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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

शब्द भर ही

मोहब्बत के
वृहद् और विस्तृत अर्थों में से
कौन सा अर्थ चुनूँ अपने लिए
जो किसी एक में समा जाए सारी कायनात की मोहब्बत

वैसे सुना है
मोहब्बत सोच समझ कर नहीं की जाती
मगर मुझे तो आदत है
हर लकीर को आड़ा काटने की
तो
मोहब्बत मेरे दिमाग का फितूर ही सही
चलो इस बार फितूर को ही आजमा लूं

दिल तो वैसे भी बंदगी का दीवाना है
और मेरे पास
न प्रेमी है न कृष्ण

और शायद इसीलिए
मेरे निरामय निपट अंधेरों में
मोहब्बत का
सिर्फ शब्द भर ही अस्तित्व रहा...

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-11-2015) को "ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री" (चर्चा-अंक 2164) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma ने कहा…

मोहब्बत कब अर्थों या परिभाषाओं में बंधती है..यह तो केवल एक अहसास है..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...