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बुधवार, 21 मई 2008

khamoshiyan

खामोशियों की जुबान नही होती,sirf dard और tanhaiyan ही साथी होते हैं ,
खामोशियों के dard को कोई समझ सके,ऐसा कोई dil नज़र नही आता ,
खामोशियों की आवाज़ बहुत खामोश होती है ,इसे सुनने की हर dil को आदत नही होती,
ऐसा कोई milta नही जो समझे इनकी जुबान को ,इन्हें तो कुछ भी कहने की आदत नही होती ,
खामोशियों के साथ sirf खामोश dil ही होता है,खामोशियों क पार तो खामोशी ही होती है,
इसलिए खामोशियों की जुबान नही होती,sirf एक अनसुनी अनकही खामोशी ही होती है

रविवार, 18 मई 2008

मासूम dil

dil kitna मासूम होता है ,जो भी इबारत पढता है ,likh लेता है,
मासूम को पता ही नही होता ,क्या likhna चाहिए और क्या नही ,
jise अपना बना लेता है उसका ही हो जाता है ,
kisi को भी पराया नही मानता,
dil kitna मासूम होता है,
हर dard को अपना बना लेता है ,
हर गम का राज सीने में छुपा लेता है ,
उफ़ भी नही करता ,खामोश सब सहे जाता है
सच dil kitna मासूम होता है,

मेरे पल

हर पल कुछ ख्वाब सजाते हैं हम और फिर उन्हें टूटते हुए देखते हैं ,
क्या ज़िंदगी बस ख्वाब सजाने और टूटने तक ही सिमट कर रह गई है
क्या हम कुछ और नही कर सकते या सोच सकते ,
क्या हमारे हाथ में कुछ भी नही है अब
कब तक हम अपने अरमानों को यूं ही दफ़न करते रहेंगे
कब तक यूं ही हर इम्तिहान में असफल होते रहेंगे हम
क्या ज़िंदगी में उससे आगे कुछ भी नही है
क्या हर पल हमसे कुछ न कुछ छीनता ही रहेगा
क्या कभी हम पलों को अपने दमन में बाँध न सकेंगे
क्या हर पल हम बस बेबस हुए दूर जाते हुए पल को देखते जायेंगे
और कुछ कर न पाएंगे
कोई टू बताये कैसे इन पलों को संजोयुं

रविवार, 6 अप्रैल 2008

न जाने कहाँ खो गए हम

न जाने कहाँ खो गए हम
बहुत ढूँढा पर कहीं न मिले हम
न जाने कौन से मुकाम पर है ज़िंदगी
हर मोड़ पर एक इम्तिहान होता है
चाहतों के मायने बदल जाते हैं
जिनका इंसान तलबगार होता है
दुनिया की भीड़ में गूम हुयी जाती हूँ
ख़ुद को ढूँढने की कोशिश में
और बेजार हुयी जाती हूँ
क्या कभी ख़ुद को पा सकेंगे हम
इसी विचार में खोयी जाती हूँ

शनिवार, 18 अगस्त 2007

रिश्ते

मौसम की तरह रंग बदलते यह बेलिबास रिश्ते,
वक़्त की आँधियों में ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
हम रिश्तों की चादर ओढ़े हुये ऐसे मौसम में ,
दिल को यह समझाए चले जाते हैं,
मगर रिश्तों का बेगानापन हर पल यह बताता है,
पत्थरों के शहर में अपनों को खोजा जाता नहीं,
हर पल दर्द देते यह रिश्ते बेमानी हैं,
क्यूंकि पत्थरों से पत्थरों को तोड़ा जाता नहीं,
ग़र मौसम कि तरह हम भी बदल जाते हैं,
तो रिश्तों के अर्थ ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
फिर क्यों हम ऐसे रिश्तों को ढोने को मजबूर हो,
जिनके लिबास वक़्त के साथ बदल जाते हैं

रिश्ते

रविवार, 5 अगस्त 2007

कुछ तो है

कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता
कहीँ चैन कहीँ आराम नहीं मिलता
ना जाने यह दिल क्या चाहता है
हर वक़्त कहीँ खोया रहता है
इसको ढूँढा बहुत मगर कहीँ मिलता नहीं
ना जाने कौन सी गलियों में गुम हो गया
इसकी ख्वाहिशों का कहीँ पता नहीं मिलता
कैसे मिले सुकून वो दवा नहीं मिलती
अरमानों को कहीँ मंजिल नहीं मिलती
कुछ तो है जो खो गया है
जिसे पाने के लिए ये दिल बेचैन हो गया है
दिल को खुद का पता नहीं मिलता
कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता

बुधवार, 4 जुलाई 2007

ख्वाब

मैंने एक ख्वाब देखा है ,चाहतों का बाज़ार देखा है,
यह कौन सी मंज़िल है,जो मिल कर भी नहीं मिलती ,
हर तरफ एक खामोशी सी छाई है , दर्द है तनहाई है,
यह कौन सा मुकाम है जिन्दगी का, जहाँ कुछ नहीं मिलता ,
सिर्फ ख्वाबों को टूटते देखा और जिन्दगी को हाथ से फिसलते देखा ,
अब इस दौर मैं कैसे ख्वाबों को सजाऊँ ?
किसे आवाज़ दूं और किसे बुलाऊं ?

दिल चाहता है

दिल चाहता है आसमान में ऊड़ना,
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।

शनिवार, 30 जून 2007

कैसे कहूं

दिल की बात कैसे कहूं ,किससे कहूं ,यहाँ कौन है सुनने वाला,
इक छोटी सी आरजू है ,इक छोटी सी तमन्ना है ,
बरसों से दबी ख्वाहिश है , कोई हो इक ऐसा जो समझे इस दिल को,
जाने इस के दर्द को , और कोशिश करे समझने की
यह दिल क्या चाहता है , गर कोई जान ले तो
जीने की आरजू पूरी हो जाये , मरने का कोई मलाल ना रहे
लेकिन किससे कहूं और कैसे कहूं ?

शुक्रवार, 29 जून 2007

वक़्त और जिन्दगी

वक़्त ने कब जिन्दगी का साथ दिया हमेशा आगे ही चलता जाता है और जिन्दगी वक़्त की  परछाईं
सी नज़र आती है। वक़्त बहुत बेरहम है , अपनी परछाईं का साथ भी छोड़ देता है। वक़्त का हर सितम जिन्दगी सहती जाती है मगर उफ़ भी नहीं कर सकती। किसी के पास इतना वक़्त होता है कि काटना मुश्किल हो जाता है और किसी को इतना भी वक़्त नहीं होता कि अपने लिए भी कुछ वक़्त निकाल सके। वाह! रे वक़्त के सितम।

वक़्त जिन्दगी को बहुत उलझाता है।
यह कैसा वक़्त आ गया जब जिन्दगी भी कुछ कह नहीं पाती
और वक़्त के खामोश सितम भी सह नहीं पाती
गर कुछ कहना भी चाहे तो सुनने वाला कोई नहीं
यह कैसी बेबसी है , यह कैसी आरजू है,
वक़्त के सितम हँस के सहने को मजबूर
जिन्दगी उदास राहों पर चलती जाती है
काश!कोई दिखाये दिशा इस  जिन्दगी को
वक़्त के साथ चलना सिखाये कोई जिन्दगी को
खामोश राहें हैं खामोश डगर है जिन्दगी की
वक़्त का साथ गर मिल जाये तो जिन्दगी के मायने बदल जाएँ