता है और वो रूठकर अपने मायके चली जाती है. अब प्रयास होता है उसे लाने का और पंचायत बैठती है तो पता चलता है उसे ऐसे ही माफ़ी मांगकर नहीं लाया जा सकता. उसे तो हलाला के बाद ही लाया जा सकता है. गाँव के ऐसे लोग हैं जो हैं तो पांच वक्त के नमाजी लेकिन जानते ही नहीं आखिर हलाला होता है क्या है. तब पता चलता है अब नजराना तभी वापस आ सकती है जब किसी और से उसका निकाह हो और उसका वो पति उसे तलाक दे तब उसका अपने शौहर से दोबारा निकाह हो सकता है. सुन सब अचंभित रह जाते हैं लेकिन धर्म में यदि ये वर्णित है तो उसका पालन जरूरी है, यहीं तक उनकी सोच है. अब शुरू होती है खोज ऐसे शख्स की जो निकाह के बाद तलाक दे दे, उसकी नियत न बिगड़े. लेकिन ऐसा कोई नहीं मिलता तो उसके सास ससुर हार कर डमरू के लिए तैयार होते हैं और नजराना और नियाज़ को भी इस बात के लिए तैयार किया जाता है. सबकी सहमति से डमरू से निकाह करवाया जाता है और फिर पंचायत बैठती है और जैसे ही वो तलाक देने लगता है इमाम कहता है क्या धर्मानुसार हलाला हुआ? यानि वो अपने शौहर के साथ हमबिस्तर हुई? यदि नहीं तो भी ये तलाक मान्य नहीं. एक ऐसा जाल जहाँ खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर काटना खरबूजे को ही है यानि गलत शौहर हो और सजा स्त्री भोगे उस गुनाह की जो उसने किया ही न हो. इस बीच दोनों घर में भूचाल सा आ जाना, नजराना की सास द्वारा ये बात न स्वीकारना या कहो हलाला के बाद बहु को न स्वीकारे जाने की जिद करना, वहीँ डमरू जिसे पता ही नहीं हमबिस्तर का सही अर्थ, उसका इतना मासूम होना और पता चलने पर सहम उठना फिर नज़राना द्वारा डमरू के नोहरे में जाना आदि घटनाओं का होना. अंत में एक बार फिर पंचायत का बैठना और वहां इमाम द्वारा हलाला किये जाने को पूछना और डमरू द्वारा हाँ कह देना. फिर इमाम द्वारा कहा जाना चलो दो अब तलाक और जैसे ही डमरू तलाक देने लगता है नजराना द्वारा ये कहना हलाला तो हुआ ही नहीं एक भूचाल ला देता है. लेकिन यहाँ लेखक ने एक सही दिशा भी दिखाई है जब नजराना कहती है कि क्यों जाऊं उस शौहर के पास जिसे अपनी पत्नी पर विश्वास नहीं. एक डमरू है जो जमात में होकर आ चुका, पांच वक्त का नमाजी है लेकिन सिर्फ मेरे लिए आज अपने दीन ईमान को ताक पर रख झूठ बोल दिया. मैं गयी उसके नोहरे में, उसे कहा भी लेकिन उसने छुआ तक नहीं. इससे बढ़कर स्त्री के मान का सम्मान करने वाला भला कहाँ मिलेगा? और क्या गारंटी नियाज़ मुझे वो ही सम्मान दे मुझे जब हलाला हो जाए या उसके घरवाले मुझे स्वीकारें. यहाँ लेखक ने नजराना के रूप में एक जागरूक स्त्री का दर्शन कराया है जो अपने अधिकारों के प्रति सचेत है , जो अपने निर्णय स्वयं ले सकती है न कि धर्म की आड़ में अपना शोषण स्वीकार्य करे. वर्ना तो आज जाने कितनी ही स्त्रियों का जीवन तीन तलाक की वजह से बर्बाद हो गया तो हलाला की वजह से दोज़ख बन गया. नयी रौशनी की जरूरत है और उसे दिखाना ही लेखक का कर्तव्य. जिसमे लेखक सफल है. 

अब बात करते हैं उपन्यास की भाषा की तो हलाला उपन्यास की भाषा ने इसकी रोचकता में रोड़े अटकाए हैं. एक तो पूरे उपन्यास में गालियों की भरमार है यानि कोई वाक्य नहीं जो गाली के बिना शुरू हो फिर वो आदमी दें या औरतें. जिस कारण एक वितृष्णा जन्म लेती है. आखिर क्या जरूरत थी लेखक को गालियों के प्रयोग की? क्या बिना गाली के बात नहीं की जा सकती. मानती हूँ, किसी क्षेत्र विशेष में ऐसे बोलना उनकी आदत में शुमार हो और लेखक साहित्य समाज का दर्पण होता है उस उक्ति को प्रमाणित कर रहा है, कहा जाए मगर कभी कभी कोई कोई चीज अति से ज्यादा हो तो हलक से नीचे नहीं उतरती बेशक वो समाज का दर्पण ही क्यों न हो. ऐसा ही यहाँ लगा. वहीँ उर्दू के शब्दों का भी काफी प्रयोग है तो कुछ शब्द ऐसे जो समझ से परे थे लेकिन क्योंकि कहानी समझ आ रही थी इसलिए उनके अर्थ जानने की ख़ास जिज्ञासा ने जन्म नहीं लिया. वहीँ लेखक ने कुछ दोहों का भी प्रयोग किया है जिनमे से कुछ तो समझ आ गए लेकिन कुछ नहीं. क्या ही अच्छा होता यदि लेखक उनके अर्थ नीचे या पीछे दे देता तो और ज्यादा रोचकता का आभास होता. 

बाकि यदि देखा जाए तो दोनों ही उपन्यासों में धर्म के नाम पर कैसे स्त्री का शोषण होता है उस पर ही प्रकाश डाला गया है. साथ ही दोनों ही लेखकों ने एक ही बात पर जोर दिया है जैसे कहना चाहते हों कि स्त्री चाहे तो अपनी दशा बदल सकती है, इस अजाब से मुक्ति पा सकती है बशर्ते वो कोशिश करे क्योंकि दोनों ने ही बदलाव की बयार स्त्री के माध्यम से ही दर्शायी है. जहाँ लेखक की भाषा में गालियों की भरमार और भाषा के खुलेपन से थोडा बहुत अश्लीलता का बोध होता है वहीँ लेखिका की भाषा काफी संतुलित और नपी तुली रही फिर चाहे यौन संबंधों का भी कितना ही जिक्र किया गया हो मगर कहीं भी भाषा असंतुलित नहीं हुई. थोडा बहुत तो चल जाता है लेकिन अधिकता जरूर प्रश्न खड़ा करती है आखिर बिना इस तरह कहे भी तो असर डाला जा सकता था जैसा कि लेखिका ने किया. दोनों ही उपन्यास वाणी प्रकाशन से हैं लेकिन सिर्फ एक भाषा की वजह से ही दोनों के प्रभाव में फर्क पड़ जाता है. बेशक लेखक ने भी बहुत बारीकी से तथ्यों से अवगत कराया जिसे नकारा नहीं जा सकता कि कैसे संबंधों पर प्रभाव पड़ता है, समाज क्या सोचता है, वहीँ लपरलैंडी का किरदार आदि के माध्यम से कहानी को रोचकता प्रदान की मगर लेखिका जॉय श्री द्वारा एक मर्यादित सीमा रेखा बनाए रखना थोडा भारी पड़ जाता है वर्ना दोनों ही उपन्यासों में कोई कमी नहीं. दोनों ही बराबर से प्रभाव डालते हैं पाठक मन पर. वहीँ लेखिका द्वारा अत्यंत विवरणात्मक वर्णन कई बार व्यवधान उत्पन्न करता है लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए तो वैसा वर्णन करना भी आसान नहीं. उसका भी अपना एक सौन्दर्य है और जो उस सौन्दर्य के उपासक होंगे उनके लिए काफी रुचिकर होगा वो सब पढना. लेकिन फिर भी यही कहूँगी अत्यधिक वर्णन से बचना चाहिए नहीं तो उपन्यास शोधपरक बन जाते हैं और कहानी की रोचकता पर असर करते हैं. 

धर्म ने कैसे सोच को जकड़ा हुआ है उसका दिग्दर्शन दोनों ही उपन्यास कराते हैं क्योंकि दोनों ने ही अलग अलग विषय पकडे हैं. बेशक धर्म एक है लेकिन उसमे व्याप्त कुरीतियों से कैसे मानवता अभिशापित है उसका हृदयविदारक चित्रण दहलाता है और प्रश्न करता है – ये कैसा सभ्य समाज है? ये कौन से युग में जी रहे हैं हम? क्या वाकई मानवता शर्मसार नहीं होती ऐसी दुर्दशा पर जिसकी कोख से जन्म लिया जाता है और उसे ही यूँ अभिशापित किया जाता है? दोनों उपन्यास प्रश्न छोड़ते हैं जिसके उत्तर हमें ढूँढने हैं और बदलना है वक्त की लकीरों को तब शायद मानवता शर्मसार न हो. 

जॉय श्री रॉय और भगवान् दास मोरवाल जी बधाई के पात्र हैं जो धर्म के नाम पर शोषण को अपनी लेखनी द्वारा प्रस्तुत किया .

4 टिप्‍पणियां:

दीपक कुमार भानरे ने कहा…

दोनों ही उपन्यास का सटीक विश्लेषण । सारगर्भित जानकारी देने के लिए शुक्रिया ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-04-2017) को "झटका और हलाल... " (चर्चा अंक-2933) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-04-2017) को "झटका और हलाल... " (चर्चा अंक-2933) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

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