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गुरुवार, 24 मार्च 2016

रंग भरी होली


जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 



जहाँ जहाँ मेरा गोविन्द गोपाल है
बस वहीँ वहीँ होली की बहार है

रंगों की चली ये कैसी बयार है
श्याम रंग में रंगी हर नार है

इन्द्रधनुषी रंगों से मालामाल है
धानी धरा भी आज हुई लाल है

ये तो बिन सावन बरसी फुहार है
राधा की प्रीत में सांवरे की पुकार है 
 
ये तो रंगरस में बहकी मुरली का नाद है
किसी रसवंती नार की मानो मुराद है

रंग तो प्रकृति के आनंद का आगाज़ है
सात सुरों की सरगम का मानो ताज है

जहाँ श्याम श्याम की चहुँ ओर मची पुकार है 
यही तो बृज की होली की महिमा अपार है 

रंगभरी होली की सभी को मंगलकामनाएं

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

तिरछी पड़ी यादें

आज भी तिरछी पड़ी हैं तुम्हारी यादें
और मैं रोज सुबकता न होऊं
ऐसा कोई लम्हा गुजरा ही नहीं
क्योंकि
इश्क का चन्दन जितना घिसा
उतना ही सुगन्धित होता गया

अब चिकनी सपाट सड़क पर भाग रहा हूँ
निपट अकेला ...

उधर
इख्तियार है तुम्हें भी
जुदाई की कोंपलों पर अश्रुपात करने का
कि
उग आये एक दास्ताँ हर दिल के सफ़हे पर
दिन-ब-दिन
और हो जाए मोहब्बत श्रृंगारिक ,अलंकारिक , गुंजारित

बस इतना सा तो सबब है
बाकि इस सत्य से कौन अनभिज्ञ है
रूहों के मिलन के मौसम आज के ज़माने का चलन नहीं ...

मंगलवार, 8 मार्च 2016

उत्सवकाल

वो देह का संधिकाल था
जिसे दफ़न करना जरूरी था

ये देह का नहीं
स्त्री का उत्सवकाल है
जिसे सिरमौर बनाना जरूरी है

देह से स्व तक के सफ़र में
देकर आहुतियाँ
निखर उठी हैं अविछिन्न रश्मियाँ
स्वाभिमान की , स्वत्व की , गौरत्व की

अब दे चुकी है तिलांजलि , जलांजलि
वो
नर्तन की बदल चुकी हैं मुद्राएँ
तिनका तोड़ दिया है
निब तोड़ चुकी है
फिर क्यों अलाप रहे हो वो ही बेसुरे राग
जिनके गायन से अब नहीं बरसा करते बेमौसम बादल
नहीं जला करते बुझे हुए चिराग फिर से

ये आज उसके बदले हुए तौर तरीके हैं
उत्सव मनाने को जरूरी नहीं
पुरातन तौर तरीके ही आजमाए जाएँ
क्या हुआ जो आज थिरक लेती है
उसकी ख़ामोशी डी जे की धुन पर होकर मतवाली

आधुनिकता को न केवल
ओढा बिछाया या लपेटा है उसने
बल्कि
जान गयी है कैसे पौंछे जाते हैं
जूते , मुंह और हाथ
तुम्हारे गरियाने से पहले .......

आज बदलनी ही पड़ेगी वो इबारतें जिन्होंने खोदी हैं कब्रें

ये आज की स्त्री की गौरवमयी गाथा है
स्वीकारनी तो पड़ेगी ही
फिर माथा नवाकर स्वीकारो या हलक में ऊंगली डलवाकर ......निर्णय तुम्हारा है !!!

सोमवार, 7 मार्च 2016

हरारत

1

दिल से उतर रहे हैं
रिश्ते करवट बदल रहे हैं

पेड़ छाल बदलें जो इक बार फिर से
उससे पहले
चलो शहर को धो पोंछ लो

शगुन अच्छा है

दिल की हरारत से
रिश्तों की हरारत तक के सफ़र में
इस बार मुझे नहीं होना नदी .........
 
2
किससे करें अब यहाँ वफ़ा की उम्मीद
सारे शहर में उनकी बेवफाई के चर्चे हैं 


हकीकत की कश्ती में सभी कच्चे हैं
यहाँ सभी बेमानी बेसबब रिश्ते हैं


3
काश ! दिल खोलकर रखा जाता
जिसने जो दर्द दिया उसे दिख जाता 


फिर ज़ख्मों का न यूं बाज़ार लगा होता
दिल की किताब से उसका नाम मिटा होता


 

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

'सैफ्रीन' मेरी नज़र से

भोपाल से प्रकाशित 'लोकजंग' समाचार पत्र में "सेफ्रीन" कथा-संग्रह पर मेरे विचार :



उत्कर्ष प्रकाशन से प्रकाशित मुकेश दूबे का कहानी संग्रह ‘सैफ्रीन’ अपने नाम से ही सबसे पहले आकर्षित करता है . सैफ्रीन एक नया शब्द आखिर इसका क्या होगा अर्थ . मन में व्याकुलता का होना स्वाभाविक है और यही व्याकुलता कहानी संग्रह को पढवाने के लिए काफी है . मानो शब्दकोष को एक नया शब्द दे दिया हो लेखक ने . 

संग्रह की पहली ही कहानी ‘सैफ्रीन’ है तो मानो पाठक को मनचाही मुराद मिल गयी हो . छोटी सी कहानी  गहन अर्थ समेटे . एक नयी विवेचना करते हुए तो साथ ही सोच को भी विस्तार देते हुए . यूँ तो मजहबी सियासत और मजहबी रंग से कौन वाकिफ नहीं है मगर जब बात आती है प्रेम की तो दोनों तरफ तलवारे खिंच जाती हैं और खिंची तलवारों के मध्य ही लेखक ने एक नया रंग दिया प्रेम को . हिन्दू के सैफ्रोन और मुस्लिम के ग्रीन को मिला एक नए रंग का न केवल निर्माण किया बल्कि प्रेम करने वालों को मानो एक नया मजहब ही प्रदान कर दिया और यही इस कहानी का मूल तत्व है .
‘केमिस्ट्री ऑफ़ फिजिक्स’ न केवल सम्पूर्ण विज्ञान को समेटे है बल्कि विज्ञानं के माध्यम से वैवाहिक जीवन की ग्रंथियों को भी खोलती है और बताती है जीवन में सही समीकरण तभी बनते हैं जब दोनों तरफ बराबर का आकर्षण हो . एक स्तर हो और ये किसी भी सफल दांपत्य जीवन का मूल सूत्र है वो तभी निभ सकते हैं जब दोनों स्त्री और पुरुष अपनी फिजिक्स सही कर लें तो केमिस्ट्री स्वयमेव आकार ले लेती है , एक छोटी सी कहानी पूरे विज्ञान के माध्यम से बयां करना लेखक के कुशल लेखन कौशल का चमत्कार है .
‘सुचित्रा’ एक पेंटर की कल्पना और हकीकत का खूबसूरत चित्रण है . जहाँ वो कल्पना से बतियाता है और हकीकत में कमाल करता है . दीपांशु कल्पना को जीता है जिस कारण उसकी पेंटिंग खुद बोल उठती हैं तो दूसरी तरफ उसे अपनी कल्पना पर इतना विश्वास है कि वो कह उठता है यदि हकीकत में भी तुम मिल गयीं तो तुम्हारा जो भी नाम हो मैं सुचित्रा ही कहूँगा ......इतना जिवंत कर देना लगे ही नहीं पाठक को कि वो किस्से बात कर रहा है कल्पना से या हकीकत से .......एक खूबसूरत कविता सी कहानी .
‘परछाइयों के शहर में’ एक सस्पेंस के भंवर में ले जाती कहानी है जहाँ दो मुसाफिर जंगल के रास्ते जा रहे हैं और तेज बारिश के कारण रास्ते में रुकना पड़ता है और फिर रात जो होता है उसका जब सबको बताते हैं तो कोई विश्वास नहीं करता . तो दूसरी तरफ एक भ्रम भी पैदा करने की कोशिश की गयी है मानो लेखन कहना चाहता हो भूत प्रेत भी होते हैं लेकिन आज के विज्ञान के युग में कोई इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता . हाँ , ये हो सकता है कहने वाले ने सिर्फ डराने के लिए कहा हो और उन दोनों ने विश्वास कर लिया हो या फिर रात के अँधेरे में जब थोड़ी राहत मिली हो तो आँख लग गयी हो और वहां एक स्वप्न देखा हो और वो ही हकीकत सा लगा हो .........हो कुछ भी सकता है मगर कहानी अपनी रोचकता बनाए रखने में कामयाब रही .
‘चदरिया झीनी रे’ रिश्तों की झीनी चादर को तो इंगित करती ही है वहीँ संसार से जाने के बाद कैसे रिश्ते छीजते हैं और जो देह रुपी चदरिया आत्मा ने ओढ़ी है वो निकल जाती है तो क्या होता है उसे भी रेखांकित करने में सक्षम रहे हैं लेखक .
‘सिम्बायोसिस’ यानि एक दूसरे की जरूरत पूरी करो और आगे बढ़ते रहो के सिद्धांत को प्रतिपादित किया है लेखक ने कहानी में स्मिता और रविन्द्र के माध्यम से . कैसे एक लड़की अपने जीवन में समझौते के पगडण्डी पर पाँव रख अपने भविष्य की नींव रखती है बेशक आम मानव मन इसे स्वीकारेगा नहीं लेकिन आजकल कुछ लोग अपनी स्वार्थपूर्ति हेतु इस राह को अपनाते हैं और इसमें बुराई भी नहीं समझते .
‘तर्पण’ एक तवायफ की ज़िन्दगी की जद्दोजहद की दास्तान है जो एक औरत बनाना चाहती है मगर तंगदिल सोच के मालिक बनने नहीं देते और उसका आखिरी ख़त एक मार्मिक मगर हकीकत पेश करता है तब तंगदिली के कुहासे छंटते हैं .इंसान किन्ही कमजोर क्षणों में निर्णय तो ले लेता है लेकिन खुमार उतरने पर अपनी कुंठित सोच से बाहर नहीं आ पाता और अपनी असलियत पर उतर आता है मानो तवायफ औरत होती ही नहीं या कहिये उसे औरत बनने ही नहीं दिया जाता . तवायफ के रूप में ही संसार से विदा होना होता है लेकिन उसका आखिरी ख़त काफी है सारा कुहासा छांटने को और उसे सम्पूर्ण औरत बनाने को ......मानो लेखक यही कहना चाहता हो .
‘कादम्बरी का कन्यादान’ एक अनोखे कन्यादान की कहानी है जिसे लेखक ने इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि अंत में पाठक को पता चलता है आखिर कन्यादान है किसका और ये ही किसी भी लेखक के लेखन की खूबसूरती होती है कि अंत तक पाठक की जिज्ञासा बनी रहे और अंत आने पर वो मुस्कुराए बिना न रह सके तो दूसरी तरफ सोचने पर विवश भी कि है आज भी भविष्य उज्जवल किताबों का .ऐसी सोच सबकी हो तो क्या बात हो .
‘मृगतृष्णा’ एक अलग ही कलेवर लिए .वैसे देखो तो आम लगे लेकिन पात्र की नज़र से देखो तो कितनी ख़ास . उसके अंतस में जाने कितने ज़ख्म होंगे जिन्हें जब मरहम लगाया एक नया घाव हर बार ताज़ा करता गया तो वहीँ कहीं न कहीं लेखक शायद ये कहना चाहता हो कि जब प्यार की तलाश को मुकाम नहीं मिलता तो उस पर क्या बीतती है ये कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है . और शायद यहीं से एक नयी सोच और नए जीवन की शुरुआत होती है कोई भटक सकता है इतनी ज़िन्दगी की मायूसियों से तो कोई अवसादग्रस्त भी हो सकता है . अंत के बाद भी एक कहानी स्वतः जन्म ले रही है ........एक ऐसी कहानी है मृगतृष्णा . शायद और पाठक वहीँ तक पढ़ें जहाँ तक लेखक ने लिखा लेकिन जाने क्यों मुझे लगा इसके बाद भी ज़िन्दगी तो रुकनी नहीं और जिसका ज़िन्दगी से विश्वास उठ जाता होगा , जिसने कदम कदम पर ज़िन्दगी और किस्मत से धोखे खाएं हों क्या उसका मानसिक रूप से संतुलित रहना संभव हो सकता होगा ? एक ऐसा प्रश्न छोडती है कहानी जो सोचने को मजबूर करती है . इस कहानी के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं क्योंकि जो प्रस्तुति है वो मानो एक आधार दे रही है एक नयी कहानी के जन्म को .
‘इत्तेफाक’ संबंधों और किस्मत के कनेक्शन का एक ऐसा सम्मिश्रण है कि कोई नहीं चाहेगा उसके साथ ज़िन्दगी में ऐसा कुछ घटे लेकिन वक्त और हालात कब किसे कहाँ ले जाते हैं और कैसे ज़िन्दगी को पलट देते हैं कोई समझ ही नहीं सकता . शादी किसी से होनी हो और ले किसी और को आयें . सामूहिक विवाह में हुए हादसे कैसे ज़िन्दगी को बदल देते हैं उसकी तस्वीर उकेरती है वहीँ याद दिलाती है ऐसी ही कुछ कहानियों की जो हम पहले पढ़ा सुना और देखा करते थे जैसे कहीं ट्रेन हादसा हो गया और दुल्हनें बदल गयीं या लम्बा घूँघट होने के कारण बदल गयीं कुछ ऐसा ही दृश्य यहाँ उकेरा गया लेकिन उसको मोड़ यहाँ दुसरे ढंग से देना ही लेखक के लेखन की सफलता है . बस यही है इत्तेफाक .
‘तुम याद आये’ मानो अकेले जीवन जीने वाली लड़कियों के मन में उपजे खालीपन को तो परिभाषित कर ही रही है वहीँ विवाह के बंधन को न स्वीकारने के कारण उपजे एकाकीपन के दोष को भी इंगित कर रही है तो दूसरी तरफ ये भी कहना चाह रही है कि शरीर और उसकी जरूरतें एक सीमा तक ही या एक उम्र तक ही होती हैं उसके बाद वो स्त्री हो या पुरुष सभी को एक साथ की जरूरत होती ही है बस अपनी स्वतंत्रता न छीने इस डर से स्त्री और पुरुष एकाकी जीवन जीने का निर्णय लेते हैं लेकिन एक दिन वो भी आभास करा ही देता है परिवार होने के महत्त्व का , किसी के साथ के महत्त्व को .मानो लेखक कहना चाह रहा हो इंसान एक सामाजिक प्राणी है तो उसे कभी न कभी समाज की जरूरत पड़ती है फिर वो उम्र का कोई भी पड़ाव हो और साथ ही देह मुक्ति या यौन स्वतंत्रता तक ही नहीं होता स्त्री विमर्श . स्त्री के अन्दर की स्त्री को भी जरूरत होती है एक साथ की ........
‘चेहरे पर चेहरों की किताब’ आज के फेसबुक के दौर के गुण और दोषों को तो व्याख्यातित करती ही है वहीँ एक पीढ़ी जो अपने कर्तव्यों से जब मुक्त हो चुकी होती है तो उसे जीने को एक अवलंबन चाहिए होता है और वो अवलंबन जब फेसबुक के रूप में मिलता है तो वो उसी को अपने समय बिताने का जरिया बना लेता है लेकिन यहाँ भी अनेक गुण दोष हैं यदि उनसे सावधान रहे तो आप सफलतापूर्वक अपने समय का सदुपयोग कर सकते हैं वर्ना अवांछित मन की शान्ति भंग होने का भी डर बना रहता है . मौलिक और इंदु एक जोड़े के माध्यम से लेखक यही कहने का प्रयास कर रहा है .
‘टीचर ऑफ़ द इयर’ कहानी व्यवस्था पर कटाक्ष है. कैसे हर जगह चाटुकारिता ने अपने पाँव जमाये हुए हैं . कैसे एक शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार उसका वो सम्मान है जो एक स्टूडेंट उसे देता है तो कुछ लोगों के लिए जुगाड़ के कन्धों पर सवार होकर प्राप्त किया सम्मान ही मायने रखता है ......इस दोहरे आकलन की कहानी के माध्यम से कहने की लेखक की कोशिश कामयाब रही है .
‘फूल तितली भंवरा और खुशबू’ के माध्यम से लेखक कहना चाह रहा है कि जब यौवन की दहलीज पर पैर रखते हैं लड़के और लड़कियां यदि उन्हें उस समय सही गाइड करने वाला मिल जाए तो उनका जीवन संवर सकता है और वो सही हमसफ़र चुन सकते है नहीं तो कई बार समझ की कमी की वजह से अपनी जिंदगियां भी खराब कर लेते हैं .
‘डैडी’ अंतिम कहानी और लम्बी कहानी . एक पिता और पुत्र के मध्य वैसे तो हमारे समाज में अक्सर ३६ का सा आंकड़ा होता है लेकिन यहाँ उससे उलट है . बेटे की सारी दुनिया ही उसके पिता हैं , बेशक माँ भी है और बहन भी लेकिन जितना अपने पिता से जुड़ा है उतना किसी से नहीं और ये संभव हो सका तो सिर्फ इस वजह से कि अपने पिता में उसने हमेशा एक दोस्त पाया और जब उसके पिता नहीं रहे तो मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त हो गया कि उन्हें जिंदा ही समझता रहा . जब घरवालों को अहसास हुआ तो उसका इलाज कराया गया जहाँ यही तथ्य निकल कर आया कि हर इंसान को अपने जीवन में एक सच्चे दोस्त की जरूरत होती है और जब वो उसे पा लेता है तो उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता ऐसा ही यहाँ होता है जब मोहित को मोनिका में एक दोस्त , एक हमसफ़र मिलता है तो वो पत्थरों से अपना मोह तोड़ लेता है जिन्हें अपने पिता के जाने के बाद अपना दोस्त समझने लगा था और जाने के बाद क्या बचपन से ही उन्हें भी दोस्त मानता आया था . कहानी के माध्यम से लेखक ने बिमारी और उसके इलाज के साथ मानवीय रिश्तों की महत्ता को भी दर्शाया है .

समग्रतः सैफ्रीन कहानी संग्रह में कहानियों में मानवीय मूल्यों और जीवन की उलझनों से कैसे निजात पाया जाए , उन पर लेखक ने काम किया है .धर्म हो या स्त्री पुरुष सम्बन्ध या प्रेम या सोशल मीडिया हो या किताबें या व्यवस्था हर पहलू पर लेखक की नज़र है और हर पहलू को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया है जो बताता है लेखक की सोच का फलक कितना विस्तृत है . सभी कहानियां छोटी छोटी . मगर गहन अर्थ लिए . अब तक लेखक के उपन्यासों से ही वास्ता पड़ा था लेकिन लेखक की कहानियों पर भी अच्छी पकड़ है .मुकेश दूबे जी बधाई के पात्र हैं जो थोड़े शब्दों में गहरे अर्थ समेटने का हुनर भी रखते हैं . उम्मीद है पाठक को आगे भी ऐसी अनेक और परिपक्व कहानियां पढने को मिलती रहेंगी और उनकी कलम अनवरत चलती रहेगी .अपनी अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ ...

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

संवेदनहीन होना


मैं नहीं चढ़ाती अब किसी भी दरगाह पर चादर
फिर चाहे उसमे किसी फ़क़ीर का अस्तित्व हो
या आरक्षण का या अफज़ल की फांसी के विरोध का
या फिर हो उसमे रोहित वेमुला
या उस जैसे और सब
जिनके नाम पर होती हैं अब मेरे देश में क्रांतियाँ

भुखमरी बेजारी महंगाई
किसान द्वारा आत्महत्या
रोज एक जैसी ख़बरों ने
इतना संवेदनाओं के चूल्हे को लीपा
कि अब
जड़ हो गया है एक पूरा साम्राज्य

ये जानते हुए भी
कि आजकल नहीं बदला करती तस्वीर किसी भी क्रांति से
बेवजह भटकाए जाते हैं मुद्दे
मैंने दे दी है अंतिम आहुति
राष्ट्र के हवन में
अपनी हहराती भावनाओं की

बस यही है कारण
मर चुकी हैं संवेदनाएं मुझमे .........

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

मकेश दूबे जी की नज़र से 'अँधेरे का मध्य बिंदु'

अब मुकेश दूबे जी की नज़र से देखिये और पढ़िए उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु ' की समीक्षा :
एक तो कल हमारी मैरिज एनिवर्सरी और उस पर एक मित्र द्वारा इतना खूबसूरत तोहफा ..........मेरे पास तो शब्द ही नहीं बचे कि कुछ कह सकूँ





जब वन्दना जी ने अपनी पुस्तक का शीर्षक बतलाया था, मैं सोच रहा था कि आखिर क्या आशय है इस अँधेरे की नाप तौल और माप का ? हर वो जगह जहाँ प्रकाश नहीं तो अँधेरा होगा फिर क्या फर्क पड़ता है कि ये कितनी दूर है... लेकिन जब इस किताब को पढ़ा तब समझ सका कि सोच भी तो एक प्रकाशपुञ्ज ही है। जो समझ के परे है वो अन्धकार ही है। जब किसी अबूझ पहेली की गिरफ्त में मन छटपटाता है तो दूरी की नापी जा सकने वाली हर माप महत्वपूर्ण लगने लगती है। विशाल पर्वत की तलहटी से शिखर बहुत दूर प्रतीत होता है। चढ़ना शुरू कर दो तो आधी दूरी पर पहुँचने पर भी अपार हर्ष की अनुभूति होती है। क्योंकि वो धरती से शिखर की दूरी का मध्य बिंदु है। शुरू से अंत तक अनेकों बार मन घुप्प अँधेरों में भटकता है। हर बार हौसले की रश्मियों के साथ पथिक शनै:शनै:आगे बढ़ता है और जैसे ही मध्य बिंदु आता है उत्साह उस शेष आधे भाग पर विजय प्राप्त कर लेता है। शीर्षक जितना उलझनों से भरा हुआ है, कथानक तो उससे भी कई गुना ज्यादा चौंकाने वाला... शुद्ध कर्मकांडी सतनामी साधु से पूछना कि भोजन में आप मांसाहार लेते हैं क्या फिर भी कम दुष्कर है, किन्तु सीधे परोस देना... परिणाम गंभीर भी हो सकता है। 

लेकिन जो दिया जलाने का हुनर जानते हैं वो हवाओं की परवाह कब करते हैं। वैसे भी मानव स्वभाव में बचपन से ही निषेध को करने की प्रवृत्ति होती है। जिसको करने के लिए मना किया जाता है उसे ही करने की उत्कंठा बलवती रहती है। शायद यही वजह है कि वन्दना जी ने स्वयं व समाज की सोच से असहमत विषय चुना। और सिर्फ चुना ही नहीं बल्कि बुना। वो भी सिद्धहस्त जुलाहे की चादर से भी महीन, कोमल व उससे भी चटक रंगो वाला। कहीं कोई रेशा उलझा नहीं, कोई सूत में गाँठ नहीं, शल नहीं बस एक समान बुनाई जिसे बार बार हाथ से छूने का मन करता है। 


लिव-इन रिलेशनशिप पर बुना गया तानाबाना सिर्फ समस्या नहीं उठा रहा ! किसी एक पक्ष की पैरवी भी नहीं करता नज़र आता। हर पहलू पर शंका से समाधान तक बराबर नज़र रखी है वन्दना जी ने। जब कहीं ऐसा भान हुआ कि बात ऐन उस जगह तक न पहुँच सके जहाँ पहुँचनी थी तो बड़े प्यार से उसे और मुखरित कर समझाया जैसे परिपक्व गुरु शिष्य की दुविधा समझ किसी और भांति बात का संप्रेषण कर देता है। 


हम जिस समाज में जन्म ले, पले बढ़े और जिसकी नियत लकीरों का उल्लंघन करना तो दूर, सोचना भी अपराध की श्रेणी में आता है, वहाँ शादी जैसी संस्था के विरुद्ध जाकर दो विदर्मियों का एक ही घर में रहकर पति-पत्नी सा आचरण !! नारायण ! नारायण....
लेकिन रवि और शीना तो उसके भी आगे गये। न सिर्फ अविवाहित रहकर साथ रहे बल्कि विवाहितों की भांति उनकी संतान भी हुई। जबकि दोनों की पृष्ठभूमि उनके अंतर्जातीय विवाह के अनुकूल थी। सिर्फ इसलिए कि एक दूसरे पर एक दूसरे का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है एक मात्र वजह मानें तो एक मोड़ ऐसा भी आया जब दोनों को अपने ऊपर नियंत्रण रखना पड़ा क्योंकि वो दैहिक जरूरतों से ज्यादा जरूरी था। कोई फेरे, कोई मंत्र, कोई साक्षी और दबाव नहीं उस परिस्थिति में भी साथ रहने का लेकिन अलग नहीं हो सके या यह कहना ज्यादा उचित है कि अलग होना ही नहीं चाहा। किसी प्रेमकथा में भी इतनी गहराई बिरले ही मिलेगी। 


मुख्य विषय के साथ लेखिका और भी समतुल्य सरोकारों को सहेज कर चली हैं। समाज की प्रतिक्रिया व दृष्टिकोण, बहिष्कार व सभ्य समाज में व्याप्त कमियाँ भी हैं और पूरी शिद्दत से अपनी बात को कहा गया है। आदिवासी अंचल की परम्परा व प्रथा को ऐसे जोड़ा है जैसे शोध प्रबंध के डिस्कशन में रिजल्ट को सपोर्ट के लिए रेफरेंस से साध दिया जाता है। एड्स जैसे विषय को कथानक में टांकने की विधि तो डिजाइनर द्वारा कफ कॉलर या गले में खूबसूरती के लिए उपयोग किये दूसरे कपड़े को खपाने से भी प्रभावी लगी। 


भावनाओं, आवेग, संवेदना, दुख, भय, रूमानियत और रोमांस बिल्कुल किसी सुस्वादु व्यंजन की रेसिपी की तरह नपे तुले। अपने पहले ही प्रयास में वन्दना जी ने अपनी पहचान कुशल उपन्यासकार के रूप में करा दी है। पुस्तक का टंकण व मुद्रण, गुणवत्ता युक्त सामग्री व मनभावन आवरण के लिए APN प्रकाशन भी बधाई के हकदार हैं। 


वन्दना जी को इस अद्भुत पुस्तक हेतु हृदयतल से बधाइयाँ व अनन्त शुभकामनाएँ।

  
ये ऊपर लिखी समीक्षा इस लिंक पर उपलब्ध है :
 https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1743758729193049&set=a.1379869332248659.1073741828.100006768150236&type=3

जो पाठक ये उपन्यास पढना चाहते हैं वो अमेज़न से इस लिंक पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं :

http://www.amazon.in/gp/product/9385296256…



सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

RN Sharma जी की नज़र से 'अँधेरे का मध्य बिंदु '

एक विशुद्ध पाठक RN Sharma जी की नज़र से मेरे पहले उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु ' पर प्रतिक्रिया न केवल अभिभूत कर गयी बल्कि सोचने को विवश शायद जहाँ तक मेरी भी नज़र न गयी हो वहां तक एक पाठक देख लेता है और उसे जी भी लेता है . शायद इससे बढ़कर और क्या उपलब्धि होगी एक लेखक के लिए जहाँ उसे ऐसे पाठक मिलें जो न मुझे जानते हों न मेरे लेखन को ..........बस ‪#‎rashmiravija‬ के माध्यम से मेरे उपन्यास की समीक्षा पढ़ी हो और पढने को लालायित हो उठे और मँगवा लिया अमेज़न से फ़ौरन उपन्यास और उतनी ही जल्दी प्रतिक्रिया भी दे दी .........मैं तो धन्य हो गयी RN Sharmaजी आप जैसा पाठक पाकर smile emoticon smile emoticon
यूँ पुस्तक का लोकार्पण एक महिना पहले १५ जनवरी को हुआ था लेकिन कल का दिन भी मेरे जीवन में ख़ास अहमियत रखता है तो उस नज़र से एक शानदार तोहफा १५ फरवरी की पूर्व संध्या पर इस लिंक पर .....वैसे उन्होंने जो कहा वो भी लगा रही हूँ :

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10153424280523424&set=a.10150677555883424.399815.611073423&type=3&theater

RN Sharma with Rashmi Ravija and Vandana Gupta.
21 hrs ·
"अँधेरे का मध्य बिंदु"
"वंदना गुप्ता ने अपने इस पहले उपन्यास में जिस विषय के इर्द गिर्द कहानी का ताना बाना बुना है वो आज भी हमारे समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता पर वंदना जी को दाद तो देनी ही होगी की उन्होंने न सिर्फ इतने मुश्किल विषय को चुना बल्कि इसे एक अंजाम तक पहुचाया।
अब न तो शरत चंद्र के "देवदास" का जमाना है न रविन्द्र नाथ टेगोर के " नष्ट नीड" का। समय बदल गया है और पिछले दो दशक से तेज़ी से बदल रहा है। स्त्री पुरुष के संबंधो की नयी परिभाषाएं लिखी जा रहीं है। सम्बन्ध इतने गूढ़ और उलझे हुऐ हैं की उनको समझना दिन पे दिन मुश्किल होता जा रहा है।
इन स्त्री पुरुष के बदलते हुए संबंधो को और उनके अंतरंग पलों को अनीता देसाई ने अपने नोवेल्स में इतनी गहराई से छुआ है की देखते ही बनता है।
अनीता देसाई की ऐसी रचनाओ को पढ़ने के बाद भी मुझे वन्दना गुप्ता का ये उपन्यास पसंद आया इसे मैं उनकी इस विषय पर अच्छी पकड़ मानता हूँ।

पर फिर भी रवि और शीना जैसी समझदारी कुछ ही लोगों में होगी। अब तो दो दिन में मन भर गया लड़की अपने रास्ते और लड़का अपने घर गया ही चल रहा है। लिव इन रिलेशनशिप्स को निभाना इतना आसान नहीं है पर कुछ अड़चनों के बाबजूद रवि और शीना अंत तक डटे रहे। न सिर्फ डटे रहे बल्कि उन्होंने इतनी शिद्दत से अपने सम्बन्ध निभाए की देखते ही बनता है।
वंदना जी ने रवि और शीना की मुलाक़ात से लेकर अंत तक लगता है उन पलों को पास से देखा है। रियल लोकेशन्स और उनका ज़िक्र रवि और शीना की कहानी को असलियत की हद तक ले जाता है। पढ़ते समय मुझे कई बार ऐसा लगा की मैं बाराखंबा रोड से जनपथ कई बार गुज़रा हूँ और शीना की दुकान मुझे दिखाई दे रही है। इसी तरह वो दोनों ढलती हुई सुरमयी शाम के समय इंडिया गेट के लॉन में बेंच पे बैठे कई बार दिखाई दिए।
बीच बीच में कुछ Distractions हैं जो शायद कहानी को आगे बढातें हो पर मुझे ऐसा नहीं लगा। रवि और शीना का चरित्र चित्रण, उनका साथ बीता समय , आपसी नोक झोंक और अंतरंग पल इतने सुन्दर बन पड़ें है की पाठक का ध्यान वहीँ रहता है।
ऐसी रिलेशनशिप भी निभाई जा सकती है यही इस उपन्यास की खूबी है और इसके लिए वंदना गुप्ता बधाई की हक़दार है।
वंदना जी को बधाई।"
RN sharma 

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

रश्मि रविजा की नज़र में - अँधेरे का मध्य बिंदु




आजकल पति पत्नी के बीच अहम् का टकराव , एक दूसरे पर सर्वाधिकार की भावना ,परम्परागत रोल में बदलाव की वजह से काफी शादियाँ टूट रही हैं या सिर्फ ऊपर से साबुत दिखती हैं, अंदर गहरी खाईयां हैं .यही सब देख, युवा पीढी बहुत उलझन में है और शादी के नाम से ही घबराकर लिव -इन का ऑप्शन चुनने लगी है . अब सिर्फ उच्च वर्ग में ही नहीं ,मध्यम वर्ग में भी यह चलन बढ़ता जा रहा है .
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Vandana Gupta ने अपने उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु ' में इसी विषय को बहुत समग्रता से व्याख्यायित किया है. इसके हर पहलू पर प्रकाश डाला है. कोई भी रिश्ता ,प्रेम ,आपसी विश्वास ,समझदारी और एक दूसरे को दिए स्पेस पर आधारित हो, तभी सफल हो सकता है . इस उपन्यास के नायक-नायिका के दिल में जब प्रेम प्रस्फुटित होता है तो वे इस सम्बन्ध को आगे ले जाना चाहते हैं पर विवाह के बंधन में नहीं जकड़ना चाहते .बल्कि सिर्फ प्रेम और विश्वास को आधार बना 'लिव इन ' में रहते हैं. एक दूसरे के ऊपर कोई बंधन नहीं है, अपने किसी कार्य के लिए कोई सफाई नहीं देनी , घर खर्च और घर के कार्य में बराबर की हिस्सेदारी है .फलस्वरूप उनका सम्बन्ध सुचारू रूप से बिना किसी अडचन के आगे बढ़ता चला जाता है. नायक और नायिका दो अलग धर्म के हैं .उनके विवाह में कई बाधाएं आतीं .परन्तु लिव -इन जात पात से भी परे है.

समाज और नायक के परिवार वाले ऐसे सम्बन्ध पर आपत्ति जताते हैं . पर अगर लोग अच्छे इंसान हों, सच्चे नागरिक हों, अपना कर्तव्य निभाते हों, अच्छे पडोसी का धर्म निभाते हों तो समाज भी उन्हें सहज ही स्वीकार कर लेता है . जब उनपर आरोप लगाया जाता है कि पडोस की एक लड़की ने उनका अनुसरण करते हुए लिव- इन में रहने का फैसला किया है तो लड़की से बात करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वो इनका अनुसरण नहीं कर रही बल्कि अपने माता-पिता के रोज के झगड़े देखकर शादी के नाम से ही डर गई है. लेखिका पाठकों को ये सन्देश भी देती है कि किसी युवा युगल के 'लिव इन ' में रहने के निर्णय पर आक्रोश प्रकट करने से पहले ये देख लें कि वे खुद शादी का कैसा उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं . अगर शादी में रोज का कलह, स्वामित्व और गुलामी की परम्परागत सोच हो तो नई पीढ़ी इस से विमुख हो नए विकल्प तलाशेगी ही .
अक्सर लिव इन को पश्चिम की देन मान लिया जाता है .परन्तु लेखिका ने आदिवासियों में प्रचलित 'घोटुल ' प्रथा के विषय में विस्तार से लिख ये जानकारी दी है कि हमारे देश में ही समाज के कुछ हिस्सों में यह प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित है.
उपन्यास में एड्स से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी मिलती हैं . एड्स सिर्फ अवैध रिश्तों का परिणाम नहीं होता. कई कारणों से हो सकता है और सही इलाज ,देखभाल से एड्स के साथ भी बिलकुल सामान्य जीवन गुजारा जा सकता है . इसे इतना भयावह या एड्स ग्रसित रोगी को अछूत ना समझा जाए .
उपन्यास में यथार्थ के धरातल पर गंभीर विषयों के प्रादुर्भाव से पहले ,नायक-नायिका के बीच वर्षा की शीतल फुहार में भीगता ,नाजुक कली सा रोमांस भी है . इन दोनों का प्यार कैसे परवान चढ़ता है, क्या अड़चनें आती हैं, कैसे ये कहानी आगे बढ़ती है ,ये तो उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है. उपन्यास की भाषा सहज ही ग्राह्य है .लेखन का प्रवाह कहीं भी रुकने नहीं देता .
एक बिलकुल नए और कुछ हद तक विवादित विषय को उपन्यास का केंद्र बना उसपर विस्तार से लिखने के लिए वंदना बधाई की पात्र हैं. उनके इस उपन्यास के खूब सफल होने की अनेक शुभकामनाएं .आप सब यह उपन्यास जरूर पढ़ें .
निम्न लिंक पर यह किताब मंगवाई जा सकती है .
http://www.amazon.in/gp/product/9385296256


रश्मि रविजा द्वारा ऊपर लिखित समीक्षा जो इस लिंक पर उपलब्ध है :
https://www.facebook.com/rashmi.ravija/posts/10153997835102216?fref=nf