अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

सोमवार, 2 नवंबर 2015

जब तक सत्ता निरंकुश है .......

आश्वस्त हूँ
अपने मानवाधिकार से
और मुझसे परे भी
क्या जरूरत होती है
किसी को किसी और अधिकार की .......जरा सोचिये !!!

मानवाधिकार
मेरा कवच
मेरी सुरक्षा का बीजमंत्र
तो क्या हुआ
कल कर दूं मैं तुम्हारे ही अधिकारों का हनन
ये है मेरा विकल्प .......

मानवाधिकार
एक शब्द भर
और शब्दों का अक्सर हो ही जाता है बलात्कार
तो क्या हुआ
जो इसकी आड़ में
हो जाए सम्पूर्ण सभ्यता बलात्कृत
ये है आज का सच

तब से सोच में हूँ
मानवाधिकार
ओढ़ा हुआ शब्द है
या बिछाया हुआ बिछौना
जो
बच्चे के गीले करने भर से हो जाता है निष्कासित
या फिर
किसी कुँवारी लड़की के सिर से
चुनरी ढलकने भर से
हो जाता है अपमानित
या फिर मैं हूँ
अपने ही हाथों अपना खून बेचता दलाल

न न , आम आदमी हूँ मैं
जिसके कोई नहीं होते मानवाधिकार
कम से कम तब तक
जब तक सत्ता निरंकुश है .......

6 टिप्‍पणियां:

Arun Roy ने कहा…

विद्रोह के शांत स्वर लिए कविता

Arun Roy ने कहा…

विरोध का शांत स्वर

Unknown ने कहा…

सत्ता हमेशा से निरंकुशता के आवरण में ही लिपटी रहती है ।

Mukesh Shukla ने कहा…

सत्ता हमेशा से निरंकुशता के आवरण में ही लिपटी रहती है ।

chhaganlal garg ने कहा…

मंथन देती अभिव्यक्ति ।सामयिक सत्य शब्दों का स्वयं हित व सता का यथार्थ चरित्र प्रकट करती रचना ।बधाई ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-11-2015) को "काश हम भी सम्मान लौटा पाते" (चर्चा अंक 2149) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'