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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

तिरछी पड़ी यादें

आज भी तिरछी पड़ी हैं तुम्हारी यादें
और मैं रोज सुबकता न होऊं
ऐसा कोई लम्हा गुजरा ही नहीं
क्योंकि
इश्क का चन्दन जितना घिसा
उतना ही सुगन्धित होता गया

अब चिकनी सपाट सड़क पर भाग रहा हूँ
निपट अकेला ...

उधर
इख्तियार है तुम्हें भी
जुदाई की कोंपलों पर अश्रुपात करने का
कि
उग आये एक दास्ताँ हर दिल के सफ़हे पर
दिन-ब-दिन
और हो जाए मोहब्बत श्रृंगारिक ,अलंकारिक , गुंजारित

बस इतना सा तो सबब है
बाकि इस सत्य से कौन अनभिज्ञ है
रूहों के मिलन के मौसम आज के ज़माने का चलन नहीं ...

4 टिप्‍पणियां:

महेश कुशवंश ने कहा…

उग आये एक दास्ताँ हर दिल के सफ़हे पर
दिन-ब-दिन
और हो जाए मोहब्बत श्रृंगारिक ,अलंकारिक , गुंजारित

बेमिसाल भावना , अच्छे काव्य हेतु बधाई

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-03-2016) को "दुखी तू भी दुखी मैं भी" (चर्चा अंक - 2286) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आशु ने कहा…

अति सुन्दर रचना वंदना जी..बधाई!!

-आशु

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर दी