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शुक्रवार, 6 मार्च 2009

गर किसी को मिले मेरा पता

गुरुवार, 5 मार्च 2009

zakhm: एक कतरा खुशी

Wednesday, August 6, 2008

virhan का दर्द

virhan का दर्द sawan क्या जाने
कैसे कटते हैं दिन और कैसे कटती हैं रातें
बदल तो आकर बरस गए
चहुँ ओर हरियाली कर गए
मगर virhan का सावन तो सुखा रह गया
पीया बीना अंखियों से सावन बरस गया
सावन तो मन को उदास कर गया
बीजली बन कर दिल पर गिर गया
कैसे सावन की फुहार दिल को जलाती है
इस दर्द को तो एक virhan ही जानती है

आत्मकथा-----------प्रेम की

मैं प्रेम हूँ,प्यार हूँ,इश्क हूँ,मोहब्बत हूँ,इक अहसास हूँ,खुदा हूँ और न जाने क्या क्या हूँ.हर किसी के लिए अलग.किसी के दिल का चैन हूँ तो किसी के दिल का दर्द,किसी के लिए ख्वाब हूँ तो किसी के लिए हकीकत,किसी का जीवन हूँ तो किसी के लिए मौत...........................सबके अहसास , सबके दायरे, सबकी सोच सब अलग मगर फिर भी एक अलग पहचान लिए मैं हर दिल में पलता हूँ किसी न किसी रूप में.कभी प्रेमी के प्रेम में तो कभी माँ के दुलार में,कभी पिता के अहसास में तो कभी बेटी के जज़्बात में,कभी बहन के रूप में तो कभी भाई के रूप में,कभी पत्नी के खवाबों में तो कभी पति के दिल में,न जाने कितने ही असंख्य रूपों में लोग मुझे जानते हैं और मेरे साथ जीते हैं अपने हर गम और खुशी के पलों को.किसी ने मुझे इंसान में देखा तो किसी ने भगवान में , मगर पूरा किसी ने न जाना। जब जाना नही तो पाना कैसा?
मेरा रूप-सौंदर्य शाश्वत है। मैं कभी नही मरता,हमेशा हर हाल में जीवित रहता हूँ.मैं गीतों में , रंगों में,रूपों में जो भी जैसा चाहे ,हर हाल में ढल जाता हूँ.जिस बंधन में भी कोई बांधना चाहे बंध जाता हूँ। मेरा मुझमें कुछ नही है,जो कुछ है वो सामने वाले के मन में ,उसके विचारों में , उसकी सोच में , उसकी आंखों में ,उसके दिल में है, जैसा भी चाहता है मुझे रूप दे लेता है।
मेरे आनंद में सराबोर हर प्राणी मुझमें ही खुदा ढूंढता है और सच मानो तो खुदा बसता भी तो प्रेम में ही है.प्रेम को जानना क्या इतना आसान है.प्रेम को तो सिर्फ़ कुछ लोगों ने जाना और जिन्होंने जाना उन्होंने ही पाया.प्रेम हो तो राधा सा,मीरा सा -------जहाँ शरीर तो थे ही नही। था तो सिर्फ़ ---------प्रेम.प्रेम के अलावा वहां कुछ न था। क्या रस था , क्या आनंद था। इसे कहते हैं ----------प्रेम।
शाश्वत सत्य ,चिरंतन,दिव्यता के पार। मुझे जानना और पाना हर किसी के बस की बात कहाँ!मैं तो रस का महासागर हूँ जहाँ प्रेमी डूबते ही हैं-------बहुत गहरे अनंत में.
बहुत से लोगों ने मेरे बारे में न जाने सदियों से कितना लिखा और आज भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे मगर फिर भी मैं किसी की भी कविता में ,किसी भी लेख में क़ैद न हो पाया क्यूंकि मैं अनंत हूँ मैं भी शायद अपने बारे में पूरा सच नही बता सकता क्यूंकि मैं क्या हूँ -------------ये तो सिर्फ़ मुझमें डूबने वाला ही बता सकता है । जिसने इस रस में डुबकी लगायी है वो ही जानता है कि -----------मैं प्रेम हूँ.

सोमवार, 2 मार्च 2009

तेरे आने से पहले
और
तेरे जाने के बाद
तेरे रोने से पहले
और
तेरे हंसने के बाद
तेरे ग़मों से पहले
और
तेरी खुशियों के बाद
तेरी यादें,तेरी खामोशी,
तेरे दर्द,तेरे आंसू
आकर हमें घेर लेते हैं
कभी तन्हाई का
अहसास ही नही होता.

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

औरत का घर?

सदियों से औरत अपना घर ढूंढ रही है
उसे अपना घर मिलता ही नही
पिता के घर किसी की अमानत थी
उसके सर पर इक जिम्मेदारी थी
हर इच्छा को ये कह टाल दिया
अपने घर जाकर पूरी करना
पति के घर को अपनाया
उस घर को अपना समझ
प्यार और त्याग के बीजों को बोया
खून पसीने से उस बाग़ को सींचा
हर आह,हर दर्द को सहकर भी
कभी उफ़ न किया जिसने
उस पे ये इल्जाम मिला
ये घर तो तुम्हारा है ही नही
क्या पिता के घर पर देखा
वो सब जो यहाँ तुम्हें मिलता है
यहाँ हुक्म पति का ही चलेगा
इच्छा उसकी ही मानी जायेगी
पत्नी तो ऐसी वस्तु है
जो जरूरत पर काम आएगी
उसकी इच्छा उसकी भावना से
हमें क्या लेना देना है
वो तो इक कठपुतली है
डोर हिलाने पर ही चलना है
ऐसे में औरत क्या करे
कहाँ ढूंढें , कहाँ खोजे
अपने घर का पता पूछे
सारी उम्र अपनी हर
हर तमन्ना की
बलि देते देते भी
ख़ुद को स्वाहा करते करते भी
कभी न अपना घर बना सकी
सबको जिसने अपनाया
उसको न कोई अपना सका
आज भी औरत
अपना घर ढूंढ रही है
मगर शायद ......................
औरत का कोई घर होता ही नही
औरत का कोई घर होता ही नही

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

सिलवटें

बिस्तर की सिलवटें तो मिट जाती हैं
कोई तो बताये
दिल पर पड़ी सिलवटों को
कोई कैसे मिटाए
उम्र बीत गई
रोज सिलवटें मिटाती हूँ
मगर हर रोज
फिर कोई न कोई
दर्द करवट लेता है
फिर कोई ज़ख्म
हरा हो जाता है
और फिर एक नई
सिलवट पड़ जाती है
हर सिलवट के साथ
यादें गहरा जाती हैं
और हर याद के साथ
एक सिलवट पड़ जाती है
फिर दिल पर पड़ी सिलवट
कोई कैसे मिटाए

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

प्यार हो तो ऐसा

बर्फ की मानिन्द
सर्द हाथ को
जो छुआ उसने
कुछ कहने और सुनने
से पहले
वहीँ साँसे
थम गयीं
आँखें पथरा गयीं
और
रूह खामोश हो गई

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

दिमाग के कीडे

कहते हैं न की जब किसी चीज़ की धुन सवार हो जाए तो फिर उससे बचना मुश्किल है और उसे पाना इंसान की पहली जरूरत बन जाता है । शायद कुछ ऐसा ही हाल हमारा है जब तक कुछ न लिखो तब तक दिमाग में लिखने का कीडा कुलबुलाता रहता है । कितना ही समझा लो मगर सुनता कौन है । फिर चाहे उसका कोई सारगर्भित अर्थ हो या न हो मगर जनाब दिमाग को तो आराम करने की फुर्सत ही नही होती न । अगर न लिखें तो शायद फट ही जाएँ किसी न किसी पर । सच कुछ दिमाग ऐसे ही होते हैं । अब देखो हमारे दिमाग को ---------कुछ और न मिला तो यही लिखने बैठ गया । है न .........दिमाग का फितूर । अब इसे और क्या कहेंगे। सच ऐसे कीडे बहुत परेशां करते हैं कभी कभी ।
अब हम कहीं किसी जरूरी काम में बैठे हैं जहाँ बहुत ध्यान से कोई लिखा पढ़ी का काम करना हो तो जनाब वहां भी शुरू हो जाते हैं । अब पुचो इनसे की उस वक्त हम तुम्हें कैसे टाइम दें और जो तुम्हारे अन्दर कुलबुला रहा है उसे कैसे शब्दों में ढलकर पन्नों पर उतर दें। मगर नही जनाब........यह कहाँ मानने वाले हैं । यह वहां भी शुरू हो जाते हैं और जहाँ हिसाब लिखा जा रहा है उसी कागज़ के पीछे चालू हो जाते हैं ।
हद तो तब होती है जब हम उनके साथ होते हैं और ये जनाब अपने काम में लग जाते हैं । अब इनसे कोई पूछे उस वक्त हम इनके बारे में कैसे सोचें। जनाब कुछ वक्त तो आराम फरमा लिया करो ।
सच यह कीडा कुछ अजीबोगरीब होता है न वक्त देखता है और न जगह और शुरू हो जाता है .मुझे जैसे न जाने कितनो का जीना दुश्वार किए रखता है । लेकिन शायद इसके बिना हम जैसों की गति भी तो नही ।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

प्रेम का अनोखा स्वरुप

प्रेम का जो स्वरुप आज मैंने देखा है उसे देखकर ह्रदय आंदोलित हो गया .अभी मैंने राज्नीश्क्झा जी का ब्लॉग अनकही खोला और वहां प्रेम का स्वरुप देखकर अहसास हुआ की प्रेम क्या होता है कोई उन लोगों से सीखे.सच प्रेम का सच्चा स्वरुप तो वो ही है.आज लोग प्रेम को एक दिन का खेल बनाकर खेलते हैं यह उन लोगो के लिए एक सबक है । प्रेम एक ऐसी अनुभूति है जहाँ कोई प्रतिकार नही, कोई अपेक्षा नही सिर्फ़ त्याग , समर्पण , विश्वास और निस्वार्थ प्रेम।

प्रेम करना भी एक कला है । यह होता है अलोकिक प्रेम ---------जहाँ सिर्फ़ समर्पण है । हर अपेक्षा से परे । सिर्फ़ भावनाओं से लबरेज़ । इसे कहते हैं रूह से रूह का असली मिलन जहाँ शारीरिक विकलांगता गौण हो गई है और उस विकलांगता का कोई निशान वहां नही है ,हर चेहरा खुशी से भरपूर जीवन जी रहा है ।

ज़िन्दगी जीना कोई उनसे सीखे और प्रेम करना भी ।
प्रेम की पराकाष्ठा है -----------सारी ज़िन्दगी ऐसे प्रेम की हसरत ही रहती है मगर ऐसा प्रेम हर किसी का नसीब नही होता ।
खुदा प्रेम दे तो ऐसा दे
जहाँ प्रेम के सिवा कुछ न हो
प्रेम ही खुशी हो
प्रेम ही बलिदान हो
प्रेम ही समर्पण हो
प्रेम ही संसार हो
प्रेम के महासागर में
प्रेमानंद में डूबे
प्रेमियों का वास हो
खुदा प्रेम दे तो ऐसा दे...........


मैं यहाँ रजनीश जी के ब्लॉग का पता दे रही हूँ पहले उसे देखियेगा और फिर यह पढियेगा ।

rajneeshkjha.ब्लागस्पाट.कॉम

इसमें अनकही खोलियेगा तब प्रेम का अनोखा स्वरुप देखने को मिलेगा।

www.ankahi.tk

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

चाहतें कब ख़त्म होती हैं
चाहत तो पत्थर भी रखता है
कि कोई उसे भी देवता बना दे

रविवार, 8 फ़रवरी 2009

मोहब्बत ऐसे भी होती है शायद

न तुमने मुझे देखा
न कभी हम मिले
फिर भी न जाने कैसे
दिल मिल गए
सिर्फ़ जज़्बात हमने
गढे थे पन्नो पर
और वो ही हमारी
दिल की आवाज़ बन गए
बिना देखे भी
बिना इज़हार किए भी
शायद प्यार होता है
प्यार का शायद
ये भी इक मुकाम होता है
मोहब्बत ऐसे भी की जाती है
या शायद ये ही
मोहब्बत होती है
कभी मीरा सी
कभी राधा सी
मोहब्बत हर
तरह से होती है

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

दिल कि बात

दोस्तों,
मुझे उम्मीद नही थी कि दिल की बात टाइटल ही आप सबको इतना पसंद आएगा और आप जानना चाहेंगे दिल की बात ,क्यूंकि बात तो अधूरी ही थी न इसलिए मैंने सोचा दिल की बात की जाए .जो अभी अनकहा है वो अनकहा न रह जाए । मैं कोशिश करती हूँ कहने की मगर कह नही सकती किस हद तक कह पाऊँगी .आपका प्यार इसी तरह मिलता रहेगा मैं उम्मीद करती हूँ। आप सबने टाइटल पर ही इतने कमेन्ट दे दिए कि मैं मजबूर हो गई हूँ कि दिल कि बात कुछ तो कि जाए .आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद.

दिल कि बात

काश ! दिल कि बात कहना इतना आसां होता । हर जज़्बात को शब्दों में ढालकर बयां करना इतना आसां नही होता।
कुछ न कुछ कमी रह ही जाती है.हर अहसास को शब्द कहाँ मिलते हैं । कुछ दिल बातें दिल ही दिल में रह जाती हैं । दिल कि बात कहने में शब्द भी खामोश हो जाते हैं.सागर कि गहराई तो फिर भी मापी जा सकती है मगर दिल कि गहराई को कैसे मापें । कौन सा पैमाना खोजें जिससे दिल कि अंतरतम गहराइयों में छुपी दिल कि बात को बाहर ला सकें। दिल कि गहराइयों में छिपे मोती हर किसी को नही मिलते । इन मोतियों का खजाना हमेशा दिल में ही दफ़न रहता है, वहां तक किसी कि भी पैठ नही होती ----------दिल कि भी नही । जिस जगह दिल ख़ुद नही जा पाता , अपने अहसास को ख़ुद नही ढूंढ पाता तो फिर हम दिल कि बात कैसे कर सकते हैं ,कैसे उसे शब्दों में ढालकर कलमबद्ध कर सकते हैं ।
सच दिल कि बातें दिल भी नही जानता तो हम कैसे कहें .

ज़िन्दगी का हिसाब

आज बहुत दिनों बाद ख़ुद से रु-बी-रु हुयी
पूछा, क्या दिया ज़िन्दगी ने आज तलक
हिसाब लगाने बैठी तो पाया
कि जमा तो कुछ किया ही नही
सब कुछ खोकर भी
कुछ भी न पाया मैंने
दोनों हाथ खाली थे
जैसे आई थी दुनिया में
वैसे ही हाथों को पाया मैंने
कहने को भीड़ बहुत है साथ
मगर वो सिर्फ़ भीड़ है
उसमें सबने इक दर्द ही दिया
अब लगा चेतना होगा
कुछ अपने लिए करना होगा
हम किसी के लिए क्या करेंगे
जब अपने लिए ही न कर सके
अब ख़ुद के लिए जीना होगा
दुनिया के दिए हर गम को
एक गर्म हवा का झोंका
समझ भूल जाना होगा
ज़िन्दगी को नए सिरे से
जीने के लिए
नए रास्ते तलाशने होंगे
कुछ ऐसा कर जाना होगा
कि पीछे मुड़कर देखने पर
पांव के निशान नज़र आने लगें
जिन पर चलकर किसी को
जीवन कि डगर आसान लगे
उस पल लगेगा
जीना मुझको आ गया
ज़िन्दगी का हिसाब
अब बराबर हो गया
फिर न खोने का गम होगा
क्यूंकि
इक मुट्ठी खुशी ही काफी है
ज़िन्दगी गुजारने के लिए

बुधवार, 21 मई 2008

khamoshiyan

खामोशियों की जुबान नही होती,sirf dard और tanhaiyan ही साथी होते हैं ,
खामोशियों के dard को कोई समझ सके,ऐसा कोई dil नज़र नही आता ,
खामोशियों की आवाज़ बहुत खामोश होती है ,इसे सुनने की हर dil को आदत नही होती,
ऐसा कोई milta नही जो समझे इनकी जुबान को ,इन्हें तो कुछ भी कहने की आदत नही होती ,
खामोशियों के साथ sirf खामोश dil ही होता है,खामोशियों क पार तो खामोशी ही होती है,
इसलिए खामोशियों की जुबान नही होती,sirf एक अनसुनी अनकही खामोशी ही होती है

रविवार, 18 मई 2008

मासूम dil

dil kitna मासूम होता है ,जो भी इबारत पढता है ,likh लेता है,
मासूम को पता ही नही होता ,क्या likhna चाहिए और क्या नही ,
jise अपना बना लेता है उसका ही हो जाता है ,
kisi को भी पराया नही मानता,
dil kitna मासूम होता है,
हर dard को अपना बना लेता है ,
हर गम का राज सीने में छुपा लेता है ,
उफ़ भी नही करता ,खामोश सब सहे जाता है
सच dil kitna मासूम होता है,

मेरे पल

हर पल कुछ ख्वाब सजाते हैं हम और फिर उन्हें टूटते हुए देखते हैं ,
क्या ज़िंदगी बस ख्वाब सजाने और टूटने तक ही सिमट कर रह गई है
क्या हम कुछ और नही कर सकते या सोच सकते ,
क्या हमारे हाथ में कुछ भी नही है अब
कब तक हम अपने अरमानों को यूं ही दफ़न करते रहेंगे
कब तक यूं ही हर इम्तिहान में असफल होते रहेंगे हम
क्या ज़िंदगी में उससे आगे कुछ भी नही है
क्या हर पल हमसे कुछ न कुछ छीनता ही रहेगा
क्या कभी हम पलों को अपने दमन में बाँध न सकेंगे
क्या हर पल हम बस बेबस हुए दूर जाते हुए पल को देखते जायेंगे
और कुछ कर न पाएंगे
कोई टू बताये कैसे इन पलों को संजोयुं

रविवार, 6 अप्रैल 2008

न जाने कहाँ खो गए हम

जाने कहाँ खो गए हम
बहुत ढूँढा पर कहीं मिले हम
जाने कौन से मुकाम पर है ज़िंदगी
हर मोड़ पर एक इम्तिहान होता है
चाहतों के मायने बदल जाते हैं
जिनका इंसान तलबगार होता है
दुनिया की भीड़ में गूम हुयी जाती हूँ
ख़ुद को ढूँढने की कोशिश में
और बेजार हुयी जाती हूँ
क्या कभी ख़ुद को पा सकेंगे हम
इसी विचार में खोयी जाती हूँ

शनिवार, 18 अगस्त 2007

रिश्ते

मौसम की तरह रंग बदलते यह बेलिबास रिश्ते,
वक़्त की आँधियों में ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
हम रिश्तों की चादर ओढ़े हुये ऐसे मौसम में ,
दिल को यह समझाए चले जाते हैं,
मगर रिश्तों का बेगानापन हर पल यह बताता है,
पत्थरों के शहर में अपनों को खोजा जाता नहीं,
हर पल दर्द देते यह रिश्ते बेमानी हैं,
क्यूंकि पत्थरों से पत्थरों को तोड़ा जाता नहीं,
ग़र मौसम कि तरह हम भी बदल जाते हैं,
तो रिश्तों के अर्थ ना जाने कहॉ खो जाते हैं,
फिर क्यों हम ऐसे रिश्तों को ढोने को मजबूर हो,
जिनके लिबास वक़्त के साथ बदल जाते हैं

रिश्ते

रविवार, 5 अगस्त 2007

कुछ तो है

कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता
कहीँ चैन कहीँ आराम नहीं मिलता
ना जाने यह दिल क्या चाहता है
हर वक़्त कहीँ खोया रहता है
इसको ढूँढा बहुत मगर कहीँ मिलता नहीं
ना जाने कौन सी गलियों में गुम हो गया
इसकी ख्वाहिशों का कहीँ पता नहीं मिलता
कैसे मिले सुकून वो दवा नहीं मिलती
अरमानों को कहीँ मंजिल नहीं मिलती
कुछ तो है जो खो गया है
जिसे पाने के लिए ये दिल बेचैन हो गया है
दिल को खुद का पता नहीं मिलता
कुछ तो है जो दिल को सुकून नहीं मिलता

बुधवार, 4 जुलाई 2007

ख्वाब

मैंने एक ख्वाब देखा है ,चाहतों का बाज़ार देखा है,
यह कौन सी मंज़िल है,जो मिल कर भी नहीं मिलती ,
हर तरफ एक खामोशी सी छाई है , दर्द है तनहाई है,
यह कौन सा मुकाम है जिन्दगी का, जहाँ कुछ नहीं मिलता ,
सिर्फ ख्वाबों को टूटते देखा और जिन्दगी को हाथ से फिसलते देखा ,
अब इस दौर मैं कैसे ख्वाबों को सजाऊँ ?
किसे आवाज़ दूं और किसे बुलाऊं ?

दिल चाहता है

दिल चाहता है आसमान में ऊड़ना,
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।