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रविवार, 28 अप्रैल 2013

अपेक्षाओं के सिन्धु

सुनो 
अपनी अपेक्षाओं के सिन्धुओ पर 
एक बाँध बना लो 
क्योंकि जानते हो ना 
सीमाएं सबकी निश्चित होती हैं 
और सीमाओं को तोडना 
या लांघना सबके वशीभूत नहीं होता 
और तुम जो अपेक्षा के तट पर खड़े 
मुझे निहार रहे हो 
मुझमे उड़ान भरता आसमान देख रहे हो 
शायद उतनी काबिलियत नहीं मुझमें 
कहीं स्वप्न धराशायी न हो जाए 
नींद के टूटने से पहले जान लो 
इस हकीकत को 
हर पंछी के उड़ान भरने की 
दिशा , गति और दशा पहले से ही तय हुआ करती है 
और मैं वो पंछी हूँ 
जो घायल है 
जिसमे संवेदनाएं मृतप्राय हो गयी हैं 
शून्यता का समावेश हो गया है 
कोई नवांकुर के फूटने की क्षीण सम्भावना भी नहीं दिखती 
कोई उमंग ,कोई उल्लास ,कोई लालसा जन्म ही नहीं लेती 
घायल अवस्था , बंजर जमीन और स्रोत का सूख जाना 
बताओ तो ज़रा कोई भी आस का बीज तुम्हें दिख रहा है प्रस्फुटित होने को 
ऐसे में कैसे तुम्हारी अपेक्षा की दुल्हन की माँग सिन्दूर से लाल हो सकती है .......ज़रा सोचना !!!

22 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत बढ़िया,उम्दा अभिव्यक्ति!!!

Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति...

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 01/05/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

Ashok Khachar ने कहा…

waaaaaaaaaaah

कालीपद प्रसाद ने कहा…

निराशा की पराकाष्ठा है परन्तु आशा कभी मरती नहीं , ,सुसुप्त रहती समय के इन्तेजार में,फिर हरी हो जाती है -आपकी रचना में गहराई है .
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अपेक्षाओं का सिन्धु प्रवाहम़ान रहे, रुकेगा तो बाँध के दरकने का भय रहेगा।

रचना दीक्षित ने कहा…

सीमाओं में रहना ही सब सीख ले तो कोई समस्या ही न हो. सुंदर मनमोहक प्रस्तुति.

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

very expressive ........

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपेक्षा तो वैसे भी नहीं होतनी चाहिए ... यही मर्ज को बढ़ाती है ... बंधन में रखती है ... इससे मुक्ति जरूरी है ...

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

आस का बीज और बंजर जमीन ... क्या बात है !!!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह :)

ARUN SATHI ने कहा…

साधू साधू

Amrita Tanmay ने कहा…

सोचने की ही आवश्यकता है अब..

सुज्ञ ने कहा…

सटीक अभिव्यक्ति

jyoti khare ने कहा…

वंदना जी
जीवन के कई अर्थो को समेटा है आपने अपनी रचना में
बधाई

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति .....

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति .....

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

बहुत खूब लिखा आपने | बहुत ही सुन्दर शब्दावली द्वारा विचारों को अभिव्यक्त किया | पढ़कर अच्छा लगा | सादर

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सागर पर बांध बनाना भी कठिन है ..... अप्रक्षाएं ही तो ज़िंदगी को कठिन बना देती हैं .... सुंदर प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सागर पर बांध बनाना ही तो मुश्किल है .... अपेक्षाएँ ही तो ज़िंदगी को कठिन बना देती हैं .... सुंदर अभिव्यक्ति

zindagi ke Panne ने कहा…

sabse mushkil kaam to apne seema me band ke rahna hi hota hai, agr wo kar le tb to koi problem hi na rahe.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मैं अपेक्षाओं की संभावनाओं से ऊपर हूँ
या बहुत दूर चली आई हूँ .... मैं नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ कि हर क्षण जो हादसे होते हैं
उन्होंने एक मृत रेखा खींच डाली है
और मैं शून्य में हूँ