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मंगलवार, 26 जून 2012

देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?



नारी के दृष्टिकोण से


सुना है नारी
सम्पूर्णता तभी पाती है
जब मातृत्व सुख से 
आप्लावित होती है
जब यशोदा बन
कान्हा को 
दुग्धपान कराती है
रचयिता की 
अनुपम कृति तब होती है

यूँ तो उन्नत वक्षस्थल
सौंदर्य का प्रतिमान होते हैं
नारी का अभिमान होते हैं
नारी देहयष्टि में
आकर्षण का स्थान होते हैं
पुरुष की कामुक दृष्टि में
काम का ज्वार होते हैं
मगर जब इसमें घुन लग जाता है
कोई रेंगता कीड़ा घुस जाता है
सारी फसल चाट जाता है
पीड़ा की भयावहता में 
अग्निबाण लग जाता है
असहनीय दर्द तकलीफ
हर चेहरे पर पसरा खौफ
अन्दर ही अन्दर 
आतंकित करता है 
कीटनाशक का प्रयोग भी
जब काम ना आता है
तब खोखले अस्तित्व को
जड़ से मिटाया जाता है
जैसे मरीज को 
वैंटिलेटर पर रखा जाता है
यूँ नारी का अस्तित्व 
बिना घृत के
बाती सा जल जाता है
उसका अस्तित्व ही तब
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाता  है
एक अधूरापन सम्मुख खड़ा हो जाता है
सम्पूर्णता से अपूर्णता का 
दुरूह सफ़र 
बाह्य सौन्दर्य तो मिटाता है
साथ ही आंतरिक 
पीड़ा पर वज्रपात सा गिर जाता है

जिस अंग से वो
गौरान्वित होती है
साक्षात वात्सल्य की 
प्रतिमूर्ति होती है
जो उसके जीवन की
उसके अस्तित्व की
अमूल्य धरोहर होती है
नारीत्व की पहचान होती है
जब नारी उसी से विमुख होती है
तब प्रतिक्षण काँटों की
शैया पर सोती है

बेशक नहीं होती परवाह उसे
समाज की 
उसकी निगाहों की
किसी भी हीनता बोध की 
सौंदर्य के अवसान की
अन्तरंग क्षणों में उपजी
क्षणिक पीड़ा की
क्योंकि जानती है
पौरुषिक स्वभाव को
क्षणिक आवेग में समाई निर्जनता
पर्याय ढूँढ लेती है
मगर 
स्वयं का अस्तित्व जब
प्रश्नचिन्ह बन 
खड़ा हो जाता है
तब कोई पर्याय ना नज़र आता है
आईना भी देखना तब
दुष्कर लगता है

नहीं भाग पाती 
अपूर्ण नारीत्व से 
स्वयं को बेधती 
स्वयं की निगाह से
हर दंश , हर पीड़ा 
सह कर भी 
जीवित रहने का गुनाह
उस वक्त बहुत कचोटता है
जब मातृत्व उसका 
अपूर्ण रहता है
बेशक दूसरे सुखो से 
वंचित हो जाए
तब भी आधार पा लेती है
मगर मातृत्व सुख की लालसा 
खोखले व्यक्तित्व पर
प्रश्नचिन्ह बन 
जब खडी हो जाती है
वात्सल्य की बलि वेदी पर
माँ का ममत्व 
नारी का नारीत्व 
प्रश्नवाचक नज़रों से 
उसे घूरता है
मृत्युतुल्य कष्ट सहकर
ज़िन्दा रहना उसे
उस वक्त दुष्कर लगता है 
जब ब्रैस्ट कैंसर की
फैली शाखाओं के व्यूह्जाल 
को तोड़ वो खुद को निरखती है 
तब ज़िन्दा रहना अभिशाप बन
उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को
अभिशापित कर देता है
जो वास्तविक कैंसर से 
ज्यादा भयावह होता है

अपूर्ण व्यक्तित्व के साथ जीना
मौत से पहले पल- पल का मरना 
उसे अन्दर ही अन्दर 
खोखला कर देता है 
मातृत्व में घुला संपूर्ण नारीत्व 
पूर्ण नारी होने की गरिमा
उसके मुखकमल के तेज को 
निस्तेज कर देती है 
जब अपूर्णता की स्याही उसकी आँखों में उतरती है

चंद लफ़्ज़ों में 
उस भयावहता को बाँधना संभव नहीं
दर्द की पराकाष्ठा का चित्रण संभव नहीं
ये तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है 
मगर लफ़्ज़ों में तो ना
वो भी व्यक्त कर सकता है 
क्योंकि 
मौत से आँख मिलाने वाली
खुद से ना आँख मिला पाती है  
यही तो इस व्याधि की भयावहता होती है 


कहना आसान होता है 
बच्चा गोद ले लो 
किसी अनाथ को प्रश्रय दो 
जीने के नए बहाने ढूंढो 
मगर जिस पर गुजरती है 
वो ही पीड़ा को जानता है 
जब खुद के सक्षम होने से 
असक्षम होने के सफ़र को 
वो तय करता है 
और एक फांस सी दिल पर 
उम्र भर के लिए गड जाती है 
जब उस सुख से वो वंचित रह जाती है 


यूँ ज़िन्दगी से बढ़कर कोई नेमत नहीं होती 
जानती है वो ......
फिर भी एक नवान्गना/तरुणी  के जीवन की सम्पूर्णता 
तो सिर्फ मातृत्व में है होती 
सोच खुद को निरीह महसूसती है 
एक प्रश्नचिन्ह उसके वजूद को 
धीमे - धीमे खाता जाता है 
जिसका उत्तर ना किसी को कहीं मिल पाता है 
एक ऐसी बेबसी जिसका निदान न मिल  पाता है 
और उसे अपना अस्तित्व अपूर्ण नज़र आता है 
और चीत्कार उठता है उसका अंतस बेबसी से उपजी पीड़ा से 


देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?




पुरुष के दृष्टिकोण से 



जब से विषबेल अमरलता से लिपटी है
मेरे अंतस में भी मची हलचल है
यूँ तो प्रणय का ठोस स्तम्भ होते हैं
मगर जीवन के पहिये सिर्फ 
इन्ही पर ना टिके होते हैं

ये भी जानता हूँ मैं 
अंग में उपजी पीड़ा की भयावहता को 
तुम्हारे ह्रदय की टीस को 
पहचानता हूँ 
संघर्षरत हो तुम 
ना केवल व्याधि से
ना केवल अपने अस्तित्व के खोखलेपन से
बल्कि नारीत्व के अधूरेपन से भी
जो तुम नहीं कहती हो
वो भी दिख रहा है मुझे
तुम्हारी वेदना का हर शब्द
मेरे भीतर रिस रहा है

मकड़ी के जालों ने तुम्हें घेरा है
खोखला कर दिया है तुम्हारा वजूद
कष्टसाध्य पीड़ा के आखिरी पायदान 
पर खडी तुम
अब भी मेरी तरफ 
दयनीय नेत्रों से देख रही हो
सिर्फ मेरे लिए
मेरे स्वार्थ के लिए
मेरी क्षणभंगुर तुष्टि के लिए
सोच रही हो
कैसे गुजरेगा जीवन
अधूरेपन के साथ
मगर तुम अधूरी कब हुईं
तुम तो हमेशा पूरी रही हो 
मेरे लिए 

नहीं प्रिये ...........नहीं
इतना स्वार्थी कैसे हो सकता हूँ
जीवन के दोनों पहियों के बिना 
कैसे गाड़ी चल सकती है
क्या तुमने मुझे सिर्फ इतना ही जाना
क्या मुझे सिर्फ 
विषयानल में फँसा दलदल का 
रेंगता कीड़ा ही समझा
जो अपनी चाहतों के सिवा
अपने रसना के स्वाद के सिवा
ना दूजे की पीड़ा समझता है
नहीं ..........ऐसा संभव नहीं 

क्या हुआ गर 
ज़हरवाद ने तुम्हें विकृत किया है
क्या सिर्फ एक अंग तक ही 
तुम्हारा अस्तित्व सिमटा है
तुम एक संपूर्ण नारी हो
गरिमामयी ओजस्वी 
अपने तेज से जीवन को 
आप्लावित करतीं 
घर संसार को संभालतीं 
अपनी एक पहचान बनातीं 
ना केवल अपने अर्थों में
बल्कि समाज की निगाह में 
संपूर्ण नारीत्व को सुशोभित करतीं
क्या सिर्फ अंगभंग होने से
तुम्हारी जगह बदल जाएगी 
नहीं प्रिये .........नहीं

जानती हो 
ये सिर्फ मन का भरम होता है 
रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए
प्रेम का अमृत ही काफी होता है 
जहाँ प्रेम होता है वासना नहीं 
वहाँ फिर कोई स्थान ना रिक्त दिखता है 
क्योंकि यथार्थ से तो अभी वास्ता पड़ता है 


शायद नहीं यक़ीनन
यही तो प्रणय संबंधों का चरम होता है 
जहाँ शारीरिक अक्षमता ना 
संबंधों पर हावी होती है 
और संबंधों की दृढ़ता के समक्ष 
मुखरित व्याधि भी मौन हो जाती है 



40 टिप्‍पणियां:

ZEAL ने कहा…

Beautifully expressed. I agree with your thoughts.

Kailash Sharma ने कहा…

शारीरिक अक्षमता कभी संबंधों पर हावी नहीं होती...सच्चा प्रेम इन आकर्षणों से बहुत ऊपर होता है....बहुत उत्कृष्ट और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

वंदना , बहुत अच्छा लिखा है , स्त्री और पुरुष के दृष्टिकोण को इस तरह से रखना सरल न था. लेकिन तुमने बहुत अच्छा लिखा है ... कैंसर का एफ्फेक्ट दोनों पर अलग प्रभाव छोड़ता है .. और तुमने बखूबी अपनी बात रखी है . बधाई स्वीकार करो

Arvind Mishra ने कहा…

अच्छा है दोनों पक्षों को सामने रख दिया ....वैसे भी दुहरी भूमिका में ही हैं नारी वक्ष!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

किसी भी अंग से रहित होना ,व्यक्तित्व को खंडित कर देता है. पुरुष का भी यही सत्य है जो नारी का.
इस अधूरेपन को जीना संबद्ध व्यक्ति के लिये सचमुच बहुत मुश्किल होता है .आपकी कविता ने उस संवेदना को कुशलता से व्यक्त किया है .

और दूसरी,-पूरक कविता - केवल काया के नहीं अंतर्निहित व्यक्तित्व की महिमा और गरिमा का उद्घोष करती हुई -गहन आश्वस्ति से पूर्ण !
स्नेह और सह-अनुभूतिमय इस मानवीय दृष्टि को नमन !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

दोनों रचनायें अपनी बात कहने में सक्षम .... बहुत गहन ...

लिंक मैं पढ़ चुकी थी पहले ही :)

इमरान अंसारी ने कहा…

राख को घुन....वाह जी वाह ।

रचना ने कहा…

no i dont agree with your view point that if one part of the body is not there a woman ceases to be a woman

read some biograpies of woman who have won over breast cancer

do you know there is a one winner who has got the rules of swimming changed in US because after removal of breast it was painful to wear the swim suits

we all have to rise above the body and think that woman is a woman irrespective of how she looks and

Removing of breast of a cancer patient is merely a operation and nothing more

वन्दना ने कहा…

@ rachana ji
बेशक आपकी बात सही है मगर हर नारी मे वो जज़्बा नही होता रचना जी ………सिर्फ़ कुछ ही ऐसी साहसी नारियाँ होती हैं मगर बाकि की आम नारी के मन पर कैसा प्रभाव पडता है , वो कैसा महसूस करती होगी ये तो शायद वो भी ना बता पाये और ये ही बात आखिर मे मैने भी लिखी है ………और मैने सौन्दर्य के दृष्टिकोण से नही लिखी मैने तो मातृत्व और नारीत्व के दृष्टिकोण से लिखी है क्योंकि वो नारी के शरीर का एक अंग है और वक्ष के अलावा यदि दूसरा कोई भी अंग किसी का भी हटे तो ऐसा ही वो फ़ील करेगा और शायद दूसरा उसे उतना सटीक व्यक्त भी ना कर सके …………बस कुछ संवेदनायें ही हम प्रस्फ़ुटित कर सकते हैं मगर उस गहराई तक नही पहुँच सकते जो एक अंगभंग होने पर महसूस होती हैं ।

रचना ने कहा…

http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/06/blog-post_27.html

i hv put a long post here with back links please read it

वन्दना ने कहा…

@ rachana ji
बीमारी का उपचार तो इंसान करायेगा ही जीवन तो उसने जीना ही है हर हालत मे मगर उसके साथ उसकी भावनायें हमेशा जुडी रहती हैं । क्या किसी भी मनुष्य का कोई अंग कट जाता है बिमारी या किसी और वजह से वो जीना छोड देता है ? नही ना…………मगर उस अंग का पर्याय तो ढूंढता ही है किसी का पैर कट जाता है तो उसे नकली पैर लगाना पड्ता है मगर समाज के लिये नही अपनी जरूरत के लिये मगर वास्तविक अंग के ना होने से जो पीडा वो महसूस करता होगा वो शायद कोई नही समझ सकता और मैने उसी ओर इंगित किया है ना कि मैडिकली कहा है और जीवन मे सम्पूर्णता कौन नही चाहता अधूरेपन के साथ जीना उसकी मजबूरी हो जाता है मगर उसे हम कहें कि तू कभी महसूस ही मत कर तो ऐसा होना संभव नही है कभी ना कभी ख्याल तो उसे जरूर कसक पैदा करेगा ही

आर. अनुराधा ने कहा…

वंदना, मैं नहीं जानती, आपने स्तन कैंसर को कितने करीब से देखा है। लेकिन निश्चित रूप से मैं रचना से सहमत हूं और आपनी कविता (स्त्री पक्ष से) महिलाओं के लिए डीमॉरलाइजिंग है, जबकि पुरुषो को महान बताती है। वास्तविकता निश्चय ही इसके उलट है (अपवाद होंगे शायद)। किसी स्त्री का एक स्तन चला जाए तो वह वात्सल्य, मातृत्व इत्यादि 'सुखों' से वंचित नहीं हो जाती। वह कीमो आदि के बाद भी मां बन सकती है और स्तनपान के लिए दूसरा स्तन होता ही है। वैसे भी कितनी ही स्त्रियां एक बार भी अपनी संतानों को स्तनपान नहीं करवा पातीं, तो क्या वे मां नहीं रहती।

दरअसल मुझे लगता है कि यह सारी समस्या महिमामंडन की, अतिरेक की है। मां का महिमामंडन, फिर इस बीमारी का और उससे होने वाले 'नुकसान' का। क्यों नहीं इसे भी एक बीमारी की तरह देखा जा सकता? इसका भी इलाज है, समस्याएं हैं और इसके साथ भी जीवन है। क्या दूसरी सैकड़ों बीमारियां इसी तरह अनिश्चित भविष्य वाली नहीं होती? क्या सिर्फ इसलिए कि पुरुषों को अपने खेल के 'खिलौने' में कुछ कमी हो गई लगती है, यह बीमारी इतनी बड़ी समस्या बन जाती है?

दरअसल समस्या है, तब, जबकि इस बीमारी की पहचान, जांच, निदान, इलाज से लोग एकदम नावाकिफ हैं, सुविधाएं एकदम कम हैं और इसका खर्च इतना ज्यादा है कि आम आदमी इसके बारे में नहीं सोचना चाहता। क्यों नहीं इन मुद्दों पर भी कोई रचनाकार सोचता और अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति से लोगों को इसके बारे में सचेत, जागरूक बनाता?

वन्दना ने कहा…

@ आर. अनुराधा जी ये एक आम बीमारी होती जा रही है आजकल महिलाओं के बीच और जहाँ तक इसकी भयावहता की बात है वो भी हम सब देखते हैं अपने आस पास ही और देखी भी है …………मैने वात्सल्य और नारीत्व दोनो को साथ लेकर लिखी है ना कि अकेले वात्सल्य पर ………मानती हूँ काम चल जाता है मगर एक अधूरापन जब नारी महसूसती है तो कैसा लगता है उसे मैने उस दृष्टिकोण से लिखा है ना की पुरुष को बडा दिखाने या नारी को नीचा दिखाने के लिये क्योंकि कोई भी नारी हो वो कम से कम अपनी निगाह मे पूर्ण रहना चाहती है इसिलिये नारी के दृष्टिकोण पर कहा भी है कि उसे नही होती परवाह ना समाज की ना पति की भावनाओं की अगर होती है तो अपनी अपूर्णता की जो उसे अन्दर ही अन्दर खोखला करती है फिर चाहे वक्ष हों या दूसरे अंग ………और किसी का भी कोई अंगभंग हो तो वो ऐसा ही महसूसेगा उस भावना को कहने की कोशिश की है ना कि किसी को भी महिमामंडित करने की ……………जहाँ तक आपकी आखिरी बात का सवाल है वो बीमारी के बारे मे है जबकि मैने एक बीमारी से उपजे साइड इफ़ेक्ट के बारे मे लिखा है बस यही फ़र्क है आपके और हमारे दृष्टिकोण मे ।उम्मीद है आप अन्यथा नही लेंगी आपने दूसरे नज़रिये से देखा और मैने दूसरे और दोनो ने अपने अपने पक्ष रख दिये जो कि जरूरी है ताकि कोई कन्फ़्यूज़न ना रहे ।

अदा ने कहा…

आपकी कविता से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ, मातृत्व वक्ष पर टिका हुआ कोई भाव नहीं होता, वह तो हृदय में होता है, और वक्ष का मोहताज़ नहीं होता....वक्ष होते हुए हुए आज कितनी हैं जो वक्षपान करातीं हैं, और अपने मातृत्व को दुलरातीं हैं, कोई उनसे जाकर पूछे जो इस दौर से गुजरतीं हैं, उन्हें अपना वक्ष प्रिय था या प्राण..
एक से एक सुन्दर इन्सान उम्र के साथ बन्दर हो जाता है, वो वक्ष जो प्राण लेने पर उतारू हो उसका नहीं होना ही ठीक है, और अगर इस कमी की वजह से कोई किसी को असुंदर दिखती है, तो देखने वाले के दिमाग का ईलाज होना चाहिए, ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है...देखने वाली नज़र चाहिए...

इस विषय पर अगर किसी को कविता ही लिखनी है तो उस विजय पर कविता लिखे, उस साहस पर कविता लिखे, उस ख़ूबसूरती पर लिखे तो मौत हो हरा कर उन महिलाओं के चेहरे पर नज़र आती है, इसे बिद्रूप, अधूरा बना कर, पेश करने वाले अपने दिमाग़ी दिवालियेपन, और छिछलेपन के सिवा और कुछ नहीं दिखा रहे है...उन महिलाओं से खूबसूरत कोई नहीं, कोई विश्वसुन्दरी भी उनके सामने खड़ी नहीं हो सकती ...और मैं और आप तो उनके क़रीब भी जाने की नहीं सोच सकते..

वन्दना ने कहा…

@ अदा जी मैने अनुराधा जी को जवाब दिया है ऊपर यदि उसके बाद भी आप नही समझीं तो मै कुछ नही कर सकती। सबकी अपनी अपनी सोच होती है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सशक्त और सार्थक प्रस्तुति!

अजय कुमार झा ने कहा…

आपकी पोस्ट पढी ,मन को भाई ,हमने चर्चाई , आकर देख न सकें आप , हाय इत्ते तो नहीं है हरज़ाई , इसी टीप को क्लिकिये और पहुंचिए आज के बुलेटिन पन्ने पर

Shanti Garg ने कहा…

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

vandana ji - the whole poem is cruel ... i personally find it disgusting. just see what all u have written -

"खोखले व्यक्तित्व"
"जिंदा रहना अभिशाप बन. उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अभिशापित कर देता है"
"घुन लग जाता है .."
"जीवित रहने का गुनाह... ????"

gunaah ???

and people up here are saying vaah ji vaah - and treating the woman as just a body ....

the poem conveys that they should rather die than do this "gunaah" of living on and being "adhhoori maa".

are you ready to accept the death of even one such woman who refuses to get operated because of this poem and dies - when she could have lived on? do you know that women have to be persuaded by doctors and family members a lot to let go of their breast? do you know that this poem could be the persuasion on the other side ?

just because you insist that you are a good poetess (which i agree you are) who is representing your imagined feelings ? .... but THIS is not poetry - this is cruelty

the whole focus is on the "breast - the beauty symbol / the feeding device"

- there is NO focus at all on CANCER - which kills. I wish the poem had never been written - or at least that it should be removed now

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

my comment is either in spam or deleted - but think it over vandana ji

वन्दना ने कहा…

@ Er. Shilpa Mehta ji
aap kya jaane ek aurat ke man ki peeda yadi janti to aisa nahi kahtin kyunki aurat sampoornta me jeena chahti hai na ki adhoorepan me beshak bimari hai to uska upchar karana hi padega magar usse aayi kurupta ko bhi aap nakaar nahi sakte aur jab bhi wo khud ko aaine me niharegi ye sirf wo hi mahsoos kar sakti hai kyunki uske astitva par ek prashnchinh ban jata hai uska khud ka adhoora vyaktitva hi magar ye baat aap jaisi mahilayein nahi samajh saktin kyunki aap sab sirf narivadita ka dhol bajana janti hain magar ek nari ke man kee peeda ko nahi samajh saktin beshak ghar pariwar ke liye wo zinda hai apne liye bhi zinda hai magar jab kisi bhi insan ka koi ang kat jata hai to us ang ke katne ki kasak umra bhar use salti hai kabhi kisi se poochiyega andar ki baat tab pata chalega kahna bahut aasan hai aapka hamara magar ham khud par rakhkar sochein to samjhenge ki ek ang katne ka dukh umra bhar salta hai aur jo nari ke jeevan ka mahattapoorna ang ho yadi use hi katna pade to wo kaisa mahsoos karegi ye sirf ek samvedansheel man ji jaan sakta hai wo nahi jo sirf nariwadita ke nare lagate hain ya sirf ek hi drishtikon se dekhte hain yahan nari ko purush ke drishtikon se chinhit nahi kiya na hi samaj ke magar uske man ke kisi kone me upji samvedna darshayi hai jo na jane kitni bar use kachotati hai ye sirf koi bhuktbhogi hi samajh sakta hai ...........aapko bura lage to mafi chahti hun magar ye mera apna drishtikon hai aapka apna isliye sabki soch me fark hota hai aapko accept ho to kijiye accept nahi ho to na kijiye ........bas maine apna paksh rakha hai uske baad bhi aap nahi samajh saktin to main kisi ke liye kuch nahi kar sakti.

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

सच कह रही हैं - मैं आपका दृष्टिकोण नहीं ही समझ सकती | न आप मेरा | फिर भी एक आखिरी प्रयास करती हूँ | आप कैंसर जैसे गंभीर विषय को भी सिर्फ निजी रूप से कविता अच्छी होने के अहंकार का प्रश्न बनाना चाहें , मेरा व्यक्तिगत अपमान कर के मुझे चुप करा कर अपनी सोच को सही दिखाना चाहें - तो यह आपकी मर्जी है | इससे मेरा अपमान नहीं होगा | मेरे लिए बहुत आसान है - यहाँ नहीं आऊँ | आपके लिए भी बहुत आसान है - आप मेरी टिपण्णी डिलीट कर दें |

हाँ पर सोचियेगा ज़रूर - आपकी यह कविता और ऐसे comments किसी स्त्री को इस ओर झुका सकते हैं कि, वह जीवित रह सकती हो इलाज करा कर - फिर भी operation न कराये | इस पर सोचियेगा | हो सके तो डॉक्टर से बात भी कीजियेगा - कि कई केसेज़ में आवश्यक होता है breast निकाला जाना और स्त्रियाँ इसी सोच के चलते नहीं करातीं ऑपरेशन, और मर जाती हैं | मैं जानती हूँ - मैंने खुद डॉक्टर्स से बात की है इस बारे में | सोचिये - she DIES because of this fear of being "अपूर्ण" - think about it .

और हाँ - इस जगह निजी "मेरी" बात बहुत अजीब लगती है - पर आपके कहे शब्दों के कारण कहना आवश्यक लगता है मुझे - मुझे नारीवादी या पुरुषवादी समझना आपकी अपनी सोच और दृष्टिकोण है - मैं सिर्फ और सिर्फ मानवतावादी हूँ | एक बार बहुत पहले मैंने एक ब्लॉग पर लिखा था - जब आप मेरे बारे में कुछ जानती नहीं - तो मेरे बारे में ऐसे निजी आरोप गढ़ने और मढने का आपको कोई अधिकार नहीं है | नारी और पुरुष को अलग अलग वादों में बांधना मेरा काम नहीं, मुझे यह सोच ही गलत लगती है | मेरे लिए नारी और पुरुष दोनों ही मनुष्य हैं - बस | उनके शरीर में कोई अंग है या नहीं, यह उन्हें एक कमतर या अधूरा इन्सान नहीं बनता मेरे लिए | याद करिए - कृष्ण ने कुब्जा को सुंदरी कहा था जब उसे पहली बार देखा था मथुरा में | उन्होंने कहा था कि कुब्जा तुम्हारा शरीर भर है - तुम यह शरीर नहीं हो - तुम सुंदरी हो | आप भी अपने आप को वंदना the poetess न सोच कर एक मनुष्य बन कर सोचिये - क्या यह कविता उसे बदसूरत शरीर नहीं कह रहा सुन्दर मनुष्य की जगह ? मुझे नारीवादी आदि कह कर मुझ पर व्यंग्य करने ओर चोट पहुँचाने के बजाय - उस स्त्री के बारे में सोचिये जो शायद जान से हाथ धो सकती है इस "अपूर्णता" के डर के चलते | this discussion is not about you or me , it is about cancer - not about the breast - But about the killer disease .

कैंसर के पेशेंट्स / उनके इलाज में आने वाली इन झिझकों के कारण होने वाली परेशानियों के बारे में जानना चाहें - तो एक बार किसी गाय्नोकोलोजिस्ट से पूछ देखें | बहुत कुछ पता चलेगा | सिर्फ breast ही नहीं - युटेरस का भी कैंसर होता है - जिसमे वह निकालना पड़ता है - ओर वह स्त्री माँ बन ही नहीं सकती उसके बाद | तो अधूरी होने के डर से वह मर जाए ? मैं हवा में बात नहीं कर रही - मैं जानती हूँ, डोक्टर्स से बात करती हूँ इस बारे में सोशल वर्क के सिलसिले में |

Shah Nawaz ने कहा…

वाकई बहुत मुश्किल है ऐसे पलों को महसूस करना... आज चिकित्सा जगत ने इतनी तरक्की कर ली है पर केंसर जैसे मर्ज़ का इलाज़ फिर भी बहुत मुश्किल है... केंसर के मरीजों को सबसे अधिक अपनों के प्यार और मर्ज़ से लड़ने के झुझारुपन की आवश्यकता होती है...

आपने एक ब्रेस्ट केंसर पीड़ित की अहसासों का खाका खींचा है.... जिसे पढकर पीड़ितों के मन की पीड़ा को महसूस करता गया....

आपने एक पक्ष रखा और रचना जी ने दूसरा.... मेरे विचार से आपकी कविता और उनका विचार... दोनों अपनी जगह सही हैं...

वन्दना ने कहा…

Er. Shilpa Mehta जी आप अब भी मेरा दृष्टिकोण नही समझीं और लगता है आप समझना भी नही चाहतीं अगर समझना चाहतीं तो जो इतने कमेंट मैने किये है उसे समझने की कोशिश करतीं मैने कहीं नही कहा कि वो इलाज ना कराये बल्कि मैने कहा है वो मौत से आंख मिलाकर आतीहै क्या इसमे आपको नही दिखा कि मैने उसके जीवट की प्रशंसा की है मै तो खुद नही चाहती कि कोई भी बिना इलाज कराये हार मान जाये अरे बीमारी का इलाज जरूरी है तो कराया ही जायेगा फिर चाहे उसके लिये कोई भी कुर्बानी देनी पडे मगर मेरी सोच मे थोडा फ़र्क उसकी उन कोमल भावनाओं को लेकर है जहाँ वो कहाँ तो एक सम्पूर्णता के साथ जीती है और कहाँ जब एक अंग के हट जाने पर कभी भी जीवन मे खुद को आईने मे देखती है तो कैसा महसूस करती है जो वो किसी से नही कहती न किसी को महसूस होने देती ये इल्म भी नारी के पास ही होता है कि वो अपनी भावनायें किसी पर जाहिर ना होने दें लेकिन अन्दर ही अन्दर उसे वो कितना कचोटता होगा ये शायद कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है और ये सिर्फ़ एक नारी के लिये नही सारी मानव जाति पर लागू होता है आप ही सोचिये किसी का पैर कट जाये तो विकल्प के रूप मे वो नकली पैर लगाता है ठीक है सारा दिन अपने सारे कार्य करता है लेकिन रात को बिस्तर पर जाते वक्त जब वो उसे हटाता होगा और अपने उस अंग को देखता होगा तो क्या आप कह सकती हैं कि वो कुछ भी मह्सूस नही करता होगा शिल्पा जी आप और हम सोच भी नही सकते कि वो कैसा महसूस करता होगा अपने ही अंग को ना पाकर …………मेरे दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करेंगी तो जरूर समझेंगी क्योंकि आप भी नारी हैं और नारी हर समय स्ट्रांग बनकर ही नही रह पाती कभी कभी वो भी बिखरती है और मैने उन्ही बिखरे हुये क्षणों को पिरोया है ना कि चिकित्सा या बीमारी से मूंह मोडा है या उसकी भयावहता को नही जानती ………जानती हूं , समझती हूं तभी अपने तरीके से कहने की कोशिश की है जहाँ तक कविता या नाम की बात है तो ऐसा मेरा कोई आशय नही है और ना कभी था और ना होगा ………ये मैने भी उस विमर्श को पढने के बाद जो महसूसा वो लिखा आपको जो लगा आपने कहा इसमे कोई बुराई नही स्वस्थ विमर्श करने के लिये लेकिन आप ये कहें कि अपनी कविता का अहंकार है मुझे तो वो गलत है ये तो सरासर आरोप हुआ जबकि स्वस्थ विमर्श मे अपना अपना पक्ष रखा जाता है अब देखिये मै ने तो आपके दृष्टिकोण को भी समझा है और माना भी है क्योंकि मै खुद उसकी पक्षधर हूँ मगर मेरा नारीमन दूसरा पहलू भी सोचता है तो मैने वो रखा है जो आप स्वीकार नही कर पा रहीं कोई बात नही सब हर बात से सहमत हों जरूरी तो नही ना ……मुझे ना पहले शिकायत थी न अब है। दूसरी बात कुब्जा की ………आज कृष्ण नही मिलते शिल्पा जी ये आप भी जानती है और मै भी ………अगर एक सच कहूँ तो ये विमर्श दूसरी दिशा मे मुड जायेगा इसलिये वो छोड रही हूँ फिर कभी उस पर बात करेंगे। दूसरी बात मैने ना पहले आपका कमेंट हटाया ना अब स्पैम मे था वहाँ से पब्लिश किया है इसलिये इतना विश्वास रखिये कि आपके कमेंट पब्लिश जरूर होंगे चाहे आप कितना भी तीखा लिखें या मीठा :)))मैने भी हवा मे कुछ कहने की कोशिश नही की है यूटरस की समस्या से पूरी तरह वाकिफ़ हूँ।

Er. Shilpa Mehta ने कहा…

वंदना जी , पहली बात तो यह कि यह टिपण्णी न प्रकाशित करें | न मेरे पास आपकी मेल आय डी है, न ही मैं यहाँ ब्लॉग जागत में मेल आय डी शेयर करना चाहती हूँ, इसलिए यह बातें टिपण्णी खिड़की में लिखनी पड़ रही हैं | आप कृपया इस टिपण्णी को न छापें, क्योंकि इनका उद्देश्य आपका सार्वजनिक विरोध नहीं, बल्कि एक इंसान होने के नाते एक इन्सान का इंसान को समझाने का प्रयास भर है - कि वह ऐसी कोई भूल न करे - जो आगे किसी और का कोई बहुत बड़ा नुक्सान कर सकती है | बाकी आप खुद ही बहुत समझदार हैं - तो बस |

१.
मैं यह नहीं कह रही की आपने चाहा या कहा कि कोई इलाज़ न कराये,
मैंने यह कहा की
इस कविता को पढ़ कर किसी एक भी, मरीज़ का इरादा बदल सकता है - और हो सकता है वह इलाज न कराये (जो बिलकुल boundary लाइन पर हैं और दोनों तरफ झुक सकती हैं - जिस तरफ वजन ज्यादा मिले ) (सिर्फ एक - सिर्फ एक मौत) -यह एक बहुत बड़ा बोझ है , जो कोई भी नहीं उठाना चाहेगा, न आप , न मैं | आप नहीं कह रहीं हैं, आप नहीं चाह रहीं हैं, आप उसका दर्द एक्सप्रेस कर रही हैं - ये सब ठीक है - परन्तु यह भी तो हो सकता है न ? आप यह बोझ उठा सकेंगी ?
२.
दूसरी बात, मैंने आपको अहंकारी नहीं कहा, मैंने कहा इस कैंसर जैसे विषय को - कैंसर जो जान लेवा है - अहंकार से न जुड़ने दें | यह जो आपने मुझे नारीवादी आदि कहा (जो कि आप नहीं जानती कि मैं हूँ या नहीं, परन्तु मैं ऊपर कह चुकी हूँ कि मैं सिर्फ मानवता वादी हूँ - नारीवादी नहीं)- यह और किस वजह से कहा ? अहंकार कब हमें किस बात के निमित्त जकड लेता है, हम जान भी नहीं पाते | हम दोनों ही बस मनुष्य भर हैं | बड़े बड़े ऋषि मुनि नहीं बचे इससे - आप और मैं क्या हैं |
३.
यहाँ टोपिक न आप हैं न मैं | टोपिक ब्रेस्ट भी नहीं है, यूट्रस भी नहीं, टांग भी नहीं हाथ भी नहीं | टोपिक है कैंसर | जो जानलेवा हो सकता है | मैं आपसे फिर रिक्वेस्ट कर रही हूँ - किसी एक संभावित पेशेंट के बारे में सोचिये, प्लीज़ रीथिंक विद अ कूल माइंड - शायद आप यह पोस्ट हटा लें |
४.
कृष्ण को अलग करके मैं यह डिस्कशन कर ही नहीं सकती |

- अब बाय |

सुनीता शानू ने कहा…

मैने अभी-अभी आपके द्वारा दिया गया लिंख पढ़ा। सचमुच शालिनी माथुर के लेख ने अंदर तक हिला दिया।
आपकी कवितायें दोनो ही अपनी जगह सही हैं। आपने नारी मन में उठते हुए भावो को बड़ी सावधानी से उकेरा है। दूसरी तरफ़ पुरुष द्वारा नारी की पीड़ा को समझ कर उसे समझाना की प्रक्रिया भी काबिले तारीफ़ है। आप इसमे काफ़ी हद तक सफल भी हुई हैं।

सुनीता शानू ने कहा…

...........

स्वप्नदर्शी ने कहा…

फिलहाल मैं जो कहना चाहती थी, अदा ने और अनुराधा ने पहले ही कह दिया है. उनके साथ मेरी सहमति है. ऎसी कवितायें पढ़कर निराशा हुयी. शालिनी ने अपना लेख जिस तेज और समझदारी से लिखा उसकी में प्रशंसक हूँ, पर फिर कितनों को उसकी बात समझ में आयी, और कितनों ने उसे समझने की कोशिश की ये अपने आप में बड़ा सवाल है. अगर सच में वंदना जी ने शालिनी के लेख का मर्म समझा होता, तो संभवत: ऎसी विद्रूप कवितायी प्रतिक्रिया नहीं करती. शालिनी की प्रतिक्रिया इन कविताओं पर भी लागू होती है...

Kavita Vachaknavee ने कहा…

मेरे ब्लॉग का लिंक इस पोस्ट में सबसे पहले दिया गया है और वंदना जी द्वारा मेरी उक्त ब्लॉगपोस्ट पर इन कविताओं की सूचना देने के कारण मेरा यहाँ यह लिखना आवश्यक हो जाता है कि शालिनी ने जिस विद्रूप और विसंगति की धज्जियाँ उड़ाई हैं, वह यहाँ भी विद्यमान है। अतः "व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि"( http://streevimarsh.blogspot.co.uk/2012/06/blog-post.html)यहाँ भी लागू होती है।

Onkar ने कहा…

सोचने पर मजबूर करती कविता

Dr. shyam gupta ने कहा…

------बहुत ही सुन्दर व यथार्थ कविता लिखी गयी है...
----वस्तुतः जो सिर्फ नारी--नारी चिल्लाने वाली एकांगी-दृष्टि वाली नारियाँ है...उनहोंने कविता के अर्थ व मर्म को समझा ही नहीं, इसीलिये व्यर्थ की चिल्लाहट है... ....
---वन्दना ने दोनों पक्षों के मानसिक-आत्मिक पक्ष को बखूबी रखा है....कविता में यह कहीं भी नहीं कहा है कि केंसर का इलाज़ नहीं कराना चाहिए ...अपितु एक वास्तविक मनोस्थिति रखी है जो एक दम सत्य है...
--- भावार्थ यही है कि निश्चय ही शारीरिक कमियां जीवन को व मानसिकता को( स्त्रियों की स्वयं की अधिक)प्रभावित करतीं हैं परन्तु सच्चा प्रेम इन सब कारणों से प्रभावित नहीं होना चाहिए......
---किसी भी भाव-व्यवहार को यूंही भावुकता में जानने/ पढ़ लेने की बजाय वस्तुस्थिति को पूर्णरूपेण तार्किक-भाव से यथास्थिति में समझ कर व्यवहार करना अधिक उचित होता है...खासकर ...पति-पत्नी जैसे आत्मीय संबंधों में...

वाणी गीत ने कहा…

अब जाकर पढ़ पाई यह कविता ...
शरीर के किसी भी अंग के व्याधिग्रस्त होने पर तकलीफ स्वाभाविक है , और इससे आपके मन में जो भाव उपजे , उन्हें आपने कविता में उतारा . किसी भी विषय पर दृष्टिकोण में भिन्नता हो सकती है .
एक परिचित को जानती हूँ जो अभी इसी बीमारी के उपचार से गुजर रही हैं , तकलीफदेह थेरेपी के बावजूद जीवन के प्रति उनका उत्साह और उनके पति का सहयोग देख कर बहुत अच्छा लगता है . इन समस्याओं से गुजर रही महिलाएं यदि लिखेंगी तो हौसले से जुड़ा हुआ ही लिखेंगी , मगर आपने भिन्न मनोस्थिति पर लिखा , यह आपकी अपनी रचनात्मकता है .

mukesh ojha ने कहा…

Ek behad samvedan sheel aur vicharpurna lekh par ek behad na samajh tippani. Shalini Ka lekh baut pathaneeya hai. Us ko padh kar itni chhichhali kavita likh kar Vandana ne dikhaya hai ki ve lekh ka marm nahin samajh sakin. Vaha lekh stree ke chitran ke vishay mein hai cancer par nahin.

Vandana ji aap to badi utawali mein hain, Anamika ki tarah.

Dr. Mukesh Kuamr Ojha

वन्दना ने कहा…

पता नही सबने क्या क्या अर्थ निकाले और सबके अपने दृष्टिकोण थे जो स्वीकार्य हैं क्योंकि मै किसी को नकारती नही जानती हूँ सोच की दृष्टि बेहद विस्तृत होती है मगर उसके साथ साथ एक दृष्टि और होती है ……दर्द की , पीडा को महसूसने की और मैने हमेशा किसी भी पीडा को महसूसा है तभीकुछ लिखा है बिना महसूसे कभी लिख ही नही पाती और जब मुझे लगा कि शायद जिस पर ऐसीगुजरती होगी या यदि उसकी जगह मै होउंगी तो कैसा महसूसूँगी तब जाकर ये लिख पायी जबकि इससे पहले इस व्याधि के मरीज तो देखे हैं अपने आस पास ही मगर इस पर कभी कुछ पढा नही था मगर जब कुछ लोगों ने कुछ आपत्ति जताई तो पढा भी तो जाना जो मैने महसूस कर लिखा वो समस्या तो सिर उठाती है हर नारी के जीवन मे जो भी इस व्याधि से ग्रसित होती है और कम से कम उनके तो जरूर जो 30-40 साल की होती हैं और जिन्हे इस व्याधि की वजह से अपने एक या दोनो ही वक्ष गंवाने पडते हैं और उसकी वजह से उनका मासिक भी बंद हो जाता है काफ़ी सालों के लिये और यदि ऐसे मे किसी महिला को फिर से मासिक धर्म हो ही ना तो वो तो वंचित ही रह जायेगी ना उम्र भर वात्सल्य सुख के लिये या अपने पूर्ण नारित्व के लिये ………बस उसके उस दुख को, उस कसक को कहा है ना कि कैंसर जैसी व्याधि पर लिखा है ना ही नारी पर बल्कि उसकी पीडा पर लिखा है और जरूरी तो नही ना हर कोई पीडा को महसूसे ही दूसरे की ………दूसरी बात हौसला अफ़ज़ाई तो मै भी करूँगी यदि कोई भी मरीज हो आखिर ज़िन्दगी एक बार मिलती है और उसे पूरा जीना चाहिये । और यही वो सभी काउन्सलर्स करते हैं उन मरीजो के साथ जो इस बीमारी से अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं और करना भी चाहिये ये तो मानवता का जरूरी अंग है …………मगर जो मैने लिखा है वो भी एक बार जरूर महसूस करती है नारी जो इस समस्या से ग्रसित होती है तो क्या उसके दर्द को बयाँ करना गुनाह है ? ना मैने उसकी हँसी उडाई है और ना ही पोर्न है इसमे ………सिर्फ़ एक दूसरा दृष्टिकोण है उसके दर्द को महसूसने का , उसकी पीडा को कुछ शब्दों मे बयाँ करने का …………वो भी शायद इसलिये इस दृष्टिकोण से लिखा गया क्योंकि मै ज्यादातर दर्द ही लिखती हूँ या कहिये दर्द ही महसूसती हूँ । बाकि मुझे किसी से आपत्ति नहीं क्योंकि सबके महसूसने की अपनी अपनी शक्ति होती है। मैने तो उस एक क्षण को कहने की कोशिश की जिसे शायद जानते तो सभी हैं बस स्वीकार नही करना चाहते । वरना ना तो मै नारी के खिलाफ़ हूँ ना मानवता के और ना ही ऐसा है कि मुझे व्याधि की विकटता का ना पता हो…………आप सबका हार्दिक आभार अपने अपने तरीके से अपने विचार रखे। अब आखिर मे मै कुछ वो तथ्य लगा रही हूँ जो सबकी बातचीत के बाद मैने गूगल पर जाकर पढे और तब पता चला कि जो मैने महसूसा वो भी कहीं से गलत नही है।

वन्दना ने कहा…

लीजिये पढिये अब ये भी तब शायद आप समझ सकें मेरी बात भी


Breast cancer treatment, early menopause and pregnancy

Breast cancer treatment is generally the same, regardless of age, depending on the extent of the disease and the woman’s general overall health, but side effects can be drastically different for younger women. One significant consequence is premature menopause caused by certain chemotherapies and hormone-blocking medications. This is a tough pill to swallow for young women who look forward to future pregnancies. Coping with hot flashes, reduced libido and other menopausal symptoms, many women feel they are sacrificing their youth and fertility to treat their cancer.

What makes each of these patient characteristics a risk factor for psychosocial distress after breast cancer?
• Younger Age—Most breast cancer occurs in women older than 50 years (about 75% of cases). Thus, for women in their 30s and 40s who are diagnosed with breast cancer, this is a relatively uncommon event, and certainly one that is not expected. In addition, breast cancer in younger women is often temporally related to a recent pregnancy or may occur during pregnancy, and thus, these women often have small children to care for at the same time that they must deal with a life-threatening disease. For younger women who have not already had their children, the diagnosis and treatment of breast cancer leads to the specter of death, the likelihood of infertility as a result of treatments, and the symptomatic burden of premature menopause, in addition to the acute toxicities of chemotherapy treatments.
All of these medical factors contribute to the risk of greater psychological distress in these younger women. Moreover, for women who do not have a spouse or intimate partner, there may be heightened concerns about future potential for such a relationship after a breast cancer diagnosis. Finally, for younger women this is often the first encounter with the health-care system (other than childbirth or minor health conditions), and this adds considerable distress. In contrast, older women may have had other medical conditions or operations, or may have cared for loved ones with cancer, thus blunting some of the initial distress with having to face a new illness.

वन्दना ने कहा…

Breast Cancer and Body Image

Breast cancer does not just lead to mastectomyscars. Radiation can lead to redness and soreness on the affected area, and chemotherapy often causes hair loss and weight gain. Experiencing these types of body changes can be especially challenging for younger women, as research has shown that these women tend to be bothered more by these changes than women over 67.

It can be difficult to express the sense that one's body has betrayed her or that the loss of one or both breasts can feel like an end to being female. A woman dealing with the effects of breast cancer may begin to avoid intimacy, dress alone or in the dark or even limit bathing. These behaviors are common but should lessen and improve with time. If you or a loved one needs help coping with body image issues, talk to a physician, support group or trusted counselor.



There are countless medical studies of the psychological benefits of reconstructive surgery. Some studies report that women who chose reconstruction surgery experience a healthier body image than women who do not; however, other studies indicate that women who select reconstructive surgery have higher anxiety about breast loss than women who do not choose to undergo this surgery.

It is important to have realistic expectations regarding the breast reconstruction. Some women are disappointed when their reconstructed breasts do not look like their original breasts. It is also important to remember that breast reconstruction can involve multiple surgeries over a period of several months. These surgeries can include a procedure to create an artificial nipple, if desired. Cancer experts do not recommend saving the nipple from the cancerous breast, because cancer cells can remain in the nipple tissue.

Caution: Immediate reconstruction is actually not an option for the majority of women. Since a reconstructed breast may not heal well if further radiation or adjunct chemotherapy is required, reconstruction can end up being a problematic mistake. Overall, this can make the jobs of other physicians following up on the procedure very difficult. As such, other members of a patient's care team must sign off before the procedure can take place.

When treatment ends, your body is different, and your hormone levels may be low due to estrogen suppressors (such as Tamoxifen) or aromatase inhibitors (such as Aromasin). Your libido (sex drive) may be very low, or you may have vaginal dryness. If you have lost a breast or part of a breast, and have surgical scars, you may feel concerned about a loss of attractiveness. Physical sensation in your breast area will be reduced because nerves and tissue have been interrupted and removed. Sex and intimacy will not be same as it was before breast cancer.

One of the less well-known side-effects of chemotherapy is to cause premature menopause.
This means that periods are likely to stop at a much earlier age if you have had this type of treatment.

Kavita Vachaknavee ने कहा…

29 जून को की गई मेरी टिप्पणी गायब कैसे है यहाँ से ?

वन्दना ने कहा…

सबकी टिप्पणियाँ हैं यहाँ स्पैम मे थी जो देखी नही थी सब पब्लिश कर दी हैं।

Rakesh Kumar ने कहा…

आपने एक आम पीड़ित महिला के दर्द को बहुत अच्छे से व्यक्त किया है जिसे की अपने वक्ष से ही अपना अस्तित्व नजर आता है.इसका मतलब यह नही है कि ऐसी विषादग्रस्त महिला को विषादग्रस्त ही रहने दिया जाए.
ऐसे में उसका जीवन साथी उसका हौंसला बढ़ा कर यदि
उसका साथ निभाता है तो इसमें क्या बुराई है.आपकी प्रस्तुति के ये शब्द बहुत ही प्रेरक लगे

' नहीं प्रिये .........नहीं जानती हो ये सिर्फ मन का भरम होता है रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए प्रेम का अमृत ही काफी होता है जहाँ प्रेम होता है वासना नहीं वहाँ फिर कोई स्थान ना रिक्त दिखता है क्योंकि यथार्थ से तो अभी वास्ता पड़ता है '

हर लेखन को किसी भी दृष्टि से देखा जा सकता है.यदि कोई बात अच्छी नही लगती है या समझ नही आती तो इसका मतलब यह नही की लेखक की भावनाओं को ही आहत किया जाए.
कैंसर के आपरेशन के खिलाफ मैं समझता हूँ वंदना जी कदापि भी नही हैं.

Kusum Thakur ने कहा…

कविता या आलेख कवि वा रचनाकार के ह्रदय से निकले उस समय में उपजे भाव होते हैं इसका मतलब यह नहीं होता कि वह रचनाकार किसी विशेष जाति या तबका के लोगों के पक्ष में या विपक्ष में है. जरूरी नहीं कि रचना सबको खुश करने के लिए हो या सबकी सोच से मिलती जुलती हो. ....... बहुत ही मार्मिक एवम यथार्थपूर्ण रचना. आपने पीड़ित स्त्री के मनोभावों का चित्रण बखूबी किया है.