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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

ओह ! मेरी तिलस्मी मोहब्बत ढूँढ सको तो ढूँढ लेना कोई ऐयार बनकर ............

सुना था
जो चले जाते हैं
वापस नहीं आते
मगर जो कभी गए ही नहीं
वजूद पर अहसास बन कर तारी रहे
अब रोज उनके साथ
सुबह की चाय
सूरज की पहली किरण
पंछियों की चहचहाट
और एक खुशनुमा सुबह
का आगाज़ होता है
और दोपहर की
गुनगुनी धूप में
एक टुकड़ा मेरी खिड़की पर
रुक जाता है .........
उस टुकड़े में परछाइयाँ नहीं होतीं
लपेट लेती हूँ उसे
तेरे वजूद के इर्द गिर्द
और फिर सांझ ढले
सुरमई लालिमा का
एक टुकड़ा
जब तेरी हँसी सा खिलखिलाता है
रुक जाती है साँझ भी
मेरी दहलीज पर ........इंतज़ार बनकर
तो कभी एक ख्वाब बनकर
तो कभी एक अहसास बनकर
तो कभी एक हकीकत बनकर
और मैं
ढूंढती नहीं कुछ भी उसमे
सिर्फ सहेजती हूँ हर पल को
सहेजती हूँ तेरे दिए
हर लम्हे की बेजुबान कड़ियों को
कहीं ज़माने की नज़र ना लग जाए
लगा देती हूँ .........मोहब्बत का टीका
और ढांप देती हूँ
मन के किवाड़ ............रात होने तक
और फिर
रात्रि की नीरव शांति में
निकालती हूँ तुम्हारी खामोश नज़र को
लो देख लो चाँद को
कर लो दीदार
भीग लो इसकी चाँदनी में
फिर ना कहना ..........बहुत इंतजार करवाया
और समेट लेती हूँ
तुम्हारी नज़र से गिरती ओस को
तुम्हारी नज़र के स्पर्श को
तुम्हारे अनकहे वक्तव्य को
तो बताओ तो ज़रा
तुम कहाँ हो मुझसे जुदा
हर पल , हर लम्हा
तेरा ही वजूद लिपटा होता है
मेरे साये से
और मैं खुद को ढूंढती हूँ
कभी चाय के प्याले में
कभी सुबह की ओस में
कभी दोपहर की धूप में
तो कभी सांझ की लालिमा में
क्या तुम्हें मिली मैं ?
कहीं किसी जन्म की हसरत बनकर
या किसी रांझे की हीर बनकर
या तुम्हारी नज़र का स्पर्श बनकर
ओह ! मेरी तिलस्मी मोहब्बत
ढूँढ सको तो ढूँढ लेना कोई ऐयार बनकर ............
जानते हो ना ………दीवानगियों के नाम नही हुआ करते

रविवार, 22 जुलाई 2012

प्रेमांजलि ……एक महक



साहित्य प्रेमी संघ के तत्वाधान में "ह्रदय तारों का स्पंदन " एक प्रेमांजलि काव्य संग्रह है जहाँ प्रेम की प्रचुरता है . प्रेम जो अखंड बहता अंतर्नाद है फिर चाहे प्रेम का स्वरुप कोई भी हो ---- चाहे मीरा का हो या राधा का , चाहे माँ का हो या बेटे का , चाहे प्रकृति का हो या पुरुष का . प्रेम एक सतत बहता दरिया है जो दर्द की गागर में जितनी डुबकी लगाता है उतना ही निखरता जाता है यहाँ अभिव्यक्ति को शब्दों की जरूरत नहीं होती सिर्फ ह्रदय तरंगों पर स्पंदनों के माध्यम से संदेशों का आदान - प्रदान हो जाता है , भावनाएं अभिव्यक्त हो जाती हैं और निराकार साकार हो जाता है ...........ये होती है प्रेम की दिव्य , अलौकिक शक्ति . और इसी शक्ति के कुछ सुमन इस काव्यमयी माला में गूंथे गए हैं जो आपके समक्ष हैं.यूँ तो यहाँ काफी खूबसूरत सुमन हैं मगर मैंने कुछ सुमन चुने हैं तो इसका ये मतलब नहीं बाकी में कोई कमी है बल्कि मेरी क्षमता ही इतनी है और फिर कुछ आपके पढने के लिए भी तो बचना चाहिए ना ..........

ललित शर्मा की "माँ, पत्नी और बेटी " कविता ज़िन्दगी के हर आयाम को छूती प्रेम के तीन रूपों का निरूपण करती है साथ ही तीनों की महत्ता को दर्शाती कविता बताती ही कि एक बेटी के आने के बाद कैसे ज़िन्दगी में ठहराव आता है तभी तो कवि ह्रदय कह उठाता है


आज तेरे आने से मेरे जीवन में
कुछ स्थिरता बनी है
इन दो धुरियों के बीच
एक पुल का निर्माण हुआ है
क्योंकि तुम तीनों हो मेरी
जनक -नियंता और विधायिका

अर्चना चाव जी "मन की उड़ान " के माध्यम से अपने विचारों को  परवाज दे रही हैं और तुलसी हो जाना चाहती हैं ........तुलसी हो जाना नारी मन के भावों की पराकाष्ठा ही तो है

मन एक उन कटे पंखों से
जिन्हें क़तर दिया था मैंने कभी
मैं उड़ना चाहती हूँ आज

अनुलाता राज नायर की कविता "जिक्र" मन के तारों को छूकर स्पंदित कर देती हैं और प्रेम में वियोग के क्षणों को कितनी कोमलता से निरुपित  करती है

अपनी एक पुरानी डायरी मिल गयी मुझे आज
याद आया जिस सफ़हे पर जिक्र होता तुम्हारा
उसे मोड़ दिया करती थी मैं
मगर ये क्या
हर सफहा ही मुड़ा पाया

फिर ख्याल आया उस रोज का
जब तुम चल दिए थे
ना जाने क्या कहकर
या शायद कुछ कहा भी ना था
मगर वो मुड़ा पन्ना दिखा नहीं मुझे
शायद नहीं किया होगा मैंने , तेरे चले जाने का जिक्र..........

आह! प्रेम जो ना करवाए कम ही तो है

 हेमंत कुमार दुबे के भाव जीवन संगिनी को समर्पित जीवन संगिनी की महत्ता को दर्शाते हैं जो आज के हर इन्सान में होना निहायत जरूरी है

कोई कोना कोई जगह ऐसी नहीं
जो भर ना सके तुम्हारे प्रेम से
समुन्दरों की लहरों को भी
शांत कर सकती है
तुम्हारी प्रेम भक्ति

प्रेम की शक्ति कितनी गहन होती है इसका दिग्दर्शन कराती "जीवन संगिनी " कविता नारी के गौरव को ना केवल बढाती है बल्कि उसके मान सम्मान और उसकी अहमियत भी दर्शाती है .

प्रदीप तिवारी की कविता " मेरा बेटा" आज के निर्मोही संबंधों का दिग्दर्शन कराती है साथ ही प्रेम कब और कैसे बोझ में तब्दील हो जाता है इसका बेहद मार्मिक चित्रण है

जब वो छोटा बच्चा थ
बड़ा होने को तड़पता था

आज अब वो बड़ा हो गया
दुनियादारी जान गया वो
मैंने उसका भार उठाया
मुझे भी भार मन गया वो
बुढ़ापे में उम्मीद थी उससे
पर जीते जी मुझे मार गया वो

स्वाती वल्लभा राज की "तकिये गीले हैं " एक संवेदनशील मन की कोमल सी अभिव्यक्ति है

अश्रु  क्या हैं
मन मंदिर में टूटे हुए
सपनो की छवि
वास्तविकता के  पटल पे
जो बनते और बिगड़ते हैं

अर्चना नायडू की " अमर प्रेम की अतृप्त बूँद " प्रेम के  विभिन्न रूपों को जीती ,सांस लेती रचना अतृप्ति के अहसास को बेहद संजीदगी से उकेरती है

प्रेम है अँधा, जानकर बन गयी मैं, सूरदास
पर दृष्टिहीन मैं, उसे ना देख सकी

प्रेम है निशब्द -शब्द ,रचकर, तुलसी के दोहे
शब्दहीन ....मैं उसे ना जान सकी

प्रेम को अटल सत्य मान, गौतम बनकर
उसके शाश्वत सत्य को ना पहचान सकी

नीरज द्विवेदी की "प्रेमी ज़माना होता" वर्तमान के हालातों और इंसानियत का जिक्र करती कविता सोचने को मजबूर करती है

पेड़ मुस्लिम हैं ना हिन्दू हैं
अब भी जंगले में रहता
पशु पक्षी और मौसम को
जीवन का दान ही करता

क्या करें सभ्यता का अब
जब सभ्य सभ्य से लड़ता
अधनंगा जब आदि मनुज
बस यहाँ शांति से रहता
ना होता कोई कत्लेआम
बस प्रेमी ज़माना होता

रागिनी मिश्रा की "स्पर्श"  दिल को स्पर्श करती बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति है जो स्पर्श की भावना को चाँद शब्दों में अभिव्यक्त करने में सक्षम हुई है

स्पर्श
कौन सा प्रथम ?
मन का या
तन का ?
 
ये तो नहीं जानती
पर
जो
छू जाए
वही .....
प्रथम
अंतिम
जीवन पर्यंत
और
मरणोपरांत भी

राजेश कुमारी की " कोई नाम लिखो" मोहब्बत की एक जीती जगती मिसाल है . जो चले गए उसी के गम में ना ज़िन्दगी को रुसवा किया जाए और मोहब्बत ही उसे उसके लिए प्रेरित करे ......वो ही तो वास्तविक मोहब्बत होती है

देखो आज भी उस पत्थर पर
जिसके नीचे मैं सोयी हूँ
लिख रहे हो रंगहीन आँसुओं से
मेरा नाम
तुम कहते हो की
तुम्हारे रंग खो गया हैं कहीं
मेरी गुजारिश है तुमसे
की आज से तुम अपने दिल पर
कोई नया नाम लिखो
धीरे धीरे खोये रंग भी लौट आयेंगे
और मेरी रूह को चैन भी मिल जायेगा

 सुध्मा आहुति की "तुम्हारे लिए वो प्यार है " एक अलग ही अंदाज़ में प्रस्तुत शिकायत सी है जो शिकायत भी नहीं है शायद प्रेम की ही एक अनुभूति है

होंगी तुम्हारे लिए मेरी कवितायेँ
कागज़ में लिखी चाँद पंक्तियाँ
मेरे लिए यह मेरी धडकनें हैं
सिर्फ तुम ही नहीं सुन पाते हो
वरना सभी को हर पंक्ति में
मेरी धडकनें सुनाई देती हैं

तो दूसरी कविता "मैं खामोश रहूंगी " ख़ामोशी की जुबाँ को व्यक्त करती शानदार अभिव्यक्ति है

इस बार सिर्फ खामोश रहूंगी
क्योंकि , मैं जान गयी हूँ
ख़ामोशी ही अब तुमसे मुझको अभिव्यक्त करेगी
ख़ामोशी ही मेरे शब्दों के बोझ से तुमको मुक्त करेगी
इस बार नहीं कहूँगी ......
मैं खामोश रहूंगी .........

सीमा गुप्ता की "मृगतृष्णा" इस शब्द को सार्थक करती एक खूबसूरत रचना है

कैसी ये मृगतृष्णा मेरी
ढूँढा तुमको तकदीरों में
चंदा की सब तहरीरों में
हाथों की धुंधली लकीरों में
मौजूद हो तुम मौजूद हो तुम
इन आँखों की तस्वीरों में

रोशी अग्रवाल की " मधुमास" वास्तव में मधुमास के अर्थ को बताती एक सार्थक अभिव्यक्ति है

प्यार का रंग भी होता है बड़ा अद्भुत और नवीन
एक दूसरे को स्व -समर्पण,साथी को आत्मसात करना ही है प्यार
बदल जाता है इस फलसफे से ही जीवन का हर रंग और ढंग

लक्ष्मी नारायण लहरे की "सुरमई सुबह" एक मधुर मुस्कान चेहरे पर अंकित कर देती है और बताती है कि जब जीवन में किसी मासूम मुस्कान का आगमन हो जाता है तो कैसे जीवन बदल जाता है



 मेरा नन्हा यज्ञेय
हँसते हुए .........
किलकारी ले रहा था
वह सुबह मेरे जीवन की
नयी जंग बन गयी
चेहरे पर मुस्कान थी पर
जिम्मेदारी की इक ...........नयी आगाज़ बन गयी

रेखा श्रीवास्तव ने "बाती का दर्द" के माध्यम से आज नर और मादा के फर्क के साथ मादा के महत्त्व को जिस खूबसूरती से पिरोया है वो काबिल-ए-तारीफ है . बाती को बिम्ब बना भविष्य के खतरे के प्रति सचेत किया है

ये पुल्लिंग की आखिरी खेप
फिर धारा पर
कोई सृष्टि ना होगी
क्योंकि गर्भ ही ना होगा
तो कौन गर्भवती और कैसा प्रजनन ?

और अंत में सत्यम की " तू साथ मेरे " अलौकिक प्रीत का प्रतिबिम्ब है

आ जा ना आ जा ना
एक बार इधर भी आ जाना
जो तेरे दरस को तरसे हैं सदियों से
उन नैनों की प्यास बुझा जाना
मन की धरती पर आज प्रभु
हरियाली बन कर छा जाना

और साथियों इसी संग्रह में मेरी भी निम्न पांच कवितायेँ सम्मिलित हैं

१) सिर्फ तुम्हारे लिए ..........जस्ट फॉर यू
२) एक खोज, एक चाहत और एक सच
३) प्रेम का कोई छोर नहीं होता
४) क्या फिर ऋतुराज का आगमन हुआ है ?
५) दोस्ती , प्रेम और सैक्स


अब दीजिये आज्ञा .......फिर मिलेंगे किसी और सफ़र में किसी और मंजिल के साथ

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

ख्वाब क्यूँ?……………एक प्रश्नचिन्ह ?

ख्वाब क्यूँ?
एक प्रश्नचिन्ह ?
बात तो सही है
क्यूँ देखें ख्वाब?
क्या जरूरी है 
ख्वाब पूरे हों ही 
मगर फिर भी
ख्वाब तो देखे जाते हैं
शायद उन्ही के सहारे 
ज़िन्दगी गुजार जाते हैं
आधी अधूरी सी 
अधखिली सी ज़िन्दगी
अधूरे ख्वाब की अधूरी तस्वीर
जब बन जाती है ज़िन्दगी
शायद "ख्वाब क्यूँ" का सही उत्तर 
दे जाती है ज़िन्दगी 
यूँ तो ख्वाबों के गुंचे 
रोज खिलते हैं ख्वाबगाह में
मगर हर ख्याली गुंचा 
चढ़ सके देवता पर 
जरूरी तो नहीं
कुछ ख्वाब के गुंचे 
अर्थियों की शोभा बनते हैं
तो भी क्या हुआ
अपने होने को तो 
सिद्ध कर देते हैं
बस होना...... सिद्ध होना जरूरी है
अस्तित्व है.......ये जरूरी है
फिर चाहे ज़िन्दगी क्षणिक ही क्यों ना हो
चाहे ख्वाब की हो या हकीकत की
मगर देखे ख्वाब ही बुलंदियां पाते हैं
जिन ख्वाबों का अस्तित्व ही ना हो
वो कहाँ कोई मुकाम पा सकते हैं
शायद इसीलिए ख्वाब का होना जरूरी है
यूँ ही नहीं कण कण में परमात्मा बसता है
अस्तित्व तो उसका भी है ही ना
बेशक दिखे ना दिखे मगर 
अपने होने का अहसास करा देता है
और उसे पाने की चाह बलवती हो जाती है
बस वैसे ही 
ख्वाब है तो चाहत है
चाहत है तो पाने की तमन्ना है
तमन्ना है तो खोज है
खोज है तो अस्तित्व है 
अस्तित्व है तभी आकार निर्माण होता है
फिर ख्वाब तो ख्वाब है
निराकार में भी साकार होता है 
तो फिर कैसे ख्वाब के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दूं ?
 
 


रविवार, 15 जुलाई 2012

सीखा दो मुझे भी..........

तू मुझे भूल ना जाये
इसलिए याद करती हूँ
देख तेरे लिए ही
जीती और मरती हूँ
और इक तू है
पास होकर भी
पास नही होता
तेरा दिल मेरे
साथ नहीं होता
तेरे दिल की खिड़की में
अब कोई दरवाज़ा मेरे लिए
खुला नहीं होता
तू जो मुझे अपनी
जान कहता था
आज तेरे लिए
बेजान हूँ मैं
तेरी मोहब्बत की
जंजीरों में जकड़ी
मेरी मोहब्बत का
देख
दम घुटा जाता है
ए सुनो
क्या ऐसे भूला जाता है ?
सीखा दो मुझे भी..........

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

बिन भक्ति ज्ञान अधूरा




भक्ति और ज्ञान यूँ तो एक दूसरे के पूरक हैं मगर सिर्फ ज्ञान हो और भक्ति नहीं तो अधूरापन रह ही जाता है मगर यदि भक्ति हो तो ज्ञान खुद आ जाता है सिर्फ इतना ही फर्क है लेकिन दोनों के अस्तित्व की जरूरत तो है ही . फिर सांसारिक व्यक्ति के लिए तो और भी जरूरी हो जाता है की इस भेद को समझे और फिर उसका अनुकरण करे मगर जो इस भेद को जाने बिना अनुकरण करते हैं उनकी दशा वैसी ही होती है जैसे कोई नाव में किनारे पर ही बैठा रहे और वहीँ पतवार चलाता रहे मगर उसे खुला ना छोड़े . ज्ञानी की दशा तो उस बालक की तरह होती है जो अब बड़ा हो चुका है और अपना ख्याल खुद रख सकता है मगर भक्त की दशा उस बच्चे जैसी होती है  जो पूरी तरह अपनी माँ पर ही निर्भर होता है तो उसकी देखभाल का दायित्व माँ का होता है तो ऐसे भक्त की रक्षा स्वयं परमेश्वर करते हैं फिर चाहे उससे भक्ति में कोई गलती ही क्यों ना हो जाए मगर इसी जगह यदि ज्ञानी से गलती हो जाए तो उसके लिए वो खुद जिम्मेदार होता है . बस यही तो ज्ञान और भक्ति में फर्क होता है . ज्ञान में अहम् भाव प्रमुख होता है और भक्ति में सिर्फ और सिर्फ समर्पण होता है . 
 कोरा ज्ञान भी सफ़लता का परिचायक नही होता बिना भक्ति के ज्ञान भी अधूरा है और भक्ति का यदि रूप देखा जाये तो स्त्रीलिंग है और ज्ञान पुल्लिंग तो कहिये कैसे समायोजन हो सकता है जब तक दोनो का मिलन ना हो . देखिये गोपियाँ भक्तिस्वरूपा थीं मगर ज्ञान से भी ओत प्रोत थीं दूसरी तरफ़ उद्धव को केवल कोरा ज्ञान ही था तो क्यों कृष्ण ने चाहा कि ये भक्ति का स्वरूप भी जाने और भेज दिया गोपियों के पास ………ये सब इसी ओर इंगित करता है कि जैसे भक्ति और ज्ञान दोनो का होना जरूरी है पूर्ण बनने के लिये वैसे ही संसारिक व्यक्ति को भी इन दोनो से रु-ब-रु होना जरूरी है ये तो एक दृष्टांत है मगर इसकी गहराई सिर्फ़ यही कहती है कि दोनो के बिना अधूरापन ही रहेगा ………हाँ जिसने संसार देख लिया जान लिया और मान लिया कि ये मिथ्या है मगर हम आये है यहां तो कर्म किये बिना नही रह सकते और फिर जिसने निर्लिप्त भाव से कर्म किया वो ही यहाँ सफ़ल हुआ और पूर्ण हुआ। जरूरी नही कि सन्यास ही धारण किया जाये घर मे रहकर भी सन्यासी बना जा सकता है तभी तो कबीर जीने कहा है "सच्चा त्याग कबीर का जो मन से दिया उतार " उसके बाद निर्लिप्त भाव से किया गया कर्म भी पूजा बन जाता है फिर चाहे वो घर मे रहे या जंगल मे.मगर त्यागपूर्वक भोग करना भी आसान नहीं होता . सबसे बड़ी बात तो उसका सही अर्थ ही कोई समझ नहीं पाता और कर्म व् त्याग के झूले पर झूलने लगता है . मगर उसका मर्म नहीं समझ पाता . कैसे घर में रहकर भी त्यागी बना जा सकता है और कैसे त्यागी होकर भी भोग में संलिप्त हुआ जा सकता है ? क्योंकि जब तक भोग का त्याग करने की भावना बलवती नहीं होती कोई भी कर्म अकर्मण्य नहीं होगा और जब कर्म में लिप्सा रहेगी तो भक्ति कहाँ से आएगी तो उसके लिए सबसे पहले यही समझना होगा कि त्यागपूर्वक भोग क्या होता है ?
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, अर्थ कि उसका त्यागपूर्वक भोग करो …………ये त्यागपूर्वक भोग का अर्थ ही तो गहन है ………जब इंसान मन से सब त्याग कर चुका होता है मगर क्योंकि समाज मे रह रहा है तो उसके कायदे भी तो मानने होते हैं और उसी के नियमानुसार भी चलना होता है तो जो कार्य करता है उसी के अनुरूप करता है मगर अन्दर से उसकी भोगवृत्ति खत्म हो चुकी होती है बस संसार मे रहने के लिये और चलाने के लिये वो उनका उपभोग करता प्रतीत होता है यही प्रवृत्ति त्यागपूर्वक भोग कहलाती है ……… तभी इस बारे मे कबीर जी ने कहा है ………सच्चा त्याग कबीर का जो मन से दिया उतार ………बस वही है त्याग और उसके बाद जो भी कार्य किया जाये उसमे संलिप्तता नही होती तो वो भोग करते हुये भी भोगी नही कहलाता ।
भक्ति और ज्ञान की परिभाषा बहुत गहन है जितनी व्याख्या करो उतनी ही कम पड़ जाए . सबसे जरूरी बात सिर्फ यही होती है की ज्ञान भक्ति के बिना पंगु है मगर भक्ति जहाँ आती है वहाँ ज्ञान और वैराग्य स्वमेव आ जाते हैं उन्हें बुलाना नहीं पड़ता . क्योंकि निश्छल भक्ति ही तो प्रभु को प्रिय है और बिक जाते हैं वो बिन मोल के और जिसे वो मिल जाएँ तो वो क्या उनका भक्त अज्ञानी रह सकता है ? गोपियाँ क्या थीं गाँव की ग्वालिनें ही तो थीं जिन्होंने कभी ज्ञान कहीं से पाया ही नहीं सिर्फ एक प्रेम की भक्ति से प्रभु को वशीभूत कर लिया तो ज्ञान गंगा तो स्वयं उनके चरण प्रक्षालन करने लगी . यही तो प्रभु भक्त की महिमा होती है क्योंकि वो अपना सब कुछ उन्हें अर्पण कर चुका होता है . उसके बाद उसका जो कर्म होता है वो सिर्फ और सिर्फ अपने प्रभु के लिए होता है देखने में ऐसा लगता है जैसे वो गृहकार्य कर रहा है बाल बच्चों में संलिप्त है मगर वास्तव में वो जितने भी कर्म करता है अपने प्यारे प्रभु के लिए करता है तो उसका ये कर्म भी उसका भगवद धर्म बन जाता है और यही सबसे बड़ा पूजन होता है .त्यागपूर्वक भोग हो या भक्ति का निश्छल स्वरुप या कर्म की मीमांसा सब एक में ही समाहित है सिर्फ दृष्टि के भेद से ही अलग स्वरुप दीखते हैं और जो इनके पार पहुँच जाता है वहाँ अस्तित्व पृथक कब होते हैं और वो ही तो भक्ति की उच्च अवस्था होती है जो ज्ञान से परिपूर्ण होती है .भक्ति की गंगा में अवगाहन करता ज्ञान ही तो भक्ति की पराकाष्ठा होती है .


 दोस्तों ये पोस्ट कल शाम ही नवभारत टाइम्स के ब्लोग(http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/zindagiekkhamoshsafar/entry/%E0%A4%AC_%E0%A4%A8_%E0%A4%AD%E0%A4%95_%E0%A4%A4_%E0%A4%9C_%E0%A4%9E_%E0%A4%A8_%E0%A4%85%E0%A4%A7_%E0%A4%B0) पर लगायी थी और देखिये आज पाबला जी की मेहरबानी से पता चला कि ये यहां छप भी गयी देखिये इस लिंक को 


अब पाबला जी का शुक्रिया किन लफ़्ज़ों मे अदा करूँ? कहाँ कहाँ हम लोग छप जाते हैं और पाबला जी की वजह से पता चलता है वरना तो पता ही ना चले।

बुधवार, 11 जुलाई 2012

क्योंकि ज़िन्दा बुतों के ताजमहल नहीं बना करते

पता नहीं कैसे 
संजोते हो तुम मुझे
अपने शब्दों की लड़ियों में 
तो कभी भावों की 
भाव भंगिमा में
और मैं 
उलझ कर रह जाती हूँ
घिर जाती हूँ 
तुम्हारे बनाये 
मोहब्बत के मकडजाल में 

कैसे तुम मोहब्बत को 
घूँट घूँट में पीते हो
जो विरह के पलों के 
विष से लबरेज होती है 
कैसे मुझे उसमे पाते हो
देखो तो जरा
मैं कितना कसमसाती हूँ
तुम्हारी गिरफ्त से छूटने के लिए
और तुम हो 
कि अपने ख्यालों की गिरफ्त
और बढ़ाते जाते हो 

जानते हो 
नहीं चाहती मैं 
कि तुम उस आग को पियो
जिसमे रोज मैं जली हूँ
तभी तो खुद को
तुम्हारे ख्यालों की बगिया से
मुक्त करना चाहती हूँ

ये मोहब्बत की अग्निवर्षा 
जिस्मों पर नहीं 
रूहों पर असर करती हैं
जला कर खाक कर देती हैं सफीना 
और नज़र  नहीं आता 
एक निशाँ भी .........अग्नि के तांडव का

देखो मदिरा तो शरीर को जलाती है
मगर ये मोहब्बत की मदिरा 
रूह को नेस्तनाबूद कर देती है
बच सको तो बच जाओ
मैं तो मिट चुकी हूँ
क्यों ख्याल के तकिये पर 
मेरे बुत को ज़िन्दा रखते हो

ए तेजाबी मोहब्बत के दरवेश 
मत कर दुआ 
मत मांग खुदा से 
मत कर कोई इल्तिजा 
क्योंकि 
ज़िन्दा बुतों के ताजमहल नहीं बना करते 

रविवार, 8 जुलाई 2012

कृष्ण लीला ……भाग 55



एक दिन इन्द्र पूजा का दिन आया
वृन्दावन वासियों ने अनेक पकवान बनाये 
यशोदा मैया भी उस दिन
भिन्न भिन्न पकवान बनाती थीं
सब की तैयारी देख
कन्हैया ने विचार किया 
ये अज्ञानी ग्रामवासी 
डर के पूजा करते हैं
किस कार्य से क्या होगा
इसका ना महत्त्व समझते हैं
पुरातन रीती अपनाये जाते हैं
पूजा शास्त्र सम्मत होनी चाहिए
ना कि डर से 
आज इन्हें समझाना होगा
पूजा का महत्त्व इन्हें बतलाना होगा
ये सोच कान्हा पहुंचे मैया के पास
रोज कान्हा गौ चरा 
मैया के पास चले आते थे
आज जब कान्हा उनकी तरफ आने लगे
ये देख मैया ने रोक दिया
कान्हा आज मेरे पास मत आना
जय जय के लिए भोग बनाती हूँ
मुझे तुम मत छूना
मगर कान्हा ने मैया की बात ना मानी
और फिर मैया की तरफ कदम बढ़ाने लगे
मैया माना करती रही
डांट लगाती रही
मगर कान्हा ने एक ना मानी 
ये देख मैया को क्रोध इतना आया
आज मैया ने कान्हा के गाल पर चपत लगाया 
कान्हा थप्पड़ खा 
बिलख- बिलख कर रोने लगे
रोते- रोते नन्द बाबा के 
पास पहुँच गए 
वहाँ भी देखा
लोग नए- नए पकवान बनाते थे
जैसे नन्द बाबा ने देखा
कान्हा को रोते
तुरंत गोद में उठा लिया
और रोने का कारण पूछा
अब तो कान्हा बोल पड़े
बाबा रोने का कारण बाद में पूछना
पहले ये बतलाओ
ये सब यहाँ क्या होता है
तब नंद बाबा ने बतलाया
ये जय- जय के लिए भोग बनाया है
सुन कान्हा बोल पड़े
इसी जय- जय ने तो 
आज पिटवाया है
कौन है ये जय -जय बाबा
हमारे लिए क्या करता है
सुन नन्द बाबा ने बतलाया
इन्द्र देवता की 
हम सब पूजा करते हैं
फिर वो पूजा से खुश होकर
पानी बरसाता है
जिससे हमारा प्रदेश
धन-धान्य से 
परिपूर्ण हो जाता है
ये सुन कान्हा बोल उठे
क्यों जान- बूझकर
कुराह पर सब चलते हैं
संसार में धर्म और कर्म
तीन तरह के होते हैं
एक वेद व् शास्त्रानुसार
दूजा लोक व्यवहार
और तीसरा अपने मन से 
कार्य करना 
सो वेदानुसार कार्य करने से ही
शुभ फल मिला करता है
फिर भला इंद्र की 
पूजा से क्या मिलेगा
ना वो किसी को
भक्ति, मुक्ति या वरदान 
दे सकता है
वो तो खुद सौ यज्ञ 
करने पर इन्द्रासन पाता है
तभी सभी देवता उसे 
अपना राजा मानते हैं
जो दैत्यों से लडाई  में
खुद जा छिप जाता है
और नारायण की सहायता से
पुनः इन्द्रासन पाता है
ऐसे निर्बल की क्यों 
तुम सब पूजा करते हो
धर्मानुसार परमेश्वर की
पूजा क्यों नहीं करते हो
जो अज्ञानी नारायण को छोड़
दूसरे देवों को पूजा करते हैं
उन्हें मूर्ख समझना चाहिए
जब प्रभु इच्छा बिना
पत्ता तक नहीं हिल सकता
फिर कोई किसी को
सुख- दुःख भला क्या देगा
जो होता है परमेश्वर की
इच्छानुसार होता है
जो कर्म में लिखा गया
वो तिल भर भी
ना घटता - बढ़ता है
सुख- संपत्ति घर- परिवार
वस्तुएं सब धर्म -कर्म से मिलती हैं
फिर बताओ इसमें
इंद्र ने क्या नया किया
उसे तो सिंचाई मंत्री 
है बनाया गया
उसका कार्य है वर्षा करना
गर इसमें वो कोताही बरतेगा
नारायण के कोप का भाजन होगा
अपने वर्णानुसार धर्म को ना छोडो
खेती व्यापार गौ सेवा करना ही
वैश्य का धर्म होता
और हमें सारी सुख समृद्धि 
ये गोवर्धन पर्वत ही देता
इससे  ही हमारा गौ धन
फलता -फूलता 
गौ बछड़े यहीं चरा करते
फिर भर -भर कर 
दूध -घी दिया करते
जिससे सबका जीवन चलता
क्यों ना हम सभी
इसी पर्वत की पूजा करें
ये सुन ग्रामवासी खुश हुए
और नंदबाबा से बोल पड़े
नंदबाबा बेशक बालक है छोटा
पर बात पते की है कहता


सबने कहा कन्हैया
ये तो बतलाओ
गर इन्द्र नाराज हुआ
तो क्या तुम्हारा गोवर्धन
हमारी रक्षा करेगा
सुन कान्हा ने हामी भरी
एक ग्वाल ने कहा
तुम्हारे गोवर्धन की
पूजा को हैं हम तैयार
मगर उसे सामने आकर
भोग लगाना होगा
कान्हा ने वो भी है
स्वीकार किया
तीसरी बात ग्वाल बालों ने ये कही
तुम्हारे गोवर्धन को क्या भाता है
५६ प्रकार का भोजन
हमारा गोवर्धन करता है
कान्हा ने बतलाया
और ५६ प्रकार के 
भोजन का अर्थ
गुनीजनों ने है ये बतलाया
पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (5)
पांच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन (6)
पांच और छः होते हैं ग्यारह 
इस तरह मिलाकर हो गया 
५६ प्रकार का भोजन
जहाँ मन ,वचन और कर्म से 
प्रभु को पूर्ण समर्पण किया
जीव का वो ही प्रभु को
५६ प्रकार का भोजन हुआ
सर्वस्व समर्पण का भाव ही
प्रभु ने  है बतलाया
पर इतनी सी बात ही
जीव ना कभी समझ पाया
अब ग्वालों ने कहा
देखो कान्हा 
पहली बार पूजा करेंगे
कोई त्रुटि हुई तो
तुम्हारे देव हमें क्षमा करेंगे
कान्हा ने कहा
तुम्हारी ये बात 
नहीं मानी जा सकती
पूजा तो शास्त्र सम्मत करनी होगी
सुन गोप बोले वो तो
हमें नहीं है आती
तब कान्हा ने बतलाया
जैसे- जैसे कहता जाऊँ
तुम वैसा करते जाना
सुन सबके मन हर्षाये
और सामग्री गाडी बैलों पर 
लदवा दिया
उत्तम वस्त्राभूषण पहन
सबने गोवर्धन को 
प्रस्थान किया
सबने मिल सबसे पहले
गोवर्धन को स्नान कराया
पर इतने बड़े पहाड़ पर ना
कोई असर हुआ
जब तक पानी भर कर लाते थे
तब तक गोवर्धन सूख जाते थे
सुबह से शाम हुई
पर गोवर्धन पर्वत की तो
मूंछ भी ना गीली हुई
ग्रामवासी थक हार गए
कान्हा से गुहार लगायी
देख भैया हम से तो अब
और पानी ढोया जाता नहीं
और तेरे गोवर्धन पर तो
कुछ भी असर होता नहीं
सुन कान्हा बोले अगर
पानी का इंतजार पास हो जाये
तो बोलो कुछ समस्या रहेगी
सुन ग्रामवासी प्रसन्न हुए
सबको आँख बंद करवाई
और मन से ही मनहरण प्यारे ने
मानसी गंगा उपजाई
अब सबने मिल गोवर्धन को
स्नान कराया
शास्त्र सम्मत विधि से पूजा किया
जैसे ही भोग लगाने को उद्यत हुए
ये देख गिरिराज स्वयं प्रकट हुए
ब्रजवासी ये देख अति आनंदित हुए
गिरिराज कोई और नहीं
स्वयं कान्हा ने ही 
रूप बनाया था
और अति हर्षित हो
ब्रजवासियों के भोजन का
भोग लगाया था
मांग -मांग कर खाते थे
विविध पकवानों का
स्वाद उठते थे
ब्रजवासियों को अपनी
गलती का अहसास हुआ
व्यर्थ ही इतने साल
इन्द्र का पूजन किया
जिसने ना कभी दर्शन दिया
गिरिराज का आज ही
पूजन किया
उसने तो स्वयं प्रकट हो
भोजन किया
ये बात सबके मन को भा गयी
अति हर्षित हो सभी
गिरिराज का पूजन कर
ब्रज में लौट आये


क्रमश: ……………


शनिवार, 7 जुलाई 2012

और तुम वहीँ एक बुत बन जाओ ...........हवा, मिटटी और छुअन का

ये शहरों की मिट्टियाँ भी अजीब होती हैं ना 
रूप रस गंध सबसे जुदा 
देखो आज मेरे क़दमों ने फिर 
तुम्हारे शहर की कदमबोसी की है 
कोई अनजानी सी हवा छूकर गयी है 
एक नमकीन सा अहसास करा गयी है 
मगर अजनबियत की गंध भी बिखरा गयी 
क्या मिट्टियाँ इतनी जल्दी बदल जाती हैं 
या उनकी गंध में प्रदूषण बढ़ गया है 
देखो तो मेरे दिल की मिटटी तो 
आज तक गीली है तुम्हारी नमी से 
हाँ उसी नमी से 
जो तुम्हारे लबों पर तैरा करती थी 
जब तुम मुझमे चाँद ढूँढा करते थे 
और चाँद अठखेलियाँ करता 
मेरी जुल्फों में छुप जाया करता था 
जुल्फों की पनाहों में चाँद की हसरतें 
कितनी मासूम सी मचला करती थीं 
देखो ना .........
कितनी नम है ना आज भी मिटटी तुम्हारी यादों की 
फिर तुम्हारे शहर की मिटटी पर कौन सा पाला पड़ गया है 
चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ बजरी बिखरी पड़ी है 
जिसमे कोई पौध नहीं उगा करती 
मगर चुभे तो ज़ख्म दे जाती है ……
क्या हुआ है तुम्हारे शहर को ? 
कौन सी आसमानी बिजली ने राख़ किया है आशियाने को…
उम्र के बदलने से आशियाने नहीं बदला करते 
कोई ज्यादा वक्त तो नहीं गुजरा है ना 
सिर्फ उस जन्म से इस जन्म तक का ही तो फासला तय किया है……
देखो रुसवा ना हो जाये मोहब्बत फासला तय करते करते
एक कदम तुम भी तो बढाओ ना
आवाज़ दो ना ......
देखो कब से मैंने तुम्हारी मिटटी को अश्कों की स्याही से नम बना रखा है 
मैंने तो सुना है शहरों की मिट्टियाँ तो 
कदमबोसी के इंतज़ार में कुदरत के नियम बदल दिया करती हैं 
ओह ! कहाँ हो ? ओ मेरे अहसासों के सुलगते वजूद 
कहीं तुम्हारे शहर की हवा और मिटटी पर ही 
मेरी कब्र ना बन जाए और जब तुम गुजरो करीब से 
तुम्हें छू जाए और तुम वहीँ एक बुत बन जाओ ...........हवा, मिटटी और छुअन का 
जानते हो ना वक्त की करवटों पर गुलाब नहीं उगा करते 

बुधवार, 4 जुलाई 2012

नहीं हूँ मैं इस दुनिया की शायद

नहीं हूँ मैं
इस दुनिया की शायद 
कोई तो वजह जरूर है 
जो ये ख्याल उड़ कर 
मन की खिड़की से 
अन्दर आया है 
गर होती इसी दुनिया की
तो सोचती दुनिया के जैसे
बन जाती गर प्रैक्टिकल   
भावनाओं के तूफानों में ना बहती
ना ही किसी हवा के झोंके में उलझती
दिल को एक खिलौना समझती
रोज इसके सौ टुकड़े करती
और फिर भी मुस्कुराती
हँसती खिलखिलाती 
नहीं होता मुझ पर असर
किसी की पीड़ा का
किसी के दर्द का
ना ही आहत होती 
किसी की बातों से
बल्कि आहत करना जानती
तो शायद मैं दुनिया जैसी बन जाती 
आज का युग सुना है 
तेजी से बदल रहा है
जहाँ सिर्फ उसी का 
झंडा बुलंद होता है 
जो विरोधी स्वर रखता है
कोई एक गाल पर मारे 
तो दूजा आगे करने की बजाय
जो उल्टा धर देता है
आज उसी का तो 
बोलबाला होता है 
और मुझमे एक भी
ऐसी प्रवृति का ना संचार हुआ
आत्मकेंद्रित भावनात्मक प्रवृत्तियां 
कभी कभी
कितना रुसवा करती हैं 
अब उन जैसी बन नहीं पाती
और साथ भी चल नहीं पाती
ये कैसी चाल वक्त ने चली है 
जो मुझे रास ना आई है
तभी तो मेरे किनारे तक 
कोई लहर आती ही नहीं
अलग थलग सा हो गया है 
वजूद मेरा 
चारों तरफ फैली भीड़ के 
अथाह सागर में 
खुद को खोज रही हूँ
और सोच रही हूँ
शायद नहीं थी इस दुनिया की मैं 
बेगाने देस में बेगाने पंछियों का डेरा 
सांझ के फेरे सा ही तो होता 
कब कोई पंछी वहाँ घोंसला बना पाता है 
उड़ कर अपने देस जाना ही होता है 
परायों के देस मे कब पंछियों को नीड मिले हैं ………

रविवार, 1 जुलाई 2012

जलसमाधि हर किसी का नसीब नहीं होती

किससे करूँ शिकायत
और क्या कहूँ
कहीं कोई अपना मिला ही नहीं
सभी अपनों के भेस में बेगाने ही मिले
सबने अपने कार्य ही सिद्ध किये
और हम किनारे पर खड़े
लहर का इंतजार ही करते रहे
कभी तो आएगी कोई लहर
मेरे नाम की
कभी तो भिगोएगी दामन
मेरे ख्वाबों का
कभी तो लहलहाएगी सरसों
मेरी मन में भी
कभी तो साहिल को नज़र आएगी
मेरी बेजुबान बेबसी
मगर ना कोई लहर आई
ना ही साहिल ने हाथ बढाया
और मैं चुपचाप
खडी खडी
लहरों का तांडव देखती रही
उस शोर में अपना वजूद खोती रही
शायद  कुछ किनारे कभी नहीं भीगते
या  जलसमाधि हर किसी का नसीब नहीं होती

मंगलवार, 26 जून 2012

देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?



नारी के दृष्टिकोण से


सुना है नारी
सम्पूर्णता तभी पाती है
जब मातृत्व सुख से 
आप्लावित होती है
जब यशोदा बन
कान्हा को 
दुग्धपान कराती है
रचयिता की 
अनुपम कृति तब होती है

यूँ तो उन्नत वक्षस्थल
सौंदर्य का प्रतिमान होते हैं
नारी का अभिमान होते हैं
नारी देहयष्टि में
आकर्षण का स्थान होते हैं
पुरुष की कामुक दृष्टि में
काम का ज्वार होते हैं
मगर जब इसमें घुन लग जाता है
कोई रेंगता कीड़ा घुस जाता है
सारी फसल चाट जाता है
पीड़ा की भयावहता में 
अग्निबाण लग जाता है
असहनीय दर्द तकलीफ
हर चेहरे पर पसरा खौफ
अन्दर ही अन्दर 
आतंकित करता है 
कीटनाशक का प्रयोग भी
जब काम ना आता है
तब खोखले अस्तित्व को
जड़ से मिटाया जाता है
जैसे मरीज को 
वैंटिलेटर पर रखा जाता है
यूँ नारी का अस्तित्व 
बिना घृत के
बाती सा जल जाता है
उसका अस्तित्व ही तब
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाता  है
एक अधूरापन सम्मुख खड़ा हो जाता है
सम्पूर्णता से अपूर्णता का 
दुरूह सफ़र 
बाह्य सौन्दर्य तो मिटाता है
साथ ही आंतरिक 
पीड़ा पर वज्रपात सा गिर जाता है

जिस अंग से वो
गौरान्वित होती है
साक्षात वात्सल्य की 
प्रतिमूर्ति होती है
जो उसके जीवन की
उसके अस्तित्व की
अमूल्य धरोहर होती है
नारीत्व की पहचान होती है
जब नारी उसी से विमुख होती है
तब प्रतिक्षण काँटों की
शैया पर सोती है

बेशक नहीं होती परवाह उसे
समाज की 
उसकी निगाहों की
किसी भी हीनता बोध की 
सौंदर्य के अवसान की
अन्तरंग क्षणों में उपजी
क्षणिक पीड़ा की
क्योंकि जानती है
पौरुषिक स्वभाव को
क्षणिक आवेग में समाई निर्जनता
पर्याय ढूँढ लेती है
मगर 
स्वयं का अस्तित्व जब
प्रश्नचिन्ह बन 
खड़ा हो जाता है
तब कोई पर्याय ना नज़र आता है
आईना भी देखना तब
दुष्कर लगता है

नहीं भाग पाती 
अपूर्ण नारीत्व से 
स्वयं को बेधती 
स्वयं की निगाह से
हर दंश , हर पीड़ा 
सह कर भी 
जीवित रहने का गुनाह
उस वक्त बहुत कचोटता है
जब मातृत्व उसका 
अपूर्ण रहता है
बेशक दूसरे सुखो से 
वंचित हो जाए
तब भी आधार पा लेती है
मगर मातृत्व सुख की लालसा 
खोखले व्यक्तित्व पर
प्रश्नचिन्ह बन 
जब खडी हो जाती है
वात्सल्य की बलि वेदी पर
माँ का ममत्व 
नारी का नारीत्व 
प्रश्नवाचक नज़रों से 
उसे घूरता है
मृत्युतुल्य कष्ट सहकर
ज़िन्दा रहना उसे
उस वक्त दुष्कर लगता है 
जब ब्रैस्ट कैंसर की
फैली शाखाओं के व्यूह्जाल 
को तोड़ वो खुद को निरखती है 
तब ज़िन्दा रहना अभिशाप बन
उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को
अभिशापित कर देता है
जो वास्तविक कैंसर से 
ज्यादा भयावह होता है

अपूर्ण व्यक्तित्व के साथ जीना
मौत से पहले पल- पल का मरना 
उसे अन्दर ही अन्दर 
खोखला कर देता है 
मातृत्व में घुला संपूर्ण नारीत्व 
पूर्ण नारी होने की गरिमा
उसके मुखकमल के तेज को 
निस्तेज कर देती है 
जब अपूर्णता की स्याही उसकी आँखों में उतरती है

चंद लफ़्ज़ों में 
उस भयावहता को बाँधना संभव नहीं
दर्द की पराकाष्ठा का चित्रण संभव नहीं
ये तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है 
मगर लफ़्ज़ों में तो ना
वो भी व्यक्त कर सकता है 
क्योंकि 
मौत से आँख मिलाने वाली
खुद से ना आँख मिला पाती है  
यही तो इस व्याधि की भयावहता होती है 


कहना आसान होता है 
बच्चा गोद ले लो 
किसी अनाथ को प्रश्रय दो 
जीने के नए बहाने ढूंढो 
मगर जिस पर गुजरती है 
वो ही पीड़ा को जानता है 
जब खुद के सक्षम होने से 
असक्षम होने के सफ़र को 
वो तय करता है 
और एक फांस सी दिल पर 
उम्र भर के लिए गड जाती है 
जब उस सुख से वो वंचित रह जाती है 


यूँ ज़िन्दगी से बढ़कर कोई नेमत नहीं होती 
जानती है वो ......
फिर भी एक नवान्गना/तरुणी  के जीवन की सम्पूर्णता 
तो सिर्फ मातृत्व में है होती 
सोच खुद को निरीह महसूसती है 
एक प्रश्नचिन्ह उसके वजूद को 
धीमे - धीमे खाता जाता है 
जिसका उत्तर ना किसी को कहीं मिल पाता है 
एक ऐसी बेबसी जिसका निदान न मिल  पाता है 
और उसे अपना अस्तित्व अपूर्ण नज़र आता है 
और चीत्कार उठता है उसका अंतस बेबसी से उपजी पीड़ा से 


देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?




पुरुष के दृष्टिकोण से 



जब से विषबेल अमरलता से लिपटी है
मेरे अंतस में भी मची हलचल है
यूँ तो प्रणय का ठोस स्तम्भ होते हैं
मगर जीवन के पहिये सिर्फ 
इन्ही पर ना टिके होते हैं

ये भी जानता हूँ मैं 
अंग में उपजी पीड़ा की भयावहता को 
तुम्हारे ह्रदय की टीस को 
पहचानता हूँ 
संघर्षरत हो तुम 
ना केवल व्याधि से
ना केवल अपने अस्तित्व के खोखलेपन से
बल्कि नारीत्व के अधूरेपन से भी
जो तुम नहीं कहती हो
वो भी दिख रहा है मुझे
तुम्हारी वेदना का हर शब्द
मेरे भीतर रिस रहा है

मकड़ी के जालों ने तुम्हें घेरा है
खोखला कर दिया है तुम्हारा वजूद
कष्टसाध्य पीड़ा के आखिरी पायदान 
पर खडी तुम
अब भी मेरी तरफ 
दयनीय नेत्रों से देख रही हो
सिर्फ मेरे लिए
मेरे स्वार्थ के लिए
मेरी क्षणभंगुर तुष्टि के लिए
सोच रही हो
कैसे गुजरेगा जीवन
अधूरेपन के साथ
मगर तुम अधूरी कब हुईं
तुम तो हमेशा पूरी रही हो 
मेरे लिए 

नहीं प्रिये ...........नहीं
इतना स्वार्थी कैसे हो सकता हूँ
जीवन के दोनों पहियों के बिना 
कैसे गाड़ी चल सकती है
क्या तुमने मुझे सिर्फ इतना ही जाना
क्या मुझे सिर्फ 
विषयानल में फँसा दलदल का 
रेंगता कीड़ा ही समझा
जो अपनी चाहतों के सिवा
अपने रसना के स्वाद के सिवा
ना दूजे की पीड़ा समझता है
नहीं ..........ऐसा संभव नहीं 

क्या हुआ गर 
ज़हरवाद ने तुम्हें विकृत किया है
क्या सिर्फ एक अंग तक ही 
तुम्हारा अस्तित्व सिमटा है
तुम एक संपूर्ण नारी हो
गरिमामयी ओजस्वी 
अपने तेज से जीवन को 
आप्लावित करतीं 
घर संसार को संभालतीं 
अपनी एक पहचान बनातीं 
ना केवल अपने अर्थों में
बल्कि समाज की निगाह में 
संपूर्ण नारीत्व को सुशोभित करतीं
क्या सिर्फ अंगभंग होने से
तुम्हारी जगह बदल जाएगी 
नहीं प्रिये .........नहीं

जानती हो 
ये सिर्फ मन का भरम होता है 
रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए
प्रेम का अमृत ही काफी होता है 
जहाँ प्रेम होता है वासना नहीं 
वहाँ फिर कोई स्थान ना रिक्त दिखता है 
क्योंकि यथार्थ से तो अभी वास्ता पड़ता है 


शायद नहीं यक़ीनन
यही तो प्रणय संबंधों का चरम होता है 
जहाँ शारीरिक अक्षमता ना 
संबंधों पर हावी होती है 
और संबंधों की दृढ़ता के समक्ष 
मुखरित व्याधि भी मौन हो जाती है