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मंगलवार, 5 मई 2015

' कतरा कतरा ज़िन्दगी '......मेरी नज़र से




धूप के सफ़र से  शुरू हुआ सफ़र जब आकार लेता है तो ' कतरा कतरा ज़िन्दगी ' जन्म लेती है जो जाने कितने मोड़ो से गुजरते हुए एक लम्हे में तब्दील हो जाती है  .  मुकेश दुबे जी का दूसरा उपन्यास ' कतरा कतरा ज़िन्दगी 'शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है जो उन्होंने मुझे पुस्तक मेले में सप्रेम भेंट दिया .

कतरा कतरा ज़िन्दगी यूँ तो देखा जाए एक आम कहानी कह देगा पाठक मगर उसको जिस तरह से प्रस्तुत किया है ये लेखक के लेखन का कमाल है . सीधे सरल सहज शब्दों का प्रयोग मगर प्रवाहमयी प्रस्तुति कहीं न तो कहानी को बोझिल करती है और न ही ऊब को कोई स्थान बल्कि पाठक के मन में एक उत्सुकता बनी रहती है आखिर हुआ क्या अभिजीत और सुखविंदर की ज़िन्दगी में या अभिजीत और शुभ्रतो की ज़िन्दगी में . और पढ़ते पढ़ते जब पाठक अंत तक पहुँचता है तो आँख से अश्रुप्रवाह स्वतः होने लगता है जो कहीं न कहीं पाठक को पात्रों से बांधे होता है इसलिए पाठक खुद को उनसे जुड़ा पाता है और घटनाएँ कैसे ज़िन्दगी में आकार ले नियंत्रण से बाहर होती हैं और फिर कैसे पात्र उनके प्रवाह में बहता जाता है सारी कहानी उसी का दिग्दर्शन है . मिलन और बिछोह  जाति - पांति की अग्नि में कैसे स्वाहा होते हैं और उस वजह से कैसे ज़िंदगियाँ हाशियों पर आ जाती हैं कि किसी भी ज़िन्दगी को किनारा नहीं मिलता का एक बेहतरीन चित्रण है . लेखक ने बारीक से बारीक चीज को इस तरह लिखा है कि सब जैसे सामने ही घटित हो रहा हो . एक एक पल , एक एक क्षण का ब्योरेवार लिखना और उसमे पाठक को भी बांधे रखने की कूवत रखना ही लेखन की सफलता है जिसमे लेखक सफल हुआ है . हर बार घटनाओं को ऊंचाई पर ले जाकर फिर सतह पर ले आने की कला में लेखक माहिर हैं जहाँ रिश्तों के बनने और बिगड़ने की प्रक्रिया के अंतर्गत जाने कितने मोड़ कितने लम्हे ऐसे आते हैं पाठक को लगता है बस शायद अब बिजली कडकड़ाएगी या अब खिलेंगे कहीं किसी छोर पर बुरांस के फूल वही लेखन की सीमाओं पर नियंत्रण रखते हुए एक मर्यादा कायम रखी जबकि संभव नहीं होता किसी भी लेखक के लिए इस सीमा का अतिक्रमण किये बिना लिखना लेकिन एक साफ़ सुथरी कहानी पाठक को आकर्षित करती है जिसे कोई भी बड़ा हो या बच्चा पढ़ सकता है , समझ सकता है और लेखन की सरलता पर मंत्रमुग्ध हो सकता है .

इंसान जितना कतरा कतरा ज़िन्दगी को सहेजने की ताउम्र कोशिश करता रहता है वो रेत सी कब और कैसे फिसलती जाती है पता ही नहीं चलता और एक वक्त आता है जब वो खुद को ठगा हुआ महसूसता है तो ज़िन्दगी बेमानी लगने लगती है और मौत खूबसूरत .......मानो लेखक ने इसी सोच को इंगित किया है .

मुकेश दुबे जी का लेखन इसी प्रकार आकार लेता रहे और अनवरत चलता रहे यही दुआ है . शुभकामनाओं के साथ .

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-05-2015) को बावरे लिखने से पहले कलम पत्थर पर घिसने चले जाते हैं; चर्चा मंच 1967 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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निर्मला कपिला ने कहा…

सुन्दर समीक्शा1

निर्मला कपिला ने कहा…

ाच्छी समीक्शा 1

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

badhiya samiksha

रचना दीक्षित ने कहा…

एक अच्छी समीक्षा